आदिवासी, दीकु और एक स्वणर् युग की कल्पना 1895 में बिरसा नाम के एक आदमी को बिहार में छोटानागपुर के जंगलों और गाँवों में घूमते देखा गया। लोग कहते थे कि उसके पास चमत्कारी शक्ितयाँ हैं - वह सारी बीमारियाँ दूर कर सकता था और अनाज की छोटी सी ढेरी को कइर् गुना बढ़ा देता था। बिरसा ने खुद यह ऐलान कर दिया था कि उसे भगवान ने लोगों की रक्षा दीवुफओं ;बाहरी लोगोंद्ध की गुलामी से आशाद कराने के लिए भेजा है। वुफछ समय के भीतर हशारों लोग बिरसा के पीछे चलने लगे। वे उसे भगवान मानते थे। उन्हें यवफीन था कि वह उनकी समस्याएँ दूर करने आया है।़बिरसा का जन्म एक मुंडा परिवार में हुआ था। मुंडा एक जनजातीय समूह है जो छोटानागपुर में रहता है। बिरसा के समथर्कों में इलाके के दूसरे आदिवासी - संथाल और उराँव - भी शामिल थे। ये सभी अपने आसपास आ रहे बदलावों और अंग्रेश शासन के कारण पैदा हो रही समस्याओं से बेचैन थे। उनकी परिचित जीवन प(ति नष्ट होती दिखाइर् दे रही थी, आजीविका खतरे में थी चित्रा 1: उड़ीसा के डोंगरिया वंफध् वफबीले की महिलाएँ़बाशार जाते हुए नदी से गुजर रही हैं। और धमर् छिन्न - भ्िान्न हो रहा था। बिरसा किन समस्याओं को हल करना चाहता था? जिन्हें दीवुफ कहा जा रहा था, वे बाहरी लोग कौन थे? उन्होंने इलाके के लोगों को गुलाम वैफसे बना लिया था? अंग्रेशों वेफ़राज में आदिवासियों के साथ क्या हो रहा था? आदिवासियों का जीवन किस तरह बदल रहा था? इस अध्याय में हम ऐसे ही वुफछ सवालों पर विचार करेंगे। पिछले साल आपने आदिवासी समाजों के बारे में पढ़ा ाफबीलों के रीति - रिवाज और रस्में ब्राह्मणों द्वारा निधार्रित रीति - रिवाजों और रस्मों से बहुत अलग थीं। इन समाजों में ऐसे गहरे सामाजिक भेद भी नहीं थे जो जाति पर आधारित समाजों में दिखाइर् देते हैं। एक वफबीले के सारे़लोग वुफटुम्ब के बँधनों में बँधे होते थे। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि आदिवासियों के बीच कोइर् आथ्िार्क और सामाजिक पफवर्फ नहीं था।़था। ज़्यादातर व़्परती - वुफछ समय के लिए बिना खेती छोड़ दी जाने वाली शमीन ताकि उसकी मिट्टी दोबारा उपजाउफ हो जाए। साल - एक पेड़। महुआ - एक पूफल जिसे खाया जाता है या शराब बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। चित्रा 2 - डोंगरिया वंफध् वफबीले की़औरतें पंडानु की पत्ितयाँ इकट्ठा करके ला रही हैं। इन पत्ितयों से पत्तलें बनाइर् जाएँगी। जनजातीय समूह किस तरह जीते थे? उन्नीसवीं सदी तक देश के विभ्िान्न भागों में आदिवासी तरह - तरह की गतिवििायों में सवि्रफय थे। वुफछ झूम खेती करते थे उनमें से वुफछ समुदाय झूम खेती करते थे। झूम खेती घुमंतू खेती को कहा जाता है। इस तरह की खेती अिाकांशतः जंगलों में छोटे - छोटे भूखण्डों पर की जाती थी। ये लोग शमीन तक धूप लाने के लिए पेड़ों