हामिद खाँ एस. के. पो‘ेकाट ‘तक्षश्िाला ;पाकिस्तानद्ध में आगजनी1’μसमाचार पत्रा की यह खबर पढ़ते ही मुझे हामिद खाँ याद आया। मैंने भगवान से विनती की, फ्हे भगवान! मेरे हामिद खाँ की दुकान को इस आगजनी से बचा लेना।य् अभी दो साल ही तो बीते हैं जब मैं तक्षश्िाला के पौराण्िाक खंडहर देखने गया था। एक ओर कड़कड़ाती ध्ूप, दूसरी ओर भूख और प्यास के मारे बुरा हाल हो रहा था। रेलवे स्टेशन से करीब पौन मील की दूरी पर बसे एक गाँव की ओर निकल पड़ा। हस्तरेखाओं के समान पैफली गलियों से भरा तंग बाशार। जहाँ कहीं नशर पड़ी धुआँ, मच्छर और गंदगी से भरी जगहें ही दिखीं। कहीं - कहीं तो सड़े हुए चमड़े की बदबू ने स्वागत किया। लंबे कद के पठान अपनी सहज अलमस्त2 चाल में चलते नशर आ रहे थे। चारों तरपफ.चक्कर लगा लिया, पर अभी तक कोइर् होटल नशर नहीं आया। मन में विचार आया, इस गाँव में होटल की शरूरत ही क्या होगी? अचानक एक दुकान नशर आइर् जहाँ चपातियाँ सेंकी जा रही थीं। चपातियों की सोंध्ी महक से मेरे पाँव अपने आप उस दुकान की ओर मुड़ गए। अपने अनुभवों से मैंने जान लिया था कि परदेश में मुसकराहट ही रक्षक और सहायक होती है। सो मुसकराते हुए मैं दुकान के अंदर घुस गया। 1. उपद्रवियों द्वारा आग लगाना 2. मस्त हामिद खाँध्37 एक अध्ेड़1 उम्र का पठान अँगीठी के पास सिर झुकाए चपातियाँ बना रहा था। मैंने ज्योंही दुकान में प्रवेश किया, वह अपनी हथेली पर रखे आटे को बेलना छोड़कर मेरी ओर घूर - घूरकर देखने लगा। मैं उसकी तरपफ.देखकर मुसकरा दिया। पिफर भी उसके चेहरे के हाव - भाव में कोइर् परिवतर्न नहीं हुआ। वह बेपरवाही के साथ तीखी नशर से मुझे निहारे जा रहा था। फ्खाने को वुफछ मिलेगा?य् मैंने ध्ीमी आवाश में पूछा। फ्चपाती और सालन2 है...वहाँ बैठ जाइए।य् उसने एक बेंच की तरपफ.इशारा करते हुए कहा। मैं बेंच पर बैठकर रूमाल से हवा करने लगा! मैंने दुकान के भीतर झाँककर देखा। बेतरतीबी3 से लीपा हुआ आँगन, ध्ूल से सनी दीवारें। एक कोने में खाट पड़ी हुइर् थी जिस पर एक दढि़यल4 बुइा गंदे तकिए पर कोहनी टेके हुए हुक्का पी रहा था। हुक्के की गुड़गुड़ाहट में उसने अपने आपको ही नहीं, बल्िक सारे जहान को भुला रखा था। फ्भाइर् जान, आप कहाँ के रहने वाले हैं?य् चपाती को अंगारों पर रखते हुए उस अधेड़ उम्र के पठान ने पूछा। फ्मालाबार केय् मैंने जवाब दिया। उसने यह नाम नहीं सुना था। आटे को हाथ में लेकर गोलाकार बनाते हुए पूछाμफ्यह हिंदुस्तान में ही है न?य् फ्हाँ, भारत के दक्ष्िाणी छोरμमद्रास के आगे।य् फ्क्या आप हिंदू हैं?य् फ्हाँ, एक हिंदू घर में जन्म लिया है।य् उसने एक पफ.ीकी मुसकराहट के साथ पिफर पूछा, फ्आप मुसलमानी होटल में खाना खाएँगे?य् फ्क्यों नहीं? हमारे यहाँ तो अगर बढि़या चाय पीनी हो, या बढि़या पुलाव खाना हो तो लोग बेखटके मुसलमानी होटल में जाया करते हैं।य् 1.ढलती उम्र का 2. गोश्त या सब्शी का मसालेदार शोरबा 3. बिना किसी सलीके/तरीके के 4. दाढ़ी वाला 38ध्संचयन वह मेरी बात पर विश्वास नहीं कर पाया। मैंने उसे गवर् के साथ बताया, फ्हमारे यहाँ हिंदू - मुसलमान में कोइर् पफ.वर्फ नहीं है! सब मिल - जुलकर रहते हैं! भारत में मुसलमानों ने जिस पहली मस्िशद का निमार्ण किया था, वह हमारे ही राज्य के एक स्थान ‘कोडुंगल्लूर’ में है। हमारे यहाँ हिंदू - मुसलमानों के बीच दंगे नहीं के बराबर होते हैं।य् उसने मेरी बात को बहुत ही ध्यानपूवर्क सुनकर कहा, फ्काश! मैं आपके मुल्क में आकर यह सब अपनी आँखों से देख सकता।य् फ्क्या आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं होता?