काका कालेलकर ;1885 .1982द्ध काका कालेलकर का जन्म महाराष्ट्र के सतारा नगर में सन् 1885 में हुआ। काका की मातृभाषा मराठी थी। उन्हें गुजराती, हिंदी, बांग्ला और अंग्रेशी का भी अच्छा ज्ञान था। गांधीजी के साथ राष्ट्रभाषा प्रचार में जुड़ने के बाद काका हिंदी में लेखन करने लगे। आशादी के बाद काका जीवनभर गांधीजी के विचार और साहित्य के प्रचार - प्रसार में जुटे रहे। महात्मा गांधी के अनन्य अनुयायियों में विनोबा भावे, सीमांत गांधी अब्दुल गफ्ऱ पफार खाँ औऱकाका कालेलकर समान रूप से याद किए जाते हैं। नयी दिल्ली में गांधी संग्रहालय के निकट सन्िनिा में काका के जीवन से जुड़ी बहुत - सी वस्तुएँ और उनका साहित्य आज भी देखा जा सकता है। देश के प्रायः कोने - कोने में यायावर की तरह भ्रमण करने वाले काका की चचिर्त कृतियाँ हैं: हिमालयनो प्रवास, लोकमाता ;यात्रा वृत्तांतद्ध, स्मरण यात्रा ;संस्मरणद्ध, धमोर्दय ;आत्मचरितद्ध, जीवननो आनंद, अवारनवार ;निबंध संग्रहद्ध। काका ने कइर् वषो± तक मंगल प्रभात पत्रा का संपादन भी किया। काका के लेखन की भाषा सरल, सरस, ओजस्वी और सारगभ्िार्त है। विचारपूणर् निबंध हो या यात्रा संस्मरण, सभी विषयों की तवर्फपूणर् व्याख्या काका की लेखन शैली की विशेषता रही है। एक हिंदीतर भाषी लेखक द्वारा मूलतः हिंदी में लिखे इस ललित निबंध कीचड़ का काव्य में काका ने कीचड़ की उपयोगिता का काव्यात्मक शैली में बखान किया है। काका कहते हैं कि हमें कीचड़ के गंदेपन पर नहीं, अपितु उसकी मानव और पशुओं तक के जीवन में उपयोगिता पर ध्यान देना चाहिए। उत्तर - पूवीर् राज्यों में सबसे श्यादा पैदा होनेवाली धान की पफसल कीचड़ में ही उग पाती है। कीचड़ न होता तो क्या - क्या न होता, मानव और पशु किन नियामतों से वंचित रह जाते, इसकी एक बानगी यह निबंध बखूबी दशार्ता है। कीचड़ हेय नहीं श्र(ेय है, यह लेखक ही नहीं पाठक भी स्वीकारता है। कीचड़ का काव्य आज सुबह पूवर् में वुफछ खास आकषर्क नहीं था। रंग की सारी शोभा उत्तर में जमी थी। उस दिशा में तो लाल रंग ने आज कमाल ही कर दिया था। परंतु बहुत ही थोड़े से समय के लिए। स्वयं पूवर् दिशा ही जहाँ पूरी रँगी न गइर् हो, वहाँ उत्तर दिशा कर - करके भी कितने नखरे कर सकती? देखते - देखते वहाँ के बादल श्वेत पूनी जैसे हो गए और यथाक्रम दिन का आरंभ ही हो गया। हम आकाश का वणर्न करते हैं, पृथ्वी का वणर्न करते हैं, जलाशयों का वणर्न करते हैं। पर कीचड़ का वणर्न कभी किसी ने किया है? कीचड़ में पैर डालना कोइर् पसंद नहीं करता, कीचड़ से शरीर गंदा होता है, कपडे़ मैले हो जाते हैं। अपने शरीर पर कीचड़ उडे़ यह किसी को भी अच्छा नहीं लगता और इसीलिए कीचड़ के लिए किसी को सहानुभूति नहीं होती। यह सब यथाथर् है। विंफतु तटस्थता से सोचें तो हम देखेंगे कि कीचड़ में वुफछ कम सौंदयर् नहीं है। पहले तो यह कि कीचड़ का रंग बहुत संुदर है। पुस्तकों के गत्तों पर, घरों की दीवालों पर अथवा शरीर पर के कीमती कपड़ों के लिए हम सब कीचड़ के जैसे रंग पसंद करते हैं। कलाभ्िाज्ञ लोगों को भऋी में पकाए हुए मि‘ी के बरतनों के लिए यही रंग बहुत पसंद है। पफोटो लेते समय भी यदि उसमें कीचड़ का, एकाध ठीकरे का रंग आ जाए तो उसे वामर्टोन कहकर विज्ञ लोग खुश - खुश हो जाते हैं। पर लो, कीचड़ का नाम लेते ही सब बिगड़ जाता है। नदी के किनारे जब कीचड़ सूखकर उसके टुकडे़ हो जाते हैं, तब वे कितने संुदर दिखते हैं। श्यादा गरमी से जब उन्हीं टुकड़ों में दरारें पड़ती हैं और वे टेढे़ हो जाते हैं, तब सुखाए हुए खोपरे जैसे दीख पड़ते हैं। नदी