3 ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना चित्रा 1 - 1765 में राॅबटर् क्लाइव मुग़्ाल बादशाह से बिहार और उड़ीसा की दीवानी ग्रहण करते हुए वंफपनी दीवान बन गइर् 12 अगस्त 1765 को मुग़्ाल बादशाह ने इर्स्ट इंडिया वंफपनी को बंगाल का दीवान तैनात किया। इस बात की पूरी संभावना है कि यह घटना मुट्ठी भर अंग्रेशों और हिंदुस्तानियों की मौजूदगी में राॅबटर् क्लाइव के तंबू में घटी होगी। लेकिन उफपर दिए गए चित्रा में इस घटना को एक भव्य समारोह के रूप में दिखाया गया है। यह चित्रा उस चित्राकार ने बनाया है जिसे राॅबटर् क्लाइव ने अपने जीवन की यादगार घटनाओं को चित्रिात करने का िाम्मा सौंपा था। बंगाल की दीवानी हाथ आ जाना अंग्रेशों के लिए निश्चय ही एक बड़ी घटना थी। दीवान के तौर पर वंफपनी अपने नियंत्राण वाले भूभाग के आथ्िार्क मामलों की मुख्य शासक बन गइर् थी। अब उसे अपनी शमीन का शासन चलाने और आमदनी को व्यवस्िथत करने का रास्ता ढूँढ़ना था। इसके लिए उसे एक ऐसा रास्ता ढूँढ़ना था जिससे वंफपनी के बढ़ते खचो± को पूरा करने के लिए कापफी आमदनी जुटाइर् जा सके। व्यापारिक वंफपनी के नाते उसे यह खयाल भी रखना था कि वह अपनी शरूरत की चीशें ख़रीदती - बेचती रहे। समय के साथ वंफपनी को यह भी समझ में आने लगा कि उसे सावधानी के साथ आगे बढ़ना होगा। बाहरी ताकत होने की वजह से उसे उन लोगों को भी शांत रखना था जो गाँव - देहात में पहले शासन चला चुके थे और जिनके पास अभी भी कापफी ताकत और सम्मान था। ऐसे जो लोग स्थानीय सत्ता में रह चुके थे उन्हें नियंत्रिात करना तो शरूरी था लेकिन उन्हें खत्म नहीं किया जा सकता था। यह काम वैफसे हो? इस अध्याय में हम देखेंगे कि वंफपनी ने ग्रामीण इलाकों को उपनिवेश वैफसे बनाया, आय के संसाधन वैफसे जुटाए, लोगों के अिाकार किस तरह तय किए और मनमाप्ि़़ाफक पफसलों की खेती वैफसे करायी? वंफपनी की आमदनी वंफपनी दीवान तो बन गइर् थी लेकिन अभी भी खुद को एक व्यापारी ही मानती थी। वंफपनी भारी - भरकम लगान तो चाहती थी लेकिन उसके आकलन और वसूली की कोइर् नियमित व्यवस्था करने में हिचकिचा रही थी। उसकी कोश्िाश यही थी कि वह ज़्यादा से ज़्यादा राजस्व हासिल करे और कम से कम कीमत पर बढि़या सूती और रेश्मी कपड़ा ख़रीदे। इसी कारण, पाँच साल के भीतर बंगाल में वंफपनी द्वारा ख़रीदी जाने वाली चीशों का वुफल मूल्य दोगुना हो चुका था। 1865 से पहले वंफपनी बि्रटेन से सोने और चाँदी का आयात करती थी और इन चीशों के बदले सामान ख़रीदती थी। अब बंगाल में इकट्ठा होने वाले पैसे से ही नियार्त के लिए चीशें ख़रीदी जा सकती थीं। जल्दी ही यह शाहिर हो गया कि बंगाल की अथर्व्यवस्था एक गहरे संकट में पँफसती जा रही है। कारीगर गाँव छोड़कर भाग रहे थे क्योंकि उन्हें बहुत कम कीमत पर अपनी चीशें वंफपनी को जबरन बेचनी पड़ती थीं। किसान अपना लगान नहीं चुका पा रहे थे। कारीगरों का उत्पादन गिर रहा था और खेती चैपट होने की दिशा में बढ़ चित्रा 2 - बंगाल स्िथत मुश्िार्दाबाद का एक साप्ताहिक हाट। ग्रामीण इलाकों के किसान और कारीगर अपनी चीशें बेचने और शरूरत की चीशें ख़रीदने के लिए नियमित रूप से बाशारों में आते थे। आथ्िार्क संकट के समय इन बाशारों पर बहुत बुरा असर पड़ता था। रही थी। 