अंतिम दौर - एक भारत राजनीतिक और आ£थक दृष्िट से पहली बार एक अन्य देश का पुछल्ला बनता है भारत में अंग्रेशी राज्य की स्थापना उसके लिए एकदम नयी घटना थी जिसकी तुलना किसी और राजनीतिक अथवा आ£थक परिवतर्न से नहीं की जा सकती थी। भारत पहले भी जीता जा चुका था, लेकिन ऐसे आक्रमणकारियों द्वारा जो उसकी सीमाओं में आकर बस गए और अपने को भारत के जीवन में शामिल कर लिया। उसने अपनी स्वाध्ीनता कभी नहीं खोइर् थी और वह कभी गुलाम नहीं बना था। भारत कभी ऐसी राजनीतिक और आ£थक व्यवस्था में नहीं बँध था जिसका संचालन - वेंफद्र उसकी ध्रती से बाहर हो। वह कभी ऐसे शासक वगर् के अध्ीन नहीं रहा जो अपने मूल और चरित्रा दोनों में स्थायी रूप से विदेशी था। नया पूँजीवाद सारे विश्व में जो बाशार तैयार कर रहा था उससे हर सूरत में भारत के आ£थक ढाँचे पर प्रभाव पड़ना ही था। लेकिन जो परिवतर्न हुआ वह स्वाभाविक नहीं था और उसने भारतीय समाज के पूरे आ£थक और संरचनात्मक आधर का विघटन कर दिया। यह ऐसी व्यवस्था थी जिसका संचालन बाहर से होता था, जो उस पर लाद दी गइर् थी। भारत बि्रटिश ढाँचे का औपनिवेश्िाक और खेतिहर पुछल्ला बन कर रह गया। अंग्रेशों ने अपने अंग्रेशी नमूने का अनुसरण करते हुए बड़े जमींदार पैदा किए। उनका लक्ष्य था लगान की शक्ल में अध्िक - से - अध्िक रुपया, जल्दी - से - जल्दी इकऋा किया जाए। इसलिए एक ऐसे वगर् को पैदा करना शरूरी समझा गया जिसके स्वाथर् अंग्रेशों के स्वाथर् से अभ्िान्न हों। बि्रटिश शासन ने इस तरह अपनी स्िथति को सुदृढ़ किया। इस व्यवस्था में शमींदार थे, राजा थे और सरकार के विभ्िान्न महकमों में पटवारी, गाँव के मुख्िाया से लेकर ऊपर तक कमर्चारियों की बहुत बड़ी संख्या थी। सरकार के दो खास महकमे थे - मालगुशारी और पुलिस। इन दोनों के ऊपर हर िाले में कलेक्टर या िाला मजिस्ट्रेट होता था जो शासन की ध्ुरी था। इस तरह भारत को साम्राज्यवादी उद्देश्यों के लिए बिना वुफछ भुगतान किए, अंे की तरह इस्तेमाल तो किया ही गया, इसके अलावा उसे इंग्लैंड में बि्रटिश सेना के एक हिस्से के प्रश्िाक्षण का खचर् भी उठाना पड़ा। इस राश्िा को ‘वैफपिटेशन चाजर्’ कहा जाता था। वास्तव में भारत को बि्रटेन के हर तरह के दूसरे खचर् भी उठाने पड़ते थे। उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान भारत में बि्रटिश राज के इतिहास से किसी भी भारतीय को निश्िचत रूप से मायूसी होगी और व्रफोध् आएगा। पिफर भी, इससे अनेक क्षेत्रों में अंग्रेशों की श्रेष्ठता का, यहाँ तक कि हमारी पूफट और कमशोरियों से लाभ उठाने की क्षमता का पता चलता है। भारत में बि्रटिश शासन के अंतविर्रोध् राममोहन राय - बंगाल में अंग्रेशी श्िाक्षा और समाचार पत्रा व्यक्ितगत रूप से अंग्रेशों ने जिनमें श्िाक्षाविद्, प्राच्य - विद्या विशारद्, पत्राकार, मिशनरी और वुफछ अन्य लोग थे, पाश्चात्य संस्वृफति को भारत लाने में महत्त्वपूणर् कायर् किया। अंग्रेशी चिंतन और साहित्य और राजनीतिक परंपरा से भारत को परिचित कराने का श्रेय उन योग्य और उत्साही अंग्रेशों को ही है, जिन्होंने अपने चारों ओर उत्साही भारतीय विद्या£थयों को इकऋा कर लिया था। श्िाक्षा के प्रसार को नापंसद करने के बावजूद, खुद बि्रटिश