तलाश भारत के अतीत की झाँकी बीते हुए सालों में मेरे मन में भारत ही भारत रहा है। इस बीच मैं बराबर उसे समझने और उसके प्रति अपनी प्रतिियाओं का विश्लेषण करने की कोश्िाश करता रहा हूँ। मैंने बचपन की ओर लौटकर याद करने की कोश्िाश की कि मैं तब वैफसा महसूस करता था, मेरे मन में इस अवधरणा ने वैफसा ध्ुँध्ला रूप ले लिया था और मेरे ताशा अनुभव ने उसे वैफसे सँवारा था। आख्िार यह भारत है क्या? अतीत में यह किस विशेषता का प्रतिनििात्व करता था? उसने अपनी प्राचीन शक्ित को वैफसे खो दिया? क्या उसने इस शक्ित को पूरी तरह खो दिया है? विशाल जनसंख्या का बसेरा होने के अलावा क्या आज उसके पास ऐसा वुफछ बचा है जिसे जानदार कहा जा सके? आध्ुनिक विश्व से उसका तालमेल किस रूप में बैठता है? भारत मेरे खून में रचा - बसा था। इसके बावशूद मैंने उसे एक बाहरी आलोचक की नशर से देखना शुरू किया। ऐसा आलोचक जो वतर्मान के साथ - साथ अतीत के बहुत से अवशेषों को, जिन्हें उसने देखा था - नापसंद करता था। एक हद तक मैं उस तक पश्िचम के रास्ते से होकर पहुँचा था। मैंने उसे उसी भाव से देखा जैसे संभवतः किसी पश्िचमी मित्रा ने देखा होता। मेरे भीतर शंकाएँ सिर उठा रही थीं। क्या मैंने भारत को जान लिया था? मैं, जो उसके अतीत की विरासत के बड़े हिस्से को खारिज करने का साहस कर रहा था। लेकिन अगर भारत के पास वह वुफछ नहीं होता जो बहुत जीवंत और टिकाऊ रहा है, वह बहुत वुफछ जो साथर्क है, तो भारत का वजूद उस रूप में नहीं होता जैसा आज है और वह हशारों वषर् तक अपने ‘सभ्य’ अस्ितत्व की पहचान इस रूप में कदापि बनाए नहीं रख सकता था। वह ‘विशेष’ तत्व आख्िार क्या था? मैं भारत के उत्तर - पश्िचम में स्िथत ¯सध्ु घाटी में मोहनजोदड़ो के एक टीले पर खड़ा था। मेरे चारों तर.पफ उस प्राचीन नगर के घर और गलियाँ बिखरी थीं जिसका समय पाँच हशार वषर् पहले बताया जाता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि वहाँ एक प्राचीन और पूणर्तः विकसित सभ्यता थी। इनके स्थायी रूप से टिके रहने का कारण है इसका ठेठ भारतीयपन और यही आधुुनिक भारतीय सभ्यता का आधार है। यह विचार आश्चयर्चकित कर देता है कि कोइर् संस्कृति या सभ्यता इस प्रकार पाँच - छह हशार वषर् या उससे भी वुफछ अध्िक समय तक निरंतर बनी रहे, वह भी बराबर परिवतर्नशील और विकासमान रहकर। पफारस, मिस्र, ग्रीस, चीन, अरब, मध्य - एश्िाया और भू - मध्य सागर के लोगों़दंतकथाओं के साथ निकट संबंध् है और जिसने हमारे विचारों और साहित्य को बहुत दूर तक प्रभावित किया है। पहाड़ों के प्रति मेरे प्रेम ने और कश्मीर के साथ मेरे खून के रिश्ते ने मुझे उनकी ओर विशेष रूप से आकष्िार्त किया। इस महान पवर्त से निकलकर भारत के मैदानों में बहने वाली भारत की विशाल नदियों ने मुझे आकष्िार्त किया और इतिहास के अनगिनत पहलुओं की याद ताशा की। इंडस या ¯सध्ु, जिसके आधर पर हमारे इस देश का नाम पड़ा ‘इंडिया’ और ‘¯हदुस्तान’, और जिसे पार करके हशारों वषो± से यहाँ जातियाँ पफौजें आती रही हंै। ब्रह्मपुत्रा...