राहुल सांकृत्यायन राहुल सांकृत्यायन का जन्म सन् 1893 में उनके ननिहाल गाँव पंदहा, िाला आशमगढ़ ;उत्तर प्रदेशद्ध मंे हुआ। उनका पैतृक गाँव कनैला था। उनका मूल नाम केदार पांडेय था। उनकी श्िाक्षा काशी, आगरा और लाहौर में हुइर्। सन् 1930 में उन्होंने श्रीलंका जाकर बौ( धमर् ग्रहण कर लिया। तबसे उनका नाम राहुल सांकृत्यायन हो गया। राहुल जी पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, तिब्बती, चीनी, जापानी, रूसी सहित अनेक भाषाओं के जानकार थे। उन्हें महापंडित कहा जाता था। सन् 1963 में उनका देहांत हो गया। राहुल सांकृत्यायन ने उपन्यास, कहानी, आत्मकथा, यात्रावृत्त, जीवनी, आलोचना, शोध आदि अनेक विधाओं में साहित्य - सृजन किया। इतना ही नहीं उन्होंने अनेक ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद भी किया। मेरी जीवन यात्रा ;छह भागद्ध, दशर्न - दिग्दशर्न, बाइसवीं सदी, वोल्गा से गंगा, भागो नहीं दुनिया को बदलो, दिमागी गुलामी, घुमक्कड़ शास्त्रा उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। साहित्य के अलावा दशर्न, राजनीति, धमर्, इतिहास, विज्ञान आदि विभ्िान्न विषयों पर राहुल जी द्वारा रचित पुस्तकों की संख्या लगभग 150 है। राहुल जी ने बहुत सी लुप्तप्राय सामग्री का उ(ार कर अत्यंत महत्वपूणर् कायर् किया है। यात्रावृत्त लेखन में राहुल जी का स्थान अन्यतम है। उन्होंने घुमक्कड़ी का शास्त्रा रचा और उससे होने वाले लाभों का विस्तार से वणर्न करते हुए मंिाल के स्थान पर यात्रा को ही घुमक्कड़ का उद्देश्य बताया। घुमक्कड़ी से मनोरंजन, ज्ञानवधर्न एवं अज्ञात स्थलों की जानकारी के साथ - साथ भाषा एवं संस्कृति का भी आदान - प्रदान होता है। राहुल जी ने विभ्िान्न स्थानों के भौगोलिक वणर्न के अतिरिक्त वहाँ के जन - जीवन की सुंदर झाँकी प्रस्तुत की है। संकलित अंश राहुल जी की प्रथम तिब्बत यात्रा से लिया गया है जो उन्होंने सन् 1929 - 30 में नेपाल के रास्ते की थी। उस समय भारतीयों को तिब्बत यात्रा की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने यह यात्रा एक भ्िाखमंगे के छद्म वेश में की थी। इसमें तिब्बत की राजधानी ल्हासा की ओर जाने वाले दुगर्म रास्तों का वणर्न उन्होंने बहुत ही रोचक शैली में किया है। इस यात्रा - वृत्तांत से हमें उस समय के तिब्बती समाज के बारे में भी जानकारी मिलती है। ल्हासा की ओर वह नेपाल से तिब्बत जाने का मुख्य रास्ता है। पफरी - कलिघ्पोघ् का रास्ता जब नहीं खुला था, तो नेपाल ही नहीं हिंदुस्तान की भी चीशें इसी रास्ते तिब्बत जाया करती थीं। यह व्यापारिक ही नहीं सैनिक रास्ता भी था, इसीलिए जगह - जगह प़्ाफौजी चैकियाँ और किले बने हुए हैं, जिनमें कभी चीनी पलटन रहा करती थी। आजकल बहुत से प़्ाफौजी मकान गिर चुके हैं। दुगर् के किसी भाग में, जहाँ किसानों ने अपना बसेरा बना लिया है, वहाँ घर वुफछ आबाद दिखाइर् पड़ते हैं। ऐसा ही परित्यक्त एक चीनी किला था। हम वहाँ चाय पीने के लिए ठहरे। तिब्बत में यात्रिायों के लिए बहुत सी तकलीप़्ोंफ भी हैं और वुफछ आराम की बातें भी। वहाँ जाति - पाँति, छुआछूत का सवाल ही नहीं है और न औरतें परदा ही करती हैं। बहुत निम्नश्रेणी के भ्िाखमंगों को लोग चोरी के डर से घर के भीतर नहीं आने देतेऋ नहीं तो आप बिलवुफल घर के भीतर चले जा सकते हैं। चाहे आप बिलवुफल अपरिचित हों, तब भी घर की बहू या सासु को अपनी झोली में से चाय दे सकते हैं। वह आपके लिए उसे पका देगी। मक्खन और सोडा - नमक दे दीजिए, वह चाय चोघी में वूफटकर उसे दूधवाली चाय के रंग की बना के मि‘ी के टोटीदार बरतन ;खोटीद्ध में रखके आपको दे देगी। यदि बैठक की जगह चूल्हे से दूर है और आपको डर है कि सारा मक्खन आपकी चाय में नहीं पड़ेगा, तो आप खुद जाकर चोघी में चाय मथकर ला सकते हैं। चाय का रंग तैयार हो जाने पर पिफर नमक - मक्खन डालने की शरूरत होती है। परित्यक्त चीनी किले से जब हम चलने लगे, तो एक आदमी राहदारी माँगने आया। हमने वह दोनों चिटें उसे दे दीं। शायद उसी दिन हम थोघ्ला के पहले के आख्िारी गाँव में पहुँच गए। यहाँ भी सुमति के जान - पहचान के आदमी थे और भ्िाखमंगेे रहते भी ठहरने के लिए अच्छी जगह मिली। पाँच साल बाद हम इसी रास्ते लौटे थे और भ्िाखमंगे नहीं, एक भद्र यात्राी के वेश में घोड़ों पर सवार होकर आए थेऋ विंफतु उस वक्त किसी ने हमें रहने के लिए जगह नहीं दी, और हम गाँव के एक सबसे गरीब झोपड़े में ठहरे थे। बहुत वुफछ लोगों की उस वक्त की मनोवृिा पर ही निभर्र है, खासकर शाम के वक्त छघ् पीकर बहुत