5 जब जनता बग़्ाावत करती है 1857 और उसके बाद नीतियाँ और लोग पिछले अध्यायों में आपने इर्स्ट इंडिया वंफपनी की नीतियों और जनता पर उसके प्रभावों के बारे में पढ़ा। इन नीतियों से राजाओं, रानियों, किसानों, शमींदारों, आदिवासियों, सिपाहियों, सब पर तरह - तरह से असर पड़े। आप यह भी देख चुके हैं कि जो नीतियाँ और कारर्वाइयाँ जनता के हित में नहीं होतीं या जो उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं उनका लोग किस तरह विरोध करते हैं। नवाबों की छिनती सत्ता अठारहवीं सदी के मध्य से ही राजाओं और नवाबों की ताकत छिनने लगी थी। उनकी सत्ता और सम्मान, दोनों खत्म होते जा रहे थे। बहुत सारे दरबारों में रेिाडेंट तैनात कर दिए गए थे। स्थानीय शासकों की स्वतंत्राता घटती जा रही थी। उनकी सेनाओं को भंग कर दिया गया था। उनके राजस्व वसूली के अिाकार व इलाके एक - एक करके छीने जा रहे थे। बहुत सारे स्थानीय शासकों ने अपने हितों की रक्षा के लिए वंफपनी के साथ बातचीत भी की। उदाहरण के लिए, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाइर् चाहती थीं कि वंफपनी उनके पति की मृत्यु के बाद उनके गोद लिए हुए बेटे को चित्रा 1 - सिपाही और किसान विद्रोह के लिए ताकत जुटाते हैं। यह विद्रोह 1857 में उत्तर भारत के मैदानों में पैफल गया था। गतिवििा कल्पना कीजिए कि आप वंफपनी की सेना में सिपाही हैं। आप नहीं चाहते कि आपका भतीजा वंफपनी की पफौज में नौकरी करे। आप उसे क्या कारण बताएँगे? राजा मान ले। पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्रा नाना साहेब ने भी वंफपनी से आग्रह किया कि उनके पिता को जो पेंशन मिलती थी वह मृत्यु के बाद उन्हें मिलने लगे। अपनी श्रेष्ठता और सैनिक ताकत के नशे में चूर वंफपनी ने इन निवेदनों को ठुकरा दिया। अवध की रियासत अंग्रेशों के कब्शे में जाने वाली आख्िारी रियासतों में से थी। 1801 में अवध पर एक सहायक संध्ि थोपी गयी और 1856 में अंग्रेशों ने उसे अपने कब्शे में ले लिया। गवनर्र - जनरल डलहौज़ी ने ऐलान कर दिया कि रियासत का शासन ठीक से नहीं चलाया जा रहा है इसलिए शासन को दुरुस्त करने के लिए बि्रटिश प्रभुत्व जरूरी है। वंफपनी ने मुग़्ालों के शासन को खत्म करने की भी पूरी योजना बना ली थी। वंफपनी द्वारा जारी किए गए सिक्कों पर से मुग़्ाल बादशाह का नाम हटा दिया गया। 1849 में गवनर्र जनरल डलहौशी ने ऐलान किया कि बहादुर शाह शपफर की मृत्यु के बाद बादशाह के परिवार को लाल व्ि़ाफले से निकाल कऱउसे दिल्ली में कहीं और बसाया जाएगा। 