इतिहास की मुख्यधारा .पफले और .और कबीले, कािसे लगभग कटी हुइर्, पर पुरानी कहानियों में आज भी जीवित, उत्तरपूवीर् पहाडि़यों के हृदय में पड़ी गहरी दरारों के बीच से बरबस मागर् बनाती हुइर् भारत में प्रवेश करती है और पिफर पहाड़ों और जंगलों से भरे मैदान के बीच शांत रमणीय धरा के रूप में बहने लगती है। यमुना, जिसके चारों ओर नृत्य, उत्सव और नाटक से संब( न जाने कितनी पौराण्िाक कथाएँ एकत्रा हैं। इन सबसे बढ़कर है, भारत की नदी गंगा, जिसने इतिहास के आंरभ से ही भारत के हृदय पर राज किया है और लाखों की तादाद में लोगों को अपने तटों की ओर खींचा है। प्राचीन काल से आध्ुनिक युग तक, गंगा की गाथा भारत की सभ्यता और संस्वृफति की कहानी है। मैंने पुराने स्मारकों और भग्नावशेषों को और पुरानी मूतिर्यों और भ्िािा आस्था थी जो हमारे लोगों को अनगिनत पीढि़यों से भारत की इस प्रसि( नदी की ओर खींचती रही है। मेरे अध्ययन की पृष्ठभूमि के साथ इन यात्राओं और दौरों ने मिलकर मुझे अतीत में देखने की अंतदर्ृष्िट दी। मेरे मन में भारत की जो तसवीर थी उसमें धीरे - ध्ीरे सच्चाइर् का बोध् घर करने लगा। मेरे पूवर्जों की भूमि में ऐसे जीते जागते लोग आबाद हो गए जो हँसते - रोते थे, प्यार करते थे और पीड़ा भोगते थे। इन्हीं में ऐसे लोग भी थे जिन्हें ¯शदगी की जानकारी और समझ थी। इस अतीत के सैकड़ों सजीव चित्रा मेरे मन में भरे थे। जब भी किसी जगह जाता था, उस विशेष स्थान से संब( चित्रा तत्काल मेरे सामने आ खड़ा होता था। बनारस के पास सारनाथ में मैंने बु( को उनका पहला उपदेश देते हुए लगभग वुफछ अभ्िालिख्िातपफासला तय करके उनके .पफ देखा। ढाइर् हशार वषर् का .साशब्द जैसे दूर से आती प्रतिध्वनि की तरह मुझे सुनाइर् पड़े। अशोक के पाषाण स्तंभ जैसे अपने श्िालालेखों के माध्यम से मुझे एक ऐसे आदमी के बारे में बताते थे, जो खुद एक सम्राट होकर भी किसी अन्य राजा और सम्राट से महान ाफतेहपुर सीकरी में, अपने साम्राज्य को भुलाकर बैठा अकबर विभ्िान्न मतों़के विद्वानों से संवाद और वाद - विवाद कर रहा था। वह जिज्ञासु भाव से मनुष्य की शाश्वत समस्याओं का हल तलाश कर रहा था। इस तरह भारत के इतिहास की लंबी झाँकी अपने उतार - चढ़ावों के और विजय - पराजयों के साथ जैसे ध्ीरे - ध्ीरे मेरे सामने खुलती जा रही थी। मुझे इतिहास के पाँच हशार वषो± से चली आ रही इस सांस्वृफतिक परंपरा की था। प्इस तकनीकी विकास के पीछे विज्ञान की चेतना थी तथा हौसलामंद जीवनी शक्ित और मानसिकता थी। नयी तकनीकों ने पश्िचमी यूरोप के देशों को सैनिक बल दिया और