जाबिर हुसैन जाबिर हुसैन का जन्म सन् 1945 में गाँव नौनहीं राजगीर, िाला नालंदा, बिहार में हुआ। वे अंग्रेशी भाषा एवं साहित्य के प्राध्यापक रहे। सिय राजनीति में भाग लेते हुए 1977 में मुंगेर से बिहार विधानसभा के सदस्य निवार्चित हुए और मंत्राी बने। सन् 1995 से बिहार विधान परिषद् के सभापति हैं। जाबिर हुसैन हिंदी, उदूर् तथा अंग्रेशीμतीनों भाषाओं में समान अिाकार के साथ लेखन करते रहे हैं। उनकी हिंदी रचनाओं में जो आगे हैं, डोला बीबी का मशार, अतीत का चेहरा, लोगां, एक नदी रेत भरी प्रमुख हैं। अपने लंबे राजनैतिक - सामाजिक जीवन के अनुभवों में उपस्िथत आम आदमी के संघषो± को उन्होंने अपने साहित्य में प्रकट किया है। संघषर्रत आम आदमी और विश्िाष्ट व्यक्ितत्वों पर लिखी गइर् उनकी डायरियाँ चचिर्त - प्रशंसित हुइर् हैं। जाबिर हुसैन ने डायरी विधा में एक अभ्िानव प्रयोग किया है जो अपनी प्रस्तुति, शैली और श्िाल्प में नवीन है। प्रस्तुत पाठ जून 1987 में प्रसि( पक्षी विज्ञानी सालिम अली की मृत्यु के तुरंत बाद डायरी शैली में लिखा गया संस्मरण है। सालिम अली की मृत्यु से उत्पन्न दुख और अवसाद को लेखक ने साँवले सपनों की याद के रूप में व्यक्त किया है। सालिम अली का स्मरण करते हुए लेखक ने उनका व्यक्ित - चित्रा प्रस्तुत किया है। यहाँ भाषा की रवानी और अभ्िाव्यक्ित की शैली दिल को छूती है। साँवले सपनों की याद सुनहरे परिंदों के खूबसूरत पंखों पर सवार साँवले सपनों का एक हुजूम मौत की खामोश वादी की तरप़्ाफ अग्रसर है। कोइर् रोक - टोक सके, कहाँ संभव है। इस हुजूम में आगे - आगे चल रहे हैं, सालिम अली। अपने कंधों पर, सैलानियों की तरह अपने अंतहीन सप़़़्ाफर का बोझ उठाए। लेकिन यह सपफर पिछले तमाम सपफरों से भ्िान्न है। भीड़ - भाड़ की िांदगी और तनाव के माहौल से सालिम अली का यहआख्िारी पलायन है। अब तो वो उस वन - पक्षी की तरह प्रकृति में विलीन हो रहे हैं, जो िांदगी का आख्िारी गीत गाने के बाद मौत की गोद में जा बसा हो। कोइर् अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा वैफसे गा सकेगा! मुझे नहीं लगता, कोइर् इस सोए हुए पक्षी को जगाना चाहेगा। वषो± पूवर्, खुद सालिम अली ने कहा था कि लोग पक्ष्िायों को आदमी की नशर से देखना चाहते हैं। यह उनकी भूल है, ठीक उसी तरह, जैसे जंगलों और पहाड़ों, झरनों और आबशारोंको वो प्रकृति की नशर से नहीं, आदमी की नशर से देखने को उत्सुक रहते हैं। भला कोइर् आदमी अपने कानों से पक्ष्िायों की आवाश का मधुर संगीत सुनकर अपने भीतर रोमांच का सोता पूफटता महसूस कर सकता है? एहसास की ऐसी ही एक उफबड़ - खाबड़ शमीन पर जन्मे मिथक का नाम है, सालिम अली।