के उफपरी हिस्से काट देते थे और शमीन पर उगी घास - पूफस जलाकर सापफ कर देते थे। इसके बाद वे घास - पूफस के जलने पर पैदा हुइर् राख को खाली शमीन पर छिड़क देते थे। इस राख में पोटाश होती थी जिससे मिट्टी उपजाउफ हो जाती थी। वे वुफल्हाड़ों से पेड़ों को काटते थे और कुदालों से शमीन की उफपरी सतह को खुरच देते थे। वे खेतों को जोतने और बीज रोपने की बजाय उन्हें बस खेत में बिखेर देते थे। जब एक बार प़्ाफसल तैयार हो जाती थी तो उसे काटकर वे दूसरी जगह के लिए चल पड़ते थे। जहाँ से उन्होंने अभी प़्ाफसल काटी थी वह जगह कइर् साल तक परती पड़ी रहती थी। घुमंतू किसान मुख्य रूप से पूवार्ेत्तर और मध्य भारत की पवर्तीय व जंगली पटि्टयों में ही रहते थे। इन आदिवासी समुदायों की जिंदगी जंगलों में बेरोकटोक आवाजाही और पफसल उगाने के लिए शमीन और जंगलों के इस्तेमाल पर ़आधारित थी। वे केवल इसी तरीके से घुमंतू खेती कर सकते थे। वुफछ श्िाकारी और संग्राहक थे बहुत सारे इलाकों में आदिवासी समूह पशुओं का श्िाकार करके और वन्य उत्पादों को इकट्ठा करके अपना काम चलाते थे। वे जंगलों को अपनी िांदगी के लिए बहुत शरूरी मानते थे। उड़ीसा के जंगलों में रहने वाला खोंड समुदाय इसी तरह का एक समुदाय था। इस समुदाय के लोग टोलियाँ बना कर श्िाकार पर निकलते थे और जो हाथ लगता था उसे आपस में बाँट लेते थे। वे जंगलों से मिले पफल और जड़ें खाते थे। खाना पकाने के लिए वे साल और महुआ के बीजों का तेल इस्तेमाल करते थे। इलाज के लिए वे बहुत सारी जंगली जड़ी - बूटियों का इस्तेमाल करते थे और जंगलों से इकट्ठा हुइर् चीजों को स्थानीय बाशारों में बेच देते थे। जब भी स्थानीय बुनकरों और चमड़ा कारीगरों को कपड़े व चमड़े की रँगाइर् के लिए वुफसुम और पलाश के पूफलों की शरूरत होती थी तो वे खोंड समुदाय के लोगों से ही कहते थे। इन समुदायों को चावल और अन्य अनाज कहाँ से मिलते थे? कइर् बार तो चीशों की अदला - बदली से काम चल जाता था। वे अपने कीमती वन उत्पादों के बदले शरूरत की चीशें ले लेते थे। कइर् बार उन्हें शरूरी चीजें खरीदने के लिए अपनी मुट्ठी भर आमदनी का सहारा लेना पड़ता था। उनमें से कइर् लोग आस पास के गाँवों में नौकरी भी करते थे। कोइर् बोझ ढोता था तो कोइर् सड़क निमार्ण कायोर्ं में नौकरी करता था। कइर् आदिवासी खेत मशदूर थे। जब वन उत्पाद कम पड़ जाते थे तो आदिवासियों को मशदूरी के लिए ज्यादा भटकना पड़ता था। लेकिन उनमें से बहुत सारे समुदाय - जैसे मध्य भारत के बैगा - औरों के लिए काम करने से कतराते थे। बैगा खुद को जंगल की संतान मानते थे जो केवल जंगल की उपज पर ही िांदा रह सकती है। मशदूरी करना बैगाओं के लिए अपमान की बात थी। जो चीशें आसपास पैदा नहीं होती थीं उन्हें हासिल करने के लिए आदिवासियों को खरीद - प़्ाफरोख्त भी करनी पड़ती थी। इसकी