किनारे मीलों तक जब समतल और कीचड़ का काव्यध्57 चिकना कीचड़ एक - सा पैफला हुआ होता है, तब वह दृश्य वुफछ कम खूबसूरत नहीं होता। इस कीचड़ का पृष्ठ भाग वुफछ सूख जाने पर उस पर बगुले और अन्य छोटे - बडे़ पक्षी चलते हैं, तब तीन नाखून आगे और अँगूठा पीछे ऐसे उनके पदचिÉ, मध्य एश्िाया के रास्ते की तरह दूर - दूर तक अंकित देख इसी रास्ते अपना कारवाँ ले जाने की इच्छा हमें होती है। पिफर जब कीचड़ श्यादा सूखकर शमीन ठोस हो जाए, तब गाय, बैल, पाडे़, भैंस, भेड़, बकरे इत्यादि के पदचिÉ उस पर अंकित होते हैं उसकी शोभा और ही है। और पिफर जब दो मदमस्त पाडे़ अपने सींगों से कीचड़ को रौंदकर आपस में लड़ते हैं तब नदी किनारे अंकित पदचिÉ और सींगों के चिÉों से मानो महिषवुफल केभारतीययु(का पूरा इतिहास ही इस कदर्म लेख में लिखा हो - ऐसा भास होता हैै। कीचड़ देखना हो तो गंगा के किनारे या सिंधु के किनारे और इतने से तृप्ित न हो तो सीधे खंभात पहुँचना चाहिए। वहाँ मही नदी के मुख से आगे जहाँ तक नशर पहुँचे वहाँ तक सवर्त्रा सनातन कीचड़ ही देखने को मिलेगा। इस कीचड़ में हाथी डूब जाएँगे ऐसा कहना, न शोभा दे ऐसी अल्पोक्ित करने जैसा है। पहाड़ के पहाड़ उसमें लुप्त हो जाएँगे ऐसा कहना चाहिए। हमारा अन्न कीचड़ में से ही पैदा होता है इसका जाग्रत भान यदि हर एक मनुष्य को होता तो वह कभी कीचड़ का तिरस्कार न करता। एक अजीब बात तो देख्िाए। पंक शब्द घृणास्पद लगता है, जबकि पंकज शब्द सुनते ही कवि लोग डोलने और गाने लगते हैं। मल बिलवुफल मलिन माना जाता है विंफतु कमल शब्द सुनते ही चित्त में प्रसन्नता और आींादकत्व पूफट पड़ते हैं। कवियों की ऐसी युक्ितशून्य वृिा उनके सामने हम रखंे तो वे कहेंगे कि फ्आप वासुदेव की पूजा करते हैं इसलिए वसुदेव को तो नहीं पूजते, हीरे का भारी मूल्य देते 58ध्स्पशर् हैं विंफतु कोयले या पत्थर का नहीं देते और मोती को वंफठ में बाँधकर पिफरते हैं विंफतु उसकी मातुश्री को गले में नहीं बाँधते!य् कम - से - कम इस विषय पर कवियों के साथ तो चचार् न करना ही उत्तम! प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिए - 1.रंग की शोभा ने क्या कर दिया? 2.बादल किसकी तरह हो गए थे? 3.लोग किन - किन चीशों का वणर्न करते हैं? 4.कीचड़ से क्या होता है? 5.कीचड़ जैसा रंग कौन लोग पसंद करते हैं? 6.नदी के किनारे कीचड़ कब सुंदर दिखता है? 7.कीचड़ कहाँ सुंदर लगता है? 8.‘पंक’ और ‘पंकज’ शब्द में क्या अंतर है? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - 1.कीचड़ के प्रति किसी को सहानुभूति क्यों नहीं होती? 2.शमीन ठोस होने पर उस पर किनके पदचिÉ अंकित होते हैं? 3.मनुष्य को क्या भान होता जिससे वह कीचड़ का तिरस्कार न करता? 4.पहाड़ लुप्त कर देनेवाले कीचड़ की क्या विशेषता है? ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - 1.कीचड़ का रंग किन - किन लोगों को खुश करता है? 2.कीचड़ सूखकर किस प्रकार के दृश्य उपस्िथत करता है? 3.सूखे हुए कीचड़ का सौंदयर् किन स्थानों पर दिखाइर् देता है? 4.कवियों की धारणा को लेखक ने युक्ितशून्य क्यों कहा है? कीचड़ का काव्यध्59 ;गद्ध निम्नलिख्िात का आशय स्पष्ट कीजिए - 1.नदी किनारे अंकित पदचिÉ और सींगों के चिÉों से मानो महिषवुफल के भारतीय यु( का पूरा इतिहास ही इस कदर्म लेख में लिखा हो ऐसा भास होता हैै। 2.फ्आप वासुदेव की पूजा करते हैं इसलिए वसुदेव को तो नहीं पूजते, हीरे का भारी मूल्य देते हैं विंफतु कोयले या पत्थर का नहीं देते और मोती को वंफठ में बाँधकर पिफरते हैं विंफतु उसकी मातुश्री को गले में नहीं बाँधते!