1 कैसे, कब और कहाँ तारीख़ें कितनी महत्वपूणर् होती हैं? एक वक्त था जब इतिहासकार तारीख़ों के जादू में ही खोए रहते थे। कब किस राजा की ताजपोशी हुइर्, कब कौन सा यु( हुआ - इन्हीं तारीख़ों पर गमार्गमर् बहसें चलती थीं। आम समझ के हिसाब से इतिहास को तारीख़ों का पयार्य माना जाता था। आपने भी लोगों को यह कहते हुए सुना होगा: फ्इतिहास तो बहुत उबाउफ है भइर्। बस तारीख़ें रटते चले जाओ!य् क्या इतिहास के बारे में यह धारणा सही है? इसमें कोइर् शक नहीं कि इतिहास अलग - अलग समय पर आने वाले बदलावों के बारे में ही होता है। इसका संबंध इस बात से है कि अतीत में चीशें किस तरह की थीं और उनमें क्या बदलाव आए हैं। जैसे ही हम अतीत और वतर्मान की तुलना करते हैं, हम समय का िाव्रफ करने लगते हैं। हम फ्पहलेय् और फ्बाद मेंय् की बात करने लगते हैं। रोशमरार् की िांदगी में हम अपने आसपास की चीशों पर हमेशा ऐतिहासिक सवाल नहीं उठाते। हम चीशों को स्वाभाविक मानकर चलते हैं। मानो जो वुफछ हमें दिख रहा है वह हमेशा से ऐसा ही रहा हो। लेकिन हम सबके सामने कभी - कभी अचंभे के क्षण आते हैं। कइर् बार हम उत्सुक हो जाते हैं और ऐसे सवाल पूछते हैं जो वावफइर् ऐतिहासिक होते हैं। किसी व्यक्ित को सड़क किनारे चाय के घूँट भरते देखकर आप इस बात पर हैरान हो सकते हैं कि चाय या काॅपफी पीने का चलन शुरू कब से हुआ होगा? रेलगाड़ी की ख्िाड़की से बाहर झाँकते हुए आपके शहन में यह सवाल उठ सकता है कि रेलवे का निमार्ण कब हुआ? रेलगाड़ी के आने से पहले लोग दूर - दूर की यात्रा किस तरह कर पाते थे? सुबह - सुबह अख़बार पढ़ते हुए आप यह जानने के लिए उत्सुक हो सकते हैं कि जिस शमाने में अख़बार नहीं छपते थे, उस समय लोगों को चीशों की जानकारी वैफसे मिलती थी। चित्रा 1 - ब्राह्मण बि्रटेनिया को शास्त्रा भेंट कर रहे हैं, जेम्स रेनेल द्वारा तैयार किए गए पहले नक्शे का आवरण चित्रा, 1782राॅबटर् क्लाइव ने रेनेल को हिंदुस्तान के नक्.शेे तैयार करने का काम सौंपा था। भारत पर अंग्रेशों की विजय के समथर्क रेनेल को वचर्स्व स्थापित करने की प्रवि्रफया में नक्शे तैयार करना बहुत महत्वपूणर् लगता था। इस तसवीर में दिखाया गया है कि भारत के लोग स्वेच्छापूवर्क अपने प्राचीन पवित्रा गं्रथ बि्रटिश सत्ता की प्रतीक बि्रटेनिया को सौंप रहे हैं मानो वे उसे भारतीय संस्वृफति की रक्षा के लिए आने का आग्रह कर रहे हों।चित्रा 2 - विज्ञापनों से भी पसंद - नापसंद तय होती है। पुराने विज्ञापनों से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि नए उत्पादों के लिए बाशार किस तरह तैयार हुए और किस तरह नयी रुचियाँ चलन में आयीं। 