काव्य खंड हर देश में तू, हर भेष में तू, तेरे नाम अनेक तू एकही है। तेरी रंगभूमि यह विश्व भरा, सब खेल में, मेल में तू ही तो है।। सागर से उठा बादल बनके, बादल से पफटा जल हो करके। पिफर नहर बना नदियाँ गहरी, तेरे भ्िान्न प्रकार, तू एकही है।। चींटी से भी अणु - परमाणु बना, सब जीव - जगत् का रूप लिया। कहीं पवर्त - वृक्ष विशाल बना, सौंदयर् तेरा, तू एकही है।। यह दिव्य दिखाया है जिसने, वह है गुरुदेव की पूणर् दया। तुकड़या कहे कोइर् न और दिखा, बस मैं अरु तू सब एकही है।। कविता का पठन - पाठन किसी भी भाषा के साहित्य में विचारों और भावों के संप्रेषण की मुख्य रूप से दो शैलियाँ होती हैं - गद्य और कविता। कविता या तो छंद, तुक, लय, सुर एवं ताल में बँधी होती है या अतुकांत भी होती है। दोनों ही तरह की कविताओं में अलग - अलग भावानुभूतियों का आनंद लिया जा सकता है। एक ओर कविता पाठक की भावनाओं को उदात्त बनाती है तो दूसरी ओर उसके सौंदयर्बोध को माँजती - सँवारती है। वह मनुष्य को इंसानियत से, प्रकृति से, देश से, और वृहत्तर दुनिया से जोड़ती है। विद्याथ्िार्यों के किशोर मन को तो कविता विशेष रूप से प्रभावित करती है, क्योंकि किशोर मन सरल, जिज्ञासु और रागात्मक होता है। कविता किशोर भावनाओं के परिष्कार, संवेदनशीलता के विकास एवं सुरफचि - निमार्ण में तो योगदान करती ही है, साथ ही यह छात्रों में सुपाठ की क्षमता भी उत्पन्न करती है। उल्लेखनीय है कि हिंदीतर विद्याथीर् अपनी मातृभाषा की कविताओं और उनके नाद, भाव तथा विचार - सौंदयर् से सुपरिचित होते ही हैं। इस संकलन की कविताओं का तादात्म्य मातृभाषा की कविताओं से बिठाकर काव्य - श्िाक्षण को और अिाक रुचिकर तथा उपयोगी बनाया जा सकता है। काव्य - पाठ कविता के आनंद का अनुभव करने के लिए पहली आवश्यकता है उचित लय और प्रवाह के साथ कविता का वाचन। कविता गद्य नहीं है, अतः गद्य की भाँति नहीं पढ़ी जाती। लय और प्रवाह ही उसे गद्य से भ्िान्न बनाते हैं। वाचन मौन हो या मुखर, लय और प्रवाह के साथ ही होना चाहिए। लय का निधार्रण काव्य - पंक्ितयों में विद्यमान 84ध्स्पशर् गति, विराम - चिÉ, मात्रा तथा तुक से होता है। मात्राओं के घटने - बढ़ने से उसके प्रवाह में रफकावट आती है। अतः वाचन में शब्दों के उच्चारण का निदोर्ष होना आवश्यक है। संयुक्ताक्षरों का शु( उच्चारण न होने पर भी कविता की लय टूट जाएगी और वह कणर्कटु बन जाएगी। उद्वेलित कर अश्रु - राश्िायाँ हृदय - चिताएँ धधकाकर, महा महामारी प्रचंड हो पैफल रही थी इधर - उधर, क्षीण - वंफठ मृतवत्साओं का करुण - रुदन दुदा±त नितांत, भरे हुए था निज कृश रव में हाहाकार अपार अशांत। यहाँ उद्वेलित, अश्रु - राश्िायाँ, क्षीण, मृतवत्साओं, हाहाकार आदि का उच्चारण सही न होने पर कविता का पाठ ठीक से न हो सकेगा और वह प्रभावहीन हो जाएगी। शब्दाथर् - बोधन