3 बस की यात्रा हम पाँच मित्रों ने तय किया कि शाम चार बजे की बस से चलें। पन्ना से इसी वंफपनी की बस सतना के लिए घंटे भर बाद मिलती है जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है। सुबह घर पहुँच जाएँगे। हम में से दो को सुबह काम पर हािार होना था इसीलिए वापसी का यही रास्ता अपनाना शरूरी था। लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सप़्ाफर नहीं करते। क्या रास्ते में डावूफ मिलते हैं? नहीं, बस डाकिन है। बस को देखा तो श्र(ा उमड़ पड़ी। खूब वयोवृ( थी। सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी। लोग इसलिए इससे सप़्ाफर नहीं करना चाहते कि वृ(ावस्था में इसे कष्ट होगा। यह बस पूजा के योग्य थी। उस पर सवार वैफसे हुआ जा सकता है! वसंत भाग 3 बस - वंफपनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे। हमने उनसे पूछाμफ्यह बस चलती भी है?य् वह बोलेμफ्चलती क्यों नहीं है जी! अभी चलेगी।य् हमने कहाμफ्वही तो हम देखना चाहते हंै। अपने आप चलती है यह? हाँ जी, और वैफसे चलेगी?य् गशब हो गया। ऐसी बस अपने आप चलती है। हम आगा - पीछा करने लगे। डाॅक्टर मित्रा ने कहाμफ्डरो मत, चलो! बस अनुभवी है। नयी - नवेली बसों से ज्यादा विश्वसनीय है। हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी।य् हम बैठ गए। जो छोड़ने आए थे, वे इस तरह देख रहे थे जैसे अंतिम विदा दे रहे हैं। उनकी आँखें कह रही थींμफ्आना - जाना तो लगा ही रहता है। आया है, सो जाएगाμराजा, रंक, पफकीर। आदमी को वूफच करने के लिए एकनिमित्त चाहिए।य् इंजन सचमुच स्टाटर् हो गया। ऐसा, जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं। काँच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था। हम प़्ाफौरन ख्िाड़की से दूर सरक गए। इंजन चल रहा था। हमें लग रहा था कि हमारी सीट के नीचे इंजन है। बस की यात्रा बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि यह गांध्ीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रे¯नग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दूसरे से असहयोग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुशर रही थी। सीट का बाॅडी से असहयोग चल रहा था। कभी लगता सीट बाॅडी को छोड़कर आगे निकल गइर् है। कभी लगता कि सीट को छोड़कर बाॅडी आगे भागी जा रही है। आठ - दस मील चलने पर सारे भेदभाव मिट गए। यह समझ में नहीं आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हम पर बैठी है। एकाएक बस रुक गइर्। मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकालकर उसे बगल में रखा और नली डालकर इंजन में भेजने लगा। अब मैं उम्मीद कर रहा था कि थोड़ी देर बाद बस - वंफपनी के हिस्सेदार इंजन को निकालकर गोद में रख लेंगे और उसे नली से पेट्रोल पिलाएँगे, जैसे माँ बच्चे के मुँह में दूध् की शीशी लगाती है। बस की रफ्रतार अब पंद्रह - बीस मील हो गइर् थी। मुझे उसके किसी हिस्से़पर भरोसा नहीं था। ब्रेक पेफल हो सकता है, स्टीय¯रग टूट सकता है। प्रकृति के दृश्य बहुत लुभावने थे। दोनों तरप़्ाफ हरे - भरे पेड़ थे जिन पर पक्षी बैठे थे। मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था। जो भी पेड़ आता, डर लगता कि इससे बस टकराएगी। वह निकल जाता तो दूसरे पेड़ का इंतशार करता। झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी। एकाएक पिफर बस रुकी। ड्राइवर ने तरह - तरह की तरकीबें कीं पर वह चली नहीं। सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया था, वंफपनी के हिस्सेदाऱकह रहे थेμफ्बस तो पफस्टर् क्लास है जी! यह तो इत्तपफाक की बात है।य् क्षीण चाँदनी में वृक्षों की छाया के नीचे वह बस बड़ी दयनीय लग रही थी। लगता, जैसे कोइर् वृ(ा थककर बैठ गइर् हो। हमें ग्लानि हो रही थी कि बेचारी पर लदकर हम चले आ रहे हैं। अगर इसका प्राणांत हो गया तो इस बियाबान में हमें इसकी अंत्येष्िट करनी पड़ेगी। वसंत भाग 3 हिस्सेदार साहब ने इंजन खोला और वुफछ सुधरा। बस आगे चली। उसकी चाल और कम हो गइर् थी। ध्ीरे - ध्ीरे वृ(ा की आँखों की ज्योति जाने लगी। चाँदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी। आगे या पीछे से कोइर् गाड़ी आती दिखती तो वह एकदम किनारे खड़ी हो जाती और कहतीμफ्निकल जाओ, बेटी! अपनी तो वह उम्र ही नहीं रही।