युगों का दौर गुप्त शासन में राष्ट्रीयता और साम्राज्यवाद मौयर् साम्राज्य का अवसान हुआ और उसकी जगह शुंग वंश ने ले ली जिसका शासन अपेक्षाकृत बहुत छोटे क्षेत्रा पर था। दक्ष्िाण में बड़े राज्य उभर रहे थे और उत्तर में काबुल से पंजाब तक बाख्त्राी या भारतीय - यूनानी पैफल गए थे। मेनांडर के नेतृत्व में उन्होंने पाटलीपुत्रा तक पर हमला किया ¯कतु उनकी हार हुइर्। खुद मेनांडर पर भारतीय चेतना और वातावरण का प्रभाव पड़ा और वह बौ( हो गया। वह राजा मि¯लद के नाम से प्रसि( हुआ। बौ( आख्यानों में उसकी लोक - प्रसिि लगभग एक संत के रूप में हुइर्। भारतीय और यूनानी संस्कृतियों के मेल से अ.पफगानिस्तान और सरहदी सूबे के क्षेत्रा में गांधर की यूनानी - बौ( कला का जन्म हुआ। भारत के मध्य प्रदेश में सांची के निकट बेसनगर में ग्रेनाइट पत्थर की एक लाट है जो हेलिओदो स्तंभ के नाम से प्रसि( है। इसका समय इर्.पू. पहली शताब्दी है और इस पर संस्कृत का एक लेख खुदा है। इससे हमें उन यूनानियों के भारतीयकरण की झलक मिलती है जो सरहद पर आए थे और भारतीय संस्कृति को जश्ब कर रहे थे। मध्य - एश्िाया में शक ;सीदियनद्ध लोग आॅक्सस ;अक्षुद्ध नदी की घाटी में बस गए थे। यूइ - ची सुदूर पूरब से आए और उन्होंने इन लोगों को उत्तर - भारत की ओर ध्केल दिया। ये शक बौ( और ¯हदू हो गए। यूइ - चियों में से एक दल वुफषाणों का था। उन्होंने सब पर अध्िकार करके उत्तर - भारत तक अपना विस्तार कर लिया। उन्होंने शकों को पराजित करके उन्हें दक्ष्िाण की ओर खदेड़ा। शक काठियावाड़ और दक्िखन की ओर चले गए। इसके बाद वुफषाणों ने पूरे उत्तर - भारत पर और मध्य - एश्िाया के बहुत बड़े भाग पर अपना व्यापक और मशबूत साम्राज्य कायम किया। उनमें से वुफछ ने ¯हदू धमर् को अपना लिया लेकिन अध्िकांश लोग बौ( हो गए। उनका सबसे प्रसि( शासक कनिष्क उन बौ( कथाओं का भी नायक है, जिनमें उसके महान कारनामों और सावर्जनिक कामों का िाव्रफ किया गया है। उसके बौ( होने के बावजूद ऐसा लगता है कि राज्य - ध्मर् का स्वरूप वुफछ मिला - जुला था जिसमें शरथुष्ट्र के ध्मर् का भी योगदान था। यह सरहदी सूबा, जो वुफषाण साम्राज्य कहलाया, उसकी राजधनी आध्ुनिक पेशावर के निकट थी। तक्षश्िाला का पुराना विश्वविद्यालय भी उसके निकट था। वह बहुत से राष्ट्रों से आने वाले लोगों के मिलने का स्थान बन गया। यहाँ भारतीयों की मुलाकात सीदियनों, यूइ - चियों, इर्रानियों, बाख्त्राी - यूनानियों, तुको± और चीनियों से होती थी। ये विभ्िान्न संस्कृतियाँ एक - दूसरे को प्रभावित करती थीं। इनके आपसी प्रभावों के परिणामस्वरूप मूतिर्कला और चित्राकला की एक सशक्त शैली ने जन्म लिया। इतिहास की दृष्िट से, इसी शमाने में चीन और भारत के बीच पहले संपवर्फ हुए और 64 इर्. में यहाँ चीनी राजदूत आए। उस समय चीन से भारत को जो तोहप़्ू और नाशपाती के पेड़ थे।ोफ मिले उनमें आड़गोबी रेगिस्तान के ठीक किनारे - किनारे तू.पफार्न और वूफचा में भारतीय, चीनी महायान की विजय हुइर्। महायान के ही सि(ांतों का प्रचार चीन में हुआ। लंका और बमार् ;वतर्मान श्रीलंका और म्यांमारद्ध हीनयान को मानते रहे। वुफषाणों ने अपना भारतीयकरण कर लिया था। वे भारतीय संस्कृति के संरक्षक हो गए थे, पिफर भी राष्ट्रीय विरोध् की एक अंतधर्रा उनके शासन के ख्िालापफ बराबर चल रही थी। बाद में जब भारत में नयी जातियों का आगमन हुआ, तो इर्सा की चैथी शताब्दी के आरंभ में विदेश्िायों का विरोध् करने वाले इस राष्ट्रीय आंदोलन ने निश्िचत रूप ग्रहण कर लिया। एक दूसरे महान शासक ने, जिसका नाम भी चंद्रगुप्त था, नए हमलावरों को मार भगाया और एक शक्ितशाली विशाल साम्राज्य कायम किया। इस तरह इर्. 320 में गुप्त - साम्राज्य का युग आरंभ हुआ। इस साम्राज्य में एक के बाद एक कइर् महान शासक हुए, जो यु( और शांति, दोनों कलाओं में सपफल हुए। लगातार हमलों ने विदेश्िायों के प्रति प्रबल विरोध्ी भावना को जन्म दिया और देश के पुराने ब्राह्मण - क्षत्रिाय तत्वों को मातृभूमि और संस्कृति दोनों की रक्षा के बारे में सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा। जो विदेशी तत्व यहाँ घुलमिल गए थे, उन्हें स्वीकार कर लिया गया, लेकिन हर नए आने वाले को प्रबल विरोध् का सामना करना पड़ा और पुराने ब्राह्मण आदशो± के आधर पर सजातीय राज्य कायम करने का प्रयास किया गया। लेकिन क्रमशः इन आदशो± में ऐसी क‘रता विकसित होने लगी थी जो इनके स्वभाव के विपरीत थी। नहीं तोड़ा बल्िक उसके सांस्कृतिक आदशो± और सामाजिक ढाँचे के लिए भी खतरा पैदा कर दिया। इनके विरु( जो प्रतििया हुइर् उसका रूप मूलतः राष्ट्रवादी था। उसमें राष्ट्रवाद की शक्ित भी थी और संकीणर्ता भी। ध्मर् और