नयी समस्याएँ अरब और मंगोल जब हषर् उत्तर - भारत में एक शक्ितशाली साम्राज्य के शासक थे और विद्वान चीनी यात्राी हुआन त्सांग नालंदा में अध्ययन कर रहे थे, उसी समय अरब में इस्लाम अपना रूप ग्रहण कर रहा था। भारत के मध्य भाग तक पहुँचने में इसे लगभग 600 वषर् लग गए और जब उसने राजनीतिक विजय के साथ भारत में प्रवेश किया, तब वह बहुत बदल चुका था और उसके नेता दूसरे लोग थे। अरब वाले भारत के उत्तर - पश्िचमी छोर तक पहुँचकर वहीं रुक गए। अरब सभ्यता का व्रफमशः पतन हुआ और मध्य तथा पश्िचमी एश्िाया में तुकीर् जातियाँ आगे आईं। भारत के सीमावतीर् प्रदेश से यही तुवर्फ और अ.पफगान इस्लाम को राजनीतिक शक्ित के रूप में भारत लाए। अरबों ने बड़ी आसानी से दूर - दूर तक पैफलकर तमाम इलाके प़्ाफतह किए। पर भारत में वे तब भी और बाद में भी ¯सध से आगे नहीं बढ़े। शायद भारत तब भी आव्रफमणकारियों को रोकने के लिए का.पफी मशबूत था। किसी हद तक इसका कारण अरबों के आंतरिक झगड़े भी हो सकते हैं। ¯सध बगदाद की वेंफद्रीय सत्ता से अलग होकर एक छोटा - सा स्वतंत्रा राज्य हो गया। हालाँकि आव्रफमण नहीं हुआ, पर भारत और अरब के बीच संपवर्फ बढ़ने लगा। दोनों ओर से यात्रिायों का आना - जाना हुआ, राजदूतावासों की अदला - बदली हुइर्। भारतीय पुस्तवेंफ, विशेषकर गण्िात और खगोलशास्त्रा पर, बगदाद पहुँचीं और वहाँ अरबी में उनके अनुवाद हुए। बहुत से भारतीय चिकित्सक बगदाद गए। यह व्यापार और सांस्वृफतिक संबंध उत्तर - भारत तक सीमित नहीं थे। भारत के दक्ष्िाणी राज्यांे ने भी उसमें हिस्सा लिया, विशेषकर राष्ट्रवूफटों ने जो भारत के पश्िचमी तट से व्यापार किया करते थे। इस लगातार संपवर्फ के कारण भारतीयों को अनिवायर् रूप से इस नए धमर् इस्लाम की जानकारी हो गइर्। इस नए धमर् को पैफलाने के लिए प्रचारक भी आए और उनका स्वागत हुआ। मसजिदें बनीं। न शासन ने इसका विरोध किया न जनता ने। न कोइर् धा£मक झगड़े हुए। सब धमो± का आदर और पूजा के सभी तरीकों के प्रति सहनशीलता का व्यवहार करना भारत की प्राचीन परंपरा थी। अतः राजनीतिक ताकत के रूप में आने से कइर् शताब्दी पहले इस्लाम भारत में एक धमर् के रूप में आ गया था। महमूद गशनवी और अ.पफगान लगभग तीन सौ वषर् तक भारत पर कोइर् और आव्रफमण नहीं हुआ। 1000 इर्के आसपास अ.पफगानिस्तान के सुलतान महमूद गशनवी ने भारत पर आव्रफमण करने आरंभ किए। महमूद गशनवी तुवर्फ था जिसने मध्य एश्िाया में अपनी ताकत बढ़ा ली थी। उसने बड़ी निमर्मता से कइर् आव्रफमण किए जिनमें बहुत खून - खराबा हुआ। हर बार महमूद अपने साथ बहुत बड़ा खशाना ले गया। ¯हदू धूलकणों की तरह चारों तर.पफ बिखर गए और उनकी याद भर लोगों के मुँह में पुराने किस्से की तरह बाकी रह गइर्। जो तितर - बितर होकर बचे रहे उनके मन में सभी मुसलमानों के प्रति गहरी न.पफरत पैदा हो गइर्। अनुमान लगाया जा सकता है कि महमूद ने कितनी तबाही की थी। पर महमूद ने उत्तरी भारत के सि.पर्फ एक टुकड़े को छुआ और लूटा था जो उसके धावे के रास्ते में पड़ा था। पूरा मध्य पूवीर् और दक्ष्िाणी भारत उससे पूरी तरह बच गया था। महमूद ने पंजाब और ¯सधु को अपने राज्य में मिला लिया। वह हर धावे के बाद गशनी लौट जाता था। वह कश्मीर पर विजय नहीं पा सका। यह पहाड़ी देश उसे रोकने और मार भगाने में सपफल हो गया। काठियावाड़ में सोमनाथ से लौटते हुए राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में भी उसे भारी हार खानी पड़ी। इस आख्िारी धावे के बाद वह पिफर नहीं लौैटा। नयी समस्याएँ महमूद की मृत्यु 1030 इर्. में हुइर्। उसकी मृत्यु के बाद 160 वषो± से अिाक समय तक न तो भारत पर कोइर् आव्रफमण हुआ और न ही पंजाब के आगे तुकीर् शासन का विस्तार हुआ। इसके बाद शाहबुद्दीन गौरी नाम के एक अ.