अध्याय 5 यूक्िलड की ज्यामिति का परिचय 5ण्1 भूमिका शब्द ‘ज्यामिति’ ;हमवउमजतलद्ध यूनानी भाषा के शब्दों ‘जियो’ ;हमवद्ध और ‘मीट्रीन’ ;उमजतमपदद्ध से मिल कर बना है। जियो का अथर् है ‘पृथ्वी’ या ‘भूमि’ और मीट्रीन का अथर् है ‘मापना’। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि ज्यामिति का उद्गम भूमि मापने की आवश्यकता के कारण हुआ है। गण्िात की इस शाखा का अध्ययन विभ्िान्न रूपों में प्रत्येक प्राचीन सभ्यताओं द्वारा किया गया, चाहे वह मिस्र हो, बेबीलोन हो, चीन हो, भारत हो, यूनान हो या इनकास ;पदबंेद्धए इत्यादि। इन सभ्यताओं के लोगों को अनेक व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ा जिनमें ज्यामिति के विकास की विभ्िान्न प्रकार से आवश्यकता पड़ी। उदाहरण के तौर पर, जब भी नील नदी में बाढ़ आती थी, तो विभ्िान्न भूमि स्वामियों के संलग्न खेतों के बीच की परिसीमाओं ;इवनदकंतपमेद्ध को अपने साथ बहा ले जाती थी। इन बाढ़ों के बाद, इन परिसीमाओं को पुनः बनाया जाता था। इस कायर् के लिए, मिस्रवासियों ने सरल क्षेत्रापफल परिकलित करने के साथ ही सरल रचनाएँ करने के लिए, अनेक ज्यामितीय तकनीवेंफ और नियम विकसित किए। उन्होंने ज्यामिति के ज्ञान का उपयोग अन्नभण्डारों के आयतन निकालने तथा नहरों और पिरामिडों ;चलतंउपकेद्ध के निमार्ण करने में किया। वे एक कटे हुए पिरामिड ;जतनदबंजमक चलतंउपकद्ध आकृति 5ण्1 रू कटा हुआ पिरामिड ;देख्िाए आकृति 5.1द्ध का आयतन ज्ञात करने का सही सूत्रा भी जानते थे। आप जानते हैं कि पिरामिड एक ऐसी ठोस आकृति होती है, जिसका आधार एक त्रिाभुज या वगर् या कोइर् अन्य बहुभुज होता है और जिसके पाश्वर् पफलक ;ेपकम ंिबमे या संजमतंस ंिबमेद्धए ऊपर एक ही बिंदु पर मिलने वाले त्रिाभुज होते हैं। भारतीय उप - महाद्वीप में, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो, इत्यादि की खुदाइयों से यह पता लगता है कि सिन्ध्ु घाटी की सभ्यता ;लगभग 3000 इर्॰पू॰द्ध ने ज्यामिति का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया। वह एक उच्च कोटि का संगठित समाज था। शहर अत्याध्िक रूप से विकसित थे और बड़े योजनाब( ढंग से निमिर्त किए गए थे। उदाहरणाथर्, सड़वेंफ परस्पर समांतर होती थीं और भूमिगत नालियों की व्यवस्था थी। घरों में विभ्िान्न प्रकार के अनेक कमरे हुआ करते थे। ये बातें दशार्ती हैं कि नगरवासी क्षेत्रामिति ;उमदेनतंजपवदद्ध और व्यावहारिक अंकगण्िात में पूणर् रूप से निपुण थे। निमार्ण कायर् में प्रयोग की जाने वाली ईंटें भट्टों पर पकाइर् ;बनाइर्द्ध जाती थीं और इन ईंटों के लिए अनुपात लम्बाइर्: चैड़ाइर्: मोटाइर्, 4: 2: 1 होता था। प्राचीन भारत में, सुल्बासूत्रा ;800 इर्॰पू॰ - 500 इर्॰पू॰द्ध ज्यामितीय रचनाओं के लिए महत्वपूणर् ग्रंथ थे। वैदिक काल की ज्यामिति का उद्गम वैदिक पूजा के लिए आवश्यक भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार की वेदियों और अग्िन - वुफण्डों के निमार्ण कायर् से हुआ। पवित्रा अग्िनयों को अध्िक प्रभावशाली साध्क होने के लिए, उनके स्थान, उनके आकारों और क्षेत्रापफलों के बारे में स्पष्ट रूप से निधर्रित अनुदेशों के अनुसार, होते थे। घरेलू धमिर्क ियाओं के लिए,वगार्कार और वृत्ताकार वेदियों का प्रयोग किया जाता था, जबकि सावर्जनिक पूजा स्थलों के लिए आयतों, त्रिाभुजों और समलंबों के संयोजनों ;मिले जुलेद्ध से बने आकारों का प्रयोग आवश्यक होता था। ;अथवर्वेद में दिएद्ध ‘श्रीयंत्रा’ में एक दूसरे के साथ जुड़े नौ समद्विबाहु त्रिाभुज अंतनिर्हित हैं। ये त्रिाभुज इस प्रकार व्यवस्िथत किए गए हैं कि इनसे 43 छोटे ;या गौणद्ध त्रिाभुजों का निमार्ण होता है। यद्यपि वेदियों की रचना करने में परिशु( ज्यामितीय