दशर्न, इतिहास और परंपरा, रीति - रिवाज और सामाजिक ढाँचा, जिसके व्यापक घेरे में उस समय के भारत के जीवन के सभी पहलू आते थे, जिसे ब्राह्मणवाद या ¯हदूवाद कहा गया, वह इस राष्ट्रवाद का प्रतीक बना। यह दरअसल राष्ट्रीय ध्मर् था, जिससे वे तमाम गहरी जातीय और सांस्कृतिक प्रवृिायाँ प्रभावित हुईं जो आज हर जगह राष्ट्रीयता की बुनियाद में मौजूद हैं। जिस बौ( ध्मर् का जन्म भारतीय विचार से हुआ था, उसके लिए भारत वह पुण्य भूमि थी जहाँ बु( ने जन्म लिया, उपदेश दिया और वहीं उनका निवार्ण हुआ। पर बौ( ध्मर् मूल रूप में अंतरराष्ट्रीय था, विश्वध्मर् था। जैसे - जैसे उसका विकास और विस्तार हुआ वैसे - वैसे उसका यह रूप और विकसित होता गया। इसलिए पुराने ब्राह्मण ध्मर् के लिए स्वाभाविक था कि वह बार - बार राष्ट्रीय पुनजार्गरण का प्रतीक बने। लगभग डेढ़ सौ वषर् तक उनके उत्तराध्िकारी अपने बचाव मंे लगे रहे और साम्राज्य सिवुफड़कर लगातार छोटा होता चला गया। मध्य एश्िाया से नए आक्रमणकारी लगातार भारत पर हमला कर रहे थे। ये ‘गोरे हूण’ कहलाते थे जिन्होंने मुल्क में बड़ी लूटमार की। अंततः यशोवमर्न के नेतृत्व में संगठित होकर उन पर आक्रमण किया गया और उनके सरदार मिहिरगुल को बंदी बना लिया गया। लेकिन गुप्तों के वंशज बालादित्य ने उसके प्रति उदारता का व्यवहार किया और उसे भारत से लौट जाने दिया। मिहिरगुल ने इसके बदले लौटकर अपने मेहरबान पर कपटपूणर् हमला कर दिया। उत्तर भारत में हूणों का शासन बहुत थोड़े समय रहा - लगभग आधी - शताब्दी। उनमें से बहुत से लोग देश में छोटे - छोटे सरदारों के रूप में यहीं रह गए। वे कभी - कभी परेशानी पैदा करते थे और भारतीय जन समुदाय के सागर में जश्ब होते जाते थे। इनमें से वुफछ सरदार सातवीं शताब्दी के आरंभ में आक्रमणकारी हो गए। उनका दमन करके कन्नौज के राजा हषर्वध्र्न ने उत्तर से लेकर मध्य भारत तक एक बहुत शक्ितशाली राज्य की स्थापना की। वे क‘र बौ( थे। उनका महायान संप्रदाय अनेक रूपों में ¯हदूवाद से मिलता - जुलता था। उन्होंने बौ( और ¯हदू दोनों ध्मो± को बढ़ावा दिया। उन्हीं के समय में प्रसि( चीनी यात्राी हुआन त्सांग ;या युआन च्वानद्ध भारत आया था ;629 इर्. मेंद्ध। हषर्वध्र्न कवि और नाटककार था। उसने अपने दरबार में बहुत से कलाकारों और कवियों को इकऋा किया और अपनी राजधनी उज्जयिनी को सांस्कृतिक गतिविध्ियों का प्रसि( वेंफद्र बनाया था। हषर् की मृत्यु 648 इर्. में हुइर् थी। यह लगभग वह समय था जब अरब के रेगिस्तानों से अप्रफीका और एश्िाया में पैफलने के लिए इस्लाम सिर उठा रहा था। दक्ष्िाण भारत दक्ष्िाण भारत में मौयर् साम्राज्य के सिमटकर अंत हो जाने के एक हशार साल से भी श्यादा समय तक बड़े - बड़े राज्य पूफले - पफले। दक्ष्िाण भारत अपनी बारीक दस्तकारी और समुद्री व्यापार के लिए विशेष रूप से प्रसि( था। उसकी गिनती समुद्री ताकतों में होती थी और भारत की खोज इनके जहाश दूर देशों तक माल पहुँचाया करते थे। वहाँ यूनानियों की बस्ितयाँ थीं और रोमन सिक्के भी वहाँ पाए गए। उत्तरी भारत पर बार - बार होने वाले हमलों का सीध प्रभाव दक्ष्िाण पर नहीं पड़ा। इसका परोक्ष प्रभाव यह शरूर हुआ कि बहुत से लोग उत्तर से दक्ष्िाण में जाकर बस गए। इन लोगों में राजगीर, श्िाल्पी और कारीगर भी शामिल थे। इस प्रकार दक्ष्िाण पुरानी कलात्मक - परंपरा का वेंफद्र बन गया और उत्तर उन नयी धराओं से अध्िक प्रभावित हुआ, जो आक्रमणकारी अपने साथ लाते थे। शांतिपूणर् विकास और यु( के तरीके बार - बार हमलों और एक के बाद दूसरे साम्राज्य की स्थापना का जो संक्ष्िाप्त ब्यौरा प्रस्तुत किया गया, उसके बीच देश मंे शांतिपूणर् और व्यवस्िथत शासन के लंबे दौर रहे हैं। मौयर्, वुफषाण, गुप्त और दक्ष्िाण में आंध््र, चालुक्य, राष्ट्रवूफट के अलावा और भी राज्य ऐसे हैं जो दो - दो, तीन - तीन सौ वषो± तक कायम रहे। इनमें लगभग सभी राजवंश देशी थे। वुफषाणों जैसे लोगों ने भी जो उत्तरी सीमा पार से आए थे, जल्दी अपने आपको इस देश और इसकी सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप ढाल लिया। जब कभी दो राज्यों के बीच यु( या कोइर् आंतरिक राजनीतिक आंदोलन होता था, तो आम जनता की जीवनचयार् में बहुत कम हस्तक्षेप किया जाता था। इस इतिहास के व्यापक सवेर्क्षण से इस बात का संकेत मिलता है कि यहाँ शांतिपूणर् और व्यवस्िथत जीवन के लंबे दौर यूरोप की तुलना में कहीं अध्िक हैं। यह धरणा भ्रामक है कि अंग्रेशी राज ने पहली बार भारत में शांति और व्यवस्था कायम की। अलबत्ता यह सही है कि जब भारत में अंग्रेशी शासन कायम हुआ, उस समय देश अवनति की पराकाष्ठा पर था। युगों का दौर राजनीतिक और आ£थक व्यवस्था टूट चुकी थी। वास्तव में