चित्रा 1 - मछलीपट्नम का एक दृश्य, 1672 मछलीपट्नम सत्राहवीं शताब्दी में एक महत्वपूणर् बंदरगाह के रूप में विकसित हुआ। अठाहरवीं सदी के आख्िार में जब व्यापार बम्बइर्, मद्रास और कलकत्ता के नए बि्रटिश बंदरगाहों पर वेंफदि्रत होने लगा तो उसका महत्व घटता गया। औपनिवेश्िाक शासन में शहरों का क्या हुआ? आप देख चुके हैं कि बि्रटिश सत्ता की स्थापना के बाद गाँवों का जीवन किस तरह बदल गया था। इसी समय शहरों में क्या हो रहा था? इसका जवाब इस बात पर निभर्र करता है कि हम किस तरह के वफस्बे या शहर की चचार् करते हैं। मदुरै जैसे मंदिरों़के शहर का इतिहास ढाका जैसे उत्पादन शहरों या सूरत जैसे बंदरगाह या एक साथ कइर् तरह के काम करने वाले वफस्बों से बिलवुफल अलग मिलेगा।़पश्िचमी विश्व के ज़्यादातर भागों में आधुनिक शहर औद्योगीकरण के साथ सामने आए थे। बि्रटेन में लीड्स और मैनचेस्टर जैसे औद्योगिक शहर उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में तेशी से पैफले क्योंकि बहुत सारे लोग नौकरी, मकान और अन्य सुविधाओं की उम्मीद में इन शहरों की तरपफ आ रहे थे। लेकिन, उन्नीसवीं सदी में भारतीय शहर पश्िचम यूरोप के शहरों की तरह तेशी से नहीं पैफले। ऐसा क्यों हुआ? अठारहवीं सदी के आख्िार में कलकत्ता, बम्बइर् और मद्रास का महत्व प्रेिाडेंसी शहरों के रूप में तेशी से बढ़ रहा था। ये शहर भारत में बि्रटिश सत्ता के वेंफद्र बन गए थे। उसी समय बहुत सारे दूसरे शहर कमशोर पड़ते जा रहे थे। ख़ास चीशों के उत्पादन वाले बहुत सारे शहर इसलिए पिछड़ने लगे क्योंकि वहाँ जो चीशें बनती थीं उनकी माँग घट गइर् थी। जब व्यापार नए इलाकों में वेंफदि्रत होने लगा तो पुराने व्यापारिक वेंफद्र और बंदरगाह पहली वाली स्िथति में नहीं रहे। इसी प्रकार, जब अंग्रेशों ने स्थानीय राजाओं को हरा दिया और शासन के नए वेंफद्र पैदा हुए तो क्षेत्राीय सत्ता के पुराने वेंफद्र भी ढह गए। इस प्रवि्रफया को अकसर विशहरीकरण कहा जाता है। मछलीपट्नम, सूरत और श्रीरंगपट्म जैसे शहरों का उन्नीसवीं सदी में कापफी ज्यादा विशहरीकरण हुआ। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में केवल 11 प्रतिशत लोग शहरों में रहते थे। प्रेिाडेंसी - शासन की सुविधा के लिहाश से औपनिवेश्िाक भारत को तीन फ्प्रेिाडेंसीय् ;बम्बइर्, मद्रास और बंगालद्ध में बाँट दिया गया था। ये तीनों प्रेिाडेंसी सूरत, मद्रास और कलकत्ता में स्िथत इर्स्ट इंडिया वंफपनी की फ्पैफक्िट्रयोंय् ;व्यापारिक चैकियोंद्ध को ध्यान में रखकर बनायी गइर् थीं। ऐतिहासिक शाही शहर दिल्ली उन्नीसवीं सदी में एक धूल भरा छोटा - सा वफस्बा बन कर रह गया था। परंतु, 1912 में बि्रटिश भारत की राजधानी बनने़के बाद इसमें दोबारा जान आ गइर्। आइए दिल्ली की कहानी को देखकर समझें कि औपनिवेश्िाक शासन के दौरान यहाँ क्या चल रहा था। नयी दिल्ली से पहले और कितनी ‘दिल्िलयाँ’ थीं? आप दिल्ली को आधुनिक भारत की राजधानी के रूप में देखते रहे हैं। क्या आपको मालूम है कि यह शहर एक हशार साल से भी ज़्यादा