बचेंद्री पाल ;1954द्ध बचेंद्री पाल का जन्म उत्तरांचल के चमोली िाले में बंपा गाँव में 24 मइर् 1954 को हुआ। बचंेद्री अपनी माँ हंसादेइर् नेगी और पिता किशन सिंह पाल की तीसरी संतान हैं। पिता पढ़ाइर् का खचर् उठाने में असमथर् थे, अतः बचेंद्री को आठवीं से आगे की पढ़ाइर् का खचर् सिलाइर् - कढ़ाइर् करके जुटाना पड़ा। दसवीं पास करने के बाद बचेंद्री के पिं्रसिपल ने उनके पिता को उनकी आगे की पढ़ाइर् के लिए सहमत किया। बचेंद्री ने ऐसी विषम स्िथतियों के बावजूद संस्कृत से एम.ए. और पिफर बीएड. की श्िाक्षा हासिल की। लक्ष्य के प्रति इसी समपर्ण भाव ने इन्हें एवरेस्ट पर विजय पाने वाली पहली भारतीय पवर्तारोही होने का गौरव दिलाया। बचेंद्री को पहाड़ों पर चढ़ने का चाव बचपन से ही था। जब इनका बड़ा भाइर् इन्हें पहाड़ पर चढ़ने से रोकता था और इनसे छह साल छोटे भाइर् को पहाड़ पर चढ़ने के लिए उकसाता था, तब बचेंद्री को बहुत बुरा लगता था। वह सोचती थी कि भाइर् यह क्यों नहीं समझता कि जो काम छोटा भाइर् कर सकता है, वह उसकी यह बहन भी कर सकती है। लोग लड़कियों को इतना कोमल, नाशुक क्यों समझते हैं। बहरहाल, पहाड़ों पर चढ़ने की उनकी इच्छा बचपन में भी पूरी होती रही। चँूकि इनका परिवार साल के वुफछ महीने एक उँफचाइर् वाले गाँव में बिताता था और वुफछ महीने पहाड़ से नीचे तराइर् में बसे एक और गाँव में। जिस मौसम में परिवार नीचे तराइर् वाले गाँव में आ जाता था, उन महीनों में स्वूफल जाने के लिए बचेंद्री को भी पाँच - छह मील पहाड़ की चढ़ाइर् चढ़नी और उतरनी पड़ती थी। इधर बचेंद्री की पढ़ाइर् पूरी हुइर्, उधर इंडियन माउंटेन पफाउंडेशन ने एवरेस्ट अभ्िायान पर जाने का साहस रखने वाली महिलाओं की खोज शुरू की। बचेंद्री इस अभ्िायान - दल में शामिल हो गईं। ट्रेनिंग के दौरान बचेंद्री 7500 मीटर उँफची मान चोटी पर सपफलतापूवर्क चढ़ीं। कइर् महीनों के अभ्यास के बाद आख्िार वह दिन आ ही गया, जब उन्होंने एवरेस्ट विजय के लिए प्रयाण किया। बचेंद्री ने एवरेस्ट विजय की अपनी रोमांचक पवर्तारोहण - यात्रा का संपूणर् विवरण स्वयं ही कलमब( किया है। प्रस्तुत अंश उसी विवरण में से लिया गया है। यह लोमहषर्क अंश बचेंद्री के उस अंतिम पड़ाव से श्िाखर तक पहुँचकर तिरंगा लहराने के पल - पल का ब्योरा बयान करता है। इसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है, मानो पाठक भी उनके कदम - से - कदम मिलाता हुआ, सभी खतरों को खुद झेलता हुआ एवरेस्ट के श्िाखर पर जा रहा हो। एवरेस्ट: मेरी श्िाखर यात्रा एवरेस्ट अभ्िायान दल 7 माचर् को दिल्ली से काठमांडू के लिए हवाइर् जहाश से चल दिया। एक मशबूत अगि्रम दल बहुत पहले ही चला गया था जिससे कि वह हमारे ‘बेस वैंफप’ पहुँचने से पहले दुगर्म हिमपात के रास्ते को साप़्ाफ कर सके। नमचे बाशार, शेरपालैंड का एक सवार्िाक महत्त्वपूणर् नगरीय क्षेत्रा है। अिावफांश शेरपा इसी स्थान तथा यहीं के आसपास के गाँवों के होते हैं। यह नमचे बाशार ही था, जहाँ से मैंने सवर्प्रथम एवरेस्ट को निहारा, जो नेपालियों में ‘सागरमाथा’ के नाम से प्रसि( है। मुझे यह नाम अच्छा लगा। एवरेस्ट की तरप़़्ाफ गौर से देखते हुए, मैंने एक भारी बपर्फ का बड़ा पूफल ;प्लूमद्ध देखा, जो पवर्त - श्िाखर पर लहराता एक ध्वज - सा लग रहा था। मुझे बताया गया कि यह दृश्य श्िाखर की उफपरी सतह के आसपास 150 किलोमीटर अथवा इससे भी अिाक की गति से हवा चलने के कारण बनता था, क्योंकि तेश हवा से सूखा बपर्फ़पवर्त पर उड़ता रहता था। बपर्फ का यह ध्वज 10 किलोमीटर या इससे भी लंबा हो़सकता था। श्िाखर पर जानेवाले प्रत्येक व्यक्ित को दक्ष्िाण - पूवीर् पहाड़ी पर इन तूप़्ाफानों को झेलना पड़ता था, विशेषकर खराब मौसम में। यह मुझे डराने के लिए काप़्ाफी था, पिफर भी मैं एवरेस्ट के प्रति विचित्रा रूप से आकष्िार्त थी और इसकी कठिनतम चुनौतियों का सामना करना चाहती थी। जब हम 26 माचर् को पैरिच पहुँचेे, हमें हिम - स्खलन के कारण हुइर् एक शेरपा वुफली की मृत्यु का दुःखद समाचार मिला। खंुभु हिमपात पर जानेवाले अभ्िायान - दल के रास्ते के ़़बाईं तरपफ सीधी पहाड़ी के धसकने से, ल्होत्से की ओर से एक बहुत बड़ी बपर्फ की च‘ान 24ध्स्पशर् नीचे ख्िासक आइर् थी। सोलह शेरपा वुफलियों के दल में से एक की मृत्यु हो गइर् और चार घायल हो गए थे। इस समाचार के कारण अभ्िायान दल के सदस्यों के चेहरों पर छाए अवसाद को देखकर हमारे नेता कनर्ल खुल्लर ने स्पष्ट किया कि एवरेस्ट जैसे महान अभ्िायान में खतरों को और कभी - कभी तो मृत्यु भी आदमी को सहज भाव से स्वीकार करनी चाहिए। उपनेता प्रेमचंद, जो अगि्रम दल का नेतृत्व कर रहे थे, 26 माचर् को पैरिच लौट आए। उन्होंने हमारी पहली बड़ी बाधा खुंभु हिमपात की स्िथति से हमें अवगत कराया। उन्होंने कहा कि उनके दल ने वैंफप - एक ;6000 मी.