यही कारण था कि वह राज यहाँ कायम हो सका। प्रगति बनाम सुरक्षा भारत में जिस सभ्यता का निमार्ण किया गया उसका मूल आधर स्िथरता और सुरक्षा की भावना थी। इस दृष्िट से वह उन तमाम सभ्यताओं से कहीं अध्िक सपफल रही जिनका उदय पश्िचम में हुआ था। वणर् - व्यवस्था और संयुक्त परिवारों पर आधरित सामाजिक ढाँचे ने इस उद्देश्य को पूरा करने में सहायता की। यह व्यवस्था अच्छे - बुरे के भेद को मिटाकर सबको एक स्तर पर ले आती है और इस तरह व्यक्ितवाद की भूमिका इसमें बहुत कम रह जाती है। यह दिलचस्प बात है कि जहाँ भारतीय दशर्न अत्यिाक व्यक्ितवादी है और उसकी लगभग सारी ¯चता व्यक्ित के विकास को लेकर है वहाँ भारत का सामाजिक ढाँचा सामुदायिक था और उसमें सामाजिक और सामुदायिक रीति - रिवाजों का कड़ाइर् से पालन करना पड़ता था। इस सारी पाबंदी के बावजूद पूरे समुदाय को लेकर बहुत लचीलापन भी था। ऐसा कोइर् कानून या सामाजिक नियम नहीं था, जिसे रीति - रिवाज से बदला न जा सके। यह भी संभव था कि नए समुदाय अपने अलग - अलग रीति - रिवाजों, विश्वासों और जीवन - व्यवहार को बनाए रखकर बड़े सामाजिक संगठन के अंग बने रहें। इसी लचीलेपन ने विदेशी तत्वों को आत्मसात करने हलचल पैदा कर पाते थे। राज सत्ता चाहे देखने में कितनी निरंवुफश लगती हो, रीति - रिवाजों और वैधनिक बंध्नों से वुफछ इस तरह नियंत्रिात रहती थी कि कोइर् शासक ग्राम समुदाय के सामान्य और विशेषाध्िकारों में आसानी से दखल नहीं दे सकता था। इन प्रचलित अिाकारों के तहत समुदाय और व्यक्ितत्व दोनों की स्वतंत्राता एक हद तक सुरक्ष्िात रहती थी। ऐसा लगता है कि ऐसे हर तत्व ने जो बाहर से भारत में आया और जिसे भारत ने जश्ब कर लिया, भारत को वुफछ दिया और उससे बहुत वुफछ लिया। जहाँ वह अलग - थलग रहा, वहाँ वह अंततः नष्ट हो गया और कभी - कभी इस प्रिया में उसने खुद को या भारत को नुकसान पहुँचाया। भारत का प्राचीन रंगमंच भारतीय रंगमंच अपने मूल में, संब( विचारों में और अपने विकास में पूरी तरह स्वतंत्रा था। इसका मूल उद्गम ट्टग्वेद की उन ट्टचाओं और संवादों मंे खोजा जा सकता है जिनमंे एक हद तक नाटकीयता है। रामायण और महाभारत में नाटकों का उल्लेख मिलता है। कृष्ण - लीला से संबंिात गीत, संगीत और नृत्य में इसने आकार ग्रहण करना आरंभ कर दिया था। इर्. पूवर् छठी या सातवीं शताब्दी के महान वैयाकरण पाण्िानि ने वुफछ नाट्य - रूपों का उल्लेख किया है। रंगमंच की कला पर रचित नाट्यशास्त्रा को इर्सा की तीसरी शताब्दी की है। अब तक मिले संस्कृत नाटकों में प्राचीनतम नाटक अश्वघोष के हैं। वह इर्सवी सन् के आरंभ के ठीक पहले या बाद में हुआ था। ये ताड़ - पत्रा पर लिख्िात पांडुलिपियों के अंश मात्रा हैं और आश्चयर् की बात यह कि ये पफार्न में मिले हैं। अश्वघोष ध्मर्परायण बौ(.गोबी रेगिस्तान की सरहदों पर तुहुआ। उसने बु(चरित नाम से बु( की जीवनी लिखी। यह ग्रंथ बहुत प्रसि( हुआ और बहुत समय पहले भारत, चीन और तिब्बत में बहुत लोकपि्रय हुआ। यूरोप को प्राचीन भारतीय नाटक के बारे में पहली जानकारी 1789 इर्में तब हुइर् जब कालिदास के शवंुफतला का सर विलियम जोंस कृत अनुवाद प्रकाश्िात हुआ। सर विलियम जोंस के अनुवाद के आधर पर जमर्न, प्रेंफच, डेनिश और इटालियन में भी इसके अनुवाद हुए। गेटे पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा और उसने शवुंफतला की अत्यध्िक प्रशंसा की। कालिदास को संस्कृत साहित्य का सबसे बड़ा कवि और नाटककार माना गया है। उसका समय अनिश्िचत है, पर संभावना यही है कि वह चैथी शताब्दी के अंत में गुप्त वंश के चंद्रगुप्त ;द्वितीयद्ध विक्रमादित्य के शासन - काल में उज्जयिनी में था। माना जाता है कि वह दरबार के नौ रत्नों में से एक था। उसकी रचनाओं में जीवन के प्रति प्रेम और प्राकृतिक सौंदयर् के प्रति आवेग का भाव मिलता है। कालिदास की एक लंबी कविता है मेघदूत। एक प्रेमी, जिसे बंदी बनाकर उसकी प्रेयसी से अलग कर दिया गया है, वषार् ट्टतु में, एक बादल से अपनी तीव्र चाहत का संदेश उस तक पहुँचाने के लिए कहता है। कालिदास से संभवतः कापफी पहले एक बहुत प्रसि( नाटक की रचना हुइर् थी - शूद्रक का मृच्छकटिकम् यानी मि‘ी की गाड़ी। यह एक कोमल और एक हद तक बनावटी नाटक है। लेकिन इसमें ऐसा सत्य है जो हमें प्रभावित करता है और हमारे सामने उस समय की मानसिकता और सभ्यता की झाँकी प्रस्तुत करता है। भारत की खोज 400 इर्. के लगभग, चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में एक और प्रसि( नाटक लिखा गया। यह विशाखदत्त का नाटक मुद्राराक्षस था। यह विशु( राजनीतिक नाटक था, जिसमें प्रेम या किसी पौराण्िाक कथा को आधर नहीं बनाया गया है। वुफछ अथो± में यह नाटक वतर्मान