समय तक राजधानी रह चुका है। इस दौरान इसमें छोटे - मोटे अंतराल भी आते रहे हैं। यमुना नदी के बाएँ किनारे पर लगभग साठ वगर् मील के छोटे से क्षेत्रापफल में कम से कम 14 राजधानियाँ अलग - अलग समय पर बसाइर् गईं। आधुनिक चित्रा 2 - अठारहवीं सदी में बम्बइर् का बंदरगाह। जब इर्स्ट इंडिया वंफपनी पश्िचमी भारत में बम्बइर् को मुख्य बंदरगाह के रूप में इस्तेमाल करने लगी तो बम्बइर् शहर पैफलने लगा। शहरीकरण - ऐसी प्रवि्रफया जिसमें अध्िक से अध्िक लोग शहरों और व़्ाफस्बों में जाकर रहने लगते हैं। चित्रा 3 - उन्नीसवीं सदी के मध्य में शाहजहाँनाबाद की एक तसवीर, दि इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूश, 16 जनवरी 1858आप बाईं ओर लाल व्ि़ाफला देख सकते हैं। शहर को घेरने वाली दीवारों को ध्यान से देखें। बीचोंबीच चाँदनी चैक का मुख्य रास्ता दिखाइर् दे रहा है। देख्िाए कि यमुना नदी लाल व्ि़ाफले से सटकर बह रही है। अब इसका रास्ता वुफछ बदल गया है। जहाँ नाव किनारे की तरपफ बढ़ रही है उसे अब दरियागंज कहा जाता है ;दरिया का मतलब नदी, और गंज का मतलब बाशारद्ध। नगर राज्य दिल्ली में घूमने पर इन सारी राजधानियों के अवशेष देखे जा सकते हैं। इनमें बारहवीं से सत्राहवीं शताब्दी के बीच बसाए गए राजधानी शहर सबसे महत्वपूणर् थे।दरगाह - सूपफी संत का़इन सारी राजधानियों में सबसे शानदार राजधानी शाहजहाँ ने बसाइर् थी।मव्ाफबरा।़ख़ानकाह - यात्रिायों के लिए विश्राम घर और ऐसा स्थान जहाँ लोग आध्यात्िमक मामलों पर चचार् करते हैं, संतों का आशीवार्द लेते हैं या नृत्य - संगीत कायर्व्रफमों का आनंद लेते हैं। इर्दगाह - मुसलमानों का खुला प्राथर्ना स्थल जहाँ सावर्जनिक प्राथर्ना और त्योहार होते हैं। वुफल - दे - सेक - ऐसा रास्ता जो एक जगह जाकर बंद हो जाता है। ़शाहजहाँनाबाद की स्थापना 1639 में शुरू हुइर्। इसके भीतर एक व्िाफला - महल और बगल में सटा शहर था। लाल पत्थर से बने लाल व्िाफले में महल परिसऱबनाया गया था। इसके पश्िचम की ओर 14 दरवाजों वाला पुराना शहर था। चाँदनी चैक और पैफश बाशार की मुख्य सड़वेंफ इतनी चैड़ी थीं कि वहाँ से शाही यात्राएँ आसानी से निकल सकती थीं। चाँदनी चैक के बीचोंबीच नहर थी। घने मौहल्लों और दजर्नों बाशारों से घ्िारी जामा मसजिद भारत की सबसे विशाल और भव्य मसजिदों में से एक थी। उस समय पूरे शहर में इस मसजिद से उँफचा कोइर् स्थान नहीं था। शाहजहाँ के समय दिल्ली सूप़फी संस्वृफति का भी एक अहम वेंफद्र हुआ करती थी। यहाँ कइर् दरगाह, ख़ानकाह, और इर्दगाह थीं। बड़े - बड़े चैराहों, टेढ़ी - मेढ़ी गलियों, खामोश वुफल - दे - सेक और जलधाराओं पर दिल्ली वालों को नाश था। शायद इसीलिए मीर तकी मीर ने कहा था, फ्दिल्ली की सड़वेंफ महश सड़वेंफ नहीं हैं। वे तो किसी चित्राकार की एल्बम के पन्ने हैं।