सरकार को परिस्िथतियों से मजबूर होकर अपनी बढ़ती हुइर् व्यवस्था के लिए क्लको± को प्रश्िाक्ष्िात करके तैयार करने का प्रबंध् करना पड़ा। इसलिए ध्ीरे - ध्ीरे श्िाक्षा का प्रसार होने लगा। यह श्िाक्षा सीमित भी थी और गलत ढंग की भी, पिफर भी उसने नए और सवि्रफय विचारों की दिशा में दिमाग की ख्िाड़कियाँ और दरवाशे खोल दिए। ध्ीरे - ध्ीरे परिवतर्न होने लगा और आध्ुनिक चेतना का प्रसार हुआ। अंतिम दौर - एक यूरोप के विचारों से बहुत सीमित वगर् प्रभावित हुआ क्योंकि भारत अपनी दाशर्निक पृष्ठभूमि को पश्िचम की तुलना में बेहतर समझते हुए उससे चिपका रहा। पश्िचम का वास्तविक आघात और प्रभाव तो जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर हुआ। नयी तकनीक, रेलगाड़ी, छापाखाना, दूसरी मशीनें, यु( के अध्िक कारगर तरीके - यह सब ऐसी बातें थीं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी। सबसे प्रकट और व्यापक परिवतर्न यह हुआ कि खेतिहर व्यवस्था टूट गइर् और उसका स्थान वैयक्ितक संपिा और शमींदारी ने ले लिया। मुद्रा - वेंफदि्रत अथर्व्यवस्था का चलन हुआ और शमीन बिकाऊ वस्तु हो गइर्। देश के किसी और बड़े हिस्से की अपेक्षा बंगाल ने बहुत पहले इन परिवतर्नों को देखा और अनुभव किया, क्योंकि बंगाल में बि्रटिश शासन पचास वषर् पहले स्थापित हो चुका था। अऋारहवीं शताब्दी में बंगाल में एक अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ितत्व का उदय हुआ। ये थे राजा राममोहन राय। वे एक नए ढंग के व्यक्ित थे जिनमें प्राचीन और नवीन ज्ञान का मेल था। भारतीय विचारधरा और दशर्न की उन्हें गहरी जानकारी थीे। वे संस्कृत, .पफारसी और अरबी के विद्वान थे और उस ¯हदू - मुस्िलम संस्कृति की उपज थे जो उस समय भारत के सुसंस्कृत वगर् के लोगों पर छाइर् हुइर् थी। उन्होंने अंग्रेशी और पश्िचम के ध्मर् और संस्कृत के ड्डोतों की खोज के लिए ग्रीक, लातीनी और इब्रानी भाषाएँ सीखीं। पश्िचमी सभ्यता के विज्ञान और तकनीकी पक्षों ने भी उन्हें आकष्िार्त किया। अपने दाशर्निक और विद्वत्तापूणर् झुकाव के कारण राममोहन राय अनिवायर् रूप से प्राचीन साहित्यों की ओर झुके। तुलनात्मक ध्मर् के अध्ययन की प(ति की गयी थीं। बि्रटिश सरकार ने सती प्रथा पर रोक उन्हीं के आंदोलन के कारण लगाइर् थी। राममोहन राय भारतीय पत्राकारिता के प्रवतर्कों में से थे। सन् 1780 के बाद भारत में अंग्रेशों ने कइर् अखबार निकाले। इन अखबारों में आमतौर पर सरकार की कड़ी आलोचना रहती थी। परिणामतः उन पर कड़ा सेंसर लगता था। पहला अखबार जिस पर भारतीयों का स्वामित्व था और जिसका संपादन भी भारतीयों ने किया था 1818 में अंग्रेशी में निकला था। उसी वषर् श्रीरामपुर के बैपटिस्ट पादरियों ने बंगाली में एक मासिक और एक साप्ताहिक पत्रा निकाला। किसी भारतीय भाषा में प्रकाश्िात होने वाले ये पहले पत्रा थे। इसके बाद एक के बाद एक अंग्रेशी और भारतीय भाषाओं में कलकत्ता ;कोलकाताद्ध, मद्रास ;चेन्नइर्द्ध और बंबइर् ;मुंबइर्द्ध से अखबार और पत्रिाकाएँ बड़ी तेशी से निकलने लगीं। राममोहन राय की पत्राकारिता का गहरा संबंध् उनके सुधरवादी आंदोलनों से था। उनका समन्वयवादी और विश्वजनीन दृष्िटकोण क‘र वगर् के लोगों को नापसंद