शरद जोशी ;1931 . 1991द्ध शरद जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में 21 मइर् 1931 को हुआ। इनका बचपन कइर् शहरों में बीता। वुफछ समय तक यह सरकारी नौकरी में रहे, पिफर इन्होंने लेखन को ही आजीविका के रूप में अपना लिया। इन्होंने आरंभ में वुफछ कहानियाँ लिखीं, पिफर पूरी तरह व्यंग्य - लेखन ही करने लगे। इन्होंने व्यंग्य लेख, व्यंग्य उपन्यास, व्यंग्य काॅलम के अतिरिक्त हास्य - व्यंग्यपूणर् धारावाहिकों की पटकथाएँ और संवाद भी लिखे। हिंदी व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलाने वाले प्रमुख व्यंग्यकारों में शरद जोशी भी एक हैं। शरद जोशी की प्रमुख व्यंग्य - कृतियाँ हैं: परिक्रमा, किसी बहाने, जीप पर सवार इल्िलयाँ, तिलस्म, रहा किनारे बैठ, दूसरी सतह, प्रतिदिन। दो व्यंग्य नाटक हैं: अंधों का हाथी और एक था गधा। एक उपन्यास है: मैं, मैं, केवल मैं, उप़्ार्फ कमलमुख बी.ए.। शरद जोशी की भाषा अत्यंत सरल और सहज है। मुहावरों और हास - परिहास का हलका स्पशर् देकर इन्होंने अपनी रचनाओं को अिाक रोचक बनाया है। धमर्, अध्यात्म, राजनीति, सामाजिक जीवन, व्यक्ितगत आचरण, वुफछ भी शरद जोशी की पैनी नशर से बच नहीं सका है। इन्होंने अपनी व्यंग्य - रचनाओं में समाज में पाइर् जाने वाली सभी विसंगतियों का बेबाक चित्राण किया है। पाठक इस चित्राण को पढ़कर चकित भी होता है और बहुत वुफछ सोचने को विवश भी। प्रस्तुत पाठ ‘तुम कब जाओगे, अतिथ्िा’ में शरद जोशी ने ऐसे व्यक्ितयों की खबर ली है, जो अपने किसी परिचित या रिश्तेदार के घर बिना कोइर् पूवर् सूचना दिए चले आते हैं और पिफर जाने का नाम ही नहीं लेते, भले ही उनका टिके रहना मेशबान पर कितना ही भारी क्यों न पड़ेे। अच्छा अतिथ्िा कौन होता है? वह, जो पहले से अपने आने की सूचना देकर आए और एक - दो दिन मेहमानी कराके विदा हो जाए या वह, जिसके आगमन के बाद मेशबान वह सब सोचने को विवश हो जाए, जो इस पाठ के मेशबान निरंतर सोचते रहे। तुम कब जाओगे, अतिथ्िा आज तुम्हारे आगमन के चतुथर् दिवस पर यह प्रश्न बार - बार मन में घुमड़ रहा है - तुम कब जाओगे, अतिथ्िा? तुम जहाँ बैठे निस्संकोच सिगरेट का धुआँ पेंफक रहे हो, उसके ठीक सामने एक वैफलेंडर है। देख रहे हो ना! इसकी तारीखें अपनी सीमा में नम्रता से पफड़पफड़ाती रहती हैं। विगत दो दिनों से मैं तुम्हें दिखाकर तारीखें बदल रहा हँू। तुम जानते हो, अगर तुम्हें हिसाब लगाना आता है कि यह चैथा दिन है, तुम्हारे सतत आतिथ्य का चैथा भारी दिन! पर तुम्हारे जाने की कोइर् संभावना प्रतीत नहीं होती। लाखों मील लंबी यात्रा करने के बाद वे दोनों एस्ट्राॅनाट्स भी इतने समय चाँद पर नहीं रफके थे, जितने समय तुम एक छोटी - सी यात्रा कर मेरे घर आए हो। तुम अपने भारी चरण - कमलों की छाप मेरी शमीन पर अंकित कर चुके, तुमने एक अंतरंग निजी संबंध मुझसे स्थापित कर लिया, तुमने मेरी आथ्िार्क सीमाओं की बैंजनी च‘ान देख लीऋ तुम मेरी काप़्ाफी मि‘ी खोद चुके। अब तुम लौट जाओ, अतिथ्िा! तुम्हारे जाने के लिए यह उच्च समय अथार्त हाइर्टाइम है। क्या तुम्हें तुम्हारी पृथ्वी नहीं पुकारती? उस दिन जब तुम आए थे, मेरा हृदय किसी अज्ञात आशंका से धड़क उठा था। अंदर - ही - अंदर कहीं मेरा बटुआ काँप गया। उसके बावजूद एक स्नेह - भीगी मुसकराहट के साथ मैं तुमसे गले मिला था और मेरी पत्नी ने तुम्हें सादर नमस्ते की थी। तुम्हारे सम्मान में ओ अतिथ्िा, हमने रात के भोजन को एकाएक उच्च - मध्यम वगर् के डिनर में बदल दिया था। तुम्हें स्मरण होगा कि दो सब्िशयों और रायते के अलावा हमने मीठा भी बनाया था। इस सारे उत्साह और लगन के मूल में एक आशा थी। आशा तुम कब जाओगे, अतिथ्िाध्37 थी कि दूसरे दिन किसी रेल से एक शानदार मेहमाननवाशी की छाप अपने हृदय में ले तुम चले जाओगे। हम तुमसे रफकने के लिए आग्रह करेंगे, मगर तुम नहीं मानोगे और एक अच्छे अतिथ्िा की तरह चले जाओगे। पर ऐसा नहीं हुआ! दूसरे दिन भी तुम अपनी अतिथ्िा - सुलभ मुसकान लिए घर में ही बने रहे। हमने अपनी पीड़ा पी ली और प्रसन्न बने रहे। स्वागत - सत्कार के जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हें ले जा चुके थे, वहाँ से नीचे उतर हमने पिफर दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की और रात्रिा को तुम्हें सिनेमा दिखाया। हमारे सत्कार का यह आख्िारी छोर है, जिससे आगे हम विफसी के लिए नहीं बढे़। इसके तुरंत बाद भावभीनी विदाइर् का वह भीगा हुआ क्षण आ जाना चाहिए था, जब तुम विदा होते और हम तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने जाते। पर तुमने ऐसा नहीं किया। तीसरे दिन की सुबह तुमने मुझसे कहा, फ्मैं धोबी को कपड़े देना चाहता हूँ।