¯सध्ु घाटी सभ्यता भारत के अतीत की सबसे पहली तसवीर उस ¯सधु घाटी सभ्यता में मिलती है, जिसके अवशेष ¯सध् में मोहनजोदड़ो और पश्िचमी पंजाब में हड़प्पा में मिले हैं। इन खुदाइयों ने प्राचीन इतिहास की समझ में क्रांति ला दी है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा एक दूसरे से का.पफी दूरी पर हैं। दोनों स्थानों पर इन खंडहरों की खोज मात्रा एक संयोग थी। इस बात में संदेह नहीं कि इन दोनों के बीच भी ऐसे ही बहुत से और नगर एवं अवशेष दबे पड़े होंगे जिन्हें प्राचीन मनुष्य ने बसाया होगा। यह सभ्यता विशेष रूप से उत्तर भारत में दूर - दूर तक पैफली थी। संभव है कि भविष्य में भी इस सुदूर अतीत को उद्घाटित करने का काम हाथ में लिया जाए और महत्त्वपूणर् नयी खोजें की जाएँ। इस सभ्यता के अवशेष इतनी दूर - दूर जगहों पर मिले हैं - जैसे पश्िचम में काठियावाड़ में और पंजाब के अंबाला िाले में। यह विश्वास किया जाता है कि यह सभ्यता गंगा की घाटी तक पैफली थी। इसलिए यह केवल ¯सधु घाटी सभ्यता भर नहीं उससे बहुत अध्िक है। अब तक हम जो जान सके हैं, उसका बहुत महत्त्व है। ¯सध्ु घाटी सभ्यता, आज जिस रूप में मिली है, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वह अत्यंत विकसित सभ्यता थी और उस स्िथति तक पहुँचने में उसे हशारों वषर् लगे होंगे। आश्चयर् की बात है कि यह सभ्यता प्रधन रूप से धमर्निरपेक्ष सभ्यता थी। ध£मक तत्व मौजूद होने पर भी इस पर हावी नहीं थे। यह भी स्पष्ट है कि यह भारत में बाद के सांस्कृतिक युगों की अग्रदूत थी। ¯सध्ु घाटी सभ्यता ने प़्ाफारस, मेसोपोटामिया और मिस्र की सभ्यताओं से संबंध् स्थापित किया और व्यापार किया। वुफछ दृष्िटयों से यह सभ्यता उनकी तुलना में बेहतर थी। यह एक ऐसी नागर सभ्यता थी जिसमें व्यापारी वगर् ध्नाढ्य था और उसकी भूमिका महत्त्वपूणर् थी। सड़कों पर दुकानों की कतारें थीं और दुकानें संभवतः छोटी थीं। ¯सध्ु घाटी सभ्यता और वतर्मान भारत के बीच समय के ऐसे कइर् दौर गुशरे हैं जिनके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। वैसे भी इस बीच असंख्य परिवतर्न हुए हैं। लेकिन भीतर ही भीतर निरंतरता की ऐसी शृंखला चली आ रही है जो आध्ुनिक भारत को छः - सात हशार पुराने उस बीते हुए युग से जोड़ती है जब संभवतः ¯सध्ु घाटी सभ्यता की शुरुआत हुइर् थी। यह देखकर अचरज होता है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में कितना वुफछ ऐसा है जो हमें चली आती परंपरा और रहन - सहन की, लोक - प्रचलित रीति - रिवाजों की, दस्तकारी की, यहाँ तक कि पोशाकों के पैफशन की याद दिलाता है।़यह बात दिलचस्प है कि भारत अपनी कहानी की इस भोर - बेला में ही एक नन्हे बच्चे की तरह नहीं, बल्िक अनेक रूपों में विकसित सयाने रूप में दिखाइर् पड़ता है। वह जीवन के तौर - तरीकों से अपरिचित नहीं है। उसने कलाओं और जीवन की सुख - सुविधओं में उल्लेखनीय तकनीकी प्रगति कर ली है। उसने केवल सुंदर वस्तुओं का सृजन ही नहीं किया बल्िक आधुनिक सभ्यता के उपयोगी और श्यादा ठेठ चिÉों - अच्छे हमामों और नालियों के तंत्रा का निमार्ण भी किया है। आयो± का आना ¯सध्ु घाटी सभ्यता के ये लोग कौन थे और कहाँ से आए थे इसका हमें अब भी पता नहीं है। यह संभावना भी है कि इनकी संस्कृति इसी देश की संस्कृति थी। उसकी जड़ें और शाखाएँ दक्ष्िाण भारत में भी मिल सकती हैं। वुफछ विद्वानों को इन लोगों और दक्ष्िाण भारत की द्रविड़ जातियों एवं संस्कृति के बीच अनिवायर् समानता दिखाइर् पड़ती है। यदि प्राचीन समय में वुफछ लोग भारत में आए भी थे तो यह घटना मोहनजोदड़ो के समय से कइर् हशार वषर् पहले घटी होगी। व्यावहारिक दृष्िट से हम उन्हें भारत के ही निवासी मान सकते हैं। ¯सध्ु घाटी की सभ्यता के बारे में वुफछ लोगों का कहना है कि उसका दीवारें भी ऊँची उठाइर् गइर् हैं। हम जानते हैं कि ¯सध् का सूबा पुराने समय में बहुत समृ( और उपजाऊ था, पर मध्ययुग के बाद वह श्यादातर रेगिस्तान रह गया। इसलिए यह मुमकिन है कि मौसमी परिवतर्नों ने उन इलाकों के निवासियों और उनके रहन - सहन की प(ति को प्रभावित किया हो। लेकिन मौसम के परिवतर्नों का प्रभाव दूर - दूर तक पैफली इस नागर सभ्यता के अपेक्षाकृत छोटे से हिस्से पर पड़ा होगा। हमारे पास इस बात पर विश्वास करने के कारण तो हैं कि यह सभ्यता गंगा घाटी तक या संभवतः उससे भी दूर तक पैफली थी पर इस बात का प़्ौफसला करने के लिए हमारे पास पयार्प्त आँकड़े नहीं हैं। वह बालू जिसने इनमें से वुफछ प्राचीन शहरों पर छा कर उन्हें ढक लिया था, उसी ने उन्हें सुरक्ष्िात भी रखा, जबकि दूसरे शहर और प्राचीन सभ्यता के प्रमाण ध्ीरे - ध्ीरे नष्ट होते रहे और समय के साथ खंड - खंड हो गए। ¯सध्ु घाटी सभ्यता और बाद के काल - खंडों के बीच निरंतर संबंध् के साथ ही इस सिलसिले के टूटने के या इसमें अंतराल के प्रमाण भी मिलते हैं। यह टूटना इस बात का भी सूचक है कि बाद में आने वाली सभ्यता भ्िान्न प्रकार की थी। बाद में आने वाली इस सभ्यता में शुरू - शुरू में संभवतः कृष्िा की बहुतायत थी गोकि नगर और थोड़ा बहुत शहरी जीवन भी मौजूद था। खेतिहर पक्ष पर शोर शायद उन नवागंतुकों ने दिया होगा, जो आयर् थे और उत्तर - पश्िचमी दिशा से भारत में एक के बाद एक कइर् बार में आए। ऐसा माना जाता है कि आयो± का प्रवेश ¯सध्ु घाटी युग के लगभग एक तत्व सा.