य् लेकिन यह भी आदशर् शहर नहीं था। इसके ऐशो - आराम भी सिप़र्फ वुफछ लोगों के हिस्से में आते थे। अमीर और गरीब के बीच पफासला बहुत गहरा था। हवेलियों के बीच़गरीबों के असंख्य कच्चे मकान होते थे। शायरी और नृत्य संगीत की रंग - बिरंगी दुनिया आमतौर पर सिप़्ार्फ मदो± के मनोरंजन का साधन थी। त्योहारों और जलसे - जुलूसों में जब - तब टकराव भी पूफट पड़ते थे, सो अलग। नयी दिल्ली का निमार्ण 1803 में अंग्रेशों ने मराठों को हराकर दिल्ली पर नियंत्राण हासिल कर लिया था। क्योंकि बि्रटिश भारत की राजधानी कलकत्ता थी इसलिए मुगल बादशाह़को लाल व्िाफले के महल में रहने की छूट मिली हुइर् थी। आज हमारे सामने़जो आधुनिक शहर दिखाइर् देता है यह 1911 में तब बनना शुरू हुआ जब दिल्ली बि्रटिश भारत की राजधानी बन गयी। एक अतीत का ध्वंस 1857 से पहले दिल्ली के हालात दूसरे औपनिवेश्िाक शहरों से कापफी अलग थे। मद्रास, बम्बइर् या कलकत्ता में भारतीयों और अंग्रेशों की बस्ितयाँ अलग - अलग होती थीं। भारतीय लोग फ्कालेय् इलाकों में और अंग्रेश लोग फ्दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतख़ाब...य् 1739 तक दिल्ली नादिर शाह के हाथों तबाही और लूट - खसोट का सामना कर चुकी थी। शहर के पतन पर दुख भरे लहशे में अठारहवीं सदी के उदूर् शायर मीर तव़्ाफी मीर कहते हैं: दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतख़ाब हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के। ;मैं उसी उजड़ी हुइर् दिल्ली का रहने वाला हूँ जो एक शमाने में दुनिया का सबसे भव्य शहर थीद्ध। गुलप़्ाफरोशान - पूफलों का त्योहार। पुनजार्गरण - इसका शाब्िदक अथर् होता है कला और ज्ञान का पुनजर्न्म। यह शब्द ऐसे दौर के लिए इस्तेमाल होता है जब बहुत बड़े पैमाने पर रचनात्मक गतिवििायाँ होती हैं। चित्रा 6 - बि्रटिश टुकडि़याँ दिल्ली की सड़कों पर विद्रोहियों का वफत्लेआम करके ़बदला ले रही हैं। ड्डोत 2 फ्कभी इस नाम का भी एक शहर हुआ हैय् दिल्ली में आ रहे बदलावों पर ग़्ाालिब गहरे तौर पर दुखी थे। उन्होंने दिल्ली के अतीत पर लिखा था: क्या लिखूँ? दिल्ली की िांदगी तो किले, चाँदनी चैक, यमुना के पुल पर जमने वाले चैकडि़यों और सलाना गुलप़्ाफरोशान से धड़कती है। जब ये सारी चीशें .... ही यहाँ नहीं हैं तो दिल्ली िांदा वैफसे रह सकती है? हाँ हिंदुस्तान में कभी इस नाम का भी शहर ाफर को देश से निकाल दिया। अंग्रेशों ने उन्हें बमार् ;अब म्याँमारद्ध भेज दिया, उनका दरबार बंद कर दिया, कइर् सुसज्िजत फ्गोरेय् इलाकों में रहते थे। दिल्ली में ऐसा नहीं था। ख़ासतौर से उन्नीसवीं सदी के पूवार्(र् में दिल्ली के अंग्रेश भी पुराना शहर के भीतर अमीर हिंदुस्तानियों के साथ ही रहा करते थे। वे भी उदूर्/प़फारसी संस्वृफति व शायरी का मशा लेते थे और स्थानीय त्योहारों में हिस्सेदारी करते थे। 1824 में दिल्ली काॅलेज की स्थापना हुइर् जिसकी शुरूआत अठारहवीं सदी में मदरसे के रूप में हुइर् थी। इस संस्था ने विज्ञान और मानवशास्त्रा के क्षेत्रा में एक नए युग का सूत्रापात कर दिया। यहाँ मुख्य रूप से उदूर् भाषा में काम होता था। बहुत सारे लोग 1830 से 1857 की अविा को दिल्ली पुनजार्गरण काल बताते हैं। 