य् यह आघात अप्रत्याश्िात था और इसकी चोट मामिर्क थी। तुम्हारे सामीप्य की वेला एकाएक यों रबर की तरह ख्िांच जाएगी, इसका मुझे अनुमान न था। पहली बार मुझे लगा कि अतिथ्िा सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोडे़ अंशांे में राक्षस भी हो सकता है। फ्किसी लाॅण्ड्री पर दे देते हैं, जल्दी धुल जाएँगे।य् मैंने कहा। मन - ही - मन एक विश्वास पल रहा था कि तुम्हें जल्दी जाना है। फ्कहाँ है लाॅण्ड्री?य् फ्चलो चलते हैं।य् मैंने कहा और अपनी सहज बनियान पर औपचारिक वुफतार् डालने लगा। फ्कहाँ जा रहे हैं?य् पत्नी ने पूछा। फ्इनके कपड़े लाॅण्ड्री पर देने हैं।य् मैंने कहा। मेरी पत्नी की आँखें एकाएक बड़ी - बड़ी हो गईं। आज से वुफछ बरस पूवर् उनकी ऐसी आँखें देख मैंने अपने अकेलेपन की यात्रा समाप्त कर बिस्तर खोल दिया था। पर अब जब वे ही आँखें बड़ी होती हैं तो मन छोटा होने लगता है। वे इस आशंका और भय से बड़ी हुइर् थीं कि अतिथ्िा अिाक दिनों ठहरेगा। 38ध्स्पशर् और आशंका निमूर्ल नहीं थी, अतिथ्िा! तुम जा नहीं रहे। लाॅण्ड्री पर दिए कपडे़ धुलकर आ गए और तुम यहीं हो। तुम्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यहीं हो। तुम्हें देखकर पूफट पड़नेवाली मुसकराहट धीरे - धीरे पफीकी पड़कर अब लुप्त हो गइर् है। ठहाकों के रंगीन गुब्बारे, जो कल तक इस कमरे के आकाश में उड़ते थे, अब दिखाइर् नहीं पड़ते। बातचीत की उछलती हुइर् गेंद चचार् के क्षेत्रा के सभी कोनलों से टप्पे खाकर पिफर सेंटर में आकर चुप पड़ी है। अब इसे न तुम हिला रहे हो, न मैं। कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूँ और तुम पिफल्मी पत्रिाका के पन्ने पलट रहे हो। शब्दों का लेन - देन मिट गया और चचार् के विषय चुक गए। परिवार, बच्चे, नौकरी, पिफल्म, राजनीति, रिश्तेदारी, तबादले, पुराने दोस्त, परिवार - नियोजन, मँहगाइर्, साहित्य और यहाँ तक कि आँख मार - मारकर हमने पुरानी पे्रमिकाओं का भी िाक्र कर लिया और अब एक चुप्पी है। सौहादर् अब शनैः - शनैः बोरियत में रूपांतरित हो रहा है। भावनाएँ गालियों का स्वरूप ग्रहण कर रही हैं, पर तुम जा नहीं रहे। किस अदृश्य गोंद से तुम्हारा व्यक्ितत्व यहाँ चिपक गया है, मैं इस भेद को सपरिवार नहीं समझ पा रहा हूँ। बार - बार यह प्रश्न उठ रहा है - तुम कब जाओगे, अतिथ्िा? कल पत्नी ने धीरे से पूछा था, फ्कब तक टिवेंफगे ये?य् मैंने वंफधे उचका दिए, फ्क्या कह सकता हूँ!य् फ्मैं तो आज ख्िाचड़ी बना रही हूँ। हलकी रहेगी।य् फ्बनाओ।य् सत्कार की उफष्मा समाप्त हो रही थी। डिनर से चले थे, ख्िाचड़ी पर आ गए। अब भी अगर तुम तुम कब जाओगे, अतिथ्िाध्39 अपने बिस्तर को गोलाकार रूप नहीं प्रदान करते तो हमें उपवास तक जाना होगा। तुम्हारे - मेरे संबंध एक संक्रमण के दौर से गुशर रहे हैं। तुम्हारे जाने का यह चरम क्षण है। तुम जाओ न अतिथ्िा! तुम्हें यहाँ अच्छा लग रहा है न! मैं जानता हूँ। दूसरों के यहाँ अच्छा लगता है। अगर बस चलता तो सभी लोग दूसरों के यहाँ रहते, पर ऐसा नहीं हो सकता। अपने घर की महत्ता के गीत इसी कारण गाए गए हैं। होम को इसी कारण स्वीट - होम कहा गया है कि लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस को काटने न दौडे़ं। तुम्हें यहाँ अच्छा लग रहा है, पर सोचो पि्रय, कि शरापफत भी कोइर् चीश होती है और गेट आउट भी एक़वाक्य है, जो बोला जा सकता है। अपने खरार्टों से एक और रात गुंजायमान करने के बाद कल जो किरण तुम्हारे बिस्तर पर आएगी वह तुम्हारे यहाँ आगमन के बाद पाँचवें सूयर् की परिचित किरण होगी। आशा है, वह तुम्हें चूमेगी और तुम घर लौटने का सम्मानपूणर् निणर्य ले लोगे। मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी। उसके बाद मैं स्टैंड नहीं कर सवँूफगा और लड़खड़ा जाउफँगा। मेरे अतिथ्िा, मैं जानता हूँ कि अतिथ्िा देवता होता है, पर आख्िार मैं भी मनुष्य हूँ। मैं कोइर् तुम्हारी तरह देवता नहीं। एक देवता और एक मनुष्य अिाक देर साथ नहीं रहते। देवता दशर्न देकर लौट जाता है। तुम लौट जाओ अतिथ्िा! इसी में तुम्हारा देवत्व सुरक्ष्िात रहेगा। यह मनुष्य अपनी वाली पर उतरे, उसके पूवर् तुम लौट जाओ! उपफ, तुम कब जाओगे, अतिथ्िा?