पता नहीं, इतिहास में कब कृष्ण ने वृंदावन में रासलीला रची थी और शोख गोपियों को अपनी शरारतों का निशाना बनाया था। कब माखन भरे भाँड़े पफोड़े थे और दूध - छाली से अपने मुँह भरे थे। कब वाटिका में, छोटे - छोटे किंतु घने पेड़ों की छाँह में विश्राम किया था। कब दिल की धड़कनों को एकदम से तेश करने वाले अंदाश में बंसी बजाइर् थी। और, पता नहीं, कब वृंदावन की पूरी दुनिया संगीतमय हो गइर् थी। पता नहीं, यह सब कब हुआ था। लेकिन कोइर् आज भी वंृदावन जाए तो नदी का साँवला पानी उसे पूरे घटना - क्रम की याद दिला देगा। हर सुबह, सूरज निकलने से पहले, जब पतली गलियों से उत्साह भरी भीड़ नदी की ओर बढ़ती है, तो लगता है जैसे उस भीड़ को चीरकर अचानक कोइर् सामने आएगा और बंसी की आवाश पर सब किसी के कदम थम जाएँगे। हर शाम सूरज ढलने से पहले, जब वाटिका का माली सैलानियों को हिदायत देगा तो लगता है जैसे बस वुफछ ही क्षणों में वो कहीं से आ टपकेगा और संगीत का जादू वाटिका के भरे - पूरे माहौल पर छा जाएगा।वृंदावन कभी कृष्ण की बाँसुरी के जादू से खाली हुआ है क्या! मिथकों की दुनिया में इस सवाल का जवाब तलाश करने से पहले एक नशर कमशोर काया वाले उस व्यक्ित पर डाली जाए जिसे हम सालिम अली के नाम से जानते हैं। उम्र को शती तक पहुँचने में थोड़े ही दिन तो बच रहे थे। संभव है, लंबी यात्राओं की थकान ने उनके शरीर को कमशोर कर दिया हो, और वैंफसर जैसी जानलेवा बीमारी उनकी मौत का कारण बनी हो। लेकिन अंतिम समय तक मौत उनकी आँखों से वह रोशनी छीनने में सपफल नहीं हुइर् जो पक्ष्िायों की तलाश और उनकी हिपफाशत के प्रति समपिर्त थी। सालिम अली की आँखों पर चढ़ी दूरबीऩउनकी मौत के बाद ही तो उतरी थी। उन जैसा ‘बडर् वाचर’ शायद ही कोइर् हुआ हो। लेकिन एकांत क्षणों में सालिम अली बिना दूरबीन भी देखे गए हैं। दूर क्ष्िातिज तक पैफली शमीन और झुके आसमान को छूने वाली उनकी नशरों में वुफछ - वुफछ वैसा ही जादू था, जो प्रकृति को अपने घेरे में बाँध लेता है। सालिम अली उन लोगों में थे जो प्रकृतिके प्रभाव में आने की बजाए प्रकृति को अपने प्रभाव में लाने के कायल होतेहैं। उनके लिए प्रकृति में हर तरप़्ाफ एक हँसती - खेलती रहस्य भरी दुनिया पसरी थी। यह दुनिया उन्होंने बड़ी मेहनत से अपने लिए गढ़ी थी। इसके गढ़ने में उनकी जीवन - साथी तहमीना ने काप़्ाफी मदद पहुँचाइर् थी। तहमीना स्वूफल के दिनों में उनकी सहपाठी रही थीं। अपने लंबे रोमांचकारी जीवन में ढेर सारे अनुभवों के मालिक सालिम अली एक दिन केरल की ‘साइलेंट वैली’ को रेगिस्तानी हवा के झोंकों से बचाने का अनुरोध लेकर चैधरी चरण सिंह से मिले थे। वे प्रधानमंत्राी थे। चैधरी साहब गाँव की मि‘ी पर पड़ने वाली पानी की पहली बूँद का असर जानने वाले नेता थे। पयार्वरण के संभावित खतरों का जो चित्रा सालिम अली ने उनके सामने रखा, उसने उनकी आँखें नम कर दी थीं। आज सालिम अली नहीं हैं। चैधरी साहब भी नहीं हैं। कौन बचा है, जो अब