विध्ियों का उपयोग किया गया था, पिफर भी इनसे संबंध्ित सि(ांतों की कोइर् चचार् नहीं की गइर्। उपरोक्त उदाहरण यह दशार्ते हैं कि ज्यामिति का विकास और अनुप्रयोग विश्व के सभी स्थानों पर होता रहा। परन्तु यह बड़े अव्यवस्िथत प्रकार से हो रहा था। प्राचीन विश्व में, ज्यामिति के विकास की इन गतिविध्ियों की एक रोचक बात यह है कि इनका ज्ञान एकपीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को या तो मौख्िाक रूप से या ताड़ के वृक्ष की पिायों पर लिखे संदेशों या वुफछ अन्य विध्ियों द्वारा दिया जाता रहा। साथ ही, हम यह भी पाते हैं कि वुफछ सभ्यताओं, जैसे कि बेबीलोनिया मंे, ज्यामिति एक अत्याध्िक व्यावहारिक दृष्िटकोण वाले विषय तक सीमित रही तथा ऐसा ही भारत और रोम में रहा। मिस्रवासियों द्वारा विकसित की गइर् ज्यामिति में मुख्यतः परिणामों के कथन ही निहित थे। इनमें प्रियाओं ;अथवा विध्ियोंद्ध के कोइर् व्यापक नियम नहीं दिए गए। वस्तुतः बेबीलोन और मिस्रवासियों दोनों ही ने ज्यामिति का उपयोग अध्िकांशतः व्यावहारिक कायो± के लिए ही किया तथा उसको एक क्रमब( विज्ञान के रूप में विकसित करने के लिए बहुत कम काम किया। परन्तु यूनान जैसी सभ्यताओं में इस तवर्फ पर बल दिया जाता था कि कुछ रचनाएँ किस प्रकार हो जाती हैं। यूनानियों की अभ्िारुचि उन कथनों, जिनको उन्होंने स्थापित किया था, की सत्यता निगमनिक तवर्फण ;कमकनबजपअम तमंेवदपदहद्ध का उपयोग करके जाँचने में थी ;देख्िाए परिश्िाष्ट 1द्ध। एक यूनानी गण्िातज्ञ थेल्स ;ज्ींसमेद्ध को श्रेय जाता है किउन्होंने सबसे पहली ज्ञात उपपिा ;चतववद्धि प्रदान की। यहउपपिा इस कथन की थी कि वृत्त का व्यास वृत्त को समद्विभाजित ;अथार्त् दो बराबर भागों में विभाजितद्ध करता है। थेल्स का एक सबसे प्रसि( श्िाष्य पाइथागोरस ;572 इर्॰पू॰द्ध था, जिसका नाम आपने अवश्य सुना होगा। पाइथागोरस और थेल्सउसके साथ्िायों ने अनेक ज्यामितीय गुणों की खोज की और ;640 साúयुúपूú - 546 साúयुúपूúद्धज्यामिति के सि(ांतों का अत्याध्िक विकास किया। यह आकृति 5ण्2 प्रिया 300 इर्॰पू॰ तक जारी रही। इसी समय मिस्र में अलेक्जेंडिªया के एक गण्िात के श्िाक्षक यूक्िलड ;म्नबसपकद्ध ने उस समय तक ज्ञात गण्िात के सभी ज्ञान को एकत्रिात किया और एलीमेंट्स ;म्समउमदजेद्ध नामक अपने प्रसि( ग्रंथ के रूप में उसे व्यवस्िथत किया। उन्होंने एलीमेंट्स को 13 अध्यायों में विभाजित किया, जिनमें से प्रत्येक को ‘पुस्ितका’ माना जाता है। यूक्िलडइन पुस्ितकाओं ने समस्त विश्व की ज्यामिति संबंध्ी समझ को;325 साúयुúपूú - 265 साúयुúपूúद्धआने वाली पीढि़यों तक प्रभावित किया। आकृति 5ण्3 इस अध्याय में, हम ज्यामिति के प्रति यूक्िलड के दृष्िटकोण की चचार् करेंगे और ज्यामिति के वतर्मान स्वरूप से इसे जोड़ने का प्रयत्न करेंगे। 5ण्2 यूक्िलड की परिभाषाएँ, अभ्िागृहीत और अभ्िाधरणाएँ यूक्िलड के समय के यूनानी गण्िातज्ञों ने ज्यामिति को उस विश्व का एक सि(ांतीय प्रतिमान ;उवकमसद्ध सोचा जिसमें वे रहते थे। बिंदु ;चवपदजद्धए रेखा ;सपदमद्धए तल ;चसंदमद्ध ख्या पृष्ठ ;ेनतंिबमद्ध,ए इत्यादि की अवधरणाएँ उन वस्तुओं से स्थापित की गईं जो उनके आस - पास थीं। आकाश ;ेचंबमद्ध और उनके आस - पास के ठोसों के अध्ययनों के आधर पर, एक ठोस वस्तु की सि(ांतीय ज्यामितीय अवधरणा विकसित की गइर्। एक ठोस ;ेवसपकद्ध का आकार होता है, माप और स्िथति होती है तथा उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है। इसकी परिसीमाएँ पृष्ठ ;ेनतंिबमद्ध कहलाती हैं। ये आकाश के एक भाग को दूसरे भाग से पृथक करती हैं और इनकी कोइर् मोटाइर् नहीं होती। पृष्ठों की परिसीमाएँ वक्र ;बनतअमेद्ध या सीधी रेखाएँ ;सपदमेद्ध होती हैं। इन रेखाओं के सिरे बिंदु ;चवपदजेद्ध होते हैं। ठोसों से बिंदुओं ;ठोस - पृष्ठ - रेखाएँ - बिंदुद्ध तक के तीन चरणों पर विचार कीजिए। प्रत्येक चरण में, हम एक विस्तार, जिसे हम विमा ;कपउमदेपवदद्ध भी कहते हैं, से वंचित होते हैं। इसलिए, यह कहा जाता है कि एक ठोस की तीन विमाएँ होती हैं, एक पृष्ठ की दो विमाएँ, एक रेखा की एक विमा होती है और एक बिंदु की कोइर् विमा नहीं होती। यूक्िलड ने इन कथनों को संक्ष्िाप्त रूप से परिभाषाओं के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने इन रहस्योदघाटनों का प्रारम्भ ‘एलीमेंट्स’ की पुस्तक 1 में 23 परिभाषाएँ ;कमपिदपजपवदेद्ध देकर किया। इनमें से वुफछ परिभाषाएँ नीचे दी जा रही हैंः 1ण् एक बिंदु ;चवपदजद्ध वह है जिसका कोइर् भाग नहीं होता। 2ण् एक रेखा ;सपदमद्ध चैड़ाइर् रहित लम्बाइर् होती है। 3ण् एक रेखा के सिरे बिंदु होते हैं। 4ण् एक सीध्ी रेखा ऐसी रेखा है जो स्वयं पर बिंदुओं के साथ सपाट रूप से स्िथत होती है। 5ण् एक पृष्ठ ;ेनतंिबमद्ध वह है जिसकी केवल लम्बाइर् और चैड़ाइर् होती है। 6ण् पृष्ठ के किनारे ;मकहमेद्ध रेखाएँ होती हंै। 7ण् एक समतल पृष्ठ ;चसंदम ेनतंिबमद्ध ऐसा पृष्ठ है जो स्वयं पर सीध्ी रेखाओं के साथ सपाट रूप से स्िथत होता है। यदि आप ध्यानपूवर्क इन परिभाषाओं को देखें, तो आप पाएँगे कि वुफछ पदों जैसे भाग, चैड़ाइर्, लम्बाइर्, सपाट रूप से, इत्यादि को स्पष्ट रूप से आगे और अध्िक समझाने की आवश्यकता है। उदाहरणाथर्, बिंदु की परिभाषा पर विचार कीजिए जो यूक्िलड ने दी है। इस परिभाषा में, ‘एक भाग’ को परिभाष्िात करने की आवश्यकता है। मान लीजिए कि हम यह परिभाष्िात करें कि एक भाग वह है जो ‘क्षेत्रा’ घेरता है, तो हमें पुनः ‘क्षेत्रा’ को परिभाष्िात करने की आवश्यकता होगी। अतः एक वस्तु को परिभाष्िात करने के लिए, आपको अनेक वस्तुओं को परिभाष्िात करने की आवश्यकता होती है और बिना किसी अंत के परिभाषाओं की एकलम्बी शृंखला प्राप्त हो सकती है। इन्हीं कारणवश, गण्िातज्ञों द्वारा यह सुविधाजनक पाया गया कि वुफछ ज्यामितीय पदों को अपरिभाष्िात ;नदकमपिदमक द्ध मान लिया जाए। इस विध्ि से, हमएक बिंदु की ज्यामितीय संकल्पना का ऊपर दी हुइर् ‘परिभाषा’ की तुलना में एक बेहतर अंतज्ञार्नात्मक आभास प्राप्त करेंगे। इसलिए, हम बिंदु को एक सूक्ष्म बिंदी ;कवजद्ध से निरूपित करते हैं, परन्तु इस सूक्ष्म बिंदी की वुफछ न वुफछ विमा अवश्य होती है। इसी प्रकार की समस्या उपरोक्त परिभाषा 2 में भी आती है। इसमें चैड़ाइर् और लम्बाइर् का संदभर् आता है और इनमें से किसी को भी पहले परिभाष्िात नहीं किया गया है। इसी कारण, किसी भी विषय के अध्ययन के लिए वुफछ पदों को अपरिभाष्िात रखा गया है। इसलिए, ज्यामिति में हम बिंदु, रेखा और तल ;यूक्िलड के शब्दों में समतल पृष्ठद्ध को अपरिभाष्िात शब्दों के रूप में मान कर चलते हैं। केवल यह बात अवश्य है कि हम इन्हें अंतज्ञार्नात्मक रूप से निरूपित कर सकते हैं अथवा ‘भौतिक प्रतिमानों’ ;वस्तुओंद्ध की सहायता से स्पष्ट कर सकते हैं। अपनी इन परिभाषाओं से प्रारम्भ करते हुए, यूक्िलड ने वुफछ गुणों को बिना सि( किए सत्य कथन मानने की कल्पना की। ये कल्पनाएँ वास्तव में ‘स्पष्टतः सवर्व्यापी सत्य’ थे। उन्होंने इनको दो वगो± में विभाजित किया। ये वगर् थे: अभ्िागृहीत ;ंगपवउेद्ध और अभ्िाधारणाएँ ;चवेजनसंजमेद्ध। उन्होंने अभ्िाधरणा शब्द का प्रयोग उन कल्पनाओं के लिए किया जो विश्िाष्ट रूप से ज्यामिति से संबंध्ित थीं। दूसरी ओर, सामान्य अवधरणाएँ ¹जिन्हंे प्रायः अभ्िागृहीत ;ंगपवउेद्ध कहा गयाह् वे कल्पनाएँ थीं जिन्हें निरंतर गण्िात में प्रयोग किया गया और जिनका केवल ज्यामिति से ही विशेष संबंध् नहीं था। अभ्िागृहीत और अभ्िाधारणाओं की और अध्िक जानकारी के