1856 में गवनर्र - जनरल वैफनिंग ने प़़़्ौफसला किया कि बहादुर शाह शपफर आख्िारी मुगल बादशाह होंगे। उनकी मृत्यु के बाद उनके किसी भी वंशज को बादशाह नहीं माना जाएगा। उन्हें केवल राजवुफमारों के रूप में मान्यता दी जाएगी। किसान और सिपाही गाँवों में किसान और शमींदार भारी - भरकम लगान और कर वसूली के सख्त तौर - तरीकों से परेशान थे। बहुत सारे लोग महाजनों से लिया कशर् नहीं लौटा पा रहे थे। इसके कारण उनकी पीढि़यों पुरानी शमीनें हाथ से निकलती जा रही थीं। वंफपनी के तहत काम करने वाले भारतीय सिपाहियों के असंतोष की अपनी वजह थी। वे अपने वेतन, भत्तों और सेवा शतार्ें के कारण परेशान थे। कइर् नए नियम उनकी धामिर्क भावनाओं और आस्थाओं को ठेस पहुँचाते थे। क्या आप जानते हैं कि उस शमाने में बहुत सारे लोग समुद्र पार नहीं जाना चाहते थे। उन्हें लगता था कि समुद्र यात्रा से उनका धमर् और जाति भ्रष्ट हो जाएँगे। जब 1824 में सिपाहियों को वंफपनी की ओर से लड़ने के लिए समुद्र के रास्ते बमार् जाने का आदेश मिला तो उन्होंने इस हुक्म को मानने से इनकार कर दिया। उन्हें शमीन के रास्ते से जाने में ऐतराश नहीं था। सरकार का हुक्म न मानने के कारण उन्हें सख्त सशा दी गइर्। क्योंकि यह मुद्दा अभी खत्म नहीं हुआ था इसलिए 1856 में वंफपनी को एक नया कानून बनाना पड़ा। इस कानून में साप़्ाफ कहा गया था कि अगर कोइर् व्यक्ित वंफपनी की सेना में नौकरी करेगा तो शरूरत पड़ने पर उसे समुद्र पार भी जाना पड़ सकता है। सिपाही गाँवों के हालात से भी परेशान थे। बहुत सारे सिपाही खुद किसान थे। वे अपने परिवार गाँवों में छोड़कर आए थे। लिहाशा, किसानों का गुस्सा जल्दी ही सिपाहियों में भी पैफल गया।सुधारों पर प्रतिवि्रफया अंग्रेशों को लगता था कि भारतीय समाज को सुधारना जरूरी है। सती प्रथा को रोकने और विधवा विवाह को बढ़ावा देने के लिए कानून बनाए गए। अंग्रेशी भाषा की श्िाक्षा को जमकर प्रोत्साहन दिया गया। 1830 के बाद वंफपनी ने इर्साइर् मिशनरियों को खुलकर काम करने और यहाँ तक कि शमीन व संपत्ित जुटाने की भी छूट दे दी। 1850 में एक नया कानून बनाया गया जिससे इर्साइर् धमर् को अपनाना और आसान हो गया। इस कानून में प्रावधान किया गया था कि अगर कोइर् भारतीय व्यक्ित इर्साइर् धमर् अपनाता है तो भी पुरखों की संपत्ित पर उसका अिाकार पहले जैसा ही रहेगा। बहुत सारे भारतीयों को यकीन हो गया था कि अंग्रेश उनका धमर्, उनके सामाजिक रीति - रिवाज और परंपरागत जीवनशैली को नष्ट कर रहे हैं। दूसरी तरपफ ऐसे भारतीय भी थे जो मौजूदा सामाजिक व्यवस्था में बदलाव चाहते थे। इन सुधारकों और उनके सुधार आंदोलनों के बारे में आप अध्याय 7 में पढ़ेंगे। जनता की नजर से उस शमाने में लोग अंग्रेश शासन के बारे में क्या सोच रहे थे, इसका जायजा लेने के लिए आप ड्डोत 1 और 2 को पढ़ें। ड्डोत 1 चैरासी नियमों की सूची यहाँ महाराष्ट्र के एक गाँव में रहने वाले ब्राह्मण विष्णुभट्ट गोडसे द्वारा लिख्िात पुस्तक माझा प्रवास के वुफछ अंश दिए गए हैं। विष्णुभट्ट और उनके चाचा मथुरा में आयोजित किए जा रहे एक यज्ञ में भाग लेने के लिए निकले थे। विष्णुभट्ट लिखते हैं कि रास्ते में उनकी मुलावफात वुफछ सिपाहियों़से हुइर् जिन्होंने उन्हें सलाह दी कि वे वापस लौट जाएँ क्योंकि तीन दिन के भीतर चारों तरपफ कोहराम मच जाएगा। सिपाहियों ने जो कहा वह इस प्रकार था: अंग्रेश सरकार