द्ध, जो हिमपात के ठीक उफपर है, वहाँ तक का रास्ता सापफ कर दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि पुल बनाकर,़रस्िसयाँ बाँधकर तथा झंडियों से रास्ता चिित कर, सभी बड़ी कठिनाइयों का जायशा ले लिया गया है। उन्होंने इस पर भी ध्यान दिलाया कि ग्लेश्िायर बपर्फ की नदी है औऱ़बपर्फ का गिरना अभी जारी है। हिमपात में अनियमित और अनिश्िचत बदलाव के कारण अभी तक के किए गए सभी काम व्यथर् हो सकते हैं और हमें रास्ता खोलने का काम दोबारा करना पड़ सकता है। ‘बेस वैंफप’ में पहुँचने से पहले हमें एक और मृत्यु की खबर मिली। जलवायु अनुवूफल न होने के कारण एक रसोइर् सहायक की मृत्यु हो गइर् थी। निश्िचत रूप से हम आशाजनक स्िथति में नहीं चल रहे थे। एवरेस्ट श्िाखर को मैंने पहले दो बार देखा था, लेकिन एक दूरी से। बेस वैंफप पहुँचने पर दूसरे दिन मैंने एवरेस्ट पवर्त तथा इसकी अन्य श्रेण्िायों को देखा। मैं भौंचक्की होकर खड़ी रह गइर् और एवरेस्ट, ल्होत्से और नुत्से की उँफचाइयों से घ्िारी, बपफीर्ली टेढ़ी - मेढ़ी नदी को निहारती रही।़हिमपात अपने आपमें एक तरह से बपर्फ के खंडों का अव्यवस्िथत ढंग से गिरना़ही था। हमें बताया गया कि ग्लेश्िायर के बहने से अकसर बपर्फ में हलचल हो जाती़थी, जिससे बड़ी - बड़ी बपर्फ की च़‘ानें तत्काल गिर जाया करती थीं और अन्य कारणों से भी अचानक प्रायः खतरनाक स्िथति धारण कर लेती थीं। सीधे धरातल पर दरार एवरेस्ट: मेरी श्िाखर यात्राध्25 पड़ने का विचार और इस दरार का गहरे - चैडे़ हिम - विदर में बदल जाने का मात्रा खयाल ही बहुत डरावना था। इससे भी श्यादा भयानक इस बात की जानकारी थी कि हमारे संपूणर् प्रवास के दौरान हिमपात लगभग एक दजर्न आरोहियों और वुफलियों को प्रतिदिन छूता रहेगा। दूसरे दिन नए आनेवाले अपने अिाकांश सामान को हम हिमपात के आधे रास्ते तक ले गए। डाॅ. मीनू मेहता ने हमें अल्यूमिनियम की सीढि़यों से अस्थायी पुलों का बनाना, लऋांे और रस्िसयों का उपयोग, बपर्फ की आड़ी - तिरछी दीवारों पर रस्िसयों को ़बाँधना और हमारे अगि्रम दल के अभ्िायांत्रिाकी कायो± के बारे में हमें विस्तृत जानकारी दी। तीसरा दिन हिमपात से वैंफप - एक तक सामान ढोकर चढ़ाइर् का अभ्यास करने के लिए निश्िचत था। रीता गोंबू तथा मैं साथ - साथ चढ़ रहे थे। हमारे पास एक वाॅकी - टाॅकी था, जिससे हम अपने हर कदम की जानकारी बेस वैंफप पर दे रहे थे। कनर्ल खुल्लर उस समय खुश हुए, जब हमने उन्हें अपने पहुँचने की सूचना दी क्योंकि वंैंफप - एक पर पहँुचनेवाली केवल हम दो ही महिलाएँ थीं। अंगदोरजी, लोपसांग और गगन बिस्सा अंततः साउथ कोल पहुँच गए और 29 अपै्रल को 7900 मीटर पर उन्होंने वैंफप - चार लगाया। यह संतोषजनक प्रगति थी। जब अप्रैल मंे मैं बेस वैंफप में थी, तेनजिंग अपनी सबसे छोटी सुपुत्राी डेकी के साथ हमारे पास आए थे। उन्होंने इस बात पर विशेष महत्त्व दिया कि दल के प्रत्येक सदस्य और प्रत्येक शेरपा वुफली से बातचीत की जाए। जब मेरी बारी आइर्, मैंने अपना परिचय यह कहकर दिया कि मैं बिलवुफल ही नौसिख्िाया हूँ और एवरेस्ट मेरा पहला अभ्िायान है। तेनजिंग हँसे और मुझसे कहा कि एवरेस्ट उनके लिए भी पहला अभ्िायान है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि श्िाखर पर पहुँचने से पहले उन्हें सात बार एवरेस्ट पर जाना पड़ा था। पिफर अपना हाथ मेरे वंफधे पर रखते हुए उन्होंने कहा, फ्तुम एक पक्की पवर्तीय लड़की लगती हो। तुम्हें तो श्िाखर पर पहले ही प्रयास में पहुँच जाना चाहिए।य् 15 - 16 मइर् 1984 को बु( पूण्िार्मा के दिन मैं ल्होत्से की बपफीर्ली सीधी़ढलान पर लगाए गए सुंदर रंगीन नाइलाॅन के बने तंबू के वैंफप - तीन में थी। वैंफप में 10 और व्यक्ित थे। लोपसांग, तशारिंग मेरे तंबू में थे, एन.डी. शेरपा तथा और 26ध्स्पशर् आठ अन्य शरीर से मशबूत और उँफचाइयों में रहनेवाले शेरपा दूसरे तंबुओं में थे। मैं गहरी नींद में सोइर् हुइर् थी कि रात में 12.30 बजे के लगभग मेरे सिर के पिछले हिस्से में किसी एक सख्त चीश के टकराने से मेरी नींद अचानक खुल गइर् और साथ ही एक शोरदार धमाका भी हुआ। तभी मुझे महसूस हुआ कि एक ठंडी, बहुत भारी कोइर् चीश मेरे शरीर पर से मुझे वुफचलती हुइर् चल रही है। मुझे साँस लेने में भी कठिनाइर् हो रही थी। यह क्या हो गया था? एक लंबा बपर्फ का पिंड हमारे वैंफप के ठीक उफपर ल्होत्से़ग्लेश्िायर से टूटकर नीचे आ गिरा था और उसका विशाल हिमपुंज बना गया था। हिमखंडों, बप़़्ार्फ के टुकड़ों तथा जमी हुइर् बपर्फ के इस विशालकाय पुंज ने, एक एक्सप्रेस रेलगाड़ी की तेश गति और भीषण गजर्ना के साथ, सीधी ढलान से नीचे आते हुए हमारे वैंफप को तहस - नहस कर दिया। वास्तव