य् कम - से - कम इस विषय पर कवियों के साथ तो चचार् न करना ही उत्तम! भाषा - अध्ययन 1ण् निम्नलिख्िात शब्दों के तीन - तीन पयार्यवाची शब्द लिख्िाए - जलाशय ....................................................................सिंधु ....................................................................पंकज ....................................................................पृथ्वी ....................................................................आकाश ....................................................................2ण् निम्नलिख्िात वाक्यों में कारकों को रेखांकित कर उनके नाम भी लिख्िाए - ;कद्ध कीचड़ का नाम लेते ही सब बिगड़ जाता है। ......................;खद्ध क्या कीचड़ का वणर्न कभी किसी ने किया है। ......................;गद्ध हमारा अन्न कीचड़ से ही पैदा होता है। ......................;घद्ध पदचिÉ उस पर अंकित होते हैं। ......................;घद्ध आप वासुदेव की पूजा करते हैं। ......................3ण् निम्नलिख्िात शब्दों की बनावट को ध्यान से देख्िाए और इनका पाठ से भ्िान्न किसी नए प्रसंग में वाक्य प्रयोग कीजिए - आकषर्क यथाथर् तटस्थता कलाभ्िाज्ञ पदचिÉ अंकित तृप्ित सनातन लुप्त जाग्रत घृणास्पद युक्ितशून्य वृिा 4ण् नीचे दी गइर् संयुक्त ियाओं का प्रयोग करते हुए कोइर् अन्य वाक्य बनाइए - ;कद्ध देखते - देखते वहाँ के बादल श्वेत पूनी जैसे हो गए। 60ध्स्पशर् ;खद्ध कीचड़ देखना हो तो सीधे खंभात पहुँचना चाहिए। ;गद्ध हमारा अन्न कीचड़ में से ही पैदा होता है। 6ण् न, नहीं, मत का सही प्रयोग रिक्त स्थानों पर कीजिए - ;कद्धतुम घर ................ जाओ। ;खद्ध मोहन कल ................ आएगा। ;गद्धउसे ................ जाने क्या हो गया है? ;घद्ध डाँटो ................ प्यार से कहो। ;घद्ध मैं वहाँ कभी ................ जाउँफगा। ;चद्ध................ वह बोला ................ मैं। योग्यता - विस्तार 1.विद्याथीर् सूयोर्दय और सूयार्स्त के दृश्य देखंे तथा अपने अनुभवों को लिखें। 2.कीचड़ में पैदा होनवाली पफसलों के नाम लिख्िाए। 3.भारत के मानचित्रा में दिखाएँ कि धान की पफसल प्रमुख रूप से किन - किन प्रांतों में उपजाइर् जाती है? 4.क्या कीचड़ ‘गंदगी’ है? इस विषय पर अपनी कक्षा में परिचचार् आयोजित कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ पूवर् - पूवर् दिशा आकषर्क - सुंदर, रोचक शोभा - संुदरता उत्तर - उत्तर दिशा, जवाब कमाल - अद्भुत चमत्कारिक कायर् नखरे - बेवजह का हाव - भाव दिखलाना पूनी - धुनी हुइर् रफइर् की बड़ी बत्ती जो सूत कातने के लिए बनाइर् जाती है जलाशय - तालाब, सरोवर कीचड़ - पैरों में चिपकने वाली गीली मि‘ी, पंक तटस्थता - निरपेक्ष, उदासीनता, किसी का पक्ष न लेना, निष्पक्षता कीचड़ का काव्यध्61 कलाभ्िाज्ञ - कला के जानकार ठीकरा - खपडे़ का टुकड़ा विज्ञ - जानकार खुश - खुश - बहुत खुश होने के लिए पुरानी हिंदी में प्रयुक्त होने वाला शब्द खोपरा ;खोपड़ाद्ध - नारियल, गरी का गोला समतल - जिसका तल या सतह बराबर हो अंकित - चिित कारवाँ - देशांतर जाने वाले यात्रिायों/व्यापारियों का झुंड मदमस्त - मतवाला, मस्त पाडे़ - भैंस के नर बच्चे महिषवुफल - भैंसांे का परिवार कदर्म - कीचड़ भास - प्रतीत, आभास, कल्पना, चमक अल्पोक्ित - थोड़ा कहना तिरस्कार - उपेक्षा आींादकत्व - हषर् का भाव युक्ितशून्य - तवर्फ शून्य, विचारहीन वृिा - तरीका, ढंग, स्वभाव, कायर्