सोंधी माटी पर उगी पफसलों के बीच एक नए भारत की नींव रखने का संकल्प लेगा? कौन बचा है, जो अब हिमालय और लद्दाख की बऱपफीली शमीनों पर जीने वाले पक्ष्िायों की वकालत करेगा? सालिम अली ने अपनी आत्मकथा का नाम रखा था ‘पफाॅल आॅपफ ए स्पैरो’ ;थ्ंसस व िं ैचंततवूद्ध। मुझे याद आ गया, डी एच लाॅरेंस की मौत के बाद लोगों ने उनकी पत्नी प्रफीडा लाॅरेंस से अनुरोध किया कि वह अपने पति के बारे में वुफछ लिखे। प्रफीडा चाहती तो ढेर सारी बातें लाॅरेंस के बारे में लिख सकती थी। लेकिन उसने कहाμमेरे लिए लाॅरेंस के बारे में वुफछ लिखना असंभव - सा है। मुझे महसूस होता है, मेरी छत पर बैठने वाली गोरैया लाॅरेंस के बारे मंे ढेर सारी बातें जानती है। मुेझसभी श्यादा जानती है। वो सचमुच इतना खुला - खुला और सादा - दिल आदमी था। मुमकिन है, लाॅरेंस मेरी रगों में, मेरी हंियों में समाया हो। लेकिन मेरे लिए कितना कठिन है, उसके बारे में अपने अनुभवों को शब्दों का जामा पहनाना। मुझे यकीन है, मेरी छत पर बैठी गौरैया उसके बारे में, और हम दोनों ही के बारे में, मुझसे श्यादा जानकारी रखती है। जटिल प्राण्िायों के लिए सालिम अली हमेशा एक पहेली बने रहेंगे। बचपन के दिनों में, उनकी एयरगन से घायल होकर गिरने वाली, नीले वंफठ की वह गौरैया सारी िांदगी उन्हें खोज के नए - नए रास्तों की तरप़्ाफ ले जाती रही। िांदगी की उँफचाइयों में उनका विश्वास एक क्षण के लिए भी डिगा नहीं। वो लाॅरेंस की तरह, नैसगिर्क िांदगी का प्रतिरूप बन गये थे। सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाए अथाह सागर बनकर उभरे थे। जो लोग उनके भ्रमणशील स्वभाव और उनकी यायावरी से परिचित हैं, उन्हें महसूस होता है कि वो आज भी पक्ष्िायों के सुराग में ही निकले हैं, और बस अभी गले में लंबी दूरबीन लटकाए अपने खोजपूणर् नतीजों के साथ लौट आएँगे। जब तक वो नहीं लौटते, क्या उन्हें गया हुआ मान लिया जाए! मेरी आँखें नम हैं, सालिम अली, तुम लौटोगे ना! प्रश्न - अभ्यास 1.किस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया और उन्हें पक्षी प्रेमी बना दिया? 2.सालिम अली ने पूवर् प्रधानमंत्राी के सामने पयार्वरण से संबंिात किन संभावित खतरों का चित्रा खींचा होगा कि जिससे उनकी आँखें नम हो गइर् थीं? 3.लाॅरेंस की पत्नी प्रफीडा ने ऐसा क्यों कहा होेगा कि फ्मेरी छत पर बैठने वाली गोरैया लाॅरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है?य् 4.आशय स्पष्ट कीजिएμ ;कद्ध वो लाॅरेंस की तरह, नैसगिर्क िांदगी का प्रतिरूप बन गए थे। ;खद्ध कोइर् अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा वैफसे गा सकेगा! ;गद्ध सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाए अथाह सागर बनकर उभरे थे। 5.इस पाठ के आधार पर लेखक की भाषा - शैली की चार विशेषताएँ बताइए। 