गणेशशंकर विद्याथीर् ;1891 . 1931द्ध गणेशशंकर विद्याथीर् का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में सन् 1891 में हुआ। एंट्रेंस पास करनेके बाद वे कानपुर करेंसी दफ्ऱतर में मुलािाम हो गए। पिफर 1921 में ‘प्रताप’ साप्ताहिक अखबार निकालना शुरू किया। विद्याथीर् आचायर् महावीर प्रसाद द्विवेदी को अपना साहित्ियक गुरफ मानते थे। उन्हीं की प्रेरणा से आशादी की अलख जगानेवाली रचनाओं का सृजन और अनुवाद उन्होंने किया। इसी उद्देश्य की पूतिर् के लिए उन्होंने सहायक पत्राकारिता की। विद्याथीर् के जीवन का श्यादातर समय जेलों में बीता। इन्हें बार - बार जेल में डालकर भी अंग्रेश सरकार को स्ंातुष्िट नहीं मिली। वह इनका अखबार भी बंद करवाना चाहती थी। कानपुर में 1931 में मचे सांप्रदायिक दंगों को शांत करवाने के प्रयास में विद्याथीर् को अपने प्राणों की बलि देनी पड़ी। इनकी मृत्यु पर महात्मा गांधी ने कहा था: काश! ऐसी मौत मुझे मिली होती। विद्याथीर् अपने जीवन में भी और लेखन में भी गरीबों, किसानों, मशलूमों, मशदूरों आदि के प्रति सच्ची हमददीर् का इशहार करते थे। देश की आशादी की मुहिम में आड़े आनेवाले किसी भीकृत्य या परंपरा को वह आड़े हाथों लेते थे। देश की आशादी उनकी नशर में सबसे महत्त्वपूणर् थी। आपसी भाइर्चारे को नष्ट - भ्रष्ट करनेवालों की वे जमकर ‘खबर’ लेते थे। उनकी भाषा सरल, सहज, लेकिन बेहद मारक और सीधा प्रहार करनेवाली होती थी। प्रस्तुत पाठ ‘धमर् की आड़’ में विद्याथीर् जी ने उन लोगों के इरादों और वुफटिल चालों को बेनकाब किया है, जो धमर् की आड़ लेकर जनसामान्य को आपस में लड़ाकर अपना स्वाथर् सि( करने की प्ि़ाफराक में रहते हैं। धमर् की आड़ में अपना स्वाथर् सि( करनेवाले हमारे ही देश में हों, ऐसा नहीं है। विद्याथीर् अपने इस पाठ में दूर देशों में भी धमर् की आड़ में वैफसे - वैफसे वुफकमर् हुए हैं, वैफसी - वैफसी अनीतियाँ हुइर् हैं, कौन - कौन लोग, वगर् और समाज उनके श्िाकार हुए हैं, इसका खुलासा करते चलते हैं। धमर् की आड़ इस समय, देश में धमर् की धूम है। उत्पात किए जाते हैं, तो धमर् और इर्मान के नाम पर, और जिद की जाती है, तो धमर् और इर्मान के नाम पर। रमुआ और बु(ू मियाँ धमर् और इर्मान को जानें, या न जानें, परंतु उनके नाम पर उबल पड़ते हैं और जान लेने और जान देने के लिए तैयार हो जाते हैं। देश के सभी शहरों का यही हाल है। उबल पड़नेवाले साधारण आदमी का इसमें केवल इतना ही दोष है कि वह वुफछ भी नहीं समझता - बूझता, और दूसरे लोग उसे जिधर जोत देते हैं, उधर जुत जाता है। यथाथर् दोष है, वुफछ चलते - पुरशे, पढे़ - लिखे लोगों का, जो मूखर् लोगों की शक्ितयों और उत्साह का दुरफपयोग इसलिए कर रहे हैं कि इस प्रकार, जाहिलों के बल के आधार पर उनका नेतृत्व और बड़प्पन कायम रहे। इसके लिए धमर् और इर्मान की बुराइयों से काम लेना उन्हें सबसे सुगम मालूम पड़ता है। सुगम है भी। साधारण से साधारण आदमी तक के दिल में यह बात अच्छी तरह बैठी हुइर् है कि धमर् और इर्मान की रक्षा के लिए प्राण तक दे देना वाजिब है। बेचारा साधारणआदमी धमर् के तत्त्वों को क्या जाने? लकीर पीटते रहना ही वह अपना धमर् समझता है। उसकी इस अवस्था से चालाक लोग इस समय बहुत बेजा पफायदा उठा रहे हैं।