स्वामी आनंद ;1887दृ1976द्ध संन्यासी स्वामी आनंद का जन्म गुजरात के कठियावाड़ िाले के किमड़ी गाँव मंे सन् 1887 में हुआ। इनका मूल नाम हिम्मतलाल था। जब ये दस साल के थे तभी वुफछ साधु इन्हें अपने साथ हिमालय की ओर ले गए और इनका नामकरण कियाμ स्वामी आनंद। 1907 में स्वामी आनंद स्वतंत्राता आंदोलन से जुड़ गए। महाराष्ट्र से वुफछ समय तक ‘तरुण हिंद’ अखबार निकाला, पिफर बाल गंगाधर तिलक के ‘केसरी’ अखबार से जुड़ गए। 1917 में गांधीजी के संसगर् में आने के बाद उन्हीं के निदेशन में ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ की प्रसार व्यवस्था सँभाल ली। इसी बहाने इन्हें, गांधीजी और उनके निजी सहयोगी महादेव भाइर् देसाइर् और बाद में प्यारेलाल जी को निकट से जानने का अवसर मिला। मूलतः गुजराती भाषा मेें लिखे गए प्रस्तुत पाठ ‘शुक्रतारे के समान’ में लेखक ने गांधीजी के निजी सचिव महादेव भाइर् देसाइर् की बेजोड़ प्रतिभा और व्यस्ततम दिनचयार् को उकेरा है। लेखक अपने इस रेखाचित्रा के नायक के व्यक्ितत्व और उसकी उफजार्, उनकी लगन और प्रतिभा से अभ्िाभूत है। महादेव भाइर् की सरलता, सज्जनता, निष्ठा, समपर्ण, लगन और निरभ्िामान को लेखक ने पूरी इर्मानदारी से शब्दों में पिरोया है। इनकी लेखनी महादेव के व्यक्ितत्व का ऐसा चित्रा खींचने में सपफल रही है कि पाठक को महादेव भाइर् पर अभ्िामान हो आता है। लेखक के अनुसार कोइर् भी महान व्यक्ित, महानतम कायर् तभी कर पाता है, जब उसके साथ ऐसे सहयोगी हों जो उसकी तमाम इतर चिंताओं और उलझनों को अपने सिर ले लें। गांधीजी के लिए महादेव भाइर् और भाइर् प्यारेलाल जी ऐसी ही शख्िसयत थे। शुक्रतारे के समान आकाश के तारों में शुक्र की कोइर् जोड़ नहीं। शुक्र चंद्र का साथी माना गया है। उसकी आभा - प्रभा का वणर्न करने में संसार के कवि थके नहीं। पिफर भी नक्षत्रा मंडल में कलगी - रूप इस तेजस्वी तारे को दुनिया या तो ऐन शाम के समय, बडे़ सवेरे घंटे - दो घंटे से अिाक देख नहीं पाती। इसी तरह भाइर् महादेव जी आधुनिक भारत की स्वतंत्राता के उषाकाल में अपनी वैसी ही आभा से हमारे आकाश को जगमगाकर, देश और दुनिया को मुग्ध करके, शुक्रतारे की तरह ही अचानक अस्त हो गए। सेवाधमर् का पालन करने के लिए इस धरती पर जनमे स्वगीर्य महादेव देसाइर् गांधीजी के मंत्राी थे। मित्रों के बीच विनोद में अपने को गांधीजी का ‘हम्माल’ कहने में और कभी - कभी अपना परिचय उनके ‘पीर - बावचीर् - भ्िाश्ती - खर’ के रूप में देने में वे गौरव का अनुभव किया करते थे। गांधीजी के लिए वे पुत्रा से भी अिाक थे। जब सन् 1917 में वे गांधीजी के पासपहँुचे थे, तभी गांधीजी ने उनको तत्काल पहचान लिया और उनको अपने उत्तरािाकारी का पद सौंप दिया। सन् 1919 में जलियाँवाला बाग के हत्याकांड के दिनों में पंजाब जातेहुए गांधीजी को पलवल स्टेशन पर गिरफ्ऱतार किया गया था। गांधीजी ने उसी समय महादेव भाइर् को अपना वारिस कहा था। सन् 1929 में महादेव भाइर् आसेतुहिमाचल, देश के चारों कोनों में, समूचे देश के दुलारे बन चुके थे। इसी बीच पंजाब में प़्ाफौजी शासन के कारण जो कहर बरसाया गया था, उसकाब्योरा रोश - रोश आने लगा। पंजाब के अिाकतर नेताओं को गिरफ्ऱ ़तार करके पफौजी कानून के तहत जन्म - वैफद की सशाएँ देकर कालापानी भेज दिया गया। लाहौर के मुख्य राष्ट्रीय अंग्रेशी दैनिक पत्रा ‘टिªब्यून’ के संपादक श्री कालीनाथ राय को 10 साल की जेल की सशा मिली। गांधीजी