था और वे उनके बहुत से सुधरों का भी विरोध् करते थे। पर उनके बहुत से समथर्कों में टैगोर परिवार था जिसने बाद में बंगाल के पुनजार्गरण में महत्त्वपूणर् भूमिका निभाइर्। राममोहन राय दिल्ली - सम्राट की ओर से इंग्लैंड गए और उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ्िाक वषो± में बि्रस्टल में उनकी मृत्यु हो गइर्। सन् 1857 की महान क्रांति - जातीयतावाद मइर् सन् 1857 में मेरठ की भारतीय सेना ढंग से बहुत अच्छी तरह बनाइर् थी लेकिन नियत समय से पहले हुए विस्पफोट ने नेताओं की योजना ही बिगाड़ दी। यह केवल सैनिक विद्रोह से कहीं अध्िक था। इसका बड़ी तेशी से प्रसार हुआ और इसने जनांदोलन और भारतीय स्वाध्ीनता की लड़ाइर् का रूप ले लिया। जनांदोलन के रूप में यह दिल्ली, संयुक्त प्रांत ;जैसा उन्हें आजकल कहा जाता हैद्ध मध्य भारत के वुफछ भागों और बिहार तक सीमित था। मूलतः यह सामंतीय विस्पफोट था, जिसका नेतृत्व सामंत सरदार और उनके अनुयायी कर रहे थे। व्यापक रूप से पैफली विदेशी - विरोधी भावना से इसे बल मिल रहा था। इनके लिए मुगल राजवंश के उस अवशेष की ओर देखना अनिवायर् हो गया जो अब भी दिल्ली के राजमहल में बैठा था, लेकिन दुबर्ल, बूढ़ा और अशक्त हो गया था। ¯हदू और मुसलमान दोनों ने विद्रोह में पूरी तरह हिस्सा लिया। इस विद्रोह ने बि्रटिश शासन पर पूरा दबाव डाला और अंततः इसका दमन भारतीय सहायता से किया गया। सामंत सरदारों के साथ व्यापक क्षेत्रों में आम जनता की सहानुभूति थी, लेकिन वे अयोग्य, असंगठित थे और उनके सामने कोइर् रचनात्मक आदशर् और सावर्जनिक हित नहीं था। इस विद्रोह से वुफछ श्रेष्ठ छापामार नेता उभर कर आए। इनमें सबसे तेजस्वी थे तांत्या टोपे जिन्होंने कइर् महीनों तक अंग्रेशों को परेशान किया। आख्िार में जब उन्होंने नमर्दा नदी को पार करके मराठा क्षेत्रा में इस आशा से प्रवेश किया कि उनके अपने लोग उनकी सहायता और स्वागत करेंगे, तो उनके साथ धेखा हुआ। इन सबके अलावा एक और विश्िाष्ट नाम जिसे आज भी आम जनता श्र(ापूवर्क स्मरण करती है झाँसी की रानी लक्ष्मीबाइर् का है, भारत की खोज ने बगावत कर दी। विद्रोह की योजना खुप्ि़जो बीस वषर् की आयु में लड़ते - लड़ते मारी गइर्। जिस अंग्रेश जनरल ने उसका मुकाबला किया उसी ने उसके बारे में कहा था कि वह विद्रोही नेताओं में ‘सवोर्त्तम और सबसे बहादुर’ थी। विद्रोह और उसके दमन के बारे में बहुत झूठा और भ्रष्ट इतिहास लिखा गया है। भारतीय उसके बारे में क्या सोचते हैं, यह बात शायद ही किताब के पृष्ठों तक छप कर पहुँच पाइर्। सावरकर ने लगभग तीस वषर् पहले द हिस्ट्री ाफ इंडिपेंडेंस शीषर्क पुस्तक लिखी, लेकिन उनकी पुस्तक तत्काल शब्त कर ली गइर् और अब भी शब्त है। इस विद्रोह ने बि्रटिश शासन को झकझोर कर रख दिया। सरकार ने अपने प्रशासन का पुनगर्ठन किया। बि्रटिश पा£लयामेंट ने ‘इर्स्ट इंडिया वंफपनी’ से देश को अपने हाथ में ले लिया। जिस भारतीय सेना ने अपनी बगावत से विद्रोह की शुरुआत की थी वह नए सिरे से संगठित हुइर्। ¯हदुओं और मुसलमानों में सुधरवादी और दूसरे आंदोलन तकनीकी परिवतर्नों और उनके परिणामों के द्वारा भारत से पश्िचम की वास्तविक टकराहट उन्नीसवीं शताब्दी में हुइर् थी। विचारों के