लिए परिश्िाष्ट 1 को देख्िाए। यूक्िलड के वुफछ अभ्िागृहीतों को, बिना उनके द्वारा दिए क्रम के, नीचे दिया जा रहा हैः ;1द्ध वे वस्तुएँ जो एक ही वस्तु के बराबर हों एक दूसरे के बराबर होती हैं। ;2द्ध यदि बराबरों को बराबरों में जोड़ा जाए, तो पूणर् भी बराबर होते हैं। ;3द्ध यदि बराबरों को बराबरों में से घटाया जाए, तो शेषपफल भी बराबर होते हैं। ;4द्ध वे वस्तुएँ जो परस्पर संपाती हों, एक दूसरे के बराबर होती हैं। ;5द्ध पूणर् अपने भाग से बड़ा होता है। ;6द्ध एक ही वस्तुओं के दुगुने परस्पर बराबर होते हैं। ;7द्ध एक ही वस्तुओं के आध्े परस्पर बराबर होते हैं। ये सामान्य अवधरणाएँ किसी प्रकार के परिमाणों ;उंहदपजनकमेद्ध के संदभर् में कही गइर्हैं। पहली सामान्य अवधरणा को समतलीय आकृतियों के लिए प्रयोग किया जा सकता है। उदाहरणाथर्, यदि एक त्रिाभुज का क्षेत्रापफल एक आयत के क्षेत्रापफल के बराबर हो और इस आयत का क्षेत्रापफल एक वगर् के क्षेत्रापफल के बराबर हो, तो त्रिाभुज का क्षेत्रापफल भी वगर् के क्षेत्रापफल के बराबर होगा। एक ही प्रकार के परिमाणों की तुलना की जा सकती है और उन्हें जोड़ा भी जा सकता है, परंतु भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार के परिमाणों की तुलना नहीं की जा सकती है। उदाहरणाथर्, एक रेखा को एक आयत में जोड़ा नहीं जा सकता और न ही एक कोण की एक पंचभुज ;चमदजंहवदद्ध से तुलना की जा सकती है। ऊपर दिया हुआ चैथा अभ्िागृहीत यह बताता हुआ प्रतीत होता है कि यदि दो वस्तुएँ सवर्सम ;पकमदजपबंसद्ध हों ;अथार्त् वे एक ही होंद्ध, तो वे बराबर होती हैं। दूसरे शब्दों में, कोइर् भी वस्तु स्वयं के बराबर होती है। यह अध्यारोपण ;ेनचमतचवेपजपवदद्ध के सि(ांत की तवर्फसंगतता प्रकट करता है। अभ्िागृहीत ;5द्ध ‘से बड़ा है ;हतमंजमत जींदद्ध’ की परिभाषा देता है। उदाहरणाथर्, यदि कोइर्राश्िा ठए किसी अन्य राश्िा । का एक भाग हो, तो । को राश्िा ठ और एक अन्य राश्िा ब् के योग के रूप में लिखा जा सकता है। सांकेतिक रूप से, । झ ठ का अथर् है कि कोइर् ब् ऐसा है कि । त्र ठ ़ ब् है। आइए अब यूक्िलड की पाँच अभ्िाधरणाओं ;चवेजनसंजमेद्ध की चचार् करें। ये इस प्रकार हैंः अभ्िाधरणा 1 रू एक बिंदु से एक अन्य बिंदु तक एक सीध्ी रेखा खींची जा सकती है। ध्यान दीजिए कि यह अभ्िाधरणा हमें बताती है कि दो भ्िान्न ;कपेजपदबजद्ध बिंदुओं से होकर कम से कम एक रेखा अवश्य खींची जा सकती है, परन्तु इससे यह नहीं ज्ञात होता कि ऐसी एक से अध्िक सीध्ी रेखाएँ नहीं हो सकतीं। परन्तु अपने समस्त कायो± में यूक्िलड ने, बिना वुफछ बताए, यह बार - बार कल्पना की है कि दो भ्िान्न बिंदुओं से एक अद्वितीय ;नदपुनमद्ध रेखा ही खींची जा सकती है। हम इस परिणाम को एक अभ्िागृहीत के रूप में नीचे दे रहे हैंः अभ्िागृहीत 5ण्1 रू दिए हुए दो भ्िान्न बिंदुओं से होकर एक अद्वितीय रेखा खींची जा सकती है। बिंदु च् से होकर कितनी रेखाएँ खींची जा सकती हैं जो बिंदु फ से होकर भी जाती हों;देख्िाए आकृति 5.4द्ध? केवल एक। यह रेखा च्फ है। बिंदु फ से होकर जाने वाली ऐसी कितनी रेखाएँ हैं जो बिंदु च् से होकर भी जाती है? केवल एक, अथार्त् रेखा च्फ। इस प्रकार, उपरोक्त कथन एक स्वयं सि( ;ेमस िमअपकमदजद्ध सत्य है और इसीलिए हम इसे एक अभ्िागृहीत के रूप में मान लेते हैं। आकृति 5ण्4 अभ्िाधरणा 2 रू एक सांत रेखा ;जमतउपदंजमक सपदमद्ध को अनिश्िचत रूप से बढ़ाया जा सकता है। ध्यान दीजिए जिसको हम आजकल रेखाखंड ;सपदम ेमहउमदजद्ध कहते हैं, उसे यूक्िलड ने सांत रेखा कहा था। अतः, वतर्मान की भाषा में, दूसरी अभ्िाधरणा यह कहती है कि एकरेखाखंड को दोनों ओर विस्तृत करके एक रेखा बनाइर् जा सकती है ;देख्िाए आकृति 5.5द्ध। आकृति 5ण्5 अभ्िाधरणा 3 रू किसी को केन्द्र मान कर और किसी त्रिाज्या से एक वृत्त खींचा जा सकता है। अभ्िाधरणा 4 रू सभी समकोण एक दूसरे के बराबर होते हैं। अभ्िाधरणा 5 रू यदि एक सीध्ी रेखा दो सीध्ी रेखाओं पर गिर कर अपने एक ही ओर दो अंतः कोण ;पदजमतपवत ंदहसमेद्ध इस प्रकार बनाए कि इन दोनों कोणों का योग मिल कर दो समकोणों से कम हो, तो वे दोनों सीध्ी रेखाएँ अनिश्िचत रूप से बढ़ाए जाने पर उसी ओर मिलती हैं जिस ओर यह योग दो समकोणों से कम होता है। उदाहरणाथर्, आकृति 5.6 में, रेखा च्फ रेखाओं ।