शब्दाथार्ः नगाध्िराजः ;नग$अध्िराजःद्ध - पवर्तराज पूवार्परौ ;पूवर्$अपरौद्ध - पूवर् और पश्िचम में स्िथत ;दोनोंद्ध तोयनिध्ी - दोनों समुद्रों को वगाह्य - प्रविष्ट होकर, ध्ँस कर मानदण्डः - मापक, पैमाना, नापने के लिए प्रयुक्त उपकरण प्रभवस्य - उत्पन्न करने वाले का सौभाग्यविलोपि - सौन्दयर्, महिमा, बड़प्पन को लुप्त करने वाला सन्िनपाते - इकट्ठा होने पर निमज्जति - विलीन हो जाता है, नगण्य होता है अघड्ढः - कलंक, ध्ब्बा आमेखलम् - मध्य भाग तक स×चरताम् - विचरण करते हुए सानुगताम् - चोटियों पर गयी हुइर् निषेव्य - सेवन करके, सुख पाकर उद्वेजिता - घबराए हुए, परेशान आश्रयन्ते - आश्रय लेते हैं आतपवन्ित - ध्ूप से युक्त पर कपोलकण्डूः - कनपटी की खुजली करिभ्िाः विनेतुम् विघ‘ितानामसरलद्रुमाणाम् स्रुतक्षीरतया प्रसूतः सानूनि सुरभीकरोति गुहासु लीनम् दिवाभीतम् क्षुद्रे{पि ;क्षुद्रे$अपिद्ध शरणं प्रपन्ने ममत्वम् सतीव ;सति$इवद्ध ्- हाथ्िायों के द्वारा - दूर करने के लिए - रगड़े हुओं का - देवदारु के वृक्षांे का - दूध् निकलने से - उत्पन्न - पवर्त की चोटियाँ - सुगन्िध्त कर देता है - गुपफाओं में - छिपे हुए - दिन से डरे हुए, उल्लू - अध्म या नीच को भी - शरण में आये हुए - अपनापन - मानों होने पर 1.अधेलिख्िातानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराण्िा लिखतμ ;कद्धपृथ्िाव्याः मानदण्डः कः? ;खद्धहिमालयः भारतस्य कस्यां दिश्िा वतर्ते? ;गद्ध इन्दोः किरणेषु कः निमज्जति? ;घद्ध वुफमारसम्भवमहाकाव्यस्य रचयिता कः? 2.अधेरेखािड्ढतेभ्यः पदेभ्यः प्रश्ननिमार्णं वुफरुतμ ;कद्धहिमालयः उत्तरस्यां दिश्िा वतर्ते। ;खद्धपृथ्िाव्याः मानदण्डः हिमालयः अस्ित। ;गद्ध वुफमारसम्भवमहाकाव्यं कालिदासेन विरचितम्। ;घद्ध अस्िमन् पाठे कविः हिमालयस्य वणर्नं करोति। 3.अधेलिख्िातेषु पदेषु सन्िध्विच्छेदं वुफरुतμ अस्त्युत्तरस्याम् = $ नगाध्िराजः = $ पूवार्परौ = $ किरणेष्िवव = $ यस्यातपवन्ित = $ 4.म×जूषातः शब्दान् चित्वा निदिर्ष्टस्तम्भेषु लिखतμ नगाध्िराजः दिश्िा इन्दोः सि(ाः करिभ्िाः किरणैः द्रुमाणाम् स्रुतक्षीरतया क्षुद्रे छायायाम् गुहासु महाकाव्ये शृघõाण्िा विघ‘ितानाम् मानदण्डः प्रभवस्य यः घनानाम् वृष्िटभ्िाः कालिदासेन प्रथमाविभक्ितः तृतीयाविभक्ितः षष्ठीविभक्ितः सप्तमीविभक्ितः यथा - यः करिभ्िाः इन्दोः गुहासु 5.अधेलिख्िातानि पदानि आध्ृत्य वाक्यानि रचयत - पृथ्िाव्याः - हिमालये - गुहासु - इन्दोः - छायायाम् - योग्यता - विस्तारः ऽ ‘मानदण्ड’© शब्द मापने के लिये प्रयोग में लायी जाने वाली तराजू के लकड़ी के डण्डे को कहा जाता है। यह शब्द अब आदशर् कसौटी, निकष, पराकाष्ठा, श्रेष्ठता का पैमाना आदि अथो± में प्रयुक्त होता है। ऽ ‘पूवार्परौ तोयनिध्ी’ के माध्यम से यहाँ क्रमशः बंगाल की खाड़ी तथा अरबसागर की ओर संकेत किया गया है। ऽ ‘सरलद्रुम’ देवदारु के पेड़ को कहा जाता है। इसकी छाल बहुत कोमल होती है। घषर्णमात्रा से ही इसकी छाल छिल जाती है तथा उससे दूध् की धर बहने लगती है। ऽ हिमालय की महिमा का वणर्न दूसरे ग्रन्थों में भी प्राप्त होता है। तुलनीय - वैफलासो हिमवांश्चैव दक्ष्िाणे वषर्पवर्तौ। पूवर्पश्िचमगावेतावणर्वान्तरुपस्िथतौ।। ;ब्रह्माण्डपुराणम्द्ध ऽ कालिदास द्वारा प्रतिपादित सि(ान्त के विरु( में एक यह भी कथन पाया जाता है - एको हि दोषो गुणसन्िनपाते निमज्जतीन्दोरिति यो बभाषे। न तेन दृष्टं कविना समस्तं दारिद्र्यमेवंफ गुणकोटिहारि।। ऽ सूक्ित का अथर् है सुन्दर कथन। कालिदास के काव्य में बहुत ऐसी सूक्ितयाँ हैं जिनसे मनुष्य को बहुत सी सीख मिलती है। नीचे दी गयी वुफछ अन्य सूक्ितयों का अध्ययन करें। ऽ कालिदास ने मेघदूत में रामगिरि पवर्त को ले कर लिखा है - न क्षुद्रो{पि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय। प्राप्ते मित्रो भवति विमुखः ¯क पुनयर्स्तथोच्चैः।। कालिदास की अन्य प्रसि( सूक्ितयाँ ऽ शरीरमाद्यं खलु ध्मर्साध्नम्। ऽ न रत्नमन्िवष्यति मृग्यते हि तत्। ऽ पि्रयेषु सौभाग्यपफला हि चारुता। ऽ पुराणमित्येव न साध्ु सवर्म्। ऽ रिक्तः सवोर् भवति हि लघुः पूणर्ता गौरवाय। परियोजना - कायर्म् इस पाठ में सूक्ितयाँ खोजें।’ अन्य भाषाओं में प्राप्त हिमालय वणर्न को पढ़ें और उसकी सूची बनायें।’

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