पफगान ने गशनी पर कब्शा कर लिया और गशनवी साम्राज्य का अंत हो गया। उसने पहले लाहौर पर धावा किया और पिफर दिल्ली पर। दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चैहान ने उसे पूरी तरह पराजित कर दिया। शाहबुद्दीन अ.पफगानिस्तान लौट गया और अगले साल एक और पफौज लेकरलौटा। इस बार उसकी जीत हुइर् और 1192 इर्. में वह दिल्ली के तख्त पर बैठा। ़दिल्ली पफतह करने का मतलब यह नहीं था कि बाकी भारत भी पफतह हो गया। दक्ष्िाण में चोल शासक अभी तक बहुत शक्ितशाली थे और उनके अलावा ़पफगानों को दक्ष्िाण भारत के बड़े हिस्से तक अपने .दूसरे स्वतंत्रा राज्य भी थे। अशासन का विस्तार करने में डेढ़ शताब्दी और लगी। लेकिन इस नयी व्यवस्था में दिल्ली का स्थान महत्त्वपूणर् भी था और प्रतीकात्मक भी। भारत पर महमूद गशनवी के आव्रफमण का परिणाम यह हुआ कि वुफछ समय के लिए पंजाब पफगानों .बाकी भारत से अलग हो गया। बारहवीं शताब्दी के अंत मंे आने वाले अकी बात वुफछ और थी। वे ¯हद - आयर् जाति के लोग थे और भारत की जनता से पफगानिस्तान भारत का हिस्सा .उनका निकट का संबंध था। लंबे समय तक अहोकर रहा है और ऐसा होना उसकी नियति थी। चैदहवीं शताब्दी के अंत में तुवर्फ - मंगोल तैमूर ने उत्तर की ओर सेतोड़ दिया था और उसके खंडहरांे पर दक्ष्िाण में कइर् राज्य उठ खड़े हुए थे। इससे बहुत पहले, चैदहवीं शताब्दी के आरंभ मंे, दो बड़े राज्य कायम हुए थे - गुलबगर् जो बहमनी राज्य के नाम से प्रसि( है और विजयनगर का ¯हदू राज्य। दिल्ली की तबाही के बाद उत्तरी भारत कमशोर पड़कर टुकड़ों में बँट गया। दक्ष्िाण भारत की स्िथति बेहतर थी और वहाँ के राज्यों में सबसे बड़ी और शक्ितशाली रियासत विजयनगर थी। इस रियासत और नगर ने उत्तर के बहुत से ¯हदू शरणाथ्िार्यों को आकष्िार्त किया। उपलब्ध वृत्तांतों से पता चलता है कि शहर बहुत समृ( और सुंदर था। जब दक्ष्िाण में विजयनगर तरक्की कर रहा था, उस समय उत्तर की पहाडि़यों से होकर एक और हमलावर दिल्ली के पास, पानीपत के प्रसि( मैदान में आया। उसने 1526 इर्. में दिल्ली के ¯सहासन को जीत लिया। मध्य एश्िाया के तैमूर वंश का यह तुवर्फ - मंगोल बाबर था। भारत में मुगल साम्राज्य की नींव उसी ने डाली। समन्वय और मिली - जुली संस्वृफति का विकास कबीर, गुरु नानक और अमीर खुसरो भारत पर मुस्िलम आव्रफमण की या भारत में मुस्िलम युग की बात करना गलत और भ्रामक है। इस्लाम ने भारत पर आव्रफमण नहीं किया, वह भारत मंे वुफछ सदियों के बाद आया। आव्रफमण तुवफो± ;महमूदद्ध ने किया था, अ.पफगानों ने किया था और उसके बाद तुवर्फ - मंगोल या मुगल आव्रफमण घर और बाकी सारी दुनिया को विदेश मानने लगे। राजनीतिक झगड़ों के बावजूद उन्हें सामान्यतः इसी रूप में स्वीकार कर लिया गया और राजपूत राजाओं में से भी बहुतों ने उन्हें अपना अिाराज मान लिया। पर वुफछ ऐसे राजपूत सरदार थे जिन्होंने उनकी अधीनता अस्वीकार कर दी और भयंकर झगड़े हुए। दिल्ली के प्रसि( सुल्तान प्िाफरोशशाह की माँ ¯हदू थी। यही ़स्िथति गयासुद्दीन तुगलक की थी। अ.पफगानी, तुकीर् और ¯हदू सामंतों के बीच विवाह होते तो थे पर आमतौर पर नहीं। दक्ष्िाण में गुलबगर् के मुस्िलम शासक ने विजयनगर की ¯हदू राजवुफमारी से बहुत ध्ूमधम से विवाह किया था। इस दौर में वुफशल प्रशासन का विकास हुआ और यातायात के साध्नों में विशेष रूप से सुधार हुआ - मुख्यतः सैनिक कारणों से। सरकार अब और अध्िक वेेंफद्रीकृत हो गइर् गोकि उसने इस बात का ध्यान रखा कि स्थानीय रीति - रिवाजों में हस्तक्षेप न करे। शेरशाह ;जिसने मुगल काल के आरंभ में हस्तक्षेप किया थाद्ध अ.पफगान शासकों में सबसे योग्य था। उसने ऐसी मालगुशारी व्यवस्था की नींव डाली जिसका आगे चलकर अकबर ने विकास किया। अकबर के प्रसि( राजस्व मंत्राी टोडरमल की नियुक्ित पहले शेरशाह ने ही की थी। ¯हदुओं की क्षमता का अ.