पफ दिखाइर् पड़ते हैं। बाद के युगों में और बहुत - सी जातियाँ आईं। सबने अपना प्रभाव डाला और पिफर यहीं घुल - मिलकर रह गए। प्राचीनतम अभ्िालेख, ध्मर् - ग्रंथ और पुराण ¯सध्ु घाटी सभ्यता की खोज से पहले यह समझा जाता था कि हमारे पास भारतीय संस्कृति का सबसे पुराना इतिहास वेद हैं। वैदिक युग के काल निधार्रण के बारे में बहुत मतभेद रहा है। यूरोपीय विद्वान प्रायः इसका समय बहुत बाद में मानते हैं और भारतीय विद्वान पहले। आजकल अध्िकांश विद्वान )ग्वेद की )चाओं का समय इर्सा पूवर् 1500 मानते हैं। पर मोहनजोदड़ो की खुदाइर् के बाद से इन आरंभ्िाक भारतीय ध्मर् ग्रंथों को और पुराना साबित करने की प्रवृिा बढ़ गइर् है। वस्तुतः यह हमारे पास मनुष्य के दिमाग की प्राचीनतम उपलब्ध् रचना है। मैक्समूलर ने इसे ‘आयर् मानव के द्वारा कहा गया पहला शब्द’ कहा है। भारत की समृ( भूमि पर प्रवेश करने के समय आयर् अपने साथ उसी वुफल के विचारों को लेकर आए थे जिससे इर्रान में अवेस्ता की रचना हुइर् थी। भारत की ध्रती पर उन्होंने उन्हीं विचारों का पल्लवन किया। वेदों और अवेस्ता की भाषा में भी अद्भुत साम्य है। कहा गया है कि वेद भारत के अपने महाकाव्यों की संस्कृत की अपेक्षा अवेस्ता के अध्िक निकट हैं। वेद बहुत से ¯हदू वेदों को प्रकाश्िात ध्मर् - ग्रंथ मानते हैं। उनका असली महत्त्व पहला वेद यानी )ग्वेद शायद मानव - जाति की पहली पुस्तक है। इसमें हमें मानव - मन के सबसे आरंभ्िाक उद्गार मिलते हैं, काव्य - प्रवाह मिलता है और प्रकृति के सौंदयर् और रहस्य के प्रति हषो±माद मिलता है। इसके अलावा हमें मनुष्य के उन साहसिक कारनामों का रिकाडर् मिलता है जो लंबे समय पहले किए गए। यहीं से भारत ने एक ऐसी तलाश आरंभ की जो उसके बाद कभी समाप्त नहीं हुइर्। सभ्यता के उषाकाल में ही प्रबल और सहज कल्पना से संपन्न लोग, जीवन में छिपे हुए अनंत रहस्यों को जानने के लिए सजग हुए। उन्होंने अपनी सहज आस्था के कारण प्रकृति के प्रत्येक तत्व और शक्ित में देवत्व का आरोप किया। पर इस सबमें साहस और आनंद का भाव था। बहुत से पश्िचमी लेखकों ने इस खयाल को बढ़ावा दिया है कि भारतीय लोग परलोक - परायण हैं। मैं समझता हूँ कि हर देश के निध्र्न और अभागे लोग एक हद तक परलोक में विश्वास करने लगते हैं - जब तक कि वे क्रांतिकारी नहीं हो जाते। यही बात गुलाम देश के लोगों पर लागू होती है। हमें भारत में भी और स्थानों की ही तरह विचार और कमर् की दो समानांतर विकसित होती धाराएँ दिखाइर् पड़ती हैं - एक जो जीवन को स्वीकार करती है और दूसरी जो िांदगी से बचकर निकल जाना चाहती है। थी। कोइर् संस्कृति जो बुनियादी तौर पर पारलौकिकतावादी होगी, वह हशारों वषर् बनी नहीं रह सकती। भारतीय संस्कृति की निरंतरता हमें आरंभ में ही एक ऐसी सभ्यता और संस्कृति की शुरुआत दिखाइर् पड़ती है जो तमाम परिवतर्नों के बावजूद आज भी बनी हुइर् है। इसी समय मूल आदशर् आकार ग्रहण करने लगते हैं और साहित्य और दशर्न, कला और नाटक तथा जीवन के और तमाम ियाकलाप इन आदशो± और विश्व - दृष्िट के अनुवूफल चलने लगते हैं। इसी समय उस विश्िाष्टतावाद और छुआछूत की प्रवृिा का आरंभ दिखाइर् पड़ता है जो बाद में बढ़ते - बढ़ते असह्य हो जाती है। यही प्रवृिा आध्ुनिक युग की जाति - व्यवस्था है। यह व्यवस्था एक खास युग की परिस्िथति के लिए बनाइर् गइर्। इसका उद्देश्य था उस समय की समाज - व्यवस्था को मशबूत बनाना और उसे शक्ित और संतुलन प्रदान करना। ¯कतु बाद में यह उसी समाज व्यवस्था और मानव - मन के लिए कारागृह बन गइर्। पिफर भी यह व्यवस्था लंबे समय तक बनी रही। उस ढाँचे के भीतर बँध्े रहते हुए भी सभी दिशाओं में विकास करने की मूल प्रेरणा इतनी प्राणवान थी कि उसका प्रसार सारे भारत में और उससे आगे बढ़कर पूवीर् समुद्रों तक हुआ। इतिहास के इस लंबे दौर में भारत अलग - थलग नहीं रहा। इर्रानियों और उपनिषदों में जाँच - पड़ताल की चेतना और चीशों के बारे में सत्य की खोज का उत्साह दिखाइर् पड़ता है। यह सही है कि सत्य की यह खोज आधुनिक विज्ञान की वस्तुनिष्ठ प(ति से नहीं की गइर्, प्िाफर भी उनके दृष्िटकोण में वैज्ञानिक प(ति का तत्व मौजूद है। वे किसी किस्म के हठवाद को अपने रास्ते में नहीं आने देते। उनका शोर अनिवायर् रूप से आत्म - बोध् पर है, व्यक्ित की आत्मा और परमात्मा संबंध्ी ज्ञान पर है। इन दोनों को मूलतः एक कहा गया है। बाह्य वस्तुजगत को मिथ्या तो नहीं कहा गया पर उसे सापेक्ष रूप में सत्य कहा गया है - आंतरिक सत्य के एक पहलू के अथर् में। उपनिषदों का सामान्य झुकाव अद्वैतवाद की ओर है और सारे दृष्िटकोण का इरादा यही मालूम होता है कि उस समय