2 व्यापार से साम्राज्य तक कंपनी की सत्ता स्थापित होती है मुग़्ाल बादशाहों में औरंगशेब आख्िारी शक्ितशाली बादशाह थे। उन्होंने वतर्मान भारत के एक बहुत बड़े हिस्से पर नियंत्राण स्थापित कर लिया था। 1707 में उनकी मृत्यु के बाद बहुत सारे मुग़्ाल सूबेदार और बड़े - बड़े शमींदार अपनी ताकत दिखाने लगे थे। उन्होंने अपनी क्षेत्राीय रियासतें कायम कर ली थीं। जैसे - जैसे विभ्िान्न भागों में ताकतवर क्षेत्राीय रियासतें सामने आने लगीं, दिल्ली अिाक दिनों तक प्रभावी केन्द्र के रूप में नहीं रह सकी। अठारहवीं सदी के उत्तराधर् तक राजनीतिक क्ष्िातिज पर अंग्रेशों के रूप में एक नयी ताकत उभरने लगी थी। क्या आप जानते हैं कि अंग्रेश पहले - पहल एक छोटी - सी व्यापारिक वंफपनी के रूप में भारत आए थे और यहाँ के इलाकों पर कब्शे मेें उनकी ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी? तो पिफर ऐसा वैफसे हुआ कि एक दिन वे इस विशाल साम्राज्य के स्वामी बन बैठे? इस अध्याय में आप देखेंगे कि यह वैफसे हुआ? चित्रा 1 - वैफप्टन हडसन द्वारा बहादुर शाह शप़फर और उनके बेटों की गिरफ्ऱतारी। औरंगशेब के बाद कोइर् मुग़्ाल बादशाह इतना ताकतवर तो नहीं हुआ लेकिन एक प्रतीक के रूप में मुग़्ाल बादशाहों का महत्व बना हुआ था। जब 1857 में बि्रटिश शासन के विरु( भारी विद्रोह शुरू हो गया तो विद्रोहियों ने मुग़्ाल बादशाह बहादुर शाह शप़फर को ही अपना नेता मान लिया था। जब विद्रोह वुफचल दिया गया तो वंफपनी ने बहादुर शाह शप़्ाफर को देश छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया और उनके बेटों को शप़फर के सामने ही मार डाला। चित्रा 2 - अठारहवीं सदी में भारत तक आने वाले रास्ते। वाण्िाज्ियक - एक ऐसा व्यावसायिक उद्यम जिसमें चीशों को सस्ती कीमत पर ख़रीद कर और ज़्यादा कीमत पर बेचकर यानी मुख्य रूप से व्यापार के शरिए मुनापफा कमाया जाता है। पूवर् में इर्स्ट इंडिया वंफपनी का आना सन् 1600 में इर्स्ट इंडिया वंफपनी ने इंग्लैंड की महारानी एलिशाबेथ प्रथम से चाटर्र अथार्त इजाजतनामा हासिल कर लिया जिससे वंफपनी को पूरब से व्यापार करने का एकाध्िकार मिल गया। इस इशाशतनामे का मतलब यह था कि इंग्लैंड की कोइर् और व्यापारिक वंफपनी इस इलाके में इर्स्ट इंडिया वंफपनी से होड़ नहीं कर सकती थी। इस चाटर्र के सहारे वंफपनी समुद्र पार जाकर नए इलाकों को खँगाल सकती थी, वहाँ से सस्ती कीमत पर चीशें ख़रीद कर उन्हें यूरोप में उँफची कीमत पर बेच सकती थी। वंफपनी को दूसरी अंग्रेश व्यापारिक वंफपनियों से प्रतिस्पधार् का कोइर् भय नहीं था। उस शमाने में वाण्िाज्ियक वंफपनियाँ मोटे तौर पर प्रतिस्पधार् से बचकर ही मुनापफा कमा सकती थीं। अगर कोइर् प्रतिस्पधीर् न हो तभी वे सस्ती चीशें ख़रीदकर उन्हें ज़्यादा कीमत पर बेच सकती थीं। लेकिन यह शाही दस्तावेश दूसरी यूरोपीय ताकतों को पूरब के बाशारों में आने से नहीं रोक सकता था। जब तक इंग्लैंड के जहाश अप्रफीका के पश्िचम तट को छूते हुए केप आॅपफ गुड होप का चक्कर लगाकर हिंद महासागर पाऱकरते तब तक पुतर्गालियों ने भारत के पश्िचमी तट पर अपनी उपस्िथति दजर् करा दी थी। वे गोवा में अपना ठिकाना बना चुके थे। पुतर्गाल के खोजी यात्राी वास्को द गामा ने ही 1498 में पहली बार भारत तक पहुँचने के इस समुद्री मागर् का पता लगाया था। सत्राहवीं शताब्दी की शुरुआत तक डच भी हिंद महासागर में व्यापार की संभावनाएँ तलाशने लगे थे। वुफछ ही समय बाद प़्रफांसीसी व्यापारी भी सामने आ गए। समस्या यह थी कि सारी वंफपनियाँ एक जैसी चीशें ही ख़रीदना चाहती थीं। यूरोप के बाशारों में भारत के बने बारीक सूती कपड़े और रेशम की जबरदस्त माँग थी। इनके अलावा काली मिचर्, लौंग, इलायची और दालचीनी की भी जबरदस्त माँग रहती थी। यूरोपीय वंफपनियों के बीच इस बढ़ती प्रतिस्पधार् से भारतीय बाशारों में इन चीशों की कीमतें बढ़ने लगीं और उनसे मिलने वाला मुनापफा गिरने लगा। अब इन व्यापारिक वंफपनियों के पफलने - पूफलने का यही एक रास्ता था कि वे अपनी प्रतिस्पधीर् कंपनियों को खत्म कर दे। लिहाजा, बाशारों पर कब्जे की इस होड़ ने व्यापारिक वंफपनियों के बीच लड़ाइयों की शुरुआत कर दी। सत्राहवीं और अठारहवीं सदी में जब भी मौका मिलता कोइर् - सी एक कंपनी किसी दूसरी कंपनी के जहाश डूबो देती, रास्ते में रुकावटें खड़ी कर देती और माल से लदे जहाशों को आगे बढ़ने से रोक देती। यह व्यापार हथ्िायारों की मदद से चल रहा था और व्यापारिक चैकियों को किलेबंदी के शरिए सुरक्ष्िात रखा जाता