स्िथति में बहुत प्रासंगिक है। राजा हषर्, जिसने सातवीं सदी इर्. में एक नया साम्राज्य कायम किया, नाटककार भी था। हमें उसके लिखे हुए तीन नाटक मिलते हैं। सातवीं सदी के आसपास ही भवभूति हुआ, जो संस्कृत साहित्य का चमकता सितारा था। वह भारत में बहुत लोकपि्रय हुआ और केवल कालिदास का ही स्थान उसके उफपर माना जाता है। संस्कृत नाटकों की यह धरा सदियों तक बहती रही लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में गुणात्मक दृष्िट से स्पष्ट रूप से उसमें ”ास दिखाइर् देने लगा। प्राचीन नाटकों की ;कालिदास तथा अन्य लोगों केद्ध भाषा मिली - जुली है - संस्कृत और उसके साथ एक या एकाध्िक प्राकृत, यानी संस्कृत के बोलचाल में प्रचलित रूप। उसी नाटक में श्िाक्ष्िात पात्रा संस्कृत बोलते हैं और सामान्य अश्िाक्ष्िात जन समुदाय, प्रायः स्ित्रायाँ प्राकृत, हालाँकि उनमें अनुवाद भी मिलते हैं। यह साहित्ियक भाषा और लोकपि्रय कला के बीच समझौता था। पिफर भी प्राचीन नाटक अक्सर राज - दरबारों या उसी प्रकार के अभ्िाजात दशर्कों के लिए अभ्िाजात्यवादी कला को प्रस्तुत करते हैं। इस उँफचे दजेर् के साहित्ियक रंगमंच के अलावा हमेशा एक लोकमंच भी रहा है। इसका आधर भारतीय पुराकथाएँ और महाकाव्यों से ली गइर् कथाएँ होती थीं। दशर्कों को इन विषयों की अच्छी तरह जानकारी रहती थी और इनका सरोकार नाटकीय तत्व से कहीं अध्िक प्रस्तुति पर रहता था। ये अलग - अलग क्षेत्रों की बोलियों में रचे जाते थे, अतः उस क्षेत्रा विशेष तक ही सीमित रहते थे। दूसरी ओर संस्कृत - नाटकों का चलन पूरे भारत में था क्योंकि उनकी भाषा पूरे भारत के श्िाक्ष्िात समुदाय की भाषा थी। युगों का दौर संस्कृत भाषा की जीवंतता और स्थायित्व संस्कृत अद्भुत रूप से समृ( भाषा है - अत्यंत विकसित और नाना प्रकार से अलंकृत। इसके बावजूद वह नियत और व्याकरण के उस ढाँचे में सख्ती से जकड़ी है जिसका निमार्ण 2600 वषर् पहले पाण्िानि ने किया था। इसका प्रसार हुआ, संपन्न हुइर्, भरी - पूरी और अलंकृत हुइर्, पर इसने अपने मूल को नहीं छोड़ा। संस्कृत साहित्य के पतन के काल मंे भाषा ने अपनी वुफछ शक्ित और शैली की सादगी खो दी। सर विलियम जोंस ने 1784 में कहा था - फ्संस्कृत भाषा चाहे जितनी पुरानी हो, उसकी बनावट अद्भुत है, यूनानी भाषा के मुकाबले यह अध्िक पूणर् है, लातीनी के मुकाबले अध्िक उत्कृष्ट है और दोनों के मुकाबले अिाक परिष्कृत है। पर दोनों के साथ वह इतनी अध्िक मिलती - जुलती है कि यह पफ पहचाना जा सकता है कि इन.संयोग आकस्िमक नहीं हो सकता। यह सासभी भाषाओं का स्रोत एक ही है, जो शायद अब मौजूद नहीं रहा है।य् संस्कृत आध्ुनिक भारतीय भाषाओं की जननी है। उनका अध्िकांश शब्दकोश और अभ्िाव्यक्ित का ढंग संस्कृत की देन है। संस्कृत काव्य और दशर्न के बहुत से साथर्क और महत्त्वपूणर् शब्द, जिनका विदेशी भाषाओं मंे अनुवाद नहीं किया जा सकता, आज भी हमारी लोक प्रचलित भाषाओं में जीवित हैं। पिछली चैथाइर् सदी के दौरान दक्ष्िाण - पूवीर् एश्िाया के इस दूर तक पैफले क्षेत्रा के इतिहास पर बहुत प्रकाश डाला गया है। इसे कभी - कभी वृहत्तर भारत कहा गया है। लेकिन अब भी बहुत - सी कडि़याँ नहीं मिलतीं। बहुत से अंत£वरोध् भी हैं। ¯कतु सामान्य रूप से सामग्री की कोइर् कमी नहीं है। भारतीय पुस्तकों के हवाले मिलते हैं, अरब यात्रिायों के लिखे हुए वृत्तांत हैं और इन सबसे अिाक महत्त्वपूणर् है चीन से प्राप्त ऐतिहासिक विवरण। इसके अलावा बहुत से पुराने श्िालालेख और ताम्र - पत्रा हैं। जावा और बाली में भारतीय ड्डोतों पर आधरित समृ( साहित्य है जिसमें अक्सर भारतीय महाकाव्यों और पुराकथाओं का भावानुवाद किया गया है। यूनानी और लातीनी स्रोतों से भी वुफछ सूचनाएँ मिली हैं। लेकिन इन सबसे बढ़कर प्राचीन इमारतों के विशाल खंडहर हैं - विशेषकर अंगकोर और बोरोबुदुर में। इर्सा की पहली शताब्दी से लगभग 900 इर्सवी तक उपनिवेशीकरण की चार प्रमुख लहरें दिखाइर् पड़ती हैं। इनके बीच - बीच में पूरब की ओर जाने वाले लोगों का सिलसिला अवश्य रहा होगा। इन साहसिक अभ्िायानों की सबसे विश्िाष्ट बात यह थी कि इनका आयोजन स्पष्टतः राज्य द्वारा किया जाता था। दूर - दूर तक पैफले इन उपनिवेशों की शुरुआत लगभग एक साथ होती थी और ये उपनिवेश यु( की दृष्िट से महत्त्वपूणर् स्थानों पर और महत्त्वपूणर् मागो± पर कायम किए जाते थे। इन बस्ितयों का नामकरण पुराने भारतीय नामों के आधर पर किया गया । इस तरह जिसे अब वंफबोडिया संस्कृत की प्राचीन कथाओं से और यूनानी और अरबी दोनों में प्राप्त वृत्तांतांे से पता लगता है कि भारत और सुदूर पूरब के देशों के बीच कम - से - कम इर्सा की पहली शताब्दी में नियमित समुद्री व्यापार