पफगान शासक अिाकाध्िक उपयोग करते गए। भारत और ¯हदू ध्मर् पर अ.पफगानों की विजय का दोहरा असर पड़ा। तत्काल प्रभाव यह पड़ा कि लोग अ.पफगान शासन में पड़ने वाले क्षेत्रों से दूर भागकर दक्ष्िाण की ओर चले गए। जो बचे रहे उन्होंने विदेशी तौर - तरीकों और प्रभावों से अपने को बचाने के लिए वणर् - व्यवस्था को और कठोर बना दिया। दूसरी ओर विचारों और जीवन दोनों में इस विदेशी ढंग की ओर धीरे - ध्ीरे लोगों का रफझान पैदा होने लगा। परिणामतः समन्वय अपने आप रूप लेने लगा। वास्तुकला की नयी शैलियाँ उपजीं, खाना - पहनना बदल गया और जीवन अनेक रूपों में प्रभावित हुआ। यह समन्वय संगीत में विशेष रूप से दिखाइर् पड़ा। भारत की प्राचीन शास्त्राीय प(ति का अनुसरण करते हुए, उसने कइर् दिशाओं में विकास किया। भारत की खोज प़्ाफारसी भाषा दरबार की सरकारी भाषा बन गइर् और .पफारसी के बहुत से शब्द बोलचाल की भाषा में प्रवेश कर गए। इसके साथ ही जन - भाषाओं का भी विकास किया गया। भारत में जिन दुभार्ग्यपूणर् बातों में वृि हुइर् उनमें एक परदा प्रथा थी। ऐसा क्यों हुआ, यह स्पष्ट नहीं है। पर भारत में परदा प्रथा का विकास मुगल - काल में तब हुआ जब यह ¯हदुओं और मुसलमानों दोनों में पद और आदर की निशानी समझा जाने लगा। औरतों को अलग परदे में रखने की यह प्रथा उन इलाकों में ऊँचे वगो± में विशेष रूप से पैफली जहाँ मुसलमानों का प्रभाव सबसे अध्िक था - यानी उस मध्य और विशाल पूवीर् प्रदेश में जिसमें दिल्ली, संयुक्त प्रांत, राजपूताना, बिहार और बंगाल आते हैं। लेकिन अजीब बात है कि पंजाब और सरहदी सूबे में जो मुख्यतः मुस्िलम इलाके थे परदे की प्रथा उतनी कड़ी नहीं थी। दिल्ली में अ.पफगानों के प्रतिष्िठत होने के साथ, पुराने और नए के बीच एक समन्वय रूप ले रहा था। इनमें से अध्िकतर परिवतर्न उच्च वगो± में, अमीर उमरावों में हुए। इनका असर विशाल जन समूह पर, विशेषकर देहाती जनता पर नहीं पड़ा। उनकी शुरफआत दरबारी समाज में होती थी और वे शहरों और कस्बों में पैफल जाते थे। इस तरह उत्तरी भारत में दिल्ली और संयुक्त प्रांत इसके वेंफद्र बने, ठीक उसी तरह जैसे ये पुरानी आयर् संस्कृति का शैनुलआबदीन को उसकी सहिष्णुता और संस्कृत के अध्ययन और प्राचीन संस्कृति को प्रोत्साहित करने के कारण बहुत यश मिला। पूरे भारत में यह नयी उत्तेजना सिय थी और नए विचार लोगों को परेशान कर रहे थे। भारत विदेशी तत्वों को आत्मसात करने का प्रयास कर रहा था और इस प्रिया में थोड़ा - बहुत खुद भी बदल रहा था। इसी बीच वुफछ नए ढंग के सुधरक खड़े हुए जिन्होंने इस समन्वय का जानबूझ कर समथर्न किया और अक्सर वणर् - व्यवस्था की ¯नदा या उपेक्षा की। पंद्रहवीं शताब्दी में दक्ष्िाण में रामानंद और उनके उनसे भी अध्िक प्रसि( श्िाष्य कबीर हुए। कबीर की साख्िायाँ और पद आज भी बहुत लोकपि्रय हैं। उत्तर में गुरु नानक हुए जो सिख - ध्मर् के संस्थापक माने जाते हैं। पूरे ¯हदू ध्मर् पर इन सुधरकों के नए विचारों का प्रभाव पड़ा और भारत में इस्लाम का स्वरूप भी दूसरे स्थानों पर उसके स्वरूप से किसी हद तक भ्िान्न हो गया। इस्लाम के एकेश्वरवाद ने ¯हदू ध्मर् को प्रभावित किया और ¯हदुओं के अस्पष्ट बहुदेववाद का प्रभाव भारतीय मुसलमानों पर पड़ा। इनमें से अध्िकतर भारतीय मुसलमान ऐसे थे जिन्होंने ध्मर् - परिवतर्न किया था और उनका पालन - पोषण प्राचीन परंपराओं में हुआ था और वे अब भी उन्हीं से घ्िारे थे। उनमें बाहर से आने वालों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी। विदेशी तत्वों के भारत में अध्िकाध्िक आत्मसात होने का सबसे महत्त्वपूणर् संकेत, उनके द्वारा देश की आम भाषा का प्रयोग था, गरचे दरबार की भाषा .