ठ और ब्क् पर इस प्रकार गिरती है कि अंतः कोणों 1 और 2 का योग, जो च्फ के बाईं ओर स्िथत हैं, 180ह् से कम है। अतः, रेखाएँ ।ठ और ब्क् अंततः च्फ के बाईं ओर आकृति 5.6प्रतिच्छेद करेंगी। उपरोक्त पाँचों अभ्िाधरणाओं को केवल देखने मात्रा से, हमें यह स्पष्टतः पता चल जाएगा कि अन्य अभ्िाधारणाओं की तुलना में अभ्िाधरणा 5 वुफछ अध्िक जटिल है। दूसरी ओर, अभ्िाधरणाएँ 1 से 4 इतनी सरल और स्पष्ट हैं कि उन्हें स्वयं सि( सत्य के रूप में मानलिया जाता है। परन्तु, इन्हें सि( करना संभव नहीं है। इसलिए, इन कथनों को बिना उपपिा ;चतववद्धि के स्वीकृत कर लिया गया है ;देख्िाए परिश्िाष्ट 1द्ध। इस जटिलता के कारण, पाँचवीं अभ्िाधरणा पर अगले अनुच्छेद में अध्िक ध्यान दिया जाएगा। आजकल, ‘अभ्िाधरणा’ और ‘अभ्िागृहीत’ दोनों पदों को एक दूसरे के लिए एक ही अथर् में प्रयोग किया जाता है। वास्तव में, अभ्िाधरणा एक िया ;अमतइद्ध है। जब हम कहते हैं कि ‘आइए अभ्िाधारणा करें’, तो इसका अथर् है कि ‘आइए विश्व में प्रेक्ष्िात परिघटनाओं ;चीमदवउमदंद्ध के आधर पर वुफछ कथन कहें।’ इसकी सत्यता/मान्यता की जाँच बाद में कीजाती है। यदि वह सत्य है, तो उसे ‘अभ्िाधारणा’ के रूप में स्वीकृत कर लिया जाता है। वुफछ अभ्िागृहीतों का एक निकाय ;ेलेजमउद्ध अविरोध्ी ;बवदेपेजमदजद्ध कहलाता है ;देख्िाए परिश्िाष्ट 1द्ध, यदि इन अभ्िागृहीतों से ऐसा कथन निमिर्त करना असंभव हो, जो किसी अन्य अभ्िागृहीत या पहले सि( किए गए किसी कथन के विरोध्ी ;बवदजतंकपबजवतलद्ध हो। अतः, यदि अभ्िागृहीतों का कोइर् निकाय दिया हो, तो यह सुनिश्िचत करना आवश्यक है कि यह निकाय अविरोध्ी हो। यूक्िलड ने अपनी अभ्िाधरणाएँ और अभ्िागृहीतों को देने के बाद, इनका प्रयोग अन्य परिणामों को सि( करने में किया। पिफर इन परिणामों का प्रयोग करके, उन्होंने निगमनिक तवर्फण ;कमकनबजपअम तमंेवदपदहद्ध द्वारा वुफछ और परिणामों को सि( किया। जिन कथनों को सि( किया वे साध्य ;चतवचवेपजपवदेद्ध या प्रमेय ;जीमवतमउेद्ध कहलाती थीं। यूक्िलड ने अपनी अभ्िागृहीतों, अभ्िाधरणाओं, परिभाषाओं और पहले सि( की गइर् प्रमेयों का प्रयोगकरके, एक ताविर्फक शृंखला में 465 साध्य निगमित ;कमकनबमद्ध किए। ज्यामिति के वुफछ अगले अध्यायों में आप इन अभ्िागृहीतों का प्रयोग करके वुफछ प्रमेयों को सि( करेंगे। आइए आगे आने वाले उदाहरणों में देखें कि यूक्िलड ने वुफछ परिणामों को सि( करने के लिए अपनी अभ्िागृहीतों और अभ्िाधरणाओं का किस प्रकार प्रयोग किया। उदाहरण 1 रू यदि ।ए ठ और ब् एक रेखा पर स्िथत तीन बिंदु हैं और ठ बिंदुओं । और ब् के बीच में स्िथत है ;देख्िाए आकृति 5.7द्ध, तो सि( कीजिए कि ।ठ ़ ठब् त्र ।ब् है। आकृति 5ण्7 हल रू उपरोक्त आकृति में, ।ठ ़ ठब् के साथ ।ब् संपाती है। साथ ही, यूक्िलड का अभ्िागृहीत ;4द्ध कहता है कि वे वस्तुएँ जो परस्पर संपाती हों एक दूसरे के बराबर होती हैं। अतः, यह सि( किया जा सकता है कि ।ठ ़ ठब् त्र ।ब् है। ध्यान दीजिए कि इस हल में यह मान लिया गया है कि दो बिंदुओं से होकर एक अद्वितीय रेखा खींची जा सकती है। उदाहरण 2 रू सि( कीजिए कि एक दिए हुए रेखाखंड पर एक समबाहु त्रिाभुज की रचना की जा सकती है। हल रू उपरोक्त कथन में, एक दी हुइर् लम्बाइर् का एक रेखाखंड, मान लीजिए, ।