महादेवी वमार् महादेवी वमार् का जन्म सन् 1907 में उत्तर प्रदेश के प़्ाफरुर्खाबाद शहर में हुआ था। उनकी श्िाक्षा - दीक्षा प्रयाग में हुइर्। प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्राचायार् पद पर लंबे समय तक कायर् करते हुए उन्होंने लड़कियों की श्िाक्षा के लिए काप़्ाफी प्रयत्न किए। सन् 1987 में उनका देहांत हो गया। महादेवी जी छायावाद के प्रमुख कवियों में से एक थीं। नीहार, रश्िम, नीरजा, यामा, दीपश्िाखा उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। कविता के साथ - साथ उन्होंने सशक्त गद्य रचनाएँ भी लिखी हैं जिनमें रेखाचित्रा तथा संस्मरण प्रमुख हैं। अतीत के चलचित्रा, स्मृति की रेखाएँ, पथ केसाथी, शंृखला की कडि़याँ उनकी महत्वपूणर् गद्य रचनाएँ हैं। महादेवी वमार् को साहित्य अकादमी एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया। महादेवी वमार् की साहित्य साधना के पीछे एक ओर आशादी के आंदोलन की प्रेरणा है तो दूसरी ओर भारतीय समाज में स्त्राी जीवन की वास्तविक स्िथति का बोध भी है। हिंदी गद्य साहित्य में संस्मरण एवं रेखाचित्रा को बुलंदियों तक पहुँचाने का श्रेय महादेवी जी को है। उनके संस्मरणों और रेखाचित्रों में शोष्िात, पीडि़त लोगों के प्रति ही नहीं बल्िक पशु - पक्ष्िायों के लिए भी आत्मीयता एवं अक्षय करुणा प्रकट हुइर् है। उनकी भाषा - शैली सरल एवं स्पष्ट है तथा शब्द चयन प्रभावपूणर् और चित्रात्मक। 68/क्ष्िातिज मेरे बचपन के दिन में महादेवी जी ने अपने बचपन के उन दिनों को स्मृति के सहारे लिखा है जब वे विद्यालय में पढ़ रही थीं। इस अंश में लड़कियों के प्रति सामाजिक रवैये, विद्यालय की सहपाठिनों, छात्रावास के जीवन और स्वतंत्राता आंदोलन के प्रसंगों का बहुत ही सजीव वणर्न है। मेरे बचपन के दिन बचपन की स्मृतियों में एक विचित्रा - सा आकषर्ण होता है। कभी - कभी लगता है, जैसे सपने में सब देखा होगा। परिस्िथतियाँ बहुत बदल जाती हैं। अपने परिवार में मैं कइर् पीढि़यों के बाद उत्पन्न हुइर्। मेरे परिवार में प्रायः दो सौ वषर् तक कोइर् लड़की थी ही नहीं। सुना है, उसके पहले लड़कियों को पैदा होते ही परमधाम भेज देते थे। पिफर मेरे बाबा ने बहुत दुगार् - पूजा की। हमारी वुफल - देवी दुगार् थीं। मैं उत्पन्न हुइर् तो मेरी बड़ी खातिर हुइर् और मुझे वह सब नहीं सहना पड़ा जो अन्य लड़कियों को सहना पड़ता है। परिवार में बाबा प़्ाफारसी और उदूर् जानते थे। पिता ने अंग्रेशी पढ़ी थी। हिंदी का कोइर् वातावरण नहीं था। मेरी माता जबलपुर से आईं तब वे अपने साथ हिंदी लाईं। वे पूजा - पाठ भी बहुत करती थीं। पहले - पहल उन्होंने मुझको ‘पंचतंत्रा’ पढ़ना सिखाया। बाबा कहते थे, इसको हम विदुषी बनाएँगे। मेरे संबंध में उनका विचार बहुतउफँचा रहा। इसलिए ‘पंचतंत्रा’ भी पढ़ा मैंने, संस्कृत भी पढ़ी। ये अवश्य चाहते थे कि मैं उदूर् - प़्ाफारसी सीख लूँ, लेकिन वह मेरे वश की नहीं थी। मैंने जब एक दिन मौलवी साहब को देखा तो बस, दूसरे दिन मैं चारपाइर् के नीचे जा छिपी। तब पंडितजी आए संस्कृत पढ़ाने। माँ थोड़ी संस्कृत जानती थीं। गीता में उन्हें विशेष रुचि थी।