वजह से वे कभी - कभी व्यापारियों और महाजनों पर आश्रित हो जाते थे। व्यापारी बेचने की चीजें लेकर आते थे और भारी कीमत पर चीशें बेचते थे। सूदखोर महाजन भी आदिवासियों को कशार् तो देते थे लेकिन उसका ब्याज बहुत श्यादा होता था। इस तरह बाजार और वाण्िाज्य ने आदिवासियों को कशर् और गरीबी में ढकेल दिया था। लिहाशा, वे महाजनों और व्यापारियों को बाहरी शैतान और अपनी सारी मुसीबतों की जड़ मानने लगे थे। वुफछ जानवर पालते थे बहुत सारे आदिवासी समूह जानवर पालकर अपनी ¯शदगी चलाते थे। वे चरवाहे थे जो मौसम के हिसाब से मवेश्िायों या भेड़ों के रेवड़ लेकर यहाँ से वहाँ जाते रहते थे। जब एक जगह घास खत्म हो जाती थी तो वे दूसरे इलाके में चले जाते थे। पंजाब के पहाड़ों में रहने वाले वन गुज्जर और आंध्र प्रदेश के लबाडि़या आदि समुदाय गाय - भैंस के झुंड पालते थे। वुफल्लू के गद्दी समुदाय के लोग गड़रिये थे और कश्मीर के बकरवाल बकरियाँ पालते थे। अगले साल इतिहास की पाठ्यपुस्तक में आप उनके बारे में विस्तार से पढ़ेंगे। वुफछ लोग एक जगह खेती करते थे उन्नीसवीं सदी से पहले ही बहुत सारे जनजातीय वफबीले एक जगह टिक़कर खेती करने लगे थे। वे बार - बार जगह बदलने की बजाय साल - दर - साल एक ही जगह खेती करते थे। वे हलों का इस्तेमाल करने लगे थे और धीरे - धीरे उन्हें शमीन पर अिाकार भी मिलते जा रहे थे। बहुत सारे समुदायों में छोटानागपुर के मुंडाओं की तरह शमीन पूरे व़्ाफबीले की संपत्ित होती थी। वुफल के सभी सदस्यों को उन मूल निवासियों का वंशज माना जाता था जिन्होंने सबसे पहले आकर शमीन को साप़्ाफ किया था। लिहाशा, शमीन पर सभी का बराबर हवफ होता था। पिफर भी, अकसर ऐसा होता था कि वुफल वेफ़वुफछ लोग औरों से श्यादा ताकत जुटा लेते थे। वुफछ मुख्िाया बन जाते थे और बाकी उनके अनुयायी होते थे। जो ताकतवर होते थे वे खुद खेती करने की बजाय अकसर अपनी शमीन बँटाइर् पर दे देते थे। बि्रटिश अपफसरों को गोंड और संथाल जैसे एक जगह ठहरकर रहने वाले़आदिवासी समूह श्िाकारी - संग्राहक या घुमंतू खेती करने वालों के मुकाबले ज्यादा सभ्य दिखाइर् देते थे। जंगलों में रहने वालों को जंगली और बबर्र माना जाता था। अंग्रेशों को लगता था कि उन्हें स्थायी रूप से एक जगह बसाना और सभ्य बनाना शरूरी है। औपनिवेश्िाक शासन से आदिवासियों के जीवन पर क्या असर पड़े? बि्रटिश शासन के दौरान आदिवासी समूहों का जीवन बदल गया। आओ देखें कि ये बदलाव क्या थे। आदिवासी मुख्िायाओं का क्या हुआ? अंग्रेशों के आने से पहले बहुत सारे इलाकों में आदिवासियों के मुख्िायाओं का महत्वपूणर् स्थान होता था। उनके पास औरों से ज्यादा आथ्िार्क ताकत होती थी और वे अपने इलाके पर नियंत्राण रखते थे। कइर् जगह उनकी अपनी पुलिस होती थी और वे शमीन एवं वन प्रबंधन के स्थानीय नियम खुद बनाते