में हर व्यक्ित को चोट लगी थी। यह एक आश्यचर् था कि किसी की मृत्यु नहीं हुइर् थी। लोपसांग अपनी स्िवस छुरी की मदद से हमारे तंबू का रास्ता साप़्ाफ करने में सपफल हो गए थे और तुरंत ही अत्यंत तेशी से मुझे बचाने की कोश्िाश में लग गए। थोड़ी - सी भी देर का सीधा अथर् था मृत्यु। बडे़ - बडे़ हिमपिंडों को मुश्िकल से हटाते हुए उन्होंने मेरे चारों तरपफ की कड़े जमे बप़्ार्फ की खुदाइर् की और मुझे उस बप़्ार्फ की़कब्र से निकाल बाहर खींच लाने में सपफल हो गए। सुबह तक सारे सुरक्षा दल आ गए थे और 16 मइर् को प्रातः 8 बजे तक हम प्रायः सभी वैंफप - दो पर पहुँच गए थे। जिस शेरपा की टाँग की हंी टूट गइर् थी, उसे एक खुद के बनाए स्टेªचर पर लिटाकर नीचे लाए। हमारे नेता कनर्ल खुल्लर के शब्दों में, फ्यह इतनी उँफचाइर् पर सुरक्षा - कायर् का एक शबरदस्त साहसिक कायर् था।’’ सभी नौ पुरफष सदस्यों को चोटों अथवा टूटी हंियों आदि के कारण बेस वैंफप में भेजना पड़ा। तभी कनर्ल खुल्लर मेरी तरप़्ाफ मुड़कर कहने लगे, फ्क्या तुम भयभीत थीं?य् फ्जी हाँ।य् फ्क्या तुम वापिस जाना चाहोगी?य् फ्नहींय्, मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के उत्तर दिया। एवरेस्ट: मेरी श्िाखर यात्राध्27 जैसे ही मैं साउथ कोल वैंफप पहुँची, मैंने अगले दिन की अपनी महत्त्वपूणर् चढ़ाइर् की तैयारी शुरू कर दी। मैंने खाना, वुफविंफग गैस तथा वुफछ आॅक्सीजन सिलिंडर इकऋे किए। जब दोपहर डेढ़ बजे बिस्सा आया, उसने मुझे चाय के लिए पानी गरम करते देखा। की, जय और मीनू अभी बहुत पीछे थे। मैं चिंतित थी क्योंकि मुझे अगले दिन उनके साथ ही चढ़ाइर् करनी थी। वे धीरे - धीरे आ रहे थे क्योंकि वे भारी बोझ लेकर और बिना आॅक्सीजन के चल रहे थे। दोपहर बाद मैंने अपने दल के दूसरे सदस्यों की मदद करने और अपने एक थरमस को जूस से और दूसरे को गरम चाय से भरने के लिए नीचे जाने का निश्चय किया। मैंने बप़्ाफीर्ली हवा में ही तंबू से बाहर कदम रखा। जैसे ही मैं वैंफप क्षेत्रा से बाहर आ रही थी मेरी मुलाकात मीनू से हुइर्। की और जय अभी वुफछ पीछे थे। मुझे जय जेनेवा स्पर की चोटी के ठीक नीचे मिला। उसने कृतज्ञतापूवर्क चाय वगैरह पी लेकिन मुझे और आगे जाने से रोकने की कोश्िाश की। मगर मुझे की से भी मिलना था। थोड़ा - सा और आगे नीचे उतरने पर मैंने की को देखा। वह मुझे देखकर हक्का - बक्का रह गया। फ्तुमने इतनी बड़ी जोख्िाम क्यों ली बचेंद्री?य् मैंने उसे दृढ़तापूवर्क कहा, फ्मैं भी औरों की तरह एक पवर्तारोही हूँ, इसीलिए इस दल में आइर् हूँ। शारीरिक रूप से मैं ठीक हूँ। इसलिए मुझे अपने दल के सदस्यों की मदद क्यों नहीं करनी चाहिए।य् की हँसा और उसने पेय पदाथर् से प्यास बुझाइर्, लेकिन उसने मुझे अपना किट ले जाने नहीं दिया। थोड़ी देर बाद साउथ कोल वैंफप से ल्हाटू और बिस्सा हमंे मिलने नीचे उतर आए। और हम सब साउथ कोल पर जैसी भी सुरक्षा और आराम की जगह उपलब्ध थी, उस पर लौट आए। साउथ कोल ‘पृथ्वी पर बहुत अिाक कठोर’ जगह के नाम से प्रसि( है। अगले दिन मैं सुबह चार बजे उठ गइर्। बपर्फ पिघलाया और चाय बनाइर्, वुफछ ़बिस्वुफट और आधी चाॅकलेट का हलका नाश्ता करने के बाद मैं लगभग साढ़े पाँच बजे अपने तंबू से निकल पड़ी। अंगदोरजी बाहर खड़ा था और कोइर् आसपास नहीं था। अंगदोरजी बिना आॅक्सीजन के ही चढ़ाइर् करनेवाला था। लेकिन इसके कारण उसके पैर ठंडे पड़ जाते थे। इसलिए वह उँफचाइर् पर लंबे समय तक खुले में और रात्रिा में श्िाखर वैंफप पर नहीं जाना चाहता था। इसलिए उसे या तो उसी दिन चोटी तक चढ़कर साउथ कोल पर वापस आ जाना था अथवा अपने प्रयास को छोड़ देना था। वह तुरंत ही चढ़ाइर् शुरू करना चाहता था... और उसने मुझसे पूछा, क्या मैं उसके साथ जाना चाहूँगी? एक ही दिन में साउथ कोल से चोटी तक जाना और वापस आना बहुत कठिन और श्रमसाध्य होगा! इसके अलावा यदि अंगदोरजी के पैर ठंडे पड़ गए तो उसके लौटकर आने का भी जोख्िाम था। मुझे पिफर भी अंगदोरजी पर विश्वास था और साथ - साथ मैं आरोहण की क्षमता और कमर्ठता के बारे में भी आश्वस्त थी। अन्य कोइर् भी व्यक्ित इस समय साथ चलने के लिए तैयार नहीं था। सुबह 6.20 पर जब अंगदोरजी और मैं साउथ कोल से बाहर आ निकले तो दिन उफपर चढ़ आया था। हलकी - हलकी हवा चल रही थी, लेकिन ठंड भी बहुत अिाक थी। मैं अपने आरोही उपस्कर में कापफी सुरक्ष्िात और गरम थी। हमने बगैर रस्सी वेफ़ही चढ़ाइर् की। अंगदोरजी एक निश्िचत गति से उफपर चढ़ते गए और मुझे भी उनके साथ चलने में कोइर् कठिनाइर् नहीं हुइर्। जमे हुए बपर्फ की सीधी व ढलाउफ च़‘ानें इतनी सख्त और भुरभुरी थीं, मानो शीशे की चादरें बिछी हों। हमें बपर्फ काटने के पफावडे़ का इस्तेमाल करना ही पड़ा और मुझे़इतनी सख्ती से पफावड़ा चलाना पड़ा जिससे कि उस जमे हुए बपर्फ की धरती को़पफावडे़ के दाँते काट सवेंफ। मैंने उन खतरनाक स्थलों पर हर कदम अच्छी तरह सोच - समझकर उठाया। दो घंटे से कम समय में ही हम श्िाखर वैंफप पर पहुँच गए। अंगदोरजी ने पीछे मुड़कर देखा और मुझसे कहा कि क्या मैं थक गइर् हूँ। मैंने जवाब दिया, फ्नहीं।