के सामने शुल्मों और अत्याचारों की कहानियाँ पेश करने के लिए आने वाले पीडि़तों के दल - के - दल गामदेवी के मण्िाभवन पर उमड़ते रहते थे। महादेव उनकी बातों की संक्ष्िाप्त टिप्पण्िायाँ तैयार करके उनको गंाधीजी के सामने पेश करते थे और आनेवालों के साथ उनकी रूबरू मुलाकातें भी करवाते थे। गांधीजी बंबइर्’ के मुख्य राष्ट्रीय अंग्रेशी दैनिक ‘बाम्बे क्रानिकल’ में इन सब विषयों पर लेख लिखा करते थे। क्रानिकल में जगह की तंगी बनी रहती थी। वुफछ ही दिनों में ‘क्रानिकल’ के निडर अंग्रेश संपादक हानीर्मैन को सरकार ने देश - निकाले की सशा देकर इंग्लैंड भेज दिया। उन दिनों बंबइर् के तीन नए नेता थे। शंकर लाल बैंकर, उम्मर सोबानी और जमनादास द्वारकादास। इनमें अंतिम श्रीमती बेसेंट के अनुयायी थे। ये नेता ‘यंग इंडिया’ नाम का एक अंग्रेशी साप्ताहिक भी निकालते थे। लेकिन उसमें ‘क्रानिकल’ वाले हानीर्मैन ही मुख्य रूप से लिखते थे।उनको देश निकाला मिलने के बाद इन लोगों को हर हफ्ऱ ते साप्ताहिक के लिए लिखनेवालों की कमी रहने लगी। ये तीनों नेता गांधीजी के परम प्रशंसक थे और उनके सत्याग्रह - आंदोलन में बंबइर् के बेजोड़ नेता भी थे। इन्होंने गांधीजी से विनती की कि वे ‘यंग इंडिया’ के संपादक बन जाएँ। गांधीजी को तो इसकी सख्त शरूरत थी ही। उन्होंने विनती तुरंत स्वीकार कर ली। गांधीजी का काम इतना बढ़ गया कि साप्ताहिक पत्रा भी कम पड़ने लगा। गांधीजीने ‘यंग इंडिया’ को हफ्ऱ ते में दो बार प्रकाश्िात करने का निश्चय किया। हर रोश का पत्रा - व्यवहार और मुलाकातें, आम सभाएँ आदि कामों के अलावा ‘यंग इंडिया’ साप्ताहिक में छापने के लेख, टिप्पण्िायाँ, पंजाब के मामलों का सारसंक्षेप और गांधीजी के लेख यह सारी सामग्री हम तीन दिन में तैयार करते। ‘यंग इंडिया’ के पीछे - पीछे ‘नवजीवन’ भी गांधीजी के पास आया और दोनों साप्ताहिक अहमदाबाद से निकलने लगे। छह महीनों के लिए मैं भी साबरमती आश्रम ’ वतर्मान में इसे ‘मुंबइर्’ कहते हंै। में रहने पहुँचा। शुरू में ग्राहकांे के हिसाब - किताब की और साप्ताहिकों को डाक में डलवाने की व्यवस्था मेरे जिम्मे रही। लेकिन वुफछ ही दिनों के बाद संपादन सहित दोनों साप्ताहिकों की और छापाखाने की सारी व्यवस्था मेरे जिम्मे आ गइर्। गांधीजी और महादेव का सारा समय देश भ्रमण में बीतने लगा। ये जहाँ भी होते, वहाँ से कामों और कायर्क्रमों की भारी भीड़ के बीच भी समय निकालकर लेख लिखते और भेजते। सब प्रांतों के उग्र और उदार देशभक्त, क्रांतिकारी और देश - विदेश के धुरंधर लोग, संवाददाता आदि गांधीजी को पत्रा लिखते और गांधीजी ‘यंग इंडिया’ के काॅलमों में उनकी चचार् किया करते। महादेव गांधीजी की यात्राओं के और प्रतिदिन की उनकी गतिवििायों के साप्ताहिक विवरण भेजा करते। इसके अलावा महादेव, देश - विदेश के अग्रगण्य समाचार - पत्रा, जो आँखों में तेल डालकर गांधीजी की प्रतिदिन की गतिवििायों को देखा करते थे और उन पर बराबर टीका - टिप्पणी करते रहते थे, उनको आडे़ हाथों लेने वाले लेख भी समय - समय पर लिखा करते थे। बेजोड़ काॅलम, भरपूर चैकसाइर्, उँफचे - से - उँफचे बि्रटिश समाचार - पत्रों की परंपराओं को अपनाकर चलने का गांधीजी का आग्रह और क‘र से क‘र विरोिायों के साथ भी पूरी - पूरी सत्यनिष्ठा में से उत्पन्न होनेवाली विनय - विवेक - युक्त विवाद करने की गांधीजी की तालीम इन सब गुणों ने तीव्र मतभेदों और विरोधी प्रचार के बीच भी देश - विदेश के सारे समाचार - पत्रांे की दुनिया में और एंग्लो - इंडियन समाचार - पत्रों के बीच भी व्यक्ितगत रूप से एम.