गिल्लू महादेवी वमार् सोनजुही1 में आज एक पीली कली लगी है। इसे देखकर अनायास2 ही उस छोटे जीव का स्मरण हो आया, जो इस लता की सघन हरीतिमा3 में छिपकर बैठता था और पिफर मेरे निकट पहुँचते ही वंफध्े पर वूफदकर मुझे चैंका देता था। तब मुझे कली की खोज रहती थी, पर आज उस लघुप्राण4 की खोज है। परंतु वह तो अब तक इस सोनजुही की जड़ में मि‘ी होकर मिल गया होगा। कौन जाने स्वण्िार्म कली के बहाने वही मुझे चैंकाने उफपर आ गया हो! अचानक एक दिन सवेरे कमरे से बरामदे में आकर मैंने देखा, दो कौवे एक गमले के चारों ओर चोंचों से छूआ - छुऔवल5 जैसा खेल खेल रहे हैं। यह काकभुशुंडि भी विचित्रा पक्षी हैμएक साथ समादरित6 अनादरित7, अति सम्मानित अति अवमानित। हमारे बेचारे पुरखे न गरफड़ के रूप में आ सकते हैं, न मयूर के, न हंस के। उन्हें पितरपक्ष में हमसे वुफछ पाने के लिए काक बनकर ही अवतीणर्8 होना पड़ता है। इतना ही नहीं हमारे दूरस्थ पि्रयजनों को भी अपने आने का मध्ु संदेश इनके कवर्फश9 स्वर में ही देना पड़ता है। दूसरी ओर हम कौवा और काँव - काँव करने को अवमानना के अथर् में ही प्रयुक्त करते हैं। 1. जूही ;पुष्पद्ध का एक प्रकार जो पीला होता है 2. अचानक 3. हरियाली 4. छोटा जीव 5. चुपके से छूकर छुप जाना और पिफर छूना 6. विशेष आदर 7. आदर का अभाव, तिरस्कार 8. प्रकट 9. कटु, कानों को न भाने वाली 2ध्संचयन मेरे काकपुराण के विवेचन में अचानक बाध आ पड़ी, क्योंकि गमले और दीवार की संध्ि में छिपे एक छोटे - से जीव पर मेरी दृष्िट रफक गइर्। निकट जाकर देखा, गिलहरी का छोटा - सा बच्चा है जो संभवतः घोंसले से गिर पड़ा है और अब कौवे जिसमें सुलभ आहार खोज रहे हैं। काकद्वय1 की चोंचों के दो घाव उस लघुप्राण के लिए बहुत थे, अतः वह निश्चेष्ट2 - सा गमले से चिपटा पड़ा था। सबने कहा, कौवे की चोंच का घाव लगने के बाद यह बच नहीं सकता, अतः इसे ऐसे ही रहने दिया जाए। परंतु मन नहीं मानाμउसे हौले से उठाकर अपने कमरे में लाइर्, पिफर रफइर् से रक्त पोंछकर घावों पर पेंसिलिन का मरहम लगाया। रफइर् की पतली बत्ती दूध् से भ्िागोकर जैसे - जैसे उसके नन्हे से मुँह में लगाइर् पर मुँह खुल न सका और दूध् की बँूदें दोनों ओर ढुलक गईं। कइर् घंटे के उपचार के उपरांत उसके मुँह में एक बँूद पानी टपकाया जा सका। तीसरे दिन वह इतना अच्छा और आश्वस्त3 हो गया कि मेरी उँगली अपने दो नन्हे पंजों से पकड़कर, नीले काँच के मोतियों जैसी आँखों से इध्र - उध्र देखने लगा। तीन - चार मास में उसके स्िनग्ध्4 रोएँ, झब्बेदार पँूछ और चंचल चमकीली आँखें सबको विस्िमत5 करने लगीं। हमने उसकी जातिवाचक संज्ञा को व्यक्ितवाचक का रूप दे दिया और इस प्रकार हम उसे गिल्लू कहकर बुलाने लगे। मैंने पूफल रखने की एक हलकी डलिया में रफइर् बिछाकर उसे तार से ख्िाड़की पर लटका दिया। वही दो वषर् गिल्लू का घर रहा। वह स्वयं हिलाकर अपने घर में झूलता और अपनी काँच के मनकांे - सी आँखों से कमरे के भीतर और ख्िाड़की से बाहर न जाने क्या देखता - समझता रहता था। परंतु उसकी समझदारी और कायर्कलाप पर सबको आश्चयर् होता था। 