क्षेत्रा में भी परिवतर्न हुआ। पहली प्रतििया अल्पसंख्यक अंग्रेशी पढ़े - लिखे वगर् तक सीमित थी और उसमें लगभग हर पश्िचमी चीश के प्रति प्रशंसा का भाव था। ¯हदू ध्मर् के वुफछ सामाजिक रीति - रिवाजों से ख्िान्न होकर, बहुत से ¯हदू इर्साइर् ध्मर् की ओर आक£षत हुए और बंगाल में वुफछ प्रसि( व्यक्ितयों ने भी ध्मर् - परिवतर्न कर लिया। राजा राममोहन राय ने ¯हदू ‘ब्रह्म - समाज’ की स्थापना समाज - सुधरवादी आधर पर की। उनके बाद केशवचंद्र ने उसे लगभग इर्साइर् रूप दे दिया। बंगाल के उभरते हुए मध्य वगर् पर ब्रह्म समाज का प्रभाव पड़ा लेकिन ध£मक आस्था के रूप में वह बहुत कम लोगों तक सीमित रहा। भारत में अन्य स्थानों पर भी ऐसी ही प्रवृिायाँ काम कर रही थीं और ¯हदू धमर् के कठोर सामाजिक ढाँचे के विरफ( असंतोष उभर रहा था। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरा(र् में स्वामी दयानंद सरस्वती ने एक अत्यंत अंतिम दौर - एक आॅप़्ाफ द वाॅर आॅप़्महत्त्वपूणर् सुधार - आंदोलन की शुरुआत की लेकिन उसकी जड़ पंजाब के ¯हदुओं में जमी। यह आयर् समाज का आंदोलन था और नारा था ‘वेदों की ओर लौटो।’ इस नारे का वास्तविक अथर् था वेदों के समय से आयर् - ध्मर् में होने वाले विकास का निषेध्। यह बात महत्त्वपूणर् है कि इसका प्रसार मुख्य रूप से पंजाब और संयुक्त प्रदेश के ¯हदू मध्य वगर् में हुआ। एक समय ऐसा आया जब सरकार इसे राजनीतिक दृष्िट से क्रांतिकारी आंदोलन समझती थी। लड़के - लड़कियों में समान रूप से श्िाक्षा के प्रसार में, स्ित्रायों की स्िथति का सुधर करने में और दलित जातियों के स्तर को ऊँचा उठाने में इसने बहुत अच्छा काम किया। लगभग स्वामी दयांनद के ही समय में बंगाल में एक दूसरे ढंग का व्यक्ितत्व समाने आया और नए पढ़े - लिखे वगर् के बहुत लोगों पर उसका प्रभाव पड़ा। वे श्रीरामकृष्ण परमहंस थे। वे सीधे - सादे, विद्वान नहीं पर धमर्प्राण व्यक्ित थे लेकिन समाज सुधर में उनकी कोइर् विशेष रुचि नहीं थी। वे सीधे चैतन्य और भारत के अन्य संतों की परंपरा में आते हैं। वे मुख्यतः धा£मक थे पर साथ ही बहुत उदार थे। आत्मसाक्षात्कार की खोज में वे मुसलमान और इर्साइर् तत्वज्ञानियों तक से मिले। उनमें से वुफछ लोग वुफछ समय श्रीरामकृष्ण के साथ भी रहे। वे कलकत्ता के निकट दक्ष्िाणेश्वर में बस गए और उनके असाधरण व्यक्ितत्व और चरित्रा की ओर ध्ीरे - ध्ीरे लोगों का ध्यान आकष्िार्त आधर था और उन्हें भारत की विरासत पर गवर् था। पिफर भी जीवन की समस्याओं के प्रति उनका दृष्िटकोण आध्ुनिक था और वे भारत के अतीत और वतर्मान के बीच एक तरह के सेतु थे। वे बंगला और अंग्रेशी के ओजस्वी वक्ता थे और बंगला गद्य और ललित कविता के लेखक थे। वे सुंदर व्यक्ितत्व के ध्नी थे - रोबीले, शालीन और गरिमावान। उन्हें अपने और अपने मिशन पर भरोसा था। उनमें भारत को आगे बढ़ाने की गहरी लगन थी। उदास और पतित ¯हदू मानस के लिए वे संजीवनी की तरह आए। 