दसवाँ पाठ एक थी लड़की। नाम था उसका वल्ली अम्माइर्। आठ बरस की थी। उसे अपने घर के दरवाजे पर खड़े होकर सड़क की रौनक देखना बड़ा अच्छा लगता था। वल्ली अम्माइर् को अपना नाम भी बड़ा अच्छा लगता था। वैसे, दुनिया में ऐसा कौन होगा जिसे अपना नाम पसंद न हो? सड़क पर वल्ली अम्माइर् की उम्र का कोइर् साथी नहीं था। अपनी दहलीज पर खड़े रहने के अलावा वह कर भी क्या सकती थी? और पिफर उसकी माँ ने उसे सख्त ताकीद कर रखी थी कि वह खेलने के लिए अपनी सड़क छोड़कर दूसरी सड़क पर न जाए। सड़क पर सबसे ज्यादा आकष्िार्त करनेवाली वस्तु, कस्बे की बस थी जो हर घंटे उध्र से गुजरती थी। एक दपफा जाते हुए और एक दपफा, लौटते हुए। हर बार नयी - नयी सवारियों से लदी होती चली गइर्। वल्ली बड़ी हसरत से उन लोगों की तरप़्ाफ देखती जो सड़क के नुक्कड़ पर बस से उतरते - चढ़ते, जहाँ पर बस आकर रुकती थी। उनके चेहरे इसके दिल में सौ - सौ इच्छाएँ, सपने और आशाएँ जगा जाते। उसकी कोइर् सखी - सहेली जब उसे अपनी बस - यात्रा का किस्सा सुनाती, शहर के किसी दृश्य का हाल बताकर डींग हाँकती, तो वल्ली जल - भुन जाती फ्घमंडी...घमंडीय् वह चिल्लाती। चाहे वल्ली और उसकी सहेलियों को इस शब्द का अथर् मालूम नहीं था, पिफर भी इसका बेध्ड़क इस्तेमाल करतीं। दिनों - दिन, महीनों - महीने वल्ली ने बस - यात्रा से संबंध्ित छोटी - मोटी जानकारी गाँव से कभी - कभार शहर जानेवालों और बस मंे प्रायः सप़फर करते रहने वाले यात्रिायों की आपसी बातचीत से प्राप्त कर ली थी। उसने आप भी वुफछ लोगों से इस बारे में सवाल पूछे थे। शहर उसके गाँव से कोइर् दस किलोमीटर दूर था। एक ओर का भाड़ा था तीस पैसे। इसका मतलब, जाने और लौटनेμदोनों ओर के साठ पैसे। शहर तक पहुँचने में बस को पौन घंटा लगता था। शहर पहुँचकर, अगर वह बस में ही बैठी रहे और तीस पैसे और चुका दे तो उसी बस में बैठी - बैठी वापस भी आ सकती है। यानी अगर वह गाँव से दोपहर एक बजे चल दे तो पौने दो बजे शहर पहुँच जाएगी। और पिफर उसी बस से वह अपने गाँव कोइर् तीन बजे लौट आएगी। इसी प्रकार वह हिसाब पर हिसाब लगाती रही, योजना पर योजना बनाती रही। एक दिन की बात है, जब यह बस गाँव की सीमा पार करके बड़ी सड़क पर प्रवेश कर रही थी, एक नन्हीं - सी आवाश पुकारती हुइर् सुनाइर् दी, फ्बस को रोको...बस को रोको।य् एक नन्हा - सा हाथ हिल रहा था। बस ध्ीमी हो गइर्। वंफडक्टर ने बाहर झाँका और वुफछ तुनककर कहा, फ्अरे भइर्! कौन चढ़ना चाहता है? उनसे कहो कि जल्दी करें..सुना तुमने?य् फ्बस...मैं इतना जानती हूँ कि मुझे शहर जाना है...