प्रकाश संसार को हम मुख्य रूप से अपनी ज्ञानेन्िद्रयों से जानते हैं। ज्ञानेन्िद्रयों में से दृष्िट एक सबसे महत्वपूणर् ज्ञानेन्िद्रय है। इसकी सहायता से हम पवर्तों, नदियों, पेड़ - पौधों, वुफसिर्यों, मनुष्यों तथा अपने चारों ओर की अन्य अनेक वस्तुओं को देखते हैं। हम आकाश में बादल, इन्द्रधनुष तथा उड़ते पक्ष्िायों को भी देखते हैं। रात्रिा में हम चन्द्रमा तथा तारों को देखते हैं। दृष्िट द्वारा ही आप इस पृष्ठ पर छपे शब्दों तथा वाक्यों को देख पाते हैं। क्या आप जानते हें कि ये सब देखना वैफसे सम्भव हो पाता है? 16.1 वस्तुओं को दृश्य कौन बनाता है? क्या कभी आपने सोचा है कि हम विभ्िान्न वस्तुओं को वैफसे देख पाते हैं? आप कह सकते हैं कि हम वस्तुओं को नेत्रों से देखते हैं। लेकिन, क्या आप अंधेरे में किसी वस्तु को देख पाते हैं? इसका अथर् है कि केवल नेत्रों द्वारा हम किसी वस्तु को नहीं देख सकते। किसी वस्तु को हम तब ही देख पाते हैं जब उस वस्तु से आने वाला प्रकाश हमारे नेत्रों में प्रवेश करे। यह प्रकाश वस्तुओं द्वारा उत्सजिर्त अथवा उनसे परावतिर्त हुआ हो सकता है। आपने कक्षा टप्प् में सीखा है कि कोइर् पाॅलिश किया हुआ या चमकदार पृष्ठ दपर्ण की भांति कायर् कर सकताहै। दपर्ण अपने ऊपर पड़ने वाले प्रकाश की दिशा को परिवतिर्त कर देता है। क्या आप बता सकते हैं कि किसी पृष्ठ पर पड़ने वाला प्रकाश किस दिशा में परावतिर्त होगा? आइए ज्ञात करें। 16.2 परावतर्न के नियम ियाकलाप 16.1 प्रकाश किरण का अस्ितत्व एक आदशीर्करण है। वास्तव में, हमें प्रकाश का एक संकीणर् किरण - पंुज प्राप्त होता है जो अनेक किरणों से मिल कर बना होता है। सरलता के लिए हम प्रकाश के संकीणर् किरण - पुंज के लिए किरण शब्द का उपयोग करते हैं। अपने मित्रों की सहायता से कागश पर समतल दपर्ण की स्िथति तथा आपतित एवं परावतिर्त किरणों को दशार्ने वाली रेखाएँ खींचिए। दपर्ण तथा कंघे को हटाइए। दपर्ण को निरूपित करने वाली रेखा के जिस बिन्दु पर आपतित किरण दपर्ण से टकराती है, उस पर दपर्ण से 90° का कोण बनाते हुए एक रेखा खींचिए। यह रेखा परावतर्क पृष्ठ के उस बिन्दु पर अभ्िालम्ब कहलाती है ;चित्रा 16.2द्ध। आपतित किरण तथा अभ्िालम्ब के बीच चित्रा 16.2: अभ्िालम्ब खींचना। के कोण को आपतन कोण ;∠पद्ध कहते हैं। परावतिर्त किरण तथा अभ्िालम्ब के बीच के कोण को परावतर्न कोण ;∠तद्ध कहते हैं ;चित्रा 16.3द्ध। आपतन कोण तथा परावतर्न कोण को मापिए। इस ियाकलाप को आपतन कोण परिवतिर्त करके कइर् बार दोहराइए। प्रेक्षणों को सारणी 16.1 में लिख्िाए। चित्रा 16.3: आपतन कोण तथा परावतर्न कोण। सारणी 16.1: आपतन कोण तथा परावतर्न कोण क्रम संख्या आपतन कोण ;∠पद्ध परावतर्न कोण ;∠तद्ध 1 2 3 4 5 क्या आप आपतन कोण तथा परावतर्न कोण के बीच कोइर् संबंध देखते हैं? क्या ये दोनों लगभग बराबर हैं? यदि यह ियाकलाप सावधानीपूवर्क किया जाए तो यह देखा जाता है कि आपतन कोण सदैव परावतर्न कोण के बराबर होता है। इसे परावतर्न का नियम कहते हैं। आइए परावतर्न से संबंिात एक और ियाकलाप करें। ियाकलाप 16.2 ियाकलाप 16.1 को दोबारा कीजिए। इस बार किसी सख्त कागश की शीट अथवा चाटर् पेपर का उपयोग कीजिए। शीट मेज के किनारे से थोड़ी बाहर निकली हुइर् होनी चाहिए ;चित्रा 16.4द्ध। शीट के बाहर निकले भाग को बीच में से काटिए। परावतिर्त किरण को देख्िाए। सुनिश्िचत कीजिए कि परावतिर्त किरण कागश के बाहर निकले भाग पर भी दिखाइर् दे। कागश के बाहर निकले उस भाग को मोडि़ए जहाँ पर परावतिर्त किरण दिखाइर् दे रही है। क्या आप अब भी परावतिर्त किरण देख पाते हैं? कागश