था। मक्खनपुर के स्वूफल और गाँव के बीच पड़ने वाले आम के पेड़ों से प्रतिवषर् उससे आम झुर1े जाते थे। इस कारण वह मूक डंडा सजीव - सा प्रतीत होता था। प्रसन्नवदन2 हम दोनों मक्खनपुर की ओर तेशी से बढ़ने लगे। चिऋियों को मैंने टोपी में रख लिया, क्योंकि वुफतेर् में जेबें न थीं। हम दोनों उछलते - वूफदते, एक ही साँस में गाँव से चार पफला±ग दूर उस वुफएँ के पास आ गए जिसमें एक अति भयंकर काला साँप पड़ा हुआ था। वुफआँ कच्चा था, और चैबीस हाथ गहरा था। उसमें पानी न था। उसमें न जाने साँप वैफसे गिर गया था? कारण वुफछ भी हो, हमारा उसके वुफएँ में होने का ज्ञान केवल दो महीने का था। बच्चे नटखट होते ही हैं। मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली हमारी टोली पूरी बानर टोली थी। एक दिन हम लोग स्वूफल से लौट रहे थे कि हमको वुफएँ में उझकने3 की सूझी। सबसे पहले उझकने वाला मैं ही था। वुफएँ में झाँककर एक ढेला पेंफका कि उसकी आवाश वैफसी होती है। उसके सुनने के बाद अपनी बोली की प्रतिध्वनि4 सुनने की इच्छा थी, पर वुफएँ में ज्योंही ढेला गिरा, त्योंही एक पुफसकार सुनाइर् पड़ी। वुफएँ के किनारे खड़े हुए हम सब बालक पहले तो उस पुफसकार से ऐसे चकित हो गए जैसे किलोलें5 करता हुआ मृगसमूह अति समीप के वुफत्ते की भौंक से चकित हो जाता है। उसके उपरांत सभी ने उछल - उछलकर एक - एक ढेला पेंफका और वुफएँ से आने वाली व्रफोधपूणर् पुफसकार पर कहकहे लगाए। गाँव से मक्खनपुर जाते और मक्खनपुर से लौटते समय प्रायः प्रतिदिन ही वुफएँ में ढेले डाले जाते थे। मैं तो आगे भागकर आ जाता था और टोपी को एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ से ढेला पेंफकता था। यह रोशाना की आदत - सी हो गइर् थी। साँप से पुफसकार करवा लेना मैं उस समय बड़ा काम समझता था। इसलिए जैसे ही हमदोनों उस वुफएँ की ओर से निकले, वुफएँ में ढेला पेंफककर पुफसकार सुनने की प्रवृिा6 जाग्रत हो गइर्। मैं वुफएँ की ओर बढ़ा। छोटा भाइर् मेरे पीछे ऐसे हो लिया जैसे बडे़1. तोड़ना 2. प्रसन्न चेहरा 3. उचकना, पंजे के बल उचककर झाँकना 4. किसी शब्द के उपरांत सुनाइर् पड़ने वाला उसी से उत्पन्न शब्द, गूँज 5. व्रफीड़ा 6. मन का किसी विषय की ओर झुकाव मृगशावक1 के पीछे छोटा मृगशावक हो लेता है। वुफएँ के किनारे से एक ढेला उठाया और उछलकर एक हाथ से टोपी उतारते हुए साँप पर ढेला गिरा दिया, पर मुझ पर तो बिजली - सी गिर पड़ी। साँप ने पुफसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं यह बात अब तक स्मरण नहीं। टोपी के हाथ में लेते ही तीनों चिऋियाँ चक्कर काटती हुइर् वुफएँ में गिर रही थीं। अकस्मात् जैसे घास चरते हुए हिरन की आत्मा गोली से हत होने पर निकल जाती है और वह तड़पता रह जाता है, उसी भाँति वे चिऋियाँ क्या टोपी से निकल गईं, मेरी तो जान निकल गइर्। उनके गिरते ही मैंने उनको पकड़ने के लिए एक झप‘ा भी माराऋ ठीक वैसे जैसे घायल शेर श्िाकारी को पेड़ पर चढ़ते देख उस पर हमला करता है। पर वे तो पहँुच से बाहर हो चुकी थीं। उनको पकड़ने की घबराहट में मैं स्वयं झटके के कारण वुफएँ में गिर गया होता। वुफएँ की पाट पर बैठे हम रो रहे थेμछोटा भाइर् ढाढ़ें2 मारकर और मैं चुपचाप आँखें डबडबाकर। पतीली में उप़्ाफान आने से ढकना उफपर उठ जाता है और पानी बाहर टपक जाता है। निराशा, पिटने के भय और उद्वेग3 से रोने का उपफान