कम होश - हवास को दुरुस्त रखते हैं। अब हमें सबसे विकट डाँड़ा थोघ्ला पार करना था। डाँड़े तिब्बत में सबसे खतरे की जगहें हैं। सोलह - सत्राह हशार पफीट की उफँचाइर् होने के कारण उनके दोनों तरपफ़मीलों तक कोइर् गाँव - गिराँव नहीं होते। नदियों के मोड़ और पहाड़ों के कोनों के कारण बहुत दूर तक आदमी को देखा नहीं जा सकता। डावुफओं के लिए यही सबसे अच्छी जगह है। तिब्बत में गाँव में आकर खून हो जाए, तब तो खूनी को सशा भी मिल सकती है, लेकिन इन निजर्न स्थानों में मरे हुए आदमियों के लिए कोइर् परवाह नहीं करता। सरकार खुप्ि़ाफया - विभाग और पुलिस पर उतना खचर् नहीं करती और वहाँ गवाह भी तो कोइर् नहीं मिल सकता। डवैफत पहिले आदमी को मार डालते हैं, उसके बाद देखते हैं कि वुफछ पैसा है कि नहीं। हथ्िायार का कानून न रहने के कारण यहाँ लाठी की तरह लोग पिस्तौल, बंदूक लिए पिफरते हैं। डावूफ यदि जान से न मारे तो खुद उसे अपने प्राणों का खतरा है। गाँव मंे हमें मालूम हुआ कि पिछले ही साल थोघ्ला के पास खून हो गया। शायद खून की हम उतनी परवाह नहीं करते, क्योंकि हम भ्िाखमंगे थे और जहाँ - कहीं वैसी सूरत देखते, टोपी उतार जीभ निकाल, फ्वुफची - वुफची ;दया - दयाद्ध एक पैसाय् कहते भीख माँगने लगते। लेकिन पहाड़ की उफँची चढ़ाइर् थी, पीठ पर सामान लादकर वैफसे चलते? और अगला पड़ाव 16 - 17 मील से कम नहीं था। मैंने सुमति से कहा कि यहाँ से लघ्कोर तक के लिए दो घोड़े कर लो, सामान भी रख लेंगे और चढ़े चलेंगे। दूसरे दिन हम घोड़ों पर सवार होकर उफपर की ओर चले। डाँड़े से पहिले एक जगह चाय पी और दोपहर के वक्त डाँड़े के उफपर जा पहुँचे। हम समुद्रतल से 17 - 18 हशार पफीट उफँचे खड़े थे। हमारी दक्िखन तरप़्ाफ पूरब से पच्िछम की ओर हिमालय के हशारों श्वेत श्िाखर चले गए थे। भीटे की ओर दीखने वाले पहाड़ बिलवुफल नंगे थे, न वहाँ बरप़़्ाफ की सपेफदी थी, न किसी तरह की हरियाली। उत्तर की तरप़़्ाफ बहुत कम बरपफ वाली चोटियाँ दिखाइर् पड़ती थीं। सवोर्च्च स्थान पर डाँड़े के देवता का स्थान था, जो पत्थरों के ढेर, जानवरों की सींगों और रंग - बिरंगे कपड़े की झंडियों से सजाया गया था। अब हमें बराबर उतराइर् पर चलना था। चढ़ाइर् तो वुफछ दूर थोड़ी मुश्िकल थी, लेकिन उतराइर् बिलवुफल नहीं। शायद दो - एक और सवार साथी हमारे साथ चल रहे थे। मेरा घोड़ा वुफछ धीमे चलने लगा। मैंने समझा कि चढ़ाइर् की थकावट के कारण ऐसा कर रहा है, और उसे मारना नहीं चाहता था। धीरे - धीरे वह बहुत पिछड़ गया और मैं दोन्िक्वक्स्तो की तरह अपने घोड़े पर झूमता हुआ चला जा रहा था। जान नहीं पड़ता था कि घोड़ा आगे जा रहा है या पीछे। जब मैं शोर देने लगता, तो वह और सुस्त पड़ जाता। एक जगह दो रास्ते पूफट रहे थे, मैं बाएँ का रास्ता ले मील - डेढ़ मील चला गया। आगे एक घर में पूछने से पता लगा कि लघ्कोर का रास्ता दाहिने वाला था। पिफर लौटकर उसी को पकड़ा। चार - पाँच बजे के करीब मैं गाँव से मील - भर पर था, तो सुमति इंतशार करते हुए मिले। मंगोलों का मुँह वैसे ही लाल होता है और अब तो वह पूरे गुस्से में थे। उन्होंने कहा - फ्मैंने दो टोकरी वंफडे पूँफ डाले, तीन - तीन बार चाय को गरम किया।य् मैंने बहुत नरमी से जवाब दिया - फ्लेकिन मेरा कसूर नहीं है मित्रा! देख नहीं रहे हो, वैफसा घोड़ा मुझे मिला है! मैं तो रात तक पहुँचने की उम्मीद रखता था।य् खैर, सुमति को जितनी जल्दी गुस्सा आता था, उतनी ही जल्दी वह ठंडा भी हो जाता था। लघ्कोर में वह एक अच्छी जगह पर ठहरे थे। यहाँ भी उनके अच्छे यजमान थे। पहिले चाय - सत्तू खाया गया, रात को गरमागरम थुक्पा मिला। अब हम तिघ्री के विशाल मैदान में थे, जो पहाड़ों से घ्िारा टापू - सा मालूम होता था, जिसमें दूर एक छोटी - सी पहाड़ी मैदान के भीतर दिखाइर् पड़ती है। उसी पहाड़ी का नाम है तिघ्री - समािा - गिरि। आसपास के गाँव में भी सुमति के कितने ही यजमान थे, कपड़े की पतली - पतली चिरी बिायों के गंडे खतम नहीं हो सकते थे, क्योंकि बोधगया से लाए कपड़े के खतम हो जाने पर किसी कपड़े से बोधगया का गंडा बना लेते थे। वह अपने यजमानों के पास जाना चाहते थे। मैंने सोचा, यह तो हफ्रता - भर उधर ही लगा देंगे। मैंने उनसे कहा कि जिस गाँव में ठहरना हो, उसमें भले ही गंडे बाँट दो, मगर आसपास के गाँवों में मत जाओऋ इसके लिए मैं तुम्हें ल्हासा पहुँचकर रुपये दे दूँगा। सुमति ने स्वीकार किया। दूसरे दिन हमने भरिया ढूँढ़ने की कोश्िाश की, लेकिन कोइर् न मिला। सवेरे ही चल दिए होते तो अच्छा था, लेकिन अब 10 - 11 बजे की तेश