को पुनः प्रारंभ्िाक अवस्था में लाइए। क्या आप पिफर से परावतिर्त किरण को देख पाते हैं? इससे आप क्या निष्कषर् निकालते हैं? ;इद्ध चित्रा 16.4 ;ंद्ध ;इद्ध रू आपतित किरण, परावतिर्त किरण तथा आपतन बिन्दु पर अभ्िालंब एक ही तल में होते हैं। जब मेज पर कागश की पूरी शीट पैफलाते हैं तो यह एक तल को निरूपित करती है। आपतित किरण, आपतन बिंदु पर अभ्िालंब तथा परावतिर्त किरण ये सभी इसी तल में होते हैं। जब आप कागश को मोड़ देते हैं, तो आप एक नया तल बना देते हैं जो उस तल से भ्िान्न होता है जिसमें आपतित किरण तथा अभ्िालम्ब स्िथत हैं। तब आप परावतिर्त किरण नहीं देख पाते। यह क्या निदश्िार्त करता है? यह दशार्ता है कि आपतित किरण, आपतन बिंदु पर अभ्िालंब तथा परावतिर्त किरण - ये सभी एक तल में होते हैं। यह परावतर्न का एक अन्य नियम है। पहेली तथा बूझो ने उपरोक्त ियाकलाप टाॅचर् के स्थान पर सूयर् को प्रकाश - स्रोत के रूप में उपयोग करके कक्ष के बाहर किए। आप भी प्रकाश स्रोत के रूप में सूयर् का उपयोग कर सकते हैं। इन ियाकलापों को किरण वणर्रेखा उपकरण का उपयोग करके भी किया जा सकता है ;यह उपकरण राष्ट्रीय शैक्ष्िाक अनुसंधान और प्रश्िाक्षण परिषद् ;छब्म्त्ज्द्ध द्वारा निमिर्त किट में उपलब्ध हैद्ध। बूझो को याद आया कि उसने कक्षा टप्प् में समतल दपर्ण द्वारा बने किसी वस्तु के प्रतिबिम्ब के वुफछ लक्षणों का अध्ययन किया था। पहेली ने उससे उन लक्षणों का स्मरण करने के लिए पूछा - ;पद्ध क्या प्रतिबिंब सीधा था अथवा उलटा? ;पपद्ध क्या प्रतिबिंब का साइश वस्तु के साइश के बराबर था? ;पपपद्ध क्या प्रतिबिंब दपर्ण के पीछे उतनी ही दूरी पर दिखाइर् दिया था जितनी दूरी पर वस्तु दपर्ण के सामने रखी थी? ;पअद्ध क्या प्रतिबंब को पदेर् पर प्राप्त किया जा सकता था? आइए निम्नलिख्िात ियाकलाप से समतल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब बनने के बारे में वुफछ और अिाक समझें। ियाकलाप 16.3 समतल दपर्ण च्फ के सामने एक प्रकाश स्रोत व् रखा गया है। दपर्ण पर दो किरणें व्। तथा व्ब् आपतित हो रही हैं। ;चित्रा 16.5द्ध। क्या आप परावतिर्त किरणों की दिशा ज्ञात कर सकते हैं? समतल दपर्ण च्फ के पृष्ठ के बिन्दुओं । तथा ब् पर अभ्िालंब खींचिए। पिफर बिंदुओं । तथा ब् पर परावतिर्त किरणें खींचिए। आप इन किरणों को वैफसे खींचेगे? परावतिर्त किरणों को क्रमशः ।ठ तथा ब्क् से निरूपित कीजिए। इन्हें आगे की ओर बढ़ाइए। क्या ये मिलती हैं? अब इन्हें पीछे की ओर बढ़ाइए। क्या अब ये मिलती हैं? यदि ये मिलती हैं तो इस बिन्दु पर प् अंकित कीजिए। क्या परावतिर्त किरणें म् पर स्िथत ;चित्रा 16.5द्ध पर जब सभी समान्तर किरणें किसी समतल पृष्ठ से परावतिर्त होने के पश्चात् समान्तर नहीं होतीं, तो ऐसे परावतर्न को विसरित परावतर्न कहते हैं। याद रख्िाए कि विसरित परावतर्न में भी परावतर्न के नियमों कासपफलतापूवर्क पालन होता है। प्रकाश का विसरण गत्ते जैसे विषय परावतीर् पृष्ठ पर अनियमितताओं के कारण होता है। इसके विपरीत दपर्ण जैसे चिकने पृष्ठ से होने वाले परावतर्न को नियमित परावतर्न कहते हैं। ;चित्रा 16.8द्ध में नियमित परावतर्न द्वारा प्रतिबिंब बनते हैं।चित्रा 16.8: नियमित परावतर्न। क्या हम सभी वस्तुओं को परावतिर्त प्रकाश के कारण ही देखते हैं? आपके चारों ओर की लगभग सभी वस्तुएँ आपको परावतिर्त प्रकाश के कारण दिखाइर् देती हैं। उदाहरण के लिए चन्द्रमा, सूयर् से प्राप्त प्रकाश को परावतिर्त करता है। इस प्रकार हम चन्द्रमा को देखते हैं। जो पिण्ड दूसरी वस्तुओं के प्रकाश में चमकते हैं उन्हें प्रदीप्त पिण्ड कहते हैं। क्या आप वुफछ ऐसे अन्य पिण्डों के नाम बता सकते हैं?