य् मैंने पूछा। फ्मुझे आपकी बात पर तो पूरा यकीन हो गया है, पर मैं इस पर इर्मान नहीं कर सकता कि आप हिंदू हैं। क्योंकि यहाँ कोइर् भी हिंदू आपकी कही हुइर् बातों को इतने पफ.दृ1 के साथ किसी मुसलमान से नहीं कह सकता। उसकी नशर में हम आततायियों2 की औलादें हैं! हमें इस हालत में अपनी आन के लिए लड़ना पड़ता है। यही हमारी नियति3 है।य् उसकी आवाश में सच्चाइर् वूफट - वूफटकर भरी थी। फ्आपका शुभ नाम?य् मैंने पूछा। फ्हामिद खाँ, वो जो चारपाइर् पर बैठे हैं, वो मेरे अब्बाजान हैं। अच्छा, आप दस मिनट तक इंतशार कीजिए, सालन अभी पक रहा है।य् मैं इंतशार करने लगा। फ्अरे ओ अब्दुल!य् हामिद खाँ ने शोर से आवाश लगाइर्। एक छोकरा दौड़ता हुआ आया जो आँगन में चटाइर् बिछाकर लाल मिचर् सुखा रहा था। हामिद ने पश्तो4 भाषा में उसे वुफछ आदेश दिया। वह दुकान के पिछवाड़े की तर.पफ भागा। फ्भाइर् जान, शालिमों की इस दुनिया में शैतान भी लुक - छिपकर चलता है। किसी पर धैंस जमाकर या मजबूर करके हम प्यार मोल नहीं ले सकते। आप इर्मान से मुहब्बत के नाते मेरे होटल में खाना खाने आए हैं। ऐसी इर्मानदारी और मुहब्बत 1. गवर् 2. अत्याचार करने वाले 3. भाग्य 4. एक प्राचीन हामिद खाँध्39 का असर मेरे दिल में क्यों न पड़े? अगर हिंदू और मुसलमान इर्मान से आपस में मुहब्बत करते तो कितना अच्छा होता।य् ध्ीमे स्वर में बोलते हुए वह अँगीठी से आख्िारी चपाती उतारकर खड़ा हो गया। जो छोकरा पिछवाड़े की तरपफ.गया था, उसने एक थाली में चावल लाकर सामने रख दिया, हामिद खाँ ने तीन - चार चपातियाँ उसमें रख दीं, पिफर लोहे की तश्तरी में सालन परोसा। छोकरा सापफ.पानी से भरा एक कटोरा मेश पर रखकर चला गया। मैंने बड़े चाव से1 भरपेट खाना खाया। फ्कितने पैसे हुए?य् जेब में हाथ डालते हुए मैंने हामिद खाँ से पूछा! मुसकराते हुए हामिद खाँ ने हाथ पकड़ लिया और बोला, फ्भाइर् जान, मापफकीजिएगा। पैसा नहीं लूँगा, आप मेरे मेहमान हैं।य् फ्मेहमाननवाशी की बात अलग है। एक दुकानदार के नाते आपको खाने के पैसे लेने पड़ेंगे। आपको मेरी मुहब्बत की कसम।य् एक रफपये के नोट को मैंने हामिद खाँ की ओर बढ़ाया। वह सवुफचा रहा था। उसने वह रफपया लेकर पिफर मेरे हाथ में रख दिया। फ्भाइर् जान मैंने खाने के पैसे आपसे ले लिए हैं, मगर मैं चाहता हूँ कि यह आप ही के हाथों में रहे। आप जब पहुँचें तो किसी मुसलमानी होटल में जाकर इस पैसे से पुलाव खाएँ और तक्षश्िाला के भाइर् हामिद खाँ को याद करें।य् वहाँ से लौटकर मैं तक्षश्िाला के खंडहरों की तरपफ.चला आया। उसके बाद मैंने पिफर कभी हामिद खाँ को नहीं देखा। पर हामिद खाँ की वह आवाश, उसके साथ बिताए क्षणों की यादें आज भी ताशा हैं। उसकी वह मुसकान आज भी मेरे दिल में बसी है। तक्षश्िाला के सांप्रदायिक दंगों की चिंगारियों की आग से हामिद और उसकी वह दुकान जिसने मुझ भूखे को दोपहर में छाया और खाना देकर मेरी क्षुध2 को तृप्त3 किया था, बची रहे। मैं यही प्राथर्ना अब भी कर रहा हूँ। 1. शौक से 2. भूख 3. संतुष्ट, संतोष 40ध्संचयन बोध् - प्रश्न 1.लेखक का परिचय हामिद खाँ से किन परिस्िथतियों में हुआ? 2.‘काश मैं आपके मुल्क में आकर यह सब अपनी आँखों से देख सकता।’μहामिद ने ऐसा क्यों कहा? 3.हामिद को लेखक की किन बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था? 4.हामिद खाँ ने खाने का पैसा लेने से इंकार क्यों किया? 5.मालाबार में हिंदू - मुसलमानों के परस्पर संबंधें को अपने शब्दों में लिख्िाए। 6.तक्षश्िाला में आगजनी की खबर पढ़कर लेखक के मन में कौन - सा विचार कौंधा? इससे लेखक के स्वभाव की किस विशेषता का परिचय मिलता है?

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