दो पृष्ठभूमियाँ - भारतीय और अंग्रेशी भारत में अगस्त सन् 1942 में जो वुफछ हुआ, वह आकस्िमक नहीं था। वह पहले से जो बहुत वुफछ होता आ रहा था उसकी चरम परिणति थी। इसके ़बारे में आक्षेप, आलोचना और सपफाइर् के रूप में बहुत वुफछ लिखा जा चुका है और बहुत सपफाइर् दी जा चुकी है। पिफर भी इस लेखन में से असली बात़गायब है, क्योंकि इनमें एक ऐसी चीश को केवल राजनीतिक पहलू से देखा गया है, जो राजनीति से कहीं अध्िक गहरी थी। इन सबके पीछे वह तीव्र भावना बच रही थी कि चाहे वुफछ हो जाए यह राज्य अब बदार्श्त नहीं किया जा सकता। व्यापक उथल - पुथल और उसका दमन जनता की ओर से अकस्मात असंगठित प्रदशर्न और विस्पफोट, जिनका अंत ¯हसात्मक संघषर् और तोड़ - पफोड़ में होता था, शबरदस्त और शक्ितशाली हथ्िायारबंद सेनाओं के विरु( भी लगातार चलते रहे। इनसे जनता की भावनाओं की तीव्रता का पता लगता है। यह भावना उनके नेताओं की गिर.फ्रतारी से पहले भी थी लेकिन इन गिर.फ्रतारियों और उसके बाद अक्सर होने वाले गोलीकांड ने जनता के क्रोध् को भड़का दिया। वे इतने व्रुफ( और उत्तेजित थे कि चुप नहीं बैठ सकते थे। ऐसी परिस्िथतियों में स्थानीय नेता सामने आए और वुफछ समय के लिए उनका अनुसरण किया गया। लेकिन उन्होंने भी जो निदेर्श दिए वे का.पफी नहीं थे। अपने मूल रूप में यह एक सहज जनांदोलन था। पूरे भारत में 1942 इर्. में युवा पीढ़ी ने, विशेष रूप से विश्वविद्यालयों के विद्या£थयों ने ¯हसक और शांतिपूणर् दोनों तरह की कायर्वाहियों में बहुत महत्त्वपूणर् काम किया। इस तरह 1857 के गदर के बाद, पहली बार, भारत में बि्रटिश राज के ढाँचे को बलपूवर्क चुनौती देने के लिए ;लेकिन यह बल निहत्था थाद्ध बहुत बड़ी जनसंख्या उठ खड़ी हुइर्। यह चुनौती मूखर्तापूणर् और बेमौके थी क्योंकि दूसरी ओर सुसंगठित हथ्िायारबंद सैनिक शक्ित थी। यह सैनिक शक्ित इतिहास में पहले किसी अवसर की तुलना में कहीं अध्िक थी। उस भीड़ ने न तो इस द्वंद्व की तैयारी ही की थी और न ही इसके लिए समय का चुनाव खुद किया था। यह स्िथति उनके सामने अनजाने ही आ गइर् थी। तात्कालिक प्रतििया के रूप में, भले ही वह प्रतििया नासमझी से भरी या गलत रही हो, लेकिन उससे भारत की स्वतंत्राता के लिए उन्होंने अपने प्रेम और विदेशी शासन के विरु( अपनी घृणा को प्रकट किया। सन् 1942 के दंगों में पुलिस और सेना की गोलीबारी से मारे गए और घायल हुए लोगांे की संख्या के अनुमानित सरकारी आँकड़े के अनुसार 1,028 मरे और 3,200 घायल हुए। जनता के अंदाश के अनुसार मृतकों की संख्या 25,000 कही जाती है, पर यह संख्या भी संभवतः अतिरंजित है। शायद 10,000 की संख्या श्यादा सही होगी। यह असाधरण बात थी कि वैफसे बहुत से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बि्रटिश शासन खत्म हो गया और उन हिस्सों पर ‘दोबारा विजय पाने में’ उसे फ्रते लग गए। ऐसा विशेष रूप से बिहार में,.