वुफछ अन्य पिण्ड हैं जो स्वयं का प्रकाश उत्सजिर्त करते हैं, जैसेμ सूयर्, मोमबत्ती की ज्वाला तथा विद्युत लैम्प। इनका प्रकाश हमारे नेत्रों पर पड़ता है। इस प्रकार हम इन पिण्डों को देखते हैं। जो पिण्ड स्वयं का प्रकाश उत्सजिर्त करते हैं वे दीप्त पिण्ड कहलाते हैं। आइए ज्ञात करें। 16.4 परावतिर्त प्रकाश को पुनः परावतिर्त किया जा सकता है स्मरण कीजिए जब पिछली बार आप किसी केश प्रसाधक के यहाँ गए थे। उसने आपको एक दपर्ण के सामने बैठाया था। बाल कट चुकने के पश्चात उसने आपके पीछे की ओर एक दपर्ण रखा था। इस दूसरे दपर्ण की सहायता से आप सामने वाले दपर्ण में यह देख सकते थे कि आपके बाल वैफसे कटे हैं ;चित्रा 16.9द्ध। क्या आप बता सकते हैं कि अपने सिर के पीछे के बालों को आप वैफसे देख पाए थे? पहेली को याद आया कि कक्षा टप् में विस्तारित ियाकलाप के रूप में उसने एक परिदशीर् बनाया था। परिदशीर् में दो समतल दपर्ण उपयोग किए जाते हैं। क्या आप बता सकते हैं कि दो दपर्णों से परावतर्न द्वारा आप उन वस्तुओं को देखने योग्य वैफसे बना पाते हैं जिन्हें आप सीधे नहीं देख पाते? परिदश्िार्यों का उपयोग पनडुब्िबयों, टैंकों तथा बंकरों में छिपे सैनिकों द्वारा बाहर की वस्तुओं को देखने के लिए किया जाता है। 16.5 बहु प्रतिबिंब आप जानते हैं कि समतल दपर्ण किसी वस्तु का केवल एक ही प्रतिबिंब बनाता है। यदि दो समतल दपर्णों को संयोजनों में उपयोग करें तो क्या होगा? आइए देखें। चित्रा 16.9: केश प्रसाधक की दुकान पर दपर्ण। ियाकलाप 16.5 क्या अब आप यह स्पष्ट कर सकते हैं कि केश प्रसाधक की दुकान पर आप अपने सिर के पीछे के भाग को वैफसे देख पाते हैं? एक दूसरे से किसी कोण पर रखे दपर्णों द्वारा अनेक प्रतिंिबबों के बनने की धारणा का उपयोग बहुमूतिर्दशीर् ;वैफलाइडोस्कोपद्ध में भांति - भांति के आकषर्क पैटनर् बनाने के लिए किया जाता है। आप स्वयं भी एक वैफलाइडोस्कोप बना सकते हैं। बहुमूतिर्दशीर् ियाकलाप 16.6 वैफलाइडोस्कोप बनाने के लिए दपर्ण की लगभग 15 बउ लम्बी, 4 बउ चैड़ी तीन आयताकार पटिðयाँ लीजिए। इन्हें चित्रा 16.12;ंद्ध में दशार्ए अनुसार एक पि्रश्म की आवृफति में जोडि़ए। इन्हेंगत्ते या मोटे चाटर् पेपर की बनी एक बेलनाकार ट्यूब में दृढ़ता से लगाइए। सुनिश्िचत कीजिए कि ट्यूब दपर्ण की पटि ðयों से थोड़ी लम्बी हो। ट्यूबके एक सिरे को गत्ते की एक ऐसी डिस्क से बंद कीजिए जिसमें भीतर का दृश्य देखने के लिए एक छिद्र बना हो ख्चित्रा 16.12;इद्ध,। डिस्क को टिकाऊ बनाने के लिए इसके नीचे पारदशीर् प्लास्िटक की शीट चिपका दीजिए। ट्यूब के दूसरे सिरे परसमतल काँच की एक वृत्ताकार प्लेट दपर्णों को छूते हुए दृढ़तापूवर्क लगाइए ख्चित्रा 16.12;बद्ध,। इस प्लेट पर छोटे - छोटे रंगीन काँच के वुफछ टुकड़े ;रंगीन चूडि़यों के टुकड़ेद्ध रख्िाए। ट्यूब के इस सिरे को घ्िासे हुए काँच की प्लेट से बन्द कीजिए। रंगीन टुकड़ों की हलचल के लिए पयार्प्त जगह रहने दीजिए। आपका वैफलाइडोस्कोप तैयार है। जब आप छिद्र से झाँकते हैं तो आपको ट्यूब में भांति - भांति के पैटनर् दिखाइर् देते हैं। वैफलाइडोस्कोप की एक रोचक विशेषता यह है कि आप कभी भी एक पैटनर् दोबारा नहीं देख पाएँगे। दीवारों वाले कागशों तथा वस्त्रों के डिशाइन बनाने वाले तथा कलाकार वैफलाइडोस्कोप का उपयोग नए - नए पैटनर् की कल्पना करने के लिए करते हैं। अपने ख्िालौने ियाकलाप 16.7 को आकषर्क बनाने के लिए आप इस पर रंगीन कागश चिपका सकते हैं। 