़प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिए - 1.अतिथ्िा कितने दिनों से लेखक के घर पर रह रहा है? 2.वैफलेंडर की तारीखें किस तरह पफड़पफड़ा रही हैं? 40ध्स्पशर् 3.पति - पत्नी ने मेहमान का स्वागत वैफसे किया? 4.दोपहर के भोजन को कौन - सी गरिमा प्रदान की गइर्? 5.तीसरे दिन सुबह अतिथ्िा ने क्या कहा? 6.सत्कार की उफष्मा समाप्त होने पर क्या हुआ? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मंेद्ध लिख्िाए - 1.लेखक अतिथ्िा को वैफसी विदाइर् देना चाहता था? 2.पाठ में आए निम्नलिख्िात कथनांे की व्याख्या कीजिए - ;कद्ध अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ काँप गया। ;खद्ध अतिथ्िा सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोडे़ अंशों में राक्षस भी हो सकता है। ;गद्ध लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस को काटने न दौडे़ं। ;घद्ध मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी। ;घद्ध एक देवता और एक मनुष्य अिाक देर साथ नहीं रहते। ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - 1.कौन - सा आघात अप्रत्याश्िात था और उसका लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा? 2.‘संबंधों का संक्रमण के दौर से गुशरना’ - इस पंक्ित से आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिख्िाए। 3.जब अतिथ्िा चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में क्या - क्या परिवतर्न आए? भाषा - अध्ययन 1ण् निम्नलिख्िात शब्दों के दो - दो पयार्य लिख्िाए - चाँद िाक्र आघात उफष्मा अंतरंग 2ण् निम्नलिख्िात वाक्यों को निदेर्शानुसार परिवतिर्त कीजिए - ;कद्ध हम तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने जाएँगे। ;नकारात्मक वाक्यद्ध ;खद्ध किसी लाॅण्ड्री पर दे देते हैं, जल्दी धुल जाएँगे। ;प्रश्नवाचक वाक्यद्ध तुम कब जाओगे, अतिथ्िाध्41 ;गद्ध सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी। ;भविष्यत् कालद्ध ;घद्ध इनके कपड़े देने हैं। ;स्थानसूचक प्रश्नवाचीद्ध ;घद्ध कब तक टिवेंफगे ये? ;नकारात्मकद्ध 3ण् पाठ में आए इन वाक्यों में ‘चुकना’ िया के विभ्िान्न प्रयोगों को ध्यान से देख्िाए और वाक्य संरचना को समझिए - ;कद्ध तुम अपने भारी चरण - कमलों की छाप मेरी शमीन पर अंकित कर चुके। ;खद्ध तुम मेरी कापफी मि़‘ी खोद चुके। ;गद्ध आदर - सत्कार के जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हें ले जा चुके थे। ;घद्ध शब्दों का लेन - देन मिट गया और चचार् के विषय चुक गए। ;घद्ध तुम्हारे भारी - भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यहीं हो। 4ण् निम्नलिख्िात वाक्य संरचनाओं में ‘तुम’ के प्रयोग पर ध्यान दीजिए - ;कद्ध लाॅण्ड्री पर दिए कपडे़ धुलकर आ गए और तुम यहीं हो। ;खद्ध तुम्हें देखकर पूफट पड़ने वाली मुसवुफराहट धीरे - धीरे पफीकी पड़कर अब लुप्त हो गइर् है। ;गद्ध तुम्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी। ;घद्ध कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूँ और तुम पिफल्मी पत्रिाका के पन्ने पलट रहे हो। ;घद्ध भावनाएँ गालियों का स्वरूप ग्रहण कर रही हैं, पर तुम जा नहीं रहे। योग्यता - विस्तार 1. ‘अतिथ्िा देवो भव’ उक्ित की व्याख्या करें तथा आधुनिक युग के संदभर् में इसका आकलन करें। 2.विद्याथीर् अपने घर आए अतिथ्िायों के सत्कार का अनुभव कक्षा में सुनाएँ। 3.अतिथ्िा के अपेक्षा से अिाक रफक जाने पर लेखक की क्या - क्या प्रतिियाएँ हुईं, उन्हें क्रम से छाँटकर लिख्िाए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ आगमन - आना निस्संकोच - संकोचरहित, बिना संकोच के नम्रता - नत होने का भाव, स्वभाव में नरमी का होना 42ध्स्पशर् सतत - आतिथ्य - एस्ट्राॅनाट्स - अंतरंग - आशंका - मेहमाननवाशी - छोर - भावभीनी - आघात - अप्रत्याश्िात - मामिर्क - सामीप्य - औपचारिक - निमूर्ल - कोनलों - सौहादर् - रूपांतरित - उफष्मा - संक्रमण - गंुजायमान - निरंतर, लगातार आवभगत अंतरिक्ष यात्राी घनिष्ठ, गहरा खतरा, भय, डर अतिथ्िा सत्कार किनारा, सीमा प्रेम से ओतप्रोत चोट, प्रहार आकस्िमक, अनसोचा ममर्स्पशीर् निकटता, समीपता दिखावटी, रस्मी मूलरहित, बिना जड़ का कोनों से मैत्राी, हृदय की सरलता जिसका रूप ;आकारद्ध बदल दिया गया हो गरमी, उग्रता एक स्िथति या अवस्था से दूसरी में प्रवेश गूँजता हुआ