उनके लिए अपना विस्तार करके पूरब पर अध्िकार करना आसान हो गया। यह केवल भारत की ही नहीं, लगभग सारे एश्िाया की कहानी है। ऐसा क्यों हुआ, इस गुत्थी को सुलझाना श्यादा मुश्िकल है क्योंकि पुराने समय में तो भारत में मानसिक सजगता और तकनीकी कौशल की कमी थी नहीं, ¯कतु बाद की सदियों में उत्तरोत्तर गिरावट का आभास होने लगता है। जीवन की लालसा और उद्यम में कमी आ जाती है। क्षीण होती रचनात्मक प्रवृिा की जगह अनुकरण की प्रवृिा ले लेती है। जहाँ कामयाबी के साथ विद्रोही विचार - प(ति ने प्रकृति और ब्रह्मांड के रहस्यों को भेदने का प्रयास किया था, वहाँ शब्दाडंबर से लैस भाष्यकार उसकी जगह लेता दिखाइर् देने लगता है। भव्य कला और मूतिर् निमार्ण का स्थान जटिल पच्चीकारी वाली सावधनी से की गइर् नक्काशी लेने लगी। प्रभावी ¯कतु सरल, सजीव और समृ( भाषा की जगह, अत्यंत अलंकृत और जटिल साहित्य शैली ने ले ली। साहसिक कायो± की लालसा और छलकती हुइर् ¯शदगी, जिसके कारण सुदूर देशों में भारतीय संस्कृति का प्रसार संभव हो सका था, क्षीण हो चली और उसके स्थान पर महासागरों को पार करने पर रोक लगाने वाली संकीणर् रूढि़वादिता ने जन्म ले लिया। जाँच - पड़ताल की विवेकपूणर् चेतना लुप्त होती गइर् और अतीत की अंध्ी मूतिर्पूजा ने उसकी जगह ले ली। अतीत के विकट भार ने उसे वुफचल कर रख दिया और वह एक तरह की मूच्छार् से ग्रस्त हो गइर्। मानसिक जड़ता और शारीरिक थकावट की इस हालत में भारत का ”ास होने लगा। वह गतिहीन और जड़ हो गया जबकि विश्व के दूसरे हिस्से प्रगति के पथ पर बढ़ते गए। ¯कतु यह स्िथति का पूरा और पूणर्तः सही सवेर्क्षण नहीं है। यदि केवल जड़ता और गतिहीनता का एकरस और लंबा दौर रहा होता, तो उसका नाता अतीत से पूरी तरह टूट जाता। एक युग का अंत और उसके ध्वंसावशेषों पर किसी नयी चीश का निमार्ण होता। इस तरह का क्रमभंग नहीं हुआ और भारत में भी निरंतरता बनी रही। इसके अलावा, समय - समय पर पुनजार्गरण भारत की खोज के दौर आते रहे। नए को समझने और उसे अनुवूफल बनाकर कम - से - कम पुराने के उस अंश के साथ, जिसको रक्षा करने लायक समझा गया, उसका सामंजस्य करने के प्रयास सा.पफ दिखाइर् पड़ते हैं। अक्सर पुराने का केवल बाहरी ढाँचा प्रतीक के रूप में बचा रहा और उसकी अंतवर्स्तु बदल गइर्। ऐसी लालसा, जो लोगांे को उस लक्ष्य की ओर खींचती है जो पूरी तरह सि( नहीं किया जा सका हो, और साथ ही प्राचीन और नवीन के बीच सामंजस्य स्थापित करने की इच्छा बराबर बनी रहती है - इसी लालसा ने उन्हें गति दी और उन्हें पुराने को बनाए रखने के साथ - साथ नए विचारों को आत्मसात करने की सामथ्यर् दी। भारत की तलाश पुस्तकों, प्राचीन स्मारकों और विगत सांस्वृफतिक उपलब्िधयों ने मुझमें एक हद तक भारत की समझ तो पैदा की लेकिन मुझे उससे संतोष नहीं हुआ, न