और यह रहा तुम्हारा किराया,य् उसने रेशगारी दिखाते हुए कहा। फ्ठीक! ठीक! पहले बस में चढ़ो तो!य् वंफडक्टर ने कहा और पिफर उसे ध्ीरे से उठाकर बस में चढ़ा लिया। फ्च च च...मैं अपने आप चढूँगी...तुम मुझे उठाते क्यों हो?य् वंफडक्टर बड़ा हँसोड़ था। फ्अरी मेम साहिब! नाराज क्यों होती हो?...बैठो...इध्र पधरो...य् उसने कहा। फ्रास्ता दो भइर् रास्ता...मेम साहिब तशरीप़फ ला रही हैं।य् दोपहर के उस समय आने - जाने वालों की भीड़ - भाड़ घट जाती थी। पूरी बस में वुफल छह - सात सवारियाँ बैठी हुइर् थीं। सभी मुसापिफरों की नशर वल्ली पर थी और वे सब वंफडक्टर की बातों पर हँस रहे थे। वल्ली मन ही मन झेंप गइर्। आँखें पेफर कर वह जल्दी से एक खाली सीट पर जा बैठी। फ्गाड़ी चलाएँ? बेगम साहिबा।य् वंफडक्टर ने मुसकराकर पूछा। उसने दो बार सीटी बजाइर्। बस गरजती हुइर् आगे को बढ़ी। वल्ली सब वुफछ आँखें पफाड़कर देख रही थी। ख्िाड़कियों से बाहर लटक रहे परदे के कारण उसे बाहर का दृश्य देखने में बाध पड़ रही थी। वह अपनी सीट पर खड़ी हो गइर् और बाहर झाँकने लगी। इस समय बस एक नहर के किनारे - किनारे जा रही थी। रास्ता बहुत ही तंग था। एक ओर नहर थी और उसके पार ताड़ के वृक्ष, घास के मैदान, सुदूर पहाडि़याँ और नीला आकाश! दूसरी ओर एक गहरी खाइर् थी, जिसके परे दूर - दूर तक पैफले हुए हरे - भरे खेत! जहाँ तक नशर जाती, हरियाली अहा! यह सब वुफछ कितना अद्भुत था! अचानक एक आवाश आइर् और वह चैंक गइर्। ‘सुनो बच्ची!’ वह आवाश कह रही थी, फ्इस तरह खड़ी मत रहो, बैठ जाओ!य् वल्ली बैठ गइर् और उसने देखा कि वह कौन था? वह एक बड़ी उम्र का आदमी था, जिसने उसी के भले के लिए यह कहा था। लेकिन उसके इन शब्दों से वह चिढ़ गइर्। फ्यहाँ कोइर् बच्ची नहीं हैय्, उसने कहा, फ्मैंने पूरा भाड़ा दिया है।य् वंफडक्टर ने भी बीच में पड़ते हुए कहा, फ्जी हाँ, यह बड़ी बेगम साहिबा हैं। क्या कोइर् बच्चा अपना किराया अपने आप देकर शहर जा सकता है?य् वल्ली ने आँखें तरेरकर उसकी ओर देखा। फ्मैं बेगम साहिबा नहीं हूँ, समझे!... और हाँ, तुमने अभी तक मुझे टिकट नहीं दिया है।य् फ्अरे हाँ!य् वंफडक्टर ने उसी के लहजे की नकल करते हुए कहा, और सब हँसने लगे। इस हँसी में वल्ली भी शामिल थी। वंफडक्टर ने एक टिकट पफाड़ा और उसे देते हुए कहा, फ्आराम से बैठो! सीट के पैसे देने के बाद कोइर् खड़ा क्यों रहे?य् फ्मुझे यह अच्छा लगता हैय्, वह बोली। फ्खड़ी रहोगी तो गिर जाओगी, चोट खा जाओगीμगाड़ी जब एकदम मोड़ काटेगी ...या झटका लगेगा। तभी मैंने तुम्हें बैठने को कहा है, बच्ची!य् फ्मैं बच्ची नहीं हूँ, तुम्हें बता दिया न!