पूजा - पाठ के समय मैं भी बैठ जाती थी और संस्कृत सुनती थी। उसके उपरांत उन्होंने मिशन स्वूफल में रख दिया मुझको। मिशन स्वूफल मंे वातावरण दूसरा था, प्राथर्ना दूसरी थी। मेरा मन नहीं लगा। वहाँ जाना बंद कर दिया। जाने में रोने - धोने लगी। तब उन्होंने मुझको क्रास्थवेट गल्सर् काॅलेज में भेजा, जहाँ मैं पाँचवें दजेर् में भतीर् हुइर्। यहाँ का वातावरण बहुत अच्छा था उस समय। हिंदू लड़कियाँ भी थीं, इर्साइर् लड़कियाँ भी थीं। हम लोगों का एक ही मेस था। उस मेस में प्याश तक नहीं बनता था। वहाँ छात्रावास के हर एक कमरे में हम चार छात्राएँ रहती थीं। उनमें पहली ही साथ्िान सुभद्रा वुफमारी मिलीं। सातवें दजेर् में वे मुझसेे दो साल सीनियर थीं। वे कविता लिखती थीं और मैं भी बचपन से तुक मिलाती आइर् थी। बचपन में माँ लिखती थीं, पद भी गाती थीं।मीरा के पद विशेष रूप से गाती थीं। सवेरे ‘जागिए कृपानिधान पंछी बन बोले’ यही सुना जाता था। प्रभाती गाती थीं। शाम को मीरा का कोइर् पद गाती थीं। सुन - सुनकर मैंने भी ब्रजभाषा में लिखना आरंभ किया। यहाँ आकर देखा कि सुभद्रा वुफमारी जी खड़ी बोली में लिखती थीं। मैं भी वैसा ही लिखने लगी। लेकिन सुभद्रा जी बड़ी थीं, प्रतिष्िठत हो चुकी थीं। उनसे छिपा - छिपाकर लिखती थी मैं। एक दिन उन्होंने कहा, ‘महादेवी, तुम कविता लिखती हो?’ तो मैंने डर के मारे कहा, ‘नहीं।’ अंत में उन्होंने मेरी डेस्क की किताबों की तलाशी ली और बहुत - सा निकल पड़ा उसमें से। तब जैसे किसी अपराधी को पकड़ते हैं, ऐसे उन्होंने एक हाथ में कागश लिए और एक हाथ से मुझको पकड़ा और पूरे होस्टल में दिखा आईं कि ये कविता लिखती है। पिफर हम दोनों की मित्राता हो गइर्। क्रास्थवेट में एक पेड़ की डाल नीची थी। उस डाल पर हम लोग बैठ जाते थे। जब और लड़कियाँ खेलती थीं तब हम लोग तुक मिलाते थे। उस समय एक पत्रिाका निकलती थीμ‘स्त्राी दपर्ण’μउसी में भेज देते थे। अपनी तुकबंदी छप भी जाती थी। पिफर यहाँ कवि - सम्मेलन होने लगे तो हम लोग भी उनमें जाने लगे। हिंदी का उस समय प्रचार - प्रसार था। मैं सन् 1917 में यहाँ आइर् थी। उसके उपरांत गांधी जी का सत्याग्रह आरंभ हो गया और आनंद भवन स्वतंत्राता के संघषर् का वेंफद्र हो गया। जहाँ - तहाँ ¯हदी का भी प्रचार चलता था। कवि - सम्मेलन होते थे तो क्रास्थवेट से मैडम हमको साथ लेकर जाती थीं। हम कविता सुनाते थे। कभी हरिऔध जी अध्यक्ष होते थे, कभी श्रीधर पाठक होते थे, कभी रत्नाकर जी होते थे, कभी कोइर् होता था। कब हमारा नाम पुकारा जाए, बेचैनी से सुनते रहते थे। मुझको प्रायः प्रथम पुरस्कार मिलता था। सौ से कम पदक नहीं मिले होंगे उसमें। एक बार की घटना याद आती है कि एक कविता पर मुझे चाँदी का एक कटोरा मिला। बड़ा नक्काशीदार, सुंदर। उस दिन सुभद्रा नहीं गइर् थीं। सुभद्रा प्रायः नहीं जाती थीं कवि - सम्मेलन में। मैंने उनसे आकर कहा, ‘देखो, यह मिला।’ सुभद्रा ने कहा, ‘ठीक है, अब तुम एक दिन खीर बनाओ और मुझको इस कटोरे में ख्िालाओ।’ उसी बीच आनंद भवन में बापू आए। हम लोग तब अपने जेब - खचर् में से हमेशा एक - एक, दो - दो आने देश के लिए बचाते थे और जब बापू आते थे तो वह पैसा उन्हें दे देते थे। उस दिन जब बापू के पास मैं गइर् तो अपना कटोरा भी लेती गइर्। मैंने निकालकर बापू को दिखाया। मैंने कहा, ‘कविता सुनाने पर मुझको यह कटोरा मिला है।’ कहने लगे, ‘अच्छा, दिखा तो मुझको।’ मैंने कटोरा उनकी ओर बढ़ा दिया तो उसे हाथ में लेकर बोले, ‘तू देती है इसे?’ अब मैं क्या कहती? मैंने दे दिया और लौट आइर्। दुख यह हुआ कि कटोरा लेकर कहते, कविता क्या है? पर कविता सुनाने को उन्होंने नहीं कहा। लौटकर अब मैंने सुभद्रा जी से कहा कि कटोरा तो चला गया। सुभद्रा जी ने कहा, ‘और जाओ दिखाने!’ पिफर बोलीं, ‘देखो भाइर्, खीर तो तुमको बनानी होगी। अब तुम चाहे पीतल की कटोरी में ख्िालाओ, चाहे पूफल के कटोरे मेंμपिफर भी मुझे मन ही मन प्रसन्नता हो रही थी कि पुरस्कार में मिला अपना कटोरा मैंने बापू को दे दिया। सुभद्रा जी छात्रावास छोड़कर चली गईं। तब उनकी जगह एक मराठी लड़की शेबुन्िनसा हमारे कमरे में आकर रही। वह कोल्हापुर से आइर् थी। शेबुन मेरा बहुत - सा काम कर देती थी। वह मेरी डेस्क साप़्ाफ कर देती थी, किताबें ठीक से रख देती थी और इस तरह मुझे कविता के लिए वुफछ और अवकाश मिल जाता था। शेबुन मराठी शब्दों से मिली - जुली हिंदी बोलती थी। मैं भी उससे वुफछ - वुफछ मराठी सीखने लगी थी। वहाँ एक उस्तानी जी थींμशीनत बेगम। शेबुन जब ‘इकड़े - तिकड़े’ या ‘लोकर - लोकर’ जैसे मराठी शब्दों को मिलाकर वुफछ कहती तो उस्तानी जी से टोके बिना न रहा जाता थाμ‘वाह! देसी कौवा, मराठी बोली!’ शेबुन कहती थी, ‘नहीं उस्तानी जी, यह मराठी कौवा मराठी बोलता है।’ शेबुन मराठी महिलाओं की तरह किनारीदार साड़ी और वैसा ही ब्लाउश पहनती थी। कहती थी, ‘हम मराठी हूँ तो मराठी बोलेंगे!’ उस समय यह देखा मैंने कि सांप्रदायिकता नहीं थी। जो अवध की लड़कियाँ थीं, वे आपस में अवधी बोलती थींऋ बुंदेलखंड की आती थीं, वे बुंदेली में बोलती थीं। कोइर् अंतर नहीं आता था और हम पढ़ते हिंदी थे। उदूर् भी हमको पढ़ाइर् जाती थी, परंतु आपस में हम अपनी भाषा में ही बोलती थीं। यह बहुत बड़ी बात थी। हम एक मेस में खाते थे, एक प्राथर्ना में खड़े होते थेऋ कोइर् विवाद नहीं होता था। मैं जब विद्यापीठ आइर्, तब तक मेरे बचपन का वही क्रम चला जो आज तक चलता आ रहा है। कभी - कभी बचपन के संस्कार ऐसे होते हैं कि हम बड़े हो जाते हैं, तब तक चलते हैं। बचपन का एक और भी संस्कार था कि हम जहाँ रहते थे वहाँ जवारा के नवाब रहते थे। उनकी नवाबी छिन गइर् थी। वे बेचारे एक बंँगले में रहते थे। उसी कंपाउंड में हम लोग रहते थे। बेगम साहिबा कहती थींμ‘हमको ताइर् कहो!’ हम लोग उनको ‘ताइर् साहिबा’ कहते थे। उनके बच्चे हमारी माँ को चची जान कहते थे। हमारे जन्मदिन वहाँ मनाए जाते थे। उनके जन्मदिन हमारे यहाँ मनाए जाते थे। उनका एक लड़का था। उसको राखी बाँधने के लिए वे कहती थीं। बहनों को राखी बाँधनी चाहिए। राखी के दिन सवेरे से उसको पानी भी नहीं देती थीं। कहती थीं, राखी के दिन बहनें राखी बाँध जाएँ तब तक भाइर् को निराहार रहना चाहिए। बार - बार कहलाती थींμ‘भाइर् भूखा बैठा है, राखी बँधवाने के लिए।’ पिफर हम लोग जाते थे। हमको लहरिए या वुफछ मिलते थे। इसी तरह मुहरर्म में हरे कपड़े उनके बनते थे तो हमारे भी बनते थे। पिफर एक हमारा छोटा भाइर् हुआ वहाँ, तो ताइर् साहिबा ने पिताजी से कहा, ‘देवर साहब से कहो, वो मेरा नेग ठीक करके रखें। मैं शाम को आउफँगी।’ वे कपड़े - वपड़े लेकर आईं। हमारी माँ को वे दुलहन कहती थीं। कहने लगीं, ‘दुलहन, जिनके ताइर् - चाची नहीं होती हैं वो अपनी माँ के कपड़े पहनते हैं, नहीं तो छह महीने तक चाची - ताइर् पहनाती हैं। मैं इस बच्चे के लिए कपड़े लाइर् हूँ। यह बड़ा सुंदर है। मैं अपनी तरप़्ाफ से इसका नाम ‘मनमोहन’ रखती हूँ।’ वही प्रोप़्ोफसर मनमोहन वमार् आगे चलकर जम्मू यूनिवसिर्टी के वाइस चांसलर रहे, गोरखपुर यूनिवसिर्टी के भी रहे। कहने का तात्पयर् यह कि मेरे छोटे भाइर् का नाम वही चला जो ताइर् साहिबा ने दिया। उनके यहाँ भी हिंदी चलती थी, उदूर् भी चलती थी। यों, अपने घर में वे अवधी बोलते थे। वातावरण ऐसा था उस समय कि हम लोग बहुत निकट थे। आज की स्िथति देखकर लगता है, जैसे वह सपना ही था। आज वह सपना खो गया। शायद वह सपना सत्य हो जाता तो भारत की कथा वुुफछ और होती। प्रश्न - अभ्यास 1.