6.इस पाठ में लेखक ने सालिम अली के व्यक्ितत्व का जो चित्रा खींचा है उसे अपने शब्दों में लिख्िाए। 7.‘साँवले सपनों की याद’ शीषर्क की साथर्कता पर टिप्पणी कीजिए। रचना और अभ्िाव्यक्ित 8.प्रस्तुत पाठ सालिम अली की पयार्वरण के प्रति चिंता को भी व्यक्त करता है। पयार्वरण को बचाने के लिए आप वैफसे योगदान दे सकते हैं? पाठेतर सियता ऽ अपने घर या विद्यालय के नशदीक आपको अकसर किसी पक्षी को देखने का मौका मिलता होगा। उस पक्षी का नाम, भोजन, खाने का तरीका, रहने की जगह और अन्य पक्ष्िायों से संबंध आदि के आधार पर एक चित्रात्मक विवरण तैयार करें। ऽ आपकी और आपके सहपाठियों की मातृभाषा में पक्ष्िायों से संबंिात बहुत से लोकगीत होंगे। उन भाषाओं के लोकगीतों का एक संकलन तैयार करें। आपकी मदद के लिए एक लोकगीत दिया जा रहा हैμ अरे अरे श्यामा चिरइया झरोखवै मति बोलहु। मोरी चिरइर्! अरी मोरी चिरइर्! सिरकी भ्िातर बनिजरवा। जगाइर् लइ आवउ, मनाइ लइ आवउ।।1।। कवने बरन उनकी सिरकी कवने रँग बरदी। बहिनी! कवने बरन बनिजरवा जगाइ लै आइर् मनाइ लै आइर्।।2।। जरद बरन उनकी सिरकी उजले रंग बरदी। सँवर बरन बनिजरवा जगाइ लै आवउ मनाइ लै आवउ।।3!! ऽ विभ्िान्न भाषाओं में प्राप्त पक्ष्िायों से संबंिात लोकगीतों का चयन करके एक संगीतात्मक प्रस्तुति दें। ऽ टीवी के विभ्िान्न चैनलों जैसेμएनिमल ¯कगडम, डिस्कवरी चैनल, एनिमल प्लेनेट आदि पर दिखाए जाने वाले कायर्क्रमों को देखकर किसी एक कायर्क्रम के बारे में अपनी प्रतििया लिख्िात रूप में व्यक्त करें। ऽ एन.सी.इर्.आर.टी. का श्रव्य कायर्क्रम सुनंेμ‘डा. सालिम अली’ शब्द - संपदा गढ़ना - बनाना हुजूम - जनसमूह, भीड़ वादी - घाटी सोंधी - सुगंिात, मि‘ी पर पानी पड़ने से उठने वाली गंध पलायन - दूसरी जगह चले जाना, भागना नैर् - सहज, स्वाभाविकसगिक हरारत - उष्णता या गमीर् आबशार - निझर्र, झरना मिथक - प्राचीन पुराकथाओं का तत्व, जो नवीन स्िथतियों में नए अथर् का वहन करता है। शोख - चंचल शती - सौ वषर् का समय यह भी जानें प्रसि( पक्षी विज्ञानी सालिम अली का जन्म 12 नवंबर 1896 में हुआ और मृत्यु 20 जून 1987 में। उन्होंने पफाॅल आॅपफ ए स्प़ैरो नाम से अपनी आत्मकथा लिखी है जिसमें पक्ष्िायों से संबंिात रोमांचक किस्से हैं। एक गौरैया का गिरना शीषर्क से इसका हिंदी अनुवाद नेशनल बुक ट्रस्ट ने प्रकाश्िात किया है। डी.एच. लाॅरेंस ;1885 - 1930द्ध 20वीं सदी के अंग्रेशी के प्रसि( उपन्यासकार। उन्होंनेकविताएँ भी लिखी हैं, विशेषकर प्रकृति संबंधी कविताएँ उल्लेखनीय हैं। प्रकृति से डी.एच. लाॅरेंस का गहरा लगाव था और सघन संबंध भी। वे मानते थे कि मानव जाति एक उखड़े हुए महान वृक्ष की भाँति है, जिसकी जड़ें हवा में पैफली हुइर् हैं। वे यह भी मानते थे कि हमारा प्रकृति की ओर लौटना शरूरी है।