था। अपनी बस्ितयों को किलेबंद करने और व्यापार में मुनापफा कमाने की इन कोश्िाशों के कारण स्थानीय शासकों से भी टकराव होने लगे। इस प्रकार, व्यापार और राजनीति को एक - दूसरे से अलग रखना वंफपनी के लिए मुश्िकल होता जा रहा था। आइए देखें कि यह वैफसे हुआ। इर्स्ट इंडिया वंफपनी बंगाल में व्यापार शुरू करती है पहली इंग्िलश पैफक्टरी 1651 में हुगली नदी के किनारे शुरू हुइर्। वंफपनी के व्यापारी यहीं से अपना काम चलाते थे। इन व्यापारियों को उस जमाने में फ्पैफक्टरय् कहा जाता था। इस पैफक्टरी में वेयरहाउस था जहाँ नियार्त होने वाली चीशों को जमा किया जाता था। यहीं पर उसके दफ्ऱतर थे जिनमें वंफपनी के अप़फसर बैठते थे। जैसे - जैसे व्यापार पैफला वंफपनी ने सौदागरों और व्यापारियों को पैफक्टरी के आस - पास आकर बसने के लिए प्रेरित किया। 1696 तक वंफपनी ने इस आबादी के चारों तरपफ एक व्ि़ाफला बनाना शुरू कर दिया था। दो साल बाद उसने मुग़्ाल अपफसरों को रिश्वत देकर तीन गाँवों की़शमींदारी भी ख़रीद ली। इनमें से एक गाँव कालीकाता था जो बाद में कलकत्ता बना। अब इसे कोलकाता कहा जाता है। वंफपनी ने मुग़्ाल सम्राट औरंगशेब को इस बात के लिए भी तैयार कर लिया कि वह वंफपनी को बिना शुल्क चुकाए व्यापार करने का प़्ाफरमान जारी कर दे। वंफपनी ज़्यादा से ज़्यादा रियायतें हासिल करने और पहले से मौजूद अिाकारों का ज़्यादा से ज़्यादा पफायदा उठाने में लगी हुइर् थी। उदाहरण के लिए, औरंगशेब के पफरमान से केवल वंफपनी को ही शुल्क मुक्त व्यापार का अिाकार मिला था। वंफपनी के जो अप़फसर निजी तौर पर व्यापार चलाते उन्हें यह छूट नहीं थी। लेकिन उन्होंने भी शुल्क चुकाने से इनकार कर दिया। इससे बंगाल में राजस्व वसूली बहुत कम हो गइर्। ऐसे में भला बंगाल के नवाब मुश्िार्द वुफली खान विरोध क्यों न करते? प़्ाफरमान - एक शाही आदेश चित्रा 3 - मद्रास के जहाशों से सामान लाती स्थानीय नौकाएँ, विलियम सिम्पसन द्वारा बनाया गया चित्रा, 1867 चित्रा 4 - राॅबटर् क्लाइव। कठपुतली - यह एक ख्िालौना होता है जिसे आप धागों के सहारे अपने हिसाब से नचाते हैं। जो व्यक्ित किसी और के इशारों पर चलता है उसे भी मशाक उड़ाने के लिए अकसर कठपुतली कहा जाता है। व्यापार से यु(ों तक अठारहवीं सदी की शुरुआत में वंफपनी और बंगाल के नवाबों का टकराव कापफी बढ़ गया था। औरंगशेब की मृत्यु के बाद बंगाल के नवाब अपनी ताकत दिखाने लगे थे। उस समय दूसरी क्षेत्राीय ताकतों की स्िथति भी ऐसी ही थी। मुश्िार्द वुफली खान के बाद अली वदीर् खान और उसके बाद सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब बने। ये सभी शक्ितशाली शासक थे। उन्होंने वंफपनी को रियायतें देने से मना कर दिया। व्यापार का अिाकार देने के बदले वंफपनी से नशराने माँगे, उसे सिक्के ढालने का अिाकार नहीं दिया, और उसकी किलेबंदी को बढ़ाने से रोक दिया। वंफपनी पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए उन्होंने दलील दी कि उसकी वजह से बंगाल सरकार की राजस्व वसूली कम होती जा रही है और नवाबों की ताकत कमशोर पड़ रही है। वंफपनी टैक्स चुकाने को तैयार नहीं थी, उसके अप़्ाफसरों ने अपमानजनक चिटि्ठयाँ लिखीं और नवाबों व उनके अिाकारियों को अपमानित करने का प्रयास किया। वंफपनी का कहना था कि स्थानीय अिाकारियों की बेतुकी माँगों से वंफपनी का व्यापार तबाह हो रहा है। व्यापार तभी पफल - पूफल सकता है जब सरकार शुल्क हटा ले। वंफपनी को इस बात का भी यकीन था कि अपना व्यापार पैफलाने के लिए उसे अपनी आबादी बढ़ानी होगी। गाँव ख़रीदने होंगे और किलों का पुननिर्मार्ण करना होगा। ये टकराव दिनोदिन गंभीर होते गए अन्ततः इन टकरावों की परिणति प्लासी के प्रसि( यु( के रूप में हुइर्। प्लासी का यु( 1756 में अली वदीर् खान की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब बने। वंफपनी को सिराजुद्दौला की ताकत से कापफी भय था। सिराजुद्दौला की जगह वंफपनी एक ऐसा कठपुतली नवाब चाहती थी जो उसे व्यापारिक रियायतें और अन्य सुविधाएँ आसानी से देने में आनाकानी न करे। वंफपनी ने प्रयास किया कि सिराजुद्दौला के प्रतिद्वंद्वियों में से किसी को नवाब बना दिया जाए। वंफपनी को कामयाबी नहीं मिली। जवाब में सिराजुद्दौला ने हुक्म दिया कि वंफपनी उनके राज्य के राजनीतिक मामलों में टाँग अड़ाना बंद कर दे, किलेबंदी रोके और बाकायदा राजस्व चुकाए। जब दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं हुए तो अपने 30,000 सिपाहियों के साथ नवाब ने कासिम बाशार में