दूसरा पाठ घर में हम तीन ही व्यक्ित रहते हैंμमाँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोइर् दूसरे ही हैं। आँगन में आम का पेड़ है। तरह - तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। जो भी पक्षी पहाडि़यों - घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहाँ कभी तोते पहुँच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह - तरह की गौरैयाँ। वह शोर मचता है कि कानों के पदेर् पफट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं! घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं। रात - भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते पिफरते हैं। वह ध्मा - चैकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बतर्न गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अँंगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सदीर् बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है। उसे शायद गमीर् बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी - कभी झाँक जाती है। मन आया तो अंदर आकर दूध् पी गइर्, न मन आया तो बाहर से ही ‘पिफर आउँफगी’ कहकर चली जाती है। शाम पड़ते ही दो - तीन चमगादड़ कमरों के आर - पार पर पैफलाए कसरत करने लगते हैं। घर में कबूतर भी हैं। दिन - भर ‘गुटर - गँू गुटर - गूँ’ का संगीत सुनाइर् देता रहता है। इतने पर ही बस नहीं, घर में छिपकलियाँ भी हैं और बरेर् भी हैं और चींटियों की तो जैसे प़्ाफौज ही छावनी डाले हुए है। अब एक दिन दो गौरैया सीध्ी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़ - उड़कर मकान देखने लगीं। पिताजी कहने लगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी ख्िाड़की पर। पिफर जैसे आईं थीं वैसे ही उड़ भी गईं। पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है, और सामान भी ले आईं हैं और मशे से दोनों बैठी गाना गा रही हैं। जाहिर है, उन्हें घर पसंद आ गया था। माँ और पिताजी दोनों सोपेफ पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे। थोड़ी देर बाद माँ सिर हिलाकर बोलीं, फ्अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।य् इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले, फ्देखता हूँ ये वैफसे यहाँ रहती हैं! गौरैयाँ मेरे आगे क्या चीश हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ।य् फ्छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिडि़यों को निकालेंगे!य् माँ ने व्यंग्य से कहा। माँ कोइर् बात व्यंग्य में कहें, तो पिताजी उबल पड़ते हैं वह समझते हैं कि माँ उनका मशाक उड़ा रही हैं। वह पफौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर शोर से ताली बजाइर् और मुँह से ‘श.....शू’ कहा, बाँहें झुलाईं, पिफर खड़े - खड़े वूफदने लगे, कभी बाहें झुलाते, कभी ‘श..शू’ करते। गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ ‘चीं - चीं करने लगीं। और माँ ख्िालख्िालाकर हँसने लगीं। पिताजी को गुस्सा आ गया, इसमें हँसने की क्या बात है? माँ को ऐसे मौकों पर हमेशा मशाक सूझता है। हँसकर बोली, चिडि़याँ एक दूसरी से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है? तब पिताजी को और भी श्यादा गुस्सा आ गया और वह पहले से भी श्यादा उँफचा वूफदने लगे। गौरैयाँ घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं। उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था। माँ पिफर हँसने लगीं, ये निकलेंगी नहीं, जी। अब इन्होंने अंडे दे दिए होंगे।य् फ्निकलेंगी वैफसे नहीं?य् पिताजी बोले और बाहर से लाठी उठा लाए। इसी बीच गौरैयाँ पिफर घोंसले में जा बैठी थीं। उन्होंने लाठी उँफची उठाकर पंखे के गोले को ठकोरा। ‘चीं - चीं’ करती गौरैयाँ उड़कर पदेर् के डंडे पर जा बैठीं। इतनी तकलीप़फ करने की क्या शरूरत थी। पंखा चला देते तो ये उड़ जातीं। माँ ने हँसकर कहा। पिताजी लाठी उठाए पदेर् के डंडे की ओर लपके। एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाशे पर जा बैठी। दूसरी सीढि़यों वाले दरवाशे पर। माँ पिफर हँस दी। तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाशे खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो। एक दरवाशा खुला छोड़ो, बाकी दरवाशे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी। अब पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा, फ्तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाजे बंद कर दे!य् मैंने भागकर दोनों दरवाशे बंद कर दिए केवल किचन वाला दरवाशा खुला रहा। पिताजी ने पिफर लाठी उठाइर् और गौरैयों पर हमला बोल दिया। एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते - लगते बची। चीं - चीं करती चिडि़याँ कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं। आख्िार दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाशे में से बाहर निकल गईं। माँ तालियाँ बजाने लगीं। पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती पैफलाए वुफसीर् पर आ बैठे। फ्आज दरवाशे बंद रखोय् उन्होंने हुक्म दिया। फ्एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।