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जाबिर हुसैन  

जाबिर हुसैन का जन्म सन् 1945 में गाँव नौनहीं राजगीर, जि़ला नालंदा, बिहार में हुआ। वे अंग्रेज़ी भाषा एवं साहित्य के प्राध्यापक रहे। सक्रिय राजनीति में भाग लेते हुए 1977 में मुंगेर से बिहार विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए और मंत्री बने। सन् 1995 से बिहार विधान परिषद् के सभापति हैं।

जाबिर हुसैन हिंदी, उर्दू तथा अंग्रेज़ी-तीनों भाषाओं में समान अधिकार के साथ लेखन करते रहे हैं। उनकी हिंदी रचनाओं में जो गे हैं, डोला बीबी का मज़ार, अतीत का चेहरा, लोगां, एक नदी रेत भरी प्रमुख हैं।

अपने लंबे राजनैतिक-सामाजिक जीवन के अनुभवों में उपस्थित आम आदमी के संघर्षों को उन्होंने अपने साहित्य में प्रकट किया है। संघर्षरत आम आदमी और विशिष्ट व्यक्तित्वों पर लिखी गई उनकी डायरियाँ चर्चित-प्रशंसित हुई हैं। जाबिर हुसैन ने डायरी विधा में एक अभिनव प्रयोग किया है जो अपनी प्रस्तुति, शैली और शिल्प में नवीन है।

प्रस्तुत पाठ जून 1987 में प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालिम अली की मृत्यु के तुरंत बाद डायरी शैली में लिखा गया संस्मरण है। सालिम अली की मृत्यु से उत्पन्न दुख और अवसाद को लेखक ने साँवले सपनों की याद के रूप में व्यक्त किया है। सालिम अली का स्मरण करते हुए लेखक ने उनका व्यक्ति-चित्र प्रस्तुत किया है। यहाँ भाषा की रवानी और अभिव्यक्ति की शैली दिल को छूती है।

साँवले सपनों की याद 

सुनहरे परिंदों के खूबसूरत पंखों पर सवार साँवले सपनों का एक हुजूम मौत की खामोश वादी की तरफ़ अग्रसर है। कोई रोक-टोक सके, कहाँ संभव है।

इस हुजूम में आगे-आगे चल रहे हैं, सालिम अली। अपने कंधों पर, सैलानियों की तरह अपने अंतहीन सफ़र का बोझ उठाए। लेकिन यह सफ़र पिछले तमाम सफ़रों से भिन्न है। भीड़-भाड़ की जि़ंदगी और तनाव के माहौल से सालिम अली का यह आखिरी पलायन है। अब तो वो उस वन-पक्षी की तरह प्रकृति में विलीन हो रहे हैं, जो जि़ंदगी का आखिरी गीत गाने के बाद मौत की गोद में जा बसा हो। कोई अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा कैसे गा सकेगा!

मुझे नहीं लगता, कोई इस सोए हुए पक्षी को जगाना चाहेगा। वर्षों पूर्व, खुद सालिम अली ने कहा था कि लोग पक्षियों को आदमी की नज़र से देखना चाहते हैं। यह उनकी भूल है, ठीक उसी तरह, जैसे जंगलों और पहाड़ों, झरनों और आबशारों को वो प्रकृति की नज़र से नहीं, आदमी की नज़र से देखने को उत्सुक रहते हैं। भला कोई आदमी अपने कानों से पक्षियों की आवाज़ का मधुर संगीत सुनकर अपने भीतर रोमांच का सोता फूटता महसूस कर सकता है?