य् जिसे सुनकर वे बहुत अिाक आश्चयर्चकित और आनंदित हुए। उन्होंने कहा कि पहलेवाले दल ने श्िाखर वैंफप पर पहुँचने में चार घंटे लगाए थे और यदि हम इसी गति से चलते रहे तो हम श्िाखर पर दोपहर एक बजे एक पहुँच जाएँगे। ल्हाटू हमारे पीछे - पीछे आ रहा था और जब हम दक्ष्िाणी श्िाखर के नीचे आराम कर रहे थे, वह हमारे पास पहुँच गया। थोड़ी - थोड़ी चाय पीने के बाद हमने पिफर चढ़ाइर् शुरू की। ल्हाटू एक नायलाॅन की रस्सी लाया था। इसलिए अंगदोरजी और मैं रस्सी के सहारे चढे़, जबकि ल्हाटू एक हाथ से रस्सी पकडे़ हुए बीच में चला। उसने रस्सी अपनी सुरक्षा की बजाय हमारे संतुलन के लिए पकड़ी हुइर् थी। ल्हाटू ने ध्यान दिया कि मैं इन उँफचाइयों के लिए सामान्यतः आवश्यक, चार लीटर आॅक्सीजन की अपेक्षा, लगभग ढाइर् लीटर आॅक्सीजन प्रति मिनट की दर से लेकर चढ़ रही थी। मेरे रेगुलेटर पर जैसे ही उसने आॅक्सीजन की आपूतिर् बढ़ाइर्, मुझे महसूस हुआ कि सपाट और कठिन चढ़ाइर् भी अब आसान लग रही थी। दक्ष्िाणी श्िाखर के उफपर हवा की गति बढ़ गइर् थी। उस उँफचाइर् पर तेश हवा के झोंके भुरभुरे बप़़्ार्फ के कणों को चारों तरपफ उड़ा रहे थे, जिससे दृश्यता शून्य तक आ गइर् थी। अनेक बार देखा कि केवल थोड़ी दूर के बाद कोइर् उँफची चढ़ाइर् नहीं है। ढलान एकदम सीधा नीचे चला गया है। मेरी साँस मानो रफक गइर् थी। मुझे विचार कौंधा कि सपफलता बहुत नशदीक है। 23 मइर् 1984 के दिन दोपहर के एक बजकर सात मिनट पर मैं एवरेस्ट की चोटी पर खड़ी थी। एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचनेवाली मैं प्रथम भारतीय महिला थी। एवरेस्ट शंवुफ की चोटी पर इतनी जगह नहीं थी कि दो व्यक्ित साथ - साथ खडे़ हो सवेंफ। चारों तरपफ हशारों मीटर लंबी सीधी ढलान को देखते हुए हमारे़सामने प्रश्न सुरक्षा का था। हमने पहले बपर्फ के पफावडे़ से बप़्ार्फ की खुदाइर् कऱअपने आपको सुरक्ष्िात रूप से स्िथर किया। इसके बाद, मैं अपने घुटनों के बल बैठी, बपर्फ पर अपने माथे को लगाकर मैंने ‘सागरमाथे’ के ताज का चुंबन लिया।़बिना उठे ही मैंने अपने थैले से दुगार् माँ का चित्रा और हनुमान चालीसा निकाला। मैंने इनको अपने साथ लाए लाल कपडे़ में लपेटा, छोटी - सी पूजा - अचर्ना की और इनको बप़्ार्फ में दबा दिया। आनंद के इस क्षण में मुझे अपने माता - पिता का ध्यान आया। जैसे मैं उठी, मैंने अपने हाथ जोडे़ और मैं अपने रज्जु - नेता अंगदोरजी के प्रति आदर भाव से झुकी। अंगदोरजी जिन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया और मुझे लक्ष्य तक पहुँचाया। मैंने उन्हें बिना आॅक्सीजन के एवरेस्ट की दूसरी चढ़ाइर् चढ़ने पर बधाइर् भी दी। उन्होंने मुझे गले से लगाया और मेरे कानों में पुफसपुफसाया, फ्दीदी, तुमने अच्छी चढ़ाइर् की। मैं बहुत प्रसन्न हूँ!य् वुफछ देर बाद सोनम पुलजर पहुँचे और उन्होंने पफोटो लेने शुरू कर दिए। इस समय तक ल्हाटू ने हमारे नेता को एवरेस्ट पर हम चारों के होने की सूचना दे दी थी। तब मेरे हाथ में वाॅकी - टाॅकी दिया गया। कनर्ल खुल्लर हमारी सपफलता से बहुत प्रसन्न थे। मुझे बधाइर् देते हुए उन्होंने कहा, फ्मैं तुम्हारी इस अनूठी उपलब्िध के लिए तुम्हारे माता - पिता को बधाइर् देना चाहूँगा!य् वे बोले कि देश को तुम पर गवर् है और अब तुम ऐसे संसार में वापस जाओगी, जो तुम्हारे अपने पीछे छोड़े हुए संसार से एकदम भ्िान्न होगा! प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिए - 1ण् अगि्रम दल का नेतृत्व कौन कर रहा था? 2ण् लेख्िाका को सागरमाथा नाम क्यों अच्छा लगा? 3ण् लेख्िाका को ध्वज जैसा क्या लगा? 4ण् हिमस्खलन से कितने लोगों की मृत्यु हुइर् और कितने घायल हुए? 5ण् मृत्यु के अवसाद को देखकर कनर्ल खुल्लर ने क्या कहा? 6ण् रसोइर् सहायक की मृत्यु वैफसे हुइर्? 7ण् वैंफप - चार कहाँ और कब लगाया गया? 8ण् लेख्िाका ने शेरपा वुफली को अपना परिचय किस तरह दिया? 9ण् लेख्िाका की सपफलता पर कनर्ल खुल्लर ने उसे किन शब्दों में बधाइर् दी? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - 1ण् नशदीक से एवरेस्ट को देखकर लेख्िाका को वैफसा लगा? 2ण् डाॅ. मीनू मेहता ने क्या जानकारियाँ दीं? 3ण् तेनजिंग ने लेख्िाका की तारीप़्ाफ में क्या कहा? 4ण् लेख्िाका को किनके साथ चढ़ाइर् करनी थी? 5ण् लोपसांग ने तंबू का रास्ता वैफसे सापफ किया?़6ण् साउथ कोल वैंफप पहुँचकर लेख्िाका ने अगले दिन की महत्त्वपूणर् चढ़ाइर् की तैयारी वैफसे शुरू की? ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - 1ण् उपनेता प्रेमचंद ने किन स्िथतियों से अवगत कराया? 2ण् हिमपात किस तरह होता है और उससे क्या - क्या परिवतर्न आते हैं? 3ण् लेख्िाका के तंबू में गिरे बपर्फ पिंड का वणर्न किस तरह किया गया है?़4ण् लेख्िाका को देखकर ‘की’ हक्का - बक्का क्यों रह गया? 5ण् एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए वुफल कितने वैंफप बनाए गए? उनका वणर्न कीजिए। 6ण् चढ़ाइर् के समय एवरेस्ट की चोटी की स्िथति वैफसी थी? 7ण् सम्िमलित अभ्िायान में सहयोग एवं सहायता की भावना का परिचय बचेंद्री के किस कायर् से मिलता है? ;गद्ध निम्नलिख्िात के आशय स्पष्ट कीजिए - 1ण् एवरेस्ट जैसे महान अभ्िायान में खतरों को और कभी - कभी तो मृत्यु भी आदमी को सहज भाव से स्वीकार करनी चाहिए। 2ण् सीधे धरातल पर दरार पड़ने का विचार और इस दरार का गहरे - चैड़े हिम - विदर में बदल जाने का मात्रा खयाल ही बहुत डरावना था। इससे भी श्यादा भयानक इस बात की जानकारी थी कि हमारे संपूणर् प्रयास के दौरान हिमपात लगभग एक दजर्न आरोहियों और वुफलियों को प्रतिदिन छूता रहेगा। 3ण् बिना उठे ही मैंने अपने थैले से दुगार् माँ का चित्रा और हनुमान चालीसा निकाला। मैंने इनको अपने साथ लाए लाल कपडे़ में लपेटा, छोटी - सी पूजा - अचर्ना की और इनको बपर्फ में दबा दिया। आनंद के इस क्षण में मुझे अपने माता - पिता का ध्यान आया।़भाषा - अध्ययन 1ण् इस पाठ में प्रयुक्त निम्नलिख्िात शब्दों की व्याख्या पाठ का संदभर् देकर कीजिए - निहारा है, धसकना, ख्िासकना, सागरमाथा, जायशा लेना, नौसिख्िाया 2ण् निम्नलिख्िात पंक्ितयों में उचित विराम चिÉों का प्रयोग कीजिए - ;कद्ध उन्होंने कहा तुम एक पक्की पवर्तीय लड़की लगती हो तुम्हें तो श्िाखर पर पहले ही प्रयास में पहुँच जाना चाहिए ;खद्ध क्या तुम भयभीत थीं ;गद्ध तुमने इतनी बड़ी जोख्िाम क्यों ली बचेंद्री 3ण् नीचे दिए उदाहरण के अनुसार निम्नलिख्िात शब्द - युग्मों का वाक्य में प्रयोग कीजिए - उदाहरण: हमारे पास एक वाॅकी - टाॅकी था। टेढ़ी - मेढ़ी हक्का - बक्का गहरे - चैडे़ इधर - उधर आस - पास लंबे - चैड़े 4ण् उदाहरण के अनुसार विलोम शब्द बनाइए - उदाहरण: अनुवूफल - प्रतिवूफल नियमित - ...............विख्यात - ..............आरोही - ...............निश्िचत - ..............सुंदर - ..............5ण् निम्नलिख्िात शब्दों में उपयुक्त उपसगर् लगाइए - जैसेः पुत्रा - सुपुत्रा वास व्यवस्िथत वूफल गति रोहण रक्ष्िात 6ण् निम्नलिख्िात िया विशेषणों का उचित प्रयोग करते हुए रिक्त स्थानों की पूतिर् कीजिए - अगले दिन, कम समय में, वुफछ देर बाद, सुबह तक ;कद्ध मैं ......................... यह कायर् कर लूँगा। ;खद्ध बादल घ्िारने के ......................... ही वषार् हो गइर्। ;गद्ध उसने बहुत ......................... इतनी तरक्की कर ली। ;घद्ध नाघकेसा को ......................... गाँव जाना था। योग्यता - विस्तार 1ण् इस पाठ में आए दस अंग्रेशी शब्दों का चयन कर उनके अथर् लिख्िाए। 2ण् पवर्तारोहण से संबंिात दस चीशों के नाम लिख्िाए। 3ण् तेनजिंग शेरपा की पहली चढ़ाइर् के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए। 4ण् इस पवर्त का नाम ‘एवरेस्ट’ क्यों पड़ा? जानकारी प्राप्त कीजिए। परियोजना कायर् 1ण् आगे बढ़ती भारतीय महिलाओं की पुस्तक पढ़कर उनसे संबंिात चित्रांे का संग्रह कीजिए एवं संक्ष्िाप्त जानकारी प्राप्त करके लिख्िाए - ;कद्ध पी.टी. उषा ;खद्ध आरती साहा ;गद्ध किरण बेदी 2ण् रामधारी सिंह दिनकर का लेख - ‘हिम्मत और िांदगी’ पुस्तकालय से लेकर पढि़ए। 3ण् ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’ - इस विषय पर कक्षा में परिचचार् आयोजित कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ अभ्िायान - दुगर्म - हिमपात - आकष्िार्त - अवसाद - ग्लेश्िायर - अनियमित - आशाजनक - भौंचक्की - अव्यवस्िथत - प्रवास - हिम - विदर - आरोही - विख्यात - अभ्िायांत्रिाकी - नौसिख्िाया - विशालकाय पुंज - पवर्तारोही - आरोहण - कमर्ठता - उपस्कर - शंवुफ - उपलब्िध - जोख्िाम - चढ़ाइर् ;आगे बढ़नाद्ध, किसी काम के लिए प्रतिब(ता जहाँ पहुँचना कठिन हो, कठिन मागर् बपर्फ का गिरना़मुग्ध होना, आकृष्ट होना उदासी बपर्फ की नदी़नियम विरफ(, जिसका कोइर् नियम न हो आशा उत्पन्न करनेवाला हैरान व्यवस्थाहीन, जिसमें कोइर् व्यवस्था न हो यात्रा में रहना दरार, तरेड़ उफपर चढ़नेवाला मशहूर, प्रसि( तकनीकी नया सीखनेवाला बडे़ आकार के बप़्ार्फ के टुकडे़ ;ढेरद्ध पवर्त पर चढ़नेवाला चढ़ना, उफपर की ओर जाना काम में वुफशलता, कमर् के प्रति निष्ठा आरोही की आवश्यक सामग्री नोक प्राप्ित खतरा