आता़था। पलकों के ढकने भीतरी भावों को रोकने का प्रयत्न करते थे, पर कपोलों पर आँसू ढुलक ही जाते थे। माँ की गोद की याद आती थी। जी चाहता था कि माँ आकर छाती से लगा ले और लाड़ - प्यार करके कह दे कि कोइर् बात नहीं, चिऋियाँ पिफर लिख ली जाएँगी। तबीयत करती थी कि वुफएँ में बहुत - सी मि‘ी डाल दी जाए और घर जाकर कह दिया जाए कि चिऋी डाल आए, पर उस समय मैं झूठ बोलना जानता ही न था। घर लौटकर सच बोलने पर रफइर् की तरह धुनाइर् होती। मार के खयाल से शरीर ही नहीं मन भी काँप जाता था। सच बोलकर पिटने के भावी भय और झूठ बोलकर चिऋियों के न पहँुचने की िाम्मेदारी के बोझ से दबा मैं बैठा सिसक रहा था। इसी सोच - विचार में पंद्रह मिनट होने को आए। देर हो रही थी, और उधर दिन का बुढ़ापा बढ़ता जाता था। कहीं भाग जाने को तबीयत करती थी, पर पिटने का भय और िाम्मेदारी की दुधारी4 तलवार कलेजे पर पिफर रही थी। 1. हिरन का बच्चा 2. शोर - शोर से रोना 3. बेचैनी, घबराहट 4. दोनों तरप़्ाफ से धर वाली, दो धरों वाली थे। इसलिए वुफएँ में घुसते समय मुझे साँप का तनिक भी भय न था। उसको मारना मैं बाएँ हाथ का खेल समझता था। वुफएँ के धरातल से जब चार - पाँच गश रहा हूँगा, तब ध्यान से नीचे को देखा। अक्ल चकरा गइर्। साँप पफन पैफलाए धरातल से एक हाथ उफपर उठा हुआ लहरा रहा था। पूँछ और पूँछ के समीप का भाग पृथ्वी पर था, आधा अग्र भाग उफपर उठा हुआ मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। नीचे डंडा बँधा था, मेरे उतरने की गति से जो इधर - उधर हिलता था। उसी के कारण शायद मुझे उतरते देख साँप घातक1 चोट के आसन पर बैठा था। सँपेरा जैसे बीन बजाकर काले साँप को ख्िालाता है और साँप व्रफोिात हो पफन पैफलाकर खड़ा होता और पुँफकार मारकर चोट करता है, ठीक उसी प्रकार साँप तैयार था। उसका प्रतिद्वंद्वी2μमैंμउससे वुफछ हाथ उफपर धोती पकड़े लटक रहा था। धोती डेंग से बँधी होने के कारण वुफएँ के बीचांेबीच लटक रही थी और मुझे वुफएँ के धरातल की परििा के बीचांेबीच ही उतरना था। इसके माने थे साँप से डेढ़ - दो पुफटμगश नहींμकी दूरी पर पैर रखना, और इतनी दूरी पर साँप पैर रखते ही चोट करता। स्मरण रहे, कच्चे वुफएँ का व्यास बहुत कम होता है। नीचे तो वह डेढ़ गश से अिाक होता ही नहीं। ऐसी दशा में वुफएँ में मैं साँप से अिाक - से - अिाक चार पुफट की दूरी पर रह सकता था, वह भी उस दशा में जब साँप मुझसे दूर रहने का प्रयत्न करता, पर उतरना तो था वुफएँ के बीच में, क्योंकि मेरा साधन बीचांेबीच लटक रहा था। उफपर से लटककर तो साँप नहीं मारा जा सकता था। उतरना तो था ही। थकावट से उफपर चढ़ भी नहीं सकता था। अब तक अपने प्रतिद्वंद्वी को पीठ दिखाने का निश्चय नहीं किया था। यदि ऐसा करता भी तो वुफएँ के धरातल पर उतरे बिना क्या मैं उफपर चढ़ सकता थाμधीरे - धीरे उतरने लगा। एक - एक इंच ज्यों - ज्यों मैं नीचे उतरता जाता था, त्यों - त्यों मेरीएकाग्रचित्तता3 बढ़ती जाती थी। मुझे एक सूझ4 सूझी। दोनों हाथों से धोती पकड़े हुए मैंने अपने पैर वुफएँ की बगल में लगा दिए। दीवार से पैर लगाते ही वुफछ मि‘ी 1. जो नुकसान पहुँचाए, घात करने वाला 2. विपक्षी, शत्राु 3. स्िथरचित्त, ध्यान 4. तरीका, उपाय उसे डंडे से दबाने का खयाल छोड़ दिया। ऐसा करना उचित भी न था। अब प्रश्न था कि चिऋियाँ वैफसे उठाइर् जाएँ। बस, एक सूरत थी। डंडे से साँप की