डी. को सबका लाड़ला बना दिया था। गांधीजी के पास आने के पहले अपनी विद्याथीर् अवस्था में महादेव ने सरकार के अनुवाद - विभाग में नौकरी की थी। नरहरि भाइर् उनके जिगरी दोस्त थे। दोनों एक साथ वकालत पढे़ थे। दोनों ने अहमदाबाद में वकालत भी साथ - साथ ही शुरू की थी। इस पेशे में आमतौर पर स्याह को सपेफद और सप़्ोफद को स्याह करना होता है। साहित्य़और संस्कार के साथ इसका कोइर् संबंध नहीं रहता। लेकिन इन दोनों ने तो उसी समय से टैगोर, शरदचंद्र आदि के साहित्य को उलटना - पुलटना शुरू कर दिया था। ‘चित्रांगदा’ कच - देवयानी की कथा पर टैगोर द्वारा रचित ‘विदाइर् का अभ्िाशाप’ शीषर्क नाटिका, ‘शरद बाबू की कहानियाँ’ आदि अनुवाद उस समय की उनकी साहित्ियक गतिवििायों की देन हैं। भारत मंे उनके अक्षरों का कोइर् सानी नहीं था। वाइसराय के नाम जाने वाले गांधीजी के पत्रा हमेशा महादेव की लिखावट में जाते थे। उन पत्रांे को देख - देखकर दिल्ली और श्िामला में बैठे वाइसराय लंबी साँस - उसँास लेते रहते थे। भले ही उन दिनों बि्रटिश सल्तनत पर कहीं सूरज न डूबता हो, लेकिन उस सल्तनत के ‘छोटे’ बादशाह को भी गंाधीजी के सेव्रेफटरी के समान खुशनवीश ;सुंदर अक्षर लिखने वाला लेखकद्ध कहाँ मिलता था? बडे़ - बडे़ सिविलियन और गवनर्र कहा करते थे कि सारी बि्रटिश सविर्सों में महादेव के समान अक्षर लिखने वाला कहीं खोजने पर भी मिलता नहीं था। पढ़ने वाले को मंत्रामुग्ध करने वाला शु( और सुंदर लेखन। महादेव के हाथों के लिखे गए लेख, टिप्पण्िायाँ, पत्रा, गांधीजी के व्याख्यान, प्राथर्ना - प्रवचन, मुलाकातें, वातार्लापों पर लिखी गइर् टिप्पण्िायाँ, सब वुफछ पुफलस्केप के चैथाइर् आकारवाली मोटी अभ्यास पुस्तकों में, लंबी लिखावट के साथ, जेट की सी गति से लिखा जाता था। वे ‘शॅाटर्हैंड’ जानते नहीं थे। बडे़ - बडे़ देशी - विदेशी राजपुरफष, राजनीतिज्ञ, देश - विदेश के अग्रगण्य समाचार - पत्रों के प्रतिनििा, अंतरराष्ट्रीय संगठनों के संचालक, पादरी, ग्रंथकार आदि गांधीजी से मिलने के लिए आते थे। ये लोग खुद या इनके साथी - संगी भी गांधीजी के साथ बातचीत को ‘शाॅटर्हैंड’ में लिखा करते थे। महादेव एक कोने में बैठे - बैठे अपनी लंबी लिखावट में सारी चचार् को लिखते रहते थे। मुलाकात के लिए आए हुए लोग अपनी मुकाम पर जाकर सारी बातचीत को टाइप करके जब उसे गांधीजी के पास ‘ओके’ करवाने के लिए पहुँचते, तो भले ही उनमें वुफछ भूलंे या कमियाँ - खामियाँ मिल जाएँ, लेकिन महादेव की डायरी में या नोट - बही में मजाल है कि काॅमा मात्रा की भी भूल मिल जाए। गांधीजी कहते: महादेव के लिखे ‘नोट’ के साथ थोड़ा मिलान कर लेना था न। और लोग दाँतों अँगुली दबाकर रह जाते। लुइर् पिफशर और गुंथर के समान धुरंधर लेखक अपनी टिप्पण्िायों का मिलान महादेव की टिप्पण्िायों के साथ करके उन्हें सुधारे बिना गांधीजी के पास ले जाने में हिचकिचाते थे। साहित्ियक पुस्तकों की तरह ही महादेव वतर्मान राजनीतिक प्रवाहों और घटनाओं से संबंिात अद्यतन जानकारीवाली पुस्तवेंफ भी पढ़ते रहते थे। हिंदुस्तान से संबंिात देश - विदेश की ताशी - से - ताशी राजनीतिक गतिवििायों और चचार्ओं की नयी - से - नयी जानकारी उनके पास मिल सकती थी। सभाओं में, कमेटियों की बैठकों में या दौड़ती रेलगाडि़यों के डिब्बों में उफपर की बथर् पर