जिन मतभेदों के कारण भयंकर वाद - विवाद हो रहे थे उन्हें किसी तरह कम किया जाए। यह समंजन का रास्ता है। जादू - टोने में दिलचस्पी या उसी किस्म के लोकोत्तर ज्ञान को सख्ती से निरुत्साहित किया गया है और बिना सच्चे ज्ञान के कमर् - कांड और पूजा - पाठ को व्यथर् बताया गया है। उपनिषदों की सबसे प्रमुख विशेषता है सच्चाइर् पर बल देना। उपनिषदों की मशहूर प्राथर्ना में प्रकाश और ज्ञान की ही कामना की गइर् है - ‘असत् से मुझे सत् की ओर ले चल। अंध्कार से मुझे प्रकाश की ओर ले चल। मृत्यु का विचार भारतीय ¯चतन में सहज रूप से निहित है। गांध्ी जी के नेतृत्व में जिन जनांदोलनों ने भारत को हिला दिया उनके पीछे जो मनोवृिा काम करती रही है उसकी सही समझ के लिए इस विचार को समझना शरूरी है। भारतीय आयर् अपने से भ्िान्न औरों के विश्वासों और जीवन - शैलियों के प्रति चरम सहनशीलता के कारण उन झगड़ों को बचाते रहे जो अक्सर समाज को खंड - खंड कर देते हैं। उन्होंने एक तरह का संतुलन बनाए रखा। एक व्यापक ढाँचे के भीतर रहते हुए भी लोगों को अपनी पसंद की ¯शदगी बसर करने की का.पफी छूट देकर उन्होंने एक प्राचीन और अनुभवी जाति की समझदारी का परिचय दिया। उनकी ये उपलब्िध्याँ बहुत अनोखी थीं। लेकिन उनके इसी व्यक्ितवाद का परिणाम यह हुआ कि उन्होंने मनुष्य के सामाजिक पक्ष पर, समाज के प्रति उसके कतर्व्य पर कम ध्यान दिया। हर व्यक्ित के लिए जीवन बँटा और बँध हुआ था। उसके मन में एक समग्र समाज की न कोइर् कल्पना थी, न उसके प्रति कोइर् दायित्व - बोध् था। इस बात का भी कोइर् प्रयास नहीं किया गया कि वह समाज के साथ एकात्मता महसूस करे। इस विचार का विकास शायद आध्ुनिक युग में हुआ। किसी प्राचीन समाज में यह नहीं मिलता। इसलिए प्राचीन भारत में इसकी उम्मीद करना गैरमुनासिब होगा। व्यक्ितवाद, अलगाववाद और ऊँच - नीच पर आधारित जातिवाद पर भारत में कहीं अध्िक बल दिया जाता रहा। बाद में हमारी प्राचीन भारतीय पुस्तवेंफ अब तक भारत में नहीं मिलीं, पर चीनी और तिब्बती भाषा में उनके अनुवाद मिल गए हैं। जो पुस्तवेंफ खो गइर् हैं, उनमें भौतिकवाद पर लिखा गया पूरा साहित्य है, जिसकी रचना आरंभ्िाक उपनिषदों के ठीक बाद हुइर् थी। इस साहित्य का हवाला अब सि.पर्फ इनकी आलोचनाओं में मिलता है या पिफर भौतिकवादी सि(ांतों के खंडन के विशद प्रयास में। पिफर भी, इस बात में कोइर् संदेह नहीं है कि भारत में सदियों तक भौतिकवादी दशर्न का प्रचलन रहा और जनता पर उस समय उसका गहरा प्रभाव रहा। राजनीतिक और आ£थक संगठन पर इर्.पू. चैथी शताब्दी में रचित कौटिल्य की प्रसि( रचना अथर्शास्त्रा में इसका उल्लेख भारत के प्रमुख दाशर्निक सि(ांत के रूप में किया गया है। भारत में भौतिकवाद के बहुत से साहित्य को पुरोहितों और ध्मर् के पुराणपंथी स्वरूप में विश्वास करने वाले लोगों ने बाद में नष्ट कर दिया। भौतिकवादियों ने विचार, ध्मर् और ब्रह्मविज्ञान के अध्िकारियों और स्वाथर् से प्रेरित विचारों का विरोध् किया। उन्होंने वेदों, पुरोहिताइर् और परंपरा - प्राप्त विश्वासों पर विचार करते हुए यह घोषणा की कि विश्वास को स्वतंत्रा होना चाहिए और पहले से मान ली गइर् बातों या अतीत के प्रमाणों पर निभर्र नहीं रहना चाहिए। उन्होंने हर तरह के जादू - टोने और अंध्विश्वास की घोर ¯नदा महाकाव्य, इतिहास, परंपरा और मिथक प्राचीन भारत के दो महाकाव्यों - रामायण और महाभारत को रूप ग्रहण करने में शायद सदियाँ लगी होंगी और उनमें बाद में भी टुकड़े जोड़े जाते रहे। इन ग्रंथों में भारतीय - आयो± के आरंभ के समय का वृत्तांत है। उनकी विजयों और उस समय के गृहयु(ों का, जब वे अपना विस्तार कर रहे थे और अपनी स्िथति मशबूत कर रहे थे। मुझे इनके अलावा कहीं भी किन्हीं ऐसी पुस्तकों की जानकारी नहीं है जिन्होंने आम जनता के मन पर लगातार इतना व्यापक प्रभाव डाला हो। इतने प्राचीन समय में रची जाने के बावजूद, भारतीयों के जीवन पर आज भी इनका जीवंत प्रभाव दिखाइर् पड़ता है। ये दोनों ग्रंथ भारतीय जीवन का अंग बन गए हैं। इनमें हमें सांस्कृतिक विकास की विभ्िान्न श्रेण्िायों के लिए ठेठ भारतीय ढंग से एक साथ सामग्री उपलब्ध् है - अथार्त उच्चतम बुिजीवी से लेकर साधरण अनपढ़ और अश्िाक्ष्िात देहाती तक के लिए। इनके द्वारा हमें प्राचीन भारतीयों का वह रहस्य वुफछ - वुफछ समझ में आता है जिससे वे अनेक रूपों में विभाजित और जात - पाँत की ऊँच - नीच में बँटे समाज को एकजुट रखते थे। उनके मतभेदों को सुलझाते थे। उन्होंने लोगों में एकता का ऐसा नशरिया पैदा करने का प्रयत्न किया जो हर तरह के भेद - भाव पर छा गया और बराबर बना रहा। भारतीय पुराकथाएँ महाकाव्यों तक सीमित नहीं है। उनका इतिहास वैदिक काल तक जाता है और वे अनेक रूप - आकारों में संस्कृत साहित्य में प्रकट होती रही हैं। कवियों और नाटककारों ने इनका पूरा लाभ उठाते हुए अपनी कथाओं और सुंदर कल्पनाओं की रचना इनके आधर पर की है। अिाकांश पुराकथाएँ और प्रचलित कहानियाँ वीरगाथात्मक हैं। उनमें सत्य