>Chap 4>

Our Past -3

Dhiranj.tif

धीरंजन मालवे

(1952)


धीरंजन मालवे का जन्म बिहार के नालंदा ज़िले के डुँवरावाँ गाँव में 9 मार्च 1952 को हुआ। ये एम.एससी. (सांख्यिकी), एम.बी.ए. और एल.एल.बी. हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़े मालवे अभी भी वैज्ञानिक जानकारी को लोगों तक पहुँचाने के काम में जुटे हुए हैं। आकाशवाणी और बी.बी.सी. (लंदन) में कार्य करने के दौरान मालवे रेडियो विज्ञान पत्रिका ‘ज्ञान-विज्ञान’ का संपादन और प्रसारण करते रहे।

मालवे की भाषा सीधी, सरल और वैज्ञानिक शब्दावली लिए हुए है। यथावश्यक अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग भी वे करते हैं। मालवे ने कई भारतीय वैज्ञानिकों की संक्षिप्त जीवनियाँ लिखी हैं, जो इनकी पुस्तक ‘विश्व-विख्यात भारतीय वैज्ञानिक’ पुस्तक में समाहित हैं।

प्रस्तुत पाठ ‘वैज्ञानिक चेतना के वाहक रामन्’ में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक के संघर्षमय जीवन का चित्रण किया गया है। वेंकट रामन् कुल ग्यारह साल की उम्र में मैट्रिक, विशेष योग्यता के साथ इंटरमीडिएट, भौतिकी और अंग्रेज़ी में स्वर्ण पदक के साथ बी.ए. और प्रथम श्रेणी में एम.ए. करके मात्र अठारह साल की उम्र में कोलकाता में भारत सरकार के फाइनेंस डिपार्टमेंट में सहायक जनरल एकाउंटेंट नियुक्त कर लिए गए थे। इनकी प्रतिभा से इनके अध्यापक तक अभिभूत थे।

सन् 1930 में नोबेल पुरस्कार पाने के बाद सी.वी. रामन् ने अपने एक मित्र को उस पुरस्कार-समारोह के बारे में लिखा था: जैसे ही मैं पुरस्कार लेकर मुड़ा और देखा कि जिस स्थान पर मैं बैठाया गया था, उसके ऊपर ब्रिटिश राज्य का ‘यूनियन जैक’ लहरा रहा है, तो मुझे अफ़सोस हुआ कि मेरे दीन देश भारत की अपनी पताका तक नहीं है। इस अहसास से मेरा गला भर आया और मैं फूट-फूट कर रो पड़ा।

चंद्रशेखर वेंकट रामन् भारत में विज्ञान की उन्नति के चिर आकांक्षी थे तथा भारत की स्वतंत्रता के पक्षधर थे। वे महात्मा गांधी को अपना अभिन्न मित्र मानते थे। नोबेल पुरस्कार समारोह के बाद एक भोज के दौरान उन्होंने कहा था: मुझे एक बधाई का तार अपने सर्वाधिक प्रिय मित्र (महात्मा गांधी) से मिला है, जो इस समय जेल में हैं।

एक मेधावी छात्र से महान वैज्ञानिक तक की रामन् की संघर्षमय जीवन यात्रा और उनकी उपलब्धियों की जानकारी यह पाठ बखूबी कराता है।


वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन्


पेड़ से सेब गिरते हुए तो लोग सदियों से देखते आ रहे थे, मगर गिरने के पीछे छिपे रहस्य को न्यूटन से पहले कोई और समझ नहीं पाया था। ठीक उसी प्रकार विराट समुद्र की नील-वर्णीय आभा को भी असंख्य लोग आदिकाल से देखते आ रहे थे, मगर इस आभा पर पड़े रहस्य के परदे को हटाने के लिए हमारे समक्ष उपस्थित हुए सर चंद्रशेखर वेंकट रामन्।

बात सन् 1921 की है, जब रामन् समुद्री यात्रा पर थे। जहाज के डेक पर खड़े होकर नीले समुद्र को निहारना, प्रकृति-प्रेमी रामन् को अच्छा लगता था। वे समुद्र की नीली आभा में घंटों खोए रहते। लेकिन रामन् केवल भावुक प्रकृति-प्रेमी ही नहीं थे। उनके अंदर एक वैज्ञानिक की जिज्ञासा भी उतनी ही सशक्त थी। यही जिज्ञासा उनसे सवाल कर बैठी–‘आखिर समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है? कुछ और क्यों नहीं?’ रामन् सवाल का जवाब ढूँढ़ने में लग गए। जवाब ढूँढ़ते ही वे विश्वविख्यात बन गए।