ही मुझे वह उत्तर मिला जिसकी मैं तलाश कर रहा था। वतर्मान मेरे लिए और मुझ जैसे बहुत से और लोगों के लिए मध्ययुगीनता, भयंकर गरीबी एवं दुगर्ति और मध्य वगर् की वुफछ - वुफछ सतही आधुनिकता का विचित्रा मिश्रण है। मैं अपने वगर् और अपनी किस्म के लोगों का प्रशंसक नहीं था, पिफर भी भारतीय संघषर् में नेतृत्व के लिए मैं निश्िचत रूप से मध्य वगर् की ओर देखता था। यह मध्य वगर् स्वयं को बंदी और सीमाओं में जकड़ा हुआ महसूस करता था और खुद तरक्की और विकास करना चाहता था। अंग्रेशी शासन के ढाँचे के भीतर ऐसा न कर पाने के कारण उसके भीतर विद्रोह की चेतना पनपी। लेकिन यह चेतना उस ढाँचे पफ नहीं जाती थी जिसने हमें रौंद दिया था। ये उस ढाँचे को बनाए .के ख्िालाकम अहमियत देते थे। यह दृश्य बेचैन कर देने वाला था इसलिए कि उसने हमारे वुफछ मूल्यों और निष्कषो± में संदेह उत्पन्न कर दिया था। तब हमने भारत के वास्तविक रूप की तलाश शुरू की और इससे हमारे भीतर इसकी समझ और द्वंद्व दोनों ही पैदा हुए। वुफछ लोग इस ग्रामीण समुदाय से पहले से परिचित थे, इसलिए उन्हें कोइर् नया उत्तेजक अनुभव नहीं हुआ। पर मेरे लिए यह सही अथो± में नयी तलाश के लिए यात्रा थी। गोया कि मुझे बराबर अपने लोगों की असपफलताओं और कमशोरियों का ददर् भरा अहसास रहता था, पर भारत की ग्रामीण जनता में वुफछ ऐसा था जिसे परिभाष्िात करना कठिन है पर उसने मुझे बराबर आकष्िार्त किया। उनमें वुफछ ऐसी बात थी जो मध्य वगर् मंे अनुपस्िथत थी। मैं आम जनता की अवधारणा को काल्पनिक नहीं बनाना चाहता। मेरे लिए भारत के लोगों का अपनी सारी विविधता के साथ वास्तविक अस्ितत्व है। उनकी विशाल संख्या के बावजूद मैं उनके बारे में अनिश्िचत समुदायों के नहीं, व्यक्ितयों के रूप में सोचने की कोश्िाश करता हूँ। चूँकि मैंने उनसे बहुत अपेक्षाएँ नहीं रखी, शायद इसीलिए मुझे निराशा भी नहीं हुइर्। मैंने जितनी उम्मीद की थी उससे कहीं अिाक पाया। मुझे सूझा कि इसका कारण और इसके साथ ही उनमें जो एक प्रकार की दृढ़ता और अंतःशक्ित है उसका कारण भारत की प्राचीन सांस्वृफतिक परंपरा है जिसे उन्होंने वुफछ अंशों किसानों को मैंने इस महान देश की बाबत बताया जिसकी मुक्ित के लिए हम संघषर् कर रहे हैं, कि वैफसे इसका हर हिस्सा दूसरे से भ्िान्न होते हुए भी भारत है। मैंने उन्हें उत्तर से दक्ष्िाण और पूरब से पश्िचम तक किसानों की सामान्य समस्याओं की जानकारी दी और उस स्वराज की भी जो वुफछ विशेष लोगों के लिए नहीं, सब के लिए, भारत के हर हिस्से के लिए एक - सा होगा। मैंने उन्हें सुदूर उत्तर - पश्िचम में खैबर पास से कन्यावुफमारी या केप कोमरिन तक अपनी यात्रा के बारे में बताया। मैंने बताया कि वैफसे हर जगह मुझसे किसानों ने एक जैसे सवाल पूछे, क्योंकि उनकी समस्याएँ समान थीं - गरीबी, कशर्, निहित