य् उसने वुफढ़कर कहा, फ्मैं आठ साल की हूँ।य् फ्क्यों नहीं...क्यों नहीं! मैं भी वैफसा बु(ू हूँ! आठ साल! बाप रे!य् बस रफकी। वुफछ नए मुसा.िपफर बस में चढ़े और वंफडक्टर वुफछ देर के लिए व्यस्त हो गया। वल्ली बैठ गइर्। उसे डर था कि कहीं उसकी सीट ही न चली जाए! एक बड़ी उम्र की औरत आइर् और उसके पास बैठ गइर्। फ्अकेली जा रही हो, बिटिया?य् जैसे ही बस चली, उसने वल्ली से पूछा। फ्हाँ, मैं अकेली जा रही हूँ। मेरे पास मेरा टिकट है।य् उसने अकड़ कर तीखा जवाब दिया। फ्हाँ...हाँ, शहर जा रही हंै...तीस पैसे का टिकट लेकरय् वंफडक्टर ने सपफाइर् दी। फ्आप अपना काम कीजिए, जी!य् वल्ली ने टोका, लेकिन उसकी अपनी हँसी भी छूट रही थी। वंफडक्टर भी ख्िाल - ख्िालाकर हँसने लगा। फ्इतनी छोटी बच्ची के लिए घर से अकेले निकलना क्या उचित है?य् बुढि़या की बक - झक जारी थी। फ्तुम जानती हो, शहर में तुम्हें कहाँ जाना है? किस गली में? किस घर में?य् फ्आप मेरी ¯चता न करें। मुझे सब मालूम है,य् वल्ली ने पीठ मोड़, मुँह ख्िाड़की की ओर करके बाहर झाँकते हुए कहा। यह उसकी पहली यात्रा थी। इस सप्से योजना बनाइर् थी। इसके लिए उसे छोटी - छोटी जो रेशगारी भी हाथ लगी, इकऋी करनी पड़ीμउसे अपनी कितनी ही इच्छाओं को दबाना पड़ा...जैसे कि वह मीठी गोलियाँ नहीं खरीदेगी...ख्िालौने, गुब्बारे...वुफछ भी नहीं लेगी। कितना बड़ा संयम था यह! और पिफर विशेष रूप से उस दिन, जब जेब में पैसे होते हुए भी, गाँव के मेले में गोल - गोल घूमने वाले झूले पर बैठने को उसका कितना जी चाह रहा था। पैसों की समस्या हल हो जाने पर, उसकी दूसरी समस्या यह थी कि वह माँ को बताए बिना घर से वैफसे ख्िासके? लेकिन इस बात का हल भी कोइर् बड़ी कठिनाइर् पैदा किए बिना ही निकल आया। हर रोश, दोपहर के खाने के बाद, उसकी माँ कोइर् एक बजे से चार - साढ़े चार बजे तक सोया करती थी। वल्ली का, बीच का यह समय गाँव के अंदर सैर - सपाटे करने में बीतता था। लेकिन आज वह यह समय गाँव से बाहर की सैर में लगा रही थी। बस चली जा रही थीμकभी खुले मैदान में से, कभी किसी गाँव को पीछे छोड़ते हुए और कभी किसी ढाबे को। कभी यह लगता कि वह सामने से आ रही किसी दूसरी गाड़ी को निगल जाएगी या पिफर किसी पैदल यात्राी को।...लेकिन यह क्या? वह तो उन सबको, दूर पीछे छोड़ती हुइर् बड़ी सावधनी - सपफाइर् से आगे निकल गइर्। पेड़ दौड़ते हुए उसकी ओर आते दिखाइर् दे रहे थे..