धूप में चलना पड़ रहा था। तिब्बत की धूप भी बहुत कड़ी मालूम होती है, यद्यपि थोड़े से भी मोटे कपड़े से सिर को ढाँक लें, तो गरमी खतम हो जाती है। आप 2 बजे सूरज की ओर मुँह करके चल रहे हैं, ललाट धूप से जल रहा है और पीछे का कंधा बरप़्ाफ हो रहा है। पिफर हमने पीठ पर अपनी - अपनी चीशें लादी, डंडा हाथ में लिया और चल पड़े। यद्यपि सुमति के परिचित तिघ्री में भी थे, लेकिन वह एक और यजमान से मिलना चाहते थे, इसलिए आदमी मिलने का बहाना कर शेकर विहार की ओर चलने के लिए कहा। तिब्बत की शमीन बहुत अिाक छोटे - बड़े जागीरदारों में बँटी है। इन जागीरों का बहुत श्यादा हिस्सा मठों ;विहारोंद्ध के हाथ में है। अपनी - अपनी जागीर में हरेक जागीरदार वुफछ खेती खुद भी कराता है, जिसके लिए मशदूर बेगार में मिल जाते हैं। खेती का इंतशाम देखने के लिए वहाँ कोइर् भ्िाक्षु भेजा जाता है, जो जागीर के आदमियों के लिए राजा से कम नहीं होता। शेकर की खेती के मुख्िाया भ्िाक्षु ;नम्सेद्ध बड़े भद्र पुरुष थे। वह बहुत प्रेम से मिले, हालाँकि उस वक्त मेरा भेष ऐसा नहीं था कि उन्हें वुफछ भी खयाल करना चाहिए था। यहाँ एक अच्छा मंदिर थाऋ जिसमें कन्जुर ;बु(वचन - अनुवादद्ध की हस्तलिख्िात 103 पोथ्िायाँ रखी हुइर् थीं, मेरा आसन भी वहीं लगा। वह बड़े मोटे कागश पर अच्छे अक्षरों में लिखी हुइर् थीं, एक - एक पोथी 15 - 15 सेर से कम नहीं रही होगी। सुमति ने पिफर आसपास अपने यजमानों के पास जाने के बारे में पूछा, मैं अब पुस्तकों के भीतर था, इसलिए मैंने उन्हें जाने के लिए कह दिया। दूसरे दिन वह गए। मैंने समझा था 2 - 3 दिन लगेंगे, लेकिन वह उसी दिन दोपहर बाद चले आए। तिघ्री गाँव वहाँ से बहुत दूर नहीं था। हमने अपना - अपना सामान पीठ पर उठाया और भ्िाक्षु नम्से से विदाइर् लेकर चल पड़े। प्रश्न - अभ्यास 1 थोघ्ला के पहले के आख्िारी गाँव पहुँचने पर भ्िाखमंगे के वेश में होने के बावजूद लेखक को ठहरने के लिए उचित स्थान मिला जबकि दूसरी यात्रा के समय भद्र वेश भी उन्हें उचित स्थान नहीं दिला सका। क्यों? 2 उस समय के तिब्बत में हथ्िायार का कानून न रहने के कारण यात्रिायों को किस प्रकार का भय बना रहता था? 3 लेखक लघ्कोर के मागर् में अपने साथ्िायों से किस कारण पिछड़ गया? 4 लेखक ने शेकर विहार में सुमति को उनके यजमानों के पास जाने से रोका, परंतु दूसरी बार रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया? 5 अपनी यात्रा के दौरान लेखक को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? 6 प्रस्तुत यात्रा - वृत्तांत के आधार पर बताइए कि उस समय का तिब्बती समाज वैफसा था? 7 ‘मैं अब पुस्तकों के भीतर था।’ नीचे दिए गए विकल्पों में से कौन सा इस वाक्य का अथर् बतलाता है - ;कद्ध लेखक पुस्तवेंफ पढ़ने में रम गया। ;खद्ध लेखक पुस्तकों की शैल्प़्ाफ के भीतर चला गया। ;गद्ध लेखक के चारों ओर पुस्तवेंफ ही थीं। ;घद्ध पुस्तक में लेखक का परिचय और चित्रा छपा था। रचना और अभ्िाव्यक्ित 8.सुमति के यजमान और अन्य परिचित लोग लगभग हर गाँव में मिले। इस आधार पर आप सुमति के व्यक्ितत्व की किन विशेषताओं का चित्राण कर सकते हैं? 9.‘हालाँकि उस वक्त मेरा भेष ऐसा नहीं था कि उन्हें वुफछ भी खयाल करना चाहिए था।’ - उक्त कथन के अनुसार हमारे आचार - व्यवहार के तरीके वेशभूषा के आधार पर तय होते हैं। आपकी समझ से यह उचित है अथवा अनुचित, विचार व्यक्त करें। 10.यात्रा - वृत्तांत के आधार पर तिब्बत की भौगोलिक स्िथति का शब्द - चित्रा प्रस्तुत करें। वहाँ की स्िथति आपके राज्य/शहर से किस प्रकार भ्िान्न है? 11.आपने भी किसी स्थान की यात्रा अवश्य की होगी? यात्रा के दौरान हुए अनुभवों को लिखकर प्रस्तुत करें। 12.यात्रा - वृत्तांत गद्य साहित्य की एक विधा है। आपकी इस पाठ्यपुस्तक में कौन - कौन सी विधाएँ हैं? प्रस्तुत विधा उनसे किन मायनों में अलग है? भाषा - अध्ययन 13.किसी भी बात को अनेक प्रकार से कहा जा सकता है, जैसे - सुबह होने से पहले हम गाँव में थे। पौ पफटने वाली थी कि हम गाँव में थे। तारों की छाँव रहते - रहते हम गाँव पहुँच गए। नीचे दिए गए वाक्य को अलग - अलग तरीके से लिख्िाए - ‘जान नहीं पड़ता था कि घोड़ा आगे जा रहा है या पीछे।’ 14.ऐसे शब्द जो किसी ‘अंचल’ यानी क्षेत्रा विशेष में प्रयुक्त होते हैं उन्हें आंचलिक शब्द कहा जाता है। प्रस्तुत पाठ में से आंचलिक शब्द ढूँढ़कर लिख्िाए। 15.