स्वाथर्, शमींदार, महाजन, भारी लगान और कर, पुलिस के अत्याचार और ये सब उस ढाँचे में लिपटे हुए थे जिसे हमारे उफपर विदेशी हुवूफमत ने आरोपित किया था। साथ ही यह भी कि राहत भी सबके लिए आनी चाहिए। मैंने इस बात की कोश्िाश की कि वे भारत को अखंड मानकर उसके बारे में सोचें। साथ ही थोड़ा - बहुत उस विराट विश्व के बारे में भी सोचें, जिसके हम एक हिस्से हैं। यह काम बहुत आसान नहीं था पर उतना मुश्िकल भी नहीं था जैसा मैंने सोचा था। हमारे प्राचीन महाकाव्यों, पुरागाथाओं और दंतकथाओं की उन्हें पूरी जानकारी थी। इस साहित्य ने अपने देश की अवधारणा से उन्हें परिचित करा दिया था। इन लोगों में से हमेशा वुफछ ऐसे भी होेते ही थे जिन्होंने भारत के तमाम टुकड़ों की या पिफर पूरे भारत की मि‘ी?य् प्रश्नोत्तर का यह सिलसिला तब तक चलता रहता जब तक वे प्रयत्न करते रहते और आख्िार में कहते कि भारत वह सब वुफछ तो है ही जो उन्होंने सोच रखा है, उसके अलावा भी बहुत वुफछ है। भारत के पहाड़ और नदियाँ, जंगल और पैफले हुए खेत जो हमारे लिए खाना मुहैया करते हैं, सब हमें पि्रय हैं। लेकिन जिस चीश का सबसे अिाक महत्त्व है वह है भारत की जनता। उनके और मेरे जैसे तमाम लोग। वे सब लोग जो इस विशाल ध्रती पर चारों ओर पैफले हैं। भारत माता मूल रूप से यही लाखों लोग हैं और उसकी जय का अथर् है इसी जनता जनादर्न की जय। मैंने उनसे कहा कि तुम भारत माता के हिस्से हो, एक तरह से तुम खुद ही भारत माता हो। जैसे - जैसे यह विचार ध्ीरे - ध्ीरे उनके दिमाग में बैठता जाता, उनकी आँखें चमकने लगतीं मानो उन्होंने कोइर् महान खोज कर ली हो। भारत की विविध्ता और एकता भारत की विविध्ता अद्भुत है, प्रकट है, वह सतह पर दिखाइर् पड़ती है और कोइर् भी उसे देख सकता है। इसका ताल्लुक शारीरिक रूप से भी है और मानसिक आदतों और विशेषताओं से भी। बाहर से देखने पर उत्तर - पश्िचमी इलाके के पठान और सुदूर दक्ष्िाण के वासी तमिल में बहुत कम समानता है। उनकी नस्लें भ्िान्न हैं, हालाँकि उनके भीतर वुफछ समान सूत्रा हो सकते मध्य एश्िाया में बसी थीं, इस्लाम के आने से पहले, बौ( थीं और उससे भी पहले वैदिक काल में ¯हदू थीं। सीमांत क्षेत्रा प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रमुख वेंफद्रों में से था। अब भी स्मारकों और मठों के ढेरों ध्वस्त अवशेष उसमें बिखरे हैं - विशेष रूप से तक्षश्िाला के महान विश्वविद्यालय के, जो दो हशार वषर् पहले अपनी प्रसिि की चरम - सीमा पर था। सारे भारत के साथ ही एश्िाया के विभ्िान्न भागों से विद्याथीर् यहाँ ¯खचे आते थे। धमर् - परिवतर्न से अंतर शरूर आया, पर उन क्षेत्रों के लोगों ने जो मानसिकता विकसित कर ली थी वह पूरी तरह नहीं बदल सकी। पठान और तमिल दो चरम उदाहरण हैं, बाकी की स्िथति कहीं इन