हरिशंकर परसाइर् हरिशंकर परसाइर् का जन्म सन् 1922 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद िाले के जमानी गाँव में हुआ। नागपुर विश्वविद्यालय से एमúएú करने के बाद वुफछ दिनों तक अध्यापन किया। सन् 1947 से स्वतंत्रा लेखन करने लगे। जबलपुर से वसुधा नामक पत्रिाका निकाली, जिसकी हिंदी संसार में काप़्ाफी सराहना हुइर्। सन् 1995 में उनका निधन हो गया।हिंदी के व्यंग्य लेखकों में उनका नाम अग्रणी है। परसाइर् जी की कृतियों में हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन पिफरे ;कहानी संग्रहद्ध, रानी नागपफनी की कहानी, तट की खोज ;उपन्यासद्ध, तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेइर्मानी की परत, पगडंडियों का शमाना, सदाचार का तावीश, श्िाकायत मुझे भी है, और अंत में, ;निबंध संग्रहद्ध, वैष्णव की पिफसलन, तिरछी रेखाएँ, ठिठुरता हुआ गणतंत्रा, विकलांग श्र(ा का दौर ;व्यंग्य संग्रहद्ध उल्लेखनीय हैं। भारतीय जीवन के पाखंड, भ्रष्टाचार, अंतविर्रोध, बेइर्मानी आदि पर लिखे उनके व्यंग्य लेखों ने शोषण के विरु( साहित्य की भूमिका का निवार्ह किया। उनका व्यंग्य लेखन परिवतर्न की चेतना पैदा करता है। कोरे हास्य से अलग यह व्यंग्य आदशर् के पक्ष में अपनी उपस्िथति दजर् कराता है। सामाजिक, राजनैतिक और धामिर्क पाखंड पर लिखे उनके व्यंग्यों ने व्यंग्य - साहित्य के मानकों का निमार्ण किया। परसाइर् जी बोलचाल की सामान्य भाषा का प्रयोग करते हैं विंफतु संरचना के अनूठेपन के कारण उनकी भाषा की मारक क्षमता बहुत बढ़ जाती है। प्रेमचंद के पफटे जूते शीषर्क निबंध में परसाइर् जी ने प्रेमचंद के व्यक्ितत्व की सादगी के साथ एक रचनाकार की अंतभेर्दी सामाजिक दृष्िट का विवेचन करते हुए आज कीदिखावे की प्रवृिा एवं अवसरवादिता पर व्यंग्य किया है। प्रेमचंद के पफटे जूते प्रेमचंद का एक चित्रा मेरे सामने है, पत्नी के साथ पफोटो ख्िांचा रहे हैं। सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, वुफरता और धोती पहने हैं। कनपटी चिपकी है, गालों की हंियाँ उभर आइर् हैं, पर घनी मूँछें चेहरे को भरा - भरा बतलाती हैं। पाँवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बँधे हैं। लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है। तब बंद वैफसे भी कस लिए जाते हैं। दाहिने पाँव का जूता ठीक है, मगर बाएँ जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आइर् है। मेरी दृष्िट इस जूते पर अटक गइर् है। सोचता हूँμपफोटो ख्िंाचाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की वैफसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग - अलग पोशावेंफ नहीं होंगीμइसमें पोशावेंफ बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही पफोटो में ख्िंाच जाता है। मैं चेहरे की तरप़्ाफ देखता हूँ। क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्ियक पुरखे कि तुम्हारा जूता पफट गया है और अँगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका शरा भी अहसास नहीं है? शरा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा नीचे खींच लेने से अँगुली ढक सकती है? मगर पिफर भी तुम्हारे चेहरे पर बड़ी बेपरवाही, बड़ा विश्वास है! पफोटोग्रापफर ने जब ‘रेडी - प्लीश’ कहा होगा, तब परंपरा के अनुसार तुमने मुसकान लाने की कोश्िाश की होगी, ददर् के गहरे वुफएँ के तल में कहीं पड़ी मुसकान को धीरे - धीरे खींचकर उफपर निकाल रहे होंगे कि बीच में ही ‘क्िलक’ करके पफोटोग्रापफर ने ‘थैंक यू’ कह दिया होगा। विचित्रा है यह अधूरी मुसकान। यह मुसकान नहीं, इसमें उपहास है, व्यंग्य है! यह वैफसा आदमी है, जो खुद तो पफटे जूते पहने पफोटो ¯खचा रहा है, पर किसी पर हँस भी रहा है! पफोटो ही ¯खचाना था, तो ठीक जूते पहन लेते, या न ¯खचाते। पफोटो न ¯खचाने से क्या बिगड़ता था। शायद पत्नी का आग्रह रहा हो और तुम, ‘अच्छा, चल भइर्’ कहकर बैठ गए होंगे। मगर यह कितनी बड़ी ‘टेªजडी’ है कि आदमी के पास पफोटो ¯खचाने को भी जूता न हो। मैं तुम्हारी यह पफोटो देखते - देखते, तुम्हारे क्लेश को अपने भीतर महसूस करके जैसे रो पड़ना चाहता हूँ, मगर तुम्हारी आँखों का यह तीखा ददर् भरा व्यंग्य मुझे एकदम रोक देता है। तुम पफोटो का महत्व नहीं समझते। समझते होते, तो किसी से पफोटो ¯खचाने के लिए जूते माँग लेते। लोग तो माँगे के कोट से वर - दिखाइर् करते हैं। और माँगे की मोटर से बारात निकालते हैं। पफोटो ¯खचाने के लिए तो बीवी तक माँग ली जाती है, तुमसे जूते ही माँगते नहीं बने! तुम पफोटो का महत्व नहीं जानते। लोग तो इत्रा चुपड़कर पफोटो ¯खचाते हैं जिससे पफोटो में खुशबू आ जाए! गंदे - से - गंदे आदमी की पफोटो भी खुशबू देती है! टोपी आठ आने में मिल जाती है और जूते उस शमाने में भी पाँच रुपये से कम में क्या मिलते होंगे। जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गइर् है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं। तुम भी जूते और टोपी के आनुपातिक मूल्य के मारे हुए थे। यह विडंबना मुझे इतनी तीव्रता से पहले कभी नहीं चुभी, जितनी आज चुभ रही है, जब मैं तुम्हारा पफटा जूता देख रहा हूँ। तुम महान कथाकार, उपन्यास - सम्राट, युग - प्रवतर्क, जाने क्या - क्या कहलाते थे, मगर पफोटो में भी तुम्हारा जूता पफटा हुआ है! मेरा जूता भी कोइर् अच्छा नहीं है। यों उफपर से अच्छा दिखता है। अँगुली बाहर नहीं निकलती, पर अँगूठे के नीचे तला पफट गया है। अँगूठा शमीन से घ्िासता है और पैनी मि‘ी पर कभी रगड़ खाकर लहूलुहान भी हो जाता है। पूरा तला गिर जाएगा, पूरा पंजा छिल जाएगा, मगर अँगुली बाहर नहीं दिखेगी। तुम्हारी अँगुली दिखती है, पर पाँव सुरक्ष्िात है। मेरी अँगुली ढँकी है, पर पंजा नीचे घ्िास रहा है।