1770 में पड़े अकाल ने बंगाल में एक करोड़ लोगों को मौत की नींद सुला दिया। इस अकाल में लगभग एक तिहाइर् आबादी समाप्त हो गइर्। खेती में सुधार की शरूरत अगर अथर्व्यवस्था संकट में थी तो क्या कंपनी अपनी राजस्व आय के बारे में आश्वस्त रह सकती थी? वंफपनी के ज़्यादातर अप़फसरों को यह लगने लगा था कि शमीन में निवेश करना और खेती में सुधार लाना शरूरी है। यह काम किस तरह किया जा सकता था? इस सवाल पर दो दशकों तक बहस चली। आख्िारकार वंफपनी ने 1793 में स्थायी बंदोबस्त लागू किया। इस बंदोबस्त की शतो± के हिसाब से राजाओं और तालुकदारों को शमींदारों के रूप में मान्यता दी गइर्। उन्हें किसानों से लगान वसूलने और कंपनी को राजस्व चुकाने का िाम्मा सौंपा गया। उनकी ओर से चुकाइर् जाने वाली राश्िा स्थायी रूप से तय कर दी गइर् थी। इसका मतलब यह था कि भविष्य में कभी भी उसमें इशापफा नहीं किया जाना था। अंग्रेशों को लगता था कि इससे उन्हें नियमित रूप से राजस्व मिलता रहेगा और शमींदारों को शमीन में सुधार के लिए खचर् करने का प्रोत्साहन मिलेगा। उन्हें लगता था कि क्योंकि राज्य की ओर से राजस्व की माँग बढ़ने वाली नहीं थी इसलिए शमींदार बढ़ते उत्पादन से पफायदे में रहेंगे। समस्या मगर स्थायी बंदोबस्त ने भी समस्या पैदा कर दी। कंपनी के अप़फसरों ने पाया कि अभी भी शमींदार शमीन में सुधार के लिए खचार् नहीं कर रहे थे। असल में, कंपनी ने जो राजस्व तय किया था वह इतना ज़्यादा था कि उसको चुकाने में शमींदारों को भारी परेशानी हो रही थी। जो शमींदार राजस्व चुकाने में विपफल हो जाता था उसकी शमींदारी छीन ली जाती थी। बहुत सारी शमींदारियों को कंपनी बाकायदा नीलाम कर चुकी थी। उन्नीसवीं सदी के पहले दशक तक हालात बदल चुके थे। बाशार में कीमतें बढ़ीं और धीरे - धीरे खेती का विस्तार होने लगा। इससे शमींदारों की आमदनी में तो सुधार आया लेकिन कंपनी को कोइर् पफायदा नहीं हुआ क्योंकि कंपनी तो हमेशा के लिए राजस्व तय कर चुकी थी। अब वह राजस्व में वृि नहीं कर सकती थी। लेकिन शमींदारों को अभी भी शमीन की बेहतरी में कोइर् दिलचस्पी नहीं थी। उनमें से वुफछ तो बंदोबस्त के शुरुआती सालों में ही अपनी शमीन गँवा चुके थे। जो बचे रह गए थे अब उन्हें भी बिना परेशानी और निवेश का ख़तरा उठाए आमदनी की उम्मीद दिखाइर् दे रही थी। जब तक शमींदार किसानों को शमीन देकर उनसे लगान वसूल सकते थे उन्हें शमीन में सुधार की परवाह नहीं थी। दूसरी तरपफ, गाँवांे में किसानों को यह व्यवस्था बहुत दमनकारी दिखाइर् दी। किसान को जो लगान चुकाना था वह बहुत ज़्यादा था और शमीन पर उसका अिाकार सुरक्ष्िात नहीं था। लगान चुकाने के लिए अकसर महाजन से कशार् लेना पड़ता था। अगर वह लगान नहीं चुका पाता था तो उसे पुश्तैनी शमीन से बेदखल कर दिया जाता था। एक नयी व्यवस्था उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में ही कंपनी के बहुत सारे अिाकारियों को इस बात का यकीन हो चुका था कि राजस्व