पर अड़े रहने और वचन के पालन का उपदेश दिया गया है, चाहे परिणाम वुफछ भी हो। साथ ही इनमेें जीवनपय±त और मरणोपरांत भी वप़्ाफादारी, साहस और लोक - हित के लिए सदाचार और बलिदान की श्िाक्षा दी गइर् है। कभी ये कहानियाँ पूणर्तः काल्पनिक होती हैं अन्यथा इनमें तथ्य और कल्पना आपस में इस प्रकार गुँथे रहते हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। और ¯सध्ु घाटी सभ्यता यह सम्िमश्रण काल्पनिक इतिहास का रूप ग्रहण कर लेता है, जो हमें यह भले ही न बता सके कि निश्िचत रूप से क्या घटित हुआ पर ऐसी बात की सूचना देता है जिसके घटित होने पर लोग विश्वास करते हैं। ये घटनाएँ वास्तविक हों या काल्पनिक, जीवन में इनकी स्िथति जीवंत तत्वों की हो जाती थी जो उन्हें रोशमरार् की िांदगी की एकरसता और वुफरूपता से खींचकर उच्चतर क्षेत्रों की ओर ले जाती हैं। यूनानियों, चीनियों और अरबवासियों की तरह प्राचीन काल में भारतीय इतिहासकार नहीं थे। इसी कारण हमारे लिए आज तिथ्िायाँ निश्िचत करना या सही कालक्रम निधर्रित करना कठिन हो गया है। घटनाएँ आपस में गं - मं हो जाती हैं। बहुत ध्ीमी गति से आध्ुनिक विद्वान ध्ैयर्पूवर्क भारतीय इतिहास की भूलभुलैया के सूत्रों की खोज कर रहे हैं। कल्हण की राजतरंगिनी एकमात्रा प्राचीन ग्रंथ है जिसे इतिहास माना जा सकता है। यह कश्मीर का इतिहास है जिसकी रचना इर्सा की बारहवीं शताब्दी में की गइर् थी। बाकी के लिए हमें महाकाव्यों और अन्य ग्रंथों के कल्िपत इतिहास, वुफछ समकालीन अभ्िालेखों, श्िालालेखों, कलाकृतियों और इमारतों के अवशेषों, सिक्कों और संस्कृत साहित्य के विशाल संग्रह से सहायता लेनी पड़ती है। इसके साथ ही विदेशी यात्रिायों के सप़्ाफरनामों से भी सहायता मिलती है, विशेष रूप से यूनानियों और चीनियों के और वुफछ बाद में आने महाभारत महाकाव्य के रूप में रामायण एक महान रचना है और लोग उससे बहुत प्रेम करते हैंऋ परंतु महाभारत का दजार् विश्व की श्रेष्ठतम रचनाओं में है। यह कृति परंपरा और दंतकथाओं का तथा प्राचीन भारत की राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं का विश्वकोश है। लगभग दस वषर् बल्िक उससे भी वुफछ अध्िक समय से इस विषय के अध्िकारी भारतीय विद्वान इसका प्रामाण्िाक संस्करण प्रकाश्िात करने की दृष्िट से विभ्िान्न उपलब्ध् पाठों की जाँच और मिलान करने में व्यस्त हैं। उन्होंने वुफछ अंश प्रकाश्िात करके जारी भी कर दिए हैं लेकिन यह कायर् अब भी अध्ूरा है। शायद यही समय था जब भारत में विदेशी लोग आ रहे थे और वे अपने रीति - रिवाज अपने साथ ला रहे थे। इनमें बहुत से रिवाज आयो± से मेल नहीं खाते थे। इसलिए विरोध्ी विचारों और रिवाजों का विचित्रा घालमेल दिखाइर् पड़ता है। आयो± में स्ित्रायों के अनेक विवाह का चलन नहीं था, विंफतु महाभारत की कथा की एक विशेष नायिका एक साथ पाँच भाइयों की पत्नी है। ध्ीरे - ध्ीरे यहाँ पहले से मौजूद आदिवासियों के साथ नए आने वाले लोग भी आयो± के साथ घुलमिल कर एक हो रहे थे और इस नयी स्िथति के अनुरूप वैदिक ध्मर् में संशोध्न किया जा रहा था। इसने सबको समेटकर चलने वाला वह उदार व्यापक रूप ग्रहण कर लिया था जिससे आध्ुनिक हिंदू ध्मर् निकला। यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि बुनियादी नशरिया यह जान पड़ता है कि सत्य पर किसी का एकाध्िकार नहीं हो सकता। उसे देखने और उस तक पहुँचने के बहुत रास्ते हैं। इसलिए सब तरह के अलग - अलग, यहाँ तक कि विरोध्ी विश्वासों को भी सहन कर लिया गया। महाभारत में ¯हदुस्तान की ;या जिसे दंतकथाओं के अनुसार जाति के आदि पुरुष भरत के नाम पर भारतवषर् कहा जाता हैद्ध बुनियादी एकता पर बल देने की निश्िचत कोश्िाश की गइर् है। इसका एक और पहले का नाम था आयार्वत्तर्, यानी आयो± का देश। विंफतु यह नाम मध्य - भारत में ¯वध्य ¯सध्ु घाटी सभ्यता पवर्त तक पैफले उत्तर - भारत के इलाके तक सीमित था। रामायण की कथा दक्ष्िाण में आयो± के विस्तार की कहानी है। वह विराट गृहयु(, जो बाद में हुआ और जिसका वणर्न महाभारत मंे किया गया है, उसके बारे में मोटे तौर से अंदाश लगाया गया है कि वह इर्सा पूवर् चैदहवीं शताब्दी के आसपास हुआ होगा। वह लड़ाइर् भारत ;या संभवतः उत्तरी भारतद्ध पर एकाध्िकार स्थापित करने के लिए लड़ी गइर् थी। इसी लड़ाइर् से एक अखंड भारत की अवधरणा की शुरुआत हुइर्। इस अवधरणा के अनुसार आध्ुनिक अ.