होता था। यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में जहाश बनाने का उद्योग बहुत विकसित और उन्नति पर था। उस समय में बनाए गए जहाशों का वुफछ ब्यौरेवार वणर्न मिलता है। बहुत से भारतीय बंदरगाहों का उल्लेख मिलता है। दूसरी और तीसरी शताब्दी के दक्ष्िाण भारतीय ;आंध््रद्ध सिक्कों पर दोहरे - पाल वाले जहाशों का चिÉ अंकित है। अजंता के भ्िािा चित्रों मंे लंका - विजय और हाथ्िायों को ले जाते हुए जहाशों के चित्रा हैं। महाद्वीप के देशों बमार्, स्याम और ¯हद - चीन पर चीन का प्रभाव अिाक था, टापुओं और मलय प्रायद्वीप पर भारत की छाप अध्िक थी। आमतौर पर शासन - प(ति और सामान्य जीवन - दशर्न चीन ने दिया और ध्मर् और कला भारत ने। इन भारतीय उपनिवेशों का इतिहास तकरीबन तेरह सौ साल या इससे भी वुफछ अध्िक का है - इर्सा की पहली या दूसरी शताब्दी से आरंभ होकर पंद्रहवीं शताब्दी के अंत तक। विदेशों पर भारतीय कला का प्रभाव भारतीय सभ्यता ने विशेष रूप से दक्ष्िाण - पूवीर् एश्िाया के देशों में अपनी जड़ें जमाईं। इस बात का प्रमाण आज वहाँ सब जगह मिलता है, चंपा, अंगकोर, श्रीविजय, भज्जापहित और दूसरे स्थानों पर संस्कृत के बड़े - बड़े अध्ययन वेंफद्र थे। वहाँ जिन राज्यों का उदय हुआ उनके शासकों के नाम विशु( भारतीय और संस्कृत नाम हैं। इसका अथर् यह नहीं है कि वे विशु( भारतीय थे, पर इसका अथर् यह अवश्य है कि उनका भारतीयकरण किया गया था। राजकीय समारोह भारतीय ढंग से संस्कृत में संपन्न किए जाते थे। राज्य के सभी कमर्चारियों के पास संस्कृत की प्राचीन पदवियाँ थीं और इनमें से वुफछ पदवियाँ और पदनाम न केवल थाइर्लैंड मंे बल्िक मलाया की भारत की खोज मुस्िलम रियासतों में भी अभी तक चले आ रहे हैं। इंडोनेश्िाया के इन स्थानों के प्राचीन साहित्य भारतीय पुराकथाओं और गाथाओं से भरे हुए हैं। जावा और बाली के मशहूर नृत्य भारत से लिए गए हैं। बाली के छोटे से टापू ने अपनी भारतीय संस्कृति को अभी तक बहुत सीमा तक कायम रखा है, यहाँ तक कि ¯हदू ध्मर् भी वहाँ चला आ रहा है। पिफलिपीन द्वीपों में लेखन - कला भारत से ही गइर् है। वंफबोडिया में वणर्माला दक्ष्िाण भारत से ली गइर् है और बहुत से संस्कृत शब्दांें को थोड़े से हेर - पेफर के साथ ले लिया गया है। दीवानी और .पफौजदारी के कानून भारत के प्राचीन स्मृतिकार मनु के कानूनों के आधर पर बनाए गए हैं और इन्हें बौ( प्रभाव के कारण वुफछ परिवतर्नों के साथ संहिताब( करके वंफबोडिया की आध्ुनिक कानून व्यवस्था में ले लिया गया है। लेकिन भारतीय प्रभाव सबसे अध्िक प्रकट रूप से प्राचीन भारतीय बस्ितयों की भव्य कला और वास्तुकला में दिखाइर् पड़ता है। इस प्रभाव से अंगकोर और बोरोबुदुर की इमारतें और अद्भुत मंदिर तैयार हुए। जावा में बोरोबुदुर में बु( की जीवन - कथा पत्थरों में उत्कीणर् है। दूसरे स्थानों पर नक्काशी करके विष्णु, राम और कृष्ण की कथाएँ अंकित की गइर् हैं। अंगकोरवट के विशाल मंदिर के चारों तर.पफ विशाल खंडहरों का विस्तृत भारतीय कला का भारतीय ध्मर् और दशर्न से इतना गहरा रिश्ता है कि जब तक किसी को उन आदशो± की जानकारी न हो जिनसे भारतीय मानस शासित होता है तब तक उसके लिए इसको पूरी तरह सराहना संभव नहीं है। भारतीय कला में हमेशा एक ध£मक प्रेरणा होती है, एक पारदृष्िट होती है, वुफछ वैसी ही जिसने संभवतः यूरोप के महान गिरजाघरों के निमार्ताओं को प्रेरित किया था। सौंदयर् की कल्पना आत्मनिष्ठ रूप में की गइर् है, वस्तुनिष्ठ रूप में नहींऋ वह आत्मा से संबंध् रखने वाली चीश है, भले ही वह रूप या पदाथर् में भी आकषर्क आकार ग्रहण कर ले। यूनानियों ने सौंदयर् से निस्वाथर् भाव से प्रेम किया। उन्हें सौंदयर् में केवल आनंद ही नहीं मिलता था, वे उसमें सत्य के दशर्न भी करते थे। प्राचीन भारतीय भी सौंदयर् से प्रेम करते थे, पर वे हमेशा अपनी रचनाओं में कोइर् गहरा अथर् भरने का प्रयत्न करते थे। भारतीय कविता और संगीत की तरह कला में भी कलाकार से यह उम्मीद की जाती थी कि वह प्रकृति की सभी मनोदशाओं से तादात्म्य स्थापित करे ताकि वह प्रकृति और विश्व के साथ मनुष्य के मूलभूत सामंजस्य की अभ्िाव्यक्ित कर सके। भारत की विशेषता उसकी मूतिर्कला और स्थापत्य में है, जिस तरह चीन और जापान की विशेषता उनकी चित्राकला में है। भारतीय संगीत, जो यूरोपीय संगीत से बहुत भ्िान्न है, अपने ढंग से बहुत विकसित था। इस दृष्िट से भारत का बहुत विश्िाष्ट स्थान है और संगीत के भारतीय कला अपने आरंभ्िाक काल में प्रकृतिवाद से भरी है, जो वुफछ अंशों में चीनी प्रभाव के कारण हो सकता है। भारतीय कला के इतिहास की विभ्िान्न अवस्थाआंे पर चीनी प्रभाव दिखाइर् पड़ता है। चैथी से छठी शताब्दी इर्सवी में गुप्तकाल के दौरान, जिसे भारत का स्वणर् युग कहा जाता है, अजंता की गु.