बंदोबस्त में दोबारा बदलाव लाना शरूरी है। जब कंपनी को शासन और व्यापार के अपने खचेर् चलाने के लिए और पैसे की शरूरत हो तो वह स्थायी रूप से राजस्व तय करके काम वैफसे चला सकती है? बंगाल प्रेिाडेंसी के उत्तर - पश्िचमी प्रांतों ;इस इलाके का ज़्यादातर हिस्सा अब उत्तर प्रदेश में हैद्ध के लिए होल्ट मैकेंजी नामक अंग्रेश ने एक नयी व्यवस्था तैयार की जिसे 1822 में लागू किया गया। मैवेंफजी को विश्वास था कि उत्तर भारतीय समाज में गाँव एक महत्वपूणर् सामाजिक संस्था है और उसको बचाए रखना चाहिए। उसके आदेश पर कलेक्टरों ने गाँव - गाँव का दौरा किया, शमीन की जाँच की, खेतों को मापा और विभ्िान्न समूहों के रीति - रिवाजों को दजर् किया। गाँव के एक - एक खेत के अनुमानित राजस्व को जोड़कर हर गाँव या ग्राम समूह ;महालद्ध से वसूल होने वाले राजस्व का हिसाब लगाया जाता था। इस राजस्व को स्थायी रूप से तय नहीं किया गया बल्िक उसमें समय - समय पर संशोधनों की गुंजाइश रखी गइर्। राजस्व इकट्ठा करने और उसे कंपनी को अदा करने का िाम्मा शमींदार की बजाय गाँव के मुख्िाया को सौंप दिया गया। इस व्यवस्था को महालवारी बंदोबस्त का नाम दिया गया। मुनरो व्यवस्था बि्रटिश नियंत्राण वाले दक्ष्िाण भारतीय इलाकों में भी स्थायी बंदोबस्त की जगह नयी व्यवस्था अपनाने का प्रयास किया जाने लगा। वहाँ जो नयी व्यवस्था विकसित हुइर् उसे रैयतवार ;या रैयतवारीद्ध का नाम दिया गया। वैफप्टन एलेक्शेंडर रीड ने टीपू सुल्तान के साथ चले यु(ों के बाद कंपनियों द्वारा कब्शे में लिए गए वुफछ इलाकों में इस व्यवस्था को आशमा कर भी देख लिया था। टाॅमस मुनरो ने इस व्यवस्था को विकसित किया और धीरे - धीरे पूरे दक्ष्िाणी भारत पर यही व्यवस्था लागू कर दी गइर्। रीड और मुनरो को लगता था कि दक्ष्िाण में परंपरागत शमींदार नहीं थे। इसलिए उनका तकर् यह था कि उन्हें सीधे किसानों ;रैयतोंद्ध से ही बंदोबस्त करना चाहिए जो पीढि़यों से शमीन पर खेती करते आ रहे हैं। राजस्व महल - बि्रटिश राजस्व दस्तावेशों में महल एक राजस्व इकाइर् थी। यह एक गाँव या गाँवों का एक समूह होती थी। चित्रा 4 - मद्रास का गवनर्र टाॅमस मुनरो ;1819 - 26द्ध। गतिवििा आकलन से पहले उनके खेतों का सावधानीपूवर्क और अलग से सवेर्क्षण किया जाना चाहिए। मुनरो का मानना था कि अंग्रेशों को पिता की भाँति किसानों की रक्षा करनी चाहिए। सब वुफछ ठीक नहीं था नयी व्यवस्थाएँ लागू होने के बाद महश वुफछ साल के भीतर उनमें समस्याएँ दिखाइर् देने लगीं। शमीन से होने वाली आमदनी बढ़ाने के चक्कर में राजस्व अिाकारियों ने बहुत ज़्यादा राजस्व तय कर दिया था। किसान राजस्व चुका नहीं पा रहे थे। रैयत गाँवों से भाग रहे थे। बहुत सारे क्षेत्रों में गाँव वीरान हो गए थे। आशावादी अप़फसरों को उम्मीद थी कि नयी व्यवस्था किसानों को संपन्न उद्यमशील किसान बना देगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यूरोप के लिए प़्ाफसलें अंग्रेशों ने यह भी महसूस किया कि ग्रामीण इलाके न केवल राजस्व प्रदान कर सकते हैं बल्िक वहाँ यूरोप की शरूरतों के हिसाब से सही प़फसलें