बैठकर, ठूँस - ठूँसकर भरे अपने बडे़ - बडे़ झोलों में रखे ताशे - से - ताशे समाचार - पत्रा, मासिक - पत्रा और पुस्तवेंफ वे पढ़ते रहते, अथवा ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ के लिए लेख लिखते रहते। लगातार चलनेवाली यात्राओं, हर स्टेशन पर दशर्नों के लिए इकऋा हुइर् जनता के विशाल समुदायों, सभाओं, मुलाकातों, बैठकों, चचार्ओं और बातचीतों के बीच वे स्वयं कब खाते, कब नहाते, कब सोते या कब अपनी हाशतें रपफा करते, किसी को इसका कोइर् पता नहीं चल पाता। वे एक घंटे में़चार घंटों के काम निपटा देते। काम में रात और दिन के बीच कोइर् प़्ाफवर्फ शायद ही कभी रहता हो। वे सूत भी बहुत सुंदर कातते थे। अपनी इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच भी वे कातना कभी चूकते नहीं थे। बिहार और उत्तर प्रदेश के हशारों मील लंबे मैदान गंगा, यमुना और दूसरी नदियों के परम उपकारी, सोने की कीमत वाले ‘गाद’ के बने हैं। आप सौ - सौ कोस चल लीजिए रास्ते में सुपारी पफोड़ने लायक एक पत्थर भी कहीं मिलेगा नहीं। इसी तरह महादेव के संपवर्फ में आने वाले किसी को भी ठेस या ठोकर की बात तो दूर रही, खुरदरी मि‘ी या वंफकरी भी कभी चुभती नहीं थी। उनकी निमर्ल प्रतिभा उनके संपवर्फ में आने वाले व्यक्ित को चंद्र - शुक्र की प्रभा के साथ दूधों नहला देती थी। उसमें सराबोर होने वाले के मन से उनकी इस मोहिनी का नशा कइर् - कइर् दिन तक उतरता न था। महादेव का समूचा जीवन और उनके सारे कामकाज गांधीजी के साथ एकरूप होकर इस तरह गुँथ गए थे कि गांधीजी से अलग करके अकेले उनकी कोइर् कल्पना की ही नहीं जा सकती थी। कामकाज की अनवरत व्यस्तताओं के बीच कोइर् कल्पना भी न कर सके, इस तरह समय निकालकर लिखी गइर् दिन - प्रतिदिन की उनकी डायरी की वे अनगिनत अभ्यास पुस्तवेंफ, आज भी मौजूद हैं। प्रथम श्रेणी की श्िाष्ट, संस्कार - संपन्न भाषा और मनोहारी लेखनशैली की इर्श्वरीय देन महादेव को मिली थी। यद्यपि गांधीजी के पास पहुँचने के बाद घमासान लड़ाइयों, आंदोलनों और समाचार - पत्रों की चचार्ओं के भीड़ - भरे प्रसंगों के बीच केवल साहित्ियक गतिवििायों के लिए उन्हें कभी समय नहीं मिला, पिफर भी गांधीजी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ का अंगे्रशी अनुवाद उन्होंने किया, जो ‘नवजीवन’ में प्रकाश्िात होनेवाले मूलगुजराती की तरह हर हफ्ऱ ते ‘यंग इंडिया’ में छपता रहा। बाद में पुस्तक के रूप में उसके अनगिनत संस्करण सारी दुनिया के देशों में प्रकाश्िात हुए और बिके। सन् 1934 - 35 में गांधीजी वधार् के महिला आश्रम में और मगनवाड़ी में रहने के बाद अचानक मगनवाड़ी से चलकर सेगाँव की सरहद पर एक पेड़ के नीचे जा बैठे। उसके बाद वहाँ एक - दो झांेपडे़ बने और पिफर धीरे - धीरे मकान बनकर तैयार हुए, तब तक महादेव भाइर् दुगार् बहन और चि. नारायण के साथ मगनवाड़ी में रहे। वहीं से वे वधार् की असह्य गरमी में रोश सुबह पैदल चलकर सेवाग्राम पहुँचते थे। वहाँ दिनभर काम करके शाम को वापस पैदल आते थे। जाते - आते पूरे 11 मील चलते थे। रोश - रोश का यह सिलसिला लंबे समय तक चला। वुफल मिलाकर इसका जो प्रतिवूफल प्रभाव पड़ा, उनकी अकाल मृत्यु के कारणों में वह एक कारण माना जा सकता है। इस मौत का घाव गांधीजी के दिल मंे उनके जीते जी बना ही रहा। वे भतर्ृहरि के भजन की यह पंक्ित हमेशा दोहराते रहे: ‘ए रे जखम जोगे नहि जशे’μ यह घाव कभी योग से भरेगा नहीं। बाद के सालों में प्यारेलाल जी से वुफछ कहना होता, और गांधीजी उनको बुलाते तो उस समय भी अनायास उनके मुँह से ‘महादेव’ ही निकलता। अनुवादक: श्री काश्िानाथ त्रिावेदी प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिएμ 1.