1893 इर्में उन्होंने श्िाकागो में अंतरराष्ट्रीय ध्मर् - सम्मेलन में भाग लिया। अमरीका में एक वषर् से अध्िक बिताया, यूरोप की यात्रा एथेंस और वुफस्तुंतुनिया तक की और मिड्ड, चीन और जापान भी गए। जो एक बार इस ¯हदू संन्यासी को देख लेता था, उसके लिए उसे और उसके संदेश को भूलना कठिन हो जाता था। खुद उन पर भी पश्िचमी देशों की यात्रा का बहुत अध्िक प्रभाव पड़ा, वे अंगे्रशों की लगन और अमरीकी लोगों की जीवंतता और समभाव के प्रशंसक थे। लेकिन वे पश्िचम के ध्मर् व्यवहार से प्रभावित नहीं हुए और भारतीय दशर्न और आध्यात्िमक पृष्ठभूमि में उनकी आस्था और बलवती हो गइर्। उन्होंने वेदांत के अद्वैत - दशर्न के एकेश्वरवाद का उपदेश दिया। उन्हें विश्वास था कि विचारशील मानवता के भविष्य के लिए यही एकमात्रा धमर् हो सकता है। उनके अनुसार वणर् - व्यवस्था एक तरह की सामाजिक व्यवस्था है जो ध्मर् से अलग थी और अलग ही रहनी चाहिए। सामाजिक संगठनों को समय के परिवतर्न के साथ बदलना चाहिए। विवेकानंद ने कमर् - कांड के निरथर्क तात्िवक - विवेचनों और तको± की घोर ¯नदा की - विशेषकर उँफची जाति की छुआछूत की। विवेकानंद ने बहुत - सी बातें कहीं लेकिन जिस एक बात के बारे में उन्होंने अपने लेखन और भाषणों में बराबर लिखा, वह थी ‘अभय’ - निडर रहो। उनके अनुसार फ्अगर दुनिया में कोइर् पाप है तो वह दुबर्लता है - हर तरह की दुबर्लता से बचो, दुबर्लता पाप है, दुबर्लता मृत्यु है। उपनिषदों की यही महान श्िाक्षा थी।य् और सत्य की कसौटी है - फ्कोइर् भी चीश जो तुम्हें शारीरिक, बौिक और आध्यात्िमक दृष्िट से कमशोर बनाती है, उसे शहर की तरह छोड़ दो, उसमें कोइर् जीवन नहीं है वह सत्य नहीं हो सकती। सत्य अंतिम दौर - एक मशबूत बनाता है, सत्य पवित्राता है, सवर्ज्ञान है।य् फ्अंध्विश्वासों से सावधान रहो। मैं तुम्हें अंध्विश्वासी मूखर् कहने की अपेक्षा क‘र नास्ितक कहना पसंद करूँगा, क्योंकि नास्ितक सजीव होता है और आप उसे वुफछ बना सकते हैं। लेकिन अगर अंध्विश्वास घर कर ले तो दिमाग गायब हो जाता है, बुि क्षीण होने लगती है, जीवन का पतन होने लगता है ...य् इसलिए विवेकानंद ने भारत के दक्ष्िाणी छोर में कन्यावुफमारी से लेकर हिमालय तक गजर्ना की। इस प्रिया में उन्होंने अपने आपको खपा दिया। सन् 1902 में उनतालीस वषर् की आयु में ही उनकी मृत्यु हो गइर्। विवेकानंद के ही समकालीन थे रवींद्रनाथ टैगोर। ¯कतु वे बाद की पीढ़ी के थे। टैगोर परिवार ने उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान बंगाल के विभ्िान्न सुधारवादी आंदोलनों में आगे बढ़कर भाग लिया था। उस परिवार में आध्यात्िमक दृष्िट से ऊँचे लोग थे, श्रेष्ठ लेखक और कलाकार थे, पर रवींद्रनाथ का स्थान इन सबसे ऊँचा था और पूरे भारत में क्रमशः उनकी स्िथति ऐसी हो गइर् कि कोइर् उनकी बराबरी नहीं कर सकता था। वे राजनीतिज्ञ नहीं थे ¯कतु वे इतने संवदेनशील और भारतीय जनता की स्वाध्ीनता के प्रति इतने सम£पत थे कि जब भी कोइर् बात उनसे बदार्श्त नहीं होती थी, वे बाहर निकलते थे और बि्रटिश सरकार या अपने लोगों को चेतावनी देते थे। बीसवीं सदी के पहले दशक में बंगाल में व्याप्त स्वदेशी आंदोलन में उन्होंने भाग लिया और अमृतसर के हत्याकांड के समय उन्होंने ‘सर’ का ख्िाताब लौटा दिया। श्िाक्षा के क्षेत्रा में उन्होंने जो रचनात्मक कायर् खामोशी से आरंभ किया था, उसने ‘शांति निकेतन’ को भारतीय संस्कृति का प्रधन वेंफद्र बना दिया। भारतीय ने की थी। अथार्त् उन्होंने लोगों को एक सीमा