द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी पढ़नेवाले विद्याथ्िार्यों को कहीं - कहीं वुफछ शब्द कठिन लग सकते हैं। उनका अथर् जाने बिना उन्हें समग्र भाव - बोध में कठिनाइर् हो सकती है। अतः उन्हें शब्दाथर् बताए जाने चाहिए विंफतु शब्दाथर् - बोधन इतना बोझिल न हो कि कविता के आनंद में ही बाधा पड़े। अच्छा हो, एक - दो बार सस्वर वाचन के द्वारा कविता की मूल संवेदना स्पष्ट हो जाने के बाद ही शब्दाथर् बताए जाएँ। रैदास, रहीम आदि प्राचीन कवियों की भाषा आज की हिंदी से भ्िान्न है, पर गेयता, भाव - प्रवणता के कारण उनकी रचनाएँ सवर्त्रा लोकपि्रय हैं और बहुत संभव है कि पाठ्यपुस्तक में उ(ृत उनकी वुफछ रचनाओं से विद्याथीर् पहले से परिचित हों और ऐसे भाव - बोध की वुफछ कविताएँ अपनी मातृभाषा के माध्यम से भी पढ़ चुके हों। ऐसी कविताओं के सस्वर पाठ द्वारा कविता का भाव - ग्रहण सहज हो सकता है। कविता का पठन - पाठनध्85 भाव - ग्रहण और रसास्वाद कविता को सुनने - पढ़ने से जो अनिवर्चनीय आनंद प्राप्त होता है, उसे ही आचायो± ने ‘रस’ कहा है। शब्द - प्रयोग, अलंकार, कहने की विश्िाष्ट शैली, छंद, लय, प्रवाह आदि कविता के बाहरी तत्त्व हैं और उसकी आत्मा संपूणर् कविता में व्याप्त भाव विशेष ही है। कविता को बार - बार पढ़ने से उसकी मूल संवेदना तथा उसका रचना - कौशल दोनों ही स्पष्ट होते हैं परंतु जहाँ तक उसके भाव का प्रश्न है, वह किसी पद, पंक्ित या छंद में न होकर पूरी कविता में व्याप्त रहता है। कविताएँ ऐसी भी हो सकती हैं जिनमें कवि का मंतव्य सवर्था स्पष्ट न होता हो। कवि मात्रा वुफछ संकेत कर देता है और शेष अस्पष्ट ही रह जाता है, जो पाठक को सोचने - विचारने के लिए बािात कर उसे पंक्ितयों में छिपी गहराइर् को नापने के लिए उकसाता है। ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ की निम्नलिख्िात पंक्ितयाँ देख्िाए - कइर् गलियों के बीच कइर् नालों के पार वूफडे़ - करकट के ढेरों के बाद बदबू से पफटते जाते इस टोले के अंदर खुशबू रचते हैं हाथ खुशबू रचते हैं हाथ। श्िाल्प - सौंदयर् का उद्घाटन कविता का आनंद पाठक की रफचि, संवेदनशीलता और संस्कारों पर निभर्र करता है। ये बातें किसी में अिाक और किसी में कम भी हो सकती हैं, पर बार - बार काव्य - पाठ सुनने और कविता की चचार् करने से रफचियों में संस्कार संभव है और संवेदनशीलता भी बढ़ती है। वस्तुतः कविता का अथर् जान लेना या उसका भावाथर् लिख लेना ही पयार्प्त नहीं है। 86ध्स्पशर् छात्रों में धीरे - धीरे ऐसी क्षमता का विकास होना चाहिए कि वे कविता की मूल संवेदना या विषय को सहज रूप से ग्रहण कर अपने शब्दों में व्यक्त कर सवेंफ। इस बात पर बल दिया जाना चाहिए कि वे पठित कविताओं को वंफठस्थ कर सवेंफ और उचित अवसरों पर उन्हें लय एवं आरोह - अवरोह के साथ सुना सवेंफ।

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