थे। बि्रटिश शासन के तहत आदिवासी मुख्िायाओं के कामकाज और अिाकार काप़्ाफी बदल गए थे। उन्हें कइर् - कइर् गाँवों पर शमीन का मालिकाना तो मिला रहा लेकिन उनकी शासकीय शक्ितयाँ छिन गइर्ं और उन्हें बि्रटिश अिाकारियों द्वारा बनाए गए नियमों को मानने के लिए बाध्य कर दिया। उन्हें अंग्रेशों को नशराना देना पड़ता था और अंग्रेशों के प्रतिनििा की हैसियत से अपने समूहों को अनुशासन में रखना होता था। पहले उनके पास जो ताकत थी अब वह नहीं रही। वे परंपरागत कामों को करने से लाचार हो गए। घुमंतू काश्तकारों का क्या हुआ? बेवड़ - मध्य प्रदेश में घुमंतू खेती के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द। ऐसे समूहों से अंग्रेशों को काप़्मदद करता है।ाफी परेशानी थी जो यहाँ - वहाँ भटकते रहते थे और एक जगह ठहरकर नहीं रहते थे। वे चाहते थे कि आदिवासियों के आदिवासी, दीवुफ और एक स्वणर् युग की कल्पना 43 चित्रा 6 - गुजरात के एक जंगल में खेती करती भील औरतें। घुमंतू खेती गुजरात के बहुत सारे वन क्षेत्रों में अभी भी जारी है। आप देख सकते हैं कि यहाँ पेड़ों को काट दिया गया है और खेती के लिए शमीन सापफ कर दी गइर् है।़समूह एक जगह स्थायी रूप से रहें और खेती करें। स्थायी रूप से एक जगह रहने वाले किसानों को नियंत्रिात करना आसान था। अंग्रेश अपने शासन के लिए आमदनी का नियमित स्रोत भी चाहते थे। पफलस्वरूप उन्होंने शमीन के बारे में वुफछ नियम लागू कर दिए। उन्होंने शमीन को मापकर प्रत्येक व्यक्ित का हिस्सा तय कर दिया। उन्होंने यह भी तय कर दिया कि किसे कितना लगान देना होगा। वुफछ किसानों को भूस्वामी और दूसरों को पट्टेदार घोष्िात किया गया। जैसा कि आप देख चुके हैं ;अध्याय 2द्ध, पट्टेदार अपने भूस्वामियों का भाड़ा चुकाते थे और भूस्वामी सरकार को लगान देते थे। झूम काश्तकारों को स्थायी रूप से बसाने की अंग्रेशों की कोश्िाश बहुत कामयाब नहीं रही। जहाँ पानी कम हो और मिट्टी सूखी हो, वहाँ हलों से खेती करना आसान नहीं होता। बल्िक, हलों की मदद से खेती करने वाले झूम काश्तकारों को अकसर नुकसान ही हुआ क्योंकि उनके खेत अच्छी उपज नहीं दे पाते थे। इसलिए, पूवोर्त्तर राज्यों के झूम काश्तकार इस बात पर अड़े रहे कि उन्हें परंपरागत ढंग से ही जीने दिया जाए। व्यापक विरोध के पफलस्वरूप अंग्रेशों को आख्िारकार उनकी बात माननी पड़ी और ऐसे व़्ाफबीलों को जंगल के वुफछ हिस्सों में घुमंतू खेती की छूट दे दी गइर्। वन कानून और उनके प्रभाव जैसा कि आपने देखा है, आदिवासी समूहों का जीवन जंगलों से जुड़ा हुआ था। अतः, वन कानूनों में आए बदलावों से आदिवासियों के जीवन पर भी चित्रा 7 - आंध्र प्रदेश में धान के खेत में काम करते आदिवासी। समतल मैदानों और जंगलों में धान की खेती के बीच प़्ाफवर्फ को देखें। भारी असर पड़ा। अंग्रेशों ने सारे