‘मैं उत्पन्न हुइर् तो मेरी बड़ी खातिर हुइर् और मुझे वह सब नहीं सहना पड़ा जो अन्य लड़कियांे को सहना पड़ता है।’ इस कथन के आलोक में आप यह पता लगाएँ किμ ;कद्ध उस समय लड़कियों की दशा वैफसी थी? ;खद्ध लड़कियों के जन्म के संबंध में आज वैफसी परिस्िथतियाँ हैं? 2.लेख्िाका उदूर् - पफारसी क्यों नहीं सीख पाईं?़3.लेख्िाका ने अपनी माँ के व्यक्ितत्व की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है? 4.जवारा के नवाब के साथ अपने पारिवारिक संबंधों को लेख्िाका ने आज के संदभर् में स्वप्न जैसा क्यों कहा है? रचना और अभ्िाव्यक्ित 5.शेबुन्िनसा महादेवी वमार् के लिए बहुत काम करती थी। शेबुन्िनसा के स्थान पर यदि आप होतीं/होते तो महादेवी से आपकी क्या अपेक्षा होती? 6.महादेवी वमार् को काव्य प्रतियोगिता में चाँदी का कटोरा मिला था। अनुमान लगाइए कि आपको इस तरह का कोइर् पुरस्कार मिला हो और वह देशहित में या किसी आपदा निवारण के काम में देना पड़े तो आप वैफसा अनुभव करेंगे/करेंगी? 7.लेख्िाका ने छात्रावास के जिस बहुभाषी परिवेश की चचार् की है उसे अपनी मातृभाषा में लिख्िाए। 8.महादेवी जी के इस संस्मरण को पढ़ते हुए आपके मानस - पटल पर भी अपने बचपन की कोइर् स्मृति उभरकर आइर् होगी, उसे संस्मरण शैली में लिख्िाए। 9.महादेवी ने कवि सम्मेलनों में कविता पाठ के लिए अपना नाम बुलाए जाने से पहले होने वालीबेचैनी का िाक्र किया है। अपने विद्यालय में होने वाले सांस्कृतिक कायर्क्रमों में भाग लेते समय आपने जो बेचैनी अनुभव की होगी, उस पर डायरी का एक पृष्ठ लिख्िाए। भाषा - अध्ययन 10.पाठ से निम्नलिख्िात शब्दों के विलोम शब्द ढूँढ़कर लिख्िाएμ विद्वान, अनंत, निरपराधी, दंड, शांति। 11. निम्नलिख्िात शब्दों से उपसगर्/प्रत्यय अलग कीजिए और मूल शब्द बताइएμ निराहारी - निर् $ आहार $ इर् सांप्रदायिकता अप्रसन्नता अपनापन किनारीदार स्वतंत्राता 12.निम्नलिख्िात उपसगर् - प्रत्ययों की सहायता से दो - दो शब्द लिख्िाएμ उपसगर् - अन्, अ, सत्, स्व, दुर् प्रत्यय - दार, हार, वाला, अनीय 13.पाठ में आए सामासिक पद छाँटकर विग्रह कीजिएμ पूजा - पाठ पूजा और पाठ पाठेतर सियता ऽ बचपन पर वेंफदि्रत मैक्िसम गोकीर् की रचना ‘मेरा बचपन’ पुस्तकालय से लेकर पढि़ए। ऽ ‘मातृभूमि: ए विलेज विदआउट विमेन’ ;2005द्ध पिफल्म देखें। मनीष झा द्वारा निदेर्श्िात इस पिफल्म में कन्या भ्रूण हत्या की त्रासदी को अत्यंत बारीकी से दिखाया गया है। ऽ कल्पना के आधार पर बताइए कि लड़कियों की संख्या कम होने पर भारतीय समाज का रूप वैफसा होगा? शब्द - संपदा परमधाम μ स्वगर् प्रμतिष्िठत सम्मानित नक्काशीदार μ बेल - बूटे के काम से युक्त पूμफल ताँबे और राँगे के मेल से बनी एक मिश्र धातु निराहार μ बिना वुफछ खाए - पिए पदक μ ;प्रशंसासूचक पुरस्कारद्ध सोने - चाँदी या अन्य धातु से बना हुआ गोल या चैकोर टुकड़ा जो किसी विशेष अवसर पर पुरस्कार के रूप में दिया जाता है। प्रभाती μ सवेरे गाया जाने वाला गीत लहरिया μ रंग - बिरंगी धरियों वाली विशेष प्रकार की साड़ी जो सामान्यतः तीज, रक्षाबंधन आदि त्यौहारों पर पहनी जाती है। वाइस चांसलर μ वुफलपति यह भी जानें स्त्राी दपर्ण μ इलाहाबाद से प्रकाश्िात होने वाली यह पत्रिाका श्रीमती रामेश्वरी नेहरू के संपादन में सन् 1909 से 1924 तक लगातार प्रकाश्िात होती रही। स्ित्रायों में व्याप्त अश्िाक्षा और वुफरीतियों के प्रति जागृति पैदा करना उसका मुख्य उद्देश्य था।