हिंदुओं और मुसलमानों के धमर् को नष्ट करने पर आमादा है... उन्होंने चैरासी नियमों की एक सूची बनाइर् है और कलकत्ता में सारे राजाओं और राजवुफमारों की मौजूदगी में उसका ऐलान कर दिया है। उन्होंने ;सिपाहियों नेद्ध बताया कि राजा इन नियमों को मानने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने अंग्रेशों को घातक परिणामों की चेतावनी दी है। राजाओं ने कहा है कि अगर ये नियम लागू किए गए तो भारी उथल - पुथल मच जाएगी... कि राजा भारी गुस्से में अपनी राजधानियों को लौट गए हैं... तमाम बड़े लोग योजनाएँ बना रहे हैं। धमर्यु( के लिए तारीख तय कर ली गइर् थी और मेरठ छावनी से एक गुप्त योजना तैयार करके विभ्िान्न छावनियों में भेज दी गइर् थी। विष्णुभट्ट गोडसे, माझा प्रवास पृष्ठ 23.24ण् ड्डोत 2 फ्जल्दी ही हर टुकड़ी में उत्तेजना छा गइर्य् उस दौर की एक और झलक सूबेदार सीताराम पांडे के संस्मरणों में मिलती है। सीताराम पांडे को 1812 में बंगाल नेटिव आमीर् में सिपाही के तौर पर भतीर् किया गया था। उन्होंने 48 साल तक नौकरी की और 1860 में वे सेवानिवृत हुए। उन्होंने बगावत को दबाने में अंग्रेशों की मदद़की हालाँकि उनका बेटा भी विद्रोहियों के साथ था और अंग्रेशों ने उसे सीताराम की आँखों के सामने ही मार डाला था। अपने सेवानिवृती के बाद उनके कमान अपफसर नाॅरगेट ने उन्हें अपने़संस्मरण लिखने के लिए प्रेरित किया। सीताराम ने 1861 में अवधी भाषा में अपने संस्मरण लिखे जिनका नाॅरगेट ने अंग्रेशी में अनुवाद किया और प्रफाॅम सिपाॅय टू सूबेदार ;सिपाही से सूबेदार तकद्ध के नाम से प्रकाश्िात करवाया। सीताराम पांडे के संस्मरणों का एक अंश इस प्रकार था: मेरा मानना है कि अवध पर हुए कब्शे से सिपाहियों के भीतर गहरा अविश्वास भर गया था और वे सरकार के ख्िालाप्ाफ सािाशें रचने लगे थे। अवध के नवाब और दिल्ली बादशाह वेफ़नुमाइंदों को सेना की नब्श जानने के लिए पूरे भारत में भेज दिया गया। उन्होंने सिपाहियों की भावनाओं को और हवा दी। उन्होंने सिपाहियों को बताया कि विदेश्िायों ने बादशाह के साथ कितना बड़ा धोखा किया है। उन्होंने हशार झूठ गढ़ डाले और सिपाहियों को अपने मालिकों, ़अंग्रेशों के ख्िालापफ बगावत करने के लिए उकसाया ताकि दिल्ली में बादशाह को दोबारा गद्दी पर बैठाया जा सके। उनकी दलील थी कि अगर सिपाही मिलकर काम करें और इन सुझावों पर अमल करें तो सेना ऐसा कर सकती है। चित्रा 3 - मेरठ में विद्रोही सिपाही अपफसरों पर हमला करते हैं, उनके घरों में घुस जाते हैं और इमारतों में आग लगा देते हैं। ड्डोत 2 जारी..गतिवििा 1.सीताराम और विष्णुभट्ट के मुताबिक लोगों के दिमाग में मुख्य चिंताएँ कौन सी थीं? 2.उनकी राय में शासकों ने क्या भूमिका निभाइर्? सिपाही क्या भूमिका निभाते दिखाइर् दे रहे थे?