स्िथत इंग्िलश पैफक्टरी पर हमला बोल दिया। नवाब की पफौजों ने वंफपनी के अप़फसरों को गिरफ्ऱतार कर लिया, गोदाम पर ताला डाल दिया, अंग्रेशों के हथ्िायार छीन लिए और अंग्रेश जहाशों को घेरे में ले लिया। इसके बाद नवाब ने वंफपनी के कलकत्ता स्िथत किले पर वफब्शे के लिए उधर का रुख किया। कलकत्ता के हाथ से निकल जाने की ख़बर सुनने पर मद्रास में तैनात वंफपनी के अप़फसरों ने भी राॅबटर् क्लाइव के नेतृत्व में सेनाओं को रवाना कर दिया। इस सेना को नौसैनिक बेड़े की मदद भी मिल रही थी। इसके बाद ड्डोत 1 संपन्नता का आश्वासन इंग्लैंड के लोग इर्स्ट इंडिया वंफपनी की शासकीय महत्वाकांक्षाओं को संदेह और अविश्वास से देखते थे। प्लासी की लड़ाइर् के बाद राॅबटर् क्लाइव ने अंग्रेश सम्राट के एक मुख्य विदेश मंत्राी विलियम पिट को 7 जनवरी 1759 को कलकत्ते से यह चिट्ठी भेजी थी: लेकिन इतनी विशाल सत्ता एक वाण्िाज्ियक वंफपनी के लिए बहुत बड़ी बात होगी... मैं खुद यह सोच कर अभ्िाभूत हूँ... कि इन समृ( रियासतों पर पूरा कब्शा हासिल करने में कोइर् परेशानी नहीं आएगी: ... अब मैं यह पैफसला आप पर छोड़ता हूँ कि क्या सालाना बीस लाख स्टलि±ग की आमदनी और तीन प्रांतों का कब्शा... कोइर् ऐसी चीश है जिस पर इतना शोर मचाना उचित हो...। चित्रा 5 - महान्यायालय कक्ष, इर्स्ट इंडिया हाउस, लेडनहाॅल स्ट्रीट। इर्स्ट इंडिया वंफपनी के कोटर् आॅपफ प्राॅपराइटसर् की लंदन स्िथत लेडनहाॅल स्ट्रीट पर बने इर्स्ट इंडिया हाउस में बैठवेंफ होती थीं। यह ऐसी ही एक सभा का चित्रा है। ड्डोत 2 नवाब की श्िाकायतें 1733 में बंगाल के नवाब ने इंग्िलश व्यापारियों के बारे में यह कहा थाः जब वे पहली बार हमारे देश में आए थे तो उन्होंने सरकार के सामने विनती करते हुए कहा था कि उन्हें एक पैफक्टरी बनाने के लिए थोड़ी - सी शमीन दे दी जाए। उन्हें वह शमीन तो मिल गइर् पर उन्होंने तो प्लासी की जंग इसलिए महत्वपूणर् मानी जाती है क्योंकि भारत में यह वंफपनी की पहली बड़ी जीत थी। प्लासी की जंग के बाद सिराजुद्दौला को मार दिया गया और मीर जापफर नवाब बना। वंफपनी अभी भी शासन की िाम्मेदारी सँभालने को तैयार नहीं थी। उसका मूल उद्देश्य तो व्यापार को पैफलाना था। अगर यह काम स्थानीय शासकों की मदद से बिना लड़ाइर् लड़े ही किया जा सकता था तो किसी राज्य को सीधे अपने कब्शे में लेने की क्या शरूरत थी। जल्दी ही वंफपनी को एहसास होने लगा कि यह रास्ता भी आसान नहीं है। कठपुतली नवाब भी हमेशा वंफपनी के इशारों पर नहीं चलते थे। आख्िारकार उन्हें भी तो अपनी प्रजा की नशर में सम्मान और संप्रभुता का दिखावा करना पड़ता था। तो पिफर वंफपनी क्या करती? जब मीर जाप़्ाफर ने वंफपनी का विरोध किया तो वंफपनी ने उसे हटाकर मीर कासिम को नवाब बना दिया। जब मीर कासिम परेशान करने लगा तो बक्सर की लड़ाइर् ;1764द्ध में उसको भी हराना पड़ा। उसे बंगाल से बाहर कर दिया गया और मीर जापफर को दोबारा नवाब बनाया ़वहाँ मशबूत व्िाफला ही खड़ा कर डाला। इसके चारों तरपफ गड्ढे बना दिये जो नदी से जुड़ते हैं। दीवारों पर उन्होंने न जाने कितनी तोपें तैनात कर दी हैं। उन्होंने बहुत सारे सौदागरों और अन्य लोगों को अपने मातहत रहने के लिए तैयार कर लिया है और वह एक लाख रुपये राजस्व वसूल कर रहे हैं.... वे असंख्य औरतों और मदो± को उनके ही देश में ग्ाुलाम़बनाकर लूट - खसोट रहे हैं। गया। अब नवाब को हर महीने पाँच लाख रुपए वंफपनी को चुकाने थे। वंफपनी अपने सैनिक खचो± से निपटने, व्यापारिक शरूरतों तथा अन्य खचो± को पूरा करने के लिए और पैसा चाहती थी। वंफपनी और ज़्यादा इलाके तथा और ज़्यादा कमाइर् चाहती थी। 1765 में जब मीर जापफर की मृत्यु हुइर् तब तक़वंफपनी के इरादे बदल चुके थे। कठपुतली नवाबों के साथ अपने खराब अनुभवों को देखते हुए क्लाइव ने ऐलान किया कि अब फ्हमें खुद ही नवाब बनना पड़ेगा।