ओर से चिऋियों को सरकाया जाए। यदि साँप टूट पड़ा, तो कोइर् चारा न था। वुफतार् था, और कोइर् कपड़ा न था जिससे साँप के मुँह की ओर करके उसके पफन को पकड़ लूँ। मारना या बिलवुफल छेड़खानी न करनाμये दो मागर् थे। सो पहला मेरी शक्ित के बाहर था। बाध्य होकर दूसरे मागर् का अवलंबन1 करना पड़ा। डंडे को लेकर ज्यों ही मैंने साँप की दाईं ओर पड़ी चिऋी की ओर उसे बढ़ाया कि साँप का पफन पीछे की ओर हुआ। धीरे - धीरे डंडा चिऋी की ओर बढ़ा और ज्योंही चिऋी के पास पहुँचा कि पुँफकार के साथ काली बिजली तड़पी और डंडे पर गिरी। हृदय में वंफप हुआ, और हाथों ने आज्ञा न मानी। डंडा छूट पड़़ा। मैं तो न मालूम कितना उफपर उछल गया। जान - बूझकर नहीं, यों ही बिदककर। उछलकर जो खड़ा हुआ, तो देखा डंडे के सिर पर तीन - चार स्थानों पर पीव - सा वुफछ लगा हुआ है। वह विष था। साँप ने मानो अपनी शक्ित का सटीर्पिफकेट सामने रख दिया था, पर मैं तो उसकी योग्यता का पहले ही से कायल2 था। उस सटीर्पिफकेट की शरूरत न थी। साँप ने लगातार पूँफ - पूँफ करके डंडे पर तीन - चार चोटें कीं। वह डंडा पहली बार इस भाँति अपमानित हुआ था, या शायद वह साँप का उपहास कर रहा था। उधर उफपर पूँफ - पूँफ और मेरे उछलने और पिफर वहीं धमाके से खड़े होने से छोटे भाइर् ने समझा कि मेरा कायर् समाप्त हो गया और बंधुत्व का नाता पूँफ - पूँफ और धमाके में टूट गया। उसने खयाल किया कि साँप के काटने से मैं गिर गया। मेरे कष्ट और विरह के खयाल से उसके कोमल हृदय को धक्का लगा। भ्रातृ - स्नेह के ताने - बाने को चोट लगी। उसकी चीख निकल गइर्। छोटे भाइर् की आशंका बेजा न थी, पर उस पूँफ और धमाके से मेरा साहस वुफछ बढ़ गया। दुबारा पिफर उसी प्रकार लिप़्ाफापेफ को उठाने की चेष्टा की। अबकी बाऱसाँप ने वार भी किया और डंडे से चिपट भी गया। डंडा हाथ से छूटा तो नहीं पर 1. सहारा 2. मानने वाला सन् 1915 में मैट्रीक्युलेशन पास करने के उपरांत यह घटना मैंने माँ को सुनाइर्। सजल नेत्रों से माँ ने मुझे अपनी गोद में ऐसे बिठा लिया जैसे चिडि़या अपने बच्चों को डैने1 के नीचे छिपा लेती है। कितने अच्छे थे वे दिन! उस समय रायपफल न थी, डंडा था और डंडे का श्िाकारμकम - से - कम उस साँप का श्िाकारμरायपफल के श्िाकार से कम रोचक और भयानक न था। बोध - प्रश्न 1.भाइर् के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में किस बात का डर था? 2.मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले वुफएँ में ढेला क्यों पेंफकती थी? 3.‘साँप ने पुफसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं, यह बात अब तक स्मरण नहीं’μयह कथन लेखक की किस मनोदशा को स्पष्ट करता है? 4.किन कारणों से लेखक ने चिऋियों को वुफएँ से निकालने का निणर्य लिया? 5.साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने क्या - क्या युक्ितयाँ अपनाइंर्? 6.वुफएँ में उतरकर चिऋियों को निकालने संबंधी साहसिक वणर्न को अपने शब्दों में लिख्िाए। 7.इस पाठ को पढ़ने के बाद किन - किन बाल - सुलभ शरारतों के विषय में पता चलता है? 8.‘मनुष्य का अनुमान और भावी योजनाएँ कभी - कभी कितनी मिथ्या और उलटी निकलती हैं’μका आशय स्पष्ट कीजिए। 9.‘पफल तो किसी दूसरी शक्ित पर निभर्र है’μपाठ के संदभर् में इस पंक्ित का आशय स्पष्ट कीजिए। 1. पंख

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