दोनों के बीच में है। सबकी अपनी अलग - अलग विशेषताएँ हैं, पर सब पर इससे भी गहरी छाप भारतीयता की है। यह जानकारी बेहद हैरत में डालने वाली है कि बंगाली, मराठी, गुजराती, तमिल, आंध्र, उडि़या, असमी, कन्नड़, मलयाली, ¯सधी, पंजाबी, पठान, कश्मीरी, राजपूत और ¯हदुस्तानी भाषा - भाषी जनता से बसा हुआ विशाल मध्य भाग, वैफसे सैकड़ों वषो± से अपनी - अपनी अलग पहचान बनाए रहा। इसके बावजूद इन सबके गुण - दोष कमोबेश एक से हैं - इसकी जानकारी पुरानी परंपरा और अभ्िालेखों से मिलती है। साथ ही इस पूरे दौरान वे ऐसे भारतीय बने रहे हैं जिनकी राष्ट्रीय विरासत एक ही थी और उनकी नैतिक और मानसिक विशेषताएँ भी समान थीं। प्राचीन चीन की किसी एक देशीय समूह में, चाहे वे कितने घनिष्ठ रूप में एक - दूसरे से जुड़े हों, छोटी - बड़ी भ्िान्नताएँ हमेशा देखी जा सकती हैं। उस समूह की मूल एकता तब प्रकट होती है जब उसकी तुलना किसी अन्य देशीय समूह से की जाती है। यह बात अलग है कि अक्सर दो निकटवतीर् समूहों की भ्िान्नता, सीमांत इलाकों में या तो धुँधली पड़ जाती हैं या आपस में घुल - मिल जाती हैं। प्राचीन और मध्य युग में, आधुनिक राष्ट्र के विचार ने जन्म नहीं लिया था और सामंती, धामिर्क या जातीय संबंधों का महत्त्व अिाक था। पिफर भी, मेरा विचार है कि ज्ञात इतिहास में किसी भी समय एक भारतवासी, भारत के किसी भी हिस्से में अपने ही घर की - सी - अपनेपन की अनुभूति करता था, जबकि किसी भी दूसरे देश में पहुँचकर वह अजनबी और परदेशी महसूस करता था। उन देशों में जाकर जिन्होंने वुफछ दूर तक उसकी संस्वृफति या धमर् को अपना लिया था, उसे अजनबीपन का बोध निश्चय ही कम होता था। वे लोग जो किसी गैर - भारतीय धमर् को मानने वाले थे या भारत में आकर यहीं बस गए, वुफछ ही पीढि़यों के गुशरने के दौरान स्पष्ट रूप से भारतीय हो गए जैसे यहूदी, पारसी और मुसलमान। जिन भारतीयों ने इन धमो± को स्वीकार कर लिया वे भी धमर् - परिवतर्न के बावजूद भारतीय बने रहे। आज, जब राष्ट्रीयतावाद की अवधारणा कहीं अिाक विकसित हो गइर् वषार् )तु की उस जादुइर् बरसात के बारे में जो झुलसी हुइर् धरती में जीवन संचार करके उसे सहसा सौंदयर् और हरियाली के झिलमिलाते प्रसार में बदल देती है। विशाल नदियों और उनके बहते जल के बारे में। ठंड की चादर से लिपटे खैबर पास के बारे में। भारत के दक्ष्िाणी सिरे के बारे में। लोगों के बारे में - व्यक्ित और समूह दोनों रूपों में और सबसे श्यादा ब.