य् आख्ि़ारकार 1765 में मुग़्ाल सम्राट ने वंफपनी को ही बंगाल प्रांत का दीवान नियुक्त कर दिया। दीवानी मिलने के कारण वंफपनी को बंगाल के विशाल राजस्व संसाधनों पर नियंत्राण मिल गया था। इस तरह वंफपनी की एक पुरानी समस्या हल हो गयी थी। अठारहवीं सदी की शुरुआत से ही भारत के साथ उसका व्यापार बढ़ता जा रहा था। लेकिन उसे भारत में ज़्यादातर चीशें बि्रटेन से लाए गए सोने और चाँदी के बदले में ख़रीदनी पड़ती थीं। इसकी वजह ये थी कि उस समय बि्रटेन के पास भारत में बेचने के लिए कोइर् चीश नहीं थी। प्लासी की जंग के बाद बि्रटेन से सोने की निकासी कम होने लगी और बंगाल की दीवानी मिलने के बाद तो बि्र्रटेन से सोना लाने की शरूरत ही नहीं रही। अब भारत से होने वाली आमदनी के सहारे ही वंफपनी अपने खचेर् चला सकती थी। इस कमाइर् से वंफपनी भारत में सूती और रेशमी कपड़ा ख़रीद सकती थी, अपनी पफौजों को सँभाल सकती थी और कलकत्ते में किलों और दफ्ऱतरों के निमार्ण की लागत उठा सकती थी। वंफपनी के अप़फसर ‘नबाॅब’ बन बैठे नवाब बनने का क्या मतलब था? इसका एक मतलब तो यही था कि वंफपनी के पास अब सत्ता और ताकत थी। लेकिन इसके वुफछ और पफायदे भी थे। वंफपनी का हर कमर्चारी नवाबों की तरह जीने के ख्वाब देखने लगा था। प्लासी के यु( के बाद बंगाल के असली नवाबों को इस बात के लिए बाध्य कर दिया गया कि वे वंफपनी के अप़फसरों को निजी तोहपेफ के तौर पर शमीन और बहुत सारा पैसा दें। खुद राॅबटर् क्लाइव ने ही भारत में बेहिसाब दौलत जमा कर ली थी। 1743 में जब वह इंग्लैंड से मद्रास ;अब चैन्नइर्द्ध आया था तो उसकी उम्र 18 साल थी। 1767 में जब वह दो बार गवनर्र बनने के बाद हमेशा के लिए भारत से रवाना हुआ तो यहाँ उसकी दौलत 401,102 पौंड के बराबर थी। दिलचस्प बात यह है कि गवनर्र के अपने दूसरे कायर्काल में उसे वंफपनी के भीतर पैफले भ्रष्टाचार को खत्म करने का काम सौंपा गया था। लेकिन 1772 में बि्रटिश संसद में उसे खुद भ्रष्टाचार के आरोपों पर अपनी सपफाइर् देनी पड़ी। सरकार को उसकी अकूत संपत्ित़के ड्डोत संदेहास्पद लग रहे थे। उसे भ्रष्टाचार आरोपों से बरी तो कर दिया गया लेकिन 1774 में उसने आत्महत्या कर ली। वंफपनी के सभी अप़फसर क्लाइव की तरह दौलत इकट्ठा नहीं कर पाए। बहुत सारी बीमारियों और लड़ाइर् के कारण कम उम्र में ही मौत का निवाला बन गए। इसके अलावा उन सभी को भ्रष्ट और बेइर्मान मानना भी सही नहीं होगा। उनमें से बहुत सारे अपफसर साधरण परिवारों से आए थे। उनकी सबसे़बड़ी इच्छा बस यही थी कि वे भारत में ठीक - ठाक पैसा कमाएँ और बि्रटेन लौटकर आराम की िांदगी बसर करें। जो जीते जी धन - दौलत लेकर वापस लौट गए उन्होंने वहाँ आलीशान जीवन जिया। उन्हें वहाँ के लोग फ्नबाॅबय् कहते थे। यह भारतीय शब्द ‘नवाब’ का ही अंग्रेशी संस्करण बन गया था। उन्हें लोग अकसर नए अमीरों और सामाजिक हैसियत में रातों - रात उफपर आने वाले लोगों के रूप में देखते थे। नाटकों और काटूर्नों में उनका मशाक उड़ाया जाता था। वंफपनी का पैफलता शासन यदि हम 1757 से 1857 के बीच इर्स्ट इंडिया वंफपनी के द्वारा भारतीय राज्यों पर कब्शे की प्रवि्रफया को देखें तो वुफछ महत्वपूणर् बातें सामने आती हैं। किसी अनजान इलाके में वंफपनी ने सीधे सैनिक हमला प्रायः नहीं किया। उसने किसी भी भारतीय रियासत का अिाग्रहण करने से पहले विभ्िान्न राजनीतिक, आथ्िार्क और वूफटनीतिक साधनों का इस्तेमाल किया। बक्सर की लड़ाइर् ;1764द्ध के बाद वंफपनी ने भारतीय रियासतों में रेिाडेंट तैनात कर दिये। ये वंफपनी के राजनीतिक या व्यावसायिक प्रतिनििा होते थे। उनका काम वंफपनी के हितों की रक्षा करना और उन्हें आगे बढ़ाना था। रिाडेंट के माध्यम से वंफपनी के अिाकारी भारतीय राज्यों के भीतरी मामलों में भी दखल देने लगे थे। अगला राजा कौन होगा, किस पद पर किसको बिठाया जाएगा, इस तरह की चीशें भी वंफपनी के अप़फसर ही तय करना चाहते थे। कइर् बार वंफपनी ने रियासतों पर फ्सहायक संध्िय् भी थोप दी। जो रियासत इस बंदोबस्त को मान लेती थी उसे अपनी स्वतंत्रा सेनाएँ रखने का अिाकार नहीं रहता था। उसे वंफपनी की तरपफ से सुरक्षा मिलती चित्रा 6 - अपने बेटों और बि्रटिश रेिाडेन्ट के साथ खड़े नवाब शुजाउद्दौला, टिली वैफटल द्वारा बनाया चित्रा ;तैल, 1772द्ध। बक्सर की लड़ाइर् के बाद हुइर् संिायों के पफलस्वरूप नवाब शुजाउद्दौला के ज़्यादातर अिाकार छिन गए थे लेकिन यहाँ वह रेिाडेन्ट के सामने अपनी चिर - परिचित शाही शानो - शौकत के साथ दिखाइर् दे रहे हैं। निषेधाज्ञा - निदेर्श। अधीनस्थता - दब्बूपन थी और फ्सहायक सेनाय् के रखरखाव के लिए वह वंफपनी को पैसा देती थी। अगर भारतीय शासक रकम अदा करने में चूक जाते थे तो जुमार्ने के तौर पर उनका इलाका वंफपनी अपने कब्शे में ले लेती थी। उदाहरण के लिए, जब रिचडर् वेलेश्ली गवनर्र - जनरल ;1798 - 1805द्ध था, उस समय अवध के नवाब को 1801 में अपना आधा इलाका वंफपनी को सौंपने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि नवाब फ्सहायक सेनाय् के लिए पैसा अदा करने में चूक गए थे। इसी आधार पर हैदराबाद के भी कइर् इलाके छीन लिए गए। टीपू सुल्तान - फ्शेर - ए - मैसूरय् जब वंफपनी को अपने राजनीतिक और आथ्िार्क हितों पर खतरा दिखाइर् दिया तो वंफपनी ने प्रत्यक्ष सैनिक टकराव का रास्ता भी अपनाया। दक्ष्िाण भारतीय राज्य मैसूर के उदाहरण से यह बात समझी जा सकती है। हैदर अली ;शासन काल 1761 से 1782द्ध और उनके विख्यात पुत्रा टीपू सुल्तान ;शासन काल 1782 से 1799द्ध जैसे शक्ितशाली शासकों के नेतृत्व में मैसूर कापफी ताकतवर हो चुका था। मालाबार तट पर होने वाला व्यापार मैसूर रियासत के नियंत्राण में था जहाँ से वंफपनी काली मिचर् और इलायची ख़रीदती थी। 