16.6 सूयर् का प्रकाश - श्वेत या रंगीन कक्षा टप्प् में आपने सीखा कि सूयर् के प्रकाश को श्वेत प्रकाश के रूप में जाना जाता है। आपने यह भी सीखा है कि इसमें सात रंग होते हैं। यह दशार्ने के लिए कि सूयर् के प्रकाश में अनेक रंग होते हैं एक और ियाकलाप ;16.7द्ध करते हैं। 16.7 हमारे नेत्रों की संरचना क्या है? हम वस्तुओं को केवल तभी देख पाते हैं जब उनसे आने वाला प्रकाश हमारे नेत्रों में प्रवेश करता है। नेत्रा हमारी सबसे महत्वपूणर् ज्ञानेन्िद्रयों में से एक है। इसीलिए इसकी संरचना तथा कायर्वििा को समझना हमारे लिए विशेषमहत्त्व रखता है। हमारे नेत्रा की आवृफति लगभग गोलाकार है। नेत्रा का बाहरी आवरण सपफेद होता है। यह कठोर होता है ताकि उपयुक्त साइश का एक समतल दपर्ण लीजिए। इसे एक पि्रश्म बनाते हैं। यह प्रकाश को इसके रंगों में चित्रा 16.13 में दशार्ए अनुसार एक कटोरी में विभक्त कर देता है, जैसा कि आपने कक्षा टप्प् में रख्िाए। कटोरी में जल भरिए। इस व्यवस्था को अध्ययन किया है। प्रकाश के अपने रंगों में विभाजित किसी ख्िाड़की के पास इस प्रकार रख्िाए कि दपर्ण होने को प्रकाश का विक्षेपण कहते हैं। इन्द्रधनुष पर सूयर् का प्रकाश सीधा पड़ सके। कटोरी की विक्षेपण को दशार्ने वाली एक प्रावृफतिक परिघटना है। स्िथति को इस प्रकार समायोजित कीजिए कि दपर्ण से परावतिर्त होने वाला प्रकाश किसी दीवार पर पडे़। यदि दीवार सपेफद न हो तो इस पर सपेफद कागश की शीट चिपकाइए। परावतिर्त प्रकाश में आपको अनेक रंग दिखाइर् देंगे। आप इसकी व्याख्या किस प्रकार करेंगे? दपर्ण एवं जल संयुक्त रूप से यह नेत्रा के आंतरिक भागों की दुघर्टनाओं से बचाव कर सके। इसके पारदशीर् अग्र भाग को काॅनिर्या या स्वच्छ मंडल कहते हैं ;चित्रा 16.14द्ध। काॅनिर्या के पीछे हम एक गहरे रंग की पेश्िायों की संरचना पाते हैं जिसे परितारिका ;आइरिसद्ध कहते हैं। आइरिस में एक छोटा सा द्वार होता है जिसे पुतली कहते हैं। पुतली के साइश को परितारिका से नियंत्रिात किया जाता है। परितारिका नेत्रा का वह भाग है जो इसे इसका विश्िाष्ट रंग प्रदान करती है। जब हम कहते हैं कि किसी व्यक्ित के नेत्रा हरे हैं तो वास्तव में हम परितारिका के रंग की ही बात कर रहे होते हैं। परितारिका नेत्रा में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा को नियंत्रिात करती है। आइए देखें यह वैफसे होता है। पुतली के पीछे एक लेंस है जो केन्द्र पर मोटा है। किस प्रकार का लेंस केन्द्र पर मोटा होता है? स्मरण करिए, कक्षा टप्प् में लेंसों के बारे में क्या पढ़ा है? लेंस प्रकाश को आँख के पीछे एक परत पर .पफोकसित करता है। इस परत को रेटिना ;दृष्िट पटलद्ध कहते हैं ;चित्रा 1614द्ध। रेटिना अनेक तंत्रिाका कोश्िाकाओं का बना होता है। तंत्रिाका कोश्िाकाओं द्वारा अनुभव की गइर् संवेदनाओं को दृव्फ तंत्रिाकाओं द्वारा मस्ितष्क तक पहुँचा दिया जाता है। तंत्रिाका कोश्िाकाएँ दो प्रकार की होती हैं। ;पद्धशंवुफ, जो तीव्र प्रकाश के लिए सुग्राही होते हैं तथा ;पपद्धशलाकाएँ, जो मंद प्रकाश के लिए सुग्राही होती हैं। इसके अतिरिक्त, शंवुफ रंगों ;वणोर्ंद्ध की सूचनाएँ भी भेजते परितारिका प्रकाश्िाक लेंस तंत्रिाका काॅनिर्या रेटिना चित्रा 16.14: मानव नेत्रा। पक्ष्माभ पेशी चेतावनीः इस ियाकलाप के लिए कभी भी लेशर टाॅचर् का प्रयोग न करें। ियाकलाप 16.8 अपने मित्रा की आँख में देख्िाए। पुतली के साइश का अवलोकन कीजिए। एक टाॅचर् से उसकी आँख पर प्रकाश डालिए। अब पुतली का अवलोकन कीजिए। टाॅचर् को बन्द कीजिए तथा उसकी पुतली का एक बार पुनः अवलोकन करें। क्या आप पुतली के साइश में कोइर् परिवतर्न देख पाते