सैनिक विद्रोह जनविद्रोह बन गया यद्यपि शासक और प्रजा के बीच संघषर् कोइर् अनोखी बात नहीं होती लेकिन सैनिक विद्रोह - जब सिपाही कभी - कभी ये संघषर् इतने पैफल जाते हैं कि राज्य की सत्ता छिन्न - भ्िान्न हो जाती है। बहुत सारे लोग मानने लगे हैं कि उन सबका शत्राु एक है। इसलिए वे सभी कुछ करना चाहते हैं। इस तरह की स्िथति में हालात अपने हाथ में लेने के लिए लोगों को संगठित होना पड़ता है, उन्हें संचार, पहलवफदमी औऱआत्मविश्वास का परिचय देना होता है। भारत के उत्तरी भागों में 1857 में ऐसी ही स्िथति पैदा हो गइर् थी। पफतह़और शासन के 100 साल बाद इर्स्ट इंडिया वंफपनी को एक भारी विद्रोह से जूझना पड़ रहा था। मइर् 1857 में शुरू हुइर् इस बगावत ने भारत में वंफपनी़का अस्ितत्व ही खतरे में डाल दिया था। मेरठ से शुरू करके सिपाहियों ने कइर् जगह बगावत की। समाज के विभ्िान्न तबकों के असंख्य लोग विद्रोही़तेवरों के साथ उठ खड़े हुए। वुफछ लोग मानते हैं कि उन्नीसवीं सदी में उपनिवेशवाद के ख्िालापफ दुनिया भर में यह सबसे बड़ा सशस्त्रा संघषर् था। इकट्ठा होकर अपने सैनिक अपफसरों का हुक्म मानने से इनकार कर देते हैं। ़चित्रा 4 - कैवेलरी लाइनों में यु(। 3 जुलाइर् 1857 को 3,000 से ज्यादा विद्रोही बरेली से दिल्ली आ पहुँचे। उन्होंने यमुना को पार किया और बि्रटिश कैवेलरी चैकियों पर धावा बोल दिया। यह यु( पूरी रात चलता रहा। प्ि़़ाफरंगी - विदेशी। इस शब्द में अपमान का भाव आता है। मेरठ से दिल्ली तक 29 माचर् 1857 को युवा सिपाही - मंगल पां़डे - को बैरकपुर में अपने अपफसरों पर हमला करने के आरोप में पफाँसी पर लटका दिया गया। चंद दिन बाद मेरठ में तैनात वुफछ सिपाहियों ने नए कारतूसों के साथ प़्ाफौजी अभ्यास करने से इनकार कर दिया। सिपाहियों को लगता था कि उन कारतूसों पर गाय और सूअर की चबीर् का लेप चढ़ाया गया था। 85 सिपाहियों को नौकरी से निकाल दिया गया। उन्हें अपने अप़्ाफसरों का हुक्म न मानने के आरोप में 10 - 10 साल की सजा दी गइर्। यह 9 मइर् 1857 की बात है। मेरठ में तैनात दूसरे भारतीय सिपाहियों की प्रतिवि्रफया बहुत शबरदस्त रही। 10 मइर् को सिपाहियों ने मेरठ की जेल पर धावा बोलकर वहाँ बंद सिपाहियों को आशाद करा लिया। उन्होंने अंग्रेश अपफसरों पर हमला करके उन्हें मार गिराया।़उन्होंने बंदूक और हथ्िायार कब्शे में ले लिए और अंग्रेशों की इमारतों व संपत्ितयों को आग के हवाले कर दिया। उन्होंने प्ि़ाफरंगियों के ख्िालापफ यु( का ऐलान कर दिया। सिपाही पूरे देश में अंग्रेशों के शासन को खत्म करने पर आमादा थे। लेकिन सवाल यह था कि अंग्रेशों के जाने के बाद देश का शासन कौन चलाएगा। सिपाहियों ने इसका भी जवाब ढूढँ़ लिया था। वे मुग़्ाल सम्राट बहादुर शाह ज़प़फर को देश का शासन सौंपना चाहते थे। मेरठ के वुफछ सिपाहियों की एक टोली 10 मइर् की रात को घोड़ों पर सवार होकर मुँह अँधेरे ही दिल्ली पहुँच गइर्। जैसे ही उनके आने की ख़्ाबर पैफली, दिल्ली में तैनात टुकडि़यों ने भी बगावत कर दी। यहाँ भी अंग्रेश अपफसर मारे गए। देशी सिपाहियों ने हथ्िायार व गोला बारूद कब्शे में ले लिया और इमारतों को आग लगा