1857 के बाद यह सब वुफछ बदल गया। उस साल हुए विद्रोह के दौरान विद्रोहियों ने बहादुर शाह शप़्ाफर को विद्रोह का नेतृत्व सँभालने के लिए मजबूर कर दिया। चार महीने तक दिल्ली विद्रोहियों के नियंत्राण में रही। जब अंग्रेशों ने शहर पर दोबारा नियंत्राण हासिल किया तो वे बदले और लूटपाट की मुहिम पर निकल पड़े। प्रसि( शायर गालिब उदास मन से इन घटनाओं को देख रहे थे। 1857 में दिल्ली की तबाही को उन्होंने इन शब्दों में व्यक्त किया, फ्जब गुस्साए शेर ;अंग्रेशद्ध शहर में दाख्िाल हुए तो उन्होंने बेसहारों को मारा.... घर जला डाले। न जाने कितने औरत - मदर्, आम और ख़ास, तीन दरवाशों से दिल्ली से भाग खड़े हुए और उन्होंने छोटे - छोटे समुदायों तथा शहर के बाहर मवफबरों में पनाह ली।य् अगली बग़्ाावतों को़रोकने के लिए अंग्रेशों ने बहादुर शाह शप़्हुआ तो शरूर है। महल गिरा दिए, बागों को बंद कर दिया और उनकी जगह अपने सैनिकों के लिए बैरवेंफ बना दीं। अंग्रेश दिल्ली के मुग़्ाल अतीत को पूरी तरह भुला देना चाहते थे। व्िाफले़के इदर् - गिदर् का सारा इलाका सापफ कर दिया गया। वहाँ के बाग, मैदान और मसजिदें नष्ट कर दिए गए ;उन्होंने मंदिरों को नहीं तोड़ाद्ध। अंग्रेश आसपास के इलाके को सुरक्ष्िात करना चाहते थे। ख़ासतौर से मसजिदों को या तो नष्ट कर दिया गया या उन्हें अन्य कामों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। मिसाल के तौर पर, शीनत - अल - मसजिद को एक बेकरी में तब्दील कर दिया गया। जामा मसजिद में पाँच साल तक किसी को नमाश की इजाशत नहीं मिली। शहर का एक - तिहाइर् हिस्सा ढहा दिया गया। नहरों को पाटकर समतल कर दिया गया। रेलवे की स्थापना करने और शहर को चारदीवारी के बाहर पैफलाने के लिए 1870 के दशक में शाहजहाँनाबाद की पश्िचमी दीवारों को तोड़ दिया गया। अब अंग्रेश उत्तर की तरपफ विकसित हुए विशाल सिविल लाइंस इलाके में रहने लगे। अब वे पुराने शहर में भारतीयों के साथ नहीं रहते थे। दिल्ली काॅलेज को एक स्वूफल बना दिया गया और 1877 में उसे बंद कर दिया गया। चित्रा 7 - जामा मसजिद से देखने पर। पेफलिस बिएतो द्वारा लिया गया पफोटो, 1858 - 59मसजिद के चारों तरपफ बनी इमारतों को़देखें। 1857 की बग़्ाावत के बाद उन्हें सापफ़कर दिया गया था। चित्रा 8 - आस पास की इमारतों को गिरा देने के बाद जामा मसजिद का दृश्य।गतिवििा चित्रा 7 और 8 की तुलना करें। इन चित्रों में जो प़्ाफवर्फ दिखाइर् देता है उससे यहाँ रहने वाले लोगों पर क्या असर पड़े होंगे? एक नयी राजधानी की योजना चित्रा 9 - जाॅजर् पंचम का राज्याभ्िाषेक ;काॅरोनेशनद्ध दरबार, 12 दिसंबर 1911इस दरबार में 1,00,000 से शयादा भारतीय राजा - महाराजा, अंग्रेश अप़्ाफसर और सिपाही जमा हुए थे। अंग्रेशों को दिल्ली के सांकेतिक महत्व का अच्छी तरह पता था। लिहाशा, 1857 की बगावत के बाद उन्होंने यहाँ बहुत सारे शानदार आयोजन किए।