़पाश्चात्य देशों में, धनी लोगों की, गरीब मशदूरों की झोंपड़ी का मशाक उड़ाती हुइर् अ‘ालिकाएँ आकाश से बातें करती हैं! गरीबों की कमाइर् ही से वे मोटे पड़ते हैं, और उसी के बल से, वे सदा इस बात का प्रयत्न करते हैं कि गरीब सदा चूसे जाते रहें। यह भयंकर अवस्था है! इसी के कारण, साम्यवाद, बोल्शेविश्म आदि का जन्म हुआ। 64ध्स्पशर् हमारे देश में, इस समय, धनपतियों का इतना शोर नहीं है। यहाँ, धमर् के नाम पर, वुफछ इने - गिने आदमी अपने हीन स्वाथोर्± की सिि के लिए, करोड़ांे आदमियों की शक्ित का दुरफपयोग किया करते हैं। गरीबों का धनाढ्यों द्वारा चूसा जाना इतना बुरा नहीं है, जितना बुरा यह है कि वहाँ है धन की मार, यहाँ है बुि पर मार। वहाँ धन दिखाकर करोड़ांे को वश में किया जाता है, और पिफर मन - माना धन पैदा करने के लिए जोत दिया जाता है। यहाँ है बुि पर परदा डालकर पहले इर्श्वर और आत्मा का स्थान अपने लिए लेना, और पिफर, धमर्, इर्मान, इर्श्वर और आत्मा के नाम पर अपनी स्वाथर् - सिि के लिए लोगों को लड़ाना - भ्िाड़ाना। मूखर् बेचारे धमर् की दुहाइयाँ देते और दीन - दीन चिल्लाते हैं, अपने प्राणों की बाजियाँ खेलते और थोडे़ - से अनियंत्रिात और धूतर् आदमियों का आसन उँफचा करते और उनका बल बढ़ाते हैं। धमर् और इर्मान के नाम पर किए जाने वाले इस भीषण व्यापार वफो रोकने के लिए, साहस और दृढ़ता के साथ, उद्योग होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक भारतवषर् में नित्य - प्रति बढ़ते जाने वाले झगडे़ कम न होंगे। धमर् की उपासना के मागर् में कोइर् भी रफकावट न हो। जिसका मन जिस प्रकार चाहे, उसी प्रकार धमर् की भावना को अपने मन में जगावे। धमर् और इर्मान, मन का सौदा हो, इर्श्वर और आत्मा के बीच का संबंध हो, आत्मा को शु( करने और उँफचे उठाने का साधन हो। वह, किसी दशा में भी, किसी दूसरे व्यक्ित की स्वाधीनता को छीनने या वुफचलने का साधन न बने। आपका मन चाहे, उस तरह का धमर् आप मानें, और दूसरों का मन चाहे, उस प्रकार का धमर् वह माने। दो भ्िान्न धमोर्± के मानने वालों के टकरा जाने के लिए कोइर् भी स्थान न हो। यदि किसी धमर् के मानने वाले कहीं शबरदस्ती टाँग अड़ाते हों, तो उनका इस प्रकार का कायर् देश की स्वाधीनता के विरफ( समझा जाए। देश की स्वाधीनता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन निःसंदेह, अत्यंत बुरा था, जिस दिन, स्वाधीनता के क्षेत्रा में ख्िालापफत, मुल्ला,़मौलवियों और धमार्चायोर्± को स्थान दिया जाना आवश्यक समझा गया। एक प्रकार से उस दिन हमने स्वाधीनता के क्षेत्रा में, एक कदम पीछे हटकर रखा था। अपने ध्मर् की आड़ध्65 उसी पाप का पफल आज हमें भोगना पड़ रहा है। देश को स्वाधीनता