लेकिन बस रफकने पर वे स्िथर हो जाते और चुपचापμबेबस से खड़े रहते। अचानक खुशी के मारे वल्ली तालियाँ पीटने लगी। गाय की एक बछिया अपनी दुम उफपर उठाए सड़क के बीचों - बीच बस के ठीक सामने दौड़ रही थी। ड्राइवर जितनी शोर से भोंपू बजाता, उतना ही श्यादा वह डर कर बेतहाशा भागने लगती। वल्ली को यह दृश्य बहुत ही मशेदार लगा और वह इतना हँसी, इतना हँसी कि उसकी आँखों में आँसू आ गए। फ्बस...बस बेगम साहिबा!य् वंफडक्टर ने कहा, फ्वुफछ हँसी कल के लिए रहने दो।य् आख्िार बछिया एक ओर निकल गइर्। और पिफर बस रेल के पफाटक तक जा पहुँची। दूर से ़ाफर के लिए उसने सचमुच कितनी सावधानी और कठिनाइर् रेलगाड़ी एक बिंदु के समान लग रही थी। पास आने पर वह बड़ी और बड़ी होती चली गइर्। जब वह पफाटक के पास से ध्ड़ध्ड़ाती - दनदनाती हुइर् निकली तो बस हिलने लगी। पिफर बस आगे बढ़ी और रेलवे - स्टेशन तक जा पहुँची। वहाँ से वह भीड़ - भड़क्के वाली एक सड़क से गुजरी, जहाँ दोनों ओर दुकानों की कतारें थी। पिफर मुड़कर वह एक और बड़ी सड़क पर पहुँची। इतनी बड़ी - बड़ी सजी हुइर् दुकानें, उनमें एक से एक बढ़कर चमकीले कपड़े और दूसरी चीशें। भीड़ की रेलम - पेल। वल्ली हैरान, भौंचक्की - सी, हर चीश को आँखें पफाड़े देख रही थी। बस रफकी, और सभी यात्राी उतर गए। फ्ए बेगम साहिबा! आप नहीं उतरेंगी क्या? तीस पैसे की टिकट खत्म हो गइर्।य् वंफडक्टर ने कहा। फ्मैं इसी बस से वापस जा रही हूँय्, उसने अपनी जेब में से तीस पैसे और निकालकर रेशगारी वंफडक्टर को देते हुए कहा। फ्क्या बात है?य् फ्वुफछ नहीं, मेरा बस में चढ़ने को जी चाहा...बस!य् फ्तुम शहर देखना नहीं चाहती?य् फ्अकेली? न बाबा न। मुझे डर लगता है।य् उसने कहा। उसके हाव - भाव पर वंफडक्टर को बड़ा मशा आ रहा था। फ्इसमें डर की क्या बात है?य् वल्ली ने जवाब दिया। फ्अच्छा तो उतर कर...उस जलपान - गृह में हो आओ...काॅपफी पी लो...इसमें डर की क्या बात है?य् फ्उँफ हूँ...मैं नहीं पिउँफगी।य् फ्अच्छा तो क्या मैं तुम्हारे लिए वुफछ पकौड़े या चबैना लाउँफ?य् फ्नहीं, मेरे पास इनके लिए पैसे नहीं हैं...मुझे बस एक टिकट दे दो।य् फ्जल - पान के लिए तुम्हें पैसे की शरूरत नहीं। पैसे मैं दूँगा।य् फ्मैंने कह दिया न नहीं...य् उसने दृढ़तापूवर्क कहा। नियत समय पर बस पिफर चल पड़ी। लौटती बार भी कोइर् खास भीड़ नहीं थी। एक बार पिफर वही दृश्य! लेकिन वह शरा भी नहीं उफबी! हर दृश्य मंे उसे पहले जैसा मशा आ रहा था। लेकिन अचानकμ ओह देखो...वह बछिया...सड़क पर मरी पड़ी थी। किसी गाड़ी के नीचे आ गइर् थी। ओह! वुफछ क्षण पहले जो एक प्यारा, सुंदर जीव था, अब अचानक अपनी सुंदरता और सजीवता खो रहा था। अब वह कितना डरावना लग रहा था।...पैफली हुइर् टाँगें, पथराइर् हुइर् आँखें, खून से लथपथ..