>Chap 3>

Our Past -3

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शरद जोशी

(1931 - 1991)

शरद जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में 21 मई 1931 को हुआ। इनका बचपन कई शहरों में बीता। कुछ समय तक यह सरकारी नौकरी में रहे, फिर इन्होंने लेखन को ही आजीविका के रूप में अपना लिया। इन्होंने आरंभ में कुछ कहानियाँ लिखीं, फिर पूरी तरह व्यंग्य-लेखन ही करने लगे। इन्होंने व्यंग्य लेख, व्यंग्य उपन्यास, व्यंग्य कॉलम के अतिरिक्त हास्य-व्यंग्यपूर्ण धारावाहिकों की पटकथाएँ और संवाद भी लिखे। हिंदी व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलाने वाले प्रमुख व्यंग्यकारों में शरद जोशी भी एक हैं।

शरद जोशी की प्रमुख व्यंग्य-कृतियाँ हैं ः परिक्रमा, किसी बहाने, जीप पर सवार इल्लियाँ, तिलस्म, रहा किनारे बैठ, दूसरी सतह, प्रतिदिन। दो व्यंग्य नाटक हैं ः अंधों का हाथी और एक था गधा। एक उपन्यास है ः मैं, मैं, केवल मैं, उर्फ़ कमलमुख बी.ए.।

शरद जोशी की भाषा अत्यंत सरल और सहज है। मुहावरों और हास-परिहास का हलका स्पर्श देकर इन्होंने अपनी रचनाओं को अधिक रोचक बनाया है। धर्म, अध्यात्म, राजनीति, सामाजिक जीवन, व्यक्तिगत आचरण, कुछ भी शरद जोशी की पैनी नज़र से बच नहीं सका है। इन्होंने अपनी व्यंग्य-रचनाओं में समाज में पाई जाने वाली सभी विसंगतियों का बेबाक चित्रण किया है। पाठक इस चित्रण को पढ़कर चकित भी होता है और बहुत कुछ सोचने को विवश भी।

प्रस्तुत पाठ ‘तुम कब जाओगे, अतिथि’ में शरद जोशी ने एेसे व्यक्तियों की खबर ली है, जो अपने किसी परिचित या रिश्तेदार के घर बिना कोई पूर्व सूचना दिए चले आते हैं और फिर जाने का नाम ही नहीं लेते, भले ही उनका टिके रहना मेज़बान पर कितना ही भारी क्यों न पड़ेे।

अच्छा अतिथि कौन होता है? वह, जो पहले से अपने आने की सूचना देकर आए और एक-दो दिन मेहमानी कराके विदा हो जाए या वह, जिसके आगमन के बाद मेज़बान वह सब सोचने को विवश हो जाए, जो इस पाठ के मेज़बान निरंतर सोचते रहे।

तुम कब जाओगे, अतिथि


आज तुम्हारे आगमन के चतुर्थ दिवस पर यह प्रश्न बार-बार मन में घुमड़ रहा है– तुम कब जाओगे, अतिथि?

तुम जहाँ बैठे निस्संकोच सिगरेट का धुआँ फेंक रहे हो, उसके ठीक सामने एक कैलेंडर है। देख रहे हो ना! इसकी तारीखें अपनी सीमा में नम्रता से फड़फड़ाती रहती हैं। विगत दो दिनों से मैं तुम्हें दिखाकर तारीखें बदल रहा हूँ। तुम जानते हो, अगर तुम्हें हिसाब लगाना आता है कि यह चौथा दिन है, तुम्हारे सतत आतिथ्य का चौथा भारी दिन! पर तुम्हारे जाने की कोई संभावना प्रतीत नहीं होती। लाखों मील लंबी यात्रा करने के बाद वे दोनों एस्ट्रॉनाट्स भी इतने समय चाँद पर नहीं रुके थे, जितने समय तुम एक छोटी-सी यात्रा कर मेरे घर आए हो। तुम अपने भारी चरण-कमलों की छाप मेरी ज़मीन पर अंकित कर चुके, तुमने एक अंतरंग निजी संबंध मुझसे स्थापित कर लिया, तुमने मेरी आर्थिक सीमाओं की बैंजनी चट्टान देख ली; तुम मेरी काफ़ी मिट्टी खोद चुके। अब तुम लौट जाओ, अतिथि! तुम्हारे जाने के लिए यह उच्च समय अर्थात हाईटाइम है। क्या तुम्हें तुम्हारी पृथ्वी नहीं पुकारती?