दी। विजयी सिपाही लाल किले की दीवारों के आसपास जमा हो गए। वे बादशाह से मिलना चाहते थे। बादशाह अंग्रेशों की भारी ताकत से दो - दो हाथ करने को तैयार नहीं थे लेकिन सिपाही भी अडे़ रहे। आख्िारकार वे जबरन महल में घुस गए और उन्होंने बहादुर शाह ज़प़फर को अपना नेता घोष्िात कर दिया। बूढ़े बादशाह को सिपाहियों की यह माँग माननी पड़ी। उन्होंने देश भर के मुख्िायाओं और शासकों को चिट्ठी लिखकर अंग्रेशों से लड़ने के लिए भारतीय राज्यों का एक संघ बनाने का आह्नान किया। बहादुर शाह के इस एकमात्रा कदम के गहरे परिणाम सामने आए। अंग्रेशों से पहले देश के एक बहुत बड़े हिस्से पर मुग़्ाल साम्राज्य का ही शासन था। ज्यादातर छोटे शासक और रजवाड़े मुग़्ाल बादशाह के नाम पर ही अपने इलाकों का शासन चलाते थे। बि्रटिश शासन के विस्तार से भयभीत ऐसे बहुत सारे शासकों को लगता था कि अगर मुग़्ाल बादशाह दोबारा शासन स्थापित कर लंे तो वे मुग़्ाल आध्िपत्य में दोबारा अपने इलाकों का शासन बेपिफक्र होकर चलाने लगेंगे। अंग्रेशों को इन घटनाओं की उम्मीद नहीं थी। उन्हें लगता था कि कारतूसों के मुद्दे पर पैदा हुइर् उथल - पुथल वुफछ समय में शांत हो जाएगी। लेकिन जब बहादुर शाह ज़प़फर ने बगावत को अपना समथर्न दे दिया तो स्िथति रातोरात ़बदल गइर्। अकसर ऐसा होता है कि जब लोगों को कोइर् रास्ता दिखाइर् देने लगता है तो उनका उत्साह और साहस बढ़ जाता है। इससे उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत, उम्मीद और आत्मविश्वास मिलता है। बग़्ाावत पैफलने लगी जब दिल्ली से अंग्रेशों के पैर उखड़ गए तो लगभग एक हफ्रते तक कहीं कोइर् विद्रोह नहीं हुआ। शाहिर है ख़बर पैफलने में भी वुफछ समय तो लगना ही था। लेकिन पिफर तो विद्रोहों का सिलसिला ही शुरू हो गया। एक के बाद एक, हर रेजिमेंट में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया और वे चित्रा 5 - जैसे - जैसे विद्रोह पैफला,दिल्ली, कानपुर व लखनउफ जैसे मुख्य बिंदुओं पर दूसरी टुकडि़यों का साथ देने छावनियों में अंग्रेश अप़्ाफसरों को मारा को निकल पड़े। उनकी देखा - देखी कस्बों और गाँवों के लोग भी बग्ाावत के रास्ते पर चलने लगे। वे स्थानीय नेताओं, शमींदारों और मुख्िायाओं के पीछे संगठित हो गए। ये लोग अपनी सत्ता स्थापित करने और अंग्रेशों से लोहा लेने को तैयार थे। स्वगीर्य पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्रा नाना साहेब कानपुर के पास रहते थे। उन्होंने सेना इकट्ठा की और बि्रटिश सैनिकों को शहर से खदेड़ दिया। उन्होंने खुद को पेशवा घोष्िात कर दिया। उन्होंने ऐलान किया कि वह बादशाह बहादुर शाह शप़्ाफर के तहत गवनर्र हैं। लखनउफ की गद्दी से हटा दिए गए नवाब वाजिद अली शाह के बेटे बिरजिस व़फद्र को नया नवाब घोष्िात कर दिया गया। ़जाने लगा। चित्रा 6 - बि्रटिश टुकडि़याँ विद्रोहियों पर हमला करती हैं जिन्होंने दिल्ली के लाल व्ि़ाफले ;दाएँद्ध तथा सलीमगढ़ किले ;बाएँद्ध पर कब्शा किया हुआ था।