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KshitijBhag1-007

महादेवी वर्मा 

महादेवी वर्मा का जन्म सन् 1907 में उत्तर प्रदेश के फ़र्रूखाबाद शहर में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा प्रयाग में हुई। प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्राचार्या पद पर लंबे समय तक कार्य करते हुए उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए काफ़ी प्रयत्न किए। सन् 1987 में उनका देहांत हो गया।

महादेवी जी छायावाद के प्रमुख कवियों में से एक थीं। नीहार, रश्मि, नीरजा, यामा, दीपशिखा उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। कविता के साथ-साथ उन्होंने सशक्त गद्य रचनाएँ भी लिखी हैं जिनमें रेखाचित्र तथा संस्मरण प्रमुख हैं। अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी, शृंखला की कड़ियाँ उनकी महत्वपूर्ण गद्य रचनाएँ हैं। महादेवी वर्मा को साहित्य अकादमी एवं  ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया।

महादेवी वर्मा की साहित्य साधना के पीछे एक ओर आज़ादी के आंदोलन की प्रेरणा है तो दूसरी ओर भारतीय समाज में स्त्री जीवन की वास्तविक स्थिति का बोध भी है। हिंदी गद्य साहित्य में संस्मरण एवं रेखाचित्र को बुलंदियों तक पहुँचाने का श्रेय महादेवी जी को है। उनके संस्मरणों और रेखाचित्रों में शोषित, पीड़ित लोगों के प्रति ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों के लिए भी आत्मीयता एवं अक्षय करुणा प्रकट हुई है। उनकी भाषा-शैली सरल एवं स्पष्ट है तथा शब्द चयन प्रभावपूर्ण और चित्रात्मक।

मेरे बचपन के दिन में महादेवी जी ने अपने बचपन के उन दिनों को स्मृति के सहारे लिखा है जब वे विद्यालय में पढ़ रही थीं। इस अंश में लड़कियों के प्रति सामाजिक रवैये, विद्यालय की सहपाठिनों, छात्रावास के जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रसंगों का बहुत ही सजीव वर्णन है।

मेरे बचपन के दिन

बचपन की स्मृतियों में एक विचित्र-सा आकर्षण होता है। कभी-कभी लगता है, जैसे सपने में सब देखा होगा। परिस्थितियाँ बहुत बदल जाती हैं।

अपने परिवार में मैं कई पीढ़ियों के बाद उत्पन्न हुई। मेरे परिवार में प्रायः दो सौ वर्ष तक कोई लड़की थी ही नहीं। सुना है, उसके पहले लड़कियों को पैदा होते ही परमधाम भेज देते थे। फिर मेरे बाबा ने बहुत दुर्गा-पूजा की। हमारी कुल-देवी दुर्गा थीं। मैं उत्पन्न हुई तो मेरी बड़ी खातिर हुई और मुझे वह सब नहीं सहना पड़ा जो अन्य लड़कियों को सहना पड़ता है। परिवार में बाबा फ़ारसी और उर्दू जानते थे। पिता ने अंग्रेज़ी पढ़ी थी। हिंदी का कोई वातावरण नहीं था।

मेरी माता जबलपुर से आईं तब वे अपने साथ हिंदी लाईं। वे पूजा-पाठ भी बहुत करती थीं। पहले-पहल उन्होंने मुझको ‘पंचतंत्र’ पढ़ना सिखाया।

बाबा कहते थे, इसको हम विदुषी बनाएँगे। मेरे संबंध में उनका विचार बहुत ऊँचा रहा। इसलिए ‘पंचतंत्र’ भी पढ़ा मैंने, संस्कृत भी पढ़ी। ये अवश्य चाहते थे कि मैं उर्दू-फ़ारसी सीख लूँ, लेकिन वह मेरे वश की नहीं थी। मैंने जब एक दिन मौलवी साहब को देखा तो बस, दूसरे दिन मैं चारपाई के नीचे जा छिपी। तब पंडित जी आए संस्कृत पढ़ाने। माँ थोड़ी संस्कृत जानती थीं। गीता में उन्हें विशेष रुचि थी। पूजा-पाठ के समय मैं भी बैठ जाती थी और संस्कृत सुनती थी। उसके उपरांत उन्होंने मिशन स्कूल में रख दिया मुझको। मिशन स्कूल में वातावरण दूसरा था, प्रार्थना दूसरी थी। मेरा मन नहीं लगा। वहाँ जाना बंद कर दिया। जाने में रोने-धोने लगी। तब उन्होंने मुझको क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज में भेजा, जहाँ मैं पाँचवें दर्जे में भर्ती हुई। यहाँ का वातावरण बहुत अच्छा था उस समय। हिंदू लड़कियाँ भी थीं, ईसाई लड़कियाँ भी थीं। हम लोगों का एक ही मेस था। उस मेस में प्याज़ तक नहीं बनता था।