महादेव भाइर् अपना परिचय किस रूप मंे देते थे? 2.‘यंग इंडिया’ साप्ताहिक में लेखों की कमी क्यों रहने लगी थी? 3.गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ प्रकाश्िात करने के विषय में क्या निश्चय किया? 4.गांधीजी से मिलने से पहले महादेव भाइर् कहाँ नौकरी करते थे? 5.महादेव भाइर् के झोलों में क्या भरा रहता था? 6.महादेव भाइर् ने गांधीजी की कौन - सी प्रसि( पुस्तक का अनुवाद किया था? 7.अहमदाबाद से कौन - से दो साप्ताहिक निकलते थे? 8.महादेव भाइर् दिन में कितनी देर काम करते थे? 9.महादेव भाइर् से गांधीजी की निकटता किस वाक्य से सि( होती है? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30द्ध शब्दों में लिख्िाएμ 1.गांधीजी ने महादेव को अपना वारिस कब कहा था? 2.गांधीजी से मिलने आनेवालों के लिए महादेव भाइर् क्या करते थे? 3.महादेव भाइर् की साहित्ियक देन क्या है? 4.महादेव भाइर् की अकाल मृत्यु का कारण क्या था? 5.महादेव भाइर् के लिखे नोट के विषय में गांधीजी क्या कहते थे? ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1.पंजाब में पफौजी शासन ने क्या कहर बरसाया?़2.महादेव जी के किन गुणों ने उन्हें सबका लाड़ला बना दिया था? 3.महादेव जी की लिखावट की क्या विशेषताएँ थीं? ;गद्ध निम्नलिख्िात का आशय स्पष्ट कीजिएμ 1.‘अपना परिचय उनके ‘पीर - बावचीर् - भ्िाश्ती - खर’ के रूप में देने में वे गौरवान्िवत महसूस करते थे।’ 2.इस पेशे में आमतौर पर स्याह को सप़्ोफद और सप़्ोफद को स्याह करना होता था। 3.देश और दुनिया को मुग्ध करके शुक्रतारे की तरह ही अचानक अस्त हो गए। 4.उन पत्रों को देख - देखकर दिल्ली और श्िामला में बैठे वाइसराय लंबी साँस - उसाँस लेते रहते थे। भाषा - अध्ययन 1ण् ‘इक’ प्रत्यय लगाकर शब्दों का निमार्ण कीजिएμ सप्ताह - साप्ताहिक अथर् - .....................साहित्य - ......................धमर् - .....................व्यक्ित - ......................मास - .....................राजनीति - ......................वषर् - .....................2ण् नीचे दिए गए उपसगो± का उपयुक्त प्रयोग करते हुए शब्द बनाइएμ अ, नि, अन, दुर, वि, वुफ, पर, सु, अिा आयर् - .............................आगत - .............................डर - .............................आकषर्ण - ............................क्रय - .............................मागर् - ............................उपस्िथत - .............................लोक - ............................नायक - .............................भाग्य - ............................3ण् निम्नलिख्िात मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिएμ आड़े हाथों लेना अस्त हो जाना दाँतों तले अंगुली दबाना मंत्रा - मुग्ध करना लोहे के चने चबाना 4ण् निम्नलिख्िात शब्दों के पयार्य लिख्िाएμ वारिस - ....................जिगरी - ....................कहर - ...................मुकाम - ....................रूबरू - ....................प़्ाफवर्फ - ...................तालीम - ....................