1. दो कौए 2. बिना किसी हरकत के 3. निश्िंचत 4. चिकना 5. आश्चयर्चकित गिल्लूध्3 जब मैं लिखने बैठती तब अपनी ओर मेरा ध्यान आकष्िार्त करने की उसे इतनी तीव्र इच्छा होती थी कि उसने एक अच्छा उपाय खोज निकाला। वह मेरे पैर तक आकर सरर् से परदे पर चढ़ जाता और पिफर उसी तेशी से उतरता। उसका यह दौड़ने का व्रफम तब तक चलता जब तक मैं उसे पकड़ने के लिए न उठती। कभी मैं गिल्लू को पकड़कर एक लंबे लि.पफाप.ेफ में इस प्रकार रख देती कि उसके अगले दो पंजों और सिर के अतिरिक्त सारा लघुगात1 लिपफ.ाप.ेफ के भीतर बंद रहता। इस अद्भुत स्िथति में कभी - कभी घंटों मेश पर दीवार के सहारे खड़ा रहकर वह अपनी चमकीली आँखों से मेरा कायर्कलाप देखा करता। भूख लगने पर चिक - चिक करके मानो वह मुझे सूचना देता और काजू या बिस्वुफट मिल जाने पर उसी स्िथति में लिपफ.ापेफ.से बाहर वाले पंजों से पकड़कर उसे वुफतरता। पिफर गिल्लू के जीवन का प्रथम बसंत आया। नीम - चमेली की गंध् मेरे कमरे में हौले - हौले आने लगी। बाहर की गिलहरियाँ ख्िाड़की की जाली के पास आकर चिक - चिक करके न जाने क्या कहने लगीं? गिल्लू को जाली के पास बैठकर अपनेपन से बाहर झाँकते देखकर मुझे लगा कि इसे मुक्त करना आवश्यक है। मैंने कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया और इस मागर् से गिल्लू ने बाहर जाने पर सचमुच ही मुक्ित की साँस ली। इतने छोटे जीव को घर में पलेवुफत्ते, बिल्िलयों से बचाना भी एक समस्या ही थी। आवश्यक कागश - पत्रों के कारण मेरे बाहर जाने पर कमरा बंद ही रहता है। मेरे काॅलेज से लौटने पर जैसे ही कमरा खोला गया और मैंने भीतर पैर रखा, वैसे ही गिल्लू अपने जाली के द्वार से भीतर आकर मेरे पैर से सिर और सिर से पैर तक दौड़ लगाने लगा। तब से यह नित्य का व्रफम हो गया। 1. छोटा शरीर गिल्लूध्5 मेरे कमरे से बाहर जाने पर गिल्लू भी ख्िाड़की की खुली जाली की राह बाहर चला जाता और दिन भर गिलहरियों के झुंड का नेता बना हर डाल पर उछलता - वूफदता रहता और ठीक चार बजे वह ख्िाड़की से भीतर आकर अपने झूले में झूलने लगता। मुझे चैंकाने की इच्छा उसमें न जाने कब और वैफसे उत्पन्न हो गइर् थी। कभी पूफलदान के पूफलों में छिप जाता, कभी परदे की चुन्नट में और कभी सोनजुही कीपिायों में। मेरे पास बहुत से पशु - पक्षी हैं और उनका मुझसे लगाव भी कम नहीं है, परंतु उनमें से किसी को मेरे साथ मेरी थाली में खाने की हिम्मत हुइर् है, ऐसा मुझे स्मरण नहीं आता। गिल्लू इनमें अपवाद1 था। मैं जैसे ही खाने के कमरे में पहँुचती, वह ख्िाड़की से निकलकर आँगन की दीवार, बरामदा पार करके मेश पर पहँुच जाता और मेरी थाली में बैठ जाना चाहता। बड़ी कठिनाइर् से मैंने उसे थाली के पास बैठना सिखाया जहाँ बैठकर वह मेरी थाली में से एक - एक चावल उठाकर बड़ी सपफ.ाइर् से खाता रहता। काजू उसका पि्रय खाद्य2 था और कइर् दिन काजू न मिलने पर वह अन्य खाने की चीशें या तो लेना बंद कर देता या झूले से नीचे पेंफक देता था। उसी बीच मुझे मोटर दुघर्टना में आहत होकर वुफछ दिन अस्पताल में रहना पड़ा। उन दिनों जब मेरे कमरे का दरवाशा खोला जाता गिल्लू अपने झूले से उतरकर दौड़ता और पिफर किसी दूसरे को देखकर उसी तेशी से अपने घोंसले3 में जा बैठता। सब उसे काजू दे आते, परंतु अस्पताल से लौटकर जब मैंने उसके झूले की सपफ.