भी पैदा की जा सकती हैं। अठाहरवीं सदी के आख्िार तक कंपनी ने अपफीम़और नील की खेती पर पूरा शोर लगा दिया था। इसके बाद लगभग 150 साल तक अंग्रेश देश के विभ्िान्न भागों में किसी न किसी प़फसल के लिए किसानों को मजबूर करते रहे: बंगाल में पटसन, असम मंे चाय, संयुक्त प्रांत ;वतर्मान उत्तर प्रदेशद्ध में गन्ना, पंजाब में गेहूँ, महाराष्ट्र व पंजाब में कपास, मद्रास में चावल। यह वैफसे किया गया? अंग्रेशों ने अपनी शरूरत की पफसलों की खेती को़पैफलाने के लिए कइर् तरीके अपनाए। आइए इसी तरह की एक प़फसल, उत्पादन की ऐसी ही एक प(ति को अच्छी तरह समझें। क्या रंग का भी कोइर् इतिहास है? चित्रा 5 और 6 में सूती कपड़े के छापों की दो तसवीरें दी गइर् हैं। बाईं तरपफ ;चित्रा 5द्ध की तसवीर में भारत में आंध्र प्रदेश के बुनकरों द्वारा बनाए गए कलमकारी छापे दिखाइर् दे रहे हैं। दूसरी तरपफ बि्रटेन के प्रसि( कवि और कलाकार विलियम माॅरिस द्वारा बनाए गए पूफल वाले छापे हैं। दोनों छापों में एक बात समान है: दोनों में ही गहरे नीले रंग का इस्तेमाल किया गया है। इसे आमतौर पर नील कहा जाता है। क्या आप जानते हैं कि यह रंग किस तरह पैदा किया गया? इन छापों में आपको जो नीला रंग दिखाइर् दे रहा है वह नील नाम के एक पौधे से निकाला जाता था। इस बात की काप्ाफी संभावना है कि उन्नीसवीं सदी के बि्रटेन में माॅरिस के छापों में इस्तेमाल किया गया नीला रंग भारत में उगने वाले नील के पौधों से ही तैयार किया गया होगा। उस समय भारत दुनिया में नील का सबसे बड़ा ड्डोत था। भारतीय नील की माँग क्यों थी? नील का पौधा मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय इलाकों में ही उगता है। तेरहवीं सदी तक इटली, प्ऱफांस और बि्रटेन के कपड़ा उत्पादक कपड़े की रँगाइर् के लिए भारतीय नील का इस्तेमाल कर रहे थे। उस समय भारतीय नील की बहुत थोड़ी मात्रा ही यूरोपीय बाशारों में पहुँचती थी। उसकी कीमत भी बहुत उँफची रहती थी। इसीलिए यूरोपीय कपड़ा उत्पादकों को बैंगनी और नीले रंग बनाने के लिए वोड नामक एक और पौधे पर निभर्र रहना पड़ता था। वोड पौधा शीतोष्ण क्षेत्रा में उगता था इसलिए यूरोप में आसानी से मिल जाता था। उत्तरी इटली, दक्ष्िाणी प़्राफांस व जमर्नी और बि्रटेन के कइर् हिस्सों में यह पौधा उगता था। नील के साथ प्रतिस्पधार् से परेशान यूरोप के वोड उत्पादकों ने अपनी सरकारों पर दवाब डाला कि वे नील के आयात पर पाबंदी लगा दें। मगर कपड़े को रँगने वाले तो नील को ही पसंद करते थे। नील से बहुत चमकदार नीला रंग मिलता था जबकि वोड से मिलने वाला रंग बेजान और पफीका होता था। सत्राहवीं सदी तक आते - आते यूरोपीय कपड़ा उत्पादकों ने नील के आयात पर लगी पाबंदी में ढील देने के लिए अपनी सरकारों को राशी कर लिया। कैरीबियाइर् द्वीप समूह स्िथत सेंट डाॅमिंग्यू में प़्रफांसीसी, ब्राशील में पुतर्गाली, जमैका में बि्रटिश और वेनेशुएला में स्पैनिश लोग नील की खेती करने लगे। उत्तरी अमेरिका के भी बहुत सारे भागों में नील के बाग़्ाान सामने आ गए थे। अठारहवीं शताब्दी के आख्िार तक भारतीय नील की माँग और बढ़ गइर्। बि्रटेन में औद्योगीकरण का युग शुरू हो चुका था और उसके कपास उत्पादन में भारी इशाप़्ाफा हुआ। अब कपड़ों की रँगाइर् की माँग और तेशी से बढ़ने लगी। जब नील की माँग बढ़ी उसी दौरान वेस्टइंडीश और अमेरिका से मिलने वाली आपूतिर् अनेक कारणों से बंद हो गइर्। 