य् तभी पंखे के उफपर से चीं - चीं की आवाज सुनाइर् पड़ी। और माँ ख्िालख्िालाकर हँस दीं। मैंने सिर उठाकर उफपर की ओर देखा, दोनों गौरैया पिफर से अपने घोंसले में मौजूद थीं। फ्दरवाशे के नीचे से आ गइर् हैं,य् माँ बोलीं। मैंने दरवाजे के नीचे देखा। सचमुच दरवाजों के नीचे थोड़ी - थोड़ी जगह खाली थी। पिताजी को पिफर गुस्सा आ गया। माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं। अब तो पिताजी गौरैयों पर पिल पड़े। उन्होंने दरवाशों के नीचे कपड़े ठूँस दिए ताकि कहीं कोइर् छेद बचा नहीं रह जाए। और पिफर लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़े। चिडि़याँ चीं - चीं करती पिफर बाहर निकल गईं। पर थोड़ी ही देर बाद वे पिफर कमरे में मौजूद थीं। अबकी बार वे रोशनदान में से आ गइर् थीं जिसका एक शीशा टूटा हुआ था। फ्देखो - जी, चिडि़यों को मत निकालो,य् माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा, अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी। क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ? पिताजी बोले और वुफसीर् पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठूँस दिया और पिफर लाठी झुलाकर एक बार पिफर चिडि़यों को खदेड़ दिया। दोनों पिछले आँगन की दीवार पर जा बैठीं। इतने में रात पड़ गइर्। हम खाना खाकर उफपर जाकर सो गए। जाने से पहले मैंने आँगन में झाँककर देखा, चिडि़याँ वहाँ पर नहीं थीं। मैंने समझ लिया कि उन्हें अक्ल आ गइर् होगी। अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गइर् होंगी। दूसरे दिन इतवार था। जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे पिफर से मौजूद थीं और मशे से बैठी मल्हार गा रही थीं। पिताजी ने पिफर लाठी उठा ली। उस दिन उन्हें गौरैयों को बाहर निकालने में बहुत देर नहीं लगी। अब तो रोश यही वुफछ होने लगा। दिन में तो वे बाहर निकाल दी जातीं पर रात के वक्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं। पिताजी परेशान हो उठे। आख्िार कोइर् कहाँ तक लाठी झुला सकता है? पिताजी बार - बार कहें, फ्मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।य् पर आख्िार वह भी तंग आ गए थे। आख्िार जब उनकी सहनशीलता चुक गइर् तो वह कहने लगे कि वह गौरैयों का घोंसला नोचकर निकाल देंगे। और वह पफौरन ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए। घोंसला तोड़ना कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे पफशर् पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए। फ्किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए,य् उन्होंने गुस्से से कहा। घोंसले में से अनेेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, गौरैयों ने सजावट के लिए मानो झालर टाँग रखी हो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकांे पर जमाया और दाईं ओर को खींचा। दो तिनके घोंसले में से अलग हो गए और पफरपफराते हुए नीचे उतरने लगे। फ्चलो, दो तिनके तो निकल गए,य् माँ हँसकर बोलीं, अब बाकी दो हशार भी निकल जाएँगे! तभी मैंने बाहर आँगन की ओर देखा और मुझे दोनों गौरैयाँ नशर आईं। दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं। इस बीच दोनों वुफछ - वुफछ दुबला गइर् थीं, वुफछ - वुफछ काली पड़ गइर् थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं। अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के उफपर रखकर वहीं रखे - रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लंबे - लंबे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। वे लिपटते गए, लिपटते गए, और घोंसला लाठी के इदर् - गिदर् ख्िांचता चला आने लगा। पिफर वह खींच - खींचकर लाठी के सिरे के इदर् - गिदर् लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रूइर् के पफाहे, और धगे और थ्िागलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा शोर की आवाश आइर्, फ्चीं - चीं, चीं - चीं!!!य् पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरैयाँ लौट आईं हैं? मैंने झट से बाहर की ओर देखा। नहीं, दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं। फ्चीं - चीं, चीं - चीं!य् पिफर आवाश आइर्। मैंने उफपर देखा। पंखे के गोले के उफपर से नन्हीं - नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं - चीं किए जा रही थीं। अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोंसले का बहुत - सा हिस्सा था। नन्हीं - नन्हीं दो गौरैयाँ! वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं - चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गइर् हैं। हमारे माँ - बाप कहाँं हैं? मैं अवाव्फ उनकी ओर देखता रहा। पिफर मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं। और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप वुफसीर् पर आकर बैठ गए हैं। इस बीच माँ वुफसीर् पर से उठीं और सभी दरवाजे खोल दिए। नन्हीं चिडि़याँ अभी भी हाँपफ - हाँपफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ - बाप को बुला रही थीं। उनके माँ - बाप झट - से उड़कर अंदर आ गए और चीं - चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं - नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे। माँ - पिताजी और मैं उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में पिफर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख - देखकर केवल मुसकराते रहे। μभीष्म साहनी 1.