गिरफ्ऱतार - ...................5ण् उदाहरण के अनुसार वाक्य बदलिएμ उदाहरणः गांधीजी ने महादेव भाइर् को अपना वारिस कहा था। गांधीजी महादेव भाइर् को अपना वारिस कहा करते थे। 1.महादेव भाइर् अपना परिचय ‘पीर - बावचीर् - भ्िाश्ती - खर’ के रूप में देते थे। 2.पीडि़तों के दल - के - दल गामदेवी के मण्िाभवन पर उमड़ते रहते थे। 3.दोनों साप्ताहिक अहमदाबाद से निकलते थे। 4.देश - विदेश के समाचार - पत्रा गांधीजी की गतिवििायों पर टीका - टिप्पणी करते थे। 5.गांधीजी के पत्रा हमेशा महादेव की लिखावट में जाते थे। योग्यता - विस्तार 1.गांधीजी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ को पुस्तकालय से लेकर पढि़ए। 2.जलियाँवाला बाग में कौन - सी घटना हुइर् थी? जानकारी एकत्रिात कीजिए। 3.अहमदाबाद में बापू के आश्रम के विषय में चित्रात्मक जानकारी एकत्रा कीजिए। 4.सूयोर्दय के 2.3 घंटे पहले पूवर् दिशा में या सूयार्स्त के 2.3 घंटे बाद पश्िचम दिशा में एक खूब चमकता हुआ ग्रह दिखाइर् देता है, वह शुक्र ग्रह है। छोटी दूरबीन से इसकी बदलती हुइर् कलाएँ देखी जा सकती हैं, जैसे चंद्रमा की कलाएँ। 5.वीराने में जहाँ बिायाँ न हों वहाँ अँधेरी रात में जब आकाश में चाँद भी दिखाइर् न दे रहा हो तब शुक्र ग्रह ;जिसे हम शुक्र तारा भी कहते हैंद्ध के प्रकाश से अपने साए को चलते हुए देखा जा सकता है। कभी अवसर मिले तो इसे स्वयं अनुभव करके देख्िाए। परियोजना कायर् 1.सूयर्मंडल में नौ ग्रह हैं। शुक्र सूयर् से क्रमशः दूरी के अनुसार दूसरा ग्रह है और पृथ्वी तीसरा। चित्रा सहित परियोजना पुस्ितका में अन्य ग्रहों के क्रम लिख्िाए। 2.‘स्वतंत्राता आंदोलन में गांधीजी का योगदान’ विषय पर कक्षा में परिचचार् आयोजित कीजिए। 3.भारत के मानचित्रा पर निम्न स्थानों को दशार्एँ: अहमदाबाद, जलियाँवाला बाग ;अमृतसरद्ध, कालापानी ;अंडमानद्ध, दिल्ली, श्िामला,श्रीमती बेसेंट ;एनीबेसेंटद्ध - स्वाध्ीनता आंदोलन की नेता। इन्होंने होमरूल लीग और थ्िायोसोपिफकल सोसाइटी की स्थापना की बिहार, उत्तर प्रदेश शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ आभा - प्रभा - चमवफ, तेश नक्षत्रा - मंडल - तारा समूह हम्माल - बोझ उठानेवाला, वुफली पीर - महात्मा, सि( बावचीर् - खाना पकानेवाला, रसोइया भ्िाश्ती - मशक से पानी ढोनेवाला व्यक्ित खर - गध, घास आसेतुहिमाचल - सेतुबंध रामेश्वर से हिमाचल तक विस्तीणर् दुलारे - प्यारे ब्योरा - विवरण कालापानी - आजीवन वैफद की सशा पाए वैफदियों को रखने का स्थान, वतर्मान अंडमान निकोबार द्वीप समूह रूबरू - आमने - सामने धुरंधर - प्रवीण, उत्तम गुणों से युक्त टीका - टिप्पणी - व्याख्या, आलोचना चैकसाइर् - चैकस रहना, नशर रखना क‘र - दृढ़, जिसे अपने मत या विश्वास का अिाक आग्रह हो लाड़ला - प्यारा, दुलारा जिगरी दोस्त - घनिष्ठ मित्रा पेशा - व्यवसाय 80ध्स्पशर् स्याह - काला सल्तनत - राज्य, हुवूफमत व्याख्यान - भाषण, वक्तृता, किसी विषय की व्याख्या या टीका करना पुफलस्केप - कागश वफा एक आकार चैथाइर् - चैथा भाग अग्रगण्य - प्रमुख, सबसे पहले गिना जानेवाला विवरण - वणर्न, व्याख्या अद्यतन - अब तक का, वतर्मान से संबंध रखनेवाला गाद - तलछट, गाढ़ी चीश सराबोर - तरबतर, डूबा हुआ अनवरत - लगातार सानी - बराबरी करनेवाला, उसी जोड़ का दूसरा अनगिनत - जिसे गिना न जा सके सिलसिला - क्रम अनायास - बिना किसी प्रयास के, आसानी से ‘पीर - बावचीर् भ्िाश्ती - खर’ - सभी प्रकार के कायो± को सपफलतापूवर्क कर सकने में समथर् व्यक्ित