ठ दिया है ख्देख्िाए आकृति 5ण्8 ;पद्ध,। आकृति 5ण्8 यहाँ आपको वुफछ रचना करने की आवश्यकता है। यूक्िलड की अभ्िाधरणा ;3द्ध का प्रयोग करके, आप बिंदु । को केन्द्र और ।ठ त्रिाज्या लेकर एक वृत्त खींच सकते हैं ख्देख्िाए आकृति 5ण्8 ;पपद्ध,। इसी प्रकार, ठ को केन्द्र मानकर और ठ। त्रिाज्या लेकर एक अन्यवृत्त खींचा जा सकता है। ये दोनों वृत्त मान लीजिए बिंदु ब् पर मिलते हैं। अब रेखाखंडों ।ब् और ठब् खींच कर Δ ।ठब् बनाइए ख्देख्िाए आकृति 5ण्8 ;पपपद्ध,। इसलिए, आपको सि( करना है कि यह त्रिाभुज एक समबाहु त्रिाभुज हैऋ अथार्त् ।ठ त्र ।ब् त्र ठब् है। अब, ।ठ त्र ।ब् है, क्योंकि ये एक वृत्त की त्रिाज्याएँ हैं। ;1द्ध इसी प्रकार, ।ठ त्र ठब् ;एक ही वृत्त की त्रिाज्याएँद्ध ;2द्ध उपरोक्त दोनों तथ्यों और यूक्िलड के पहले अभ्िागृहीत ;वे वस्तुएँ जो एक ही वस्तु के बराबर होती हैं एक दूसरे के बराबर होती हैंद्ध से आप निष्कषर् निकाल सकते हैं कि ।ठ त्र ठब् त्र ।ब् है। अतः, Δ ।ठब् एक समबाहु त्रिाभुज है। ध्यान दीजिए कि यहाँ यूक्िलड ने, बिना कहीं बताए, यह मान लिया है कि केन्द्रों । और ठ को लेकर खींचे गए वृत्त परस्पर एक बिंदु पर मिलेंगे। अब हम एक प्रमेय सि( करेंगे जो विभ्िान्न परिणामों में अनेक बार अध्िकांशतः प्रयोग की जाती हैः प्रमेय 5ण्1 रू दो भ्िान्न रेखाओं में एक से अध्िक बिंदु उभयनिष्ठ नहीं हो सकता। उपपिारू यहाँ, हमें दो रेखाएँस औरउ दी हुइर् हैं। हमें यह सि( करना है कि स औरउ में केवल एक बिंदु उभयनिष्ठ है। थोड़े समय के लिए, यह मान लीजिए कि ये दो रेखाएँ दो भ्िान्न बिंदुओं च् और फ पर प्रतिच्छेद करती हैं। इस प्रकार, दो भ्िान्न बिंदुओं च् और फ से होकर जाने वाली आपके पास दो रेखाएँ स और उ हो जाती हैं। परन्तु यह कथन अभ्िागृहीत 5.1 के विरु( है, जिसके अनुसार दो भ्िान्न बिंदुओं से होकर एक अद्वितीय रेखा खींची जा सकती है। अतः, हम जिस कल्पना से चले थे कि दो रेखाएँ दो भ्िान्न बिंदुओं से होकर जाती हैं गलत है। इससे हम क्या निष्कषर् निकाल सकते हैं? हम निष्कषर् निकालने पर बाध्य हो जाते हैं कि दो भ्िान्न रेखाओं में एक से अध्िक बिंदु उभयनिष्ठ नहीं होगा। ऽ प्रश्नावली 5ण्1 1ण् निम्नलिख्िात कथनों में से कौन - से कथन सत्य हैं और कौन - से कथन असत्य हैं? अपने उत्तरों के लिए कारण दीजिए। ;पद्ध एक बिंदु से होकर केवल एक ही रेखा खींची जा सकती है। ;पपद्ध दो भ्िान्न बिंदुओं से होकर जाने वाली असंख्य रेखाएँ हैं। ;पपपद्ध एक सांत रेखा दोनों ओर अनिश्िचत रूप से बढ़ाइर् जा सकती है। ;पअद्ध यदि दो वृत्त बराबर हैं, तो उनकी त्रिाज्याएँ बराबर होती हैं। ;अद्ध आकृति 5.9 में, यदि ।ठ त्र च्फ और च्फ त्र ग्ल् है, तो ।ठ त्र ग्ल् होगा। आकृति 5ण्9 2ण् निम्नलिख्िात पदों में से प्रत्येक की परिभाषा दीजिए। क्या इनके लिए वुफछ ऐसे पद हैं, जिन्हें परिभाष्िात करने की आवश्यकता है? वे क्या हैं और आप इन्हें वैफसे परिभाष्िात कर पाएँगे? ;पद्ध समांतर रेखाएँ ;पपद्ध लम्ब रेखाएँ ;पपपद्ध रेखाखंड ;पअद्ध वृत्त की त्रिाज्या ;अद्ध वगर् 3ण् नीचे दी हुइर् दो अभ्िाधरणाओं पर विचार कीजिए: ;पद्ध दो भ्िान्न बिंदु । और ठ दिए रहने पर, एक तीसरा बिंदु ब् ऐसा विद्यमान है जो । और ठ के बीच स्िथत होता है। ;पपद्ध यहाँ कम से कम ऐसे तीन बिंदु विद्यमान हैं कि वे एक रेखा पर स्िथत नहीं हैं। क्या इन अभ्िाधरणाओं में कोइर् अपरिभाष्िात शब्द हैं? क्या ये अभ्िाधरणाएँ अविरोध्ी हैं? क्या ये यूक्िलड की अभ्िाधरणाओं से प्राप्त होती हैं? स्पष्ट कीजिए। 4ण् यदि दो बिंदुओं । और ठ के बीच एक बिंदु ब् ऐसा स्िथत है कि।ब् त्र ठब् है, तो सि( कीजिए 1कि ।ब् त्र ।