पाठ से ;कद्ध दोनों गौरैयों को पिताजी जब घर से बाहर निकालने की कोश्िाश कर रहे थे तो माँ क्यों मदद नहीं कर रही थी? बस, वह हँसती क्यों जा रही थी? ;खद्ध देखो जी, चिडि़यों को मत निकालो। माँ ने पिताजी से गंभीरता से यह क्यों कहा? क्यों रहे? 2.पशु - पक्षी और हम इस कहानी के शुरू में कइर् पशु - पक्ष्िायों की चचार् की गइर् है। कहानी में वे ऐसे वुफछ काम करते हंै जैसे मनुष्य करते हैं। उनको ढूँढ़कर तालिका पूरी करोμ ;कद्ध पक्षी μ घर का पता लिखवाकर लाए हैं। ;खद्ध बूढ़ा चूहा μ ;गद्ध बिल्ली μ ;घद्ध चमगादड़ μ ;ड़द्ध चींटियाँ μ 3.मल्हार नीचे दिए गए वाक्य को पढ़ो - फ्जब हम लोग नीचे उतरकर आए, तब वे पिफर से मौजूद थीं और मशे से बैठी मल्हार गा रही थीं।य् ;कद्ध अब तुम पता करो कि मल्हार क्या होता है? इस काम में तुम बड़ों की सहायता भी ले सकते हो। ;खद्ध बताओ कि क्या सचमुच चिडि़याँ ‘मल्हार’ गा सकती हैं? ;गद्ध बताओ की कहानी में चिडि़यों द्वारा मल्हार गाने की बात क्यों कही गइर् है? 4.पाठ से आगे अलग - अलग पक्षी अलग - अलग तरह से घोंसला बनाते हैं। तुम वुफछ पक्ष्िायों के घोसलों के चित्रा इकऋे करके उसे अपनी काॅपी पर चिपकाकर श्िाक्षक को दिखाओ। 5.अंदर आने के रास्ते ;कद्ध पूरी कहानी में गौरैया, कहाँ - कहाँ से घर के अंदर घुसी थीं? सूची बनाओ। ;खद्ध अब अपने घर के बारे में सोचो। तुम्हारे घर में यदि गौरैया आना चाहे तो वह कहाँ - कहाँ से अंदर घुस सकती है? इसे अपने श्िाक्षक को बताओ। 6.कहने का अंदाश फ्माँ ख्िालख्िालाकर हँस दीं।य् इस वाक्य में ‘ख्िालख्िालाकर’ शब्द बता रहा है कि माँ वैफसे हँसी थीं। इसी प्रकार नीचे दिए गए रेखांकित शब्दों पर भी ध्यान दो। इन शब्दों से एक - एक वाक्य बनाओ। ;कद्ध पिताजी ने झिड़ककर कहा, फ्तू खड़ा क्या देख रहा है?य् ;खद्ध फ्आज दरवाशे बंद रखो,य् उन्होंने हुक्म दिया। ;गद्ध फ्देखो जी, चिडि़यों को मत निकालो,य् माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा। ;घद्ध फ्किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए,य् उन्होंने गुस्से में कहा। तुम इनसे मिलते - जुलते वुफछ और शब्द सोचो और उनका प्रयोग करते हुए वुफछ वाक्य बनाओ। संकेत - ध्ीरे से, शोर से, अटकते हुए, हकलाते हुए, पुफसपुुुफसाते हुए आदि। 7.किससे - क्यों - वैफसे फ्पिताजी बोले, क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ?य् ऊपर दिए गए वाक्य पर ध्यान दो और बताओ किμ ;कद्ध पिताजी ने यह बात किससे कही? ;खद्ध उन्होंने यह बात क्यों कही? ;गद्ध गौरैयों के आने से कालीन वैफसे बरबाद होता? 8.सराय फ्पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है।य् ऊपर के वाक्य को पढ़ो और बताओ कि - ;कद्ध सराय और घर में क्या अंतर होता है? आपस में इस पर चचार् करो। ;खद्ध पिताजी को अपना घर सराय क्यों लगता है? 9.गौरैयों की चचार् मान लो तुम लेखक के घर की एक गौरैया हो। अब अपने साथी गौरैया को बताओ कि तुम्हारे साथ इस घर में क्या - क्या हुआ? 10.वैफसे लगे तुम्हें इस कहानी में कौन सबसे अध्िक पसंद आया? तुम्हें उसकी कौन - सी बात सबसे अिाक अच्छी लगी? ;कद्धमाँ ;खद्ध पिताजी ;गद्ध लेखक ;घद्ध गौरैया ;घद्ध चूहे ;चद्ध बिल्ली ;छद्ध कबूतर ;जद्ध कोइर् अन्य/वुफछ और 11.माँ की बात नीचे माँ द्वारा कही गइर् वुफछ बातें लिखी हुइर् हैं। उन्हें पढ़ो। फ्अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं।य् फ्एक दरवाशा खुला छोड़ो, बाकी दरवाशे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।य् फ्देखो जी, चिडि़यों को मत निकालो। अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी।य् अब बताओ किμ ;कद्ध क्या माँ सचमुच चिडि़यों को घर से निकालना चाहती थीं? ;खद्ध माँ बार - बार क्यों कह रही थीं कि ये चिडि़याँ नहीं जाएँगी? 12.कहानी की चचार् ;कद्ध तुम्हारे विचार से इस कहानी को कौन सुना रहा है? तुम्हें यह किन बातों से पता चला? ;खद्ध लेखक ने यह अनुमान वैफसे लगाया कि एक चूहा बूढ़ा है और उसको सदीर् लगती है? 13.शब्द की समझ चुक - चूक ;कद्ध अब उनकी सहनशीलता चुक गइर्। ;खद्ध उनका निशाना चूक गया। अब तुम भी इन शब्दों को समझो और उनसे वाक्य बनाओ। ;पद्ध सुख - सूख ;कद्ध ........................................................................................................................;खद्ध ........................................................................................................................;पपद्ध ध्ुल - ध्ूल ;कद्ध ........................................................................................................................;खद्ध ........................................................................................................................;पपपद्ध सुना - सूना ;कद्ध ........................................................................................................................;खद्ध ........................................................................................................................