1922 में लिप्टन चाय के लिए तैयार किया गया यह विज्ञापन इस बात की ओर संकेत करता है कि दुनिया भर के शाही लोग यही चाय पीते हैं। इस तसवीर में पीछे की तरप़्ाफ एक भारतीय महल दिखाइर् दे रहा है जबकि अगले हिस्से में बि्रटेन की रानी विक्टोरिया का तीसरा बेटा राजवुफमार आथर्र घोड़े पर बैठा हुआ है। राजवुफमार आथर्र को ड्यूक आॅपफ कनाॅट की पदवी दी गइर् थी।़ये सारे ऐतिहासिक सवाल हमें समय के बारे में सोचने के लिए प्रेरित कर देते हैं। समय को हमेशा साल या महीनों के पैमाने पर ही नहीं देखा जा सकता। कइर् बार ऐसी प्रवि्रफयाओं के लिए कोइर् तारीख़ तय करना वाव़्ाफइर् ग़्ालत होता है जो एक लंबे समय तक चलती रहती हैं। भारत में लोगों ने अचानक एक दिन सुबह - सबेरे चाय पीना शुरू नहीं कर दिया था। इसका स्वाद धीरे - धीरे ही उनकी शबान पर चढ़ा था। इस तरह की प्रवि्रफयाओं के लिए कोइर् स्पष्ट तिथ्िा नहीं हो सकती। इसी तरह हम बि्रटिश शासन की स्थापना के लिए भी कोइर् एक तिथ्िा नहीं बता सकते। राष्ट्रीय आंदोलन किस दिन शुरू हुआ या अथर्व्यवस्था या समाज में किस दिन बदलाव आए, यह बताना भी संभव नहीं है। ये सारी चीशें एक लंबे समय में घटती हैं। ऐसे में हम सिप़र्फ एक अविा की ही बात कर सकते हैं, एक लगभग सही अविा के बारे में बता सकते हैं जब वे खास बदलाव दिखाइर् देने शुरू हुए होंगे। तो पिफर लोग इतिहास को तारीख़ों से जोड़ कर क्यों देखते हैं? इस जुड़ाव की एक वजह है। एक समय था जब यु( और बड़ी - बड़ी घटनाओं के ब्योरों को ही इतिहास माना जाता था। यह इतिहास राजा - महाराजाओं और उनकी नीतियों के बारे में होता था। इतिहासकार यह लिखते थे कि कौन से साल राजा को ताज पहनाया गया, किस साल उसका विवाह हुआ, किस साल उसके घर में बच्चा पैदा हुआ, कौन से साल उसने कौन सी लड़ाइर् लड़ी, वह कब मरा और उसके बाद कब कौन - सा शासक गद्दी पर बैठा। इस तरह की घटनाओं के लिए निश्िचत तिथ्िा बताइर् जा सकती है और इस तरह के इतिहासों में तिथ्िायों का महत्व बना रहता है। जैसा कि पिछले दो साल की इतिहास की किताबों में आपने देखा है, अब इतिहासकार बहुत सारे दूसरे मुद्दों और दूसरे सवालों के बारे में भी लिखने लगे हैं। वे इस बात पर ध्यान देते हैं कि लोग किस तरह अपनी रोशी - रोटी चलाते थे। वे क्या पैदा करते थे और क्या खाते थे। शहर वैफसे बने और बाशार किस तरह पैफले। किस तरह रियासतें बनीं, नए विचार पनपे और संस्वृफति व समाज किस तरह बदले। कौन सी तारीख़ें? वुफछ तारीख़ों को महत्वपूणर् मानने का पैमाना क्या होता है? हम जो तारीख़ें चुनते हैं, जिन तारीख़ों के इदर् - गिदर् हम अतीत की कहानी बुनते हैं, वे अपने आप में महत्वपूणर् नहीं होतीं। वे इसलिए महत्वपूणर् हो जाती हैं क्योंकि हम वुफछ खास घटनाओं को महत्वपूणर् मानकर चलने लगते हैं। अगर अध्ययन का विषय बदल जाता है, अगर