य्एक पुलिया के ऊपर पहुँचे ही थे कि एक टायर पिफस्स करके बैठ गया। वह बहुत शोर से हिलकर थम गइर्। अगर स्पीड में होती तो उछलकर नाले में गिर जाती। मैंने उस वंफपनी के हिस्सेदार की तरप़्ाफ पहली बार श्र(ाभाव से देखा। वह टायरों की हालत जानते हैं पिफर भी जान हथेली पर लेकर इसी बस से सपफर कर रहे हैं। उत्सगर् की ऐसी भावना दुलर्भ है। सोचा, इस आदमी़के साहस और बलिदान भावना का सही उपयोग नहीं हो रहा है। इसे तो किसी क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए। अगर बस नाले मंे गिर पड़ती और हम सब मर जाते तो देवता बाँहें पसारे उसका इंतशार करते। कहतेμफ्वह महान आदमी आ रहा है जिसने एक टायर के लिए प्राण दे दिए। मर गया, पर टायर नहीं बदला।य् दूसरा घ्िासा टायर लगाकर बस पिफर चली। अब हमने वक्त पर पन्ना पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना कभी भी पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना क्या, कहीं भी, कभी भी पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। लगता था, ¯शदगी इसी बस में गुजारनी है और इससे सीध्े उस लोक को प्रयाण कर जाना है। इस पृथ्वी पर उसकी कोइर् मंिाल नहीं है। हमारी बेताबी, तनाव खत्म हो गए। हम बड़े इत्मीनान से घर की तरह बैठ गए। ¯चता जाती रही। हँसी - मशाक चालू हो गया। μहरिशंकर परसाइर् बस की यात्रा कारण बताएँ 1.फ्मैंने उस वंफपनी के हिस्सेदार की तरप़्ाफ पहली बार श्र(ाभाव से देखा।य् ललेखक के मन में हिस्सेदार साहब के लिए श्र(ा क्यों जग गइर्? 2.फ्लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सप़्ाफर नहीं करते।य् ललोगों ने यह सलाह क्यों दी? 3.फ्ऐसा जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं।य् ललेखक को ऐसा क्यों लगा? 4.फ्गशब हो गया। ऐसी बस अपने आप चलती है।य् ललेखक को यह सुनकर हैरानी क्यों हुइर्? 5.फ्मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था।य् ऽ लेखक पेड़ों को दुश्मन क्यों समझ रहा था? पाठ से आगे 1.‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ किसके नेतृत्व में, किस उद्देश्य से तथा कब हुआ था? इतिहास की उपलब्ध् पुस्तकांे के आधर पर लिख्िाए। 2.सविनय अवज्ञा का उपयोग व्यंग्यकार ने किस रूप में किया है? लिख्िाए। 3.आप अपनी किसी यात्रा के ख‘े - मीठे अनुभवों को याद करते हुए एक लेख लिख्िाए। मन - बहलाना ऽ अनुमान कीजिए यदि बस जीवित प्राणी होती, बोल सकती तो वह अपनी बुरी हालत और भारी बोझ के कष्ट को किन शब्दों में व्यक्त करती? लिख्िाए। वसंत भाग 3 भाषा की बात 1.बस, वश, बस तीन शब्द हंैμइनमें बस सवारी के अथर् में, वश अध्ीनता के अथर् में, और बस पयार्प्त ;कापफीद्ध के अथर् में प्रयुक्त होता है, जैसेμबस से चलना होगा। मेरे वश में नहीं है। अब बस करो। ल उपयुर्क्त वाक्यों के समान वश और बस शब्द से दो - दो वाक्य बनाइए। 2.फ्हम पाँच मित्रों ने तय किया कि शाम चार बजे की बस से चलें। पन्ना से इसी वंफपनी की बस सतना के लिए घंटे भर बाद मिलती है।य् ऊपर दिए गए वाक्यों में ने, की, से आदि वाक्य के दो शब्दों के बीच संबंध् स्थापित कर रहे हैं। ऐसे शब्दों को कारक कहते हैं। इसी तरह दो वाक्यों को एक साथ जोड़ने के लिए ‘कि’ का प्रयोग होता है। ल कहानी में से दोनों प्रकार के चार वाक्यों को चुनिए। 3.फ्हम प़्ाफौरन ख्िाड़की से दूर सरक गए। चाँदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी।य् दिए गए वाक्यों में आइर् ‘सरकना’ और ‘रंेगना’ जैसी ियाएँ दो प्रकार की गतियाँ दशार्ती हैं। ऐसी वुफछ और ियाएँ एकत्रा कीजिए जो गति के लिए प्रयुक्त होती हैं, जैसेμघूमना इत्यादि। उन्हें वाक्यों में प्रयोग कीजिए। 4.फ्काँच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था।य् इस वाक्य में ‘बच’ शब्द को दो तरह से प्रयोग किया गया है। एक ‘शेष’ के अथर् में और दूसरा ‘सुरक्षा’ के अथर् में। नीचे दिए गए शब्दों को वाक्यों में प्रयोग करके देख्िाए। ध्यान रहे, एक ही शब्द वाक्य में दो बार आना चाहिए और शब्दों के अथर् में वुफछ बदलाव होना चाहिए। ;कद्ध जल ;खद्ध हार 5.बोलचाल में प्रचलित अंग्रेजी शब्द ‘पफस्टर् क्लास’ में दो शब्द हैंμ पफस्टर् और क्लास। यहाँ क्लास का विशेषण है पफस्टर्। चूँकि पफस्टर् संख्या है, पफस्टर् क्लास संख्यावाचक विशेषण का उदाहरण है। ‘महान आदमी’ में किसी आदमी बस की यात्रा की विशेषता है महान। यह गुणवाचक विशेषण है। संख्यावाचक विशेषण और गुणवाचक विशेषण के दो - दो उदाहरण खोजकर लिख्िाए।

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