पफगानिस्तान का बहुत बड़ा हिस्सा भारत में शामिल था। इस हिस्से को उस समय गांधर ;जिससे वतर्मान वंफदहार शहर का नाम पड़ा हैद्ध कहा जाता था और उसे भारत का अभ्िान्न हिस्सा समझा जाता था। वास्तव में इसी कारण मुख्य शासक की पत्नी का नाम गांधरी यानी गांधर की कन्या पड़ा था। दिल्ली नाम का आधुनिक शहर नहीं, बल्िक इस इलाके के निकट बसे हुए हस्ितनापुर और इंद्रप्रस्थ नाम के पुराने शहर इसी समय भारत की राजधानी बने थे। महाभारत में कृष्ण से संब( आख्यान भी हैं और प्रसि( काव्य भगवद्गीता भी। गीता के दशर्न के अलावा, इस ग्रंथ में शासन कला और सामान्य रूप से जीवन के नैतिक और आचार संबंध्ी सि(ांतों पर शोर दिया गया है। धमर् की इस बुनियाद के बिना न सच्चा सुख मिल सकता है और से था यानी ¯हसा की मानसकिता के अभाव से, आत्मानुशासन से, क्रोध् और घृणा की भावना पर नियंत्राण से था। महाभारत एक ऐसा समृ( भंडार है जिसमें अनेक अनमोल चीशें ढूँढ़ी जा सकती हैं। यह विविधतापूणर्, भरपूर और खदबदाती ¯शदगी से सराबोर है। यह केवल नैतिक श्िाक्षा की पुस्तक नहीं है। महाभारत से मिलने वाली श्िाक्षा को एक वाक्य में इस रूप में सूत्राब( किया गया है - फ्दूसरों के साथ ऐसा आचरण नहीं करो जो तुम्हें खुद अपने लिए स्वीकायर् न हो।य् इसमें लोक - मंगल पर जो बल दिया गया है वह ध्यान देने योग्य है। महाभारत में कहा गया है - फ्जो बात लोक - हित में नहीं है या जिसे करते हुए तुम्हें शमर् आए उसे कभी नहीं करना चाहिए।य् पिफर कहा गया है - फ्सच्चाइर्, आत्म - संयम, तपस्या, उदारता, अ¯हसा, ध्मर् का निरंतर पालन - सपफलता के साध्न हैं जाति और वुफल नहीं।य् फ्ध्मर् जीवन और अमरता से बड़ा है।य् फ्सच्चे आनंद के लिए दुख भोगना आवश्यक है।य् ध्न के पीछे दौड़ने वाले पर व्यंग्य किया गया है - फ्रेशम का कीड़ा अपने धन के बोझ से ही मरता है।य् और अंत में एक जीवित और विकासशील जनता के लिए आदेश है - फ्असंतोष प्रगति का प्रेरक है।य् भगवद्गीता भगवद्गीता महाभारत का अंश है परंतु उसकी अपनी अलग जगह है और वह अपने आप में मुकम्मल है। यह 700 श्लोकों का एक छोटा सा काव्य संकट के लिए। गीता की असंख्य व्याख्याएँ की गईं और अब भी लगातार की जा रही हंै। आध्ुनिक युग के विचार और कमर् क्षेत्रा के नेताओं तिलक, अरविंद घोष, गांध्ी सभी ने इसकी अपने ढंग से व्याख्या की है। गांध्ी जी ने इसे अ¯हसा में अपने दृढ़ विश्वास का आधर बनाया है, औरों ने धमर् - कायर् के लिए ¯हसा और यु( का औचित्य इसी के आधर पर सि( किया है। इस काव्य का आरंभ महाभारत का यु( आरंभ होने से पहले यु( - क्षेत्रा में अजुर्न और कृष्ण के बीच संवाद से होता है। अजुर्न परेशान है। उसकी अंतरात्मा यु( और उसमें होने वाले व्यापक नरसंहार के, मित्रों और संबंिायों के संहार के विचार के विरु( विद्रोह कर उठती है। आख्िार यह किसलिए? कौन सा ऐसा लाभ हो सकता है जो इस हानि, इस पाप का परिहार कर सके। उसकी पुरानी कसौटियाँ नाकाम हो जाती हैं, उसके मूल्य ढह जाते हैं। अजुर्न इंसान की उस पीडि़त आत्मा का प्रतीक बन जाता है जो युग - युग से कतर्व्यों और नैतिकता के तकाशों की दुविध से ग्रस्त है। इस निजी बातचीत से हम एक - एक करके व्यक्ित के कतर्व्य, सामाजिक आचरण, मानव जीवन में सदाचार और सबको नियंत्रिात करने वाले आध्यात्िमक दृष्िटकोण जैसे विषयों की ओर बढ़ते हैं। गीता में ऐसा बहुत वुफछ है जो आध्यात्िमक है। इसमें मानव विकास के तीन मागो± ज्ञान, कमर् और भक्ित गीता का संदेश न सांप्रदायिक है और न ही किसी विशेष विचारधरा के लोगों को संबोिात करता है। इसकी दृष्िट सावर्भौमिक है। उसमें कहा गया है - फ्सभी रास्ते मुझ तक आते हैं।य् इसी सावर्भौमिकता के कारण गीता सभी वगो± और संप्रदायों के लोगों के लिए मान्य हुइर्। इसकी रचना के बाद ढाइर् हशार वषो± में भारतवासी बार - बार परिवतर्न, विकास और ”ास की प्रिया से गुशरे हैं, उन्हें एक के बाद एक, तरह - तरह के अनुभव हुए हैं। एक के बाद एक विचार सामने आए हैं, पर उन्हें हमेशा गीता में कोइर् ऐसी जीवंत चीश मिली है जो विकसित होते विचारों से मेल खाती रही। प्राचीन भारत में जीवन और कमर् बु( के समय से पहले का वृत्तांत हमें जातक - कथाओं में मिलता है। इन जातक - कथाओं का वतर्मान रूप बु( के वुफछ समय बाद का है। जातक - कथाओं में उस समय का वणर्न है जब भारत की दो प्रधन जातियों - द्रविड़ों और आयो± का अंतिम रूप से मेल हो रहा था। कहा जा सकता है कि जातक पुरोहित या ब्राह्मण परंपरा तथा क्षत्रिाय या शासक परंपरा के विरोध् में लोक - परंपरा का प्रतिनिध्ित्व करते हैं। ग्राम - सभाएँ एक सीमा तक स्वतंत्रा थीं। आमदनी का मुख्य शरिया लगान था। माना जाता था कि शमीन पर लगाया जाने वाला कर, उत्पादन में राजा का हिस्सा है। उसका भुगतान, हमेशा तो नहीं पर अक्सर गल्ले या पैदावार की शक्ल में किया जाता था। यह कर उपज के छठे भाग के करीब होता था। यह सभ्यता मुख्य रूप से कृष्िा वेंफदि्रत थी और इसकी बुनियादी इकाइर् स्वशासित गाँव थे। राजनीतिक और आ£थक ढाँचा इन्हीं ग्राम - समुदायों से बनाया जाता था जिन्हें दस - दस और सौ - सौ के समूह में बाँट दिया जाता था। जातकों के वणर्नों से एक खास तरह का विकास उभरकर सामने आता है। यह विशेष दस्तकारियों से जुड़े लोगों की अलग बस्ितयों और गाँवों की स्थापना थी। इस तरह एक गाँव बढ़इयों का था, एक गाँव लोहारों का था। इसी तरह और पेशों के लोगों के गाँव थे। ये खास पेशेवर लोगों के गाँव ¯सध्ु घाटी सभ्यता आमतौर पर शहर के पास बसे होते थे। शहर में उनके विशेष उत्पादनों की खपत हो जाती थी और बदले में उन्हें िंादगी की