>Chap 6>

Our Past -3

स्वामी आनंद

(1887–1976)

संन्यासी स्वामी आनंद का जन्म गुजरात के कठियावाड़ ज़िले के किमड़ी गाँव में सन् 1887 में हुआ। इनका मूल नाम हिम्मतलाल था। जब ये दस साल के थे तभी कुछ साधु इन्हें अपने साथ हिमालय की ओर ले गए और इनका नामकरण किया– स्वामी आनंद। 1907 में स्वामी आनंद स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। महाराष्ट्र से कुछ समय तक ‘तरुण हिंद’ अखबार निकाला, फिर बाल गंगाधर तिलक के ‘केसरी’ अखबार से जुड़ गए। 1917 में गांधीजी के संसर्ग में आने के बाद उन्हीं के निदेशन में ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ की प्रसार व्यवस्था सँभाल ली। इसी बहाने इन्हें, गांधीजी और उनके निजी सहयोगी महादेव भाई देसाई और बाद में प्यारेलाल जी को निकट से जानने का अवसर मिला।

मूलतः गुजराती भाषा मेें लिखे गए प्रस्तुत पाठ ‘शुक्रतारे के समान’ में लेखक ने गांधीजी के निजी सचिव महादेव भाई देसाई की बेजोड़ प्रतिभा और व्यस्ततम दिनचर्या को उकेरा है। लेखक अपने इस रेखाचित्र के नायक के व्यक्तित्व और उसकी ऊर्जा, उनकी लगन और प्रतिभा से अभिभूत है। महादेव भाई की सरलता, सज्जनता, निष्ठा, समर्पण, लगन और निरभिमान को लेखक ने पूरी ईमानदारी से शब्दों में पिरोया है। इनकी लेखनी महादेव के व्यक्तित्व का एेसा चित्र खींचने में सफल रही है कि पाठक को महादेव भाई पर अभिमान हो आता है।

लेखक के अनुसार कोई भी महान व्यक्ति, महानतम कार्य तभी कर पाता है, जब उसके साथ एेसे सहयोगी हों जो उसकी तमाम इतर चिंताओं और उलझनों को अपने सिर ले लें। गांधीजी के लिए महादेव भाई और भाई प्यारेलाल जी एेसी ही शख्सियत थे।

शुक्रतारे के समान


आकाश के तारों में शुक्र की कोई जोड़ नहीं। शुक्र चंद्र का साथी माना गया है। उसकी आभा-प्रभा का वर्णन करने में संसार के कवि थके नहीं। फिर भी नक्षत्र मंडल में कलगी-रूप इस तेजस्वी तारे को दुनिया या तो एेन शाम के समय, बड़े सवेरे घंटे-दो घंटे से अधिक देख नहीं पाती। इसी तरह भाई महादेव जी आधुनिक भारत की स्वतंत्रता के उषाकाल में अपनी वैसी ही आभा से हमारे आकाश को जगमगाकर, देश और दुनिया को मुग्ध करके, शुक्रतारे की तरह ही अचानक अस्त हो गए। सेवाधर्म का पालन करने के लिए इस धरती पर जनमे स्वर्गीय महादेव देसाई गांधीजी के मंत्री थे। मित्रों के बीच विनोद में अपने को गांधीजी का ‘हम्माल’ कहने में और कभी-कभी अपना परिचय उनके ‘पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर’ के रूप में देने में वे गौरव का अनुभव किया करते थे।

गांधीजी के लिए वे पुत्र से भी अधिक थे। जब सन् 1917 में वे गांधीजी के पास पहुँचे थे, तभी गांधीजी ने उनको तत्काल पहचान लिया और उनको अपने उत्तराधिकारी का पद सौंप दिया। सन् 1919 में जलियाँवाला बाग के हत्याकांड के दिनों में पंजाब जाते हुए गांधीजी को पलवल स्टेशन पर गिरफ़्तार किया गया था। गांधीजी ने उसी समय महादेव भाई को अपना वारिस कहा था। सन् 1929 में महादेव भाई आसेतुहिमाचल, देश के चारों कोनों में, समूचे देश के दुलारे बन चुके थे।

इसी बीच पंजाब में फ़ौजी शासन के कारण जो कहर बरसाया गया था, उसका ब्योरा रोज़-रोज़ आने लगा। पंजाब के अधिकतर नेताओं को गिरफ़्तार करके फ़ौजी कानून के तहत जन्म-कैद की सज़ाएँ देकर कालापानी भेज दिया गया। लाहौर के मुख्य राष्ट्रीय अंग्रेज़ी दैनिक पत्र ‘ट्रिब्यून’ के संपादक श्री कालीनाथ राय को 

10 साल की जेल की सज़ा मिली।

गांधीजी के सामने ज़ुल्मों और अत्याचारों की कहानियाँ पेश करने के लिए आने वाले पीड़ितों के दल-के-दल गामदेवी के मणिभवन पर उमड़ते रहते थे। महादेव उनकी बातों की संक्षिप्त टिप्पणियाँ तैयार करके उनको गांधीजी के सामने पेश करते थे और आनेवालों के साथ उनकी रूबरू मुलाकातें भी करवाते थे। गांधीजी बंबई* के मुख्य राष्ट्रीय अंग्रेज़ी दैनिक ‘बाम्बे क्रानिकल’ में इन सब विषयों पर लेख लिखा करते थे। क्रानिकल में जगह की तंगी बनी रहती थी।

कुछ ही दिनों में ‘क्रानिकल’ के निडर अंग्रेज़ संपादक हार्नीमैन को सरकार ने देश-निकाले की सज़ा देकर इंग्लैंड भेज दिया। उन दिनों बंबई के तीन नए नेता थे। शंकर लाल बैंकर, उम्मर सोबानी और जमनादास द्वारकादास। इनमें अंतिम श्रीमती बेसेंट के अनुयायी थे। ये नेता ‘यंग इंडिया’ नाम का एक अंग्रेज़ी साप्ताहिक भी निकालते थे। लेकिन उसमें ‘क्रानिकल’ वाले हार्नीमैन ही मुख्य रूप से लिखते थे। उनको देश निकाला मिलने के बाद इन लोगों को हर हफ़्ते साप्ताहिक के लिए लिखनेवालों की कमी रहने लगी। ये तीनों नेता गांधीजी