एहसास की ऐसी ही एक ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर जन्मे मिथक का नाम है, सालिम अली।

पता नहीं, इतिहास में कब कृष्ण ने वृंदावन में रासलीला रची थी और शोख गोपियों को अपनी शरारतों का निशाना बनाया था। कब माखन भरे भाँड़े फोड़े थे और दूध-छाली से अपने मुँह भरे थे। कब वाटिका में, छोटे-छोटे किंतु घने पेड़ों की छाँह में विश्राम किया था। कब दिल की धड़कनों को एकदम से तेज़ करने वाले अंदाज़ में बंसी बजाई थी। और, पता नहीं, कब वृंदावन की पूरी दुनिया संगीतमय हो गई थी। पता नहीं, यह सब कब हुआ था। लेकिन कोई आज भी वृंदावन जाए तो नदी का साँवला पानी उसे पूरे घटना-क्रम की याद दिला देगा। हर सुबह, सूरज निकलने से पहले, जब पतली गलियों से उत्साह भरी भीड़ नदी की ओर बढ़ती है, तो लगता है जैसे उस भीड़ को चीरकर अचानक कोई सामने आएगा और बंसी की आवाज़ पर सब किसी के कदम थम जाएँगे। हर शाम सूरज ढलने से पहले, जब वाटिका का माली सैलानियों को हिदायत देगा तो लगता है जैसे बस कुछ ही क्षणों में वो कहीं से आ टपकेगा और संगीत का जादू वाटिका के भरे-पूरे माहौल पर छा जाएगा। वृंदावन कभी कृष्ण की बाँसुरी के जादू से खाली हुआ है क्या!

मिथकों की दुनिया में इस सवाल का जवाब तलाश करने से पहले एक नज़र कमज़ोर काया वाले उस व्यक्ति पर डाली जाए जिसे हम सालिम अली के नाम से जानते हैं। उम्र को शती तक पहुँचने में थोड़े ही दिन तो बच रहे थे। संभव है, लंबी यात्राओं की थकान ने उनके शरीर को कमज़ोर कर दिया हो, और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी उनकी मौत का कारण बनी हो। लेकिन अंतिम समय तक मौत उनकी आँखों से वह रोशनी छीनने में सफल नहीं हुई जो पक्षियों की तलाश और उनकी हिफ़ाज़त के प्रति समर्पित थी। सालिम अली की आँखों पर चढ़ी दूरबीन उनकी मौत के बाद ही तो उतरी थी।

उन जैसा ‘बर्ड वाचर’ शायद ही कोई हुआ हो। लेकिन एकांत क्षणों में सालिम अली बिना दूरबीन भी देखे गए हैं। दूर क्षितिज तक फैली ज़मीन और झुके आसमान को छूने वाली उनकी नज़रों में कुछ-कुछ वैसा ही जादू था, जो प्रकृति को अपने घेरे में बाँध लेता है। सालिम अली उन लोगों में थे जो प्रकृति के प्रभाव में आने की बजाए प्रकृति को अपने प्रभाव में लाने के कायल होते हैं। उनके लिए प्रकृति में हर तरफ़ एक हँसती-खेलती रहस्य भरी दुनिया पसरी थी। यह दुनिया उन्होंने बड़ी मेहनत से अपने लिए गढ़ी थी। इसके गढ़ने में उनकी जीवन-साथी तहमीना ने काफ़ी मदद पहुँचाई थी। तहमीना स्कूल के दिनों में उनकी सहपाठी रही थीं।

अपने लंबे रोमांचकारी जीवन में ढेर सारे अनुभवों के मालिक सालिम अली एक दिन केरल की ‘साइलेंट वैली’ को रेगिस्तानी हवा के झोंकों से बचाने का अनुरोध लेकर चौधरी चरण सिंह से मिले थे। वे प्रधानमंत्री थे। चौधरी साहब गाँव की मिट्टी पर पड़ने वाली पानी की पहली बूँद का असर जानने वाले नेता थे। पर्यावरण के संभावित खतरों का जो चित्र सालिम अली ने उनके सामने रखा, उसने उनकी आँखें नम कर दी थीं।

आज सालिम अली नहीं हैं। चौधरी साहब भी नहीं हैं। कौन बचा है, जो अब सोंधी माटी पर उगी फसलों के बीच एक नए भारत की नींव रखने का संकल्प लेगा? कौन बचा है, जो अब हिमालय और लद्दाख की बर फैली ज़मीनों पर जीने वाले पक्षियों की वकालत करेगा?