दूसरी शरूरतों को पूरा करने का सामान मिल जाता था। ऐसा लगता है कि पूरा गाँव सहकारिता के उसूल पर काम करता था और बड़े ठेके लेता था। शायद इस तरह अलहदा रहने और संगठित होने से जाति प्रथा का विकास और विस्तार हुआ होगा। जातकों में सौदागरों की समुद्री यात्राओं के हवाले भरे हुए हैं। सूखे रास्तों से रेगिस्तान को पार करके भड़ौच के पश्िचमी बंदरगाह और उत्तर में गांधर और मध्य एश्िाया तक कारवाँ जाया करते थे। भड़ौच से जहाश बेबिलोन ;बावेरूद्ध के लिए प़्ाफारस की खाड़ी को जाया करते थे। नदियों के रास्ते बहुत यातायात होता था। जातकों के अनुसार बेड़े बनारस, पटना, चंपा ;भागलपुरद्ध और दूसरे स्थानों से समुद्र की ओर जाते थे और वहाँ से दक्ष्िाणी बंदरगाहों और लंका और मलय टापू तक। भारत में लिखने की प्रथा बहुत पुरानी है। पाषाण युग के मि‘ी के पुराने बतर्नों पर ब्राह्मी लिपि के अक्षर मिले हैं। मोहनजोदड़ो में मिले श्िालालेखों को अब तक पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सका है। वे ब्राह्मी लेख जो पूरे भारत में मिले हैं निश्िचत रूप से उस मूल लिपि में है जिससे भारत में देवनागरी और अन्य लिपियों का विकास हुआ है। अशोक के वुफछ लेख ब्राह्मी लिपि में हैं, उत्तर - पश्िचम में मिलने वाले वुफछ अन्य लेख खरोष्टी लिपि में हैं। आने से बहुत पहले भारत और यूनान के बीच किसी - न - किसी तरह का संपवर्फ हो चुका था। औषध् - विज्ञान की पाठ्यपुस्तवेंफ भी थीं और अस्पताल भी। अनुश्रुति है कि भारत में औषध - विज्ञान के जनक ध्न्वंतरि थे। विंफतु सबसे प्रसि( पुरानी पाठ्यपुस्तवेंफ इर्सवी सन् की शुरू की सदियों में लिखी गईं। इनमें औषध्ि पर चरक की पुस्तवेंफ हैं और शल्य - चिकित्सा पर सुश्रुत की। कहा जाता है कि चरक उन राजा कनिष्क के दरबार में राजवैद्य थे जिनकी राजधानी पश्िचमोत्तर दिशा में थी। इन पाठ्यपुस्तकों में बहुत - सी बीमारियों का िाक्र है और उनकी पहचान और इलाज के तरीके बताए गए हैं। इनमें शल्य - चिकित्सा, प्रसूति - विज्ञान, स्नान, पथ्य, सप़्ाफाइर्, बच्चों को ख्िालाने और चिकित्सा के बारे में श्िाक्षा को विषय बनाया गया है। लेखक का रफझान प्रयोगात्मक है और शल्य - प्रश्िाक्षण के दौरान मुदो± की चीर - पफाड़ कराइर् जाती थी। सुश्रुत ने शल्य - िया के औशारों का िाक्र किया है, साथ ही आॅपरेशन का भीऋ जिसमें अंगों को काटना, पेट काटना, आॅपरेशन से बच्चे को जन्म दिलाना, मोतिया¯बद का आॅपरेशन आदि सब शामिल हैं। घावों के जीवाणुओं को ध्ुआँ देकर मारा जाता था। इर्सा पूवर् तीसरी चैथी सदी में जानवरों के अस्पताल भी थे। यह जैन और बौ( ध्मर् का प्रभाव था जिसमें अ¯हसा पर बल दिया जाता था। महाकाव्यों के युग में अक्सर वनों में एक तरह के विश्वविद्यालयों का के संकेत मिलते हैं कि लोकपि्रय अध्यापक बड़ी संख्या में विद्या£थयों को आकष्िार्त करते थे। बनारस हमेशा श्िाक्षा का वेंफद्र रहा। बु( के समय में भी वह प्राचीन वेंफद्र माना जाता था। विंफतु उत्तर - पश्िचम में, आध्ुनिक पेशावर के पास एक प्राचीन और प्रसि( विश्वविद्यालय तक्षश्िाला या तक्ष्िाला था। यह विश्वविद्यालय विशेष रूप से विज्ञान, चिकित्सा - शास्त्रा और कलाओं के लिए मशहूर था और भारत के दूर - दूर के हिस्सों से लोग यहाँ आया करते थे। तक्षश्िाला का स्नातक होना सम्मान और विशेष योग्यता की बात समझी जाती थी। जो चिकित्सक यहाँ के आयुविर्ज्ञान विद्यालय से पढ़कर निकलते थे, उनकी बड़ी कद्र होती थी। कहा जाता है कि जब कभी बु( बीमार पड़ते थे तो उनके भक्त इलाज के लिए एक मशहूर चिकित्सक को बुलाते थे, जो तक्षश्िाला का स्नातक था। इर्सा पूवर् छठी - सातवीं शताब्दी के महान वैयाकरण पाण्िानि ने भी यहीं श्िाक्षा पाइर् थी। इस तरह तक्षश्िाला बु( से पहले ब्राह्मण श्िाक्षा - प(ति का विश्वविद्यालय था। बौ( - काल में यह बौ( - ज्ञान का भी वंेफद्र बन गया था। सारे भारत और सीमा - पार से बौ( विद्याथीर् यहाँ ¯खचे चले आते थे। यह मौयर् साम्राज्य के उत्तर - पश्िचमी सूबे का मुख्यालय था। उस सुदूर अतीत के भारतीय वैफसे थे? हमारे लिए इतने पुराने और महावीर और बु( - वणर् व्यवस्था जैन ध्मर् और बौ( ध्मर् दोनों वैदिक ध्मर् से कटकर अलग हुए थे और उसकी शाखाएँ थे। पर उन्होंने वेदों को प्रमाण नहीं माना। तमाम और बातों में सबसे बुनियादी बात यह है कि आदि कारण के बारे में वे या तो मौन हैं या उसके अस्ितत्व से इंकार करते हैं। दोनों अ¯हसा पर बल देते हैं और ब्रह्मचारी भ्िाक्षुओं और पुरोहितों के संघ बनाते हैं। उनके नशरिए एक हद तक यथाथर्वादी और बुिवादी हैं। जैन - ध्मर् का एक बुनियादी सि(ांत यह है कि सत्य हमारे दृष्िटकोण की सापेक्षता में होता है। इसमें जीवन और विचार में तपस्या के पहलू पर बल दिया गया है। जैन ध्मर् के संस्थापक महावीर और बु( समकालीन थे और दोनों क्षत्रिाय थे। बु( की मृत्यु इर्.पू. 544 में अस्सी वषर् की आयु में हुइर् और तभी बौ( संवत् शुरू हुआ। इतिहासकारों ने बाद की तारीख यानी इर्.पू. 