ओह! कितने दुख की बात! फ्यह वही बछिया है न जो बस के आगे - आगे भाग रही थी...जब हम आ रहे थे?य् वल्ली ने वंफडक्टर से पूछा। वंफडक्टर ने सिर हिला दिया। बस चली जा रही थी। बछिया का ख्याल उसे सता रहा था। उसका उत्साह ढीला पड़ गया था। अब ख्िाड़की से बाहर झाँककर और दृश्य देखने की उसकी इच्छा नहीं रही थी। वह अपनी सीट पर जमी बैठी रही। बस तीन बजकर चालीस मिनट पर उसके गाँव पहुँची। वल्ली खड़ी हुइर्। उसने जम्हाइर् लेकर कमर सीध्ी की और वंफडक्टर को विदा कहते हुए बोली, फ्अच्छा, पिफर मिलेंगे, जनाब!य् μवल्ली कानन ;अनुवादμबालकराम नागरद्ध 1.कहानी से ;कद्ध शहर की ओर जाते हुए वल्ली ने बस की ख्िाड़की से बाहर क्या - क्या देखा? फ्अब तो उसकी ख्िाड़की से बाहर देखने की इच्छा भी खत्म हो गइर् थी।य् ;खद्ध वापसी में वल्ली ने ख्िाड़की के बाहर देखना बंद क्यों कर दिया? ;गद्ध वल्ली ने बस के टिकट के लिए पैसों का प्रबंध् वैफसे किया? 2.क्या होता अगर ;कद्ध वल्ली की माँ जाग जाती और वल्ली को घर पर न पाती? ;खद्ध वल्ली शहर देखने के लिए बस से उतर जाती और बस वापिस चली जाती? 3.छिप - छिपकर फ्ऐसी छोटी बच्ची का अकेले सप़्ाफर करना ठीक नहीं।य् ;कद्ध क्या तुम इस बात से सहमत हो? अपने उत्तर का कारण भी बताओ। ;खद्ध वल्ली ने यह यात्रा घर के बड़ों से छिपकर की थी। तुम्हारे विचार से उसने ठीक किया या गलत? क्यों? ;गद्ध क्या तुमने भी कभी कोइर् काम इसी तरह छिपकर किया है? उसके बारे में लिखो। 4.मना करना फ्मैंने कह दिया न नहीं.......।य् उसने दृढ़ता से कहा। वल्ली ने वंफडक्टर से खाने - पीने का सामान लेने से साप़्ाफ मना कर दिया। ;कद्ध ऐसी और कौन - कौन सी बातें हो सकती हैं जिनके लिए तुम्हें भी बड़ांे को दृढ़ता से मना कर देना चाहिए? ;खद्ध क्या तुमने भी कभी किसी को किसी चीश/कायर् के लिए मना किया है? उसके बारे में बताओ। 5.घमंडी वल्ली को या उसके किसी साथी को घमंडी शब्द का अथर् ही मालूम नहीं था। ;कद्ध तुम्हारे विचार से घमंडी का क्या अथर् होता है? ;खद्ध तुम किसी घमंडी को जानते हो? तुम्हें वह घमंडी क्यों लगता/लगती है? ;गद्ध वल्ली ‘घमंडी’ शब्द का अथर् जानने के लिए क्या - क्या कर सकती थी? उसके लिए वुफछ उपाय सुझाओ। 6.बचत वल्ली ने एक खास काम के लिए पैसों की बचत की। बहुत से लोग अलग - अलग कारणों से रफपए - पैसे की बचत करते हैं। बचत करने के तरीके भी अलग - अलग हैं। ;कद्ध किसी डाकघर या बैंक जाकर पता करो कि किन - किन तरीकों से बचत की जा सकती है? ;खद्ध घर पर ही बचत करने के कौन - कौन से तरीके हो सकते हैं? ;गद्ध तुम्हारे घर के बड़े लोग बचत किन तरीकों से करते हैं? पता करो।