पाठ में कागश, अक्षर, मैदान के आगे क्रमशः मोटे, अच्छे और विशाल शब्दों का प्रयोग हुआ है। इन शब्दों से उनकी विशेषता उभर कर आती है। पाठ में से वुफछ ऐसे ही और शब्द छाँटिए जो किसी की विशेषता बता रहे हों। पाठेतर सियता ऽ यह यात्रा राहुल जी ने 1930 में की थी। आज के समय यदि तिब्बत की यात्रा की जाए तो राहुल जी की यात्रा से वैफसे भ्िान्न होगी? ऽ क्या आपके किसी परिचित को घुमक्कड़ी/यायावरी का शौक है? उसके इस शौक का उसकी पढ़ाइर्/काम आदि पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, लिखें। ऽ अपठित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए - आम दिनों में समुद्र किनारे के इलाके बेहद खूबसूरत लगते हैं। समुद्र लाखों लोगों को भोजन देता है और लाखों उससे जुड़े दूसरे कारोबारों में लगे हैं। दिसंबर 2004 को सुनामी या समुद्री भूवंफप से उठने वाली तूप़्ाफानी लहरों के प्रकोप ने एक बार पिफर साबित कर दिया है कि वुफदरत की यह देन सबसे बड़े विनाश का कारण भी बन सकती है। प्रकृति कब अपने ही ताने - बाने को उलट कर रख देगी, कहना मुश्िकल है। हम उसके बदलते मिशाज को उसका कोप कह लें या वुफछ और, मगर यह अबूझ पहेली अकसर हमारे विश्वास के चीथड़े कर देती है और हमें यह अहसास करा जाती है कि हम एक कदम आगे नहीं, चार कदम पीछे हैं। एश्िाया के एक बड़े हिस्से में आने वाले उस भूवंफप ने कइर् द्वीपों को इधर - उधर ख्िासकाकर एश्िाया का नक्शा ही बदल डाला। प्रकृति ने पहले भी अपनी ही दी हुइर् कइर् अद्भुत चीशें इंसान से वापस ले ली हैं जिसकी कसक अभी तक है। दुख जीवन को माँजता है, उसे आगे बढ़ने का हुनर सिखाता है। वह हमारे जीवन में ग्रहण लाता है, ताकि हम पूरे प्रकाश की अहमियत जान सवेंफ और रोशनी को बचाए रखने के लिए जतन करें। इस जतन से सभ्यता और संस्कृति का निमार्ण होता है। सुनामी के कारण दक्ष्िाण भारत और विश्व के अन्य देशों में जो पीड़ा हम देख रहे हैं, उसे निराशा के चश्मे से न देखें। ऐसे समय में भी मेघना, अरुण और मैगी जैसे बच्चे हमारे जीवन में जोश, उत्साह और शक्ित भर देते हैं। 13 वषीर्य मेघना और अरुण दो दिन अकेले खारे समुद्र में तैरते हुए जीव - जंतुओं से मुकाबला करते हुए किनारे आ लगे। इंडोनेश्िाया की रिजा पड़ोसी के दो बच्चों को पीठ पर लादकर पानी के बीच तैर रही थी कि एक विशालकाय साँप ने उसे किनारे का रास्ता दिखाया। मछुआरे की बेटी मैगी ने रविवार को समुद्र का भयंकर शोर सुना, उसकी शरारत को समझा, तुरंत अपना बेड़ा उठाया और अपने परिजनों को उस पर बिठा उतर आइर् समुद्र में, 41 लोगों को लेकर। महज 18 साल की यह जलपरी चल पड़ी पगलाए सागर से दो - दो हाथ करने। दस मीटर से श्यादा उफँची सुनामी लहरें जो कोइर् बाधा, रुकावट मानने को तैयार नहीं थीं, इस लड़की के बुलंद इरादों के सामने बौनी ही साबित हुईं। जिस प्रकृति ने हमारे सामने भारी तबाही मचाइर् है, उसी ने हमें ऐसी ताकत और सूझ दे रखी है कि हम पिफर से खड़े होते हैं और चुनौतियों से लड़ने का एक रास्ता ढूँढ़ निकालते हैं। इस त्रासदी से पीडि़त लोगों की सहायता के लिए जिस तरह पूरी दुनिया एकजुट हुइर् है, वह इस बात का सबूत है कि मानवता हार नहीं मानती। ;1द्ध कौन - सी आपदा को सुनामी कहा जाता है? ;2द्ध ‘दुख जीवन को माँजता है, उसे आगे बढ़ने का हुनर सिखाता है’ - आशय स्पष्ट कीजिए। ;3द्ध मैगी, मेघना और अरुण ने सुनामी जैसी आपदा का सामना किस प्रकार किया? ;4द्ध प्रस्तुत गद्यांश में ‘दृढ़ निश्चय’ और ‘महत्व’ के लिए किन शब्दों का प्रयोग हुआ है? ;5द्ध इस गद्यांश के लिए एक शीषर्क ‘नाराश समुद्र’ हो सकता है। आप कोइर् अन्य शीषर्क दीजिए। शब्द - संपदा डाँड़ा - उफँची शमीन थोघ्ला - तिब्बती सीमा का एक स्थान भीटे - टीले के आकार का सा उँफचा स्थान वंफडे - गाय - भैंस के गोबर से बने उपले जो ईंधन के काम में आते हैं। सत्तू - भूने हुए अन्न ;जौ, चनाद्ध का आटा थुक्पा - सत्तू या चावल के साथ मूली, हंी और माँस के साथ पतली लेइर् की तरह पकाया गया खाद्य - पदाथर् गंडा - मंत्रा पढ़कर गाँठ लगाया हुआ धागा या कपड़ा चिरी - पफाड़ी हुइर् भरिया - भारवाहक सुमति - लेखक को यात्रा के दौरान मिला मंगोल भ्िाक्षु जिसका नाम राहुल सांकृत्यायन/33 दोनों चिटंे - दोन्िक्वक्स्तो - लोब्शघ् शेख था। इसका अथर् है सुमति प्रज्ञ। अतः सुविधा के लिए लेखक ने उसे सुमति नाम से पुकारा है। ×ोनम् गाँव के पास पुल से नदी पार करने के लिए जोघ्पोन् ;मजिस्ट्रेटद्ध के हाथ की लिखी लमयिव्फ ;राहदारीद्ध जो लेखक ने अपने मंगोल दोस्त के माध्यम से प्राप्त की। स्पेनिश उपन्यासकार सावे±तेज ;17वीं शताब्दीद्ध के उपन्यास ‘डाॅन क्िवक्शोट’ का नायक, जो घोड़े पर चलता था।

