अंतिम दौर - दो राष्ट्रीयता बनाम साम्राज्यवाद मध्य वगर् की बेबसी - गांध्ी का आगमन पहला विश्व यु( आरंभ हुआ। राजनीति उतार पर थी। इसका कारण था कांग्रेस का तथाकथ्िात गरम दल और नरम दल में विभाजन और यु( - काल में लागू किए गए नियम और प्रतिबंध्। अंततः विश्व यु( समाप्त हुआ और शांति के परिणामस्वरूप देश में राहत और प्रगति की बजाय दमनकारी कानून और पंजाब में माशर्ल लाॅ लागू हुआ। जनता में अपमान की कड़वाहट और क्रोध् का आवेश भर गया। ऐसे समय में जब हमारे देश के पौरुष को लगातार वुफचला जा रहा थाऋ शोषण की लगातार निमर्म प्रिया से हमारी गरीबी बढ़ रही थी और हमारी जीवन शक्ित क्षीण हो रही थी। किसान वगर् दब्बू और भयभीत था, कारखाने के मशदूरों की स्िथति भी बेहतर नहीं थी। मध्य वगर् और बुिजीवी लोग, जो इस सवर्ग्रासी अंध्कार में आकाशदीप हो सकते थे, खुद इस सवर्व्यापी उदासी में डूबे हुए थे। और तब गांध्ी का आगमन हुआ। वे ताशा हवा के ऐसे झोंके की तरह आए जिसने पैफलकर हमें गहरी साँस लेने के योग्य बनाया। वे ऊपर से अवतरित नहीं हुए थे, वे भारत की करोड़ों की आबादी के बीच से ही निकलकर आए थे। वे उन्हीं की भाषा बोलते थे और लगातार उनकी शोचनीय स्िथति की ओर ध्यान आकष्िार्त करते थे। उन्होंने हमसे कहा कि इन मशदूरों और किसानों की पीठ से उतर जाओ, तुम सब जो उनके शोषण के सहारे ¯शदा हो उस व्यवस्था को समाप्त कर दो जो इस गरीबी और दुगर्ति की जड़ है। उन्होंने जो वुफछ कहा हमने उनमें से श्यादातर बातों को आंश्िाक रूप में माना और कभी - कभी बिलवुफल नहीं माना। लेकिन यह एक गौण बात थी। उनकी श्िाक्षा का सार था - निभर्यता और सत्य और इनसे जुड़ा हुआ कमर्। वे हमेशा सामान्य जनता की खुशहाली पर नशर रखते थे। लेकिन बि्रटिश शासन के अध्ीन सबसे प्रबल एहसास था ‘भय’ - व्यापक दमनकारी, दमघांेटू भय - सेना का, पुलिस का, दूर - दूर तक पैफले हुए खुप्ि़ाफया विभाग का भय, अप्ाफसरों व शमींदार के कारिंदों का भय, साहूकार का भय, बेकारी औऱ़भुखमरी का भय, जो हमेशा करीब खड़ा रहता था। चारों तरपफ पैफले इस डर ही गांधी की शांत ¯कतु दृढ़ आवाश उठी फ्डरो मत।य्ाफ़इस तरह लोगों के ऊपर से भय का काला लबादा उठ गया, पूरी तरह तो नहीं पर आश्चयर्जनक मात्रा में। क्योंकि भय का झूठ से नशदीक का के ख्िालाप्संबंध् होता है। जैसे - जैसे झूठ और लुक - छिपकर काम करने की शरूरत कम होती गइर् वैसे - वैसे एक व्यापक परिवतर्न दिखाइर् देने लगा। यह मनोवैज्ञानिक परिवतर्न था। गांध्ी ने भारत में करोड़ों लोगों को अलग - अलग मात्रा में प्रभावित किया। वुफछ लोगों ने अपने जीवन की पूरी बनावट को ही बदल लिया, वुफछ पर आंश्िाक प्रभाव पड़ा, या पिफर प्रभाव मिट गया, पर पूरी तरह नहीं। अलग - अलग लोगों में प्रतिियाएँ भी अलग - अलग हुइंर् और हर आदमी के पास इस सवाल का अलग - अलग जवाब था। अंतिम दौर - दो गांध्ी जी के नेतृत्व में कांग्रेस सिय गांध्ी जी ने पहली बार कांग्रेस के संगठन में प्रवेश किया और तत्काल उसके संविधन में पूरी तरह परिवतर्न ला दिया। उन्होंने उसे लोकतांत्रिाक और लोक संगठन बनाया। अब उसमें किसानों ने प्रवेश किया और अपने नए रूप में वह एक विशाल किसान - संगठन दिखाइर् देने लगा, जिसमें मध्य वगर् के लोग संख्या में छितरे हुए थे लेकिन उनका शोर का.