रामन् का जन्म 7 नवंबर सन् 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर में हुआ था। इनके पिता विशाखापत्तनम् में गणित और भौतिकी के शिक्षक थे। पिता इन्हें बचपन से गणित और भौतिकी पढ़ाते थे। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिन दो विषयों के ज्ञान ने उन्हें जगत-प्रसिद्ध बनाया, उनकी सशक्त नींव उनके पिता ने ही तैयार की थी। कॉलेज की पढ़ाई उन्होंने पहले ए.बी.एन. कॉलेज तिरुचिरापल्ली से और फिर प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास से की। बी.ए. और एम.ए.–दोनों ही परीक्षाओं में उन्होंने काफ़ी ऊँचे अंक हासिल किए।

5.tif

रामन् का मस्तिष्क विज्ञान के रहस्यों को सुलझाने के लिए बचपन से ही बेचैन रहता था। अपने कॉलेज के ज़माने से ही उन्होंने शोधकार्यों में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था। उनका पहला शोधपत्र फिलॉसॉफिकल मैगज़ीन में प्रकाशित हुआ था। उनकी दिली इच्छा तो यही थी कि वे अपना सारा जीवन शोधकार्यों को ही समर्पित कर दें, मगर उन दिनों शोधकार्य को पूरे समय के कैरियर के रूप में अपनाने की कोई खास व्यवस्था नहीं थी। प्रतिभावान छात्र सरकारी नौकरी की ओर आकर्षित होते थे। रामन् भी अपने समय के अन्य सुयोग्य छात्रों की भाँति भारत सरकार के वित्त-विभाग में अफ़सर बन गए। उनकी तैनाती कलकत्ता* में हुई।

कलकत्ता में सरकारी नौकरी के दौरान उन्होंने अपने स्वाभाविक रुझान को बनाए रखा। दफ़्तर से फ़ुर्सत पाते ही वे लौटते हुए बहू बाज़ार आते, जहाँ ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन अॉफ़ साइंस’ की प्रयोगशाला थी। यह अपने आपमें एक अनूठी संस्था थी, जिसे कलकत्ता के एक डॉक्टर महेंद्रलाल सरकार ने वर्षाेंρ की कठिन मेहनत और लगन के बाद खड़ा किया था। इस संस्था का उद्देश्य था देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना। अपने महान् उद्देश्यों के बावजूद इस संस्था के पास साधनों का नितांत अभाव था। रामन् इस संस्था की प्रयोगशाला में कामचलाऊ उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए शोधकार्य करते। यह अपने आपमें एक आधुनिक हठयोग का उदाहरण था, जिसमें एक साधक दफ़्तर में कड़ी मेहनत के बाद बहू बाज़ार की इस मामूली-सी प्रयोगशाला में पहुँचता और अपनी इच्छाशक्ति के ज़ोर से भौतिक विज्ञान को समृद्ध बनाने के प्रयास करता। उन्हीं दिनों वे वाद्ययंत्रों की ओर आकृष्ट हुए। वे वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के पीछे छिपे वैज्ञानिक रहस्यों की परतें खोलने का प्रयास कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने अनेक वाद्ययंत्रों का अध्ययन किया जिनमें देशी और विदेशी, दोनों प्रकार के वाद्ययंत्र थे।

* वर्तमान नाम ‘कोलकाता’ है।

वाद्ययंत्रों पर किए जा रहे शोधकार्यों के दौरान उनके अध्ययन के दायरे में जहाँ वायलिन, चैलो या पियानो जैसे विदेशी वाद्य आए, वहीं वीणा, तानपूरा और मृदंगम् पर भी उन्होंने काम किया। उन्होंने वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर पश्चिमी देशों की इस भ्रांति को तोड़ने की कोशिश की कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्यों की तुलना में घटिया हैं। वाद्ययंत्रों के कंपन के पीछे छिपे गणित पर उन्होंने अच्छा-खासा काम किया और अनेक शोधपत्र भी प्रकाशित किए।

उस ज़माने के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री सर आशुतोष मुखर्जी को इस प्रतिभावान युवक के बारे में जानकारी मिली। उन्हीं दिनों कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर का नया पद सृजित हुआ था। मुखर्जी महोदय ने रामन् के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे सरकारी नौकरी छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर का पद स्वीकार कर लें। रामन् के लिए यह एक कठिन निर्णय था। उस ज़माने के हिसाब से वे एक अत्यंत प्रतिष्ठित सरकारी पद पर थे, जिसके साथ मोटी तनख्वाह और अनेक सुविधाएँ जुड़ी हुई थीं। उन्हें नौकरी करते हुए दस वर्ष बीत चुके थे। एेसी हालत में सरकारी नौकरी छोड़कर कम वेतन और कम सुविधाओंवाली विश्वविद्यालय की नौकरी में आने का फ़ैसला करना हिम्मत का काम था।

रामन् सरकारी नौकरी की सुख-सुविधाओं को छोड़ सन् 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की नौकरी में आ गए। उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण थी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल में वे अपना पूरा समय अध्ययन, अध्यापन और शोध में बिताने लगे। चार साल बाद यानी सन् 1921 में समुद्र-यात्रा के दौरान जब रामन् के मस्तिष्क में समुद्र के नीले रंग की वजह का सवाल हिलोरें लेने लगा, तो उन्होंने आगे इस दिशा में प्रयोग किए, जिसकी परिणति रामन् प्रभाव की खोज के रूप में हुई।