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राहुल सांकृत्यायन 

राहुल सांकृत्यायन का जन्म सन् 1893 में उनके ननिहाल गाँव पंदहा, जि़ला आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनका पैतृक गाँव कनैला था। उनका मूल नाम केदार पांडेय था। उनकी शिक्षा काशी, आगरा और लाहौर में हुई। सन् 1930 में उन्होंने श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। तबसे उनका नाम राहुल सांकृत्यायन हो गया। राहुल जी पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, तिब्बती, चीनी, जापानी, रूसी सहित अनेक भाषाओं के जानकार थे। उन्हें महापंडित कहा जाता था। सन् 1963 में उनका देहांत हो गया।

राहुल सांकृत्यायन ने उपन्यास, कहानी, आत्मकथा, यात्रावृत्त, जीवनी, आलोचना, शोध आदि अनेक विधाओं में साहित्य-सृजन किया। इतना ही नहीं उन्होंने अनेक ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद भी किया। मेरी जीवन यात्रा (छह भाग), दर्शन-दिग्दर्शन, बाइसवीं सदी, वोल्गा से गंगा, भागो नहीं दुनिया को बदलो, दिमागी गुलामी, घुमक्कड़ शास्त्र उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। साहित्य के अलावा दर्शन, राजनीति, धर्म, इतिहास, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों पर राहुल जी द्वारा रचित पुस्तकों की संख्या लगभग 150 है। राहुल जी ने बहुत सी लुप्तप्राय सामग्री का उद्धार कर अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है।

यात्रावृत्त लेखन में राहुल जी का स्थान अन्यतम है। उन्होंने घुमक्कड़ी का शास्त्र रचा और उससे होने वाले लाभों का विस्तार से वर्णन करते हुए मंजि़ल के स्थान पर यात्रा को ही घुमक्कड़ का उद्देश्य बताया। घुमक्कड़ी से मनोरंजन, ज्ञानवर्धन एवं अज्ञात स्थलों की जानकारी के साथ-साथ भाषा एवं संस्कृति का भी आदान-प्रदान होता है। राहुल जी ने विभिन्न स्थानों के भौगोलिक वर्णन के अतिरिक्त वहाँ के जन-जीवन की सुंदर झाँकी प्रस्तुत की है।

संकलित अंश राहुल जी की प्रथम तिब्बत यात्रा से लिया गया है जो उन्होंने सन् 1929-30 में नेपाल के रास्ते की थी। उस समय भारतीयों को तिब्बत यात्रा की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने यह यात्रा एक भिखमंगे के छद्म वेश में की थी। इसमें तिब्बत की राजधानी ल्हासा की ओर जाने वाले दुर्गम रास्तों का वर्णन उन्होंने बहुत ही रोचक शैली में किया है। इस यात्रा-वृत्तांत से हमें उस समय के तिब्बती समाज के बारे में भी जानकारी मिलती है।

ल्हासा की ओर


वह नेपाल से तिब्बत जाने का मुख्य रास्ता है। फरी-कलिघ्पोघ् का रास्ता जब नहीं खुला था, तो नेपाल ही नहीं हिंदुस्तान की भी चीज़ें इसी रास्ते तिब्बत जाया करती थीं। यह व्यापारिक ही नहीं सैनिक रास्ता भी था, इसीलिए जगह-जगह फ़ौजी चौकियाँ और किले बने हुए हैं, जिनमें कभी चीनी पलटन रहा करती थी। आजकल बहुत से फ़ौजी मकान गिर चुके हैं। दुर्ग के किसी भाग में, जहाँ किसानों ने अपना बसेरा बना लिया है, वहाँ घर कुछ आबाद दिखाई पड़ते हैं। ऐसा ही परित्यक्त एक चीनी किला था। हम वहाँ चाय पीने के लिए ठहरे। तिब्बत में यात्रियों के लिए बहुत सी तकलीफ़ें भी हैं और कुछ आराम की बातें भी। वहाँ जाति-पाँति, छुआछूत का सवाल ही नहीं है और न औरतें परदा ही करती हैं। बहुत निम्नश्रेणी के भिखमंगों को लोग चोरी के डर से घर के भीतर नहीं आने देते; नहीं तो आप बिलकुल घर के भीतर चले जा सकते हैं। चाहे आप बिलकुल अपरिचित हों, तब भी घर की बहू या सासु को अपनी झोली में से चाय दे सकते हैं। वह आपके लिए उसे पका देगी। मक्खन और सोडा-नमक दे दीजिए, वह चाय चोघी में कूटकर उसे दूधवाली चाय के रंग की बना के मिट्टी के टोटीदार बरतन (खोटी) में रखके आपको दे देगी। यदि बैठक की जगह चूल्हे से दूर है और आपको डर है कि सारा मक्खन आपकी चाय में नहीं पड़ेगा, तो आप खुद जाकर चोघी में चाय मथकर ला सकते हैं। चाय का रंग तैयार हो जाने पर फिर नमक-मक्खन डालने की ज़रूरत होती है।

परित्यक्त चीनी किले से जब हम चलने लगे, तो एक आदमी राहदारी माँगने आया। हमने वह दोनों चिटें उसे दे दीं। शायद उसी दिन हम थोघ्ला के पहले के आखिरी गाँव में पहुँच गए। यहाँ भी सुमति के जान-पहचान के आदमी थे और भिखमंगेे रहते भी ठहरने के लिए अच्छी जगह मिली। पाँच साल बाद हम इसी रास्ते लौटे थे और भिखमंगे नहीं, एक भद्र यात्री के वेश में घोड़ों पर सवार होकर आए थे; किंतु उस वक्त किसी ने हमें रहने के लिए जगह नहीं दी, और हम गाँव के एक सबसे गरीब झोपड़े में ठहरे थे। बहुत कुछ लोगों की उस वक्त की मनोवृत्ति पर ही निर्भर है, खासकर शाम के वक्त छघ् पीकर बहुत कम होश-हवास को दुरुस्त रखते हैं।