तक इस बात के लिए विवश किया कि वे अपने विचारों के संकीणर् घेरे से बाहर निकलकर मानवता को प्रभावित करने वाले व्यापक प्रश्न पर ध्यान दें। टैगोर भारत के सबसे बड़े मानवतावादी थे। बीसवीं शताब्दी के पूवार्(र् में टैगोर और गांध्ी निस्संदेह भारत के दो विश्िाष्ट और प्रभावशाली व्यक्ितत्व थे। उनकी समानताओं और विषमताओं की तुलना से हम बहुत वुफछ सीख सकते हैं। कोइर् दो व्यक्ित अपनी बनावट और मिशाज में एक - दूसरे से इतने भ्िान्न नहीं हो सकते। टैगोर संभ्रांत कलाकार थे, जो सवर्हारा के प्रति सहानुभूति के कारण लोकतंत्रावादी हो गए थे। गांध्ी, जो विशेष रूप से जनता के आदमी थे, भारतीय किसान का साकार रूप थे और भारत की दूसरी प्राचीन परंपरा का प्रतिनिध्ित्व करते थे। यह परंपरा संन्यास और त्याग की परंपरा थी। टैगोर मूलतः विचारक थे और गांधी अनवरत कमर्ठता के प्रतीक थे। दोनों की, अपने - अपने ढंग की विश्वदृष्िट थी और इसके साथ ही दोनों पूरी तरह भारतीय थे। वे दोनों भारत के अलग - अलग पक्षों का प्रतिनिध्ित्व करते थे जो एक - दूसरे के पूरक थे। अपनी आध्यात्िमक और राष्ट्रीय विरासत में ¯हदू मध्य वगर् की आस्था को बढ़ाने में श्रीमती ऐनी बेसेंट का शबरदस्त प्रभाव पड़ा। इस सब में एक आध्यात्िमक और ध£मक तत्व था, लेकिन साथ ही उसके पीछे सुदृढ़ राजनीतिक पृष्ठभूमि भी थी। उदीयमान मध्य वगर् का झुकाव राजनीतिक था और वह किसी ध्मर् की तलाश में नहीं था। उसे पकड़ने के लिए सांस्कृतिक आधर चाहिए था। वुफछ ऐसा जो उनमें आत्मविश्वास पैदा करता और उस नैराश्य अंतिम दौर - एक और अपमान के बोध् को कम करता, जो उनके भीतर विदेशी जीत और शासन ने पैदा कर दिया था। हर देश में राष्ट्रीयता के विकास के साथ ध्मर् के अलावा यह तलाश, अपने अतीत की ओर जाने की प्रवृिा होती है। भारत का अतीत अपनी संपूणर् संास्कृतिक विविध्ता और महानता के साथ सब भारतीयों की साझी विरासत है - ¯हदुओं, मुसलमानों, इर्साइयों तथा अन्य लोगों की भी और उन्हीं के पूवर्जों ने इसके निमार्ण में सहयोग दिया था। बाद में दूसरे मतों में ध्मर् - परिवतर्न कर लेने के कारण, वे इस विरासत से वंचित नहीं हो जाते। प्राचीन दशर्न और साहित्य, कला और इतिहास ने वुफछ सांत्वना दी। राममोहन राय, दयानंद, विवेकानंद और अन्य लोगों ने नए विचारधरात्मक आंदोलन चलाए। एक ओर उन्होंने अंग्रेशी साहित्य की समृ( साहित्य धरा से रसपान किया वहीं दूसरी ओर उनका मानस भारत के प्राचीन मनीष्िायों और शूरवीरों के विचारों और कायो± से और उन पुरागाथाओं और परंपराओं से भरा था जिन्हें उन्होंने अपने बचपन से आत्मसात किया था। इसमें से बहुत - सी बातें मुसलमान जनता में भी समान रूप से प्रचलित थीं। वे लोग परंपराओं से भलीभाँति परिचित थे। लेकिन ध्ीरे - ध्ीरे, विशेष रूप से उच्च वगर् के मुसलमानों के द्वारा यह महसूस किया जाने लगा कि उनके लिए इन अ(र् - ध£मक परंपराओं से जुड़ना बहुत मुनासिब नहीं होगा। इन परंपराओं को बढ़ावा देना इस्लाम की भावना के विरु( होगा। उन्होंने अपनी कौमी बुनियाद दूसरी जगह तलाश की। वुफछ हद तक उन्होंने उसे भारत के अ.