सालिम अली ने अपनी आत्मकथा का नाम रखा था ‘फॉल ऑफ ए स्पैरो’ (Fall of a Sparrow)। मुझे याद आ गया, डी एच लॉरेंस की मौत के बाद लोगों ने उनकी पत्नी फ्रीडा लॉरेंस से अनुरोध किया कि वह अपने पति के बारे में कुछ लिखे। फ्रीडा चाहती तो ढेर सारी बातें लॉरेंस के बारे में लिख सकती थी। लेकिन उसने कहा-मेरे लिए लॉरेंस के बारे में कुछ लिखना असंभव-सा है। मुझे महसूस होता है, मेरी छत पर बैठने वाली गोरैया लॉरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है। मुझसे भी ज़्यादा जानती है। वो सचमुच इतना खुला-खुला और सादा-दिल आदमी था। मुमकिन है, लॉरेंस मेरी रगों में, मेरी हड्डियों में समाया हो। लेकिन मेरे लिए कितना कठिन है, उसके बारे में अपने अनुभवों को शब्दों का जामा पहनाना। मुझे यकीन है, मेरी छत पर बैठी गौरैया उसके बारे में, और हम दोनों ही के बारे में, मुझसे ज़्यादा जानकारी रखती है।

सालिम अली

जटिल प्राणियों के लिए सालिम अली हमेशा एक पहेली बने रहेंगे। बचपन के दिनों में, उनकी एयरगन से घायल होकर गिरने वाली, नीले कंठ की वह गौरैया सारी जि़ंदगी उन्हें खोज के नए-नए रास्तों की तरफ़ ले जाती रही। जि़ंदगी की ऊँचाइयों में उनका विश्वास एक क्षण के लिए भी डिगा नहीं। वो लॉरेंस की तरह, नैसर्गिक जि़ंदगी का प्रतिरूप बन गये थे।

सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाए अथाह सागर बनकर उभरे थे। जो लोग उनके भ्रमणशील स्वभाव और उनकी यायावरी से परिचित हैं, उन्हें महसूस होता है कि वो आज भी पक्षियों के सुराग में ही निकले हैं, और बस अभी गले में लंबी दूरबीन लटकाए अपने खोजपूर्ण नतीजों के साथ लौट आएँगे।

जब तक वो नहीं लौटते, क्या उन्हें गया हुआ मान लिया जाए!

मेरी आँखें नम हैं, सालिम अली, तुम लौटोगे ना!

प्रश्न-अभ्यास

  1. किस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया और उन्हें पक्षी प्रेमी बना दिया?
  2. सालिम अली ने पूर्व प्रधानमंत्री के सामने पर्यावरण से संबंधित किन संभावित खतरों का चित्र खींचा होगा कि जिससे उनकी आँखें नम हो गई थीं?
  3. लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा ने ऐसा क्यों कहा होेगा कि "मेरी छत पर बैठने वाली गोरैया लॉरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है?"
  4. आशय स्पष्ट कीजिए-

    (क) वो लॉरेंस की तरह, नैसर्गिक जि़ंदगी का प्रतिरूप बन गए थे।

    (ख) कोई अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा कैसे गा सकेगा!

    (ग) सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाए अथाह सागर बनकर उभरे थे।

  5. इस पाठ के आधार पर लेखक की भाषा-शैली की चार विशेषताएँ बताइए।
  6. इस पाठ में लेखक ने सालिम अली के व्यक्तित्व का जो चित्र खींचा है उसे अपने शब्दों में लिखिए।
  7. ‘साँवले सपनों की याद’ शीर्षक की सार्थकता पर टिप्पणी कीजिए।

    रचना और अभिव्यक्ति

  8. प्रस्तुत पाठ सालिम अली की पर्यावरण के प्रति चिंता को भी व्यक्त करता है। पर्यावरण को बचाने के लिए आप कैसे योगदान दे सकते हैं?