अब हमें सबसे विकट डाँड़ा थोघ्ला पार करना था। डाँड़े तिब्बत में सबसे खतरे की जगहें हैं। सोलह-सत्रह हज़ार फीट की ऊँचाई होने के कारण उनके दोनों तरफ़ मीलों तक कोई गाँव-गिराँव नहीं होते। नदियों के मोड़ और पहाड़ों के कोनों के कारण बहुत दूर तक आदमी को देखा नहीं जा सकता। डाकुओं के लिए यही सबसे अच्छी जगह है। तिब्बत में गाँव में आकर खून हो जाए, तब तो खूनी को सज़ा भी मिल सकती है, लेकिन इन निर्जन स्थानों में मरे हुए आदमियों के लिए कोई परवाह नहीं करता। सरकार खुफ़िया-विभाग और पुलिस पर उतना खर्च नहीं करती और वहाँ गवाह भी तो कोई नहीं मिल सकता। डकैत पहिले आदमी को मार डालते हैं, उसके बाद देखते हैं कि कुछ पैसा है कि नहीं। हथियार का कानून न रहने के कारण यहाँ लाठी की तरह लोग पिस्तौल, बंदूक लिए फिरते हैं। डाकू यदि जान से न मारे तो खुद उसे अपने प्राणों का खतरा है। गाँव में हमें मालूम हुआ कि पिछले ही साल थोघ्ला के पास खून हो गया। शायद खून की हम उतनी परवाह नहीं करते, क्योंकि हम भिखमंगे थे और जहाँ-कहीं वैसी सूरत देखते, टोपी उतार जीभ निकाल, "कुची-कुची (दया-दया) एक पैसा" कहते भीख माँगने लगते। लेकिन पहाड़ की ऊँची चढ़ाई थी, पीठ पर सामान लादकर कैसे चलते? और अगला पड़ाव 16-17 मील से कम नहीं था। मैंने सुमति से कहा कि यहाँ से लघ्कोर तक के लिए दो घोड़े कर लो, सामान भी रख लेंगे और चढ़े चलेंगे।

दूसरे दिन हम घोड़ों पर सवार होकर ऊपर की ओर चले। डाँड़े से पहिले एक जगह चाय पी और दोपहर के वक्त डाँड़े के ऊपर जा पहुँचे। हम समुद्रतल से 17-18 हज़ार फीट ऊँचे खड़े थे। हमारी दक्खिन तरफ़ पूरब से पच्छिम की ओर हिमालय के हज़ारों श्वेत शिखर चले गए थे। भीटे की ओर दीखने वाले पहाड़ बिलकुल नंगे थे, न वहाँ बरफ़ की सफ़ेदी थी, न किसी तरह की हरियाली। उत्तर की तरफ़ बहुत कम बरफ़ वाली चोटियाँ दिखाई पड़ती थीं। सर्वोच्च स्थान पर डाँड़े के देवता का स्थान था, जो पत्थरों के ढेर, जानवरों की सींगों और रंग-बिरंगे कपड़े की झंडियों से सजाया गया था। अब हमें बराबर उतराई पर चलना था। चढ़ाई तो कुछ दूर थोड़ी मुश्किल थी, लेकिन उतराई बिलकुल नहीं। शायद दो-एक और सवार साथी हमारे साथ चल रहे थे। मेरा घोड़ा कुछ धीमे चलने लगा। मैंने समझा कि चढ़ाई की थकावट के कारण ऐसा कर रहा है, और उसे मारना नहीं चाहता था। धीरे-धीरे वह बहुत पिछड़ गया और मैं दोन्क्विक्स्तो की तरह अपने घोड़े पर झूमता हुआ चला जा रहा था। जान नहीं पड़ता था कि घोड़ा आगे जा रहा है या पीछे। जब मैं ज़ोर देने लगता, तो वह और सुस्त पड़ जाता। एक जगह दो रास्ते फूट रहे थे, मैं बाएँ का रास्ता ले मील-डेढ़ मील चला गया। आगे एक घर में पूछने से पता लगा कि लघ्कोर का रास्ता दाहिने वाला था। फिर लौटकर उसी को पकड़ा। चार-पाँच बजे के करीब मैं गाँव से मील-भर पर था, तो सुमति इंतज़ार करते हुए मिले। मंगोलों का मुँह वैसे ही लाल होता है और अब तो वह पूरे गुस्से में थे। उन्होंने कहा-"मैंने दो टोकरी कंडे फूँक डाले, तीन-तीन बार चाय को गरम किया।" मैंने बहुत नरमी से जवाब दिया-"लेकिन मेरा कसूर नहीं है मित्र! देख नहीं रहे हो, कैसा घोड़ा मुझे मिला है! मैं तो रात तक पहुँचने की उम्मीद रखता था।" खैर, सुमति को जितनी जल्दी गुस्सा आता था, उतनी ही जल्दी वह ठंडा भी हो जाता था। लघ्कोर में वह एक अच्छी जगह पर ठहरे थे। यहाँ भी उनके अच्छे यजमान थे। पहिले चाय-सत्तू खाया गया, रात को गरमागरम थुक्पा मिला।