वहाँ छात्रावास के हर एक कमरे में हम चार छात्राएँ रहती थीं। उनमें पहली ही साथिन सुभद्रा कुमारी मिलीं। सातवें दर्जे में वे मुझसेे दो साल सीनियर थीं। वे कविता लिखती थीं और मैं भी बचपन से तुक मिलाती आई थी। बचपन में माँ लिखती थीं, पद भी गाती थीं। मीरा के पद विशेष रूप से गाती थीं। सवेरे ‘जागिए कृपानिधान पंछी बन बोले’ यही सुना जाता था। प्रभाती गाती थीं। शाम को मीरा का कोई पद गाती थीं। सुन-सुनकर मैंने भी ब्रजभाषा में लिखना आरंभ किया। यहाँ आकर देखा कि सुभद्रा कुमारी जी खड़ी बोली में लिखती थीं। मैं भी वैसा ही लिखने लगी। लेकिन सुभद्रा जी बड़ी थीं, प्रतिष्ठित हो चुकी थीं। उनसे छिपा-छिपाकर लिखती थी मैं। एक दिन उन्होंने कहा, ‘महादेवी, तुम कविता लिखती हो?’ तो मैंने डर के मारे कहा, ‘नहीं।’ अंत में उन्होंने मेरी डेस्क की किताबों की तलाशी ली और बहुत-सा निकल पड़ा उसमें से। तब जैसे किसी अपराधी को पकड़ते हैं, ऐसे उन्होंने एक हाथ में कागज़ लिए और एक हाथ से मुझको पकड़ा और पूरे होस्टल में दिखा आईं कि ये कविता लिखती है। फिर हम दोनों की मित्रता हो गई। क्रास्थवेट में एक पेड़ की डाल नीची थी। उस डाल पर हम लोग बैठ जाते थे। जब और लड़कियाँ खेलती थीं तब हम लोग तुक मिलाते थे। उस समय एक पत्रिका निकलती थी–‘स्त्री दर्पण’-उसी में भेज देते थे। अपनी तुकबंदी छप भी जाती थी। फिर यहाँ कवि-सम्मेलन होने लगे तो हम लोग भी उनमें जाने लगे। हिंदी का उस समय प्रचार-प्रसार था। मैं सन् 1917 में यहाँ आई थी। उसके उपरांत गांधी जी का सत्याग्रह आरंभ हो गया और आनंद भवन स्वतंत्रता के संघर्ष का केंद्र हो गया। जहाँ-तहाँ हिदी का भी प्रचार चलता था। कवि-सम्मेलन होते थे तो क्रास्थवेट से मैडम हमको साथ लेकर जाती थीं। हम कविता सुनाते थे। कभी हरिऔध जी अध्यक्ष होते थे, कभी श्रीधर पाठक होते थे, कभी रत्नाकर जी होते थे, कभी कोई होता था। कब हमारा नाम पुकारा जाए, बेचैनी से सुनते रहते थे। मुझको प्रायः प्रथम पुरस्कार मिलता था। सौ से कम पदक नहीं मिले होंगे उसमें।

एक बार की घटना याद आती है कि एक कविता पर मुझे चाँदी का एक कटोरा मिला। बड़ा नक्काशीदार, सुंदर। उस दिन सुभद्रा नहीं गई थीं। सुभद्रा प्रायः नहीं जाती थीं कवि-सम्मेलन में। मैंने उनसे आकर कहा, ‘देखो, यह मिला।’

सुभद्रा ने कहा, ‘ठीक है, अब तुम एक दिन खीर बनाओ और मुझको इस कटोरे में खिलाओ।’

उसी बीच आनंद भवन में बापू आए। हम लोग तब अपने जेब-खर्च में से हमेशा एक-एक, दो-दो आने देश के लिए बचाते थे और जब बापू आते थे तो वह पैसा उन्हें दे देते थे। उस दिन जब बापू के पास मैं गई तो अपना कटोरा भी लेती गई। मैंने निकालकर बापू को दिखाया। मैंने कहा, ‘कविता सुनाने पर मुझको यह कटोरा मिला है।’ कहने लगे, ‘अच्छा, दिखा तो मुझको।’ मैंने कटोरा उनकी ओर बढ़ा दिया तो उसे हाथ में लेकर बोले, ‘तू देती है इसे?’ अब मैं क्या कहती? मैंने दे दिया और लौट आई। दुख यह हुआ कि कटोरा लेकर कहते, कविता क्या है? पर कविता सुनाने को उन्होंने नहीं कहा। लौटकर अब मैंने सुभद्रा जी से कहा कि कटोरा तो चला गया। सुभद्रा जी ने कहा, ‘और जाओ दिखाने!’ फिर बोलीं, ‘देखो भाई, खीर तो तुमको बनानी होगी। अब तुम चाहे पीतल की कटोरी में खिलाओ, चाहे फूल के कटोरे में–फिर भी मुझे मन ही मन प्रसन्नता हो रही थी कि पुरस्कार में मिला अपना कटोरा मैंने बापू को दे दिया।

