संसारसागरस्य नायकाः ¹प्रस्तुत पाठ अनुपम मिश्र की कृति आज भी खरे हैं तालाब के संसार सागर के नायक नामक अध्याय से लिया गया है। इसमें विलुप्त होते जा रहे पारम्परिक ज्ञान, कौशल एवं श्िाल्प के ध्नी गजध्र के सम्बन्ध् में चचार् की गयी है। पानी के लिए मानव निमिर्त तालाब, बावड़ी जैसे निमार्णों को लेखक ने यहाँ संसार सागर के रूप में चित्रिात किया है।ह् के आसन् ते अज्ञातनामानः? शतशः सहड्डशः तडागाः सहसैव शून्यात् न प्रकटीभूताः। इमे एव तडागाः अत्रा संसारसागराः इति। एतेषाम् आयोजनस्य नेपथ्ये निमार्पयितड्डणाम् एककम्, निमार्तड्डणां च दशकम् आसीत्। एतत् एकवंफ दशवंफ च आहत्य शतवंफ सहड्डं वा रचयतः स्म। परं विगतेषु द्विशतवषेर्षु नूतनप(त्या समाजेन यत्िकिचत् पठितम्। पठितेन तेन समाजेन एकवंफ दशवंफ सहड्डवफ×च इत्येतानि शून्ये एव परिवतिर्तानि। अस्य नूतनसमाजस्य मनसि इयमपि जिज्ञासा नैव उद्भूता यद् अस्मात्पूवर्म् एतावतः तडागान् के रचयन्ित स्म। एतादृशानि कायार्ण्िा कत±ु ज्ञानस्य यो नूतनः प्रवििाः विकसितः, तेन प्रविध्िना{पि पूव± सम्पादितम् एतत्काय± मापयितंु न केनापि प्रयतितम्। अद्य ये अज्ञातनामानः वतर्न्ते, पुरा ते बहुप्रथ्िाताः आसन्। अशेषे हि देशे तडागाः निमीर्यन्ते स्म, निमार्तारो{पि अशेषे देशे निवसन्ित स्म। गजध्रः इति सुन्दरः शब्दः तडागनिमार्तड्डणां सादरं स्मरणाथर्म्। राजस्थानस्य केषुचिद् भागेषु शब्दो{यम् अद्यापि प्रचलति। कः गजध्रः? यः गजपरिमाणं धारयति स गजधरः। गजपरिमाणम् एव मापनकायेर् उपयुज्यते। समाजे त्रिाहस्त - परिमाणात्िमकीं लौहयष्िटं हस्ते गृहीत्वा चलन्तः गजध्राः इदानीं श्िाल्िपरूपेण नैव समादृताः सन्ित। गजध्रः, यः समाजस्य गाम्भीय± मापयेत् इत्यस्िमन् रूपे परिचितः। गजध्राः वास्तुकाराः आसन्। कामं ग्रामीणसमाजो भवतु नागरसमाजो वा तस्य नव - निमार्णस्य सुरक्षाप्रबन्ध्नस्य च दायित्वं गजध्राः निभालयन्ित स्म। नगरनियोजनात् लघुनिमार्णपयर्न्तं सवार्ण्िा कायार्ण्िा एतेष्वेव आधृतानि आसन्। ते योजनां प्रस्तुवन्ित स्म, भाविव्ययम् आकलयन्ित स्म, उपकरणभारान् संगृÊन्ित स्म। प्रतिदाने ते न तद् याचन्ते स्म यद् दातुं तेषां स्वामिनः असमथार्ः भवेयुः। कायर्समाप्तौ वेतनानि अतिरिच्य गजधरेभ्यः सम्मानमपि प्रदीयते स्म। नमः एतादृशेभ्यः श्िाल्िपभ्यः। शब्दाथार्ः सहसैव ;सहसा$एवद्ध - अकस्मात्, अचानक प्रकटीभूताः - प्रकट हुए, दिखाइर् दिए नेपथ्ये - पदेर् के पीछे तडागाः - तालाब निमार्पयितड्डणाम् - बनवाने वालों की निमार्तड्डणाम् - बनाने वालों की एककम् - इकाइर् दशकम् - दहाइर् शतकम् - सैकड़ा सहड्डकम् - हजार जिज्ञासा - जानने की इच्छा उद्भूता - उत्पन्न हुइर्, जागृत हुइर् अस्मात्पूवर्म् - इससे पहले मापयितुम् - मापने/नापने के लिये प्रयतितम् - प्रयत्न किया बहुप्रथ्िाताः - बहुत प्रसि( अशेषे - सम्पूणर् निमीर्यन्ते स्म - बनाए जाते थे निमार्तारः - बनाने वाले गजध्रः - गज ;लंबाइर्, चैड़ाइर्, गहराइर्, मोटाइर् मापने की लोहे की छड़द्ध को धरण करने वाला व्यक्ित तडागनिमार्तड्डणाम् - तालाब बनाने वालों के