बिरजिस व़फद्र ने भी बहादुर शाह ज़प़फर को अपना बादशाह मान लिया। उनकी माँ बेगम हज़रत महल ने अंग्रेशों के ख्िालापफ विद्रोहों को बढ़ावा देने़में बढ़ - चढ़कर हिस्सा लिया। झाँसी में रानी लक्ष्मीबाइर् भी विद्रोही सिपाहियों के साथ जा मिलीं। उन्होंने नाना साहेब के सेनापति ताँत्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेशों को भारी चुनौती दी। विद्रोही टुकडि़यों के सामने अंग्रेशों की संख्या बहुत कम थी। बहुत सारे मोचोर्ं पर उनकी जबरदस्त हार हुइर्। इससे लोगों को यवफीन हो गया कि अब़अंग्रेशों का शासन खत्म हो चुका है। अब लोगों को विद्रोहों में वूफद पड़ने का गहरा आत्मविश्वास मिल गया था। खासतौर से अवध के इलाके में चैतरपफा बग़ावत की स्िथति थी। 6 अगस्त 1857 को लेिटनेंट कनर्ल टाइटलर ने अपने कमांडर - इन - चीपफ को टेलीग्राम भेजा जिसमें उसने अंग्रेशों के भय को़व्यक्त किया था: फ्हमारे लोग विरोिायों की संख्या और लगातार लड़ाइर् से थक गए हैं। एक - एक गाँव हमारे ख्िालापफ है। शमींदार भी हमारे ख्िालाप़्ाफ़खड़े हो रहे हैं।य् इस दौरान बहुत सारे महत्वपूणर् नेता सामने आए। उदाहरण के लिए, पैफजाबाद के मौलवी अहमदुल्ला शाह ने भविष्यवाणी कर दी कि अंग्रेशों का़शासन जल्दी ही खत्म हो जाएगा। वह समझ चुके थे कि जनता क्या चाहती है। इसी आधार पर उन्होंने अपने समथर्कों की एक विशाल संख्या जुटा ली। अपने समथर्कों के साथ वे भी अंग्रेशों से लड़ने लखनउफ जा पहुँचे। दिल्ली में अंग्रेशों का सपफाया करने के लिए बहुत सारे ग़्ााशी यानी धमर्यो(ा इकट्ठा़हो गए थे। बरेली के सिपाही बख्त खान ने लड़ाकों की एक विशाल टुकड़ी के साथ दिल्ली की ओर वूफच कर दिया। वह इस बगावत में एक मुख्य व्यक्ित साबित हुए। बिहार के एक पुराने शमींदार वुँफवर सिंह ने भी विद्रोही सिपाहियों का साथ दिया और महीनों तक अंग्रेशों से लड़ाइर् लड़ी। तमाम इलाकों के नेता और लड़ाके इस यु( में हिस्सा ले रहे थे। वंफपनी का पलटवार इस उथल - पुथल के बावजूद अंग्रेशों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। वंफपनी ने अपनी पूरी ताकत लगाकर विद्रोह को वुफचलने का पैफसला लिया। उन्होंने इंग्लैंड से और प़्ाफौजी मँगवाए, विद्रोहियों को जल्दी सशा देने के लिए नए कानून बनाए और विद्रोह के मुख्य वेंफद्रों पर धावा बोल दिया। सितंबर 1857 में दिल्ली दोबारा अंग्रेशों के कब्शे में आ गइर्। अंतिम मुग़्ाल बादशाह बहादुर शाह शप़्ाफर पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गइर्। उनके बेटों को उनकी आँखों के सामने गोली मार दी गइर्। बहादुर शाह और उनकी पत्नी बेगम शीनत महल को अक्तूबर 1858 में रंगून जेल में भेज दिया गया। इसी जेल में नवंबर 1862 में बहादुर शाह शप़्ाफर ने अंतिम साँस ली। दिल्ली पर अंग्रेशों का कब्शा हो जाने का यह मतलब नहीं था कि विद्रोह खत्म हो चुका था। इसके बाद भी लोग अंग्रेशों से टक्कर लेते रहे। व्यापक बगावत की विशाल