के संग्राम ही ने मौलाना अब्दुल बारी और शंकराचायर् को देश के सामने दूसरे रूप में पेश किया, उन्हें अिाक शक्ितशाली बना दिया और हमारे इस काम का पफल यह हुआ है कि इस समय, हमारे हाथों ही से बढ़ाइर् इनकी और इनके से लोगों की शक्ितयाँ हमारी जड़उखाड़ने और देश में मशहबी पागलपन, प्रपंच और उत्पात का राज्य स्थापित कर रही हैं। महात्मा गांधी धमर् को सवर्त्रा स्थान देते हैं। वे एक पग भी धमर् के बिना चलने के लिए तैयार नहीं। परंतु उनकी बात ले उड़ने के पहले, प्रत्येक आदमी का कतर्व्य यह है कि वह भली - भाँति समझ ले कि महात्माजी के ‘धमर्’ का स्वरूप क्या है?धमर् से महात्माजी का मतलब धमर् उँफचे और उदार तत्त्वों ही का हुआ करता है। उनके मानने में किसे एतराश हो सकता है। अजाँ देने, शंख बजाने, नाक दाबने और नमाश पढ़ने का नाम धमर् नहीं है।शु(ाचरण और सदाचार ही धमर् के स्पष्ट चिÉ हैं। दो घंटे तक बैठकर पूजा कीजिए और पंच - वक्ता नमाश भी अदा कीजिए, परंतु इर्श्वर को इस प्रकार रिश्वत के दे चुकने के पश्चात्, यदि आप अपने को दिन - भर बेइर्मानी करने और दूसरों को तकलीप़्ाफ पहँुचाने के लिए आशाद समझते हैं तो, इस धमर् को, अब आगे आने वाला समय कदापि नहीं टिकने देगा। अब तो, आपका पूजा - पाठ न देखा जाएगा, आपकी भलमनसाहत की कसौटी केवल आपका आचरण होगी। सबके कल्याण की दृष्िट से, आपको अपने आचरण को सुधारना पडे़गा और यदि आप अपने आचरण को नहीं सुधारेंगे तो नमाश और रोशे, पूजा और गायत्राी आपको देश के अन्य लोगों की आशादी को रौंदने और देश - भर में उत्पातों का कीचड़ उछालने के लिए आशाद न छोड़ सकेगी। ऐसे धामिर्क और दीनदार आदमियों से तो, वे ला - मशहब और नास्ितक आदमी कहीं अिाक अच्छे और उफॅँचे हैं, जिनका आचरण अच्छा है, जो दूसरों के सुख - दुःख का खयाल रखते हैं और जो मूखो± को किसी स्वाथर् - सिि के लिए उकसाना बहुत बुरा समझते हैं। इर्श्वर इन नास्ितकों और ला - मशहब लोगों को अिाक प्यार करेगा, और वह अपने पवित्रा नाम पर अपवित्रा काम करने वालों से यही कहना पसंद करेगा, मुझे मानो 66ध्स्पशर् या न मानो, तुम्हारे मानने ही से मेरा इर्श्वरत्व कायम नहीं रहेगा, दया करके, मनुष्यत्व को मानो, पशु बनना छोड़ो और आदमी बनो! प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिएμ 1.आज धमर् के नाम पर क्या - क्या हो रहा है? 2.धमर् के व्यापार को रोकने के लिए क्या उद्योग होने चाहिए? 3.लेखक के अनुसार स्वाध्ीनता आंदोलन का कौन सा दिन सबसे बुरा था? 4.साधारण से साधारण आदमी तक के दिल में क्या बात अच्छी तरह घर कर बैठी है? 5.धमर् के स्पष्ट चिÉ क्या हैं? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1.चलते - पुरशे लोग धमर् के नाम पर क्या करते हैं? 2.चालाक लोग साधारण आदमी की किस अवस्था का लाभ उठाते हंै? 3.आनेवाला समय किस प्रकार के धमर् को नहीं टिकने देगा? 4.कौन - सा कायर् देश की स्वाधीनता के विरफ( समझा जाएगा? 5.पाश्चात्य देशों में धनी और निधर्न लोगों में क्या अंतर है? 