पफाएँ खोदी गईं और उनमें भ्िािा चित्रा बनाए गए। बाग और बादामी की गु.पफाएँ भी इसी काल की हैं। अजंता हमें किसी स्वप्न की तरह दूर ¯कतु असल में एकदम वास्तविक दुनिया में ले जाती है। इन भ्िािा चित्रों को बौ( भ्िाक्षुओं ने बनाया था। बहुत समय पहले उनके स्वामी ने कहा था - स्ित्रायों से दूर रहो, उनकी तर.पफ देखो भी नहीं, क्योंकि वे खतरनाक हैं। इसके बावजूद इन चित्रों में स्ित्रायों की कमी नहीं है - सुंदर स्ित्रायाँ, राजवुफमारियाँ, गायिकाएँ, नतर्कियाँ, बैठी और खड़ी, शृंगार करती हुईं या एलिपेंफटा की गु.़पफाओं में नटराज श्िाव की एक खंडित मूतिर् है, जिसमें श्िाव नृत्य की मुद्रा में हैं। हैवेल का कहना है कि इस क्षत - विक्षत अवस्था में भी यह मूतिर् भीमाकार शक्ित का मूतर् रूप है और इसकी कल्पना अत्यंत विशाल है। भारत का विदेशी व्यापार इर्सवी सन् के पहले एक हशार वषो± के दौरान, भारत का व्यापार दूर - दूर तक पैफला हुआ था और बहुत से विदेशी बाशारों पर भारतीय व्यापारियों का नियंत्राण था। पूवीर् समुद्र के देशों में तो उनका प्रभुत्व था ही, उध्र वह भूमध्य सागर तक भी पैफला हुआ था। भारत मंे बहुत प्राचीन काल से कपड़े का उद्योग बहुत विकसित हो चुका था। भारतीय कपड़ा दूर - दूर के देशों में जाता था। रेशमी कपड़ा भी यहाँ काप़्ाफी समय से बनता रहा है। लेकिन वह शायद उतना अच्छा नहीं होता था जितना चीनी रेशम, जिसका आयात यहाँ इर्.पू. चैथी शताब्दी से ही किया जाता था। भारतीय रेशम उद्योग ने कामों में। भारतीयों को और बहुत सी धतुओं की भी जानकारी थी और उनका इस्तेमाल किया जाता था। औषध्ियों के लिए धतुओं के मिश्रण तैयार किए जाते थे। आसव और भस्म बनाना ये लोग खूब जानते थे। औषध - विज्ञान ़पफी विकसित था। मध्य - युग तक प्रयोगों में काप्.कााफी विकास किया जा चुका था, गरचे ये प्रयोग मुख्य रूप से प्राचीन ग्रंथों पर आधरित थे। शरीर - रचना और शरीर - विज्ञान का अध्ययन किया जाता था और हावेर् से बहुत पहले रक्त - संचार की बात सुझाइर् जा चुकी थी। खगोलशास्त्रा, जो विज्ञानों में प्राचीनतम है, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का नियमित विषय था और पफलित ज्योतिष को इससे मिला दिया जाता था। एक निश्िचत पंचांग भी तैयार किया गया था जो अब भी प्रचलित है। जो लोग समुद्री - यात्रा पर निकलते थे, उनके लिए खगोलशास्त्रा का ज्ञान व्यावहारिक दृष्िट से बहुत सहायक होता था। यह कहना कठिन है कि उस समय तक यंत्रों ने कितनी प्रगति की थी, लेकिन जहाश बनाने का उद्योग खूब चलता था। इसके अलावा, विशेष रूप से यु( मंे काम आने वाली तरह - तरह की मशीनों के हवाले भी मिलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय भारत औशारों के निमार्ण एवं प्रयोग मंे और रसायनशास्त्रा एवं धतुशास्त्रा संबंधी जानकारी में किसी देश से पीछे नहीं था। इसी कारण कइर् सदियों तक वह कइर् विदेशी मंडियों को अपने वश में रख सका। प्राचीन भारत में गण्िातशास्त्रा भारत में ज्यामिति, अंकगण्िात और बीजगण्िात का आरंभ बहुत प्राचीन काल में हुआ था। शायद आरंभ में वैदिक वेदियों पर आकृतियाँ बनाने के लिए एक तरह के ज्यामितीय बीजगण्िात का प्रयोग किया जाता था। ¯हदू संस्कारों में ज्यामितिक आकृतियाँ अब भी आमतौर पर काम में लाइर् जाती हैं। भारत में ज्यामिति का विकास अवश्य हुआ पर इस क्षेत्रा मंे यूनान और सिवंफदरिया आगे बढ़ गए। अंकगण्िात और बीजगण्िात में भारत आगे बना रहा। जिसे ‘शून्य’ या ‘वुफछ नहीं’ कहा जाता है वह आरंभ में एक बिंदी या नुक्ते की तरह था। बाद में उसने एक छोटे वृत्त का रूप धरण कर लिया। उसे किसी भी और अंक की तरह एक अंक समझा जाता था। शून्यांक और स्थान - मूल्य वाली दशमलव विध्ि को स्वीकार करने के बाद अंकगण्िात और बीजगण्िात में तेशी से विकास करने की दिशा में कपाट खुल गए। बीजगण्िात पर सबसे प्राचीन ग्रंथ ज्योतिविर्द आयर्भ‘ का है, जिनका जन्म 427 इर्. में हुआ था। भारतीय गण्िातशास्त्रा में अगला महत्त्वपूणर् नाम भास्कर ;522 इर्.द्ध का और उसके बाद ब्रह्मपुत्रा ;628 इर्.द्ध का है। ब्रह्मपुत्रा प्रसि( खगोलशास्त्राी भी था जिसने शून्य पर लागू होने वाले नियम निश्िचत किए और इस क्षेत्रा में और अध्िक उल्लेखनीय प्रगति की। इसके बाद अंकगण्िात और बीजगण्िात पर लिखने वाले गण्िातज्ञों की परंपरा मिलती है। इनमें अंतिम महान नाम भास्कर द्वितीय का है, जिसका जन्म 1114 इर्. में हुआ था। उसने आठवीं शताब्दी में खलीपफा अल्मंसूर के राज्यकाल में ;753 - 774 इर्.