1783 से 1789 के बीच दुनिया का नील उत्पादन आधा रह गया था। बि्रटेन के रँगरेश अब नील की आपूतिर् के लिए बैचेनी से किसी और ड्डोत की तलाश कर रहे थे। यह नील कहाँ से मिल सकता था? भारत में बि्रटेन की बढ़ती दिलचस्पी यूरोप में नील की बढ़ती माँग को देखते हुए इर्स्ट इंडिया कंपनी भी भारत में नील की खेती बढ़ाने के रास्ते ढूँढ़ने लगी। ़बाग़्ाान - एक विशाल खेत जिस पर बाग़्ाान मालिक बहुत सारे लोगों से जबरन काम करवाता था। काॅप़्ाफी, गन्ना, तंबावूफ, चाय और कपास आदि के विषय में बाग़्ाानांे का िाव्रफ किया जाता है। चित्रा 7 - सेंट डाॅंमिंग्यू में गुलामों की बगावत, अगस्त 1791, जनवरी स्वुफहदोल्स्की का चित्रा। अठाहरवीं सदी में प्ऱफांसीसी बाग़्ाान मालिकों ने वैफरीबियाइर् द्वीप समूह में स्िथत प्ऱफांसीसी उपनिवेश सेंट डाॅमिंग्यू में नील और चीनी का उत्पादन शुरू किया। इन बाग़्ाानों में काम करने वाले अप्ऱफीकी गुलाम 1791 में बगावत पर उतर आए। उन्होंने बाग़्ाान जला दिए और अपने धनी मालिकों को मार डाला। 1792 में प्ऱफांस ने अपने उपनिवेशों में दास प्रथा समाप्त कर दी। इन घटनाओं की वजह से वैफरीबियाइर् द्वीपों में नील की खेती ठप्प हो गइर्। गुलाम - ऐसा व्यक्ित जो किसी दास - स्वामी की संपत्ित होता है। गुलाम के पास कोइर् आशादी नहीं होती, उसे अपने मालिक के लिए काम करना होता है। अठाहरवीं सदी के आख्िारी दशकों से ही बंगाल में नील की खेती तेशी से पैफलने लगी थी। बंगाल में पैदा होने वाला नील दुनिया के बाशारों पर छा गया था। 1788 में बि्रटेन द्वारा आयात किए गए नील में भारतीय नील का हिस्सा केवल लगभग 30 प्रतिशत था। 1810 में बि्रटेन द्वारा आयात किए गए नील में भारतीय नील का हिस्सा 95 प्रतिशत हो चुका था। जैसे - जैसे नील का व्यापार पैफला, कंपनी के अप़फसर और व्यावसायिक एजेंट नील के उत्पादन में पैसा लगाने लगे। समय बीतने के साथ वंफपनी के बहुत सारे अिाकारियों ने नील के अपने कारोबार पर ध्यान देने के लिए अपनी नौकरियाँ छोड़ दीं। भारी मुनापेफ की़उम्मीद में स्काॅटलैंड और इंग्लैंड के बहुत सारे लोग भारत आए और उन्होंने नील के बाग़्ाान लगा लिए। जिनके पास नील की पैदावार के लिए पैसा नहीं था उन्हें वंफपनी और नए - नए बैंक कशार् देने को तैयार रहते थे। नील की खेती वैफसे होती थी? नील की खेती के दो मुख्य तरीके थे - निज और रैयती। निज खेती की व्यवस्था में बाग़्ाान मालिक खुद अपनी शमीन में नील का उत्पादन करते थे। या तो वह शमीन ख़रीद लेते थे या दूसरे शमींदारों से शमीन भाड़े पर ले लेते थे और मशदूरों को काम पर लगाकर नील की खेती करवाते थे। निज खेती की समस्याएँ बाग़्ाान मालिकों को निज खेती का क्षेत्रापफल पैफलाने में मुश्िकल आ रही थी। नील की खेती केवल उपजाउफ शमीन पर की जा सकती थी। ऐसी शमीनों पर