पफारसी बनी रही। आरंभ के लेखकों में सबसे प्रसि( अमीर खुसरो थे। वे तुवर्फ थे और उनका परिवार दो या तीन पीढि़यों से संयुक्त राज्य में बसा हुआ था। वे चैदहवीं शताब्दी के दौरान कइर् अ.पफगान सुल्तानों के शासन काल में रहे। वे.भाषा और व्याकरण ;संस्कृतद्ध के अतिरिक्त संगीत, गण्िात, विज्ञान और आम का पफल है। उनकी प्रसिि का आधर उनके लोकप्रचलित गीत हैं जिन्हें उन्होंने बोलचाल की सामान्य ¯हदी में लिखा था। उन्होंने ग्रामीण जनता से केवल उसकी भाषा ही नहीं ली बल्िक उनके रीति - रिवाज और रहन - सहन के ढंग का भी वणर्न किया। उन्होंने विभ्िान्न )तुओं और जीवन के विभ्िान्न पहलुओं पर गीत लिखे। वे गीत अब भी उत्तर और मध्य भारत के किसी भी गाँव या नगर में सुनाइर् पड़ सकते हैं। अमीर खुसरो ने अनगिनत पहेलियाँ भी लिखीं। अपने लंबे जीवन - काल में ही खुसरो अपने गीतों और पहेलियों के लिए बहुत प्रसि( हो गए थे। ऐसी कोइर् और मिसाल नहीं मिलती जहाँ छह सौ साल पहले लिखे गए गीतों की लोकपि्रयता आम जनता के बीच बराबर बनी रही हो और बोलों में बिना परिवतर्न किए वे अब भी उसी तरह गाए जाते हों। बाबर और अकबर - भारतीयकरण की प्रिया अकबर भारत में मुगल खानदान का तीसरा शासक था, पिफर भी साम्राज्य की बुनियाद उसी ने पक्की की। उसके बाबा ने दिल्ली के ¯सहासन पर 1526 इर्. में विजय प्राप्त कर ली थी। भारत में आने के चार वषर् के भीतर ही बाबर की मृत्यु हो गइर्। उसका अध्िकतर समय यु( में और आगरा में एक भव्य राजधनी बनाने में बीता। यह काम उसने वुफस्तुंतुनिया के एक प्रसि( वास्तुश्िाल्पी को बुलाकर कराया। बाबर का व्यक्ितत्व आकषर्क है, वह नयी जागृति का शहशादा है, बहादुर और साहसी, जो कला और साहित्य तथा अच्छे रहन - सहन का शौकीन है। उसका पौत्रा अकबर उससे भी अध्िक आकषर्क और गुणवान है। वह बहादुर और दुस्साहसी है, योग्य सेनानायक है और इस सबके अलावा विनम्र और दयालु है, आदशर्वादी और स्वप्नदशीर् है। साथ ही वह लोगों का ऐसा नेता है जो अपने अनुयायियों में तीव्र स्वामिभक्ित उत्पन्न कर सके। वह नयी समस्याएँ लोगों के दिल और दिमाग पर विजय हासिल करना चाहता था। अखंड भारत का पुराना सपना उसमें पिफर आकार लेने लगा - ऐसा भारत जो केवल राजनीतिक दृष्िट से एक राज्य न हो बल्िक जिसकी जनता परस्पर सहज संब( हो। 1556 इर्. से आरंभ होने वाले अपने लंबे शासन के लगभग पचास वषर् के दौरान वह बराबर इसी लक्ष्य की पूतिर् के लिए कोश्िाश करता रहा। बहुत से स्वाभ्िामानी राजपूत सरदारों को उसने अपनी ओर मिला लिया। उसने एक राजपूत राजवुफमारी से शादी की। उसका बेटा और वारिस जहाँगीर इस तरह आध मुगल और आध ¯हदू राजपूत था। जहाँगीर का बेटा शाहजहाँ भी राजपूत माँ का बेटा था। इसलिए यह तुवर्फ - मंगोल वंश, तुवर्फ या मंगोल होने की अपेक्षा कहीं अध्िक भारतीय था। राजपूत राजघरानों से संबंध् बनाने से उसका साम्राज्य बहुत अकबर ने अपने चारों ओर अत्यंत प्रतिभाशाली लोगों का समुदाय इकऋा किया था जो उसके आदशो± के प्रति समपिर्त थे। इन लोगों में .पैफजी और अबुल.पफशल नाम के दो मशहूर भाइर्, बीरबल, राजा मान¯सह और अब्दुल रहीम खानखाना शामिल थे। उसने एक ऐसे नए समन्िवत ध्मर् की शुरुआत करने का प्रयत्न किया जो सबको मान्य हो। स्वयं अकबर निश्िचत रूप से ¯हदुओं में उतना ही लोकपि्रय था जितना मुसलमानों में। मुगल वंश भारत में इस तरह स्थापित हुआ जैसे वह भारत का अपना वंश हो। यांत्रिाक उन्नति और रचनात्मक शक्ित में एश्िाया और यूरोप के बीच अंतर अकबर के दरबार के पुतर्गाली जेसुइट बताते हैं कि उसकी दिलचस्पी बहुत सी बातों में थी और वह उन सबके बारे में जानकारी हासिल करना चाहता था। उसे सैनिक और राजनीतिक मामलों का पूरा ज्ञान तो था ही, साथ ही बहुत सी यांत्रिाक कलाओं का भी। पिफर भी यह अजीब बात है कि उसकी