रामन् ने अनेक ठोस रवों और तरल पदार्थों पर प्रकाश की किरण के प्रभाव का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुज़रती है तो गुज़रने के बाद उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। वजह यह होती है कि एकवर्णीय प्रकाश की किरण के फोटॉन जब तरल या ठोस रवे से गुज़रते हुए इनके अणुओं से टकराते हैं तो इस टकराव के परिणामस्वरूप वे या तो ऊर्जा का कुछ अंश खो देते हैं या पा जाते हैं। दोनों ही स्थितियाँ प्रकाश के वर्ण (रंग) में बदलाव लाती हैं। एकवर्णीय प्रकाश की किरणों में सबसे अधिक ऊर्जा बैंजनी रंग के प्रकाश में होती है। बैंजनी के बाद क्रमशः नीले, आसमानी, हरे, पीले, नारंगी और लाल वर्ण का नंबर आता है। इस प्रकार लाल-वर्णीय प्रकाश की ऊर्जा सबसे कम होती है। एकवर्णीय प्रकाश तरल या ठोस रवों से गुज़रते हुए जिस परिमाण में ऊर्जा खोता या पाता है, उसी हिसाब से उसका वर्ण परिवर्तित हो जाता है।

रामन् की खोज भौतिकी के क्षेत्र में एक क्रांति के समान थी। इसका पहला परिणाम तो यह हुआ कि प्रकाश की प्रकृति के बारे में आइंस्टाइन के विचारों का प्रायोगिक प्रमाण मिल गया। आइंस्टाइन के पूर्ववर्ती वैज्ञानिक प्रकाश को तरंग के रूप में मानते थे, मगर आइंस्टाइन ने बताया कि प्रकाश अति सूक्ष्म कणों की तीव्र धारा के समान है। इन अति सूक्ष्म कणों की तुलना आइंस्टाइन ने बुलेट से की और इन्हें ‘फोटॉन’ नाम दिया। रामन् के प्रयोगों ने आइंस्टाइन की धारणा का प्रत्यक्ष प्रमाण दे दिया, क्योंकि एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन यह साफ़तौर पर प्रमाणित करता है कि प्रकाश की किरण तीव्रगामी सूक्ष्म कणों के प्रवाह के रूप में व्यवहार करती है।

रामन् की खोज की वजह से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सहज हो गया। पहले इस काम के लिए इंफ्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाता था। यह मुश्किल तकनीक है और गलतियों की संभावना बहुत अधिक रहती है। रामन् की खोज के बाद पदार्थों की आणविक और परमाणविक संरचना के अध्ययन के लिए रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाने लगा। यह तकनीक एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन के आधार पर, पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक जानकारी देती है। इस जानकारी की वजह से पदार्थों का संश्लेषण प्रयोगशाला में करना तथा अनेक उपयोगी पदार्थाें का कृत्रिम रूप से निर्माण संभव हो गया है।

रामन् प्रभाव की खोज ने रामन् को विश्व के चोटी के वैज्ञानिकों की पंक्ति में ला खड़ा किया। पुरस्कारों और सम्मानों की तो जैसे झड़ी-सी लगी रही। उन्हें सन् 1924 में रॉयल सोसाइटी की सदस्यता से सम्मानित किया गया। सन् 1929 में उन्हें ‘सर’ की उपाधि प्रदान की गई। ठीक अगले ही साल उन्हें विश्व के सर्वोच्च पुरस्कार–भौतिकी में नोबेल पुरस्कार–से सम्मानित किया गया। उन्हें और भी कई पुरस्कार मिले, जैसे रोम का मेत्यूसी पदक, रॉयल सोसाइटी का ह्यूज़ पदक, फ़िलोडेल्फ़िया इंस्टीट्यूट का फ्रैंकलिन पदक, सोवियत रूस का अंतर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार आदि। सन् 1954 में रामन् को देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वे नोबेल पुरस्कार पानेवाले पहले भारतीय वैज्ञानिक थे। उनके बाद यह पुरस्कार भारतीय नागरिकतावाले किसी अन्य वैज्ञानिक को अभी तक नहीं मिल पाया है। उन्हें अधिकांश सम्मान उस दौर में मिले जब भारत अंग्रेज़ों का गुलाम था। उन्हें मिलनेवाले सम्मानों ने भारत को एक नया आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास दिया। विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने एक नयी भारतीय चेतना को जाग्रत किया।

भारतीय संस्कृति से रामन् को हमेशा ही गहरा लगाव रहा। उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को हमेशा अक्षुण्ण रखा। अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के बाद भी उन्होंने अपने दक्षिण भारतीय पहनावे को नहीं छोड़ा। वे कट्टर शाकाहारी थे और मदिरा से सख्त परहेज़ रखते थे। जब वे नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने स्टॉकहोम गए तो वहाँ उन्होंने अल्कोहल पर रामन् प्रभाव का प्रदर्शन किया। बाद में आयोजित पार्टी में जब उन्होंने शराब पीने से इनकार किया तो एक आयोजक ने परिहास में उनसे कहा कि रामन् ने जब अल्कोहल पर रामन् प्रभाव का प्रदर्शन कर हमें आह्लादित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, तो रामन् पर अल्कोहल के प्रभाव का प्रदर्शन करने से परहेज़ क्यों?