6.कौन - से लोग धामिर्क लोगों से अिाक अच्छे हैं? ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1.धमर् और इर्मान के नाम पर किए जाने वाले भीषण व्यापार को वैफसे रोका जा सकता है? 2.‘बुि पर मार’ के संबंध मंे लेखक के क्या विचार हैं? 3.लेखक की दृष्िट में धमर् की भावना वैफसी होनी चाहिए? 4.महात्मा गांधी के धमर् - संबंधी विचारों पर प्रकाश डालिए। 5.सबके कल्याण हेतु अपने आचरण को सुधारना क्यों आवश्यक है? ध्मर् की आड़ध्67 ;गद्ध निम्नलिख्िात का आशय स्पष्ट कीजिएμ 1ण् उबल पड़ने वाले साधारण आदमी का इसमें केवल इतना ही दोष है कि वह वुफछ भी नहीं समझता - बूझता, और दूसरे लोग उसे जिधर जोत देते हंै, उधर जुत जाता है। 2ण् यहाँ है बुि पर परदा डालकर पहले इर्श्वर और आत्मा का स्थान अपने लिए लेना, और पिफर धमर्, इर्मान, इर्श्वर और आत्मा के नाम पर अपनी स्वाथर् - सिि के लिए लोगों को लड़ाना - भ्िाड़ाना। 3ण् अब तो, आपका पूजा - पाठ न देखा जाएगा, आपकी भलमनसाहत की कसौटी केवल आपका आचरण होगी। 4ण् तुम्हारे मानने ही से मेरा इर्श्वरत्व कायम नहीं रहेगा, दया करके, मनुष्यत्व को मानो, पशु बनना छोड़ो और आदमी बनो! भाषा - अध्ययन 1ण् उदाहरण के अनुसार शब्दों के विपरीताथर्क लिख्िाएμ सु - गम दुगर्म धमर् - ............इर्मान - ............साधारण - .............स्वाथर् - ............दुरफपयोग - ............नियंत्रिात - .............स्वाधीनता - ............2ण् निम्नलिख्िात उपसगो± का प्रयोग करके दो - दो शब्द बनाइएμ ला, बिला, बे, बद, ना, खुश, हर, गैर 3ण् उदाहरण के अनुसार ‘त्व’ प्रत्यय लगाकर पाँच शब्द बनाइएμ उदाहरणः देव $ त्व = देवत्व 4ण् निम्नलिख्िात उदाहरण को पढ़कर पाठ में आए संयुक्त शब्दों को छाँटकर लिख्िाएμ उदाहरणः चलते - पुरशे 5ण् ‘भी’ का प्रयोग करते हुए पाँच वाक्य बनाइएμ उदाहरणः आज मुझे बाशार होते हुए अस्पताल भी जाना है। 68ध्स्पशर् योग्यता - विस्तार ‘धमर् एकता का माध्यम है’μ इस विषय पर कक्षा में परिचचार् कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ उत्पात - उपद्रव, खुरापफात़इर्मान - नीयत, सच्चाइर् जाहिलों ;जाहिलद्ध - मूखर्, गँवार, अनपढ़ वािाब बेजा अ‘ालिकाएँ साम्यवाद बोल्शेविश्म धनाढ्य स्वाथर् - सिि अनियंत्रिात धूतर् ख्िालाप़्ाफत मशहबी प्रपंच उदार भलमनसाहत कसौटी ला - मशहब - उचित, उपयुक्त, यथाथर् - गलत, अनुचित - उँफचे - उँफचे मकान, प्रासाद - कालर् माक्सर् द्वारा प्रतिपादित राजनीतिक सि(ांत जिसका उद्देश्य विश्व में वगर्हीन समाज की स्थापना करना है - सोवियत क्रांति के बाद लेनिन के नेतृत्व में स्थापित व्यवस्था - धनवान, दौलतमंद - अपना स्वाथर् पूरा करना - जो नियंत्राण में न हो, मनमाना - छली, पाखंडी - खलीपफा का पद, पैगंबर या बादशाह का प्रतिनििा होना़- धमर् विशेष से संबंध रखनेवाला - छल, धोखा - महान, दयालु, उँफचे दिलवाला - सज्जनता, शरापफत़- परख, जाँच - जिसका कोइर् धमर्, मशहब न हो, नास्ितक