जिज्ञासा एक ¯बदु पर जाकर रुक गइर्। ़यदि अकबर ने इस तरपफ ध्यान दिया होता और पता लगाया होता कि संसार के दूसरे हिस्सों में क्या हो रहा है तो उसने सामाजिक परिवतर्न की बुनियाद रख दी होती। लेकिन उसके सामने बड़ी समस्या यह थी कि वह इस्लाम ध्मर् और लोगों के रीति - रिवाजों का मेल कराके राष्ट्रीय एकता वैफसे कायम करे। इस तरह भारत की सामाजिक स्िथति में अकबर भी कोइर् बुनियादी अंतर पैदा नहीं कर सका और उसके बाद भारत ने पिफर अपना गतिहीन और अपरिवतर्नशील जीवन अपना लिया। अकबर ने जो इमारत खड़ी की थी वह इतनी मशबूत थी कि दुबर्ल उत्तराध्िकारियों के बावजूद वह सौ साल तक कायम रही। ¯सहासन के लिए शहशादों में लगातार यु( होते रहे और वंेफद्रीय शक्ित कमशोर पड़ती गइर्। पर दरबार का प्रताप बना रहा और सारे एश्िाया और यूरोप में आलीशान मुगल बादशाहों का यश पैफल गया। वास्तुकला की दृष्िट से दिल्ली और आगरा में वेफ साथ राष्टªबराबरी के सि(ांतों का विशेषकर उन लोगों पर गहरा असर पड़ा जिन्हें ¯हदू समाज में बराबरी का दजार् देने से इंकार कर दिया गया था। इस विचारधारात्मक टकराहट से कइर् आंदोलन उठ खड़े हुए जिनका उद्देश्य ध£मक समन्वय करना था। यह बात ध्यान देने लायक है कि वगो± का प्रभाव इस हद तक था कि नियमतः लोगों ने इस्लाम में ध्मर् - परिवतर्न सामूहिक रूप से किया। ऊँची जाति के लोगों में व्यक्ित कभी - कभार अकेले धमर् - परिवतर्न कर लेता था पर निम्न श्रेणी के लोगों में मुहल्ले में एक जाति के लोग, या पिफर लगभग सारा गाँव ही ध्मर् बदल लेता था। इसलिए उनका सामूहिक जीवन और काम - काज पहले की ही तरह चलते रहे। केवल पूजा के तरीकों आदि में छोटे - मोटे अंतर अवश्य आ गए। इस कारण आज हम देखते हैं कि वुफछ विशेष पेशे और श्िाल्प ऐसे हैं जिन पर मुसलमानों का एकाध्िकार है। इस तरह कपड़ा बुनने का काम मुख्यतः और श्यादातर हिस्सों में पूरी तरह मुसलमान करते हैं। भारत में रहने वाले अध्िकतर मुसलमानों ने ¯हदू ध्मर् से ध्मर् - परिवतर्न किया था। वुफछ लंबे संपवर्फ के कारण भारत के ¯हदुओं और मुसलमानों ने बहुत - सी समान विशेषताएँ, आदतें, रहने - सहने के ढंग और कलात्मक रुचियाँं विकसित कीं। वे शांतिपूवर्क एक कौम के लोगों की तरह साथ - साथ रहा करते थे। एक - दूसरे के त्योहारों और जलसों में शरीक होेते थे, एक ही भाषा बोलते थे तथा बहुत वुफछ एक ही तरह से रहते थे और एकदम एक जैसी आथ्िार्क समस्याओं का सामना करते थे। यह तमाम आपसदारी और एक साथ रहना - सहना उस वणर् - व्यवस्था के बावजूद हुआ जो ऐसे मेल - मिलाप में बाध्क थी। एकाध् उदाहरणों को छोड़कर आपस में शादी - ब्याह नहीं होते थे और जब ऐसा होता था तो दोनों पक्ष मिलकर एक नहीं होते थे, आपसी खान - पान भी नहीं होता था, पर इस मामले में बहुत कड़ाइर् नहीं बरती जाती थी। औरतों के परदे में अलग - थलग रहने से सामाजिक जीवन के विकास में रुकावट आइर्। नयी समस्याएँ गाँव की आम जनता में अथार्त् आबादी के बड़े हिस्से में जीवन मिला - जुला था और उनमें सामूहिकता कहीं अध्िक थी। गाँव के सीमित घेरे के भीतर ¯हदू और मुसलमानों के बीच गहरे संबंध् थे। वणर् - व्यवस्था से कोइर् बाध नहीं होती थी और ¯हदुओं ने मुसलमानों को भी एक जात मान लिया था। वे एक दूसरे के त्योहारों में शरीक होते थे और वुफछ अ(र् - ध£मक से त्योहार दोनों के बीच समान रूप से मनाए जाते थे। उनके लोक - गीत भी एक ही थे। इनमें से श्यादातर लोग किसान, दस्तकार और श्िाल्पी थे। मुगल शासन - काल के दौरान बहुत से ¯हदुओं ने दरबार की भाषा पफारसी में पुस्तवेंफ लिखीं। इनमें से वुफछ पुस्तवेंफ कालजयी रचनाएँ मानी जाती़हैं। इसी समय मुसलमान विद्वानों ने .पफारसी में संस्कृत की पुस्तकों का अनुवाद किया और ¯हदी में लिखा। ¯हदी के सबसे प्रसि( कवियों में दो हैं मलिक मोहम्मद जायसी, जिन्होंने पद्मावत लिखा और अब्दुल रहीम खानखाना, जो अकबर - दरबार के अमीरों में थे और उनके संरक्षक के पुत्रा थे। खानखाना अरबी, .पफारसी और संस्कृत तीनों भाषाओं के विद्वान थे और उनकी ¯हदी कविता का स्तर बहुत ऊँचा था। वुफछ समय तक वे शाही सेना के सिपहसालार रहे, पिफर भी उन्होंने मेवाड़ के उन राणा प्रताप की प्रशंसा में लिखा जो बराबर अकबर से यु( करते रहे और उनके सामने कभी हथ्िायार नहीं डाले। औरंगशेब ने उल्टी गंगा बहाइर् - ¯हदू राष्ट्रवाद का उभार - श्िावाजी खड़े हुए। वे ¯हदू और मुस्िलम विचारांे का किसी हद तक समन्वय करने वाले शांतिपि्रय समुदाय के प्रतिनिध्ि थे जो दमन और अत्याचार के विरु( एक सैनिक बिरादरी के रूप में संगठित हो गए। भारत के पश्िचमी समुद्र तट पर उसने प्राचीन राष्ट्रवूफटों के वंशज लड़ावूफ मराठों को वु्रफ( कर दिया, ठीक ऐसे समय जब उनके बीच एक अद्भुत सेनानायक उठ खड़ा हुआ था। मुगल साम्राज्य के दूर - दूर तक पैफले क्षेत्रों में उत्तेजना पैफल गइर् और पुनजार्गरणवादी विचार पनपने लगा जिसमें धमर् और राष्ट्रवाद का मेल था। वह आधुनिक युग जैसा धमर्निरपेक्ष ढंग का राष्ट्रवाद नहीं था, न ही इसकी व्याप्ित पूरे भारत में थी। धमर् और राष्ट्रीयता के मेल ने दोनों ही तत्वों से शक्ित और संब(ता हासिल की, लेकिन उसकी कमशोरी भी इसी मेल से पैदा हुइर् थी। यह केवल खास किस्म की और आंश्िाक राष्ट्रीयता थी जिसमें धमर् के क्षेत्रा से बाहर पड़ने वाले तमाम भारतीय तत्वों का समावेश नहीं था। ¯हदू राष्ट्रवाद उस व्यापक राष्ट्रीयतावाद के मागर् में बाधक था जो धमर् और जाति के भेदभाव से उफपर उठ जाती है। विशेषकर मराठों की अवधारणा व्यापक थी और जैसे - जैसे उनकी शक्ित बढ़ी उनके साथ इस अवधारणा का भी विकास हुआ। 1784 इर्. में वारेन हेस्िंटग ने लिखा था, फ्¯हदोस्तान और दक्िखन के तमाम लोगों में से केवल मराठों के मन में राष्ट्र प्रेम की भावना है, जिसकी गहरी छाप राष्ट्र के हर व्यक्ित के मन पर है।य् मराठे अपनी राजनीतिक और सैनिक व्यवस्था और आदतों में उदार थे और उनके भीतर लोकतांत्रिाक भावना थी। इससे उन्हें शक्ित मिलती थी। श्िावाजी औरंगशेब से लड़ा शरूर पर उसने मुसलमानों को खुलकर नौकरियाँ दीं। मुगल साम्राज्य के खंडित होने का महत्त्वपूणर् कारण आ£थक ढाँचे का चरमराना था। किसान बार - बार विद्रोह करते थे, इनमें से वुफछ आंदोलन बड़े पैमाने पर हुए थे। 1669 इर्. के बाद जाट किसान जो राजधानी से बहुत दूर नहीं थे बार - बार दिल्ली सरकार के ख्िाला.पफ खड़े होते रहे। गरीब लोगों का एक अन्य विद्रोह सतनामियों का था। नयी समस्याएँ उस समय जब साम्राज्य में पूफट और बगावत पैफली हुइर् थी, पश्िचमी भारत में नयी मराठा शक्ित विकास कर रही थी और अपने को मशबूत कर रही थी। श्िावाजी, जिनका जन्म 1627 इर्. में हुआ था, पहाड़ी इलाकों के सख्तजान लोगों के आदशर् छापामार नेता थे। उनके घुड़सवार दूर - दूर तक छापे मारते थे। उन्होंने सूरत को, जहाँ अंग्रशों की कोठियाँ थीं, लूटा और मुगल साम्राज्य के दूर - दूर तक पैफले क्षेत्रों पर चैथ - कर लगाया। उन्होंने मराठों को एक शक्ितशाली संगठित प़्ाफौजी दल का रूप दिया, उन्हें राष्ट्रीयतावादी पृष्ठभूमि प्रदान की और दुजेर्य शक्ित का रूप दिया। 