आबादी पहले ही बहुत ज़्यादा थी। यहाँ - वहाँ छोटे - मोटे खेत ही उनके हाथ लग पाते थे। नील की खेती करने के लिए उन्हें बड़े - बड़े भूखण्डों की शरूरत थी। इस तरह की शमीनें उन्हें कहाँ से मिल सकती थीं? उन्होंने नील की पैफक्ट्री के इदर् - गदर् पट्टे पर शमीन लेने के प्रयास किए और वहाँ के किसानों को हटवा दिया। इससे टकराव और तनाव पैदा हो जाता था। मशदूरों का इंतशाम करना भी आसान नहीं था। बड़े बाग़्ाान के लिए बहुत सारे मशदूरों की शरूरत होती थी। मशदूरों की शरूरत भी सबसे ज़्यादा उसी समय होती थी जब किसान धन की खेती में व्यस्त रहते थे। बड़े पैमाने पर निज खेती के लिए बहुत सारे हल - बैलों की भी शरूरत थी। एक बीघा नील की खेती के लिए दो हल चाहिए होते थे। इसका मतलब यह था कि अगर किसी बाग़्ाान मालिक के पास एक हशार बीघा शमीन है तो उसे दो हशार हलों की शरूरत पड़ती। हलों को ख़रीदना और उनका रखरखाव एक बड़ी समस्या थी। किसानों से भी हल नहीं मिल सकते थे। उन्हें अपने लिए ही इन चीशों की शरूरत होती थी। जिस समय नील उत्पादकों को शरूरत होती थी उसी समय किसानों के हल - बैल भी चावल के खेतों में व्यस्त रहते थे। उन्नीसवीं सदी के आख्िार तक बाग़्ाान मालिक निज खेती का क्षेत्रापफल पैफलाने में हिचकिचाते थे। इस व्यवस्था के तहत नील की पैदावार वाली 25 प्रतिशत से भी कम शमीन आती थी। बाकी शमीन रैयती व्यवस्था के अंतगर्त थी। रैयतों की शमीन पर नील की खेती रैयती व्यवस्था के तहत बाग़्ाान मालिक रैयतों के साथ एक अनुबंध ;सट्टाद्ध करते थे। कइर् बार वे गाँव के मुख्िायाओं को भी रैयतों की तरपफ से समझौता करने के लिए बाध्य कर देते थे। जो अनुबंध पर दस्तखत कर देते थे उन्हें नील उगाने के लिए कम ब्याज दर पर बाग़्ाान मालिकों से नवफद कशार् मिल जाता था। कशार् लेने वाले ़रैयत को अपनी कम से कम 25 प्रतिशत शमीन पर नील की खेती करनी होती थी। बाग़्ाान मालिक बीज और उपकरण मुहैया कराते थे जबकि मिट्टी को तैयार करने, बीज बोने और प़्ाफसल की देखभाल करने का िाम्मा काश्तकारों के उफपर रहता था। जब कटाइर् के बाद पफसल बाग़्ाान मालिक को सौंप़दी जाती थी तो रैयत को नया कशार् मिल जाता था और वही चव्रफ दोबारा बीघा - शमीन की एक माप। बि्रटिश शासन से पहले बीघे का आकार अलग - अलग होता था। बंगाल में अंग्रेशों ने इसका क्षेत्रापफल करीब एक तिहाइर् एकड़ तय कर दिया था। चित्रा 8 - उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बंगाल के मशदूर नील की खेती करते हुए। भारत में नील के पौधों की कटाइर् अिाकांशतः पुरुष ही करते थे। चित्रा 9 - खेतों से प़्ौफक्ट्री में लाए जा रहे नील के पौधों के गठ्ठर। शुरू हो जाता था। जो किसान पहले इन कशो± से बहुत आकष्िार्त थे उन्हें जल्दी ही समझ में आ गया कि यह व्यवस्था कितनी कठोर है। उन्हें नील की जो कीमत मिलती थी वह बहुत कम थी और कशो± का सिलसिला कभी खत्म ही नहीं होता था। समस्याएँ और भी थीं। बाग़्ाान मालिक चाहते थे कि किसान अपने सबसे बढि़या खेतों में ही नील की खेती करें। लेकिन नील के साथ परेशानी यह थी कि उसकी जड़ें बहुत गहरी होती थीं