>Chap 8>

Our Past -3

Rahim.tif

रहीम

(1556 - 1626)

रहीम का जन्म लाहौर (अब पाकिस्तान) में सन् 1556 में हुआ। इनका पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। रहीम अरबी, फ़ारसी, संस्कृत और हिंदी के अच्छे जानकार थे। इनकी नीतिपरक उक्तियों पर संस्कृत कवियों की स्पष्ट छाप परिलक्षित होती है। रहीम मध्ययुगीन दरबारी संस्कृति के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। अकबर के दरबार में हिंदी कवियों में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान था। रहीम अकबर के नवरत्नों में से एक थे।

रहीम के काव्य का मुख्य विषय शृंगार, नीति और भक्ति है। रहीम बहुत लोकप्रिय कवि थे। इनके दोहे सर्वसाधारण को आसानी से याद हो जाते हैं। इनके नीतिपरक दोहे ज़्यादा प्रचलित हैं, जिनमें दैनिक जीवन के दृष्टांत देकर कवि ने उन्हें सहज, सरल और बोधगम्य बना दिया है। रहीम को अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था। इन्होंने अपने काव्य में प्रभावपूर्ण भाषा का प्रयोग किया है।

रहीम की प्रमुख कृतियाँ हैं: रहीम सतसई, शृंगार सतसई, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, रहीम रत्नावली, बरवै, भाषिक भेदवर्णन। ये सभी कृतियाँ ‘रहीम ग्रंथावली’ में समाहित हैं।