* वर्तमान में इसे ‘मुंबई’ कहते हैं।

के परम प्रशंसक थे और उनके सत्याग्रह-आंदोलन में बंबई के बेजोड़ नेता भी थे। इन्होंने गांधीजी से विनती की कि वे ‘यंग इंडिया’ के संपादक बन जाएँ। गांधीजी को तो इसकी सख्त ज़रूरत थी ही। उन्होंने विनती तुरंत स्वीकार कर ली।

गांधीजी का काम इतना बढ़ गया कि साप्ताहिक पत्र भी कम पड़ने लगा। गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ को हफ़्ते में दो बार प्रकाशित करने का निश्चय किया।

हर रोज़ का पत्र-व्यवहार और मुलाकातें, आम सभाएँ आदि कामों के अलावा ‘यंग इंडिया’ साप्ताहिक में छापने के लेख, टिप्पणियाँ, पंजाब के मामलों का सारसंक्षेप और गांधीजी के लेख यह सारी सामग्री हम तीन दिन में तैयार करते।

‘यंग इंडिया’ के पीछे-पीछे ‘नवजीवन’ भी गांधीजी के पास आया और दोनों साप्ताहिक अहमदाबाद से निकलने लगे। छह महीनों के लिए मैं भी साबरमती आश्रम में रहने पहुँचा। शुरू में ग्राहकाें के हिसाब-किताब की और साप्ताहिकों को डाक में डलवाने की व्यवस्था मेरे जिम्मे रही। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद संपादन सहित दोनों साप्ताहिकों की और छापाखाने की सारी व्यवस्था मेरे जिम्मे आ गई। गांधीजी और महादेव का सारा समय देश भ्रमण में बीतने लगा। ये जहाँ भी होते, वहाँ से कामों और कार्यक्रमों की भारी भीड़ के बीच भी समय निकालकर लेख लिखते और भेजते।

सब प्रांतों के उग्र और उदार देशभक्त, क्रांतिकारी और देश-विदेश के धुरंधर लोग, संवाददाता आदि गांधीजी को पत्र लिखते और गांधीजी ‘यंग इंडिया’ के कॉलमों में उनकी चर्चा किया करते। महादेव गांधीजी की यात्राओं के और प्रतिदिन की उनकी गतिविधियों के साप्ताहिक विवरण भेजा करते।

इसके अलावा महादेव, देश-विदेश के अग्रगण्य समाचार-पत्र, जो आँखों में तेल डालकर गांधीजी की प्रतिदिन की गतिविधियों को देखा करते थे और उन पर बराबर टीका-टिप्पणी करते रहते थे, उनको आड़े हाथों लेने वाले लेख भी समय-समय पर लिखा करते थे। बेजोड़ कॉलम, भरपूर चौकसाई, ऊँचे-से-ऊँचे ब्रिटिश समाचार-पत्रों की परंपराओं को अपनाकर चलने का गांधीजी का आग्रह और कट्टर से कट्टर विरोधियों के साथ भी पूरी-पूरी सत्यनिष्ठा में से उत्पन्न होनेवाली विनय-विवेक-युक्त विवाद करने की गांधीजी की तालीम इन सब गुणों ने तीव्र मतभेदों और विरोधी प्रचार के बीच भी देश-विदेश के सारे समाचार-पत्राें की दुनिया में और एंग्लो-इंडियन समाचार-पत्रों के बीच भी व्यक्तिगत रूप से एम.डी. को सबका लाड़ला बना दिया था।

गांधीजी के पास आने के पहले अपनी विद्यार्थी अवस्था में महादेव ने सरकार के अनुवाद-विभाग में नौकरी की थी। नरहरि भाई उनके जिगरी दोस्त थे। दोनों एक साथ वकालत पढ़े थे। दोनों ने अहमदाबाद में वकालत भी साथ-साथ ही शुरू की थी। इस पेशे में आमतौर पर स्याह को सफ़ेद और सफ़ेद को स्याह करना होता है। साहित्य और संस्कार के साथ इसका कोई संबंध नहीं रहता। लेकिन इन दोनों ने तो उसी समय से टैगोर, शरदचंद्र आदि के साहित्य को उलटना-पुलटना शुरू कर दिया था। ‘चित्रांगदा’ कच-देवयानी की कथा पर टैगोर द्वारा रचित ‘विदाई का अभिशाप’ शीर्षक नाटिका, ‘शरद बाबू की कहानियाँ’ आदि अनुवाद उस समय की उनकी साहित्यिक गतिविधियों की देन हैं।

भारत में उनके अक्षरों का कोई सानी नहीं था। वाइसराय के नाम जाने वाले गांधीजी के पत्र हमेशा महादेव की लिखावट में जाते थे। उन पत्राें को देख-देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वाइसराय लंबी साँस-उसाँस लेते रहते थे। भले ही उन दिनों ब्रिटिश सल्तनत पर कहीं सूरज न डूबता हो, लेकिन उस सल्तनत के ‘छोटे’ बादशाह को भी गांधीजी के सेक्रेटरी के समान खुशनवीश (सुंदर अक्षर लिखने वाला लेखक) कहाँ मिलता था? बड़े-बड़े सिविलियन और गवर्नर कहा करते थे कि सारी ब्रिटिश सर्विसों में महादेव के समान अक्षर लिखने वाला कहीं खोजने पर भी मिलता नहीं था। पढ़ने वाले को मंत्रमुग्ध करने वाला शुद्ध और सुंदर लेखन।