पफी था। अब उसका खेतिहर चरित्रा बढ़ने लगा। औद्योगिक मशदूर भी उसमें आए लेकिन अपनी व्यक्ितगत हैसियत में, अलग से संगठित रूप में नहीं। इस संगठन का लक्ष्य और आधर था सियता। ऐसी सियता जिसका आधर शांतिपूणर् प(ति थी। अब तक जो विकल्प थे उसमें या तो केवल बातचीत करना और प्रस्ताव पारित करना था अथवा ¯हसक कायर्वाही करना। इन दोनों तरीकों को एक तरप्ाफ हटा दिया और ¯हसा की विशेष रूप से ¯नदा की गइर् क्योंकि वह कांग्रेस की मूल नीति के ख्िाला.पफ था। काम करने का एक नया तरीका निकाला गया, जो पूरी तरह शांतिपूणर् था। लेकिन जिस बात को गलत समझा जाता था उसके आगे सिर झुकाना मंशूर नहीं किया गया। परिणामस्वरूप इस प्रिया में होने वाली जो पीड़ा और कष्ट थे उन्हें खुशी से स्वीकार किया गया। गांध्ी जी विचित्रा प्रकार के शांतिवादी थे, वे गतिशील ऊजार् से भरे सिय व्यक्ित थे। उन्होंने न कभी भाग्य से हार मानी न ऐसी बात के सामने सिर झुकाया जिसे वे बुरा समझते थे। उनमें ़गांध्ी जी ने अंग्रेशी शासन की बुनियादों पर चोट की। उन्होंने कहा कि ख्िाताब छोड़ देने चाहिए। गरचे कम लोगों ने ख्िाताब छोड़े, लेकिन अंग्रेशों द्वारा दिए गए इन ख्िाताबों के लिए आम जनता में इश्शत समाप्त हो गइर् और ये पतन के प्रतीक बन गए। नए मापदंड और मूल्य स्थापित हुए। वायसराय के दरबार और रजवाड़ों की शान - शौकत जो इतना अध्िक प्रभावित करती थी, बेहद उपहासास्पद, अभद्र और शमर्नाक लगने लगी क्योंकि वह आम जनता की गरीबी और कष्टों से घ्िारी हुइर् थी। ध्नी लोगों ने भी कम - से - कम ऊपरी तौर पर, उनमें से बहुतों ने, सादा रहन - सहन अपना लिया। वेशभूषा में उनमें और मामूली लोगों में कोइर् अंतर नहीं रह गया। कांग्रेस के पुराने नेता, जो एक अलग और श्यादा निष्िक्रय परंपरा में पले थे, इन नए तौर - तरीकों को आसानी से नहीं अपना सके और आम जनता की इस उठान से उन्हें परेशानी हुइर्। लेकिन जो हवा पूरे देश में बही, इन लोगों में भी उसका नशा वुफछ दूर तक भर गया। ऐसा कहा जाता है कि भारतीय मानस मूलतः निवृिामागीर् है। पर गांधी जी इस निवृिामागर् के एकदम विपरीत थे। भारतीय जनता की निष्िक्रयता के विरफ( संघषर् करने और उसे बदलने के लिए जितना काम उन्होंने किया, किसी दूसरे ने नहीं किया। उन्होंने हमें गाँवों की ओर भेजा और कमर् के इस नए संदेश को ले जाने वाले अनगिनत दूतों की गतिविध्ियों से देहात में चहल - पहल मच गइर्। किसानों को झकझोरा गया। हम लोगों पर प्रभाव दूसरे ढंग का था। हमने पहली