हैं? किस स्िथति में पुतली बड़ी थी? क्या आप बता सकते हैं कि ऐसा क्यों हुआ। किस स्िथति में आपको आँख में अिाक प्रकाश भेजने की आवश्यकता है, मंद प्रकाश में या तीव्र प्रकाश में? हैं। दृवफ तंत्रिाकाओं तथा रेटिना की संिा पर कोइर् तंत्रिाका कोश्िाका नहीं होती। इस बिंदु को अंध बिंदु कहते हैं। इसके अस्ितत्व को निम्न प्रकार से प्रदश्िार्त किया जा सकता है। ियाकलाप 16.9 किसी कागश की शीट पर एक गोल चिÉ तथाएक क्रॅास बनाइए। गोल चिÉ क्रॅास के दाइर्ं ओरहोना चाहिए ;चित्रा 16.15द्ध। दोनों चिÉों के बीच 6 - 8 बउ की दूरी होनी चाहिए। कागश की शीट को नेत्रा से भुजा की दूरी पर पकड़े रख्िाए। अपने बाएँ नेत्रा को बन्द कीजिए। क्राॅस को वुफछ देर तक लगातार देख्िाए। अपने नेत्रा को क्राॅस पर स्िथर रखते हुए, शीट को धीरे - धीरे अपनी ओर लाइए।आप क्या देखते हैं? क्या गोल चिÉ शीट के किसी दूरी तक आने पर अदृश्य हो जाता है? अब अपनादायाँ नेत्रा बन्द कीजिए। अब गोल चिÉ पर देखते हुए उपरोक्त ियाकलाप को दोहराइए। क्या इस बार क्राॅस अदृश्य हो जाता है? क्राॅस अथवा गोलचिÉ का अदृश्य होना यह दशर्ाता है कि रेटिना पर कोइर् ऐसा बिन्दु है जो प्रकाश गिरने पर इसकी सूचना मस्ितष्क तक नहीं पहुँचाता। चित्रा 16.15: अंध बिंदु दिखाना। ्रेटिना पर बने प्रतिबिंब का प्रभाव, वस्तु को हटा लेने पर, तुरन्त ही समाप्त नहीं होता। यह लगभग 1/16 सेवंफड तक बना रहता है। इसलिए, यदि नेत्रा पर प्रति सेवंफड 16 या इससे अध्िक दर पर किसी गतिशील वस्तु के स्िथर प्रतिबिंब बनें, तो नेत्रा को वह वस्तु चलचित्रा की भाँति चलती - पिफरती अनुभव होगी। ियाकलाप 16.10 नेत्रों को बाहरी वस्तुओं के प्रवेश से सुरक्षा देने केलिए प्रकृति ने पलकें प्रदान की हैं। पलकें बंद होकर अनावश्यक प्रकाश को भी नेत्रों में प्रवेश करने से रोक देती हैं। नेत्रा एक ऐसा अद्भुत यंत्रा है कि सामान्य नेत्रा दूर स्िथत वस्तुओं के साथ - साथ निकट की वस्तुओं को भी स्पष्टतया देख सकता है। वह न्यूनतम दूरी जिस पर नेत्रा वस्तुओं को स्पष्टतया देख सकता है, आयु के साथ परिवतिर्त होती रहती है। सामान्य नेत्रा द्वारा पढ़ने के लिए सवार्िाक सुविधाजनक दूरी लगभग 25 बउ होती है। वुफछ मनुष्य पास रखी वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं परन्तु दूर की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख पाते। इसके विपरीत, वुफछ मनुष्य निकट रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख पाते परन्तु दूर की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकते हैं। उचित संशोधक लेंसों के उपयोग द्वारा नेत्रा के इन दृष्िट दोषों का संशोधन किया जा सकता है। कभी - कभी, विशेष रूप से वृृ(ावस्था में नेत्रादृष्िट धुँधली हो जाती है। यह नेत्रा लेंस के धुँधला हो जाने के कारण होता है। ऐसा होने पर यह कहा जाता है कि नेत्रा में मोतियाबिंद विकसित हो रहा है। इसके कारण दृष्िट कमजोर हो जाती है जो कभी - कभी अत्यिाक गंभीर रूप ले लेता है। इस दोष की चिकित्सा सम्भव है। अपारदशीर्लेंस को हटा कर नया कृत्रिाम लेंस लगा दिया जाता है। आधुनिक प्राौद्योगिकी ने इस प्रवि्रफया को और सरल एवं सुरक्ष्िात बना दिया है। 16.8 नेत्रों की देखभाल यह आवश्यक है कि आप अपने नेत्रों की उचित देखभाल करें। यदि कोइर् भी समस्या है तो आपको किसी नेत्रा विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए। नेत्रों की नियमित जाँच कराइए। ऽ यदि परामशर् दिया गया है तो उचित चश्मे का उपयोग कीजिए। ऽ नेत्रों के लिए बहुत कम या बहुत अिाक प्रकाश हानिकारक है। अपयार्प्त प्रकाश से नेत्रा - ख्िांचाव तथा सरददर् हो सकता है। सूयर् या किसी शक्ितशाली लैम्प का अत्यिाक तीव्र प्रकाश, अथवा लेशर टाचर् का प्रकाश रेटिना को क्षति पहुँचा सकता है। क्या आप जानते हैं?