उस दिन जब तुम आए थे, मेरा हृदय किसी अज्ञात आशंका से धड़क उठा था। अंदर-ही-अंदर कहीं मेरा बटुआ काँप गया। उसके बावजूद एक स्नेह-भीगी मुसकराहट के साथ मैं तुमसे गले मिला था और मेरी पत्नी ने तुम्हें सादर नमस्ते की थी। तुम्हारे सम्मान में ओ अतिथि, हमने रात के भोजन को एकाएक उच्च-मध्यम वर्ग के डिनर में बदल दिया था। तुम्हें स्मरण होगा कि दो सब्ज़ियों और रायते के अलावा हमने मीठा भी बनाया था। इस सारे उत्साह और लगन के मूल में एक आशा थी। आशा थी कि दूसरे दिन किसी रेल से एक शानदार मेहमाननवाज़ी की छाप अपने हृदय में ले तुम चले जाओगे। हम तुमसे रुकने के लिए आग्रह करेंगे, मगर तुम नहीं मानोगे और एक अच्छे अतिथि की तरह चले जाओगे। पर एेसा नहीं हुआ! दूसरे दिन भी तुम अपनी अतिथि-सुलभ मुसकान लिए घर में ही बने रहे। हमने अपनी पीड़ा पी ली और प्रसन्न बने रहे। स्वागत-सत्कार के जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हें ले जा चुके थे, वहाँ से नीचे उतर हमने फिर दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की और रात्रि को तुम्हें सिनेमा दिखाया। हमारे सत्कार का यह आखिरी छोर है, जिससे आगे हम किसी के लिए नहीं बढ़े। इसके तुरंत बाद भावभीनी विदाई का वह भीगा हुआ क्षण आ जाना चाहिए था, जब तुम विदा होते और हम तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने जाते। पर तुमने एेसा नहीं किया।

तीसरे दिन की सुबह तुमने मुझसे कहा, "मैं धोबी को कपड़े देना चाहता हूँ।"

यह आघात अप्रत्याशित था और इसकी चोट मार्मिक थी। तुम्हारे सामीप्य की वेला एकाएक यों रबर की तरह खिंच जाएगी, इसका मुझे अनुमान न था। पहली बार मुझे लगा कि अतिथि सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोड़े अंशाें में राक्षस भी हो सकता है।

"किसी लॉण्ड्री पर दे देते हैं, जल्दी धुल जाएँगे।" मैंने कहा। मन-ही-मन एक विश्वास पल रहा था कि तुम्हें जल्दी जाना है।

"कहाँ है लॉण्ड्री?"

"चलो चलते हैं।" मैंने कहा और अपनी सहज बनियान पर औपचारिक कुर्ता डालने लगा।

"कहाँ जा रहे हैं?" पत्नी ने पूछा।

"इनके कपड़े लॉण्ड्री पर देने हैं।" मैंने कहा।

मेरी पत्नी की आँखें एकाएक बड़ी-बड़ी हो गईं। आज से कुछ बरस पूर्व उनकी एेसी आँखें देख मैंने अपने अकेलेपन की यात्रा समाप्त कर बिस्तर खोल दिया था। पर अब जब वे ही आँखें बड़ी होती हैं तो मन छोटा होने लगता है। वे इस आशंका और भय से बड़ी हुई थीं कि अतिथि अधिक दिनों ठहरेगा।

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और आशंका निर्मूल नहीं थी, अतिथि! तुम जा नहीं रहे। लॉण्ड्री पर दिए कपड़े धुलकर आ गए और तुम यहीं हो। तुम्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यहीं हो। तुम्हें देखकर फूट पड़नेवाली मुसकराहट धीरे-धीरे फीकी पड़कर अब लुप्त हो गई है। ठहाकों के रंगीन गुब्बारे, जो कल तक इस कमरे के आकाश में उड़ते थे, अब दिखाई नहीं पड़ते। बातचीत की उछलती हुई गेंद चर्चा के क्षेत्र के सभी कोनलों से टप्पे खाकर फिर सेंटर में आकर चुप पड़ी है। अब इसे न तुम हिला रहे हो, न मैं। कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूँ और तुम फिल्मी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हो। शब्दों का लेन-देन मिट गया और चर्चा के विषय चुक गए। परिवार, बच्चे, नौकरी, फिल्म, राजनीति, रिश्तेदारी, तबादले, पुराने दोस्त, परिवार-नियोजन, मँहगाई, साहित्य और यहाँ तक कि आँख मार-मारकर हमने पुरानी प्रेमिकाओं का भी ज़िक्र कर लिया और अब एक चुप्पी है। सौहार्द अब शनैः-शनैः बोरियत में रूपांतरित हो रहा है। भावनाएँ गालियों का स्वरूप ग्रहण कर रही हैं, पर तुम जा नहीं रहे। किस अदृश्य गोंद से तुम्हारा व्यक्तित्व यहाँ चिपक गया है, मैं इस भेद को सपरिवार नहीं समझ पा रहा हूँ। बार-बार यह प्रश्न उठ रहा है– तुम कब जाओगे, अतिथि?

कल पत्नी ने धीरे से पूछा था, "कब तक टिकेंगे ये?"

मैंने कंधे उचका दिए, "क्या कह सकता हूँ!"

"मैं तो आज खिचड़ी बना रही हूँ। हलकी रहेगी।"

"बनाओ।"

सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी। डिनर से चले थे, खिचड़ी पर आ गए। अब भी अगर तुम अपने बिस्तर को गोलाकार रूप नहीं प्रदान करते तो हमें उपवास तक जाना होगा। तुम्हारे-मेरे संबंध एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं। तुम्हारे जाने का यह चरम क्षण है। तुम जाओ न अतिथि!