ताकत को वुफचलने के लिए अंग्रेशों को अगले दो साल तक लड़ाइर् लड़नी पड़ी। माचर् 1858 में लखनउफ अंग्रेशों के कब्शे में चला गया। जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाइर् की श्िाकस्त हुइर् और उन्हें मार दिया गया। ताँत्या टोपे मध्य भारत के जंगलों में रहते हुए आदिवासियों और किसानों की सहायता से छापामार यु( चलाते रहे। जिस तरह पहले अंग्रेशों के ख्िालाप़्ाफ मिली सपफलताओं से विद्रोहियों को उत्साह मिला था उसी तरह विद्रोही ताकतों की हार से लोगों की हिम्मत टूटने लगी। बहुत सारे लोगों ने विद्रोहियों का साथ छोड़ दिया। अंग्रेशों ने भी लोगोंचित्रा 7: विद्रोही सिपाही मेरठ से दिल्ली की तरपफ वूफच करते हैं। शुरू में, अंग्रेशी सेनाओं को दिल्ली की भारी किले - बंदी को तोड़ने में मुश्िकल हुइर्। 3 सितंबर 1857 को अंग्रेशी सेनाओं को और श्यादा हथ्िायार गोले आदि पहुंचाये गए। ये गाडि़यों पर लदे हुए थे जिन्हें हाथी खींच रहे थे और इनकी कतार 7 मील लंबी थी। गतिवििा चित्रा 8 - अंग्रेश टुकडि़याँ दिल्ली में घुसने के लिए कश्मीरी गेट को बारूद से उड़ा देती हैं। चित्रा 9 - अंग्रेश टुकडि़याँ कानपुर के पास विद्रोहियों को पकड़ लेती हैं। ध्यान से देखें कि किस तरह कलाकार ने अंग्रेश सिपाहियों को बहादुरी से विद्रोहियों पर धावा बोलते हुए दिखाया है। का विश्वास जीतने के लिए हर संभव प्रयास किया। उन्होंने वप़्ाफादार भूस्वामियों के लिए इर्नामों का ऐलान कर दिया। उन्हें आश्वासन दिया गया कि उनकी शमीन पर उनके परंपरागत अिाकार बने रहेंगे। जिन्होंने विद्रोह किया था उनसे कहा गया कि अगर वे अंग्रेशों के सामने समपर्ण कर देते हैं और अगर उन्होंने किसी अंग्रेश की हत्या नहीं की है तो वे सुरक्ष्िात रहेंगे और शमीन पर उनके अिाकार और दावेदारी बनी रहेगी। इसके बावजूद सैकड़ों सिपाहियों, विद्रोहियों, नवाबों और राजाओं पर मुवफदमे चलाए गए़और उन्हें पफाँसी पर लटका दिया गया। विद्रोह के बाद के साल अंग्रेशों ने 1859 के आख्िार तक देश पर दोबारा नियंत्राण पा लिया था लेकिन अब वे पहले वाली नीतियों के सहारे शासन नहीं चला सकते थे। अंग्रेशों ने जो अहम बदलाव किए वे निम्नलिख्िात हैं: 1. बि्रटिश संसद ने 1858 में एक नया कानून पारित किया और इर्स्ट इंडिया वंफपनी के सारे अिाकार बि्रटिश साम्राज्य के हाथ में सौंप दिए ताकि भारतीय मामलों को ज्यादा बेहतर ढंग से सँभाला जा सके। बि्रटिश मंत्रिामंडल के एक सदस्य को भारत मंत्राी के रूप में नियुक्त किया गया। उसे भारत के शासन से संबंिात मामलों को सँभालने का जिम्मा सौंपा गया। उसे सलाह देने के लिए एक परिषद का गठन किया गया जिसे इंडिया काउंसिल कहा जाता था। भारत के गवनर्र - जनरल को वायसराय का ओहदा दिया गया। इस प्रकार उसे इंगलैंड के राजा/रानी का निजी प्रतिनििा घोष्िात कर दिया गया। पफलस्वरूप, अंग्रेश सरकार ने भारत के शासन की िाम्मेदारी सीधे अपने हाथों में ले ली। 