महादेव के हाथों के लिखे गए लेख, टिप्पणियाँ, पत्र, गांधीजी के व्याख्यान, प्रार्थना-प्रवचन, मुलाकातें, वार्तालापों पर लिखी गई टिप्पणियाँ, सब कुछ फुलस्केप के चौथाई आकारवाली मोटी अभ्यास पुस्तकों में, लंबी लिखावट के साथ, जेट की सी गति से लिखा जाता था। वे ‘शॅार्टहैंड’ जानते नहीं थे।

बड़े-बड़े देशी-विदेशी राजपुरुष, राजनीतिज्ञ, देश-विदेश के अग्रगण्य समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि, अंतरराष्ट्रीय संगठनों के संचालक, पादरी, ग्रंथकार आदि गांधीजी से मिलने के लिए आते थे। ये लोग खुद या इनके साथी-संगी भी गांधीजी के साथ बातचीत को ‘शॉर्टहैंड’ में लिखा करते थे। महादेव एक कोने में बैठे-बैठे अपनी लंबी लिखावट में सारी चर्चा को लिखते रहते थे। मुलाकात के लिए आए हुए लोग अपनी मुकाम पर जाकर सारी बातचीत को टाइप करके जब उसे गांधीजी के पास ‘ओके’ करवाने के लिए पहुँचते, तो भले ही उनमें कुछ भूलें या कमियाँ-खामियाँ मिल जाएँ, लेकिन महादेव की डायरी में या नोट-बही में मजाल है कि कॉमा मात्र की भी भूल मिल जाए।

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महादेव देसाई


गांधीजी कहते: महादेव के लिखे ‘नोट’ के साथ थोड़ा मिलान कर लेना था न। और लोग दाँतों अँगुली दबाकर रह जाते।

लुई फिशर और गुंथर के समान धुरंधर लेखक अपनी टिप्पणियों का मिलान महादेव की टिप्पणियों के साथ करके उन्हें सुधारे बिना गांधीजी के पास ले जाने में हिचकिचाते थे।

साहित्यिक पुस्तकों की तरह ही महादेव वर्तमान राजनीतिक प्रवाहों और घटनाओं से संबंधित अद्यतन जानकारीवाली पुस्तकें भी पढ़ते रहते थे। हिंदुस्तान से संबंधित देश-विदेश की ताज़ी- से-ताज़ी राजनीतिक गतिविधियों और चर्चाओं की नयी-से-नयी जानकारी उनके पास मिल सकती थी। सभाओं में, कमेटियों की बैठकों में या दौड़ती रेलगाड़ियों के डिब्बों में ऊपर की बर्थ पर बैठकर, ठूँस-ठूँसकर भरे अपने बड़े-बड़े झोलों में रखे ताज़े-से-ताज़े समाचार-पत्र, मासिक-पत्र और पुस्तकें वे पढ़ते रहते, अथवा ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ के लिए लेख लिखते रहते। लगातार चलनेवाली यात्राओं, हर स्टेशन पर दर्शनों के लिए इकट्ठा हुई जनता के विशाल समुदायों, सभाओं, मुलाकातों, बैठकों, चर्चाओं और बातचीतों के बीच वे स्वयं कब खाते, कब नहाते, कब सोते या कब अपनी हाज़तें रफ़ा करते, किसी को इसका कोई पता नहीं चल पाता। वे एक घंटे में चार घंटों के काम निपटा देते। काम में रात और दिन के बीच कोई फ़र्क शायद ही कभी रहता हो। वे सूत भी बहुत सुंदर कातते थे। अपनी इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच भी वे कातना कभी चूकते नहीं थे।

बिहार और उत्तर प्रदेश के हज़ारों मील लंबे मैदान गंगा, यमुना और दूसरी नदियों के परम उपकारी, सोने की कीमत वाले ‘गाद’ के बने हैं। आप सौ-सौ कोस चल लीजिए रास्ते में सुपारी फोड़ने लायक एक पत्थर भी कहीं मिलेगा नहीं। इसी तरह महादेव के संपर्क में आने वाले किसी को भी ठेस या ठोकर की बात तो दूर रही, खुरदरी मिट्टी या कंकरी भी कभी चुभती नहीं थी। उनकी निर्मल प्रतिभा उनके संपर्क में आने वाले व्यक्ति को चंद्र-शुक्र की प्रभा के साथ दूधों नहला देती थी। उसमें सराबोर होने वाले के मन से उनकी इस मोहिनी का नशा कई-कई दिन तक उतरता न था।

महादेव का समूचा जीवन और उनके सारे कामकाज गांधीजी के साथ एकरूप होकर इस तरह गुँथ गए थे कि गांधीजी से अलग करके अकेले उनकी कोई कल्पना की ही नहीं जा सकती थी। कामकाज की अनवरत व्यस्तताओं के बीच कोई कल्पना भी न कर सके, इस तरह समय निकालकर लिखी गई दिन-प्रतिदिन की उनकी डायरी की वे अनगिनत अभ्यास पुस्तकें, आज भी मौजूद हैं।