जंगलों पर अपना नियंत्राण स्थापित कर लिया था और जंगलों को राज्य की संपत्ित घोष्िात कर दिया था। वुफछ जंगलों को आरक्ष्िात वन घोष्िात कर दिया गया। ये ऐसे जंगल थे जहाँ अंग्रेशों की शरूरतों के लिए इमारती लकड़ी पैदा होती थी। इन जंगलों में लोगों को स्वतंत्रा रूप से घूमने, झूम खेती करने, पफल इकट्ठा करने या पशुओं का श्िाकार करने की इजाशत नहीं थी। ऐसी सूरत में झूम काश्तकार किस तरह िांदा रह सकते थे? इसलिए, उनमें से बहुतों को काम और रोजगार की तलाश में मजबूरन दूसरे इलाकों में जाना पड़ा। जैसे ही अंग्रेशों ने जंगलों के भीतर आदिवासियों के रहने पर पाबंदी लगा दी, उनके सामने एक समस्या पैदा हो गइर्। समस्या यह थी कि रेलवे स्लीपसर् के लिए पेड़ काटने और लकड़ी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए मशदूरों का इंतशाम कहाँ से किया जाए? औपनिवेश्िाक अध्िकारियों ने इसका भी एक हल ढूँढ़ निकाला। उन्होंने तय किया कि झूम काश्तकारों को जंगल में शमीन के छोटे टुकड़े दिए जाएँगे और उन्हें वहाँ खेती करने की भी छूट होगी बशतेर् गाँवों में रहने वालों को वन विभाग के लिए मशदूरी करनी होगी और जंगलों की देखभाल करनी होगी। इस तरह, बहुत सारे इलाकांे में वन विभाग ने सस्ते श्रम की आपूतिर् सुनिश्िचत करने के लिए वन गाँव बसा दिए। स्लीपर - लकड़ी के क्षैतिज तख्ते जिन पर रेल की पटरियाँ बिछाइर् जाती हैं। बहुत सारे आदिवासी समूहों ने औपनिवेश्िाक वन कानूनों का विरोध किया। उन्होंने नए नियमों का पालन करने से इनकार कर दिया और उन्हीं तौर - तरीकों से चलते रहे जिन्हें सरकार गैर - कानूनी घोष्िात कर चुकी है। कइर् बार उन्होंने खुलेआम बगावत भी कर दी।़1906 में सोंग्रम संगमा द्वारा असम में और 1930 के दशक में मध्य प्रांत में हुआ वन सत्याग्रह इसी तरह के विद्रोह थे। व्यापार की समस्या उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान जनजातीय समूहों ने पाया कि व्यापारी और महाजन जंगलों में जल्दी - जल्दी आने लगे हैं। वे वन उपज खरीदने, नव़्ाफद कशार् देने और आदिवासियों को मजदूरी पर रखने के लिए आ रहे थे। इन सारे बदलावों से क्या असर पड़ने वाले हैं, यह समझने में आदिवासियों को वुफछ समय लगा। यह समझने के लिए आइए रेशम उत्पादकों की स्िथति को देखें। अठारहवीं सदी में भारतीय रेशम की यूरोपीय बाशारों में भारी माँग थी। भारतीय रेशम की अच्छी गुणवत्ता सबको आकष्िार्त करती थी और भारत का नियार्त तेशी से बढ़ रहा था। जैसे - जैसे बाशार पैफला इर्स्ट इंडिया वंफपनी के अपफसर इस माँग को पूरा करने के लिए रेशम उत्पादन पर शोर देने लगे। हशार कृमिकोषों के लिए 3 - 4 रुपए मिलते थे। इसके बाद इन कृमिकोषों को बदर्वान या गया भेज दिया जाता था जहाँ उन्हें पाँच गुना कीमत पर बेचा जाता था। नियार्तकों और रेशम उत्पादकों के बीच