पर्फ की टोपी पहने हिमालय के या वसंत )तु में कश्मीर की किसी पहाड़ी घाटी के बारे में जो नवजात पूफलों से लदी होती है और जिसके बीच से कलकल - खलखल करता झरना बहता है। हम अपनी पसंद की तसवीर बनाते हैं और उसे सहेजकर रखते हैं। जन संस्वृफति मैंने वतर्मान समय में भारतीय जनता के गतिशील जीवन - नाटक को देखा। ऐसे अवसर पर मैं अक्सर उन सूत्रों को खोज लेता था जिनसे उनका जीवन अतीत में बंँध है, जबकि उनकी आँखें भविष्य पर टिकी रहती थीं। हर जगह मुझे एक सांस्वृफतिक पृष्ठभूमि मिली जिसका जनता के जीवन पर बहुत गहरा असर था। इस पृष्ठभूमि में लोक प्रचलित दशर्न, परंपरा, इतिहास, मिथक और पुराकथाओं का मेल था और इनमें से किसी को दूसरे से अलग करके देख पाना संभव नहीं था। पूरी तरह अश्िाक्ष्िात और निरक्षर लोग भी इस पृष्ठभूमि में हिस्सेदार थे। लोक - प्रचलित अनुवादों और टीकाओं के माध्यम से भारत के प्राचीन महाकाव्य - रामायण और महाभारत और अन्य ग्रंथ भी जनता के बीच दूर - दूर तक प्रसि( थे। हर घटना, कथा और उनका नैतिक अथर्, लोकमानस पर अंकित था और उसने उन्हें समृ( और संतुष्ट बनाया था। अनपढ़ ग्रामीणों को सैकड़ों पद याद थे और अपनी बातचीत के दौरान वे बराबर या तो उन्हें उ(ृत करते थे या पिफर किसी प्राचीन रचना में सुरक्ष्िात किसी ऐसी कहानी का उल्लेख करते थे जिससे कोइर् नैतिक उपदेश निकलता हो। रोशमरार् की ¯शदगी के मसलों के बारे में सीध्ी - सादी बातचीत को ये देहाती लोग जब इस तरह का साहित्ियक मोड़ देते थे तो मुझे अक्सर बहुत आश्चयर् होता था। यदि मेरे मन में लिख्िात इतिहास और लगभग तलाश सुनिश्िचत तथ्यों से निमिर्त तसवीरों का भंडार था तो मैंने महसूस किया कि अनपढ़ किसान के मन में भी उसका अपना तसवीरों का भंडार है। यह बात अलग है कि उसका ड्डोत पुराकथाएँ एवं परंपरा और महाकाव्य के नायक - नायिकाएँ ही अध्िक थीं और इतिहास बहुत कम। तिस पर भी वह बहुत स्पष्ट होता था। मैं उनके चेहरे, उनके आकार और उनकी चाल - ढाल को ध्यान से देखता। उनके बीच बहुत से संवेदनशील चेहरे, बलिष्ठ देह और सीध्े सा.पफ अवयवों वाले पुरुष दिखाइर् देते। महिलाओं में लावण्य, नम्रता, गरिमा और संतुलन के साथ - साथ एक ऐसा चेहरा जो अवसाद से भरा होता था। कभी - कभी किसी देहाती रास्ते या गाँव के बीच से गुशरते हुए मेरी नशर किसी मनोहर पुरुष या सुंदर स्त्राी पर पड़ती थी तो मैं विस्मय - विमुग्ध् हो जाता था। वे मुझे पुराने भ्िािा चित्रों की याद दिला देते थे। मुझे इस बात से हैरत होती कि उन तमाम भयानक कष्टों के बावजूद, जिनसे भारत युगों तक गुशरता रहा, आख्िार यह सौंदयर् वैफसे टिका और बना रहा! इन लोगों को साथ लेकर हम क्या नहीं कर सकते बशतेर् इनके हालात बेहतर हों और इनके पास वुफछ करने के श्यादा अवसर हों। चारों ओर गरीबी और उससे पैदा होने वाली अनगिनत विपिायाँ पैफली थीं और इसकी छाप हर माथे पर थी। ¯शदगी को वुफचलकर विकृत और भयंकर रूप दे दिया गया था। इस विकृति से तरह - तरह के भ्रष्टाचार पैदा हुए और लगातार अभाव और असुरक्षा की स्िथति बनी रहने लगी। यह सब देखने

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