प्रस्तुत पाठ में रहीम के नीतिपरक दोहे दिए गए हैं। ये दोहे जहाँ एक ओर पाठक को औरों के साथ कैसा बरताव करना चाहिए, इसकी शिक्षा देते हैं, वहीं मानव मात्र को करणीय और अकरणीय आचरण की भी नसीहत देते हैं। इन्हें एक बार पढ़ लेने के बाद भूल पाना संभव नहीं है और उन स्थितियों का सामना होते ही इनका याद आना लाज़िमी है, जिनका इनमें चित्रण है।

 

दोहे


रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।

टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।।

 

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।

सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय।।

 

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।

रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।।

 

चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध-नरेस।

जा पर बिपदा पड़त है, सो आवत यह देस।।

 

दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं।

ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं।।

 

धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय।

उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय।।

 

नाद रीझि तन देत मृृग, नर धन हेत समेत।

ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत।।

 

बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।

रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय।।

 

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।

जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि।।

 

रहिमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय।

बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सके बचाय।।

 

रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।


प्रश्न-अभ्यास

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–

(क) प्रेम का धागा टूटने पर पहले की भाँति क्यों नहीं हो पाता?

(ख) हमें अपना दुःख दूसरों पर क्यों नहीं प्रकट करना चाहिए? अपने मन की व्यथा दूसरों से कहने पर उनका व्यवहार कैसा हो जाता है?

(ग) रहीम ने सागर की अपेक्षा पंक जल को धन्य क्यों कहा है?

(घ) एक को साधने से सब कैसे सध जाता है?

(ङ) जलहीन कमल की रक्षा सूर्य भी क्यों नहीं कर पाता?

(च) अवध नरेश को चित्रकूट क्यों जाना पड़ा?

(छ) ‘नट’ किस कला में सिद्ध होने के कारण ऊपर चढ़ जाता है?

(ज) ‘मोती, मानुष, चून’ के संदर्भ में पानी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।

2. निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए–

(क) टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।

(ख) सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय।

(ग) रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।

(घ) दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं।

(ङ) नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत।

(च) जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि।

(छ) पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।

3. निम्नलिखित भाव को पाठ में किन पंक्तियों द्वारा अभिव्यक्त किया गया है–

(क) जिस पर विपदा पड़ती है वही इस देश में आता है।

(ख) कोई लाख कोशिश करे पर बिगड़ी बात फिर बन नहीं सकती।

(ग) पानी के बिना सब सूना है अतः पानी अवश्य रखना चाहिए।

4. उदाहरण के आधार पर पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप लिखिए–

उदाहरणः कोय – कोई, जे – जो

ज्यों ..................... कछु .....................

नहिं ..................... कोय .....................

धनि ..................... आखर .....................

जिय ..................... थोरे .....................

होय ..................... माखन .....................

तरवारि ..................... सींचिबो .....................

मूलहिं ..................... पिअत .....................

पिआसो ..................... बिगरी .....................

आवे ..................... सहाय .....................

ऊबरै ..................... बिनु .....................

बिथा ..................... अठिलैहैं .....................

परिजाय .....................

योग्यता-विस्तार

1. ‘सुई की जगह तलवार काम नहीं आती’ तथा ‘बिन पानी सब सून’ इन विषयों पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित कीजिए।

2. ‘चित्रकूट’ किस राज्य में स्थित है, जानकारी प्राप्त कीजिए।

परियोजना कार्य

नीति संबंधी अन्य कवियों के दोहेे/कविता एकत्र कीजिए और उन दोहों/कविताओं को 

चार्ट पर लिखकर भित्ति पत्रिका पर लगाइए।

शब्दार्थ और टिप्पणियाँ

चटकाय चटकाकर

बिथा व्यथा, दुःख, वेदना

गोय छिपाकर

अठिलैहैं इठलाना, मज़ाक उड़ाना

सींचिबो सिंचाई करना, पौधों में पानी देना

अघाय - तृप्त

अरथ (अर्थ) मायने, आशय

थोरे - थोड़ा, कम

पंक कीचड़

उदधि - सागर

नाद - ध्वनि

रीझि - मोहित होकर

बिगरी - बिगड़ी हुई

फाटे दूध - फटा हुआ दूध

मथे - बिलोना, मथना

आवे - आना

निज - अपना

बिपति - मुसीबत, संकट

पिआसो - प्यासा

चित्रकूट - वनवास के समय श्री रामचंद्र जी सीता और लक्ष्मण के साथ कुछ समय तक चित्रकूट में रहे थे

 

3.tif

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