1680 इर्में उनकी मृत्यु हो गइर्, लेकिन मराठा शक्ित तब तक बढ़ती गइर् जब तक भारत पर उसका प्रभुत्व नहीं हो गया। प्रभुत्व के लिए मराठों और अंग्रेशों के बीच संघषर् अंग्रेशों की विजय सन् 1707 में औरंगशेब की मृत्यु के बाद 100 वषर् तक भारत पर अिाकार करने के लिए विविध रूपों में संघषर् चलता रहा। अऋारहवीं शताब्दी में भारत पर अिाकार के चार दावेदार थे - इनमें से भारतीय थे मराठे और दक्ष्िाण में हैदरअली और उसका बेटा टीपू सुलतान, विदेशी थे प्रफांसीसी और अंग्रेश। सदी के पूवार्(र् में यह लगभग निश्िचत जान पड़ता था कि मराठे पूरे भारतवषर् पर अपनी हुवूफमत कायम कर लेंगे और मुगल शासन के उत्तरािाकारी होंगे। कोइर् शक्ित इतनी मशबूत नहीं रह गइर् थी कि उनका सामना कर सके। नादिरशाह के आव्रफमण से दिल्ली के मुगल शासकों का अध्िकार और राज्य का रहा सहा दावा भी खत्म हो गया। जिस किसी के पास उन्हें नियंत्रिात करने की शक्ित होती, वे उसी के हाथ की कठपुतली भर रह जाते। नादिरशाह के आने से पहले ही उनकी यह हालत हो चुकी थी। उसने इस प्रिया को पूरा कर दिया। पिफर भी चले आते रिवाजों के दबाव के कारण अंग्रेशी इर्स्ट इंडिया वंफपनी और दूसरे लोग भी उनके पास प्लासी की लड़ाइर् से पहले तक उपहार और कर भेजते रहे, बाद में भी लंबे समय तक वंफपनी दिल्ली के उस बादशाह के एजेंट के रूप में काम करती रही, जिसके नाम के सिक्के 1835 इर्. तक चलते रहे। नादिरशाह के हमले का दूसरा परिणाम यह हुआ कि अ.पफगानिस्तान भारत से अलग हो गया। अ.पफगानिस्तान जो बहुत लंबे समय से भारत का हिस्सा था, उससे कटकर अब नादिरशाह के राज्य का हिस्सा बन गया। बंगाल में, जालसाशी और बगावत को बढ़ावा देकर, क्लाइव ने थोड़े से प्रयास से सन् 1757 में प्लासी का यु( जीत लिया। इस तारीख से कभी - कभी भारत में अंग्रेशी साम्राज्य की शुरुआत मानी जाती है। जल्दी ही पूरा बंगाल और बिहार अंग्रेशों के हाथ आ गया। इनके शासन की शुरुआत के साथ ही 1770 इर्. में इन दोनों सूबों में भयंकर अकाल पड़ा जिससे इस घनी आबादी वाले इलाके की एक तिहाइर् से अध्िक आबादी नष्ट और मध्य भारत में यहाँ तक कि दिल्ली तक पैफले हुए थे और उनका साहस और यु( करने की योग्यता प्रसि( थी। हैदरअली और टीपू सुल्तान भी विकट विरोध्ी थे जिन्होंने अंग्रेशों को बुरी तरह हराया था और इर्स्ट इंडिया वंफपनी की शक्ित को लगभग खत्म कर दिया था। पर वे दक्ष्िाण तक सीमित रहे और पूरे भारत पर उनका कोइर् प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा। हैदरअली एक अद्भुत व्यक्ित और भारतीय इतिहास का उल्लेखनीय व्यक्ितत्व था। उसका आदशर् किसी हद तक राष्ट्रीय था और उसमें कल्पनाशील नेता के गुण थे। मैसूर के टीपू सुल्तान को अंग्रेशों ने अंततः 1799 इर्. में पराजित कर दिया और इस तरह मराठों और अंग्रेशों की इर्स्ट इंडिया वंफपनी के बीच आख्िारी मुकाबले के लिए मैदान सा.पफ हो गया। लेकिन मराठा सरदारों के बीच आपसी वैर था और अंग्रेशों ने उनसे अलग - अलग यु( करके उन्हें पराजित किया। उन्होंने 1804 इर्. में आगरा के पास अंग्रेशों को बुरी तरह हराया, लेकिन 1818 इर्. तक आते - आते मराठा शक्ित अंतिम रूप से वुफचल दी गइर् और उन बड़े सरदारों ने जो मध्य भारत में उनका प्रतिनिध्ित्व कर रहे थे, इर्स्ट इंडिया वंफपनी की अध्ीनता स्वीकार कर ली। अंग्रेश इसके बाद भारत के अध्िकांश भाग के शासक हो गए और वे देश पर सीध्े या पिफर अपने अधीनस्थ राजाओं के माध्यम से शासन करने लगे। हमें बार - बार याद दिलाया जाता है कि अंग्रेशों ने भारत को अव्यवस्था और अराजकता से बचाया। यह बात इस हद तक सही है कि उन्होंने उस युग के बाद जिसे मराठों ने ‘आतंक का युग’ कहा है, सुव्यवस्िथत शासन कायम समझना चाहते होंगे लेकिन घटनाओं की बाढ़ ने उन्हें दबा दिया और उनका कोइर् प्रभाव न पड़ सका। ऐसे व्यक्ितयों में जिनमें जिज्ञासा भरी हुइर् थी महाराजा रणजीत ¯सह थे। वे जाट सिख थे जिन्हांेने पंजाब में अपना साम्राज्य कायम किया था। बाद में यह साम्राज्य कश्मीर और सरहदी सूबे तक पैफल गया। अपनी कमशोरियों के बावजूद वह एक अद्भुत व्यक्ित था। वह अत्यंत मानवीय था। उसने एक राज्य और शक्ितशाली सेना का निमार्ण किया, पिफर भी वह खून - खराबा पसंद नहीं करता था। जब