तुम परदे का महत्त्व ही नहीं जानते, हम परदे पर वुफबार्न हो रहे हैं! तुम पफटा जूता बड़े ठाठ से पहने हो! मैं ऐसे नहीं पहन सकता। पफोटो तो िांदगी भर इस तरह नहीं ¯खचाउँफ, चाहे कोइर् जीवनी बिना पफोटो के ही छाप दे। तुम्हारी यह व्यंग्य - मुसकान मेरे हौसले पस्त कर देती है। क्या मतलब है इसका? कौन सी मुसकान है यह? - क्या होरी का गोदान हो गया? - क्या पूस की रात में नीलगाय हलवूफ का खेत चर गइर्? - क्या सुजान भगत का लड़का मर गयाऋ क्योंकि डाॅक्टर क्लब छोड़कर नहीं आ सकते? नहीं, मुझे लगता है माधो औरत के कपफन के चंदे की शराब पी गया। वही़मुसकान मालूम होती है। मैं तुम्हारा जूता पिफर देखता हूँ। वैफसे पफट गया यह, मेरी जनता के लेखक? क्या बहुत चक्कर काटते रहे? क्या बनिये के तगादे से बचने के लिए मील - दो मील का चक्कर लगाकर घर लौटते रहे? चक्कर लगाने से जूता पफटता नहीं है, घ्िास जाता है। वुफंभनदास का जूता भी पफतेहपुर सीकरी जाने - आने में घ्िास गया था। उसे बड़ा पछतावा हुआ। उसने कहा - ‘आवत जात पन्हैया घ्िास गइर्, बिसर गयो हरि नाम।’ और ऐसे बुलाकर देने वालों के लिए कहा थाμ‘जिनके देखे दुख उपजत है, तिनको करबो परै सलाम!’ चलने से जूता घ्िासता है, पफटता नहीं। तुम्हारा जूता वैफसे पफट गया? मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीश को ठोकर मारते रहे हो। कोइर् चीश जो परत - पर - परत सदियों से जम गइर् है, उसे शायद तुमने ठोकर मार - मारकर अपना जूता पफाड़ लिया। कोइर् टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आशमाया। तुम उसे बचाकर, उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियाँ पहाड़ थोड़े ही पफोड़ती हैं, कोइर् रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है। तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमशोरी थी, जो होरी को ले डूबी, वही ‘नेम - धरम’ वाली कमशोरी? ‘नेम - धरम’ उसकी भी शंजीर थी। मगर तुम जिस तरह मुसकरा रहे हो, उससे लगता है कि शायद ‘नेम - धरम’ तुम्हारा बंधन नहीं था, तुम्हारी मुक्ित थी! तुम्हारी यह पाँव की अँगुली मुझे संकेत करती - सी लगती है, जिसे तुम घृण्िात समझते हो, उसकी तरपफ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो?़तुम क्या उसकी तरप़्ाफ इशारा कर रहे हो, जिसे ठोकर मारते - मारते तुमने जूता पफाड़ लिया? मैं समझता हूँ। तुम्हारी अँगुली का इशारा भी समझता हूँ और यह व्यंग्य - मुसकान भी समझता हूँ। तुम मुझ पर या हम सभी पर हँस रहे हो, उन पर जो अँगुली छिपाए और तलुआ घ्िासाए चल रहे हैं, उन पर जो टीले को बरकाकर बाजू से निकल रहे हैं। तुम कह रहे होμमैंने तो ठोकर मार - मारकर जूता पफाड़ लिया, अँगुली बाहर निकल आइर्, पर पाँव बच रहा और मैं चलता रहा, मगर तुम अँगुली को ढाँकने की चिंता में तलुवे का नाश कर रहे हो। तुम चलोगे वैफसे? मैं समझता हूँ। मैं तुम्हारे पफटे जूते की बात समझता हूँ, अँगुली का इशारा समझता हूँ, तुम्हारी व्यंग्य - मुसकान समझता हूँ! प्रश्न - अभ्यास 1.हरिशंकर परसाइर् ने प्रेमचंद का जो शब्दचित्रा हमारे सामने प्रस्तुत किया है उससे प्रेमचंद के व्यक्ितत्व की कौन - कौन सी विशेषताएँ उभरकर आती हैं? 2.