ठ है। एक आकृति खींच कर इसे स्पष्ट कीजिए।2 5ण् प्रश्न 4 में, ब् रेखाखंड ।ठ का एक मध्य - बिंदु कहलाता है। सि( कीजिए कि एक रेखाखंड का एक और केवल एक ही मध्य - बिंदु होता है। 6ण् आकृति 5.10 में, यदि ।ब् त्र ठक् हैए तो सि( कीजिए कि।ठ त्र ब्क् है। आकृति 5.10 7ण् यूक्िलड की अभ्िागृहीतों की सूची में दिया हुआ अभ्िागृहीत 5 एक सवर्व्यापी सत्य क्यों माना जाता है? ;ध्यान दीजिए कि यह प्रश्न पाँचवीं अभ्िाधरणा से संबंध्ित नहीं है।द्ध 5ण्3 यूक्िलड की पाँचवीं अभ्िाधरणा के समतुल्य रूपान्तरण गण्िात के इतिहास में यूक्िलड की पाँचवीं अभ्िाधारणा का अत्याध्िक महत्व है। अनुच्छेद 5.2 से पुनः इस अभ्िाधरणा को याद कीजिए। इस अभ्िाधरणा के परिणामस्वरूप यदि दो रेखाओं पर गिरने वाली रेखा के एक ही ओर के दोनों अंतः कोणों का योग 1800 हो, तो दोनों रेखाएँ कभी भी प्रतिच्छेद नहीं कर सकतीं। इस अभ्िाधरणा के अनेक समतुल्य रूपांतरण ;मुनपअंसमदज अमतेपवदेद्ध हैं। इनमें से एक प्लेपेफयर का अभ्िागृहीत ;च्संलंिपतश्े ।गपवउद्ध है ;जिसे स्काटलेंड के एक गण्िातज्ञ जाॅन प्लेपेफयर ने 1729 में दिया थाद्ध। यह इस प्रकार हैः प्रत्येक रेखा स और उस पर न स्िथत प्रत्येक बिंदु च् के लिए, एक अद्वितीय रेखा उ ऐसी होती है जो च् से होकर जाती है और स के समांतर है। आकृति 5.11 में, आप देख सकते हैं कि च् से होकर जाने वाली सभी रेखाओं में से केवल उ ही आकृति 5.11रेखा स के समांतर है। इस परिणाम को निम्नलिख्िात रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है: दो भ्िान्न प्रतिच्छेदी रेखाएँ एक ही रेखा के समांतर नहीं हो सकतीं। यूक्िलड को अपनी प्रथम 28 प्रमेयों को सि( करने में पाँचवीं अभ्िाधरणा की कोइर् आवश्यकता नहीं पड़ी। अनेक गण्िातज्ञों और स्वयं यूक्िलड को यह विश्वास था कि पाँचवीं अभ्िाधरणा वास्तव में एक प्रमेय है, जिसे चारों अभ्िाधरणों और अन्य अभ्िागृहीतों की सहायता से सि( किया जा सकता है। परन्तु पाँचवीं अभ्िाधरणा को प्रमेय के रूप में सि( करने के सभी प्रयत्न असपफल रहे। परन्तु इन प्रयत्नों के कारण एक महत्वपूणर् उपलब्िध् हुइर् - यह उपलब्िध् अनेक अन्य ज्यामितियों की रचनाएँ ;सृष्िटद्ध रही। ये ज्यामितियाँ यूक्िलडीय ज्यामिति ;म्नबसपकमंद ळमवउमजतलद्ध से बहुत भ्िान्न हैं। आकृति 5.12 इन्हें अयूक्िलडीय ज्यामितियाँ ;छवद.म्नबसपकमंद ळमवउमजतपमेद्ध कहा जाता है। इन ज्यामितियों की रचना को विचारों के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है, क्योंकि तब तक प्रत्येक व्यक्ित यह विश्वास करता था कि यूक्िलड की ज्यामिति ही एक मात्रा ज्यामिति है और संपूणर् विश्व यूक्िलडीय है। जिस विश्व में हम रह रहे हैं, उसकी ज्यामिति को अब अयूक्िलडीय ज्यामिति दशार्या जा चुका है। वास्तव में, यह गोलाकार ज्यामिति ;ेचीमतपबंस हमवउमजतलद्ध कहलाती है। गोलाकार ज्यामिति में रेखाएँ सीध्ी रेखाएँ नहीं होती हैं। ये रेखाएँ दीघर् वृत्तों ;हतमंज बपतबसमेद्ध ;जो एक गोले और उसके केन्द्र से होकर जाने वाले तलों के प्रतिच्छेदन से प्राप्त वृत्त होते हैंद्ध के भाग होती हैं। आकृति 5ण्12 में, रेखाएँ।छ और ठछ ;जो एक गोले के दीघर् वृत्तों के भाग हैंद्ध एक ही रेखा ।ठ पर लम्ब हैं। परन्तु ये एक दूसरे से मिल रही हैं, यद्यपि रेखा ।ठ के एक ही ओर के अंतः कोणों का योग दो समकोणों से कम नहीं है ;वास्तव में, यह 90ह् $ 90ह्त्र 180ह् हैद्ध। साथ ही, ध्यान दीजिए कि त्रिाभुज छ।ठ के कोणों का योग 180ह् से अध्िक है, क्योंकि ∠ । ़ ∠ ठ त्र 180ह् है। इस प्रकार, यूक्िलडीय ज्यामिति केवल एक तल में बनी आकृतियों के लिए ही मान्य है। वक्र पृष्ठों में यह असपफल रहती है। अब, आइए एक उदाहरण लें। उदाहरण 3 रू निम्न कथन पर विचार कीजिए: सीध्ी रेखाओं के एक ऐसे युग्म का अस्ितत्व है, जो एक दूसरे से प्रत्येक स्थान पर समदूरस्थ ;मुनपकपेजंदजद्ध होती हैं। क्या यह कथन यूक्िलड की पाँचवीं अभ्िाधरणा का एक प्रत्यक्ष ;सीधद्ध परिणाम है? स्पष्ट कीजिए। हलरू एक रेखास लीजिए और एक बिंदु ऐसा लीजिए जो रेखा स पर स्िथत न हो।