द्ध़कइर् भारतीय विद्वान बगदाद गए और अपने साथ वे जिन पुस्तकों को ले गए उनमें खगोलशास्त्रा और गण्िात की पुस्तवेंफ थीं। इन्होंने अरबी जगत में गण्िातशास्त्रा और ज्योतिषशास्त्रा के विकास को प्रभावित किया और वहाँ भारतीय अंक प्रचलित हुए। बगदाद उस समय विद्याध्ययन का बड़ा वेंफद्र था और यूनानी और यहूदी विद्वान वहाँ एकत्रा होकर अपने साथ यूनानी दशर्न, ज्यामिति और विज्ञान ले गए थे। मध्य एश्िाया से स्पेन तक सारी इस्लामी दुनिया पर बगदाद का सांस्कृतिक प्रभाव महसूस किया जा रहा था और अरबी अनुवादों के माध्यम से भारतीय गण्िात का ज्ञान इस व्यापक क्षेत्रा में पैफल गया था। अरबी जगत से यह नया गण्िात, संभवतः स्पेन के मूर विश्वविद्यालयों के माध्यम से यूरोपीय देशों में पहुँचा और इससे यूरोपीय गण्िात की नींव पड़ी। यूरोप में इन नए अंकों का विरोध् हुआ और इनके आमतौर पर प्रचलन में कइर् सौ वषर् लग गए। इनका सबसे पहला प्रयोग, जिसकी जानकारी मिलती है, 1134 इर्. में सिसली के एक सिक्के में हुआ। बि्रटेन में इसका पहला प्रयोग 1490 इर्. में हुआ। विकास और ”ास इर्सवी सन् के पहले हशार वषो± मंे, भारत में आक्रमणकारी तत्वों और आंतरिक झगड़ों के कारण बहुत उतार - चढ़ाव आए। पिफर भी यह समय उफजार् से उपफनता और सभी दिशाओं में अपना प्रसार करते हुए कमर्ठ राष्ट्रीय जीवन का समय रहा है। इर्रान, चीन, यूनानी जगत, मध्य एश्िाया से उसका संपवर्फ बढ़ता है और इस सबसे बढ़कर पूवीर् समुद्रों की ओर बढ़ने की शक्ितशाली प्रेरणा पैदा होती है। परिणामस्वरूप भारतीय उपनिवेशों की स्थापना और भारतीय सीमाओं को पार कर दूर - दूर तक भारतीय संस्कृति का प्रसार होता है। इन हशार वषो± के बीच के समय में यानी चैथी शताब्दी के आरंभ से लेकर छठी शताब्दी तक गुप्त साम्राज्य समृ( होता है। यह भारत भारत की खोज का स्वणर् युग कहलाता है। इस युग के संस्कृत साहित्य में एक प्रकार की प्रशांति, आत्मविश्वास और आत्माभ्िामान की दीप्ित और उमंग दिखाइर् पड़ती है। स्वणर् - युग के समाप्त होने से पहले ही कमशोरी और ”ास के लक्षण भी प्रकट होने लगते हैं। उत्तर - पश्िचम से गोरे हूणों के दल के दल आते हैं और बार - बार वापस खदेड़ दिए जाते हैं। ¯कतु ध्ीरे - ध्ीरे वे उत्तर - भारत मंे अपनी राह बना लेते हैं और आध्ी शताब्दी तक पूरे उत्तर में अपने को राज - सत्ता के रूप में प्रतिष्िठत कर लेते हैं। इसके बाद, अंतिम गुप्त सम्राट मध्य - भारत के एक शासक यशोवमर्न के साथ मिलकर, बहुत प्रयत्न करके हूणों को निकाल बाहर करता है। इस लंबे संघषर् ने भारत को राजनीतिक और सैनिक दोनों दृष्िटयों से दुबर्ल बना दिया। हूणों के उत्तर भारत में बस जाने के कारण लोगों में धीरे - धीरे एक अंदरूनी परिवतर्न घटित हुआ। हूणों के पुराने वृत्तांत कठोरता और बबर्र व्यवहार से भरे पड़े हैं। ऐसा व्यवहार जो यु( और शासन के भारतीय आदशो± से एकदम भ्िान्न हैं। सातवीं शताब्दी में हषर् के शासनकाल में उज्जयिनी ;आध्ुनिक उज्जैनद्ध, जो गुप्त शासकों की शानदार राजधनी थी, पिफर से कला, संस्कृति और एक शक्ितशाली साम्राज्य का वेंफद्र बनती है। लेकिन आने वाली सदियों में वह भी कमशोर पड़कर ध्ीरे - ध्ीरे खत्म हो जाती है। नौवीं शताब्दी में गुजरात का का संरक्षण किया। वह स्वयं कवि और लेखक था जिसके नाम से कइर् रचनाएँ मिलती हैं। उसका नाम महानता, विद्वत्ता और उदारता के प्रतीक के रूप में लोक - कथाओं और किस्सों का हिस्सा बन गया है। इन तमाम चमकदार टुकड़ों के बावजूद एक भीतरी कमशोरी ने भारत को जकड़ रखा है, जिससे उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा ही नहीं, बल्िक उसके रचनात्मक ियाकलाप भी प्रभावित होते दिखाइर् पड़ते हैं। यह प्रवि्रफया बहुत धीमी गति से चलती रही और इसने दक्ष्िाण भारत की तुलना में उत्तर भारत को जल्द प्रभावित किया। वस्तुतः दक्ष्िाण, आव्रफमणकारियों के लगातार हमलों का मुकाबला करने के दबाव से बचा रहा। उत्तर भारत की अनिश्िचत स्िथति से बचाव के लिए बहुत से लेखक, कलाकार और वास्तुश्िाल्पी दक्ष्िाण में जाकर बस गए। दक्ष्िाण के शक्ितशाली राज्यों ने इन लोगों को रचनात्मक कायर् के लिए ऐसा अवसर दिया होगा जो उन्हें दूसरी जगह नहीं मिला। गरचे उत्तरी भारत छोटे - छोटे राज्यों में बँटा हुआ था, पर जीवन वहाँ समृ( था और वहाँ कइर् वेंफद्र सांस्वृफतिक और दाशर्निक दृष्िट से सवि्रफय थे। हमेशा की तरह बनारस धा£मक और दाशर्निक विचारों का गढ़ था। लंबे समय तक कश्मीर भी बौ(ों और ब्राह्मणों के संस्वृफत - ज्ञान का बहुत बड़ा वंेफद्र रहा। भारत में बड़े - बड़े विश्वविद्यालय रहे। इनमें सबसे प्रसि( नालंदा था, जिसके विद्वानों का पूरे भारत में आदर किया जाता था। यहाँ चीन, मंे उज्जयिनी विश्वविद्यालय का उत्कषर् हुआ। दक्ष्िाण में अमरावती विश्वविद्यालय