पाठेतर सक्रियता

  • अपने घर या विद्यालय के नज़दीक आपको अकसर किसी पक्षी को देखने का मौका मिलता होगा। उस पक्षी का नाम, भोजन, खाने का तरीका, रहने की जगह और अन्य पक्षियों से संबंध आदि के आधार पर एक चित्रात्मक विवरण तैयार करें।
  • आपकी और आपके सहपाठियों की मातृभाषा में पक्षियों से संबंधित बहुत से लोकगीत होंगे। उन भाषाओं के लोकगीतों का एक संकलन तैयार करें। आपकी मदद के लिए एक लोकगीत दिया जा रहा है-

    अरे अरे श्यामा चिरइया झरोखवै मति बोलहु।
    मोरी चिरई! अरी मोरी चिरई! सिरकी भितर बनिजरवा।
    जगाई लइ आवउ, मनाइ लइ आवउ।।1।।
    कवने बरन उनकी सिरकी कवने रँग बरदी।
    बहिनी! कवने बरन बनिजरवा जगाइ लै आई मनाइ लै आई।।2।।
    जरद बरन उनकी सिरकी उजले रंग बरदी।
    सँवर बरन बनिजरवा जगाइ लै आवउ मनाइ लै आवउ।।3!!

  • विभिन्न भाषाओं में प्राप्त पक्षियों से संबंधित लोकगीतों का चयन करके एक संगीतात्मक प्रस्तुति दें।
  • टीवी के विभिन्न चैनलों जैसे-एनिमल किगडम, डिस्कवरी चैनल, एनिमल प्लेनेट आदि पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों को देखकर किसी एक कार्यक्रम के बारे में अपनी प्रतिक्रिया लिखित रूप में व्यक्त करें।
  • एन.सी.ई.आर.टी. का श्रव्य कार्यक्रम सुनें-‘डा. सालिम अली’

शब्द-संपदा

गढ़ना - बनाना

हुजूम - जनसमूह, भीड़

वादी - घाटी

सोंधी - सुगंधित, मिट्टी पर पानी पड़ने से उठने वाली गंध

पलायन - दूसरी जगह चले जाना, भागना

नैसर्गिक - सहज, स्वाभाविक

हरारत - उष्णता या गर्मी

आबशार - निर्झर, झरना

मिथक - प्राचीन पुराकथाओं का तत्व, जो नवीन स्थितियों में नए अर्थ का वहन करता है।

शोख - चंचल

शती - सौ वर्ष का समय

यह भी जानें

प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालिम अली का जन्म 12 नवंबर 1896 में हुआ और मृत्यु 20 जून 1987 में। उन्होंने फ़ॉल ऑफ ए स्पैरो नाम से अपनी आत्मकथा लिखी है जिसमें पक्षियों से संबंधित रोमांचक किस्से हैं। एक गौरैया का गिरना शीर्षक से इसका हिंदी अनुवाद नेशनल बुक ट्रस्ट ने प्रकाशित किया है।

डी.एच. लॉरेंस (1885-1930) 20वीं सदी के अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध उपन्यासकार। उन्होंने कविताएँ भी लिखी हैं, विशेषकर प्रकृति संबंधी कविताएँ उल्लेखनीय हैं। प्रकृति से डी.एच. लॉरेंस का गहरा लगाव था और सघन संबंध भी। वे मानते थे कि मानव जाति एक उखड़े हुए महान वृक्ष की भाँति है, जिसकी जड़ें हवा में फैली हुई हैं। वे यह भी मानते थे कि हमारा प्रकृति की ओर लौटना ज़रूरी है।

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