कड़ी का काम करने वाले बिचैलियों को जमकरचित्रा 9 - चटाइर् बुनती एक मुनाप्ाफा होता था। रेशम उत्पादकों़़को बहुत मामूली प्हाजाँग औरत औरतों के लिए घरेलू काम सिपर्फ घर तक ही सीमित ़था। स्वाभाविक है कि बहुत नहीं था। वे खेतों और सारे आदिवासी समुदाय बाशार कारखानों में भी अपने बच्चों और व्यापारियों को अपना सबसे को साथ लेकर जाती थीं। बड़ा दुश्मन मानने लगे थे। काम की तलाश काम की तलाश में घर से दूर जाने वाले आदिवासियों की दशा तो और भी खराब थी। उन्नीसवीं सदी के आख्िार से ही चाय बागान पैफलने लगे थे। खनन उद्योग भी एक महत्वपूणर् उद्योग बन गया था। असम के चाय बागानों और झारखण्ड की़कोयला खादानों में काम करने के लिए आदिवासियों को बड़ी संख्या में भतीर् किया गया। इन लोगों को ठेकेदारों की मापर्फत भतीर् किया जाता था। ये ठेकेदार न केवल़उन्हें बहुत कम वेतन देते थे बल्िक उन्हें वापस घर भी लौटने नहीं देते थे। नशदीक से देखने पर उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्िदयों के दौरान देश के विभ्िान्न भागों में जनजातीय समूहों ने बदलते कानूनों, अपने व्यवहार पर लगी पाबंदियों, नए करों और व्यापारियों व महाजनों द्वारा किए जा रहे शोषण के ख्िालापफ कइर् बार बग़्ाावत की। 1831 - 32 ़में कोल आदिवासियों ने और 1855 में संथालों ने बग़्ाावत कर दी थी। मध्य भारत में बस्तर विद्रोह 1910 में हुआ और 1940 में महाराष्ट्र में वलीर् विद्रोह हुआ। बिरसा जिस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे वह भी इसी तरह का विद्रोह था। ड्डोत 3 बिरसा मुंडा बिरसा का जन्म 1870 के दशक के मध्य में हुआ। उनके पिता गरीब थे। बिरसा का बचपन भेड़ - बकरियाँ चराते, बाँसुरी बजाते और स्थानीय अखाड़ों में नाचते - गाते बीता था। उनकी परवरिश मुख्य रूप से बोहोंडा के आस - पास के जंगलों में हुइर्। गरीबी से लाचार बिरसा के पिता को काम की तलाश में जगह - जगह भटकना पड़ता था। लड़कपन में ही बिरसा ने अतीत में हुए मुंडा विद्रोहों की कहानियाँ सुन ली थीं। उन्होंने कइर् बार समुदाय के सरदारों ;मुख्िायाओंद्ध को विद्रोह का आह्नान करते देखा था। बिरसा के समुदाय के लोग ऐसे स्वणर् युग की बात किया करते थे जब मुंडा लोग दीकुओं के उत्पीड़न से पूरी तरह आशाद थे। सरदारों का कहना था कि एक बार पिफर उनके समुदाय के परंपरागत अिाकार बहाल हो जाएँगे। वे खुद को इलाके के मूल निवासियों का वंशज मानते थे और अपनी शमीन की लड़ाइर् ;मुल्क की लड़ाइर्द्ध लड़ रहे थे। वे लोगों को याद दिलाते थे कि उन्हें अपना साम्राज्य वापस पाना है। बिरसा स्थानीय मिशनरी स्वूफल में जाने लगे जहाँ उन्हें मिशनरियों के उपदेश सुनने का मौका मिला। वहाँ भी उन्होंने यही सुना कि मुंडा समुदाय स्वगर् का साम्राज्य हासिल कर सकता है और अपने खोये हुए अिाकार वापस