प्रथम श्रेणी की शिष्ट, संस्कार-संपन्न भाषा और मनोहारी लेखनशैली की ईश्वरीय देन महादेव को मिली थी। यद्यपि गांधीजी के पास पहुँचने के बाद घमासान लड़ाइयों, आंदोलनों और समाचार-पत्रों की चर्चाओं के भीड़-भरे प्रसंगों के बीच केवल साहित्यिक गतिविधियों के लिए उन्हें कभी समय नहीं मिला, फिर भी गांधीजी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ का अंग्रेज़ी अनुवाद उन्होंने किया, जो ‘नवजीवन’ में प्रकाशित होनेवाले मूल गुजराती की तरह हर हफ़्ते ‘यंग इंडिया’ में छपता रहा। बाद में पुस्तक के रूप में उसके अनगिनत संस्करण सारी दुनिया के देशों में प्रकाशित हुए और बिके।

सन् 1934-35 में गांधीजी वर्धा के महिला आश्रम में और मगनवाड़ी में रहने के बाद अचानक मगनवाड़ी से चलकर सेगाँव की सरहद पर एक पेड़ के नीचे जा बैठे। उसके बाद वहाँ एक-दो झाेंपड़े बने और फिर धीरे-धीरे मकान बनकर तैयार हुए, तब तक महादेव भाई दुर्गा बहन और चि. नारायण के साथ मगनवाड़ी में रहे। वहीं से वे वर्धा की असह्य गरमी में रोज़ सुबह पैदल चलकर सेवाग्राम पहुँचते थे। वहाँ दिनभर काम करके शाम को वापस पैदल आते थे। जाते-आते पूरे 11 मील चलते थे। रोज़-रोज़ का यह सिलसिला लंबे समय तक चला। कुल मिलाकर इसका जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, उनकी अकाल मृत्यु के कारणों में वह एक कारण माना जा सकता है।

इस मौत का घाव गांधीजी के दिल में उनके जीते जी बना ही रहा। वे भर्तृहरि के भजन की यह पंक्ति हमेशा दोहराते रहे:

‘ए रे जखम जोगे नहि जशे’– यह घाव कभी योग से भरेगा नहीं।

बाद के सालों में प्यारेलाल जी से कुछ कहना होता, और गांधीजी उनको बुलाते तो उस समय भी अनायास उनके मुँह से ‘महादेव’ ही निकलता।

अनुवादक: श्री काशिनाथ त्रिवेदी

प्रश्न-अभ्यास

मौखिक

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए–

1. महादेव भाई अपना परिचय किस रूप में देते थे?

2. ‘यंग इंडिया’ साप्ताहिक में लेखों की कमी क्यों रहने लगी थी?

3. गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ प्रकाशित करने के विषय में क्या निश्चय किया?

4. गांधीजी से मिलने से पहले महादेव भाई कहाँ नौकरी करते थे?

5. महादेव भाई के झोलों में क्या भरा रहता था?

6. महादेव भाई ने गांधीजी की कौन-सी प्रसिद्ध पुस्तक का अनुवाद किया था?

7. अहमदाबाद से कौन-से दो साप्ताहिक निकलते थे?

8. महादेव भाई दिन में कितनी देर काम करते थे?

9. महादेव भाई से गांधीजी की निकटता किस वाक्य से सिद्ध होती है?

लिखित

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30) शब्दों में लिखिए–

1. गांधीजी ने महादेव को अपना वारिस कब कहा था?

2. गांधीजी से मिलने आनेवालों के लिए महादेव भाई क्या करते थे?

3. महादेव भाई की साहित्यिक देन क्या है?

4. महादेव भाई की अकाल मृत्यु का कारण क्या था?

5. महादेव भाई के लिखे नोट के विषय में गांधीजी क्या कहते थे?

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए–

1. पंजाब में फ़ौजी शासन ने क्या कहर बरसाया?

2. महादेव जी के किन गुणों ने उन्हें सबका लाड़ला बना दिया था?

3. महादेव जी की लिखावट की क्या विशेषताएँ थीं?

(ग) निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए–

1. ‘अपना परिचय उनके ‘पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर’ के रूप में देने में वे गौरवान्वित  महसूस करते थे।’

2. इस पेशे में आमतौर पर स्याह को सफ़ेद और सफ़ेद को स्याह करना होता था।

3. देश और दुनिया को मुग्ध करके शुक्रतारे की तरह ही अचानक अस्त हो गए।

4. उन पत्रों को देख-देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वाइसराय लंबी साँस-उसाँस लेते रहते थे।

भाषा-अध्ययन

1. ‘इक’ प्रत्यय लगाकर शब्दों का निर्माण कीजिए–

सप्ताह - साप्ताहिक अर्थ - ......................

साहित्य - ...................... धर्म - ......................

व्यक्ति - ...................... मास - ......................

राजनीति - ...................... वर्ष - ......................

2. नीचे दिए गए उपसर्गों का उपयुक्त प्रयोग करते हुए शब्द बनाइए–

अ, नि, अन, दुर, वि, कु, पर, सु, अधि

आर्य - ............................. आगत - .............................

डर - ............................. आकर्षण - .............................

क्रय - ............................. मार्ग - .............................

उपस्थित - ............................. लोक - .............................

नायक - ............................. भाग्य - .............................