सुभद्रा जी छात्रावास छोड़कर चली गईं। तब उनकी जगह एक मराठी लड़की ज़ेबुन्निसा हमारे कमरे में आकर रही। वह कोल्हापुर से आई थी। ज़ेबुन मेरा बहुत-सा काम कर देती थी। वह मेरी डेस्क साफ़ कर देती थी, किताबें ठीक से रख देती थी और इस तरह मुझे कविता के लिए कुछ और अवकाश मिल जाता था। ज़ेबुन मराठी शब्दों से मिली-जुली हिंदी बोलती थी। मैं भी उससे कुछ-कुछ मराठी सीखने लगी थी। वहाँ एक उस्तानी जी थीं;ज़ीनत बेगम। ज़ेबुन जब ‘इकड़े-तिकड़े’ या ‘लोकर-लोकर’ जैसे मराठी शब्दों को मिलाकर कुछ कहती तो उस्तानी जी से टोके बिना न रहा जाता था;‘वाह! देसी कौवा, मराठी बोली!’ ज़ेबुन कहती थी, ‘नहीं उस्तानी जी, यह मराठी कौवा मराठी बोलता है।’ ज़ेबुन मराठी महिलाओं की तरह किनारीदार साड़ी और वैसा ही ब्लाउज़ पहनती थी। कहती थी, ‘हम मराठी हूँ तो मराठी बोलेंगे!’

उस समय यह देखा मैंने कि सांप्रदायिकता नहीं थी। जो अवध की लड़कियाँ थीं, वे आपस में अवधी बोलती थीं; बुंदेलखंड की आती थीं, वे बुंदेली में बोलती थीं। कोई अंतर नहीं आता था और हम पढ़ते हिंदी थे। उर्दू भी हमको पढ़ाई जाती थी, परंतु आपस में हम अपनी भाषा में ही बोलती थीं। यह बहुत बड़ी बात थी। हम एक मेस में खाते थे, एक प्रार्थना में खड़े होते थे; कोई विवाद नहीं होता था।

मैं जब विद्यापीठ आई, तब तक मेरे बचपन का वही क्रम चला जो आज तक चलता आ रहा है। कभी-कभी बचपन के संस्कार ऐसे होते हैं कि हम बड़े हो जाते हैं, तब तक चलते हैं। बचपन का एक और भी संस्कार था कि हम जहाँ रहते थे वहाँ जवारा के नवाब रहते थे। उनकी नवाबी छिन गई थी। वे बेचारे एक बंँगले में रहते थे। उसी कंपाउंड में हम लोग रहते थे। बेगम साहिबा कहती थीं–‘हमको ताई कहो!’ हम लोग उनको ‘ताई साहिबा’ कहते थे। उनके बच्चे हमारी माँ को चची जान कहते थे। हमारे जन्मदिन वहाँ मनाए जाते थे। उनके जन्मदिन हमारे यहाँ मनाए जाते थे। उनका एक लड़का था। उसको राखी बाँधने के लिए वे कहती थीं। बहनों को राखी बाँधनी चाहिए। राखी के दिन सवेरे से उसको पानी भी नहीं देती थीं। कहती थीं, राखी के दिन बहनें राखी बाँध जाएँ तब तक भाई को निराहार रहना चाहिए। बार-बार कहलाती थीं–‘भाई भूखा बैठा है, राखी बँधवाने के लिए।’ फिर हम लोग जाते थे। हमको लहरिए या कुछ मिलते थे। इसी तरह मुहर्रम में हरे कपड़े उनके बनते थे तो हमारे भी बनते थे। फिर एक हमारा छोटा भाई हुआ वहाँ, तो ताई साहिबा ने पिताजी से कहा, ‘देवर साहब से कहो, वो मेरा नेग ठीक करके रखें। मैं शाम को आऊँगी।’ वे कपड़े-वपड़े लेकर आईं। हमारी माँ को वे दुलहन कहती थीं। कहने लगीं, ‘दुलहन, जिनके ताई-चाची नहीं होती हैं वो अपनी माँ के कपड़े पहनते हैं, नहीं तो छह महीने तक चाची-ताई पहनाती हैं। मैं इस बच्चे के लिए कपड़े लाई हूँ। यह बड़ा सुंदर है। मैं अपनी तरफ़ से इसका नाम ‘मनमोहन’ रखती हूँ।’

वही प्रोफ़ेसर मनमोहन वर्मा आगे चलकर जम्मू यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रहे, गोरखपुर यूनिवर्सिटी के भी रहे। कहने का तात्पर्य यह कि मेरे छोटे भाई का नाम वही चला जो ताई साहिबा ने दिया। उनके यहाँ भी हिंदी चलती थी, उर्दू भी चलती थी। यों, अपने घर में वे अवधी बोलते थे। वातावरण ऐसा था उस समय कि हम लोग बहुत निकट थे। आज की स्थिति देखकर लगता है, जैसे वह सपना ही था। आज वह सपना खो गया।

शायद वह सपना सत्य हो जाता तो भारत की कथा कुुछ और होती।

प्रश्न-अभ्यास

  1. ‘मैं उत्पन्न हुई तो मेरी बड़ी खातिर हुई और मुझे वह सब नहीं सहना पड़ा जो अन्य लड़कियाें को सहना पड़ता है।’ इस कथन के आलोक में आप यह पता लगाएँ कि-

    (क) उस समय लड़कियों की दशा कैसी थी?