बार ग्रामीण को उसकी कच्ची झोंपड़ी में भूख की उस छाया के साथ जो हमेशा उसका पीछा करती है, चिपटे देखा। हमने इन यात्राओं से भारतीय अथर् - व्यवस्था के बारे में पुस्तकों और विद्वत्तापूणर् भाषणों की तुलना में अिाक जाना। जो भावात्मक अनुभव हमंें पहले हो चुके थे, उन्हें बल मिला। आ£थक, सामाजिक और दूसरे मामलों में गांध्ी जी के विचार बहुत सख्त थे। उन्होंने इन सबको कांग्रेस पर लादने की कोश्िाश नहीं की। इनमंे से वुफछ विचारों को उन्होंने कांग्रेस में पैठाने की कोश्िाश की। वे सावधनी से आगे बढ़े क्योंकि वे जनता को अपने साथ ले चलना चाहते थे। बहुत से अंतिम दौर - दो लोगों ने उनके सभी विचारों को स्वीकार नहीं किया, वुफछ लोगों का उनके बुनियादी दृष्िटकोण से मतभेद था। दो तरह से, उनके विचारों का अस्पष्ट ¯कतु पयार्प्त प्रभाव पड़ा। हर बात की बुनियादी कसौटी यह थी कि उससे आम जनता का भला कहाँ तक होता है और दूसरे यह कि लक्ष्य भले ही सही हो, लेकिन साध्न हमेशा महत्त्वपूणर् होते हैं और उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। गांध्ी मूलतः ध्मर्प्राण व्यक्ित हंै। वे अपने अंतरतम की गहराइयों तक ¯हदू हैं, लेकिन ध्मर् संबंध्ी उनकी अवधरणा का किसी सि(ांत, परंपरा या कमर्कांड से कोइर् संबंध् नहीं है। उनका बुनियादी सरोकार उन नैतिक नियमों में उनके दृढ़ विश्वास से है जिन्हें वे सत्य या प्रेम के नियम कहते हैं। सत्य और अ¯हसा, इन दोनों शब्दों को वे एक ही अथर् के लिए अदल - बदल कर इस्तेमाल करते हैं। उनका दावा है कि वे ¯हदू ध्मर् की मूल भावना को समझते हैं। उन्होंने हर उस सि(ांत और व्यवहार को नामंशूर किया जो उनकी आदशर्वादी व्याख्या से मेल नहीं खाता था। वे सबसे ऊपर नैतिक नियमों की सत्ता मानते हैं, वह भी उस रूप में जिस रूप में उन्होंने खुद उन्हें समझा है। जीवन के अन्य पक्षों की ही तरह औसत आदमी के लिए इससे राजनीति मंें परेशानी और अक्सर गलत.पफहमी पैदा होती है। लेकिन कोइर् बाधा उन्हें अपनी पसंद के सीध्े रास्ते से नहीं हटा पाती, क्योंकि एक सीमा अिाकार होंगे...यही मेरे सपनों का भारत है।य् जहाँ उन्हें अपनी ¯हदू विरासत का गवर् था, वहाँ उन्होंने ¯हदू ध्मर् को एक सावर्भौमिक बाना पहनाने का प्रयत्न किया और सत्य के घेरे में सब ध्मो± को शामिल कर लिया। उन्होंने अपनी सांस्कृतिक विरासत को संकीणर् बनाने से इंकार कर दिया। उन्होंने लिखा - फ्भारतीय संस्कृति न ¯हदू है न इस्लाम, न पूरी तरह से वुफछ और है। यह सबका मिला - जुला रूप है।य् उन्होंने आगे लिखा - फ्मैं चाहता हूँ कि मेरे घर के पास सारे देशों की संस्कृति जितनी स्वतंत्राता से संभव हो उतनी स्वतंत्राता से पैफले। लेकिन उसमें से कोइर् मेरे पैर उखाड़ दे, मुझे यह मंशूर नहीं।