सही कथन के सामने ;टद्ध का निशान लगाइएμ ;कद्ध बाएँ पाँव का जूता ठीक है मगर दाहिने जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आइर् है। ;खद्ध लोग तो इत्रा चुपड़कर पफोटो ¯खचाते हंै जिससे पफोटो में खुशबू आ जाए। ;गद्ध तुम्हारी यह व्यंग्य मुसकान मेरे हौसले बढ़ाती है। ;घद्ध जिसे तुम घृण्िात समझते हो, उसकी तरपफ अँगूठे से इशारा करते हो? 3.नीचे दी गइर् पंक्ितयों में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिएμ ;कद्ध जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गइर् है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं। ;खद्ध तुम परदे का महत्व ही नहीं जानते, हम परदे पर वुफबार्न हो रहे हैं। ;गद्ध जिसे तुम घृण्िात समझते हो, उसकी तर ़पफ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो? 4.पाठ में एक जगह पर लेखक सोचता है कि ‘पफोटो ख्िांचाने की अगर यह पोशाक है तो पहनने की वैफसी होगी?’ लेकिन अगले ही पल वह विचार बदलता है कि ‘नहीं, इस आदमी की अलग - अलग पोशावेंफ नहीं होंगी।’ आपके अनुसार इस संदभर् में प्रेमचंद के बारे में लेखक के विचार बदलने की क्या वजहें हो सकती हैं? 5.आपने यह व्यंग्य पढ़ा। इसे पढ़कर आपको लेखक की कौन सी बातें आकष्िार्त करती हैं? 6.पाठ में ‘टीले’ शब्द का प्रयोग किन संदभो± को इंगित करने के लिए किया गया होगा? रचना और अभ्िाव्यक्ित 7.प्रेमचंद के पफटे जूते को आधार बनाकर परसाइर् जी ने यह व्यंग्य लिखा है। आप भी किसी व्यक्ित की पोशाक को आधार बनाकर एक व्यंग्य लिख्िाए। 8.आपकी दृष्िट में वेश - भूषा के प्रति लोगों की सोच में आज क्या परिवतर्न आया है? भाषा - अध्ययन 9. पाठ में आए मुहावरे छाँटिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए। 10.प्रेमचंद के व्यक्ितत्व को उभारने के लिए लेखक ने जिन विशेषणों का उपयोग किया है उनकी सूची बनाइए। पाठेतर सियता ऽ महात्मा गांधी भी अपनी वेश - भूषा के प्रति एक अलग सोच रखते थे, इसके पीछे क्या कारण रहे होंगे, पता लगाइए। ऽ महादेवी वमार् ने ‘राजेंद्र बाबू’ नामक संस्मरण में पूवर् राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद का वुफछ इसी प्रकार चित्राण किया है, उसे पढि़ए। ऽ अमृतराय लिख्िात प्रेमचंद की जीवनी ‘प्रेमचंदμकलम का सिपाही’ पुस्तक पढि़ए। ऽ एन.सी.इर्.आर.टी. द्वारा निमिर्त प्ि़ाफल्म ‘नमर्दा पुत्रा हरिशंकर परसाइर्’ देखें। शब्द - संपदा उपहास - ख्िाल्ली उड़ाना, मशाक उड़ाने वाली हँसी आग्रह - पुनः पुनः निवेदन करना क्लेश - दख ुतगादा - तकाशा पन्हैया - देशी जूतियाँ बिसरना - भूल जाना नेम - नियम धरम - कतर्व्य बंद - पफीता बेतरतीब - अव्यवस्िथत ठाठ - शान बरकाकर - बचाकर यह भी जानें वुंफभनदासμ ये भक्ितकाल की कृष्ण भक्ित शाखा के कवि थे तथा आचायर् वल्लभाचायर् के श्िाष्य और अष्टछाप के कवियों में से एक थे। एक बार बादशाह अकबर के आमंत्राण पर उनसे मिलने वे पफतेहपुर सीकरी गए थे। इसी संदभर् में कही गईं पंक्ितयों का उल्लेख लेखक ने प्रस्तुत पाठ में किया है।