और वह मिट्टी की सारी ताकत खींच लेती थीं। नील की कटाइर् के बाद वहाँ धन की खेती नहीं की जा सकती थी। फ्नील विद्रोहय् और उसके बाद माचर् 1859 में बंगाल के हशारों रैयतों ने नील की खेती से इनकार कर दिया। जैसे - जैसे विद्रोह पैफला, रैयतों ने बाग़्ाान मालिकों को लगान चुकाने से भी इनकार कर दिया। वे तलवार, भाले और तीर - कमान लेकर नील की पैफक्िट्रयों पर हमला करने लगे। औरतें अपने बतर्न लेकर लड़ाइर् में वूफद पड़ीं। बाग़्ाान मालिकों के लिए काम करने वालों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। बाग़्ाान मालिकों की तरप़्ाफ से लगान वसूली के लिए आने वाले गुमाश्ता - एजेंटों - की पिटाइर् की गइर्। रैयतों ने कसम खा ली कि न तो वे नील की खेती के लिए कशार् लेंगे और न ही बाग़्ाान मालिकों के लठियालों - लाठीधारी गुंडों - से डरेंगे। नील के किसान चुप बैठने को तैयार नहीं थे। क्यों? उन्हें बगावत की ़ताकत कहाँ से मिली? इसमें कोइर् शक नहीं कि नील की खेती अत्यन्त दमनात्मक थी। लेकिन जो लोग दबे होते हैं वे हमेशा बगावत नहीं करते। ऐसा कभी - कभी ही होता है। 1859 में नील रैयतों को लगा कि बाग़्ाान मालिकों के ख्ि़ालाप़़्ाफ बगावत में उन्हें स्थानीय शमींदारों और मुख्िायाओं का भी समथर्न मिल सकता है। बहुत सारे गाँवों में जिन मुख्िायाओं से नील के अनुबंधों पर जबरन दस्तखत कराए गए थे उन्होंने ही नील किसानों को इकट्ठा किया और लठियालों के साथ आमने - सामने की लड़ाइर् लड़ी। कइर् स्थानों पर रैयतों को बगावत के ़लिए उकसाते हुए खुद शमींदार गाँव - गाँव घूमने लगे। शमींदार इस बात से परेशान थे कि बाग़्ाान मालिकों की ताकत बढ़ती जा रही थी और बाग़्ाान मालिक जबरन लंबे समय के लिए उनसे शमीन ले लेते थे। नील के किसानों को ये भी लग रहा था कि अंग्रेशी सरकार भी संघषर् में उनका साथ देगी। 1857 की बग़्ाावत के बाद बि्रटिश सरकार एक और व्यापक विद्रोह के ख़तरे से डरी हुइर् थी। जब नील की खेती वाले िालों में एक और बग़्ाावत की ख़बर पैफली तो लेि़टनेंट गवनर्र ने 1859 की सदिर्यों में इलाके का दौरा किया। रैयतों को लगा कि सरकार उनकी दुदर्शा से परेशान है। बरसात में मजिस्ट्रेट ऐशले इर्डन ने एक नोटिस जारी किया जिसमें कहा गया था कि रैयतों को नील के अनुबंध मानने के लिए मजबूर नहीं किया ड्डोत 2 नील गाँवों का एक गीत संघषर् के क्षणों में लोग एक - दूसरे का उत्साह बढ़ाने और सामूहिकता का भाव पैदा करने के लिए अकसर गीत गाते हैं। इस तरह के गीतों से हमें उनकी भावनाओं का पता चलता है। नील विद्रोह के दौरान बंगाल के निचले इलाकों में ऐसे बहुत सारे गीत सुनाइर् देते थे। इनमें से एक गीत इस प्रकार था: मौला हाती के बाग़्ाान मालिक की लम्बी - लम्बी लाठियाँ दूर इकट्ठी पड़ी हैं। कोलकाता के बाबू इस बड़ी लड़ाइर् को देखने के लिए नावों के जरिये पहुँच चुके हैं। इस बार तो सभी रैयत तैयार हैं, वे चुपचाप मार नहीं सहेंगे। अब वे बिना लठियालों का मुकाबला किये अपनी जान नहीं गँवाएँगे। जाएगा। इस नोटिस के आधार पर लोगों में यह ख़बर पैफल गइर् कि रानी विक्टोरिया ने नील की