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¶pha&pha] pha&pha!¸ fiQj vkok”k vkbZA eSaus mQij ns[kkA ia[ks osQ xksys osQ mQij ls uUgha&uUgha xkSjS;k¡ flj fudkys uhps dh vksj ns[k jgh Fkha vkSj pha&pha fd, tk jgh FkhaA vHkh Hkh firkth osQ gkFk esa ykBh Fkh vkSj ml ij fyiVk ?kksalys dk cgqr&lk fgLlk FkkA uUgha&uUgha nks xkSjS;k¡! os vHkh Hkh >k¡osQ tk jgh Fkha vkSj pha&pha djosQ ekuks viuk ifjp; ns jgh Fkha] ge vk xbZ gSaA gekjs ek¡&cki dgk¡a gSa\

eSa voko~Q mudh vksj ns[krk jgkA fiQj eSaus ns[kk] firkth LVwy ij ls uhps mrj vk, gSaA vkSj ?kksalys osQ frudksa esa ls ykBh fudkydj mUgksaus ykBh dks ,d vksj j[k fn;k gS vkSj pqipki oqQlhZ ij vkdj cSB x, gSaA bl chp ek¡ oqQlhZ ij ls mBha vkSj lHkh njokts [kksy fn,A uUgha fpfM+;k¡ vHkh Hkh gk¡iQ&gk¡iQdj fpYyk, tk jgh Fkha vkSj vius ek¡&cki dks cqyk jgh FkhaA