य् आध्ुनिक विचारधराओं से प्रभावित होकर उन्होंने कभी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा और उन्हें मशबूती से पकड़े रखा। डूबे हुए लोगों को उठाने की लगन के सामने और सभी बातों की तरह ध्मर् का भी उनके लिए गौण स्थान था। फ्एक अध्भूखे राष्ट्र का न कोइर् धमर् हो सकता है, न कला, न संगठन। करोड़ों भूखे मरते लोगों के लिए जो वुफछ भी उपयोगी हो सकता है वही मेरे लिए सुंदर है। आज हम सबसे पहले ¯शदगी की शरूरी चीशें दें और उसके बाद जीवन के लिए शोभा की वस्तुएँ और अलंकार अपने आप आ जाएँगे...।य् उन्होंने कहा, फ्मेरी आकांक्षा है हर आँख से हर आँसू को पोंछ लेना।य् यह आश्चयर् की बात नहीं है कि इस अद्भुत रूप से तेजस्वी आदमी ने, जिसका पैमाना सबसे गरीब आदमी है, भारत की सामान्य जनता को सम्मोहित कर लिया और उन्हें चुंबक की तरह आक£षत किया। वे उनको अतीत के साथ भविष्य को जोड़ने वाली कड़ी की तरह जान पड़े। उन्होंने केवल अपने अनुयायियों में ही नहीं, बल्िक अपने विरोध्ियों में भी और उन तमाम तटस्थ लोगों में जो इस बारे में निश्चय नहीं कर पाते थे कि क्या सोचना और क्या करना है, एक मनोवैज्ञानिक क्रांति पैदा की। कांग्रेस पर गांध्ी जी का प्रभुत्व था, लेकिन यह खास किस्म का अिाकार था, क्योंकि कांग्रेस एक सिय, विद्रोही, अनेक पक्षीय संगठन था जिसमें तरह - तरह की राय होती थी और उसे आसानी से इध्र - उध्र नहीं ले जाया जा सकता था। गांध्ी जी अक्सर दूसरों की इच्छा के सामने झुक जाते थे। कभी - कभी वे अपने विरु( पैफसलों को भी स्वीकार कर लेते थे। अंतिम दौर - दो इस तरह सन् 1920 में नेशनल कांग्रेस ने और का.पफी हद तक देश ने इस नए रास्ते को अपनाया और बि्रटिश सरकार के ख्िाला.पफ बार - बार संघषर् किया। एक के बाद दूसरा सविनय अवज्ञा आंदोलन हुआ और उसके कारण बहुत कष्ट उठाने पड़े, लेकिन इन मुसीबतों को चूँकि खुद आमंत्रिात किया गया था इसलिए उनसे शक्ित ही मिली। जब सविनय अवज्ञा आंदोलन जारी नहीं था, तब भी भारत में बि्रटिश सरकारी तंत्रा से असहयोग जारी था, गरचे उसका आक्रामक चरित्रा समाप्त हो गया था। अल्पसंख्यकों की समस्या - मुस्िलम लीग - मोहम्मद अली जिन्ना जिसे सांप्रदायिक समस्या कहा जाता था, वह अल्पसंख्यकों के अध्िकारों के साथ इस तरह तालमेल बैठाना था ताकि उन्हें बहुसंख्यकों के ख्िाला.पफ पयार्प्त संरक्षण मिल सके। भारत के अल्पसंख्यक यूरोप की तरह जातीय या राष्ट्रीय अल्पसंख्यक नहीं, वे ध£मक अल्पसंख्यक हैं। जातीय दृष्िट से भारत में एक विचित्रा मिश्रण है, पर जातीय सवाल भारत में न कभी उठे हैं न उठ सकते हैं। ध्मर् इन जातीय विभ्िान्नताओं के ऊपर है। जातियाँ या तो एक दूसरे होता है जो मानसिक रूप से अपना आधार किसी ध£मक वगर् को बनाता है, ¯कतु वास्तव में उसकी दिलचस्पी राजनीतिक शक्ित और अपने समुदाय को बढ़ावा देने में होती है। कांग्रेस सांप्रदायिक हल निकालने के लिए उत्सुक और ¯चतित थी ताकि प्रगति के मागर् की रुकावट को दूर किया जा सके। कांग्रेस की सदस्य - संख्या