़1877 में वायसराॅय लिटन ने रानी विक्टोरिया को भारत की मलिका घोष्िात करने के लिए एक दरबार का आयोजन किया। वैसे तो बि्रटिश भारत की राजधानी अभी भी कलकत्ता ही थी लेकिन इस विशाल दरबार का आयोजन दिल्ली में किया गया। इसकी क्या वजह रही होगी? विद्रोह के दौरान अंग्रेशों ने यह समझ लिया था कि लोगों की नशर में मुग़्ाल बादशाह का महत्व अभी भी बना हुआ है और वे उसे ही अपना मुख्िाया मानते हैं। लिहाशा, बि्रटिश सत्ता का मुग़्ाल बादशाहों और 1857 के बागियों के मुख्य वेंफद्र में पूरी तड़क - भड़क के साथ प्रदशर्न किया गया। 1911 मंे जब जाॅजर् पंचम को इंग्लैंड का राजा बनाया गया तो इस मौके पर दिल्ली में एक और दरबार का आयोजन हुआ। कलकत्ता की बजाय दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने के पैफसले का भी इसी दरबार में ऐलान किया गया। तत्कालीन शहर के दक्ष्िाण में रायसीना पहाड़ी पर दस वगर् मील के इलाके में नयी दिल्ली का निमार्ण किया गया। एडवडर् लटयंस और हबर्टर् बेकर नाम के दो वास्तुकारों को नयी दिल्ली और उसकी इमारतों का डिशाइन तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया। नयी दिल्ली स्िथत सरकारी परिसर में दो मील का चैड़ा रास्ता, वायसराॅय के महल ;वतर्मान राष्ट्रपति भवनद्ध तक जाने वाला विंफग्सवे ;वतर्मान राजपथद्ध, और उसके दोनों तरपफ सचिवालय की इमारतें बनाइर् गईं। इन सरकारी इमारतों की बनावट में भारत के शाही इतिहास के अलग - अलग दौर की झलक दिखायी देती थी। पिफर भी इसका रूप मोटे तौर पर क्लासिकी यूनान ;पाँचवीं शताब्दी इर्सा पूवर्द्ध का दिखाइर् देता था। उदाहरण के लिए, वायसराॅय पैलेस का वेंफद्रीय गुंबद साँची में बने बौ( स्तूप की बनावट पर आधारित था। लाल भुरभुरे पत्थर और नक्वफाशीदार जालियों की प्रेरणा मुग़्ाल़वास्तुश्िाल्प से ली गइर् थी। लेकिन नयी इमारतों में बि्रटिश प्रभुत्व की झलक भी शरूरी थी। इसीलिए वास्तुकारों ने इस बात का खयाल रखा कि वायसराॅय का महल शाहजहाँ की जामा मसजिद से भी उँफचा हो! यह काम वैफसे किया जा सकता था? नयी दिल्ली के निमार्ण में लगभग 20 साल लगे। इरादा एक ऐसा शहर बनाने का था जो शाहजहाँनाबाद के मुव़्ाफाबले बिलवुफल अलग हो। उसमें भीड़ भरे मोहल्लों और संकरी गलियों के लिए कोइर् जगह नहीं थी। नयी दिल्ली में चैड़ी, सीधी सड़कों और विशाल परिसरों के बीच बड़ी - बड़ी इमारतों की कल्पना की गइर् थी। पुरानी दिल्ली में अप़़्ाफरा - तपफरी दिखाइर् देती थी। नया शहर स्वच्छ और स्वस्थ दिखाइर् पड़ता था। अंग्रेशों को भीड़ भरे इलाके गंदे और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बीमारियों का ड्डोत दिखाइर् देते थे। इसीलिए नयी दिल्ली में बेहतर जलापूतिर्, गंदगी के निकास और नालियों की पूरी व्यवस्था तैयार की गइर्। उसे ज़्यादा हरा - भरा बनाया गया। वहाँ पेड़ और बड़े - बड़े पावर्फ बनाए गए ताकि लगातार ताशी हवा और आॅक्सीजन मिलती रहे। गतिवििा विभाजन के समय जीवन 1947 में भारत के विभाजन से नयी सीमा के दोनों तरपफ आबादी बड़ी तादाद में विस्थापित हुइर्। इसका नतीजा यह हुआ कि दिल्ली की आबादी बढ़ गइर्। रोशगार बदल गए और शहर की संस्वृफति बिलवुफल भ्िान्न हो गइर्। स्वतंत्राता और विभाजन के वुफछ ही दिनों बाद भीषण दंगे शुरू हो गए। दिल्ली में हशारों लोग मारे गए और उनके घर - बार लूटकर जला दिए गए। दिल्ली से पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों की जगह पाकिस्तान से आए सिख और हिंदू शरणाथ्िार्यों ने ले ली। शाहजहाँनाबाद में लावारिस मकानों पर कब्शे के लिए शरणाथ्िार्यों के झुंड घूमने लगे। कइर् बार उन्होंने मुसलमानों को भाग जाने और अपनी संपत्ित बेचने के लिए मशबूर भी किया। दिल्ली के दो - तिहाइर् मुसलमान पलायन कर गए थे जिससे लगभग 44,000 मकान खाली हो गए। बहुत सारे मुसलमान पाकिस्तान जाने के इंतशार में कामचलाउफ श्िाविरों में रहने लगे। उस समय दिल्ली शरणाथ्िार्यों का शहर बन गइर् थी। दिल्ली की आबादी में लगभग पाँच लाख की वृि हो गइर् ;जबकि 1951 में यहाँ की आबादी 8 लाख से कुछ ही ज़्यादा थीद्ध। ज़्यादातर लोग पंजाब से आए थे। वे श्िाविरों, स्वूफलों, प़्ाफौजी बैरकों और बाग - बगीचों में आकर रहने लगे। उनमें से वुफछ को खाली पड़े मकानों पर कब्शे का मौका मिल गया। बहुत सारे लोग शरणाथीर् बस्ितयों में रहने लगे। लाजपत नगर और तिलक नगर जैसी बस्ितयाँ इसी समय बसी थीं। दिल्ली में आने वालों की शरूरतों को पूरा करने के लिए दुकान और स्टाॅल खुल गए। कइर् नए स्वूफल और काॅलेज भी खोल दिए गए। जो लोग यहाँ से गए थे उनकी जगह आए शरणाथ्िार्यों की निपुणता और काम - धंधे बिलवुफल अलग थे। पाकिस्तान जाने वाले बहुत सारे मुसलमान कारीगर, छोटे - मोटे व्यापारी और मशदूर थे। दिल्ली आए नए लोग ग्रामीण भूस्वामी, वकील, श्िाक्षक, व्यापारी और छोटे दुकानदार थे। विभाजन ने उनकी िांदगी और उनके व्यवसाय बदल दिए थे। पेफरीवालों, पटरीवालों, बढ़इर् और लुहारों के तौर पर उन्होंने नए रोशगार अपनाए। इनमें से बहुत सारे नए व्यवसायों में काप़्ाफी सपफल भी रहे। पंजाब से आइर् विशाल टोलियों ने दिल्ली का सामाजिक परिवेश पूरी तरह बदल दिया। भोजन, पहनावे और कला के हर क्षेत्रा में मुख्य रूप से उदूर् पर आधारित शहरी संस्वृफति नयी रुचियों और संवेदनशीलता के नीचे दब गइर्। पुराने शहर के भीतर इस बीच पुराने शहर यानी शाहजहाँनाबाद का क्या हुआ? अतीत में मुग़्ालों के जमाने की प्रसि( नहरों से घरों में न केवल पीने का ताशा पानी आता था बल्िक दूसरी घरेलू शरूरतों के लिए भी पानी मिल जाता था। उन्नीसवीं सदी में जलापूतिर् और निकासी की इस बेहतरीन व्यवस्था को नशरअंदाश किया जाने लगा। वुफओं ;बावड़ीद्ध की व्यवस्था अस्त - व्यस्त हो गइर्। घरेलू कचरे की निकासी करने वाली धाराएँ भी क्षतिग्रस्त थीं। यह एक ऐसे समय की बात है जब शहर की आबादी लगातार बढ़ रही थी। टूटी - पूफटी नहरें इस तेशी से बढ़ती आबादी की शरूरत को पूरा नहीं कर सकती थीं। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में शाहजहाँनी नालियों को बंद कर दिया गया और खुली नालियों की नयी व्यवस्था विकसित की गइर्। जल्दी ही यह प्रणाली भी बोझ से चरमराने लगी। बहुत सारे अमीर लोगों को सड़क किनारे बहती नालियों और उपफनते खुले नालों की बदबू परेशान करती थी। दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी एक अच्छी निकासी व्यवस्था पर पैसा खचर् करने को तैयार नहीं थी। तथापि, उसी समय नयी दिल्ली के इलाके में निकासी व्यवस्था पर लाखों रुपये खचर् किए गए। हवेलियों का पतन सत्राहवीं और अठाहरवीं शताब्िदयों में मुग़्ाल वुफलीन वगर् भव्य हवेलियों में रहता था। उन्नीसवीं सदी के मध्य का नक्शा देखने पर ऐसी कम से कम सौ हवेलियाँ दिखाइर् देती हैं। ये चारदीवारी से घ्िारे दालान और झरनों वाली भव्य इमारतें थीं। गतिवििा दो बच्चों की कल्पना कीजिए। उनमें से एक हवेली में रहता है और दूसरा औपनिवेश्िाक बंगले में। अपने परिवार के साथ उनके संबंधों में क्या प़्ाफवर्फ होगा? आप कौन से बच्चे की तरह जीना पसंद करेंगे? अपने सहपाठियों के साथ अपनी राय पर चचार् करें और बताएँ कि आपने यह चुनाव क्यों किया? एक हवेली में बहुत सारे परिवार रहते थे। खूबसूरत पफाटक से भीतर जाने पर हवेली के अंदर आप एक खुले अहाते में पहुँच जाते थे। इसके चारों तरपफ मेहमानों और कारोबारियों के लिए सावर्जनिक कमरे बने होते थे जिनका सिप़र्फ पुरुष ही इस्तेमाल करते थे। भीतरी दालान और कमरे परिवार की औरतोें के लिए होते थे। हवेली के कमरों का कइर् कामों के लिए इस्तेमाल होता था। उनमें प़्ाफनीर्चर बहुत कम होता था। यहाँ तक कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक भी व़्ाफमर - अल - दीन ख़ान की हवेली में कइर् इमारतें थीं। उनमें गाड़ीवानों, तम्बू लगाने वालों ;डेरवालद्ध, मशालची, खातेदारों, क्लको±, घरेलू नौकरों के रहने का इंतशाम था। बहुत सारे मुग़्ाल अमीर बि्रटिश शासन के समय इन विशालकाय इमारतों को सँभालने की हालत में नहीं थे। पफलस्वरूप, हवेलियाँ बँटने लगीं। उनके हिस्सों को बेचा जाने लगा। हवेलियों के जो हिस्से सड़क पर खुलते थे वहाँ दुकानें या गोदाम बन गए। वुफछ हवेलियाँ नए उभरते व्यवसायी वगर् के नियंत्राण में चली गईं। बहुत सारी उपयोग में न होने के कारण बेकार हो गईं। औपनिवेश्िाक बंगले इन हवेलियों से बिलवुफल अलग थे। ये बंगले एकल परिवारों के लिए बनाए गए थे। इसलिए उनमें एक मंिाल की ढलवाँ छत वाली इमारत होती थी। ये बंगले आमतौर पर एक या दो एकड़ के खुले स्थान पर बने होते थे। इनमें रहने, खाने और सोने के कमरे अलग थे। अगले ाफ बरामदा बनाया जाता था। रसोइर् घर, अस्तबल और नौकरों के क्वाटर्र मुख्य मकान से अलग बनाए जाते थे। घर की देखभाल के लिए दजर्नों नौकर होते थे। परिवार की औरतें अकसर दिार्यों या अन्य कारीगरों पर नशर रखने के लिए बरामदे में बैठती थीं। नगरपालिका योजना बनाती है 1931 की जनगणना से पता चला कि पुराने शहर के इलाके में भयानक भीड़ हंै। यहाँ प्रति एकड़ 90 लोग रहते थे जबकि नयी दिल्ली में प्रति एकड़ केवल 3 लोगों का औसत था। अमीर - वुफलीन वगर् का व्यक्ित हिस्से में एक लंबा बरामदा होता था। कइर् बंगलों में तीन तरप़्पुराने शहर के बिगड़ते हालात के बावजूद उसका पैफलना जारी रहा। पुराने शहर के निवासियों के लिए राॅबटर् क्लावर्फ ने 