>Chap 7>

Our Past -3

काव्य खंड

हर देश में तू, हर भेष में तू, तेरे नाम अनेक तू एकही है।

तेरी रंगभूमि यह विश्व भरा, सब खेल में, मेल में तू ही तो है।।

सागर से उठा बादल बनके, बादल से फटा जल हो करके।

फिर नहर बना नदियाँ गहरी, तेरे भिन्न प्रकार, तू एकही है।।

चींटी से भी अणु-परमाणु बना, सब जीव-जगत् का रूप लिया।

कहीं पर्वत-वृक्ष विशाल बना, सौंदर्य तेरा, तू एकही है।।

यह दिव्य दिखाया है जिसने, वह है गुरुदेव की पूर्ण दया।

तुकड़या कहे कोई न और दिखा, बस मैं अरु तू सब एकही है।।

- संत तुकड़ोजी

कविता का पठन-पाठन


किसी भी भाषा के साहित्य में विचारों और भावों के संप्रेषण की मुख्य रूप से दो शैलियाँ होती हैं–गद्य और कविता। कविता या तो छंद, तुक, लय, सुर एवं ताल में बँधी होती है या अतुकांत भी होती है। दोनों ही तरह की कविताओं में अलग-अलग भावानुभूतियों का आनंद लिया जा सकता है। एक ओर कविता पाठक की भावनाओं को उदात्त बनाती है तो दूसरी ओर उसके सौंदर्यबोध को माँजती-सँवारती है। वह मनुष्य को इंसानियत से, प्रकृति से, देश से, और वृहत्तर दुनिया से जोड़ती है। विद्यार्थियों के किशोर मन को तो कविता विशेष रूप से प्रभावित करती है, क्योंकि किशोर मन सरल, जिज्ञासु और रागात्मक होता है। कविता किशोर भावनाओं के परिष्कार, संवेदनशीलता के विकास एवं सुरुचि-निर्माण में तो योगदान करती ही है, साथ ही यह छात्रों में सुपाठ की क्षमता भी उत्पन्न करती है।

उल्लेखनीय है कि हिंदीतर विद्यार्थी अपनी मातृभाषा की कविताओं और उनके नाद, भाव तथा विचार-सौंदर्य से सुपरिचित होते ही हैं। इस संकलन की कविताओं का तादात्म्य मातृभाषा की कविताओं से बिठाकर काव्य-शिक्षण को और अधिक रुचिकर तथा उपयोगी बनाया जा सकता है।

काव्य-पाठ

कविता के आनंद का अनुभव करने के लिए पहली आवश्यकता है उचित लय और प्रवाह के साथ कविता का वाचन। कविता गद्य नहीं है, अतः गद्य की भाँति नहीं पढ़ी जाती। लय और प्रवाह ही उसे गद्य से भिन्न बनाते हैं। वाचन मौन हो या मुखर, लय और प्रवाह के साथ ही होना चाहिए। लय का निर्धारण काव्य-पंक्तियों में विद्यमान गति, विराम-चिह्न, मात्रा तथा तुक से होता है। मात्राओं के घटने-बढ़ने से उसके प्रवाह में रुकावट आती है। अतः वाचन में शब्दों के उच्चारण का निर्दोष होना आवश्यक है। संयुक्ताक्षरों का शुद्ध उच्चारण न होने पर भी कविता की लय टूट जाएगी और वह कर्णकटु बन जाएगी।

उद्वेलित कर अश्रु-राशियाँ

हृदय-चिताएँ धधकाकर,

महा महामारी प्रचंड हो

फैल रही थी इधर-उधर,

क्षीण-कंठ मृतवत्साओं का

करुण-रुदन दुर्दांत नितांत,

भरे हुए था निज कृश रव में

हाहाकार अपार अशांत।


यहाँ उद्वेलित, अश्रु-राशियाँ, क्षीण, मृतवत्साओं, हाहाकार आदि का उच्चारण सही न होने पर कविता का पाठ ठीक से न हो सकेगा और वह प्रभावहीन हो जाएगी।

शब्दार्थ-बोधन

द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी पढ़नेवाले विद्यार्थियों को कहीं-कहीं कुछ शब्द कठिन लग सकते हैं। उनका अर्थ जाने बिना उन्हें समग्र भाव-बोध में कठिनाई हो सकती है। अतः उन्हें शब्दार्थ बताए जाने चाहिए किंतु शब्दार्थ-बोधन इतना बोझिल न हो कि कविता के आनंद में ही बाधा पड़े। अच्छा हो, एक-दो बार सस्वर वाचन के द्वारा कविता की मूल संवेदना स्पष्ट हो जाने के बाद ही शब्दार्थ बताए जाएँ।