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हरिशंकर परसाई 

हरिशंकर परसाई का जन्म सन् 1922 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जि़ले के जमानी गाँव में हुआ। नागपुर विश्वविद्यालय से एम०ए० करने के बाद कुछ दिनों तक अध्यापन किया। सन् 1947 से स्वतंत्र लेखन करने लगे। जबलपुर से वसुधा नामक पत्रिका निकाली, जिसकी हिंदी संसार में काफ़ी सराहना हुई। सन् 1995 में उनका निधन हो गया।

हिंदी के व्यंग्य लेखकों में उनका नाम अग्रणी है। परसाई जी की कृतियों में हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे (कहानी संग्रह), रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज (उपन्यास), तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, पगडंडियों का ज़माना, सदाचार का तावीज़, शिकायत मुझे भी है, और अंत में, (निबंध संग्रह), वैष्णव की फिसलन, तिरछी रेखाएँ, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, विकलांग श्रद्धा का दौर (व्यंग्य संग्रह) उल्लेखनीय हैं।

भारतीय जीवन के पाखंड, भ्रष्टाचार, अंतर्विरोध, बेईमानी आदि पर लिखे उनके व्यंग्य लेखों ने शोषण के विरुद्ध साहित्य की भूमिका का निर्वाह किया। उनका व्यंग्य लेखन परिवर्तन की चेतना पैदा करता है। कोरे हास्य से अलग यह व्यंग्य आदर्श के पक्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक पाखंड पर लिखे उनके व्यंग्यों ने व्यंग्य-साहित्य के मानकों का निर्माण किया। परसाई जी बोलचाल की सामान्य भाषा का प्रयोग करते हैं किंतु संरचना के अनूठेपन के कारण उनकी भाषा की मारक क्षमता बहुत बढ़ जाती है।

प्रेमचंद के फटे जूते शीर्षक निबंध में परसाई जी ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व की सादगी के साथ एक रचनाकार की अंतर्भेदी सामाजिक दृष्टि का विवेचन करते हुए आज की दिखावे की प्रवृत्ति एवं अवसरवादिता पर व्यंग्य किया है।

प्रेमचंद के फटे जूते  

प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फोटो खिंचा रहे हैं। सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं। कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियों उभर आई हैं, पर घनी मूँछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं।

पाँवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बँधे हैं। लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है। तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं।

दाहिने पाँव का जूता ठीक है, मगर बाएँ जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।

मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है। सोचता हूँ-फोटो खिंचाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी-इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फोटो में खिंच जाता है।

मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूँ। क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अँगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा नीचे खींच लेने से अँगुली ढक सकती है? मगर फिर भी तुम्हारे चेहरे पर बड़ी बेपरवाही, बड़ा विश्वास है! फोटोग्राफर ने जब ‘रेडी-प्लीज़’ कहा होगा, तब परंपरा के अनुसार तुमने मुसकान लाने की कोशिश की होगी, दर्द के गहरे कुएँ के तल में कहीं पड़ी मुसकान को धीरे-धीरे खींचकर ऊपर निकाल रहे होंगे कि बीच में ही ‘क्लिक’ करके फोटोग्राफर ने ‘थैंक यू’ कह दिया होगा। विचित्र है यह अधूरी मुसकान। यह मुसकान नहीं, इसमें उपहास है, व्यंग्य है!

यह कैसा आदमी है, जो खुद तो फटे जूते पहने फोटो खिंच रहा है, पर किसी पर हँस भी रहा है!

फोटो ही खिचाना था, तो ठीक जूते पहन लेते, या न खिचाते। फोटो न खिचाने से क्या बिगड़ता था। शायद पत्नी का आग्रह रहा हो और तुम, ‘अच्छा, चल भई’ कहकर बैठ गए होंगे। मगर यह कितनी बड़ी ‘ट्रेजडी’ है कि आदमी के पास फोटो खिचाने को भी जूता न हो। मैं तुम्हारी यह फोटो देखते-देखते, तुम्हारे क्लेश को अपने भीतर महसूस करके जैसे रो पड़ना चाहता हूँ, मगर तुम्हारी आँखों का यह तीखा दर्द भरा व्यंग्य मुझे एकदम रोक देता है।

तुम फोटो का महत्व नहीं समझते। समझते होते, तो किसी से फोटो खिचाने के लिए जूते माँग लेते। लोग तो माँगे के कोट से वर-दिखाई करते हैं। और माँगे की मोटर से बारात निकालते हैं। फोटो खिचाने के लिए तो बीवी तक माँग ली जाती है, तुमसे जूते ही माँगते नहीं बने! तुम फोटो का महत्व नहीं जानते। लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिचाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए! गंदे-से-गंदे आदमी की फोटो भी खुशबू देती है!

टोपी आठ आने में मिल जाती है और जूते उस ज़माने में भी पाँच रुपये से कम में क्या मिलते होंगे। जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं। तुम भी जूते और टोपी के आनुपातिक मूल्य के मारे हुए थे। यह विडंबना मुझे इतनी तीव्रता से पहले कभी नहीं चुभी, जितनी आज चुभ रही है, जब मैं तुम्हारा फटा जूता देख रहा हूँ। तुम महान कथाकार, उपन्यास-सम्राट, युग-प्रवर्तक, जाने क्या-क्या कहलाते थे, मगर फोटो में भी तुम्हारा जूता फटा हुआ है!