तुम्हें यहाँ अच्छा लग रहा है न! मैं जानता हूँ। दूसरों के यहाँ अच्छा लगता है। अगर बस चलता तो सभी लोग दूसरों के यहाँ रहते, पर एेसा नहीं हो सकता। अपने घर की महत्ता के गीत इसी कारण गाए गए हैं। होम को इसी कारण स्वीट-होम कहा गया है कि लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस को काटने न दौड़ें। तुम्हें यहाँ अच्छा लग रहा है, पर सोचो प्रिय, कि शराफ़त भी कोई चीज़ होती है और गेट आउट भी एक वाक्य है, जो बोला जा सकता है।

अपने खर्राटों से एक और रात गुंजायमान करने के बाद कल जो किरण तुम्हारे बिस्तर पर आएगी वह तुम्हारे यहाँ आगमन के बाद पाँचवें सूर्य की परिचित किरण होगी। आशा है, वह तुम्हें चूमेगी और तुम घर लौटने का सम्मानपूर्ण निर्णय ले लोगे। मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी। उसके बाद मैं स्टैंड नहीं कर सकूँगा और लड़खड़ा जाऊँगा। मेरे अतिथि, मैं जानता हूँ कि अतिथि देवता होता है, पर आखिर मैं भी मनुष्य हूँ। मैं कोई तुम्हारी तरह देवता नहीं। एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते। देवता दर्शन देकर लौट जाता है। तुम लौट जाओ अतिथि! इसी में तुम्हारा देवत्व सुरक्षित रहेगा। यह मनुष्य अपनी वाली पर उतरे, उसके पूर्व तुम लौट जाओ!

उफ़, तुम कब जाओगे, अतिथि?

प्रश्न-अभ्यास

मौखिक

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए–

1. तिथि कितने दिनों से लेखक के घर पर रह रहा है?

2. कैलेंडर की तारीखें किस तरह फड़फड़ा रही हैं?

3. पति-पत्नी ने मेहमान का स्वागत कैसे किया?

4. दोपहर के भोजन को कौन-सी गरिमा प्रदान की गई?

5. तीसरे दिन सुबह अतिथि ने क्या कहा?

6. सत्कार की ऊष्मा समाप्त होने पर क्या हुआ?


लिखित

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए–

1. लेखक अतिथि को कैसी विदाई देना चाहता था?

2. पाठ में आए निम्नलिखित कथनाें की व्याख्या कीजिए–

(क) अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ काँप गया।

(ख) अतिथि सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोड़े अंशों में राक्षस भी हो सकता है।

(ग) लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस को काटने न दौड़ें।

(घ) मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी।

(ङ) एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते।


(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए–

1. कौन-सा आघात अप्रत्याशित था और उसका लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा?

2. ‘संबंधों का संक्रमण के दौर से गुज़रना’– इस पंक्ति से आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।

3. जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए?


भाषा-अध्ययन

1. निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्याय लिखिए–

चाँद ज़िक्र आघात ऊष्मा अंतरंग

2. निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए–

(क) हम तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने जाएँगे। (नकारात्मक वाक्य)

..........................................................

(ख) किसी लॉण्ड्री पर दे देते हैं, जल्दी धुल जाएँगे। (प्रश्नवाचक वाक्य)

..........................................................

(ग) सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी। (भविष्यत् काल)

..........................................................

(घ) इनके कपड़े देने हैं। (स्थानसूचक प्रश्नवाची)

..........................................................

(ङ) कब तक टिकेंगे ये? (नकारात्मक)

..........................................................

3. पाठ में आए इन वाक्यों में ‘चुकना’ क्रिया के विभिन्न प्रयोगों को ध्यान से देखिए और वाक्य संरचना को समझिए–

(क) तुम अपने भारी चरण-कमलों की छाप मेरी ज़मीन पर अंकित कर चुके।

(ख) तुम मेरी काफ़ी मिट्टी खोद चुके।

(ग) आदर-सत्कार के जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हें ले जा चुके थे।

(घ) शब्दों का लेन-देन मिट गया और चर्चा के विषय चुक गए।

(ङ) तुम्हारे भारी-भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यहीं हो।

4. निम्नलिखित वाक्य संरचनाओं में ‘तुम’ के प्रयोग पर ध्यान दीजिए–

(क) लॉण्ड्री पर दिए कपड़े धुलकर आ गए और तुम यहीं हो।

(ख) तुम्हें देखकर फूट पड़ने वाली मुसकुराहट धीरे-धीरे फीकी पड़कर अब लुप्त हो गई है।

(ग) तुम्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी।

(घ) कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूँ और तुम फिल्मी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हो।

(ङ) भावनाएँ गालियों का स्वरूप ग्रहण कर रही हैं, पर तुम जा नहीं रहे।

योग्यता-विस्तार

1. ‘अतिथि देवो भव’ उक्ति की व्याख्या करें तथा आधुनिक युग के संदर्भ में इसका आकलन करें।

2. विद्यार्थी अपने घर आए अतिथियों के सत्कार का अनुभव कक्षा में सुनाएँ।

3. अतिथि के अपेक्षा से अधिक रुक जाने पर लेखक की क्या-क्या प्रतिक्रियाएँ हुईं, उन्हें क्रम से छाँटकर लिखिए।

शब्दार्थ और टिप्पणियाँ

आगमन - आना

निस्संकोच - संकोचरहित, बिना संकोच के

नम्रता - नत होने का भाव, स्वभाव में नरमी का होना

सतत - निरंतर, लगातार

आतिथ्य - आवभगत

एस्ट्रॉनाट्स - अंतरिक्ष यात्री

अंतरंग - घनिष्ठ, गहरा

आशंका - खतरा, भय, डर

मेहमाननवाज़ी - अतिथि सत्कार

छोर - किनारा, सीमा

भावभीनी - प्रेम से ओतप्रोत

आघात - चोट, प्रहार

अप्रत्याशित - आकस्मिक, अनसोचा

मार्मिक - मर्मस्पर्शी

सामीप्य - निकटता, समीपता

औपचारिक - दिखावटी, रस्मी

निर्मूल - मूलरहित, बिना जड़ का

कोनलों - कोनों से

सौहार्द - मैत्री, हृदय की सरलता

रूपांतरित - जिसका रूप (आकार) बदल दिया गया हो

ऊष्मा - गरमी, उग्रता

संक्रमण - एक स्थिति या अवस्था से दूसरी में प्रवेश

गुंजायमान - गूँजता हुआ

 

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