अब हम तिघ्री के विशाल मैदान में थे, जो पहाड़ों से घिरा टापू-सा मालूम होता था, जिसमें दूर एक छोटी-सी पहाड़ी मैदान के भीतर दिखाई पड़ती है। उसी पहाड़ी का नाम है तिघ्री-समाधि-गिरि। आसपास के गाँव में भी सुमति के कितने ही यजमान थे, कपड़े की पतली-पतली चिरी बत्तियों के गंडे खतम नहीं हो सकते थे, क्योंकि बोधगया से लाए कपड़े के खतम हो जाने पर किसी कपड़े से बोधगया का गंडा बना लेते थे। वह अपने यजमानों के पास जाना चाहते थे। मैंने सोचा, यह तो हफ़्ता-भर उधर ही लगा देंगे। मैंने उनसे कहा कि जिस गाँव में ठहरना हो, उसमें भले ही गंडे बाँट दो, मगर आसपास के गाँवों में मत जाओ; इसके लिए मैं तुम्हें ल्हासा पहुँचकर रुपये दे दूँगा। सुमति ने स्वीकार किया। दूसरे दिन हमने भरिया ढूँढ़ने की कोशिश की, लेकिन कोई न मिला। सवेरे ही चल दिए होते तो अच्छा था, लेकिन अब 10-11 बजे की तेज़ धूप में चलना पड़ रहा था। तिब्बत की धूप भी बहुत कड़ी मालूम होती है, यद्यपि थोड़े से भी मोटे कपड़े से सिर को ढाँक लें, तो गरमी खतम हो जाती है। आप 2 बजे सूरज की ओर मुँह करके चल रहे हैं, ललाट धूप से जल रहा है और पीछे का कंधा बरफ़ हो रहा है। फिर हमने पीठ पर अपनी-अपनी चीज़ें लादी, डंडा हाथ में लिया और चल पड़े। यद्यपि सुमति के परिचित तिघ्री में भी थे, लेकिन वह एक और यजमान से मिलना चाहते थे, इसलिए आदमी मिलने का बहाना कर शेकर विहार की ओर चलने के लिए कहा। तिब्बत की ज़मीन बहुत अधिक छोटे-बड़े जागीरदारों में बँटी है। इन जागीरों का बहुत हिस्सा मठों (विहारों) के हाथ में है। अपनी-अपनी जागीर में हरेक जागीरदार कुछ खेती खुद भी कराता है, जिसके लिए मज़दूर बेगार में मिल जाते हैं। खेती का इंतज़ाम देखने के लिए वहाँ कोई भिक्षु भेजा जाता है, जो जागीर के आदमियों के लिए राजा ज़्यादा से कम नहीं होता। शेकर की खेती के मुखिया भिक्षु (नम्से) बड़े भद्र पुरुष थे। वह बहुत प्रेम से मिले, हालाँकि उस वक्त मेरा भेष ऐसा नहीं था कि उन्हें कुछ भी खयाल करना चाहिए था। यहाँ एक अच्छा मंदिर था; जिसमें कन्जुर (बुद्धवचन-अनुवाद) की हस्तलिखित 103 पोथियाँ रखी हुई थीं, मेरा आसन भी वहीं लगा। वह बड़े मोटे कागज़ पर अच्छे अक्षरों में लिखी हुई थीं, एक-एक पोथी 15-15 सेर से कम नहीं रही होगी। सुमति ने फिर आसपास अपने यजमानों के पास जाने के बारे में पूछा, मैं अब पुस्तकों के भीतर था, इसलिए मैंने उन्हें जाने के लिए कह दिया। दूसरे दिन वह गए। मैंने समझा था 2-3 दिन लगेंगे, लेकिन वह उसी दिन दोपहर बाद चले आए। तिघ्री गाँव वहाँ से बहुत दूर नहीं था। हमने अपना-अपना सामान पीठ पर उठाया और भिक्षु नम्से से विदाई लेकर चल पड़े।

प्रश्न-अभ्यास

  1. थोघ्ला के पहले के आखिरी गाँव पहुँचने पर भिखमंगे के वेश में होने के बावजूद लेखक को ठहरने के लिए उचित स्थान मिला जबकि दूसरी यात्रा के समय भद्र वेश भी उन्हें उचित स्थान नहीं दिला सका। क्यों?
  2. उस समय के तिब्बत में हथियार का कानून न रहने के कारण यात्रियों को किस प्रकार का भय बना रहता था?
  3. लेखक लघ्कोर के मार्ग में अपने साथियों से किस कारण पिछड़ गया?
  4. लेखक ने शेकर विहार में सुमति को उनके यजमानों के पास जाने से रोका, परंतु दूसरी बार रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया?
  5. अपनी यात्रा के दौरान लेखक को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
  6. प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत के आधार पर बताइए कि उस समय का तिब्बती समाज कैसा था?
  7. ‘मैं अब पुस्तकों के भीतर था।’ नीचे दिए गए विकल्पों में से कौन सा इस वाक्य का अर्थ बतलाता है-

    (क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।

    (ख) लेखक पुस्तकों की शैल्फ़ के भीतर चला गया।

    (ग) लेखक के चारों ओर पुस्तकें ही थीं।

    (घ) पुस्तक में लेखक का परिचय और चित्र छपा था।

    रचना और अभिव्यक्ति

  8. सुमति के यजमान और अन्य परिचित लोग लगभग हर गाँव में मिले। इस आधार पर आप सुमति के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं का चित्रण कर सकते हैं?
  9. ‘हालाँकि उस वक्त मेरा भेष ऐसा नहीं था कि उन्हें कुछ भी खयाल करना चाहिए था।’- उक्त कथन के अनुसार हमारे आचार-व्यवहार के तरीके वेशभूषा के आधार पर तय होते हैं। आपकी समझ से यह उचित है अथवा अनुचित, विचार व्यक्त करें।
  10. यात्रा-वृत्तांत के आधार पर तिब्बत की भौगोलिक स्थिति का शब्द-चित्र प्रस्तुत करें। वहाँ की स्थिति आपके राज्य/शहर से किस प्रकार भिन्न है?
  11. आपने भी किसी स्थान की यात्रा अवश्य की होगी? यात्रा के दौरान हुए अनुभवों को लिखकर प्रस्तुत करें।
  12. यात्रा-वृत्तांत गद्य साहित्य की एक विधा है। आपकी इस पाठ्यपुस्तक में कौन-कौन सी विधाएँ हैं? प्रस्तुत विधा उनसे किन मायनों में अलग है?