कइर् दिन और कभी - कभी हशासन के पिछले 170 वषो± में यह सबसे बड़ा और विनाशकारी था। इसकी तुलना 1766 इर्. से 1770 इर्. के दौरान बंगाल और बिहार के उन भयंकर अकालों से की जा सकती है जो बि्रटिश शासन की स्थापना के आरंभ्िाक परिणाम थे। इसके बाद महामारी पैफली, विशेषकर हैशा और मलेरिया। वह दूसरे सूबों में भी पैफल गइर् और आज भी हशारों की संख्या में लोग उसके श्िाकार हो रहे हैं। इस अकाल ने, ऊपर के थोड़े से लोगों की खुशहाली के झीने आवरण के नीचे भारत की जो तसवीर थी, उसे उघाड़ कर रख दिया। यह तसवीर बि्रटिश शासन की बदहाली और बदसूरती की तस्वीर थी। जब यह सब घटित हो रहा था और कलकत्ता;कोलकाताद्ध की सड़कों पर लाशें बिछी थीं, कलकत्ता के ऊपरी तबके के दस हशार लोगों के सामाजिक जीवन में कोइर् परिवतर्न नहीं आया था। नाच - गाने और दावतों में विलासिता का प्रदशर्न हो रहा था और जीवन उल्लास से भरा था। अक्सर कहा जाता है कि भारत अंत£वरोधें का देश है। वुफछ लोग बहुत ध्नवान हैं और बहुत से लोग बहुत निध्र्न हैं। यहाँ आध्ुनिकता भी है और मध्ययुगीनता भी। यहाँ शासक है और शासित हैं, बि्रटिश हैं और भारतीय हैं। ये अंत£वरोध् सन् 1943 के उत्तरा(र् में अकाल के उन भयंकर दिनों में जैसे कलकत्ता शहर में दिखाइर् पड़े, वैसे पहले कभी नशर नहीं आए थे। अकाल की गहरी वजह उस बुनियादी नीति में थी जो भारत को दिनोदिन गरीब बनाती जा रही थी और जिसके कारण लाखों लोग भुखमरी का जीवन जी रहे थे। भारत में बि्रटिश शासन पर बंगाल की भयंकर बबार्दी ने और उड़ीसा, मालाबार एवं दूसरे स्थानों पर पड़ने वाले अकाल ने आख्िारी .पैफसला दे दिया। पर जब वे जाएँगे, तो वे क्या छोड़ेंगे - तीन वषर् पहले मृत्यु - शÕया पर पड़े टैगोर के सामने यह चित्रा उभरा था - फ्लेकिन वे वैफसा भारत छोड़ेंगे? कितनी नग्न दुगर्ति? अंत में उनके सदियों पुराने प्रशासन की धरा सूख जाएगी तो वे अपने पीछे कितनी कीचड़ और कचरा छोडें़गे?य् दो पृष्ठभूमियाँ - भारतीय और अंग्रेशी भारत की सजीव सामथ्यर् अकाल और यु( के बावजूद, प्रकृति अपना कायाकल्प करती है और कल के लड़ाइर् के मैदान को आज पूफलों और हरी घास से ढक देती हैं। मनुष्य के पास स्मृति का विलक्षण गुण होता है। वह कहानियों और यादों से नि£मत अतीत में बसता है। यह वतर्मान, इससे पहले कि हमें उसका बोध् हो, अतीत में ख्िासक जाता है। आज, जो बीते हुए कल की संतान है, खुद अपनी जगह अपनी संतान, आने वाले कल को दे जाता है। कमशोर आत्मा वाले समपर्ण कर देते हैं और वे हटा दिए जाते हैं, लेकिन बाकी लोग मशाल को आगे ले चलते हैं और आने वाले कल के मागर् - दशर्कों को सौंप देते हैं।

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