त्रिाहस्तपरिमाणात्िमकीम् - तीन हाथ के नाप की लौहयष्िटम् - लोहे की छड़ समादृताः - आदर को प्राप्त गाम्भीयर्म् - गहराइर् वास्तुकाराः - भवन आदि का निमार्ण करने वाले कामम् - चाहे, भले ही निभालयन्ित स्म - निभाते थे आध्ृतानि - आधरित आकलयन्ित स्म - अनुमान करते थे उपकरणसम्भारान् - साध्न सामग्री को संगृह्णन्ित स्म - संग्रह करते थे प्रतिदाने - बदले में याचन्ते स्म - माँगते थे अतिरिच्य - अतिरिक्त 1.एकपदेन उत्तरत - ;कद्ध कस्य राज्यस्य भागेषु गजध्रः शब्दः प्रयुज्यते? ;खद्ध गजपरिमाणं कः धरयति? ;गद्ध कायर्समाप्तौ वेतनानि अतिरिच्य गजध्रेभ्यः ¯क प्रदीयते स्म? ;घद्ध के श्िाल्िपरूपेण न समादृताः भवन्ित? 2.अधेलिख्िातानां प्रश्नानामुत्तराण्िा लिखत - ;कद्ध तडागाः वुफत्रा निमीर्यन्ते स्म? ;खद्ध गजध्राः कस्िमन् रूपे परिचिताः? ;गद्ध गजध्राः ¯क वुफवर्न्ित स्म? ;घद्ध के सम्माननीयाः? 3.रेखाितानि पदानि आध्ृत्य प्रश्न - निमार्णं वुफरुत - ड्ढ;कद्ध सुरक्षाप्रबन्ध्नस्य दायित्वं गजध्राः निभालयन्ित स्म। ;खद्ध तेषां स्वामिनः असमथार्ः सन्ित। ;गद्ध कायर्समाप्तौ वेतनानि अतिरिच्य सम्मानमपि प्राप्नुवन्ित। ;घद्ध गजध्रः सुन्दरः शब्दः अस्ित। ;घद्ध तडागाः संसारसागराः कथ्यन्ते। 4.अधेलिख्िातेषु यथापेक्ष्िातं स¯न्ध्/विच्छेदं वुफरुत - ;कद्धअद्य $ अपि ;खद्ध $ ;गद्ध इति $ अस्िमन् ;घद्ध ..........$ .........= = स्मरणाथर्म् = = एतेष्वेव 5 म×जूषातः समुचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत - रचयन्ित गृहीत्वा सहसा जिज्ञासा सह ;कद्ध छात्राः पुस्तकानि ................... विद्यालयं गच्छन्ित। ;खद्ध मालाकाराः पुष्पैः मालाः ................................। ;गद्ध मम मनसि एका ...............................वतर्ते। ;घद्ध रमेशः मित्रौः ................ विद्यालयं गच्छति। ;घद्ध ..................... बालिका तत्रा अहसत। 6 पदनिमार्णं वुुफरुत - धतुः यथा - कृ हृ तृ यथा - नम् $ $ $ $ प्रत्ययः तुमुन् तुमुन् तुमुन् क्त्वा = = = = पदम् कतर्ुम् ........................नत्वा गम् $ क्त्वा = ............ त्यज् $ क्त्वा = ............. भुज् उपसगर्ः $ क्त्वा धतुः = प्रत्ययः ............= पदम् यथा - उप ल्यप् = उपगम्य गम्पूज् ल्यप् =सम्आ नी ल्यप्= 7.कोष्ठकेषु दत्तेषु शब्देषु समुचितां विभक्ितं योजयित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत - यथा - विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ित। ;विद्यालयद्ध ;कद्ध उभयतः ग्रामाः सन्ित। ;ग्रामद्ध ;खद्ध सवर्तः अ‘ालिकाः सन्ित। ;नगरद्ध ;गद्ध ध्िव्फ ....................। ;कापुरुषद्ध यथा - मृगाः मृगैः सह धवन्ित। ;मृगद्ध ;कद्ध बालकाः सह पठन्ित। ;बालिकाद्ध ;खद्ध पुत्रा ....................सह आपणं गच्छति। ;पितृद्ध ;गद्ध श्िाशुः ....................सह क्रीडति। ;मातृद्ध योग्यता - विस्तारः अनुपम मिश्र - जल संरक्षण के पारंपरिक ज्ञान को समाज के सामने लाने का श्रेय जिन लोगों को है श्री अनुपम मिश्र ;जन्म 1948द्ध उनमें अग्रगण्य हैं। