अहमदनगर का किला अहमदनगर का किला, 13 अपै्रल 1944 यह मेरी नौवीं जेलयात्रा थी। हमें यहाँ आए बीस महीने से भी अिाक समय हो चुका था। जब हम यहाँ पहुँचे तो अँध्ियारे आकाश में झिलमिलाते दूज के चाँद ने हमारा स्वागत किया। शुक्ल - पक्ष शुरू हो चुका था। तब से हर बार जब नया चाँद उगता है तो जैसे मुझे याद दिला जाता है कि मेरे कारावास का एक महीना और बीत गया। चाँद मेरे बंदी जीवन का स्थायी सहचर रहा है। वही मुझे इस बात की याद दिलाता है कि अँध्ेरे के बाद उजाला होता है। अतीत का भार दूसरी जेलों की तरह, यहाँ अहमदनगर के किले में भी मैंने बागवानी करना शुरू कर दिया। मैं रोश कइर् घंटे, तपती ध्ूप में भी पूफलों के लिए क्यारियाँ बनाने में बिताने लगा। मि‘ी बहुत खराब थी - पथरीली और पुराने मलबे और अवशेषों से भरी हुइर्। चूँकि यह इतिहास - स्थल है इसलिए अतीत में इसने कइर् यु( और राजमहलों की दुरभ्िासंध्ियाँ देखी हैं। यहाँ का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। घटनाओं की दृष्िट से इसकी कोइर् विशेष अहमियत भी नहीं है। पर इससे जुड़ी एक घटना, आज भी याद की जाती है। यह घटना है चाँद बीबी नाम की एक सुंदर महिला के साहस की कहानी, जिसने इस किले की रक्षा के लिए अकबर की शाही सेना के विरफ(, हाथ में तलवार बना लेता, मैं उसके बारे में नहीं लिख सकता। न ही पैगंबर की भूमिका अख्ितयार कर मैं प्िाफलहाल भविष्य के बारे में लिख सकता हूँ। बचा रहता़है अतीत, पर मैं उसके बारे में भी किसी इतिहासकार या विद्वान की तरह विद्वत्तापूणर् शैली में नहीं लिख सकता। मैं पहले की ही तरह, अपने आज के विचारों और ियाकलापों के साथ संबंध् स्थापित करके ही उसके बारे में वुफछ लिख सकता हूँ। गेटे ने एक बार कहा था कि इस तरह का इतिहास लेखन अतीत के भारी बोझ से एक सीमा तक राहत दिलाता है। अतीत का दबाव दबाव, भला हो या बुरा, दोनों तरह अभ्िाभूत करता है। कभी - कभी यह दबाव दमघोंटू होता है - खास तौर पर उन लोगों के लिए जिनकी जड़ें बहुत पुरानी सभ्यताओं में होती हैं - मसलन भारत और चीन की सभ्यताएँ। आख्िार मेरी विरासत क्या है? मैं किन बातों का उत्तराध्िकारी हूँ? क्या उन सबका जिसे मानवता ने दसियों हशारों साल के दौरान हासिल किया। उसकी विजयों के उल्लास का, उसकी पराजयों की दुखद यंत्राणा का, मानव के उन हैरतअंगेश साहसिक कायो± का जिनकी शुरुआत युगों पहले हुइर् और जो अब भी जारी हैं और हमें आकष्िार्त करती हैं। मैं इस सबका वारिस हूँ, साथ ही उस सबका भी जिसमें पूरी मानव जाति की साझेदारी है। हम भारतवासियों की विरासत में एक खास बात है, जो अनोखी नहीं है, क्योंकि कोइर् व्यक्ित औरों से एकदम अलग नहीं होता। अलबत्ता एक बात हम लोगों पर विशेष रूप से लागू होती है, जो हमारे रक्त, मांस और अस्िथयों में समाइर् है। इसी विशेषता से हमारा वतर्मान रूप बना है और हमारा भावी रूप बनेगा। इसी विश्िाष्ट विरासत का विचार और वतर्मान पर इसे लागू करने की बात एक लंबे अरसे से मेरे मन में घर किए है। मैं इसी के बारे में लिखना चाहता हूँ। विषय की कठिनाइर् और जटिलता मुझे भयभीत करती है। मुझे लगता है कि मैं सतही तौर पर इसका स्पशर् ही कर सकता हूँ। अहमदनगर का किला

RELOAD if chapter isn't visible.