मेरा जूता भी कोई अच्छा नहीं है। यों ऊपर से अच्छा दिखता है। अँगुली बाहर नहीं निकलती, पर अँगूठे के नीचे तला फट गया है। अँगूठा ज़मीन से घिसता है और पैनी मिट्टी पर कभी रगड़ खाकर लहूलुहान भी हो जाता है। पूरा तला गिर जाएगा, पूरा पंजा छिल जाएगा, मगर अँगुली बाहर नहीं दिखेगी। तुम्हारी अँगुली दिखती है, पर पाँव सुरक्षित है। मेरी अँगुली ढँकी है, पर पंजा नीचे घिस रहा है। तुम परदे का महत्त्व ही नहीं जानते, हम परदे पर कुर्बान हो रहे हैं!

तुम फटा जूता बड़े ठाठ से पहने हो! मैं ऐसे नहीं पहन सकता। फोटो तो जि़ंदगी भर इस तरह नहीं खिचाऊँ, चाहे कोई जीवनी बिना फोटो के ही छाप दे।

तुम्हारी यह व्यंग्य-मुसकान मेरे हौसले पस्त कर देती है। क्या मतलब है इसका? कौन सी मुसकान है यह?

-क्या होरी का गोदान हो गया?

-क्या पूस की रात में नीलगाय हलकू का खेत चर गई?

-क्या सुजान भगत का लड़का मर गया_ क्योंकि डॉक्टर क्लब छोड़कर नहीं आ सकते?

नहीं, मुझे लगता है माधो औरत के कफ़न के चंदे की शराब पी गया। वही मुसकान मालूम होती है।

मैं तुम्हारा जूता फिर देखता हूँ। कैसे फट गया यह, मेरी जनता के लेखक?

क्या बहुत चक्कर काटते रहे?

क्या बनिये के तगादे से बचने के लिए मील-दो मील का चक्कर लगाकर घर लौटते रहे?

चक्कर लगाने से जूता फटता नहीं है, घिस जाता है। कुंभनदास का जूता भी फतेहपुर सीकरी जाने-आने में घिस गया था। उसे बड़ा पछतावा हुआ। उसने कहा-

‘आवत जात पन्हैया घिस गई, बिसर गयो हरि नाम।’

और ऐसे बुलाकर देने वालों के लिए कहा था-‘जिनके देखे दुख उपजत है, तिनको करबो परै सलाम!’

चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया?

मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज़ को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज़ जो परत-पर-परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आज़माया।

तुम उसे बचाकर, उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियाँ पहाड़ थोड़े ही फोड़ती हैं, कोई रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है।

तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमज़ोरी थी, जो होरी को ले डूबी, वही ‘नेम-धरम’ वाली कमज़ोरी? ‘नेम-धरम’ उसकी भी ज़ंजीर थी। मगर तुम जिस तरह मुसकरा रहे हो, उससे लगता है कि शायद ‘नेम-धरम’ तुम्हारा बंधन नहीं था, तुम्हारी मुक्ति थी!

तुम्हारी यह पाँव की अँगुली मुझे संकेत करती-सी लगती है, जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ़ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो?

तुम क्या उसकी तरफ़ इशारा कर रहे हो, जिसे ठोकर मारते-मारते तुमने जूता फाड़ लिया?

मैं समझता हूँ। तुम्हारी अँगुली का इशारा भी समझता हूँ और यह व्यंग्य-मुसकान भी समझता हूँ।

तुम मुझ पर या हम सभी पर हँस रहे हो, उन पर जो अँगुली छिपाए और तलुआ घिसाए चल रहे हैं, उन पर जो टीले को बरकाकर बाजू से निकल रहे हैं। तुम कह रहे हो-मैंने तो ठोकर मार-मारकर जूता फाड़ लिया, अँगुली बाहर निकल आई, पर पाँव बच रहा और मैं चलता रहा, मगर तुम अँगुली को ढाँकने की चिंता में तलुवे का नाश कर रहे हो। तुम चलोगे कैसे?