1785 में टीपू सुल्तान ने अपनी रियासत में पड़ने वाले बंदरगाहों से चंदन की लकड़ी, काली मिचर् और इलायची का नियार्त रोक दिया। सुल्तान ने स्थानीय सौदागरों को भी वंफपनी के साथ कारोबार करने से रोक दिया था। टीपू सुल्तान ने भारत में रहने वाले प़्रफांसीसी व्यापारियों से घनिष्ठ संबंध विकसित किए और उनकी मदद से अपनी सेना का आधुनिकीकरण किया।चित्रा 7 - टीपू सुल्तान। सुल्तान के इन कदमों से अंग्रेश आग - बबूला हो गए। उन्हें हैदर अली और टीपू सुल्तान बहुत महत्वाकांक्षी, घमण्डी और ख़तरनाक दिखाइर् देते थे। अंग्रेशों को लगता था कि ऐसे राजाओं को नियंत्रिात करना और वुफचलना शरूरी है। पफलस्वरूप, मैसूर के साथ अंग्रेशों की चार बार जंग हुइर् ;1767 - 69, 1780 - 84, 1790 - 92 और 1799द्ध। श्रीरंगपट्म की आख्िारी जंग में वंफपनी को सपफलता मिली। अपनी राजधानी की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान मारे गए और मैसूर का राजकाज पुराने वोडियार राजवंश के हाथों में सौंप दिया गया। इसके साथ ही मैसूर पर भी सहायक संध्ि थोप दी गइर्। चित्रा 8 - टीपू सुल्तान के बेटों को बंधक के रूप में काॅनर्वालिस के सामने पेश किया जा रहा है। डेनियल आॅमर् द्वारा चित्रिात, 1793वंफपनी की पफौजों को हैदर अली और टीपू सुल्तान ने कइर् बार यु( में हराया था। लेकिन 1792 में मराठों, हैदराबाद के निशाम और वंफपनी की संयुक्त पफौजों के हमले के बाद टीपू सुल्तान को अंग्रेशों से संिा करनी पड़ी। इस संिा के तहत उनके दो बेटों को अंग्रेशों ने बंधक के रूप में अपने पास रख लिया। बि्रटिश चित्राकारों को ऐसे दृश्यों की तसवीर बनाने में मशा आता था जिनमें अंग्रेशों की सत्ता की विजय दिखाइर् देती थी। कन्प़्ोफडरेसी - गठबंधन मराठों से लड़ाइर् अठारहवीं शताब्दी के आख्िार से वंफपनी मराठों की ताकत को भी व़्ाफाबू और खत्म करने के बारे में सोचने लगी थी। 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाइर् में हार के बाद दिल्ली से देश का शासन चलाने का मराठों का सपना चूर - चूर हो गया। उन्हें कइर् राज्यों में बाँट दिया गया। इन राज्यों की बागडोर सिंिाया, होलकर, गायकवाड और भोंसले जैसे अलग - अलग राजवंशों के हाथों में थी। ये सारे सरदार एक पेशवा ;सवोर्च्च मंत्राीद्ध के अंतगर्त एक कन्प़्ोफडरेसी;राज्यमण्डलद्ध के सदस्य थे। पेशवा इस राज्यमण्डल का सैनिक और प्रशासकीय प्रमुख होता था और पुणे में रहता था। महाद्जी सिंिाया और नाना पफड़नीस अठारहवीं सदी के आख्िार के दो प्रसि( मराठा यो(ा और राजनीतिज्ञ थे। एक के बाद एक कइर् यु(ों में कंपनी ने मराठों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। पहला यु( 1782 में सालबाइर् संिा के साथ खत्म हुआ जिसमें कोइर् पक्ष नहीं जीत पाया। दूसरा अंग्रेश - मराठा यु( ;1803 - 05द्ध कइर् मोचो± पर लड़ा गया। इसका नतीजा यह हुआ कि उड़ीसा और यमुना के उत्तर में स्िथत आगरा व दिल्ली सहित कइर् भूभाग अंग्रेशों के कब्शे में आ गए। अंततः, 1817 - 19 के तीसरे अंग्रेश - मराठा यु( में मराठों की ताकत को पूरी तरह वुफचल दिया गया। पेशवा को पुणे से हटाकर कानपुर के पास बिठूर में पेंशन पर भेज दिया गया। अब विंध्य के दक्ष्िाण में स्िथत पूरे भूभाग पर वंफपनी का नियंत्राण हो चुका था। सवोर्च्चता का दावा उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से वंफपनी क्षेत्राीय विस्तार की आव्रफामक नीति पर चल रही थी। लाॅडर् हेस्िटंग्स ;1813 से 1823 तक गवनर्र - जनरलद्ध के नेतृत्व में फ्सवोर्च्चताय् की एक नयी नीति शुरू की गइर्। वंफपनी का दावा था कि उसकी सत्ता सवोर्च्च है इसलिए वह भारतीय राज्यों से ऊपर है। अपने हितों की रक्षा के लिए वह भारतीय रियासतों का अिाग्रहण करने या उनको अिाग्रहण की धमकी देने का अिाकार अपने पास मानती थी। यह सोच बाद में भी अंग्रेशों की नीतियों में दिखाइर् देती रही। लेकिन यह प्रवि्रफया बेरोकटोक नहीं चली। उदाहरण के लिए, जब अंग्रेशों ने कित्तूर ;पिफलहाल कनार्टक मेंद्ध के छोटे से राज्य को कब्शे में लेने का प्रयास किया तो रानी चेन्नम्मा ने हथ्िायार उठा लिए और अंग्रेशों के ख्ि़ालाप़फ आंदोलन छेड़ दिया। 