रैदास, रहीम आदि प्राचीन कवियों की भाषा आज की हिंदी से भिन्न है, पर गेयता, भाव-प्रवणता के कारण उनकी रचनाएँ सर्वत्र लोकप्रिय हैं और बहुत संभव है कि पाठ्यपुस्तक में उद्धृत उनकी कुछ रचनाओं से विद्यार्थी पहले से परिचित हों और एेसे भाव-बोध की कुछ कविताएँ अपनी मातृभाषा के माध्यम से भी पढ़ चुके हों। एेसी कविताओं के सस्वर पाठ द्वारा कविता का भाव-ग्रहण सहज हो सकता है।

भाव-ग्रहण और रसास्वाद

कविता को सुनने-पढ़ने से जो अनिर्वचनीय आनंद प्राप्त होता है, उसे ही आचार्यों ने ‘रस’ कहा है। शब्द-प्रयोग, अलंकार, कहने की विशिष्ट शैली, छंद, लय, प्रवाह आदि कविता के बाहरी तत्त्व हैं और उसकी आत्मा संपूर्ण कविता में व्याप्त भाव विशेष ही है।

कविता को बार-बार पढ़ने से उसकी मूल संवेदना तथा उसका रचना-कौशल दोनों ही स्पष्ट होते हैं परंतु जहाँ तक उसके भाव का प्रश्न है, वह किसी पद, पंक्ति या छंद में न होकर पूरी कविता में व्याप्त रहता है।

कविताएँ एेसी भी हो सकती हैं जिनमें कवि का मंतव्य सर्वथा स्पष्ट न होता हो। कवि मात्र कुछ संकेत कर देता है और शेष अस्पष्ट ही रह जाता है, जो पाठक को सोचने-विचारने के लिए बाधित कर उसे पंक्तियों में छिपी गहराई को नापने के लिए उकसाता है। ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ की निम्नलिखित पंक्तियाँ देखिए–


कई गलियों के बीच

कई नालों के पार

कूड़े-करकट

के ढेरों के बाद

बदबू से फटते जाते इस

टोले के अंदर

खुशबू रचते हैं हाथ

खुशबू रचते हैं हाथ।


शिल्प-सौंदर्य का उद्घाटन

कविता का आनंद पाठक की रुचि, संवेदनशीलता और संस्कारों पर निर्भर करता है। ये बातें किसी में अधिक और किसी में कम भी हो सकती हैं, पर बार-बार काव्य-पाठ सुनने और कविता की चर्चा करने से रुचियों में संस्कार संभव है और संवेदनशीलता भी बढ़ती है। वस्तुतः कविता का अर्थ जान लेना या उसका भावार्थ लिख लेना ही पर्याप्त नहीं है।

छात्रों में धीरे-धीरे एेसी क्षमता का विकास होना चाहिए कि वे कविता की मूल संवेदना या विषय को सहज रूप से ग्रहण कर अपने शब्दों में व्यक्त कर सकें। इस बात पर बल दिया जाना चाहिए कि वे पठित कविताओं को कंठस्थ कर सकें और उचित अवसरों पर उन्हें लय एवं आरोह-अवरोह के साथ सुना सकें।


Redas.tif

 

रैदास

(1388 - 1518)

रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म सन् 1388 और देहावसान सन् 1518 में बनारस में ही हुआ, एेसा माना जाता है। इनकी ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था। मध्ययुगीन साधकों में रैदास का विशिष्ट स्थान है। कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के कवियों में गिने जाते हैं। मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रैदास का ज़रा भी विश्वास न था। वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे।

रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विशेष प्रिय रहे हैं। सीधे-सादे पदों में संत कवि ने हृदय के भाव बड़ी सफ़ाई से प्रकट किए हैं। इनका आत्मनिवेदन, दैन्य भाव और सहज भक्ति पाठक के हृदय को उद्वेलित करते हैं। रैदास के चालीस पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ ‘गुरुग्रंथ साहब’ में भी सम्मिलित हैं।

यहाँ रैदास के दो पद लिए गए हैं। पहले पद ‘प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी’ में कवि अपने आराध्य को याद करते हुए उनसे अपनी तुलना करता है। उसका प्रभु बाहर कहीं किसी मंदिर या मस्ज़िद में नहीं विराजता वरन् उसके अपने अंतस में सदा विद्यमान रहता है। यही नहीं, वह हर हाल में, हर काल में उससे श्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न है। इसीलिए तो कवि को उन जैसा बनने की प्रेरणा मिलती है।