487 दी। यह अजीब संयोग है कि मैं ये पंक्ितयाँ बौ( संवत् 2488 की पहली तारीख को वैशाखी पू£णमा के दिन लिख रहा हूँ। बौ( साहित्य में बार - बार चेतावनी दी है, पिफर भी ध्ीरे - ध्ीरे वणर् - व्यवस्था का विकास और विस्तार हुआ है। इसने भारतीय जीवन के हर पहलू को अपने श्िावंफजे में जकड़ लिया है। जात के विरोध्ियों के बहुत से अनुयायी हुए, पर समय के साथ उनके समुदाय की अपनी एक अलग जात बन गइर्। जैन ध्मर्, जो अपने मूल ध्मर् के विरोध् में खड़ा हुआ था, जात के प्रति सहिष्णु था और खुद उसने अपने को उसके अनुरूप बना लिया था। इसलिए आज भी यह ¯शदा है और जारी है तो लगभग ¯हदू ध्मर् की एक शाखा के रूप में। बौ( ध्मर् ने जाति - व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। वह अपने विचारों और दृष्िटकोण में श्यादा स्वतंत्रा रहा। अंततः वह भारत से बाहर निकल गया, गोकि भारत और हिंदूवाद पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। बु( की श्िाक्षा बु( का संदेश उन भारतीयों के लिए बहुत नया और मौलिक था जो ब्रह्मज्ञान उन्होंने यह उपदेश न किसी ध्मर् के समथर्न के आधर पर और न इर्श्वर या परलोक का हवाला देकर दिया। उन्होंने विवेक, तवर्फ और अनुभव का सहारा लिया और लोगों से कहा कि वे अपने मन के भीतर सत्य की खोज करें। सत्य की जानकारी का अभाव सब दुखों का कारण है। इर्श्वर या परब्रह्म का अस्ितत्व है या नहीं, उन्होंने नहीं बताया। वे न उसे स्वीकार करते हैं न इंकार। जहाँ जानकारी संभव नहीं है वहाँ हमें निणर्य नहीं देना चाहिए। इसलिए हमें अपने आपको उन्हीं चीशों तक सीमित रखना चाहिए जिन्हें हम देख सकते हैं और जिनके बारे में हम निश्िचत जानकारी हासिल कर सकते हैं। बु( की प(ति मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की प(ति थी और इस बात की जानकारी हैरत में डालने वाली है कि अध्ुनातन विज्ञानों के बारे में उनकी अंतदृर्ष्िट कितनी गहरी थी। जीवन में वेदना और दुख पर बौ( ध्मर् में बहुत बल दिया गया है। बु( ने जिन ‘चार आयर् सत्यों’ का निरूपण किया है उनका संबंध् दुख का कारण, दुख के अंत की संभावना और उसे समाप्त करने के उपाय से है। दुख की इस स्िथति के अंत से ‘निवार्ण’ की प्राप्ित होती है। बु( का मागर् मध्यम मागर् था। यह अतिशय भोग और अतिशय तप के बीच का रास्ता है। अपने शरीर को कष्ट देने के अनुभव के बाद उन्होंने कहा, कहा - फ्इसी तरह मैंने तुम्हें मुऋी भर सत्य दिया है, विंफतु इसके अलावा कइर् हशार और सत्य ऐसे हैं, जिनकी गणना नहीं की जा सकती।य् बु( - कथा ‘बु(’ की वह संकल्पना जिसे प्यार से भरे अनगिनत हाथों ने पत्थर, संगमरमर और काँसे में ढालकर आकार दिया, भारतीयों के विचारों की समग्र आत्मा की, या कम - से - कम उसके एक तेजस्वी पक्ष का प्रतीक है। कमल के पूफल पर बैठे हुए - शांत और ध्ीर, वासनाओं और लालसाओं से परे, इस संसार के तूप़्ाफानों और संघषो± से दूर वे इतनी दूर, पहुँच से इतने परे मालूम होते हैं जैसे उन्हें पाना असंभव हो। लेकिन जब हम उन्हें दोबारा देखते हैं तो उनकी आकृति जीवन - शक्ित से भरी जान पड़ती है। युग पर युग बीतते जाते हैं पर बु( हमसे बहुत दूर नहीं मालूम होते। उनकी वाणी हमारे कान में धीमे स्वर से कहती है कि हमें संघषर् से भागना नहीं चाहिए बल्िक शांत - दृष्िट से उनका मुकाबला करना चाहिए तथा जीवन मंे विकास और प्रगति के और बड़े अवसरों को देखना चाहिए। बु( के बारे में सोचते हुए आज भी हम एक जीती - जागती, थरथराहट पैदा करने वाली अनुभूति से गुशरते हैं। उस राष्ट्र और जाति के पास निश्चय ही समझदारी और आंतरिक शक्ित की गहरी संचित निध्ि होगी जो ऐसे भव्य आदशर् को जन्म दे सकती है। चंद्रगुप्त और चाणक्य - मौयर् साम्राज्य की स्थापना पाटलीपुत्रा ;आध्ुनिक पटनाद्ध थी। दोनों पश्िचमोत्तर प्रदेश में तक्षश्िाला गए और उन यूनानियों के संपवर्फ में आए जिन्हें सिकंदर ने वहाँ नियुक्त किया था। चंद्रगुप्त की भेंट खुद सिकंदर से हुइर् थी। चंद्रगुप्त और चाणक्य ने राष्ट्रीयता का पुराना पर चिर नवीन नारा बुलंद करके विदेशी आक्रमणकारी के विरु( लोगों को उत्तेजित किया। यूनानी सेना को खदेड़कर तक्षश्िाला पर अिाकार कर लिया गया। राष्ट्रीयता की पुकार सुनकर बहुत से लोग चंद्रगुप्त के साथ हो गए और उन्हें साथ लेकर चंद्रगुप्त पटना तक पहुँच गया। सिवंफदर की मृत्यु के दो ही वषर् में उसने पाटलीपुत्रा पर अध्िकार करके मौयर् साम्राज्य की स्थापना की। लिख्िात इतिहास में पहली बार एक विराट वेंफद्रीय राज्य की स्थापना हुइर्। पाटलीपुत्रा इस महान साम्राज्य की राजधनी थी। यह नया राज्य था वैफसा? सौभाग्य से हमें इसका पूरा ब्यौरा मिलता है - भारतीय भी और यूनानी भी। एक विवरण सिल्यूकस के राजदूत मेगस्थनीश ने छोड़ा है और दूसरा है कौटिल्य का अथर्शास्त्रा जो कहीं अध्िक महत्त्वपूणर् ‘राजनीतिशास्त्रा’ है और उसी समय की रचना है। कौटिल्य चाणक्य का ही दूसरा नाम है। वह हर दृष्िट से बड़ा आदमी था - बुिमानी में भी और कमर्ठता