जन्तुओं के नेत्रा विभ्िान्न आकृतियों के होते हैं। केकड़े के नेत्रा बहुत छोटे होते हैं परन्तु इनके द्वारा केकड़ा चारों ओर देख सकता है। इसलिए यदि शत्राु पीछे से भी उसकी ओर आता है तब भी उसे पता लग जाता है। तितली के बड़े नेत्रा होते हैं जो सहस्रों छोटे नेत्रों से मिलकर बने प्रतीत होते हैं ;चित्रा 16.17द्ध। यह केवल सामने अथवा पाश्वर् में ही नहीं बल्िक पीछे का भी देख सकती है। उल्लू रात में भली भाँति देख सकता है परन्तु दिन में नहीं देख पाता। इसके विपरीत दिन के प्रकाश में सिय पक्षी ;चील, गरुड़द्ध दिन में अच्छी प्रकार देख सकते हैं लेकिन रात में ठीक से नहीं देख पाते। उल्लू के नेत्रा में बड़ा काॅनिर्या तथा बड़ी पुतली होती है, ताकि नेत्रा में अिाक प्रकाश प्रवेश कर सके। इसी के साथ - साथ इसके रेटिना में बड़ी संख्या में शलाकाएँ होती हैं तथा केवल वुफछ ही शंवुफ होते हैं। इसके विपरीत दिन के पक्ष्िायों के नेत्रों में शंवुफ अिाक तथा शलाकाएँ कम चित्रा 16.17: तितली के नेत्रा। होती हैं। ऽ सूयर् या किसी शक्ितशाली प्रकाश ड्डोत को कभी भी सीधा मत देख्िाए। ऽ अपने नेत्रों को कभी मत रगडि़ए। यदि आपके नेत्रों में कोइर् धूल का कण गिर जाए तो नेत्रों को स्वच्छ जल से धोइए। यदि कोइर् सुधार न हो तो डाॅक्टर के पास जाइए। ऽ अपने नेत्रों को बारंबार स्वच्छ जल से धोइए। ऽ पठन सामग्री को सदैव दृष्िट की सामान्य दूरी पर रखकर पढि़ए। अपनी पुस्तक को नेत्रों के बहुत समीप लाकर अथवा उसे नेत्रों से बहुत दूर ले जाकर मत पढि़ए। कक्षा टप् में आपने संतुलित आहार के बारे में सीखा था। यदि भोजन में किसी अवयव का अभाव है तो इससे नेत्रों को भी क्षति हो सकती है। भोजन में विटामिन । का अभाव नेत्रों के अनेक रोगों के लिएउत्तरदायी होता है। इनमें सबसे अिाक सामान्य रोग रतौंधी है। इसलिए हमें अपने आहार में विटामिन । युक्त अवयवों को सम्िमलित करना चाहिए। कच्ची गाजर, पूफलगोभी तथा हरी सब्िजयाँ ;जैसे पालकद्ध तथा काॅड - लीवर तेल मेें विटामिन । की प्रचुर मात्रा पाइर् जाती है। अंडे, दूध, दही, पनीर, मक्खन एवं पफल जैसे आम तथा पतीता भी विटामिन । से भरपूर होते हैं। 16.9 चाक्षुष - विकृति वाले व्यक्ित पढ़ - लिख सकते हैं वुफछ व्यक्ित जिनमें बच्चे भी सम्िमलित हैं, चाक्षुषी ;दृष्िट सम्बंधीद्ध - अक्षमता से पीडि़त होते हैं। उनकी वस्तुओं को देखने के लिए सीमित दृष्िट होती है। वुफछ व्यक्ित जन्म से ही बिलवुफल नहीं देख पाते। वुफछ व्यक्ित किसी बीमारी के कारण अपनी दृष्िट खो देते हैं। ऐसे व्यक्ित स्पशर् द्वारा अथवा ध्वनियों को ध्यानपूवर्क सुनकर वस्तुओं को पहचानने का प्रयत्न करते हैं। वे अपनी दूसरी ज्ञानेन्िद्रयों को अिाक विकसित कर लेते हैं। तथापि, अतिरिक्त संसाधन उन्हें अपनी क्षमताओं को और अिाक विकसित करने में सक्षम बना सकते हैं। संसाधन दो प्रकार के हो सकते हैं μ अप्रकाश्िाक साधन तथा प्रकाश्िाक साधन। अप्रकाश्िाक साधनों में चाक्षुष साधन, स्पशर् साधन ;स्पशर् की ज्ञानेन्िद्रय का उपयोग करकेद्ध, श्रवण साधन ;श्रवण की ज्ञानेन्िद्रय का उपयोग करकेद्ध तथा इलेक्ट्राॅनिक साधन सम्िमलित हैं। चाक्षुष साधन शब्दों को आविार्त कर सकते हैं, उचित तीव्रता का प्रकाश प्रदान कर सकते हैं तथा सामग्री को उचित दूरीपर जुटा सकते हैं। स्पशर् साधन जिनमें ब्रैल लेखन पाटी तथा शलाका सम्िमलित हैं, चाक्षुष