पा सकता है। अगर वे अच्छे इर्साइर् बन जाएँ और अपनी फ्खराब आदतेंय् छोड़ दें तो ऐसा हो सकता है। बाद में बिरसा ने एक जाने - माने वैष्णव धमर् प्रचारक के साथ भी वुफछ समय बिताया। उन्होंने जनेउफ धारण किया और शु(ता व दया पर जोर देने लगे। अपनी किशोरावस्था में बिरसा जिन विचारों के संपवर्फ में आए, उनसे वह काप़्ाफी गहरे तौर पर प्रभावित थे। बिरसा का आंदोलन आदिवासी समाज को सुधारने का आंदोलन था। उन्होंने मुंडाओं से आह्नान किया कि वे शराब पीना वैष्णव - विष्णु की पूजा करने वाले वैष्णव कहलाते हैं। छोड़ दें, गाँवों को साप्ाफ रखें और डायन व जादू - टोने में विश्वास न करें। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि बिरसा ने मिशनरियों और हिंदू जमींदारों का भी लगातार विरोध किया। वह उन्हें बाहर का मानते थे जो मुंडा जीवन शैली को नष्ट कर रहे थे। 1895 में बिरसा ने अपने अनुयायियों से आह्नान किया कि वे अपने गौरवपूणर् अतीत को पुनजीर्वित करने के लिए संकल्प लें। वह अतीत के एक ऐसे स्वणर् युग - सतयुग - की चचार् करते थे जब मुंडा लोग अच्छा जीवन जीते थे, तटबंध बनाते थे, वुफदरती झरनों को नियंत्रिात करते थे, पेड़ और बाग लगाते थे, पेट पालने के लिए खेती करते थे। उस काल्पनिक युग में मुंडा अपने बिरादरों और रिश्तेदारों का खून नहीं बहाते थे। वे इर्मानदारी से जीते थे। बिरसा चाहते थे कि लोग एक बार पिफर अपनी शमीन पर खेती करें, एक जगह टिक कर रहें और अपने खेतों में काम करें। अंग्रेशों को बिरसा आंदोलन के राजनीतिक उद्देश्यों से बहुत ज्यादा परेशानी थी। यह आंदोलन मिशनरियों, महाजनों, हिंदू भूस्वामियों और सरकार को बाहर निकालकर बिरसा के नेतृत्व में मुंडा राज स्थापित करना चाहता था। ़यह आंदोलन इन्हीं ताकतों को मुंडाओं की सारी समस्याओं व कष्टों का स्रोत मानता था। अंग्रेशों की भूनीतियाँ उनकी परंपरागत भूमि व्यवस्था को नष्ट कर रही थीं, हिंदू भूस्वामी और महाजन उनकी शमीन छीनते जा रहे थे और मिशनरी उनकी परंपरागत संस्वृफति की आलोचना करते थे। जब आंदोलन पैफलने लगा तो अंग्रेशों ने सख्त कारर्वाइर् का प़्ौफसला लिया। उन्होंने 1895 में बिरसा को गिरफ्ऱतार किया और दंगे - प़्ाफसाद के आरोप में दो साल की सशा सुनायी। 1897 में जेल से लौटने के बाद बिरसा समथर्न जुटाते हुए गाँव - गाँव घूमने लगे। उन्होंने लोगों को उकसाने के लिए परंपरागत प्रतीकों और भाषा का इस्तेमाल किया। वे आह्नान कर रहे थे कि उनके नेतृत्व में साम्राज्य की स्थापना के लिए फ्रावणोंय् ;दीवुफ और यूरोपीयोंद्ध को तबाह कर दें। बिरसा के अनुयायी दीवुफ और यूरोपीय सत्ता के प्रतीकों को निशाना बनाने लगे। उन्होंने थाने और चचोर्ं पर हमले किए और महाजनों व शमींदारों की संपत्ितयों पर धावा बोल दिया। सप़्ोफद झंडा बिरसा राज का प्रतीक था। सन् 1900 