में मुख्य रूप से ¯हदू थे, लेकिन उनमें बड़ी संख्या में मुसलमानों के अलावा दूसरे तमाम ध्मो± के लोग जैसे सिख, इर्साइर् आदि भी शामिल थे। इसलिए राष्ट्रीय दृष्िटकोण से विचार करना उसकी मजबूरी थी। उसके लिए सबसे बड़ी समस्या थी राष्ट्रीय स्वाध्ीनता और एक स्वतंत्रा लोकतांत्रिाक राज्य की स्थापना। कांग्रेस निस्संदेह एका चाहती थी और उसे मानकर चलती थी, पर उसे ऐसा कोइर् कारण दिखाइर् नहीं पड़ता था जिसकी वजह से भारत के सांस्कृतिक जीवन की संपन्नता और विविध्ता को सिप़्ार्फ एक साँचे में कस दिया जाए। इसलिए का.पफी दूर तक प्रादेश्िाक स्वायत्तता स्वीकार कर ली गइर् और विभ्िान्न समुदायों की स्वतंत्राता और सांस्कृतिक विकास की सुरक्षा के तरीकों पर भी सहमति हो गइर्। दो बुनियादी प्रश्नों पर कांग्रेस अडिग रही - राष्ट्रीय एकता और लोकतंत्रा। आध्ी शताब्दी तक अपने विकास के समय वह इन पर बराबर बल देती रही। गुशरे शमाने में, कम - से - कम सि(ांत में, बि्रटिश सरकार ने भी भारतीय एकता और लोकतंत्रा का समथर्न किया था। लेकिन उसकी नीतियाँ हमें सीधे उस दिशा मेें ले गईं जहाँ इन दोनों का ही अस्वीकार था। अगस्त 1940 इर्में कांग्रेस ने मजबूर होकर घोषणा की कि भारत में बि्रटिश सरकार की नीति ‘जनजीवन में संघषर् और पूफट को प्रत्यक्ष रूप से उकसाती और भड़काती है।’ बि्रटिश सरकार के िाम्मेदार लोग खुल्लमखुल्ला हमसे यह कहने लगे कि शायद किसी नयी व्यवस्था के पक्ष में भारत की एकता की बलि चढ़ानी पड़े और यह भी कि भारत के लिए लोकतंत्रा ठीक नहीं हैं। हम सांप्रदायिक समस्या का कोइर् ऐसा हल न ढूँढ़ सके जो सब पाटिर्यों को मंशूर हो। अंतिम दौर - दो यह साप़्ाफ शाहिर है कि भारत में बहुत से सामंती और प्रतिियावादी समुदाय हैं, इनमें वुफछ यहाँ की शमीन की उपज हैं और वुफछ को जन्म देकर उनका पोषण अंग्रेशों ने किया है। संख्या की दृष्िट से वे भले ही कम हों, लेकिन उनके पास बि्रटिश सत्ता की मदद है। बीते हुए दिनों में अंग्रेशों की नीति मुस्िलम लीग और ¯हदू महासभा के मतभेदों को प्रोत्साहित करके उन पर बल देने की और सांप्रदायिक संगठनों को कांग्रेस के विरु( महत्त्व देने की रही। मिस्टर जिन्ना की माँग का आधर एक नया सि(ांत था, जिसकी उन्होंने हाल ही में घोषणा की थी कि भारत में दो राष्ट्र हैं, ¯हदू और मुसलमान। दो ही क्यों? मैं नहीं जानता, क्योंकि अगर राष्ट्रीयता का आधर ध्मर् है, तब तो भारत में बहुत से राष्ट्र हैं। यहाँ तक कहा जा सकता है कि अतीत में भारत का विकास एक बहुराष्ट्रीय राज्य के रूप में हुआ और उसमें राष्ट्रीय चेतना धीरे - धीरे आइर्। मिस्टर जिन्ना के दो राष्ट्रों के सि(ांत से पाकिस्तान का या भारत के विभाजन की अवधरणा का विकास हुआ। लेकिन उससे ‘दो - राष्ट्रों’ की समस्या का हल नहीं हुआ, क्योंकि वे तो पूरे देश में थे।

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