1824 में उन्हें गिरफ्ऱतार किया गया और 1829 में जेल में ही उनकी मृत्यु हो गइर्। चेन्नम्मा के बाद कित्तूर स्िथत संगोली के एक गरीब चैकीदार रायन्ना ने यह प्रतिरोध जारी रखा। चैतरपफा समथर्न और सहायता से उन्होंने बहुत सारे बि्रटिश श्िाविरों और दस्तावेशों को नष्ट कर दिया था। आख्िारकार उन्हें भी अंग्रेशों ने पकड़कर 1830 में पफाँसी पर लटका दिया। प्रतिरोध के ऐसे कइर् दूसरे उदाहरण आप इस किताब में आगे पढ़ेंगे। 1830 के दशक के अंत में इर्स्ट इंडिया वंफपनी रूस के प्रभाव से बहुत डरी हुइर् थी। वंफपनी को भय था कि कहीं रूस का प्रभाव पूरे एश्िाया में पैफलकर उत्तर - पश्िचम से भारत को भी अपनी चपेट में न ले ले। इसी डर के चलते अंग्रेश अब उत्तर - पश्िचमी भारत पर भी अपना नियंत्राण स्थापित करना चाहते थे। उन्होंने 1838 से 1842 के बीच अपफगानिस्तान के साथ एक लंबी लड़ाइर् लड़ी और वहाँ अप्रत्यक्ष वंफपनी शासन स्थापित कर लिया। 1843 में सिंध भी कब्शे में आ गया। इसके बाद पंजाब की बारी थी। यहाँ महाराजा रणजीत सिंह ने वंफपनी की दाल नहीं गलने दी। 1839 में उनकी मृत्यु के बाद इस रियासत के साथ दो लंबी लड़ाइयाँ हुईं और आख्िारकार 1849 में अंग्रेशों ने पंजाब का भी अिाग्रहण कर लिया। विलय नीति अिाग्रहण की आख्िारी लहर 1848 से 1856 के बीच गवनर्र - जनरल बने लाॅडर् डलहौशी के शासन काल में चली। लाॅडर् डलहौशी ने एक नयी नीति अपनाइर् जिसे विलय नीति का नाम दिया गया। यह सि(ांत इस तवर्फ पर आधारित था कि अगर किसी शासक की मृत्यु हो जाती है और उसका कोइर् पुरुष वारिस नहीं है तो उसकी रियासत हड़प कर ली जाएगी यानी वंफपनी के भूभाग का हिस्सा बन जाएगी। इस सि(ांत के आधार पर एक के बाद एक कइर् रियासतें - सतारा ;1848द्ध, संबलपुर ;1850द्ध, उदयपुर ;1852द्ध, नागपुर ;1853द्ध और झाँसी ;1854द्ध - अंग्रेशों के हाथ में चली गईं। आख्िारकार 1856 में वंफपनी ने अवध को भी अपने नियंत्राण में ले लिया। इस बार अंग्रेशों ने एक नया तवर्फ दिया। उन्होंने कहा कि वे अवध की जनता को नवाब के फ्वुफशासनय् से आशाद कराने के लिए फ्कतर्व्य से बँधेय् हुए हैं इसलिए वे अवध पर कब्शा करने को मजबूर हैं! अपने पि्रय नवाब को जिस तरह से गद्दी से हटाया गया, उसे देखकर लोगों में गुस्सा भड़क उठा और अवध के लोग भी 1857 के महान विद्रोह में शामिल हो गए। गतिवििा कल्पना कीजिए कि आप नवाब के भतीजे हैं। आपको बचपन से ही यह एहसास कराया गया है कि एक दिन आप राजगद्दी सँभालेंगे। अब आपको पता चलता है कि विलय नीति के कारण अंग्रेश आपको राजा नहीं बनने देंगे। आपको वैफसा लगेगा? राजगद्दी पाने के लिए आप क्या करेंगे? नए शासन की स्थापना गवनर्र - जनरल वाॅरेन हेस्िटंग्स ;1773 - 1785द्ध उन बहुत सारे महत्वपूणर् व्यक्ितयों में से था जिन्होंने वंफपनी की ताकत पैफलाने में अहम भूमिका अदा की थी। वाॅरेन हेस्िटंग्स के समय तक आते - आते वंफपनी न केवल बंगाल बल्िक बम्बइर् और मद्रास में भी सत्ता हासिल कर चुकी थी। बि्रटिश इलाके मोटे तौर पर प्रशासकीय इकाइयों में बँटे हुए थे जिन्हें प्रेिाडेंसी कहा जाता था। उस समय तीन प्रेिाडेंसी थीं - बंगाल, मद्रास और बम्बइर्। हरेक का शासन गवनर्र के पास होता था। सबसे उफपर गवनर्र - जनरल होता था। वाॅरेन हेस्िटंग्स ने कइर् प्रशासकीय सुधार किए। न्याय के क्षेत्रा में उसके सुधार ख़ासतौर से उल्लेखनीय थे। 1772 से एक नयी न्याय व्यवस्था स्थापित की गइर्। इस व्यवस्था में प्रावधान किया गया कि हर जिले में दो अदालतें होंगी - प़्ाफौजदारी अदालत और दीवानी अदालत। दीवानी अदालतों के मुख्िाया यूरोपीय िाला कलेक्टर होते थे। मौलवी और हिंदू पंडित उनके लिए भारतीय कानूनों की व्याख्या करते थे। पफौजदारी अदालतें अभी भी़काशी और मुफ्ऱती के ही अंतगर्त थीं लेकिन वे भी कलेक्टर की निगरानी में काम करते थे। काशी - एक न्यायाधीश। मुफ्रती - मुसलिम समुदाय का एक न्यायविद जो कानूनों की व्याख्या करता है। काशी इसी व्याख्या के आधार पर प़्ौफसले सुनाता है। महाभ्िायोग - जब इंग्लैंड के हाउस आॅपफ काॅमंस में किसी व्यक्ित के ख्ि़ालाप़फ दुराचरण का आरोप लगाया जाता है तो हाउस आॅप़्ाफ लाॅड्सर् ;संसद का उफपरी सदनद्ध में उस व्यक्ित के ख्ि़ालाप़्ाफ मुकदमा चलता है। इसे महाभ्िायोग कहा जाता है। जब वाॅरेन हेस्िटंग्स 1785 में इंग्लैंड लौटा तो ऐडमंड बवेर्फ ने उस पर बंगाल का शासन सही ढंग से न चलाने का आरोप जड़ दिया। इस आरोप के चलते हेस्िटंग्स पर बि्रटिश संसद में महाभ्िायोग का मुकदमा चलाया गया जो सात साल चला। ड्डोत 5 फ्मैं सबके शत्राु और उत्पीड़क पर महाभ्िायोग चला रहा हूँ।