में बिरसा की हैशे से मृत्यु हो गइर् और आंदोलन ठंडा पड़ गया। यह आंदोलन दो मायनों में महत्वपूणर् था। पहला - इसने औपनिवेश्िाक सरकार को ऐसे कानून लागू करने के लिए मशबूर किया जिनके जरिए दीवुफ लोग आदिवासियों की शमीन पर आसानी से वफब्शा न कर सवेंफ। दूसरा, इसने एक बार पिफर जता दिया कि अन्याय का विरोध करने और औपनिवेश्िाक शासन के विरु( अपने गुस्से को अभ्िाव्यक्त करने में आदिवासी सक्षम हैं। उन्होंने अपने खास अंदाश में, अपनी खास रस्मों और संघषर् के प्रतीकों के शरिए इस काम को अंजाम दिया। फिर से याद करें 1.रिक्त स्थान भरें: ;कद्ध अंग्रेशों ने आदिवासियों को ............... के रूप में वण्िार्त किया। ;खद्ध झूम खेती में बीज बोने के तरीके को .............. कहा जाता है। ;गद्ध मध्य भारत में बि्रटिश भूमि बंदोबस्त के अंतगर्त आदिवासी मुख्िायाओं को ............. स्वामित्व मिल गया। ;घद्ध असम के ............. और बिहार की ............... में काम करने के लिए आदिवासी जाने लगे। हमें नव़्ाफदी की क्या शरूरत! ऐसे बहुत सारे कारण हैं जिनकी वजह से आदिवासी और अन्य सामाजिक समूह प्रायः बाशार के लिए पैदावार नहीं करना चाहते। पापुआ न्यू गिनी के इस जनजातीय गीत में इस बात की झलक मिलती है कि वहाँ के आदिवासी बाशार को किस तरह देखते हैं। कहते हैं नकदी है बेकार का वूफड़ा - करकट बारिश ये रोक नहीं सकती और देती है तकलीपेंफ इन सरकारी मठाध्ीशों के लिए क्यों मैं जोश से करूँ काम क्यों मैं चढूँ नारियल के पेड़ पर? तो है नकदी पफसलें अच्छी लेकिन श्रीमान मुझे बताएँ अगर ख़रीदने को नहीं है वुफछ तो मैं चिन्ता करूँ क्यों? कोहेन, क्लावर्फ एवं हासवेल, सं., दि इकाॅनाॅमी आॅपफ सब्िसस्टेंस ़एग्रीकल्चर ;1970द्ध, में उ(ृत एक गीत पर आधारित। 2.सही या गलत बताएँ: ;कद्ध झूम काश्तकार शमीन की जुताइर् करते हैं और बीज रोपते हैं। ;खद्ध व्यापारी संथालों से कृमिकोष खरीदकर उसे पाँच गुना श्यादा कीमत पर बेचते थे। ;गद्ध बिरसा ने अपने अनुयायियों का आह्नान किया कि वे अपना शुिकरण करें, शराब पीना छोड़ दें और डायन व जादू - टोने जैसी प्रथाओं में यकीन न करें। ;घद्ध अंग्रेश आदिवासियों की जीवन प(ति को बचाए रखना चाहते थे। 3 बि्रटिश शासन में घुमंतू काश्तकारों के सामने कौन सी समस्याएँ थीं? 4 औपनिवेश्िाक शासन के तहत आदिवासी मुख्िायाओं की ताकत में क्या बदलाव आए? 5 दीकुओं से आदिवासियों के गुस्से के क्या कारण थे? 6 बिरसा की कल्पना में स्वणर् युग किस तरह का था? आपकी राय में यह कल्पना लोगों को इतनी आकषर्क क्यों लग रही थी? 7.अपने माता - पिता दोस्तों या श्िाक्षकों से बात करके बीसवीं सदी के अन्य आदिवासी विद्रोहों के नायकों के नाम पता करें। उनकी कहानी अपने शब्दों में लिखें।

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