था। ज्यों - ज्यों सहस्राब्दी समाप्ित पर आती है यह सब सभ्यता के तीसरे पहर जैसा लगने लगता है। दक्ष्िाण में अब भी तेजस्िवता और शक्ित शेष थी और वह वुफछ और शताब्िदयों तक बनी रही। पर ऐसा लगता था जैसे हृदय स्तंभ्िात हो चला हो, उनकी धड़कनें मंद होने लगी हों। आठवीं शताब्दी में शंकर के बाद कोइर् महान दाशर्निक नहीं हुआ। शंकर भी दक्ष्िाण भारतीय थे। ब्राह्मण और बौ( दोनों धमो± का ”ास होने लगता है और पूजा के विवृफत रूप सामने आने लगते हैं, विशेषकर तांत्रिाक पूजा और योग - प(ति के भ्रष्ट रूप। साहित्य में भवभूति ;आठवीं शताब्दीद्ध आख्िारी बड़ा व्यक्ित था। गण्िात में आख्िारी बड़ा नाम भास्कर द्वितीय ;बारहवीं शताब्दीद्ध का है। कला में इर्. वी. हैवेल के अनुसार सातवीं या आठवीं शताब्दी से चैदहवीं शताब्दी तक भारतीय कला का महान युग था। यही समय यूरोप में गाथ्िाक कला के चरम विकास का समय था। प्राचीन भारतीय कला की रचनात्मक प्रवृिा का ”ास स्पष्ट रूप से सोलहवीं शताब्दी मंेे होने लगा। मेरा खयाल है कला के क्षेत्रा में भी उत्तर की अपेक्षा दक्ष्िाण भारत में ही पुरानी परंपरा श्यादा लंबे समय तक कायम रही। उपनिवेशों में बसने के लिए आख्िारी बड़ा दल दक्ष्िाण से नवीं शताब्दी में गया था, लेकिन दक्ष्िाण के चोलवंशी ग्यारहवीं शताब्दी में तब तक एक बड़ी समुद्री शक्ित बने रहे जब तक उन्हें श्रीविजय ने परास्त करके उन पर विजय नहीं प्राप्त कर ली। समय के साथ भारत व्रफमशः अपनी प्रतिभा और जीवन - शक्ित को खोता जा रहा था। यह प्रवि्रफया बहुत धीमी थी और कइर् सदियों तक चलती रही। इसका आरंभ उत्तर मंे हुआ और अंत में यह दक्ष्िाण पहुँच गइर्। इस राजनीतिक पतन और सांस्वृफतिक गतिरोध के कारण क्या थे? राधावृफष्णन का कहना है कि भारतीय दशर्न ने अपनी शक्ित राजनीतिक स्वतंत्राता के साथ खो दी। यह सही है कि राजनीतिक स्वतंत्राता खो जाने से सांस्वृफतिक ”ास अनिवायर् रूप से शुरू हो जाता है। लेकिन राजनीतिक स्वतंत्राता तभी छिनती युगों का दौर है जब उससे पहले किसी तरह का ”ास शुरू हो जाता है। भारत जैसा विशाल, अति विकसित और अत्यंत सभ्य देश बाह्य आव्रफमण के सामने तभी हार मानेगा जब या तो भीतर से खुद पतनशील हो या आव्रफमणकारी यु(कौशल में उससे आगे हो। भीतरी ”ास भारत में इन हशार वषो± के अंत में बिलवुफल स्पष्ट दिखाइर् पड़ता है। हर सभ्यता के जीवन में ”ास और विघटन के दौर बार - बार आते हैं पर भारत ने उनसे बचकर नए सिरे से अपना कायाकल्प कर लिया। उसमें एक ऐसा सवि्रफय अंतस्तल रहा जो नए संपको± से अपने को हमेशा ताशा रूप देकर पिफर से अपना विकास करता रहा - वुफछ इस रूप में कि अतीत से भ्िान्न होकर भी उसके साथ गहरा संबंध बना रहा। भारत में हमेशा से व्यवहार में रूढि़वादिता और विचारों में विस्पफोट का विचित्रा संयोग रहा है। सभ्यताओं के ध्वस्त होने के हमारे सामने बहुत से उदाहरण हैं। इनमें सबसे उल्लेखनीय उदाहरण यूरोप की प्राचीन सभ्यता का है जिसका अंत रोम के पतन के साथ हुआ। भारतीय सभ्यता का ऐसा नाटकीय अंत न उस समय हुआ और न बाद में, ¯कतु उत्तरोत्तर पतन सा.पफ दिखाइर् पड़ता है। शायद यह भारतीय समाज - व्यवस्था के बढ़ते हुए क‘रपन और गैरमिलनसारी का अनिवायर् परिणाम था जिसे यहाँ की जाति - व्यवस्था में देखा जा सकता है। जहाँ भारतीय विदेश चले गए, जैसे भारत के सामाजिक ढँाचे ने भारतीय सभ्यता को अद्भुत दृढ़ता दी थी। उसने गुटों को शक्ित दी और उन्हें एकजुट किया, लेकिन यह बात बृहत्तर एकता और विकास के लिए बाधक हुइर्। इसने दस्तकारी, श्िाल्प, वाण्िाज्य और व्यापार का विकास किया, लेकिन हमेशा अलग - अलग समुदायों के भीतर। इस तरह खास ढंग के धंधे पुश्तैनी बन गए और नए ढंग के कामों से बचने और पुरानी लकीर पीटते रहने की प्रवृिा पैदा हुइर्। इससे बड़ी संख्या में लोगों को विकास के अवसरों से वंचित करते हुए, उन्हें स्थायी रूप से समाज की सीढ़ी में नीचा दजार् देकर यह मूल्य चुकाया गया। इसी कारण हर तर.पफ ”ास हुआ - विचारों में, दशर्न में, राजनीति में, यु( की प(ति में, बाहरी दुनिया के बारे में जानकारी और उसके साथ संपवर्फ में। साथ ही क्षेत्राीयता के भाव बढ़ने लगे, भारत की अखंडता की अवधारणा के स्थान पर सामंतवाद और गिरोहबंदी की भावनाएँ बढ़ने लगीं और अथर्व्यवस्था संवुफचित हो गइर्। इसके बावजूद जीवनी शक्ित और अद्भुत दृढ़ता बची हुइर् थी और इसके साथ लचीलापन एवं अपने को ढालने की क्षमता। इसीलिए वह बचा रह सका, नए संपको± एवं विचारधाराओं का लाभ उठा सका और वुफछ दिशाओं में प्रगति भी कर सका, लेकिन यह प्रगति अतीत के बहुत से अवशेषों से जकड़ी रही और बािात होती रही।

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