ाइर् की तो उसमें काजू भरे मिले, जिनसे ज्ञात होता था कि वह उन दिनों अपना पि्रय खाद्य कितना कम खाता रहा। मेरी अस्वस्थता में वह तकिए पर सिरहाने बैठकर अपने नन्हे - नन्हे पंजों से मेरे सिर और बालों को इतने हौले - हौले सहलाता रहता कि उसका हटना एक परिचारिका4 के हटने के समान लगता। 1. सामान्य नियम को बाध्ित या मयार्दित करने वाला 2. भोजन 3.नीड़, रहने की जगह 4.सेविका 6ध्संचयन गरमियों में जब मैं दोपहर में काम करती रहती तो गिल्लू न बाहर जाता न अपने झूले में बैठता। उसने मेरे निकट रहने के साथ गरमी से बचने का एक सवर्था नया उपाय खोज निकाला था। वह मेरे पास रखी सुराही पर लेट जाता और इस प्रकार समीप भी रहता और ठंडक में भी रहता। गिलहरियों के जीवन की अवध्ि दो वषर् से अध्िक नहीं होती, अतः गिल्लू की जीवन यात्रा का अंत आ ही गया। दिन भर उसने न वुफछ खाया न बाहर गया। रात में अंत की यातना में भी वह अपने झूले से उतरकर मेरे बिस्तर पर आया और ठंडे पंजों से मेरी वही उँगली पकड़कर हाथ से चिपक गया, जिसे उसने अपने बचपन की मरणासन्न1 स्िथति में पकड़ा था। पंजे इतने ठंडे हो रहे थे कि मैंने जागकर हीटर जलाया और उसे उष्णता2 देने का प्रयत्न किया। परंतु प्रभात की प्रथम किरण के स्पशर् के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया। उसका झूला उतारकर रख दिया गया है और ख्िाड़की की जाली बंद कर दी गइर् है, परंतु गिलहरियों की नयी पीढ़ी जाली के उस पार चिक - चिक करती ही रहती है और सोनजुही पर बसंत आता ही रहता है। सोनजुही की लता के नीचे गिल्लू को समाध्ि दी गइर् हैμइसलिए भी कि उसे वह लता सबसे अध्िक पि्रय थीμइसलिए भी कि उस लघुगात का, किसी वासंती दिन, जुही के पीताभ3 छोटे पूफल में ख्िाल जाने का विश्वास, मुझे संतोष देता है। बोध् - प्रश्न 1.सोनजुही में लगी पीली कली को देख लेख्िाका के मन में कौन से विचार उमड़ने लगे? 2.पाठ के आधर पर कौए को एक साथ समादरित और अनादरित प्राणी क्यों कहा गया है? 3.गिलहरी के घायल बच्चे का उपचार किस प्रकार किया गया? 1. जिसकी मृत्यु निकट हो, मृत्यु के समीप पहुँचा हुआ 2. गरमी 3. पीले रंग का गिल्लूध्7 4.लेख्िाका का ध्यान आकष्िार्त करने के लिए गिल्लू क्या करता था? 5.गिल्लू को मुक्त करने की आवश्यकता क्यों समझी गइर् और उसके लिए लेख्िाका ने क्या उपाय किया? 6.गिल्लू किन अथो± में परिचारिका की भूमिका निभा रहा था? 7.गिल्लू की किन चेष्टाओं से यह आभास मिलने लगा था कि अब उसका अंत समय समीप है? 8.‘प्रभात की प्रथम किरण के स्पशर् के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया’μका आशय स्पष्ट कीजिए। 9.सोनजुही की लता के नीचे बनी गिल्लू की समाध्ि से लेख्िाका के मन में किस विश्वास का जन्म होता है?

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