य् वाॅरेन हेस्िटंग्स के महाभ्िायोग की कारर्वाइर् के दौरान ऐडमंड बवर्फ ने एक उत्तेजनापूणर् भाषण दिया जिसका एक हिस्सा इस प्रकार था: मैं उनके ;हेस्िटंग्स केद्ध ऊपर भारत के लोगों की ओर से महाभ्िायोग चला रहा हूँ जिनके अिाकारों को उन्होंने पैरों तले रौंद दिया और जिनके देश को उन्होंने रेगिस्तान बना दिया है। अंत में, मानव स्वभाव के नाम पर, स्त्राी - पुरुष के नाम पर, हर उम्र के नाम पर, हर ओहदे के नाम पर मैं सबके साझा शत्राु और सबके उत्पीड़क पर महाभ्िायोग चला रहा हूँ। धमर्शास्त्रा - संस्वृफत की ऐसी वृफतियाँ जिनमें सामाजिक तौर - तरीकों और आचरण के सि(ांतों की व्याख्या की जाती है। ये धमर्शास्त्रा इर्सा पूवर् 500 वषर् से भी पहले लिखे गए थे। सवार - घुड़सवार मस्केट .पैदल सिपाहियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक भारी बंदूक। मैचलाॅक - शुरुआती दौर की बंदूक जिसमें बारूद को माचिस से चिंगारी दी जाती थी। एक बड़ी समस्या यह थी कि ब्राह्मण पंडित धमर्शास्त्रा की अलग - अलग शाखाओं के हिसाब से स्थानीय कानूनों की अलग - अलग व्याख्या कर देते थे। इस भ्िान्नता को खत्म करके समरूपता लाने के लिए 1775 में 11 पंडितों को भारतीय कानूनों का एक संकलन तैयार करने का काम सौंपा गया। एनबी. हालहेड ने इस संकलन का अंग्रेशी में अनुवाद किया। 1778 तक यूरोपीय न्यायाधीशों के लिए मुसलिम कानूनों की भी एक संहिता तैयार कर ली गइर् थी। 1773 के रेग्युलेटिंग ऐक्ट के तहत एक नए सवोर्च्च न्यायालय की स्थापना की गइर्। इसके अलावा कलकत्ता में अपीलीय अदालत - सदर निशामत अदालत - की भी स्थापना की गइर्। भारतीय जिले में कलेक्टर सबसे बड़ा ओहदा होता था। जैसा कि नाम से ही पता चलता है, उसका मुख्य काम लगान और कर इकट्ठा करना तथा न्यायाधीशों, पुलिस अिाकारियों व दारोगा की सहायता से िाले में कानून - व्यवस्था बनाए रखना होता था। उसका कायार्लय - कलेक्टरेट - सत्ता और संरक्षण का नया वेंफद्र बन गया था जिसने पुराने सत्ता वेंफद्रों को हाश्िाये पर ढकेल दिया। वंफपनी की प़्ाफौज वंफपनी के साथ भारत में शासन और सुधार के नए विचार तो आए लेकिन उसकी असली सत्ता सैनिक ताकत में थी। मुग़्ाल प़्ाफौज मुख्य रूप से घुड़सवार ;सवार: घोड़े पर चलने वाले प्रश्िाक्ष्िातद्ध और पैदल सेना थी। उन्हें तीरंदाजी और तलवारबाशी का प्रश्िाक्षण दिया जाता था। सेना में सवारों का दबदबा रहता था और मुग़्ाल साम्राज्य को एक विशाल पेशेवर प्रश्िाक्षण वाली पैदल सेना की शरूरत महसूस नहीं होती थी। ग्रामीण इलाकों में सशस्त्रा किसानों की बड़ी संख्या थी। स्थानीय शमींदार मुग़्ालों को शरूरत पड़ने पर पैदल सिपाही मुहैया कराते थे। अठारहवीं सदी में जब अवध और बनारस जैसी रियासतों में किसानों को भतीर् करके उन्हें पेशेवर सैनिक प्रश्िाक्षण दिया जाने लगा तो यह सूरत बदलने लगी। इर्स्ट इंडिया वंफपनी ने जब अपनी सेना के लिए भतीर् शुरू की तो उसने भी यही तरीका अपनाया। अंग्रेश अपनी सेना को सिपाॅय ;जो भारतीय शब्द ‘सिपाही’ से ही बना हैद्ध आमीर् कहते थे। 1820 के दशक से जैसे - जैसे यु( तकनीक बदलने लगी वंफपनी की सेना में घुड़सवार टुकडि़यों की शरूरत कम होती गइर्। इसकी वजह यह थी कि बि्रटिश साम्राज्य बमार्, अपफगानिस्तान और मिड्ड में भी लड़ रहा था जहाँ सिपाही मस्केट ;तोड़ेदार बंदूकद्ध और मैचलाॅक से लैस होते थे। वंफपनी की सेना के सिपाहियों को बदलती सैनिक आवश्यकताओं का ध्यान रखना पड़ता था और अब उसकी पैदल टुकड़ी ज़्यादा महत्वपूणर् होती जा रही थी। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में अंग्रेश एक समरूप सैनिक संस्वृफति विकसित करने लगे थे। सिपाहियों को यूरोपीय ढंग का प्रश्िाक्षण, अभ्यास और अनुशासन सिखाया जाने लगा। अब उनका जीवन पहले से भी ज़्यादा नियंत्रिात था। इस कोश्िाश में कभी - कभी समस्याएँ भी आ जाती थीं क्योंकि पेशेवर सिपाहियों की सेना खड़ा करने के चक्कर में अंग्रेश कइर् बार जाति और समुदाय की भावनाओं को नशरअंदाश कर देते थे। भला लोग अपनी जातीय और धामिर्क भावनाओं को इतनी आसानी से कैसे छोड़ सकते थे? क्या वे खुद को अपने समुदाय का सदस्य मानने की बजाय सिप़र्फ सिपाही मान सकते थे? सिपाही क्या महसूस करते थे? अपने जीवन और अपनी पहचान, यानी वे कौन हैं, इस बात के अहसास में जो बदलाव आ रहे थे उनको सिपाहियों ने किस तरह देखा? 