    भाषा-अध्ययन

  13. किसी भी बात को अनेक प्रकार से कहा जा सकता है, जैसे-

    सुबह होने से पहले हम गाँव में थे।

    पौ फटने वाली थी कि हम गाँव में थे।

    तारों की छाँव रहते-रहते हम गाँव पहुँच गए।

    नीचे दिए गए वाक्य को अलग-अलग तरीके से लिखिए-

    ‘जान नहीं पड़ता था कि घोड़ा आगे जा रहा है या पीछे।’

  14. ऐसे शब्द जो किसी ‘अंचल’ यानी क्षेत्र विशेष में प्रयुक्त होते हैं उन्हें अांचलिक शब्द कहा जाता है। प्रस्तुत पाठ में से अांचलिक शब्द ढूँढ़कर लिखिए।
  15. पाठ में कागज़, अक्षर, मैदान के आगे क्रमशः मोटे, अच्छे और विशाल शब्दों का प्रयोग हुआ है। इन शब्दों से उनकी विशेषता उभर कर आती है। पाठ में से कुछ ऐसे ही और शब्द छाँटिए जो किसी की विशेषता बता रहे हों।

पाठेतर सक्रियता

  • यह यात्रा राहुल जी ने 1930 में की थी। आज के समय यदि तिब्बत की यात्रा की जाए तो राहुल जी की यात्रा से कैसे भिन्न होगी?
  • क्या आपके किसी परिचित को घुमक्कड़ी/यायावरी का शौक है? उसके इस शौक का उसकी पढ़ाई/काम आदि पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, लिखें।
  • अपठित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

आम दिनों में समुद्र किनारे के इलाके बेहद खूबसूरत लगते हैं। समुद्र लाखों लोगों को भोजन देता है और लाखों उससे जुड़े दूसरे कारोबारों में लगे हैं। दिसंबर 2004 को सुनामी या समुद्री भूकंप से उठने वाली तूफ़ानी लहरों के प्रकोप ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कुदरत की यह देन सबसे बड़े विनाश का कारण भी बन सकती है।

प्रकृति कब अपने ही ताने-बाने को उलट कर रख देगी, कहना मुश्किल है। हम उसके बदलते मिज़ाज को उसका कोप कह लें या कुछ और, मगर यह अबूझ पहेली अकसर हमारे विश्वास के चीथड़े कर देती है और हमें यह अहसास करा जाती है कि हम एक कदम आगे नहीं, चार कदम पीछे हैं। एशिया के एक बड़े हिस्से में आने वाले उस भूकंप ने कई द्वीपों को इधर-उधर खिसकाकर एशिया का नक्शा ही बदल डाला। प्रकृति ने पहले भी अपनी ही दी हुई कई अद्भुत चीज़ें इंसान से वापस ले ली हैं जिसकी कसक अभी तक है।

दुख जीवन को माँजता है, उसे आगे बढ़ने का हुनर सिखाता है। वह हमारे जीवन में ग्रहण लाता है, ताकि हम पूरे प्रकाश की अहमियत जान सकें और रोशनी को बचाए रखने के लिए जतन करें। इस जतन से सभ्यता और संस्कृति का निर्माण होता है। सुनामी के कारण दक्षिण भारत और विश्व के अन्य देशों में जो पीड़ा हम देख रहे हैं, उसे निराशा के चश्मे से न देखें। ऐसे समय में भी मेघना, अरुण और मैगी जैसे बच्चे हमारे जीवन में जोश, उत्साह और शक्ति भर देते हैं। 13 वर्षीय मेघना और अरुण दो दिन अकेले खारे समुद्र में तैरते हुए जीव-जंतुओं से मुकाबला करते हुए किनारे आ लगे। इंडोनेशिया की रिजा पड़ोसी के दो बच्चों को पीठ पर लादकर पानी के बीच तैर रही थी कि एक विशालकाय साँप ने उसे किनारे का रास्ता दिखाया। मछुआरे की बेटी मैगी ने रविवार को समुद्र का भयंकर शोर सुना, उसकी शरारत को समझा, तुरंत अपना बेड़ा उठाया और अपने परिजनों को उस पर बिठा उतर आई समुद्र में, 41 लोगों को लेकर। महज 18 साल की यह जलपरी चल पड़ी पगलाए सागर से दो-दो हाथ करने। दस मीटर से ज़्यादा ऊँची सुनामी लहरें जो कोई बाधा, रुकावट मानने को तैयार नहीं थीं, इस लड़की के बुलंद इरादों के सामने बौनी ही साबित हुईं।

जिस प्रकृति ने हमारे सामने भारी तबाही मचाई है, उसी ने हमें ऐसी ताकत और सूझ दे रखी है कि हम फिर से खड़े होते हैं और चुनौतियों से लड़ने का एक रास्ता ढूँढ़ निकालते हैं। इस त्रासदी से पीड़ित लोगों की सहायता के लिए जिस तरह पूरी दुनिया एकजुट हुई है, वह इस बात का सबूत है कि मानवता हार नहीं मानती।

  1. कौन-सी आपदा को सुनामी कहा जाता है?
  2. ‘दुख जीवन को माँजता है, उसे आगे बढ़ने का हुनर सिखाता है’-आशय स्पष्ट कीजिए।
  3. मैगी, मेघना और अरुण ने सुनामी जैसी आपदा का सामना किस प्रकार किया?
  4. प्रस्तुत गद्यांश में ‘दृढ़ निश्चय’ और ‘महत्व’ के लिए किन शब्दों का प्रयोग हुआ है?
  5. इस गद्यांश के लिए एक शीर्षक ‘नाराज़ समुद्र’ हो सकता है। आप कोई अन्य शीर्षक दीजिए।

शब्द-संपदा

डाँड़ा - ऊँची ज़मीन

थोघ्ला - तिब्बती सीमा का एक स्थान

भीटे - टीले के आकार का सा ऊँचा स्थान

कंडे - गाय-भैंस के गोबर से बने उपले जो ईंधन के काम में आते हैं।

सत्तू - भूने हुए अन्न (जौ, चना) का आटा

थुक्पा - सत्तू या चावल के साथ मूली, हड्डी और माँस के साथ पतली लेई की तरह पकाया गया खाद्य-पदार्थ

गंडा - मंत्र पढ़कर गाँठ लगाया हुआ धागा या कपड़ा

चिरी - फाड़ी हुई

भरिया - भारवाहक

सुमति - लेखक को यात्रा के दौरान मिला मंगोल भिक्षु जिसका नाम लोब्ज़घ् शेख था। इसका अर्थ है सुमति प्रज्ञ। अतः सुविधा के लिए लेखक ने उसे सुमति नाम से पुकारा है।

दोनों चिटें - ञेनम् गाँव के पास पुल से नदी पार करने के लिए जोघ्पोन् (मजिस्ट्रेट) के हाथ की लिखी लमयिक (राहदारी) जो लेखक ने अपने मंगोल दोस्त के माध्यम से प्राप्त की।

दोन्क्विक्स्तो - स्पेनिश उपन्यासकार सार्वेंतेज (17वीं शताब्दी) के उपन्यास ‘डॉन क्विक्ज़ोट’ का नायक, जो घोड़े पर चलता था।


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