रामन् का वैज्ञानिक व्यक्तित्व प्रयोगों और शोधपत्र-लेखन तक ही सिमटा हुआ नहीं था। उनके अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी और वे देश में वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन के विकास के प्रति समर्पित थे। उन्हें अपने शुरुआती दिन हमेशा ही याद रहे जब उन्हें ढंग की प्रयोगशाला और उपकरणों के अभाव में काफ़ी संघर्ष करना पड़ा था। इसीलिए उन्होंने एक अत्यंत उन्नत प्रयोगशाला और शोध-संस्थान की स्थापना की जो बंगलोर में स्थित है और उन्हीं के नाम पर ‘रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट’ नाम से जानी जाती है। भौतिक शास्त्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने इंडियन जरनल अॉफ़ फ़िज़िक्स नामक शोध-पत्रिका प्रारंभ की। अपने जीवनकाल में उन्होंने सैकड़ों शोध-छात्रों का मार्गदर्शन किया। जिस प्रकार एक दीपक से अन्य कई दीपक जल उठते हैं, उसी प्रकार उनके शोध-छात्रों ने आगे चलकर काफ़ी अच्छा काम किया। उन्हीं में कई छात्र बाद में उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हुए। विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए वे करेंट साइंस नामक एक पत्रिका का भी संपादन करते थे। रामन् प्रभाव केवल प्रकाश की किरणों तक ही सिमटा नहीं था; उन्होंने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश की किरणों से पूरे देश को आलोकित और प्रभावित किया। उनकी मृत्यु 21 नवंबर सन् 1970 के दिन 82 वर्ष की आयु में हुई।

रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें हमेशा ही यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें। तभी तो उन्होंने संगीत के सुर-ताल और प्रकाश की किरणों की आभा के अंदर से वैज्ञानिक सिद्धांत खोज निकाले। हमारे आसपास एेसी न जाने कितनी ही चीज़ें बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं। ज़रूरत है रामन् के जीवन से प्रेरणा लेने की और प्रकृति के बीच छुपे वैज्ञानिक रहस्य का भेदन करने की।

प्रश्न-अभ्यास

मौखिक

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए–

1. रामन् भावुक प्रकृति प्रेमी के अलावा और क्या थे?

2. समुद्र को देखकर रामन् के मन में कौन-सी दो जिज्ञासाएँ उठीं?

3. रामन् के पिता ने उनमें किन विषयों की सशक्त नींव डाली?

4. वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के अध्ययन के द्वारा रामन् क्या करना चाहते थे?

5. सरकारी नौकरी छोड़ने के पीछे रामन् की क्या भावना थी?

6. ‘रामन् प्रभाव’ की खोज के पीछे कौन-सा सवाल हिलोरें ले रहा था?

7. प्रकाश तरंगों के बारे में आइंस्टाइन ने क्या बताया?

8. रामन् की खोज ने किन अध्ययनों को सहज बनाया?

लिखित

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए–

1. कॉलेज के दिनों में रामन् की दिली इच्छा क्या थी?

2. वाद्ययंत्रों पर की गई खोजों से रामन् ने कौन-सी भ्रांति तोड़ने की कोशिश की?

3. रामन् के लिए नौकरी संबंधी कौन-सा निर्णय कठिन था?

4. सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् को समय-समय पर किन-किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया?

5. रामन् को मिलनेवाले पुरस्कारों ने भारतीय-चेतना को जाग्रत किया। एेसा क्यों कहा गया है?

(ख) निम्नलिखित प्रश्नाें के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए–

1. रामन् के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग क्यों कहा गया है?

2. रामन् की खोज ‘रामन् प्रभाव’ क्या है? स्पष्ट कीजिए।

3. ‘रामन् प्रभाव’ की खोज से विज्ञान के क्षेत्र में कौन-कौन से कार्य संभव हो सके?

4. देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने में सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के महत्त्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालिए।

5. सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् के जीवन से प्राप्त होनेवाले संदेश को अपने शब्दों में

लिखिए।

(ग) निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए–

1. उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण थी।

2. हमारे पास एेसी न जाने कितनी ही चीज़ें बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं।

3. यह अपने आपमें एक आधुनिक हठयोग का उदाहरण था।

(घ) उपयुक्त शब्द का चयन करते हुए रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए–

इंफ्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी, इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन अॉफ़ साइंस, फिलॉसॉफिकल मैगज़ीन, भौतिकी, रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट

1. रामन् का पहला शोध पत्र ...................... में प्रकाशित हुआ था।

2. रामन् की खोज ...................... के क्षेत्र में एक क्रांति के समान थी।

3. कलकत्ता की मामूली-सी प्रयोगशाला का नाम ...................... था।

4. रामन् द्वारा स्थापित शोध संस्थान ...................... नाम से जानी जाती है।

5. पहले पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन करने के लिए ...................... का सहारा लिया जाता था।

भाषा-अध्ययन

1. नीचे कुछ समानदर्शी शब्द दिए जा रहे हैं जिनका अपने वाक्य में इस प्रकार प्रयोग करें कि उनके अर्थ का अंतर स्पष्ट हो सके।

(क) प्रमाण ................................. (ख) प्रणाम .................................

(ग) धारणा ................................ (घ) धारण .................................

(ङ) पूर्ववर्ती ................................. (च) परवर्ती .................................

(छ) परिवर्तन ................................. (ज) प्रवर्तन .................................