खेती न करने का हुक्म दे दिया है। इर्डन किसानों को शांत करने और विस्पफोटक स्िथतियों को नियंत्रिात करने की कोश्िाश कर रहे थे। उसकी कारर्वाइर् को किसानों ने अपने विद्रोह का समथर्न मान लिया। जैसे - जैसे विद्रोह पैफला, कलकत्ता के पढ़े - लिखे लोग भी नील िालों की ओर चल पड़े। उन्होंने रैयतों की दुदर्शा, बाग़्ाान मालिकों की शोर - शबदर्स्ती और अत्याचारी नील व्यवस्था के बारे में लिखा। इस बग़्ाावत से परेशान सरकार को बाग़्ाान मालिकों की रक्षा के लिए सेना बुलानी पड़ी। नील उत्पादन व्यवस्था की जाँच करने के लिए एक नील आयोग भी बना दिया गया। इस आयोग ने बाग़्ाान मालिकों को दोषी पाया, शोर - शबदर्स्ती के लिए उनकी आलोचना की। आयोग ने कहा कि नील की खेती रैयतों के लिए पफायदे का सौदा नहीं है। आयोग ने रैयतों से कहा कि वे मौजूदा अनुबंधों को पूरा करें लेकिन आगे से वे चाहें तो नील की खेती बंद कर सकते हैं। इस बगावत के बाद बाग़्ाानों में नील का उत्पादन धराशायी हो गया। इसके बाद बागान मालिक बिहार पर ध्यान देने लगे। उन्नीसवीं सदी वेफ़आख्िार में वृफत्रिाम रंगों का निमार्ण होने लगा था। इससे उनका व्यवसाय भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। पिफर भी, वे उत्पादन पैफलाने में सपफल रहे। जब महात्मा गांधी दक्ष्िाण अप्ऱफीका से लौटे तो बिहार के एक किसान ने उन्हें चंपारण आकर नील किसानों की दुदर्शा को देखने का न्यौता दिया। 1917 में महात्मा गांधी का यह दौरा नील बाग़्ाान मालिकों के ख्ि़ालाप़्ाफ चंपारण आंदोलन की शुरुआत थी। गतिवििा कल्पना कीजिए कि आप नील आयोग के सामने गवाही दे रहे हैं। डब्ल्यू.एस. सीटन कार आपसे पूछते हैं: फ्रैयत किस सूरत में नील की खेती कर सकते हैं?य् आपका जवाब क्या होगा? 1 निम्नलिख्िात के जोड़े बनाएँ रैयत ग्राम - समूह महाल किसान निज रैयतों की शमीन पर खेती रैयती बाग़्ाान मालिकों की अपनी शमीन पर खेती 2 रिक्त स्थान भरें: ;कद्ध यूरोप में वोड उत्पादकों को ................. से अपनी आमदनी में गिरावट का ख़तरा दिखाइर् देता था। ;खद्ध अठारहवीं सदी के आख्िार में बि्रटेन में नील की माँग ............ के कारण बढ़ने लगी। ;गद्ध ............ की खोज से नील की अंतरार्ष्ट्रीय माँग पर बुरा असर पड़ा। ;घद्ध चंपारण आंदोलन ............ के ख्ि़ालाप़फ था। 3 स्थायी बंदोबस्त के मुख्य पहलुओं का वणर्न कीजिए। 4 महालवारी व्यवस्था स्थायी बंदोबस्त के मुवफाबले वैफसे अलग थी? 5 राजस्व निधार्रण की नयी मुनरो व्यवस्था के कारण पैदा हुइर् दो समस्याएँ बताइए। 6 रैयत नील की खेती से क्यों कतरा रहे थे? 7 किन परिस्िथतियों में बंगाल में नील का उत्पादन धराशायी हो गया? आइए करके देखें 8.चंपारण आंदोलन और उसमें महात्मा गांधी की भूमिका के बारे में और जानकारियाँ इकट्ठा करें। 9.भारत के शुरुआती चाय या काॅपफी बाग़्ाानों का इतिहास देखें। ध्यान दें कि इन बाग़्ाानों में काम करने वाले मशदूरों और नील के बाग़्ाानों में काम करने वाले मशदूरों के जीवन में क्या समानताएँ या पफवर्फ थे।

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