में भी। इस युग के बारे में एक प्राचीन भारतीय नाटक है - मुद्राराक्षस। इस नाटक मंे चाणक्य की तसवीर उभरती है। साहसी और षड़यंत्राी, अभ्िामानी और प्रतिशोध्ी, जो न कभी अपमान को भूलता है न अपने लक्ष्य को ओझल होने देता है। दुश्मन को धेखा देने और पराजित करने के लिए वह हर तरीके का इस्तेमाल करता है। वह साम्राज्य की बागडोर हाथ से सँभाले रहता है और सम्राट को स्वामी की तरह नहीं बल्िक एक पि्रय श्िाष्य की तरह देखता है। अपने जीवन में वह सादा और तपस्वी है, उँफचे पदों की शान - शौकत में उसकी दिलचस्पी नहीं है। जब वह अपनी शपथ पूरी कर लेता है और अपने उद्देश्य में सपफल हो जाता है तो सेवानिवृत्त होकर ¯चतन - मनन का जीवन बिताना चाहता है। अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए शायद ही कोइर् ऐसी बात रही हो जिसे करने में चाणक्य को किसी प्रकार का संकोच होता। भारत की खोज चाणक्य के अथर्शास्त्रा में व्यापक स्तर पर अनेकानेक विषयों पर लिखा गया है। उसमें शासन के सि(ांत और व्यवहार के लगभग सभी पहलुओं पर विचार किया गया है। इसमें चंद्रगुप्त की विराट सेना का विस्तार से वणर्न किया गया है। चाणक्य का कहना है कि केवल संख्या से वुफछ नहीं होता, अनुशासन और उचित नेतृत्व के अभाव में वे बोझ बन जाते हैं। इसमें रक्षा और किलेबंदी के बारे में भी बताया गया है। पुस्तक में च£चत अन्य विषयों में व्यापार और वाण्िाज्य, कानून और न्यायालय, नगर - व्यवस्था, सामाजिक रीति - रिवाज, विवाह और तलाक, स्ित्रायों के अध्िकार, कर और लगान, कृष्िा, खानों और कारखानों को चलाना, दस्तकारी, मंडियाँ, बागवानी, उद्योग - ध्ंध्े, ¯सचाइर् और जलमागर्, जहाश और जहाशरानी, निगमें, जन - गणना, मत्स्य - उद्योग, कसाइर् खाने, पासपोटर् और जेल - सब शामिल हैं। इसमें विध्वा विवाह को मान्यता दी गइर् है और विशेष परिस्िथतियों में तलाक को भी। अपने राज्याभ्िाषेक के समय राजा को इस बात की शपथ लेनी पड़ती थी कि वह प्रजा की सेवा करेगा - उसका सुख उसकी प्रजा के सुख में है, उसकी खुशहाली में है, वह उसी को अच्छा समझेगा जो उसकी प्रजा को अच्छा लगेगा, उसे नहीं जो खुद को अच्छा लगे। यदि राजा उत्साही होगा, तो प्रजा समान रूप से उत्साही होगी। सावर्जनिक काम राजा की मशीर् के मोहताज नहीं होते, उसे खुद हमेशा इनके लिए तैयार रहना चाहिए। यदि दक्ष्िाण - पूवर् और दक्ष्िाण का एक भाग उसके अध्िकार क्षेत्रा में नहीं आ पाए थे। संपूणर् भारत को एक शासन व्यवस्था के मातहत इकऋा करने के पुराने सपने ने अशोक को प्रेरित किया और उसने तत्काल पूरबी तट के क¯लग प्रदेश को जीतने की ठान ली। क¯लग के लोगों के बहादुरी से मुकाबला करने के बावजूद अशोक की सेना जीत गइर्। इस यु( में भयंकर कत्लेआम हुआ। जब इस बात की खबर अशोक को मिली तो उसे बहुत पछतावा हुआ और यु( से विरक्ित हो गइर्। बु( की श्िाक्षा के प्रभाव से उसका मन दूसरे क्षेत्रों में विजय हासिल करने और साहसिक काम करने की ओर घूम गया। अशोक के विचारों और कमो± के बारे में हमें .पफरमानों से जानकारी मिलती है जो उसने जारी किए और जो पत्थर और धतु पर खोदे गए। ये .पफरमान पूरे भारत में पैफले हैं और अब भी मिलते हैं। क¯लग को साम्राज्य में मिलाए जाने के ठीक बाद ही महामहिम सम्राट ने ध्मर् के नियमों का उत्साहपूवर्क पालन, उन नियमों के प्रति प्रेम और उसको ;ध्मर् कोद्ध अंगीकार करना आरंभ कर दिया। उनके एक .पफरमान में कहा गया है कि अशोक अब आगे किसी प्रकार की हत्या या बंदी बनाए जाने को सहन नहीं करेगा। क¯लग में मरने और बंदी बनाए जाने वाले लोगों के सौवें - हशारवें हिस्से को भी नहीं। सच्ची विजय कतर्व्य और ध्मर् पालन करके लोगों के हृदय को जीतने में है। .पफरमान में आगे कहा गया है - फ्इसके अलावा, यदि कोइर् उनके साथ बुराइर् करेगा तो उसे भी जहाँ तक संभव होगा महामहिम सम्राट को झेलना होगा। महामहिम सम्राट की यह आकांक्षा है कि जीव - मात्रा की रक्षा हो, उनमें आत्म - संयम हो, उन्हें मन की शांति और आनंद प्राप्त हो।य् भारत की खोज अशोक का एक अभ्िालेख इस अद्भुत शासक ने, जिसे आज भी भारत और एश्िाया के बहुत से दूसरे भागों में प्यार से याद किया जाता है, अपने आपको बु( की श्िाक्षा के प्रचार में, नेकी और सद्भाव के काम में तथा प्रजा के हित के लिए सावर्जनिक कायो± के प्रति समपिर्त कर दिया। उसने ऐलान कर दिया था कि वह इनके लिए हमेशा तैयार है। हर स्थान पर और हर समय, सरकारी कमर्चारी जनता के कायो± के बारे में उसे बराबर सूचना देते रहें, चाहे जिस समय और जहाँ भी हो वह लोक - हित के लिए अवश्य काम करेगा। खुद क‘र बौ( होने पर भी उसने दूसरे ध्मो± को बराबर आदर और महत्त्व दिया। अशोक बहुत बड़ा निमार्ता भी था। उसने अपनी वुफछ बड़ी इमारतों को बनाने में मदद के लिए विदेशी कारीगरों को रख छोड़ा था। यह नतीजा एक जगह इकऋे बने स्तंभों के डिशाइन से निकाला गया है जो पसिर्पोलिस की याद दिलाते हैं। लेकिन इस

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