मैं समझता हूँ। मैं तुम्हारे फटे जूते की बात समझता हूँ, अँगुली का इशारा समझता हूँ, तुम्हारी व्यंग्य-मुसकान समझता हूँ!

प्रश्न-अभ्यास

  1. हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद का जो शब्दचित्र हमारे सामने प्रस्तुत किया है उससे प्रेमचंद के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताएँ उभरकर आती हैं?
  2. सही कथन के सामने ( ) का निशान लगाइए-

    (क) बाएँ पाँव का जूता ठीक है मगर दाहिने जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।

    (ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए।

    (ग) तुम्हारी यह व्यंग्य मुसकान मेरे हौसले बढ़ाती है।

    (घ) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ अँगूठे से इशारा करते हो?

  3. नीचे दी गई पंक्तियों में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए-

    (क) जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं।

    (ख) तुम परदे का महत्व ही नहीं जानते, हम परदे पर कुर्बान हो रहे हैं।

    (ग) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ़ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो?

  4. पाठ में एक जगह पर लेखक सोचता है कि ‘फोटो खिंचाने की अगर यह पोशाक है तो पहनने की कैसी होगी?’ लेकिन अगले ही पल वह विचार बदलता है कि ‘नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी।’ आपके अनुसार इस संदर्भ में प्रेमचंद के बारे में लेखक के विचार बदलने की क्या वजहें हो सकती हैं?
  5. आपने यह व्यंग्य पढ़ा। इसे पढ़कर आपको लेखक की कौन सी बातें आकर्षित करती हैं?
  6. पाठ में ‘टीले’ शब्द का प्रयोग किन संदर्भों को इंगित करने के लिए किया गया होगा?

    रचना और अभिव्यक्ति

  7. प्रेमचंद के फटे जूते को आधार बनाकर परसाई जी ने यह व्यंग्य लिखा है। आप भी किसी व्यक्ति की पोशाक को आधार बनाकर एक व्यंग्य लिखिए।
  8. आपकी दृष्टि में वेश-भूषा के प्रति लोगों की सोच में आज क्या परिवर्तन आया है?

    भाषा-अध्ययन

  9. पाठ में आए मुहावरे छाँटिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
  10. प्रेमचंद के व्यक्तित्व को उभारने के लिए लेखक ने जिन विशेषणों का उपयोग किया है उनकी सूची बनाइए।

पाठेतर सक्रियता

  • महात्मा गांधी भी अपनी वेश-भूषा के प्रति एक अलग सोच रखते थे, इसके पीछे क्या कारण रहे होंगे, पता लगाइए।
  • महादेवी वर्मा ने ‘राजेंद्र बाबू’ नामक संस्मरण में पूर्व राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद का कुछ इसी प्रकार चित्रण किया है, उसे पढ़िए।
  • अमृतराय लिखित प्रेमचंद की जीवनी ‘प्रेमचंद-कलम का सिपाही’ पुस्तक पढ़िए।
  • एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘नर्मदा पुत्र हरिशंकर परसाई’ देखें।

शब्द-संपदा

उपहास - खिल्ली उड़ाना, मज़ाक उड़ाने वाली हँसी

आग्रह - पुनः पुनः निवेदन करना

क्लेश - दुख

तगादा - तकाज़ा

पन्हैया - देशी जूतियाँ

बिसरना - भूल जाना

नेम - नियम

धरम - कर्तव्य

बंद - फीता

बेतरतीब - अव्यवस्थित

ठाठ - शान

बरकाकर - बचाकर

यह भी जानें

कुंभनदास- ये भक्तिकाल की कृष्ण भक्ति शाखा के कवि थे तथा आचार्य वल्लभाचार्य के शिष्य और अष्टछाप के कवियों में से एक थे। एक बार बादशाह अकबर के आमंत्रण पर उनसे मिलने वे फतेहपुर सीकरी गए थे। इसी संदर्भ में कही गईं पंक्तियों का उल्लेख लेखक ने प्रस्तुत पाठ में किया है।


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