इंग्लैंड में छोटे - मोटे चोर - उचक्कों को भी मौत की सशा भोगनी पड़ती थी, उसने मौत की सशा बंद कर दी, चाहे जुमर् कितना ही बड़ा हो। यु( के सिवाय, उसने कभी किसी की जान नहीं ली, गरचे उसकी जान लेने की कोश्िाश एकाध्िक बार की गइर्। उसका शासन निदर्यता और दमन से मुक्त था। एक दूसरा पर वुफछ और ही ढंग का भारतीय राजनेता, राजपूताने में जयपुर का सवाइर् जय ¯सह था। उसका समय वुफछ और पहले था और उसकी मृत्यु 1743 इर्. में हुइर् थी। वह औरंगशेब की मृत्यु के बाद होने वाली उथल - पुथल के समय हुआ था। वह इतना चतुर और अवसरवादी था कि एक के बाद एक लगने वाले ध्क्कों और परिवतर्नों के बावजूद बचा रहा। वह बहादुर यो(ा और वुफशल राजनयिक तो था ही, इससे बढ़कर वह अंधकारमय युग में जब उथल - पुथल, यु( और उपद्रवों से माहौल भरा था राजपूताना के ठेठ सामंती वातावरण में जय ¯सह ने वैज्ञानिक की तरह उठकर काम किया, यह बात बहुत महत्त्वपूणर् है। भारत की आ£थक पृष्ठभूमि - इंग्लैंड के दो रूप अपने आरंभ्िाक दिनों में इर्स्ट इंडिया वंफपनी का मुख्य काम था भारतीय माल लेकर यूरोप में व्यापार करना। वंफपनी को इससे बहुत लाभ हुआ। भारतीय कारीगरों और श्िाल्िपयों की कारीगरी इस स्तर की थी कि वे इंग्लैंड में उत्पादन के उच्चतर तकनीकों का बड़ी सपफलता से मुकाबला कर सकते थे। जब इग्लैंड में मशीनों का युग शुरू हुआ, उस समय भी भारतीय वस्तुएँ इतनी बहुतायत से वहाँ भरी रहती थीं कि भारी चंुगी लगाकर और वुफछ चीशों का तो आना बंद करके रोकना पड़ा। पर यह बात स्पष्ट है कि भारत का अथर् - तंत्रा चाहे जितना विकसित रहा हो वह बहुत दिनों तक उन देशों के माल से मुकाबला नहीं कर सकता था जिनका औद्योगीकरण हो चुका था। आवश्यक हो गया कि या तो वह अपने यहाँ कल - कारखाने लगाए या विदेशी आ£थक घुस - पैठ के सामने समपर्ण करे, जिसका आगे परिणाम होता राजनीतिक हस्तक्षेप। हुआ यह कि विदेशी राजनीतिक हुवूफमत ने यहाँ पहले आकर बड़ी तेशी से उस अथर् - तंत्रा को नष्ट कर दिया, जिसे भारत ने खड़ा किया था और उसकी जगह कोइर् निश्िचत और रचनात्मक चीश सामने नहीं आइर्। इर्स्ट इंडिया वंफपनी सवर्शक्ितमान थी। व्यापारियों की वंफपनी होने के कारण वह ध्न कमाने पर तुली हुइर् थी। ठीक उस समय जब वह तेशी पफ नेशंस .द वैल्थ आॅसे अपार ध्न कमा रही थी एडम स्िमथ ने सन् 1776 में और काॅमवेल सामने आए और राजनीतिक क्रांति हुइर्। 1660 इर्. में इंग्लैंड की रायल सोसाइटी की स्थापना हुइर्, जिसने विज्ञान की प्रगति में बहुत हिस्सा लिया। सौ साल बाद कपड़ा बुनने की तेश ढरकी का आविष्कार हुआ और उसके बाद तेशी से एक - एक करके कातने की कला, इंजन और मशीन के करघे निकले। इन दो में से भारत कौन - सा इंग्लैड आया? शेक्सपीयर और मिल्टन वाला, शालीन बातों, लेखन और बहादुरी के कारनामों वाला, राजनीतिक क्रंाति और स्वाध्ीनता के लिए संघषर् करने वाला, विज्ञान और तकनीक में प्रगति करने वाला इंग्लैंड या पिफर बबर्र दंड संहिता और नृशंस व्यवहार वाला, वह इंग्लैंड जो सामंतवाद और प्रतिियावाद से घ्िारा हुआ था? ये इंग्लैंड एक दूसरे को प्रभावित करते हुए साथ - साथ चल रहे हैं और इन्हें एक - दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। पिफर भी यह हो जाता है कि गलत इंग्लैड गलत भारत के संपवर्फ में आकर उसे बढ़ावा दे। संयुक्त राज्य अमरीका के स्वतंत्रा होने का समय लगभग वही है जो भारत के स्वतंत्राता खोने का समय है। यह सच है कि अमरीकियों में बहुत से गुण हैं और हममें बहुत - सी कमशोरियाँ हैं। यह भी सच है कि अमरीका में नयी शुरुआत के लिए बिलवुफल अनछुआ और सा.पफ मैदान था जबकि हम प्राचीन स्मृतियों और परंपराओं से जकड़े हुए थे। पिफर भी इस बात की

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