1857 का विद्रोह हमें सिपाहियों की इस दुनिया की झलक दिखाता है। इस विद्रोह के बारे में आप अध्याय 5 में पढ़ेंगे। निष्कषर् इर्स्ट इंडिया वंफपनी एक व्यापारिक वंफपनी से बढ़ते - बढ़ते एक भौगोलिक औपनिवेश्िाक शक्ित बन गइर्। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में नयी भाप तकनीक के आने से यह प्रवि्रफया और तेश हुइर्। तब तक समुद्र मागर् से भारत पहुँचने में 6 - 8 माह का समय लग जाता था। भाप से चलने वाले जहाशों ने यह यात्रा तीन हफ्ऱतों में समेट दी। इसके बाद तो ज़्यादा से ज़्यादा अंग्रेश और उनके परिवार भारत जैसे दूर देश में आने लगे। 1857 तक भारतीय उपमहाद्वीप के 63 प्रतिशत भूभाग और 78 प्रतिशत आबादी पर वंफपनी का सीधा शासन स्थापित हो चुका था। देश के शेष भूभाग और आबादी पर वंफपनी का अप्रत्यक्ष प्रभाव था। इस प्रकार, व्यावहारिक स्तर पर इर्स्ट इंडिया वंफपनी पूरे भारत को अपने नियंत्राण में ले चुकी थी। मराठों और मैसूर के साथ हुए यु(ों के बाद वंफपनी को अपनी घुड़सवार टुकडि़यों को मशबूत करने की अहमियत समझ में आने लगी थी। दक्ष्िाण अप्रफीका में दास व्यापार डच व्यापारी सत्राहवीं सदी में दक्ष्िाण अप्रफीका पहुँचे। जल्द ही दास व्यापार शुरू हो गया। लोगों को बंधक बनाकर जंजीरों में बाँध्कर दास बाशारों में बेचा जाने लगा। 1834 में दास प्रथा के अन्त के समय अप्रफीका के दक्ष्िाणी सिरे पर स्िथत केप में निजी स्वामित्व में दासों की संख्या 36,774 थी। 1824 में केप आने वाले एक यात्राी ने वहाँ होने वाली नीलामी का आँखों देखा ब्योरा प्रस्तुत किया है - फ्यह मालूम होने पर कि पशुओं, वृफष्िा उत्पादों की नीलामी होने वाली है... हमने अपनी गाड़ी नए बैल खरीदने के लिए रोक ली। नीलामी के माल में एक स्त्राी - दास और उसके तीन बच्चे थे। किसानों ने पशुओं के समान ही उन्हें परखा। उन्हें अलग - अलग खरीदारों को बेच दिया गया। माँ ने चिन्ता, वेदना और आँसू भरी आँखों से बच्चों की तरपफ देखा। दुखी बच्चे व्यावुफल माँ - बाप से चिपक गये। यह दृश्य दिल को पिघलाने वाला था। इसके विपरीत मौजूद दशर्कों के चेहरे हँसते हुये एवं असंवेदनशील थे। नाइर्जल वोडर्न द्वारा लिख्िात, द चेनस देट बाइंड अस: ए हिस्ट्री आॅपफ सलेवरी एट द केप, 1996 फिर से याद करें 1.निम्नलिख्िात के जोड़े बनाएँ दीवानी टीपू सुल्तान फ्शेर - ए - मैसूरय् भूराजस्व वसूल करने का अिाकार प़्सिपाॅयाफौजीदारी अदालत रानी चेन्नम्मा भारत का पहला गवनर्र - जनरल सिपाही पफौजदारी अदालत़वाॅरेन हेस्िटंग्स कित्तूर में अंग्रेश - विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया 2.रिक्त स्थान भरें ;कद्ध बंगाल पर अंग्रेशों की जीत .............. की जंग से शुरू हुइर् थी। ;खद्ध हैदर अली और टीपू सुल्तान ............. के शासक थे। ;गद्ध डलहौशी ने .................. का सि(ांत लागू किया। ;घद्ध मराठा रियासतें मुख्य रूप से भारत के ................. भाग में स्िथत थीं। 3.सही या गलत बताएँ: ;कद्ध मुग़्ाल साम्राज्य अठारहवीं सदी में मशबूत होता गया। ;खद्ध इंग्िलश इर्स्ट इंडिया वंफपनी भारत के साथ व्यापार करने वाली एकमात्रा यूरोपीय वंफपनी थी। ;गद्ध महाराजा रणजीत सिंह पंजाब के राजा थे। ;घद्ध अंग्रेशों ने अपने कब्शे वाले इलाकों में कोइर् शासकीय बदलाव नहीं किए। आइए विचार करें 4.यूरोपीय व्यापारिक वंफपनियाँ भारत की तरपफ क्यों आकष्िार्त हो रही थीं? 5.बंगाल के नवाबों और इर्स्ट इंडिया वंफपनी के बीच किन बातों पर विवाद थे? 6.दीवानी मिलने से इर्स्ट इंडिया वंफपनी को किस तरह पफायदा पहुँचा? 7.इर्स्ट इंडिया वंफपनी टीपू सुल्तान को खतरा क्यों मानती थी? 8.फ्सब्िसडियरी एलायंसय् ;सहायक संध्िद्ध व्यवस्था की व्याख्या करें। 9.वंफपनी का शासन भारतीय राजाओं के शासन से किस तरह अलग था? 10.वंफपनी की सेना की संरचना में आए बदलावों का वणर्न करें। 11.बंगाल में अंग्रेशों की जीत के बाद कलकत्ता एक छोटे से गाँव से बड़े शहर में तब्दील हो गया। औपनिवेश्िाक काल के दौरान शहर के यूरोपीय और भारतीय निवासियों की संस्वृफति, श्िाल्प और जीवन के बारे में पता लगाएँ। 12.निम्नलिख्िात में से किसी के बारे में तसवीरें, कहानियाँ, कविताएँ और जानकारियाँ इकट्ठा करें - झाँसी की रानी, महादजी सिंिाया, हैदर अली, महाराजा रणजीत सिंह, लाॅडर् डलहौशी या आपके इलाके का कोइर् पुराना शासक।

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