तब, प्लेपेफयर अभ्िागृहीत से, जो यूक्िलड की पाँचवीं अभ्िाधरणा के समतुल्य है, हम जानते हैं कि च् से होकर जाती हुइर् एक अद्वितीय रेखा उ है जो स के समांतर है। अब, एक बिंदु की एक रेखा से दूरी उस बिंदु से रेखा पर डाले गए लम्ब की लम्बाइर् होती है। उ पर स्िथत किसी बिंदु से रेखा स की दूरी और स पर स्िथत किसी बिंदु से रेखा उ की दूरी सदैव समान होगी। अतः, ये दोनों रेखाएँ स और उ प्रत्येक स्थान पर एक दूसरे से समदूरस्थ हैं। टिप्पणी: अगले वुफछ अध्यायों में जो आप पढ़ेंगे वह यूक्िलडीय ज्यामिति होगी। परन्तु, इनमें हमारे द्वारा प्रयोग किए गए अभ्िागृहीत और प्रमेय यूक्िलड के अभ्िागृहीत और प्रमेयों से भ्िान्न हो सकते हैं। प्रश्नावली 5ण्2 1ण् आप यूक्िलड की पाँचवीं अभ्िाधरणा को किस प्रकार लिखेंगे ताकि वह सरलता से समझी जा सके? 2ण् क्या यूक्िलड की पाँचवीं अभ्िाधरणा से समांतर रेखाओं के अस्ितत्व का औचित्य निधर्रित होता है? स्पष्ट कीजिए। 5ण्4 सारांश इस अध्याय में, आपने निम्नलिख्िात बिंदुओं का अध्ययन किया हैः 1ण् यद्यपि यूक्िलड ने बिंदु, रेखा और तल को परिभाष्िात किया है, परन्तु गण्िातज्ञों ने इन परिभाषाओं को स्वीकार नहीं किया है। इसलिए ज्यामिति में इन्हें अब अपरिभाष्िात पदों के रूप में लिया जाता है। 2ण् अभ्िागृहीत और अभ्िाधरणाएँ ऐसी कल्पनाएँ हैं जो स्पष्टतः सवर्व्यापी सत्य होती हैं। इन्हें सि( नहीं किया जाता है। 3ण् प्रमेय वे कथन हैं जिन्हें परिभाषाओं, अभ्िागृहीतों, पहले सि( किए गए कथनों और निगमनिक तवर्फण द्वारा सि( किया जाता है। 4ण् यूक्िलड के वुफछ अभ्िागृहीत थे: ;1द्ध वे वस्तुएँ जो एक ही वस्तु के बराबर हों, एक दूसरे के बराबर होती हैं। ;2द्ध यदि बराबरों को बराबरों में जोड़ा जाए, तो पूणर् भी बराबर होते हैं। ;3द्ध यदि बराबरों को बराबरों में से घटाया जाए, तो शेषपफल भी बराबर होते हैं। ;4द्ध वे वस्तुएँ जो परस्पर संपाती हों एक दूसरे के बराबर होती हैं। ;5द्ध पूणर् अपने भाग से बड़ा होता है। ;6द्ध एक ही वस्तुओं के दुगुने परस्पर बराबर होते हैं। ;7द्ध एक ही वस्तुओं के आध्े परस्पर बराबर होते हैं। 5ण् यूक्िलड की अभ्िाधरणाएँ निम्न थीं: अभ्िाधरणा 1 रू एक बिंदु से एक अन्य बिंदु तक एक सीध्ी रेखा खींची जा सकती है। अभ्िाधरणा2 रू एक सांत रेखा को अनिश्िचत रूप से बढ़ाया जा सकता है। अभ्िाधरणा3 रू किसी को केन्द्र मान कर और किसी त्रिाज्या से एक वृत्त खींचा जा सकता है। अभ्िाधरणा 4 रू सभी समकोण एक दूसरे के बराबर होते हैं। अभ्िाधरणा 5 रू यदि एक सीध्ी रेखा दो सीध्ी रेखाओं पर गिर कर अपने एक ही ओर दो अंतः कोण इस प्रकार बनाए कि इन दोनों कोणों का योग मिल कर दो समकोणों से कम हो, तो वे दोनों सीध्ी रेखाएँ अनिश्िचत रूप से बढ़ाए जाने पर उसी ओर मिलती हैं जिस ओर यह योग दो समकोणों से कम होता है। 6ण् यूक्िलड की पाँचवीं अभ्िाधरणा के दो समतुल्य रूपांतरण हैं: ;पद्ध प्रत्येक रेखा स और उस पर न स्िथत प्रत्येक बिंदु च् के लिए, एक अद्वितीय रेखा उ ऐसी होती है जो च् से होकर जाती है और स के समांतर है। ;पपद्ध दो भ्िान्न प्रतिच्छेदी रेखाएँ एक ही रेखा के समांतर नहीं हो सकतीं। 7ण् यूक्िलड की पाँचवीं अभ्िाधरणा को पहली चारों अभ्िाधरणों की सहायता से सि( करने के सभी प्रयत्न असपफल रहे। परन्तु इनसे अन्य ज्यामितियों की खोज हुइर् जिन्हें अयूक्िलडीय ज्यामितियाँ कहा जाता है।

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