    (ख) लड़कियों के जन्म के संबंध में आज कैसी परिस्थितियाँ हैं?

  2. लेखिका उर्दू-फ़ारसी क्यों नहीं सीख पाईं?
  3. लेखिका ने अपनी माँ के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
  4. जवारा के नवाब के साथ अपने पारिवारिक संबंधों को लेखिका ने आज के संदर्भ में स्वप्न जैसा क्यों कहा है?

    रचना और अभिव्यक्ति

  5. ज़ेबुन्निसा महादेवी वर्मा के लिए बहुत काम करती थी। ज़ेबुन्निसा के स्थान पर यदि आप होतीं/होते तो महादेवी से आपकी क्या अपेक्षा होती?
  6. महादेवी वर्मा को काव्य प्रतियोगिता में चाँदी का कटोरा मिला था। अनुमान लगाइए कि आपको इस तरह का कोई पुरस्कार मिला हो और वह देशहित में या किसी आपदा निवारण के काम में देना पड़े तो आप कैसा अनुभव करेंगे/करेंगी?
  7. लेखिका ने छात्रावास के जिस बहुभाषी परिवेश की चर्चा की है उसे अपनी मातृभाषा में लिखिए।
  8. महादेवी जी के इस संस्मरण को पढ़ते हुए आपके मानस-पटल पर भी अपने बचपन की कोई स्मृति उभरकर आई होगी, उसे संस्मरण शैली में लिखिए।
  9. महादेवी ने कवि सम्मेलनों में कविता पाठ के लिए अपना नाम बुलाए जाने से पहले होने वाली बेचैनी का जि़क्र किया है। अपने विद्यालय में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते समय आपने जो बेचैनी अनुभव की होगी, उस पर डायरी का एक पृष्ठ लिखिए।

    भाषा-अध्ययन

  10. पाठ से निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द ढूँढ़कर लिखिए-

    विद्वान, अनंत, निरपराधी, दंड, शांति।

  11. निम्नलिखित शब्दों से उपसर्ग/प्रत्यय अलग कीजिए और मूल शब्द बताइए-

    निराहारी - निर् + आहार + ई

    सांप्रदायिकता

    अप्रसन्नता

    अपनापन

    किनारीदार

    स्वतंत्रता

  12. निम्नलिखित उपसर्ग-प्रत्ययों की सहायता से दो-दो शब्द लिखिए-

    उपसर्ग - अन्, अ, सत्, स्व, दुर्

    प्रत्यय - दार, हार, वाला, अनीय

  13. पाठ में आए सामासिक पद छाँटकर विग्रह कीजिए-

    पूजा-पाठ पूजा और पाठ

    ........................ ........................

    ........................ ........................

    ........................ ........................

    ........................ ........................

पाठेतर सक्रियता

  • बचपन पर केंद्रित मैक्सिम गोर्की की रचना ‘मेरा बचपन’ पुस्तकालय से लेकर पढ़िए।
  • ‘मातृभूमि: ए विलेज विदआउट विमेन’ (2005) फिल्म देखें। मनीष झा द्वारा निर्देशित इस फिल्म में कन्या भ्रुण हत्या की त्रासदी को अत्यंत बारीकी से दिखाया गया है।
  • कल्पना के आधार पर बताइए कि लड़कियों की संख्या कम होने पर भारतीय समाज का रूप कैसा होगा?

शब्द-संपदा

परमधाम - स्वर्ग

प्रतिष्ठित - सम्मानित

नक्काशीदार - बेल-बूटे के काम से युक्त

फूल - ताँबे और राँगे के मेल से बनी एक मिश्र धातु

निराहार - बिना कुछ खाए-पिए

पदक - (प्रशंसासूचक पुरस्कार) सोने-चाँदी या अन्य धातु से बना हुआ गोल या चौकोर टुकड़ा जो किसी विशेष अवसर पर पुरस्कार के रूप में दिया जाता है।

प्रभाती - सवेरे गाया जाने वाला गीत

लहरिया - रंग-बिरंगी धारियों वाली विशेष प्रकार की साड़ी जो सामान्यतः तीज, रक्षाबंधन आदि त्यौहारों पर पहनी जाती है।

वाइस चांसलर - कुलपति

यह भी जानें

स्त्री दर्पणइलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका श्रीमती रामेश्वरी नेहरू के संपादन में सन् 1909 से 1924 तक लगातार प्रकाशित होती रही। स्त्रियों में व्याप्त अशिक्षा और कुरीतियों के प्रति जागृति पैदा करना उसका मुख्य उद्देश्य था।


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