muosQ ek¡&cki >V&ls mM+dj vanj vk x, vkSj pha&pha djrs muls tk feys vkSj mudh uUgha&uUgha pksapksa esa pqXxk Mkyus yxsA ek¡&firkth vkSj eSa mudh vksj ns[krs jg x,A dejs esa fiQj ls 'kksj gksus yxk Fkk] ij vcdh ckj firkth mudh vksj ns[k&ns[kdj osQoy eqldjkrs jgsA

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Msjk & jgus dh txg] iM+ko                                    

'kksj & gYyk] dksykgy                                        

/ek&pkSdM+h & mNy&owQn                                     

v¡xhBh & vkx j[kus dk cjru                                  

dljr & O;k;ke                                            

Nkouh & tgk¡ lsuk ;k iqfyl jgrh gks] f'kfoj

jks'kunku & dejs osQ vanj jks'kuh vkus osQ fy, cuh f[kM+dh

fFkxfy;k¡ & Nsn can djus osQ fy, Vk¡dk x;k diM+s dk VqdM+k] iScan

fcNkou & fcLrj

mcy iM+uk & xqLlkuk

gqDe & vkns'k

vDy & cqf¼

bnZ&fxnZ & vkl&ikl

fujh{k.k & tk¡p

1- ikB ls

(d) nksuksa xkSjS;ksa dks firkth tc ?kj ls ckgj fudkyus dh dksf'k'k dj jgs Fks rks ek¡ D;ksa enn ugha dj jgh Fkh\ cl] og g¡lrh D;ksa tk jgh Fkh\

([k) ns[kks th] fpfM+;ksa dks er fudkyksA ek¡ us firkth ls xaHkhjrk ls ;g D;ksa dgk\

(x) ¶fdlh dks lpeqp ckgj fudkyuk gks rks mldk ?kj rksM+ nsuk pkfg,]¸ firkth us xqLls esa ,slk D;ksa dgk\ D;k firkth osQ bl dFku ls ek¡ lger Fkh\ D;k rqe lger gks\ vxj ugha rks D;kas\

(?k) dejs esa fiQj ls 'kksj gksus ij Hkh firkth vcdh ckj xkSjS;k dh rj-IkQ ns[kdj eqLkoqQjkrs D;ksa jgs\

2- i'kq&i{kh vkSj ge

bl dgkuh osQ 'kq: esa dbZ i'kq&if{k;ksa dh ppkZ dh xbZ gSA dgkuh esa os ,sls oqQN dke djrs gaS tSls euq"; djrs gSaA mudks <w¡<+dj rkfydk iwjh djks-

(d) i{kh - ?kj dk irk fy[kokdj yk, gSaA

([k) cw<+k pwgk -

(x) fcYyh -

(?k) pexknM+ -

(M+) phafV;k¡ -

3- eYgkj

uhps fn, x, okD; dks i<+ks&

¶tc ge yksx uhps mrjdj vk,] rc os fiQj ls ekStwn Fkha vkSj e”ks ls cSBh eYgkj xk jgh FkhaA¸

(d) vc rqe irk djks fd eYgkj D;k gksrk gS\ bl dke esa rqe cM+ksa dh lgk;rk Hkh ys ldrs gksA

([k) crkvks fd D;k lpeqp fpfM+;k¡ ^eYgkj* xk ldrh gSa\

(x) crkvks dh dgkuh esa fpfM+;ksa }kjk eYgkj xkus dh ckr D;ksa dgh xbZ gS\

4- ikB ls vkxs

vyx&vyx i{kh vyx&vyx rjg ls ?kksalyk cukrs gSaA rqe oqQN if{k;ksa osQ ?kkslyksa osQ fp=k bdêòs djosQ mls viuh dkWih ij fpidkdj f'k{kd dks fn[kkvksA

5- vanj vkus osQ jkLrs

(d) iwjh dgkuh esa xkSjS;k] dgk¡&dgk¡ ls ?kj osQ vanj ?kqlh Fkha\ lwph cukvksA

([k) vc vius ?kj osQ ckjs esa lkspksA rqEgkjs ?kj esa ;fn xkSjS;k vkuk pkgs rks og dgk¡&dgk¡ ls vanj ?kql ldrh gS\ bls vius f'k{kd dks crkvksA