पफगान और मुगल युग में पाया, लेकिन उससे खाली जगह पूरी तरह नहीं भर पाइर्। गदर के बाद भारत के मुसलमान इस असमंजस में थे कि वे किस ओर मुड़ें। बि्रटिश सरकार ने जानबूझकर ¯हदुओं की तुलना में उनका दमन कहीं अध्िक किया और इस दमन का प्रभाव विशेष रूप से उन मुसलमानों पर पड़ा जिनसे नया मध्य वगर् या बुजुर्आ वगर् पैदा होता है। सन् 1870 के बाद उनके प्रति बि्रटिश नीति में ध्ीरे - ध्ीरे परिवतर्न हुआ और वह उनके अिाक अनुवूफल हो गइर्। इस परिवतर्न का विशेष कारण बि्रटिश सरकार की संतुलन की नीति थी। पिफर भी, इस प्रिया में सर सैयद अहमद खाँ की महत्त्वपूणर् भूमिका रही। उन्हें इस बात का भरोसा था कि वे बि्रटिश सत्ता से सहयोग करके ही मुसलमानों को ऊपर उठा सकते हैं। वे इस बात के लिए बहुत भारत की खोज उत्सुक थे कि ये लोग अंग्रेशी श्िाक्षा को स्वीकार कर लें। उन्होंने यूरोपीय सभ्यता को जिस रूप में देखा था, उसका उन पर गहरा प्रभाव था। वास्तव में यूरोप से लिखे उनके वुफछ पत्रों से शाहिर होता है कि वे इतने चकाचैंध् थे कि उनका संतुलन डगमगा - सा गया था। सर सैयद उत्साही सुधरक थे और वे आध्ुनिक वैज्ञानिक विचारों के साथ इस्लाम का मेल बैठाना चाहते थे। वे नए ढंग की श्िाक्षा को बढ़ावा देना चाहते थे। राष्ट्रीय आंदोलन के आरंभ से वे भयभीत हुए, क्योंकि उनका विचार था कि बि्रटिश अध्िकारियों का किसी भी तरह का विरोध् करने के कारण उन्हें अपने शैक्ष्िाक कायर्क्रम में उनकी सहायता नहीं मिलेगी। उन्हें यह सहायता शरूरी मालूम होती थी, इसलिए उन्होंने मुसलमानों में बि्रटिश विरोधी भावना को कम करने की कोश्िाश की और उन्हंे नेशनल कांग्रेस से, जो उस समय आकार ले रही थी, हटाने की कोश्िाश की। उन्होंने जिस अलीगढ़ काॅलेज की स्थापना की, उसका एक घोष्िात उद्देश्य था, ‘भारत के मुसलमानों को बि्रटिश ताज की योग्य और उपयोगी प्रजा बनाना।’ वे नेशनल कांग्रेस का विरोध् इसलिए नहीं करते थे कि वे उसे विशेष रूप से ¯हदू संगठन समझते थे, उन्होंने उसका विरोध् इसलिए किया क्योंकि वे अंग्रशों की सहायता और सहयोग चाहते थे। उन्होंने यह दिखाने की कोश्िाश की कि वुफल मिलाकर मुसलमानों ने गदर में हिस्सा नहीं लिया और वे बि्रटिश सत्ता के प्रति व.पफादार रहे। वे किसी रूप में ¯हदू विरोध्ी या सांप्रदायिक दृष्िट से अलगाववादी नहीं थे। उन्होंने कहा - याद रखो ‘¯हदू’ और ‘मुसलमान’ ये शब्द सि.पर्फ ध£मक अंतर बताने के लिए हैं - वरना सब लोग, चाहे वे ¯हदू हों या मुसलमान, यहाँ तक कि इर्साइर् भी, जो इस देश में रहते हैं, इस दृष्िट से सब एक ही राष्ट्र के लोग हैं। सर सैयद अहमद खाँ का प्रभाव मुसलमानों में उच्च वगर् के वुफछ लोगों तक ही सीमित था, उन्होंने शहरी या देहाती आम जनता से संपवर्फ नहीं किया। सर सैयद के कइर् योग्य और उल्लेखनीय सहयोगी थे। सर सैयद अहमद अपने प्रयत्न में इतनी दूर तक सपफल हुए कि मुसलमानों में अंग्रेशी श्िाक्षा आरंभ हो गइर् और उनका दिमाग राजनीतिक आंदोलन से हट गया। एक मुस्िलम एजुकेशनल कांप्रेंफस शुरू की गइर् और उसने नौकरियों और दूसरे पेशों में उभरते हुए मध्य वगर् के मुसलमानों को आकष्िार्त किया। अंतिम दौर - एक यह बात ध्यान देने की है कि गदर के बाद के समय में भारतीय मुसलमानों में जितने विश्िाष्ट लोग थे, जिनमें सर सैयद भी शमिल हैं, सभी ने पुरानी परंपरागत श्िाक्षा