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ysfdu vpkud-

vksg ns[kks---og cfN;k---lM+d ij ejh iM+h FkhA fdlh xkM+h osQ uhps vk xbZ FkhA

vksg! oqQN {k.k igys tks ,d I;kjk] lqanj tho Fkk] vc vpkud viuh lqanjrk vkSj lthork [kks jgk FkkA vc og fdruk Mjkouk yx jgk FkkA---iSQyh gqbZ Vk¡xsa] iFkjkbZ gqbZ vk¡[ksa] [kwu ls yFkiFk---

vksg! fdrus nq[k dh ckr!

¶;g ogh cfN;k gS u tks cl osQ vkxs&vkxs Hkkx jgh Fkh---tc ge vk jgs Fks\¸ oYyh us oaQMDVj ls iwNkA

oaQMDVj us flj fgyk fn;kA cl pyh tk jgh FkhA cfN;k dk [;ky mls lrk jgk FkkA mldk mRlkg <hyk iM+ x;k FkkA vc f[kM+dh ls ckgj >k¡ddj vkSj n`'; ns[kus dh mldh bPNk ugha jgh FkhA og viuh lhV ij teh cSBh jghA

cl rhu ctdj pkyhl feuV ij mlosQ xk¡o igq¡phA oYyh [kM+h gqbZA mlus tEgkbZ ysdj dej lh/h dh vkSj oaQMDVj dks fonk dgrs gq, cksyh] ¶vPNk] fiQj feysaxs] tukc!¸

-oYyh dkuu

(vuqokn-ckydjke ukxj)

vH;kl

'kCnkFkZ

rkdhn & funsZ'k

HkkM+k & fdjk;k

eqlkfi+Qj & ;k=kh

1- dgkuh ls

(d) 'kgj dh vksj tkrs gq, oYyh us cl dh f[kM+dh ls ckgj D;k&D;k ns[kk\

¶vc rks mldh f[kM+dh ls ckgj ns[kus dh bPNk Hkh [kRe gks xbZ FkhA¸

([k) okilh esa oYyh us f[kM+dh osQ ckgj ns[kuk can D;ksa dj fn;k\

(x) oYyh us cl osQ fVdV osQ fy, iSlksa dk izca/ oSQls fd;k\

2- D;k gksrk vxj

(d) oYyh dh ek¡ tkx tkrh vkSj oYyh dks ?kj ij u ikrh\

([k) oYyh 'kgj ns[kus osQ fy, cl ls mrj tkrh vkSj cl okfil pyh tkrh\

3- fNi&fNidj

¶,slh NksVh cPph dk vosQys lI+kQj djuk Bhd ughaA¸

(d) D;k rqe bl ckr ls lger gks\ vius mÙkj dk dkj.k Hkh crkvksA

([k) oYyh us ;g ;k=kk ?kj osQ cM+ksa ls fNidj dh FkhA rqEgkjs fopkj ls mlus Bhd fd;k ;k xyr\ D;ksa\

(x) D;k rqeus Hkh dHkh dksbZ dke blh rjg fNidj fd;k gS\ mlosQ ckjs esa fy[kksA

4- euk djuk

¶eSaus dg fn;k u ugha-------A¸ mlus n`<+rk ls dgkA

oYyh us oaQMDVj ls [kkus&ihus dk lkeku ysus ls lkI+kQ euk dj fn;kA

(d) ,slh vkSj dkSu&dkSu lh ckrsa gks ldrh gSa ftuosQ fy, rqEgsa Hkh cM+kas dks n`<+rk ls euk dj nsuk pkfg,\

([k) D;k rqeus Hkh dHkh fdlh dks fdlh ph”k@dk;Z osQ fy, euk fd;k gS\ mlosQ ckjs esa crkvksA

5- ?keaMh

oYyh dks ;k mlosQ fdlh lkFkh dks ?keaMh 'kCn dk vFkZ gh ekywe ugha FkkA

(d) rqEgkjs fopkj ls ?keaMh dk D;k vFkZ gksrk gS\

([k) rqe fdlh ?keaMh dks tkurs gks\ rqEgsa og ?keaMh D;ksa yxrk@yxrh gS\

(x) oYyh ^?keaMh* 'kCn dk vFkZ tkuus osQ fy, D;k&D;k dj ldrh Fkh\ mlosQ fy, oqQN mik; lq>kvksA

6- cpr

oYyh us ,d [kkl dke osQ fy, iSlksa dh cpr dhA cgqr ls yksx vyx&vyx dkj.kksa ls jQi,&iSls dh cpr djrs gSaA cpr djus osQ rjhosQ Hkh vyx&vyx gSaA

(d) fdlh Mkd?kj ;k cSad tkdj irk djks fd fdu&fdu rjhdksa ls cpr dh tk ldrh gS\

([k) ?kj ij gh cpr djus osQ dkSu&dkSu ls rjhosQ gks ldrs gSa\

(x) rqEgkjs ?kj osQ cM+s yksx cpr fdu rjhdksa ls djrs gSa\ irk djksA

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