2. रेखांकित शब्द के विलोम शब्द का प्रयोग करते हुए रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए–

(क) मोहन के पिता मन से सशक्त होते हुए भी तन से ...................... हैं।

(ख) अस्पताल के अस्थायी कर्मचारियों को ...................... रूप से नौकरी दे दी गई है।

(ग) रामन् ने अनेक ठोस रवों और ..................... पदार्थों पर प्रकाश की किरण के प्रभाव का अध्ययन किया।

(घ) आज बाज़ार में देशी और ...................... दोनों प्रकार के खिलौने उपलब्ध हैं।

(ङ) सागर की लहरों का आकर्षण उसके विनाशकारी रूप को देखने के बाद .......में परिवर्तित हो जाता है।

3. नीचे दिए उदाहरण में रेखांकित अंश में शब्द-युग्म का प्रयोग हुआ है–

उदाहरण: चाऊतान को गाने-बजाने में आनंद आता है।

उदाहरण के अनुसार निम्नलिखित शब्द-युग्मों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए–

सुख-सुविधा ............................................

अच्छा-खासा ............................................

प्रचार-प्रसार ............................................

आस-पास ............................................

4. प्रस्तुत पाठ में आए अनुस्वार और अनुनासिक शब्दों को निम्न तालिका में लिखिए–

अनुस्वार
अनुनासिक
(क) अंदर
(क) ढूँढ़ते
(ख) ............................
(ख) ............................
(ग) ............................
(ग) ............................
(घ) ............................
(घ) ............................
(ङ) ............................
(ङ) ............................


5. पाठ में निम्नलिखित विशिष्ट भाषा प्रयोग आए हैं। सामान्य शब्दों में इनका आशय स्पष्ट कीजिए–

घंटों खोए रहते, स्वाभाविक रुझान बनाए रखना, अच्छा-खासा काम किया, हिम्मत का काम था, सटीक जानकारी, काफ़ी ऊँचे अंक हासिल किए, कड़ी मेहनत के बाद खड़ा किया था, मोटी तनख्वाह

6. पाठ के आधार पर मिलान कीजिए–

नीला
कामचलाऊ
पिता
रव
तैनाती
भारतीय वाद्ययंत्र
उपकरण
 वैज्ञानिक रहस्य
घटिया
समुद्र
फोटॉन
नींव
भेदन
कलकत्ता

7. पाठ में आए रंगों की सूची बनाइए। इनके अतिरिक्त दस रंगों के नाम और लिखिए।

8. नीचे दिए गए उदाहरण के अनुसार ‘ही’ का प्रयोग करते हुए पाँच वाक्य बनाइए।

उदाहरण: उनके ज्ञान की सशक्त नींव उनके पिता ने ही तैयार की थी।

योग्यता-विस्तार

1. ‘विज्ञान का मानव विकास में योगदान’ विषय पर कक्षा में चर्चा कीजिए।

2. भारत के किन-किन वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार मिला है? पता लगाइए और लिखिए।

3. न्यूटन के आविष्कार के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।

परियोजना कार्य

1. भारत के प्रमुख वैज्ञानिकों की सूची उनके कार्यों/योगदानों के साथ बनाइए।

2. भारत के मानचित्र में तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली और कलकत्ता की स्थिति दर्शाएँ।

3. पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में हुए उन वैज्ञानिक खोजों, उपकरणों की सूची बनाइए, जिसने  मानव जीवन बदल दिया है।

शब्दार्थ और टिप्पणियाँ

नील वर्णीय - नीले रंग का

असंख्य - अनगिनत, जिसकी संख्या बताना संभव न हो

आभा - चमक

जिज्ञासा - जानने की इच्छा

विश्वविख्यात - संसार में प्रसिद्ध

भौतिकी - वह विज्ञान जिसमें तत्त्वों के गुण आदि का विवेचन किया गया हो, फ़िज़िक्स

अतिशयोक्ति - किसी बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना

हासिल - प्राप्त

शोधकार्य - खोज, अनुसंधान कार्य

प्रतिभावान - जिसमें विलक्षण-बौद्धिक शक्ति हो

वित्त विभाग - किसी राज्य के आय-व्यय से संबंधित विभाग

रुझान - झुकाव, किसी ओर प्रवृत्त होना

उपकरण - साधन, औजार

समृद्ध - उन्नतशील

भ्रांति - संदेह, अयथार्थ ज्ञान

सृजित - रचा हुआ

समक्ष - सामने

अध्यापन - पढ़ाना

परिणति - परिणाम

ठोस रवे - बिल्लौर, मणिभ

फोटॉन - प्रकाश का अंश

एकवर्णीय - एक रंग का

ऊर्जा  - शक्ति, बल

प्रायोगिक - प्रयोग संबंधित

तीव्रधारा - तेज़ धारा

इंफ्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी - अवरक्त स्पेक्ट्रम विज्ञान

आणविक - अणु का

परमाणविक - परमाणु का

संरचना - बनावट

संश्लेषण - मिलान करना (सिंथेसिस)

कृत्रिम - बनाया हुआ, बनावटी

अक्षुण्ण - अखंडित

कट्टर - दृढ़

परिहास - हँसी-मज़ाक

आह्लादित - आनंदित

आलोकित - प्रकाशित

प्रतिमूर्ति - अनुकृति, चित्र, प्रतिमा

नोबेल पुरस्कार - यह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार है जो  साहित्य, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान,  अर्थशास्त्र तथा शांति के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य के लिए  दिया जाता है। नोबेल पुरस्कार के जन्मदाता अल्फ्रेड नोबेल  हैं, जिनका जन्म सन् 1833 में स्वीडन स्टॉकहोम नामक  स्थान में हुआ था। अल्फ्रेड नोबेल ने सन् 1866 में  विध्वंसकारी डायनामाइट का आविष्कार किया था। इस  पुरस्कार को सर्वप्रथम सन् 1901 में दिया गया। सर चंद्रशेखर वेंकट रामन्

3.tif

RELOAD if chapter isn't visible.