पाइर् थी, हाँ उनमें से वुफछ लोगों ने बाद में अंग्रेशी का ज्ञान हासिल कर लिया। नयी पश्िचमी श्िाक्षा ने तब भी उनके बीच कोइर् उल्लेखनीय व्यक्ितत्व पैदा नहीं किया। वषर् 1912 भारत में मुस्िलम दिमाग के विकास की दृष्िट से उल्लेखनीय है। उस साल दो नए साप्ताहिक निकलने शुरू हुए - उदूर् में अल - हिलाल और अंग्रेशी में द काॅमरेड । अल - हिलाल का आरंभ अबुल कलाम आशाद ;कांग्रेस के वतर्मान सभापतिद्ध ने किया। ये चैबीस वषर् के प्रतिभाशाली नवयुवक थे जो पंद्रह से बीस वषर् की आयु में ही अपने अरबी और .पफारसी के ज्ञान और गहन अध्ययन के लिए प्रसि( हो गए थे। इसके साथ उन्होंने बाहर की इस्लामी दुनिया के बारे में जानकारी हासिल की और उन सुधारवादी आंदोलनों के बारे में भी जो वहाँ चल रहे थे। उन्होंने धमर् - ग्रंथों की व्याख्या बुिवादी दृष्िटकोण से की। वे इस्लामी देशों में किसी भी अन्य भारतीय मुसलमान की अपेक्षा अध्िक प्रसि( हुए। उनका दृष्िटकोण अध्िक उदार और तवर्फसंगत था। इस कारण वे पुराने नेताओं के सामंती, संकीणर् धमिर्कता और अलगाववादी दृष्िटकोण से दूर थे। अपने इसी दृष्िटकोण के कारण वे अनिवायर् रूप से भारतीय राष्ट्रवादी थे। आशाद की शैली में उत्तेजना और तेजस्िवता थी, गोकि कभी - कभी वह प़्लिए उन्होंने नयी शब्दावली का प्रयोग किया और उदर्ू भाषा जैसी आज का नेतृत्व कर रहा था और कभी - कभी प्रकट रूप से, पर अध्िकतर परदे के पीछे से लगभग हर मुस्िलम आंदोलन को प्रभावित करता था। मुस्िलम लीग की स्थापना मुख्य रूप से इन्हीं लोगों के प्रयास से हुइर्। अबुल कलाम आशाद ने इस पुरातनपंथी और राष्ट्रविरोध्ी भावना के गढ़ पर हमला किया। यह काम उन्होंने ऐसे विचारों के प्रसार से किया जिन्होंने अलीगढ़ परंपरा की जड़ ही खोद दी। इस युवा लेखक और पत्राकार ने मुस्िलम बुिजीवी समुदाय में सनसनी पैदा की, यद्यपि बुशुगो± ने उन पर भौहें चढ़ाईं पर युवा पीढ़ी के दिमाग में उनके शब्दों ने उत्तेजना पैदा कर दी। तिलक और गोखले नेशनल कांग्रेस, जिसकी स्थापना सन् 1885 में हुइर् थी, जब प्रौढ़ हुइर् तो एक नए ढंग का नेतृत्व सामने आया। ये लोग अध्िक आक्रामक और अवज्ञाकारी थे और बड़ी संख्या में निम्न मध्यवगर्, विद्याथीेर् और युवा लोगों के प्रतिनिध्ि थे। बंगाल - विभाजन के विरोध् में जो शक्ितशाली आंदोलन हुआ था, उसमें इस प्रकार के कइर् योग्य और ओजस्वी नेता उभरकर आए। लेकिन इसके सच्चे प्रतीक, महाराष्ट्र के बाल गंगाध्र तिलक थे। पुराने नेतृत्व के प्रतिनिध्ि भी कम उम्र के मराठा सज्जन गोपाल कृष्ण गोखले थे। क्रांतिकारी नारे हवा में गूँज रहे थे और संघषर् अनिवायर् था। इस संघषर् को बचाने के लिए कांग्रेस के बुशुगर् नेता दादा भाइर् नौरोजी, जिन्हें राष्ट्रपिता समझा जाता था, अपने अवकाश प्राप्त जीवन से वापस लाए गए। बचाव थोड़े ही दिन के लिए हुआ और 1907 में संघषर् पिफर हुआ जिसमें पुराने उदार दल की जीत हुइर्। पर इसमें संदेह नहीं कि राजनीतिक दृष्िट से सजग भारत की बहुसंख्यक जनता तिलक और उनके समुदाय के पक्ष में थी। कांग्रेस का महत्त्व का.पफी वुफछ घट गया था और बंगाल में ¯हसक गतिविध्ियाँ सामने आ रही थीं। अंतिम दौर - एक

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