3. निम्नलिखित मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए–

आड़े हाथों लेना अस्त हो जाना

दाँतों तले अंगुली दबाना मंत्र-मुग्ध करना

लोहे के चने चबाना

4. निम्नलिखित शब्दों के पर्याय लिखिए–

वारिस - ....................

जिगरी - ....................

कहर - ....................  

मुकाम - ....................

रूबरू - ....................

फ़र्क - ....................  

तालीम - ....................

गिरफ़्तार - ....................

5. उदाहरण के अनुसार वाक्य बदलिए–

उदाहरणः गांधीजी ने महादेव भाई को अपना वारिस कहा था।

गांधीजी महादेव भाई को अपना वारिस कहा करते थे।

1. महादेव भाई अपना परिचय ‘पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर’ के रूप में देते थे।

2. पीड़ितों के दल-के-दल गामदेवी के मणिभवन पर उमड़ते रहते थे।

3. दोनों साप्ताहिक अहमदाबाद से निकलते थे।

4. देश-विदेश के समाचार-पत्र गांधीजी की गतिविधियों पर टीका-टिप्पणी करते थे।

5. गांधीजी के पत्र हमेशा महादेव की लिखावट में जाते थे।

योग्यता-विस्तार

1. गांधीजी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ को पुस्तकालय से लेकर पढ़िए।

2. जलियाँवाला बाग में कौन-सी घटना हुई थी? जानकारी एकत्रित कीजिए।

3. अहमदाबाद में बापू के आश्रम के विषय में चित्रात्मक जानकारी एकत्र कीजिए।

4. सूर्योदय के 2-3 घंटे पहले पूर्व दिशा में या सूर्यास्त के 2-3 घंटे बाद पश्चिम दिशा में एक खूब चमकता हुआ ग्रह दिखाई देता है, वह शुक्र ग्रह है। छोटी दूरबीन से इसकी बदलती हुई कलाएँ देखी जा सकती हैं, जैसे चंद्रमा की कलाएँ।

5. वीराने में जहाँ बत्तियाँ न हों वहाँ अँधेरी रात में जब आकाश में चाँद भी दिखाई न दे रहा हो तब शुक्र ग्रह (जिसे हम शुक्र तारा भी कहते हैं) के प्रकाश से अपने साए को चलते हुए देखा जा सकता है। कभी अवसर मिले तो इसे स्वयं अनुभव करके देखिए।

परियोजना कार्य

1. सूर्यमंडल में नौ ग्रह हैं। शुक्र सूर्य से क्रमशः दूरी के अनुसार दूसरा ग्रह है और पृथ्वी तीसरा। चित्र सहित परियोजना पुस्तिका में अन्य ग्रहों के क्रम लिखिए।

2. ‘स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी का योगदान’ विषय पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित कीजिए।

3. भारत के मानचित्र पर निम्न स्थानों को दर्शाएँ:

अहमदाबाद, जलियाँवाला बाग (अमृतसर), कालापानी (अंडमान), दिल्ली, शिमला, बिहार, उत्तर प्रदेश

शब्दार्थ और टिप्पणियाँ

आभा-प्रभा  - चमक, तेज़

नक्षत्र-मंडल - तारा समूह

हम्माल - बोझ उठानेवाला, कुली

पीर - महात्मा, सिद्ध

बावर्ची - खाना पकानेवाला, रसोइया

भिश्ती - मशक से पानी ढोनेवाला व्यक्ति

खर - गधा, घास

आसेतुहिमाचल  - सेतुबंध रामेश्वर से हिमाचल तक विस्तीर्ण

दुलारे - प्यारे

ब्योरा - विवरण

कालापानी  - आजीवन कैद की सज़ा पाए कैदियों को रखने का स्थान, वर्तमान अंडमान निकोबार द्वीप समूह

रूबरू - आमने-सामने

धुरंधर - प्रवीण, उत्तम गुणों से युक्त

टीका-टिप्पणी - व्याख्या, आलोचना

चौकसाई - चौकस रहना, नज़र रखना

कट्टर - दृढ़, जिसे अपने मत या विश्वास का अधिक आग्रह हो

लाड़ला - प्यारा, दुलारा

जिगरी दोस्त - घनिष्ठ मित्र

पेशा - व्यवसाय

स्याह - काला

सल्तनत - राज्य, हुकूमत

व्याख्यान - भाषण, वक्तृता, किसी विषय की व्याख्या या टीका करना

फुलस्केप - कागज़ का एक आकार

चौथाई - चौथा भाग

अग्रगण्य - प्रमुख, सबसे पहले गिना जानेवाला

विवरण - वर्णन, व्याख्या

अद्यतन - अब तक का, वर्तमान से संबंध रखनेवाला

गाद  - तलछट, गाढ़ी चीज़

सराबोर - तरबतर, डूबा हुआ

अनवरत - लगातार

सानी  - बराबरी करनेवाला, उसी जोड़ का दूसरा

अनगिनत - जिसे गिना न जा सके

सिलसिला  - क्रम

अनायास  - बिना किसी प्रयास के, आसानी से

‘पीर-बावर्ची भिश्ती-खर’ - सभी प्रकार के कार्यों को सफलतापूर्वक कर सकने में समर्थ व्यक्ति

श्रीमती बेसेंट (एनीबेसेंट) - स्वाधीनता आंदोलन की नेता। इन्होंने होमरूल लीग और थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना की

 


3.tif

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