दूसरे पद में भगवान की अपार उदारता, कृपा और उनके समदर्शी स्वभाव का वर्णन है। रैदास कहते हैं कि भगवान ने तथाकथित निम्न कुल के भक्तों को भी सहज-भाव से अपनाया है और उन्हें लोक में सम्माननीय स्थान दिया है।

पद

( 1 )

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।

प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी।

प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।

प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।

प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।

प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, एेसी भक्ति करै रैदासा।।

( 2 )

एेसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।

गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै ।।

जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै।

नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै।।

नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै।

कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै।।

प्रश्न-अभ्यास

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–

(क) पहले पद में भगवान और भक्त की जिन-जिन चीज़ों से तुलना की गई है, उनका उल्लेख कीजिए।

(ख) पहले पद की प्रत्येक पंक्ति के अंत में तुकांत शब्दों के प्रयोग से नाद-सौंदर्य आ गया है, जैसे– पानी, समानी आदि। इस पद में से अन्य तुकांत शब्द छाँटकर लिखिए।

(ग) पहले पद में कुछ शब्द अर्थ की दृष्टि से परस्पर संबद्ध हैं। एेसे शब्दों को छाँटकर  लिखिए–

उदाहरण :
दीपक
बाती

........... ...........

........... ...........

........... ...........

........... ...........


(घ) दूसरे पद में कवि ने ‘गरीब निवाजु’ किसे कहा है? स्पष्ट कीजिए।

(ङ) दूसरे पद की ‘जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

(च) ‘रैदास’ ने अपने स्वामी को किन-किन नामों से पुकारा है?

(छ) निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप लिखिए–

मोरा, चंद, बाती, जोति, बरै, राती, छत्रु, धरै, छोति, तुहीं, गुसईआ

2. नीचे लिखी पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए–

(क) जाकी अँग-अँग बास समानी

(ख) जैसे चितवत चंद चकोरा

(ग) जाकी जोति बरै दिन राती

(घ) एेसी लाल तुझ बिनु कउनु करै

(ङ) नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै

3. रैदास के इन पदों का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।

योग्यता-विस्तार

1. भक्त कवि कबीर, गुरु नानक, नामदेव और मीराबाई की रचनाओं का संकलन 

कीजिए।

2. पाठ में आए दोनों पदों को याद कीजिए और कक्षा में गाकर सुनाइए।

शब्दार्थ और टिप्पणियाँ

बास गंध, वास

समानी - समाना (सुगंध का बस जाना), बसा हुआ (समाहित)

घन बादल

मोरा मोर, मयूर

चितवत देखना, निरखना

चकोर तीतर की जाति का एक पक्षी जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है

बाती बत्ती; रुई, पुराने कपड़े आदि को एेंठकर या बटकर बनाई  हुई पतली पूनी, जिसे तेल में डालकर दिया जलाते हैं

जोति ज्योति, देवता के प्रीत्यर्थ जलाया जानेवाला दीपक

बरै बढ़ाना, जलना

राती रात्रि

सुहागा सोने को शुद्ध करने के लिए प्रयोग में आनेवाला क्षारद्रव्य

दासा  दास, सेवक

लाल  - स्वामी

कउनु - कौन

गरीब निवाजु - दीन-दुखियों पर दया करनेवाला

गुसईआ - स्वामी, गुसाईं

माथै छत्रु धरै - मस्तक पर स्वामी होने का मुकुट धारण करता है

छोति   - छुआछूत, अस्पृश्यता

जगत कउ लागै  - संसार के लोगों को लगती है

ता पर तुहीं ढरै  - उन पर द्रवित होता है

नीचहु ऊच करै  - नीच को भी ऊँची पदवी प्रदान करता है

नामदेव - महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध संत, इन्होंने मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में रचना की है

तिलोचनु (त्रिलोचन) - एक प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य, जो ज्ञानदेव और नामदेव के  गुरु थे

सधना - एक उच्च कोटि के संत जो नामदेव के समकालीन माने  जाते हैं

सैनु - ये भी एक प्रसिद्ध संत हैं, आदि ‘गुरुग्रंथ साहब’ में  संगृहीत पद के आधार पर इन्हें रामानंद का समकालीन माना जाता है

हरिजीउ - हरि जी से

सभै सरै - सब कुछ संभव हो जाता है

 

3.tif

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