1888 में लाहौर गेट सुध् ार योजना के नाम से एक विस्तार योजना तैयार की। इसके पीछे सोच यह थी कि यहाँ के निवासियों को पुराने शहर से अलग एक नए तरह के चैराहा बाशार की तरपफ ढकेला जाए। इस चैराहे पर चारों तरपफ दुकानों की कल्पना की गइर् थी। इस पुन£वकास मंे सड़कों के लिए जाल वाली संरचना तय की गइर्। सभी सड़कों की चैड़ाइर्, आकार और स्वरूप एक जैसा होना था। मोहल्लों के निमार्ण के लिए शमीन को एक जैसे टुकड़ों में बाँट दिया गया था। इस नए स्थान को क्लावर्फगंज का नाम दिया गया। यह कभी पूरा नहीं हो पाया और उसने पुराने शहर को भीड़ से आशाद कराने में कोइर् मदद नहीं की। यहाँ तक कि 1912 में भी इन नए स्थानों पर जलापूतिर् और निकासी की व्यवस्था बहुत खराब थी। दिल्ली सुधर ट्रस्ट का गठन 1936 में किया गया। इस योजना के तहत संपन्न लोगों के लिए दरियागंज दक्ष्िाण जैसे इलाके बनाए गए। यहाँ पाको± के इदर् - गिदर् रिहायशी मकान बने। मकानों के भीतर निजता की नयी सोच के हिसाब से जगह बँचित्रा 15 - पुरानी दिल्ली की एकटी हुइर् थी। अब बहुत सारे परिवार या समूह साझा जगह पर नहीं रहते थे बल्िक मकान के भीतर एक ही परिवार सड़क। के विभ्िान्न सदस्यों के लिए अलग - अलग जगह होने लगी। 1.सही या गलत बताएँ: ;कद्ध पश्िचमी विश्व में आधुनिक शहर औद्योगीकरण के साथ विकसित हुए। ;खद्ध सूरत और मछलीपट्नम का उन्नीसवीं शताब्दी में विकास हुआ। ;गद्ध बीसवीं शताब्दी में भारत की ज़्यादातर आबादी शहरों में रहती थी। ;घद्ध 1857 के बाद जामा मसजिद में पाँच साल तक नमाश नहीं हुइर्। ;घद्ध नयी दिल्ली के मुवफाबले पुरानी दिल्ली की सापफ - सपफाइर् पर ज़्यादा़पैसा खचर् किया गया। 2.रिक्त स्थान भरें: ;कद्ध सपफलतापूवर्क गुंबद का इस्तेमाल करने वाली पहली इमारत ................ थी। ;खद्ध नयी दिल्ली और शाहजहाँनाबाद की रूपरेखा तय करने वाले दो वास्तुकार ................. और ................. थे। ;गद्ध अंग्रेश भीड़ भरे स्थानों को ................. मानते थे। ;घद्ध ................. के नाम से 1888 में एक विस्तार योजना तैयार की गइर्। 3.नयी दिल्ली और शाहजहाँनाबाद की नगर योजना में तीन पफवर्फ ढूँढ़ें। 4.मद्रास जैसे शहरों के फ्गोरेय् इलाकों में कौन लोग रहते थे? 5 विशहरीकरण का क्या मतलब है? 6 अंग्रेशों ने दिल्ली में ही विशाल दरबार क्यों लगाया जबकि दिल्ली राजधानी नहीं थी। 7 पुराना दिल्ली शहर बि्रटिश शासन के तहत किस तरह बदलता गया? 8 विभाजन से दिल्ली के जीवन पर क्या असर पड़ा? 9.अपने शहर या आसपास के किसी शहर के इतिहास का पता लगाएँ। देखें कि वह कब और वैफसे पैफला तथा समय के साथ उसमें क्या बदलाव आए हैं। आप बाशारों, इमारतों, सांस्वृफतिक संस्थानों और बस्ितयों का इतिहास दे सकते हैं। 10.अपने शहर, वफस्बे या गाँव के कम से कम दस व्यवसायों की सूची ़बनाएँ। पता लगाएँ कि ये व्यवसाय कब से चले आ रहे हैं। इस सूची से इस इलाके में आए बदलावों के बारे में क्या पता चलता है? टिप्पणी

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