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ और ‘राजस्थान की रजत बूँदंे’ पानी पर उनकी बहुप्रशंसित पुस्तवंेफ हैं। भाषा - विस्तारः कारक सामान्य रूप से दो प्रकार की विभक्ितयाँ होती हैं। 1.कारक विभक्ित 2.उपपद विभक्ित। कारक चिह्नों के आधर पर जहाँ पदों का प्रयोग होता है उसे कारक विभक्ित कहतेहैं। किन्तु किन्हीं विशेष पदों के कारण जहाँ कारक चिÉों की उपेक्षा कर किसी विशेष विभक्ित का प्रयोग होता है उसे उपपद विभक्ित कहते हैं, जैसे - सवर्तः अभ्िातः, परितः, ध्िव्फ आदि पदों के योग में द्वितीया विभक्ित होती है। उदा - ;कद्ध विद्यालयं परितः पुष्पाण्िा सन्ित। ;खद्ध ध्िव्फ देशद्रोहिणम्। सह, साकम्, सा(र्म्, समं के योग में तृतीया विभक्ित होती है। उदा - ;कद्ध जनकेन सह पुत्राः गतः। ;खद्ध दुजर्नेन समं सख्यम्। नमः, स्वस्ित, स्वाहा, स्वध के योग में चतुथीर् विभक्ित प्रयुक्त होती है - उदा - ;कद्ध देशभक्ताय नमः। ;खद्ध नमः एतादृशेभ्यः श्िाल्िपभ्यः। ;गद्ध जनेभ्यः स्वस्ित। अलम् शब्द के दो अथर् हैं - पयार्प्त एवं मत ;वारण के अथर् मेंद्ध। पयार्प्त के अथर् में चतुथीर् विभक्ित होती है जैसे - देशद्रोहिणे अलं देशरक्षकाः। मना करने के अथर् में तृतीया विभक्ित होती है, जैसे - अलं विवादेन। विना के योग में द्वितीया, तृतीया एवं प×चमी विभक्ितयाँ होती हैं, जैसे - परिश्रमं/ परिश्रमेण/परिश्रमात् विना न गतिः। निम्नलिख्िात ियाओं के एकवचन बनाने का प्रयास करें - आकलयन्ित, संगृÊन्ित, प्रस्तुवन्ित। जिज्ञासा - जानने की इच्छा। इसी प्रकार के अन्य शब्द हैं - पिपासा, जिग्िमषा, विवक्षा, बुभूक्षा। भाव - विस्तारः अगर हम ध्यान से देखें तो हमारे चारों तरपफ ज्ञान एवं कौशल के विविध् रूप दिखाइर् देते हैं। इसमें वुफछ ज्ञान और कौशल पफलते - पूफलते हैं और कइर् निरंतर क्षीण होते हैं। इसके कइर् उदाहरण हमारे सामने हैं। पानी का व्यवस्थापन संरक्षण और खेती - बाड़ी का पारंपरिक तौर - तरीका, श्िाल्प तथा कारीगरी का ज्ञान दुलर्भ और विलुप्त होने के कगार पर है। वहीं अभ्िायान्ित्राकी एवं संचार से संबंध्ित ज्ञान नए उभार पर हैं। दरअसल किस तरह का ज्ञान और कौशल आगे विकसित और प्रगुण्िात होगा और किस तरह का ज्ञान एवं कौशल पिछड़ेगा, विलुप्त होने के लिए विवश होगा यह इस बात पर निभर्र करता है कि देश और समाज किस तरह के ज्ञान एवं कौशल के विकास में अपना भविष्य सुरक्ष्िात एवं सुखमय मानता है। परियोजना - कायर्म् आने वाली छु‘ियों में अपने आस - पास के क्षेत्रा के उन पारंपरिक ज्ञान एवं कौशलों का पता लगाएँ जिनका स्थान समाज में अब निरंतर घट रहा है। उन्हें कोइर् उचित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है या वे विलुप्त होने के कगार पर हैं। उनकी एक सूची भी तैयार करेंऔर उनके लिए प्रयुक्त होने वाले संस्कृत शब्द लिखें। अपने और अपने मित्रों द्वारा तैयार की गइर् अलग - अलग सूचियों को सामने रखते हुए इन पारंपरिक कौशलों के विलुप्त होने के कारणों का पता लगाएँ।

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