2. देश के सभी शासकों को भरोसा दिया गया कि भविष्य में कभी भी उनके भूक्षेत्रा पर कब्शा नहीं किया जाएगा। उन्हें अपनी रियासत अपने वंशजों, यहाँ तक कि दत्तक पुत्रों को सौंपने की छूट दे दी गइर्। लेकिन उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि वे बि्रटेन की रानी को अपना अिापति स्वीकार करें। इस तरह, भारतीय शासकों को बि्रटिश साम्राज्य के अधीन शासन चलाने की छूट दी गइर्। 3. सेना में भारतीय सिपाहियों का अनुपात कम करने और यूरोपिय सिपाहियों की संख्या बढ़ाने का पैफसला लिया गया। यह भी तय किया गया कि अवध, बिहार, मध्य भारत और दक्ष्िाण भारत से सिपाहियों को भतीर् करने की बजाय अब गोरखा, सिखों और पठानों में से श्यादा सिपाही भतीर् किए जाएँगे। 4. मुसलमानों की शमीन और संपत्ित बड़े पैमाने पर शब्त की गइर्। उन्हें संदेह व शत्राुता के भाव से देखा जाने लगा। अंग्रेशों को लगता था कि यह विद्रोह उन्होंने ही खड़ा 5. अंग्रेशों ने पैफसला किया कि वे भारत के लोगों के धमर् और सामाजिक़रीति - रिवाजों का सम्मान करेंगे। 6. भूस्वामियों और शमींदारों की रक्षा करने तथा शमीन पर उनके अिाकारों को स्थायित्व देने के लिए नीतियाँ बनाइर् गईं। इस प्रकार, 1857 के बाद इतिहास का एक नया चरण शुरू हुआ। 1.झाँसी की रानी लक्ष्मीबाइर् की अंग्रेशों से ऐसी क्या माँग थी जिसे अंग्रेशों ने ठुकरा दिया? 2.इर्साइर् धमर् अपनाने वालों के हितों की रक्षा के लिए अंग्रेशों ने क्या किया? 3.सिपाहियों को नए कारतूसों पर क्यों ऐतराश था? 4.अंतिम मुगल बादशाह ने अपने आख्िारी साल किस तरह बिताए?़आइए विचार करें 5.मइर् 1857 से पहले भारत में अपनी स्िथति को लेकर अंग्रेश शासकों के आत्मविश्वास के क्या कारण थे? 6.बहादुर शाह ज़प़फर द्वारा विद्रोहियों को समथर्न दे देने से जनता और राज - परिवारों पर क्या असर पड़ा? 7.अवध के बागी भूस्वामियों से समपर्ण करवाने के लिए अंग्रेशों ने क्या किया? 8.1857 की बगावत के पफलस्वरूप अंग्रेशों ने अपनी नीतियाँ किस तरह़बदलीं? आइए करके देखें 9.पता लगाएँ कि सन सत्तावन की लड़ाइर् के बारे में आपके इलाके या आपके परिवार के लोगों को किस तरह की कहानियाँ और गीत याद हैं? इस महान विद्रोह से संबंिात कौन सी यादें अभी लोगों को उत्तेजित करती हैं? 10.झाँसी की रानी लक्ष्मीबाइर् के बारे में और पता लगाएँ। आप उन्हें अपने समय की एक विलक्षण महिला क्यों मानते हैं? जून 1857 में विद्रोही टुकडि़यों ने रेजिडेंसी को कब्शे में ले लिया। बहुत सारी अंग्रेश औरतों, मदोर्ं और बच्चों ने रेजिडेंसी की इमारतों में पनाह ली हुइर् थी। विद्रोहियों ने इस पूरे परिसर को घेरकर उन पर गोलों से हमला किया। इसी तरह के एक गोले से अवध के चीप़्ाफ कमिश्नर हेनरी लाॅरेंस की भी मौत हो गइर् थी। हेनरी लाॅरेंस जिस कमरे में मरे वह इस चित्रा में दिखाइर् दे रहा है। गौर से देखें कि इमारतों पर बीते़दौर के निशान किस तरह बचे रह जाते हैं।

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