विकृति युक्त व्यक्ितयों को पढ़ने तथा लिखने में सहायता करते हैं। श्रवण साधनों में वैफसेट, टेपरिकोडर्र, बोलने वाली पुस्तकें तथा ऐसे अन्य साधन सम्िमलित हैं। बोलने वाले वैफलवुफलेटर जैसे इलेक्ट्राॅनिक साधन भी उपलब्ध हैं जिनसे अनेक संगणना कायर् किए जा सकते हैं। बंद परिपथ टेलीविज़्ान भी एक इलेक्ट्राॅनिक साधन है जो मुदि्रत सामग्री को उचित विपयार्स ;वंफट्रास्टद्ध तथा प्रदीप्ित के साथ आविार्त करता है। आजकल श्रवण सीडी ;ब्क्द्ध तथा कम्प्यूटरों के साथ वाक्यंत्रा भी वांछित विषय को सुनने तथा लिखने में अत्यिाक सहायक हैं। प्रकाश्िाक साधनों में द्वि - .पफोकसी लेंस, संस्पशर् लेंस, रंजित लेंस, आवधर्क तथा दूरबीनी साधन सम्िमलित हैं। जबकि लेंसों के संयोजन चाक्षुष सीमाबन्धन के संशोधन के लिए उपयोग किए जाते हैं। दूरबीनी साधन चाॅक बोडर् तथा कक्षा प्रदशर्नों को देखने के लिए उपलब्ध हैं। 16.10 ब्रैल प(ति क्या है? चाक्षुषविवृफति युक्त व्यक्ितयों के लिए सवार्िाक लोकपि्रय साधन ब्रैल कहलाता है। लुइर् ब्रैल जो स्वयं एक चक्षुषविवृफति युक्त व्यक्ित थे, ने चक्षुषविवृफति युक्त व्यक्ितयों के लिए एक प(ति विकसित की तथा इसे 1821 में प्रकाश्िात किया। ब्रैल पद्वति में 63 बिंदुकित पैटनर् अथवा छाप हैं। प्रत्येक छाप एक अक्षर, अक्षरों के समुच्चय, सामान्य शब्दअथवा व्याकरण्िाक चिÉ को प्रदश्िार्त करती है। बिंदुओंको ऊध्वार्धर पंक्ितयों के दो कक्षों में व्यवस्िथत किया गया है। प्रत्येक पंक्ित में तीन बिंदु हैं। अंग्रेजी वणर्माला के वुफछ अक्षरों तथा वुफछ सामान्य शब्दों को प्रदश्िार्त करने के लिए बिंदुकित पैटनर् नीचे दशार्या गया है। लुइर् बै्रल चित्रा 16.18: ब्रैल प(ति में प्रयोग किए जाने वाले बिंदुकित पैटनर् का उदाहरण। वतर्मान प(ति 1932 में अपनाइर् गइर्। सामान्य भाषाओं, इन पैटनर् को जब ब्रैल शीट पर उभारा जाता है तो ये गण्िात तथा वैज्ञानिक विचारों के लिए ब्रैल कोड है। ब्रैल चाक्षुषविवृफति युक्त व्यक्ितयों को छूकर शब्दों को पहचानने प(ति का उपयोग करके अनेक भारतीय भाषाओं को में सहायता करते हैं। स्पशर् को आसान बनाने के लिए बिंदुओं को थोड़ा सा उभार दिया जाता है।पढ़ा जा सकता है। चाक्षुषविवृफति युक्त व्यक्ित ब्रैल प(ति को अक्षरों प्रत्येक छाप को स्मरण करना पड़ता हैं। ब्रैल पाठों को से सीखना प्रारम्भ करता है। इसके पश्चात विशेष हाथ या मशीन से तैयार किया जा सकता है। आजकल छापों एवं अक्षरों के संयोजनों को पहचानता है। सीखने टाइपराइटर जैसी युक्ितयाँ तथा मुद्रण मशीनें विकसित की वििायाँ स्पशर् से पहचान करने पर निभर्र होती हैं। की गइर् हैं। वुफछ चाक्षुषविकृति युक्त भारतीयों को महान उपलब्िधयाँ प्राप्त करने का श्रेय है। दिवाकर नामक एक प्रतिभासम्पन्न बालक ने गायक के रूप में आश्चयर्जनक प्रदशर्न दिए हैं। जन्म से पूणर्तया चाक्षुषविवृफति युक्त श्री रविन्द्र जैन ने इलाहाबाद से अपनी संगीत प्रभाकर की उपािा प्राप्त की। उन्होंने एक गीतकार, संगीतकार तथा गायक के रूप में अपनी श्रेष्ठता को दशार्याहै। श्री लाल आडवाणी जो स्वयं चाक्षुषविकृति युक्त हैं, ने भारत में विकलांगों के पुनवार्स तथा विश्िाष्ट श्िाक्षा के लिए एक संस्था की स्थापना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने यूनेस्को में ब्रैल समस्याओं पर भारत का प्रतिनििात्व किया।हेलन ए. केलर अमेरिका की एक लेख्िाका एवं प्राध्यापिका हेलन ए. केलर सम्भवतः सवर्विदित तथा प्रेरक चाक्षुषविकृति युक्त महिला हैं। 18 महीने की आयु में उन्होंने दृष्िट खो दी थी। लेकिन उनके संकल्प तथा साहस के कारण वह एक विश्वविद्यालय से स्नातक की उपािा ग्रहण कर सकीं। ‘‘स्टोरी आॅपफ माइर् लाइ.