6- dgus dk vank”k

¶ek¡ f[kyf[kykdj g¡l nhaA¸ bl okD; esa ^f[kyf[kykdj* 'kCn crk jgk gS fd ek¡ oSQls g¡lh FkhaA blh izdkj uhps fn, x, js[kkafdr 'kCnksa ij Hkh è;ku nksA bu 'kCnksa ls ,d&,d okD; cukvksA

(d) firkth us f>M+ddj dgk] ¶rw [kM+k D;k ns[k jgk gS\¸

([k) ¶vkt njok”ks can j[kks]¸ mUgksaus gqDe fn;kA

(x) ¶ns[kks th] fpfM+;ksa dks er fudkyks]¸ ek¡ us vcdh ckj xaHkhjrk ls dgkA

(?k) ¶fdlh dks lpeqp ckgj fudkyuk gks] rks mldk ?kj rksM+ nsuk pkfg,]¸ mUgksaus xqLls esa dgkA

rqe buls feyrs&tqyrs oqQN vkSj 'kCn lkspks vkSj mudk iz;ksx djrs gq, oqQN okD; cukvksA

laosQr&/hjs ls] ”kksj ls] vVdrs gq,] gdykrs gq,] iqQliqqqQlkrs gq, vkfnA

7- fdlls&D;ksa&oSQls

¶firkth cksys] D;k eryc\ eSa dkyhu cjckn djok yw¡\¸ Åij fn, x, okD; ij è;ku nks vkSj crkvks fd-

(d) firkth us ;g ckr fdlls dgh\

([k) mUgksaus ;g ckr D;ksa dgh\

(x) xkSjS;ksa osQ vkus ls dkyhu oSQls cjckn gksrk\

8- ljk;

¶firkth dgrs gSa fd ;g ?kj ljk; cuk gqvk gSA¸ Åij osQ okD; dks i<+ks vkSj crkvks fd&

(d) ljk; vkSj ?kj esa D;k varj gksrk gS\ vkil esa bl ij ppkZ djksA

([k) firkth dks viuk ?kj ljk; D;ksa yxrk gS\

9- xkSjS;ksa dh ppkZ

eku yks rqe ys[kd osQ ?kj dh ,d xkSjS;k gksA vc vius lkFkh xkSjS;k dks crkvks fd rqEgkjs lkFk bl ?kj esa D;k&D;k gqvk\

10- oSQls yxs

rqEgsa bl dgkuh esa dkSu lcls vf/d ilan vk;k\ rqEgsa mldh dkSu&lh ckr lcls vfèkd vPNh yxh\

(d) ek¡   ([k) firkth   (x) ys[kd   (?k) xkSjS;k    (Ä) pwgs    (p) fcYyh    (N) dcwrj (t) dksbZ vU;@oqQN vkSj

11- ek¡ dh ckr

uhps ek¡ }kjk dgh xbZ oqQN ckrsa fy[kh gqbZ gSaA mUgsa i<+ksA

¶vc rks ;s ugha mM+saxhA igys bUgsa mM+k nsrs] rks mM+ tkrhaA¸

¶,d njok”kk [kqyk NksM+ks] ckdh njok”ks can dj nksA rHkh ;s fudysaxhA¸

¶ns[kks th] fpfM+;ksa dks er fudkyksA vc rks bUgksaus vaMs Hkh ns fn, gksaxsA vc ;s ;gk¡ ls ugha tk,¡xhA¸

vc crkvks fd-

(d) D;k ek¡ lpeqp fpfM+;ksa dks ?kj ls fudkyuk pkgrh Fkha\

([k) ek¡ ckj&ckj D;ksa dg jgh Fkha fd ;s fpfM+;k¡ ugha tk,¡xh\

12- dgkuh dh ppkZ

(d) rqEgkjs fopkj ls bl dgkuh dks dkSu lquk jgk gS\ rqEgsa ;g fdu ckrksa ls irk pyk\

([k) ys[kd us ;g vuqeku oSQls yxk;k fd ,d pwgk cw<+k gS vkSj mldks lnhZ yxrh gS\

13- 'kCn dh le>

pqd & pwd

(d) vc mudh lgu'khyrk pqd xbZA

([k) mudk fu'kkuk pwd x;kA

vc rqe Hkh bu 'kCnksa dks le>ks vkSj muls okD; cukvksA

(i) lq[k & lw[k

(d) -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

([k) -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

(ii) /qy & /wy

(d) -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

([k) -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

(iii) lquk & lwuk

(d) -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

([k) -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

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