पफ’’ ;1903द्ध सहित उन्होंने अनेक पुस्तवेंफ लिखीं। आपने क्या सीखा हैऽ प्रकाश सभी पृष्ठों से परावतिर्त होता है। ऽ जब प्रकाश किसी चिकने, पाॅलिश किए हुए तथा नियमित पृष्ठों पर आपतित होता है तो नियमित परावतर्न होता है। ऽ विसरित परावतर्न खुरदरे पृष्ठों से होता है। ऽ परावतर्न के दो नियम हैं: ;पद्धआपतन कोण, परावतर्न कोण के बराबर होता है। ;पपद्धआपतित किरण, परावतिर्त किरण तथा परावतर्क पृष्ठ पर आपतन बिंदु पर खींचा गया अभ्िालंब एक ही तल में होते हैं। ऽ दपर्ण द्वारा बने प्रतिबिंब में पाश्वर् - परिवतर्न होता है। ऽ किसी कोण पर झुके दो दपर्ण अनेक प्रतिबिंब बना सकते हैं। ऽ बहुलित परावतर्न के कारण वैफलाइडोस्कोप में सुन्दर पैटनर् बनते हैं। ऽ सूयर् का प्रकाश जो श्वेत प्रकाश कहलाता है, सात रंगों से मिलकर बना है। ऽ प्रकाश के अपने घटक रंगों में विभक्त होने को विक्षेपण कहते हैं। ऽ हमारे नेत्रा के महत्त्वपूणर् भाग हैं μ काॅनिर्या ;स्वच्छ मंडलद्ध, आइरिस ;परितारिकाद्ध, पुतली, लेंस, रेटिना ;दृष्िट पटलद्ध तथा दृक् तंत्रिाकाएँ। ऽ सामान्य नेत्रा समीप तथा दूर की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकते हैं। ऽ ब्रैल प(ति का उपयोग करके चाक्षुषविकृति युक्त व्यक्ित पढ़ तथा लिख सकते हैं। ऽ चाक्षुषविकृति युक्त व्यक्ित अपने पयार्वरण से संपवर्फ के लिए अपनी दूसरी ज्ञानेन्िद्रयों को अिाक तीक्ष्णता से विकसित कर लेते हैं। अभ्यास 1.मान लीजिए आप एक अंधेरे कमरे में हैं। क्या आप कमरे में वस्तुओं को देख सकते हैं? क्या आप कमरे के बाहर वस्तुओं को देख सकते हैं। व्याख्या कीजिए। 2.नियमित तथा विसरित परावतर्न में अन्तर बताइए। क्या विसरित परावतर्न का अथर् है कि परावतर्न के नियम विपफल हो गए हैं? 3.निम्न में से प्रत्येक के स्थान के सामने लिख्िाए, यदि प्रकाश की एक समान्तर किरण - पुंज इनसे टकराएतो नियमित परावतर्न होगा या विसरित परावतर्न होगा। प्रत्येक स्िथति में अपने उत्तर का औचित्य बताइए। ;कद्ध पाॅलिश युक्त लकड़ी की मेज ;खद्ध चाॅक पाउडर ;गद्ध गत्ते का पृष्ठ ;घद्ध संगमरमर के पफशर् पर पैफला जल ;घद्ध दपर्ण ;चद्ध कागज का टुकड़ा 4 परावतर्न के नियम बताइए। 5.यह दशार्ने के लिए कि आपतित किरण, परावतिर्त किरण तथा आपतन बिंदु पर अभ्िालंब एक ही तल में होते हैं, एक ियाकलाप का वणर्न कीजिए। 6. नीचे दिए गए रिक्त स्थानों की पूतिर् कीजिएμ ;ंद्ध एक समतल दपर्ण के सामने 1उ दूर खड़ा एक व्यक्ित अपने प्रतिबिंब से उ दूर दिखाइर् देता है। ;इद्ध यदि किसी समतल दपर्ण के सामने खड़े होकर आप अपने दाएँ हाथ से अपने कान को छुएँ तो दपर्ण में ऐसा लगेगा कि आपका दायाँ कान हाथ से छुआ गया है। ;बद्ध जब आप मंद प्रकाश में देखते हैं तो आपकी पुतली का साइज़्ा हो जाता है। ;कद्ध रात्रिा पक्ष्िायों के नेत्रों में शलाकाओं की संख्या की अपेक्षा शंवुफओं की संख्या होती है। प्रश्न 7 तथा 8 में सही विकल्प छाँटिएμ 7. आपतन कोण परावतर्न कोण के बराबर होता है: ;कद्ध सदैव ;खद्ध कभी - कभी ;गद्ध विशेष दशाओं में ;गद्ध कभी नहीं 8.समतल दपर्ण द्वारा बनाया गया प्रतिबिंब होता हैμ ;कद्ध आभासी, दपर्ण के पीछे तथा आविार्त। ;खद्ध आभासी, दपर्ण के पीछे तथा बिंब के साइज़्ा के बराबर। ;गद्ध वास्तविक, दपर्ण के पृष्ठ पर तथा आविार्त। ;घद्ध वास्तविक, दपर्ण के पीछे तथा बिंब के साइज़्ा के बराबर। 9.वैफलाइडोस्कोप की रचना का वणर्न कीजिए। 10.मानव नेत्रा का एक नामांकित रेखाचित्रा बनाइए।

RELOAD if chapter isn't visible.