हम नए मुद्दों पर ध्यान देने लगते हैं तो महत्वपूणर् तारीख़ें भी बदल जाती हैं। एक उदाहरण पर विचार कीजिए। भारत में बि्रटिश इतिहासकारों ने जो इतिहास लिखे उनमें हरेक गवनर्र - जनरल का शासनकाल महत्वपूणर् है। ये इतिहास प्रथम गवनर्र - जनरल वाॅरेन हेस्िटंग्स के शासन से शुरू होते थे और आख्िारी वायसराॅय, लाॅडर् माउंटबैटन के साथ खत्म होते थे। अलग - अलग अध्यायों में हम दूसरे गवनर्र - जनरलों - हेस्िटंग्स, वेलेश्ली, बेंटिंक, डलहौशी, वैफनिंग, लाॅरेंस, लिटन, रिपन, कजऱ्न, हाडि±ग, इरविन - के बारे में भी पढ़ते हैं। इस इतिहास में गवनर्र - जनरलों और वायसराॅ़यों का कभी न खत्म होने वाला सिलसिला ही छाया रहता था। इतिहास की इन किताबों में सारी तारीख़ों का महत्व इन अिाकारियों, उनकी गतिवििायों, नीतियों, उपलब्िधयों के आधार पर ही तय होता था। यह ऐसे था मानो इन लोगों के जीवन के बाहर कोइर् ऐसी चीश नहीं थी जिसे जानना महत्वपूणर् हो। इन लोगों के जीवन का व्रफम बि्रटिश भारत के इतिहास में अलग - अलग अध्यायों का विषय बन जाता था। क्या हम इसी दौर के इतिहास को अलग ढंग से नहीं लिख सकते? गवनर्र - जनरलों के इस इतिहास के चैखटे में हम भारतीय समाज के विभ्िान्न समूहों और वगो± की गतिवििायों पर किस तरह ध्यान दे सकते हैं? जब हम इतिहास या कोइर् कहानी लिखते हैं तो उसे टुकड़ों या अध्यायों में बाँट देते हैं। हम ऐसा क्यों करते हैं? ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि हर अध्याय में वुफछ सामंजस्य रहे। इसका मव़्ाफसद कहानी को इस तरह सामने लाना होता है कि उसे आसानी से समझा जा सके और याद रखा जा सके। इस प्रवि्रफया में हम सिप़र्फ उन घटनाओं पर शोर देते हैं जो उस कहानी को पेश करने में मददगार होती हैं। जो इतिहास गवनर्र - जनरलों के जीवन के इदर् - गिदर् चलता है उसमें भारतीयों की गतिवििायाँ कोइर् मायने नहीं रखतीं। उनके लिए वहाँ कोइर् जगह नहीं होती। तो पिफर क्या किया जाए? शाहिर है हमें अपने इतिहास का एक अलग ख़ाका बनाना पड़ेगा। इसका मतलब यह है कि अब तक जिन तिथ्िायों को महत्व दिया जा रहा था वे महत्वपूणर् नहीं रहेंगी। हमारे लिए नयी तिथ्िायाँ महत्वपूणर् हो जाएँगी। हम अविायाँ वैफसे तय करते हैं? 1817 में स्काॅटलैंड के अथर्शास्त्राी और राजनीतिक दाशर्निक जेम्स मिल ने तीन विशाल खंडों में ए हिस्ट्री आॅप़्ाफ बि्रटिश इंडिया ;बि्रटिश भारत का इतिहासद्ध नामक एक किताब लिखी। इस किताब में उन्होंने भारत के इतिहास को हिंदू, मुसलिम और बि्रटिश, इन तीन काल खंडों में बाँटा था। काल खंडों के इस निधार्रण को श्यादातर लोगों ने मान भी लिया। क्या आपको भारतीय इतिहास को समझने के इस तरीके में कोइर् समस्या दिखाइर् देती है? इतिहास को हम अलग - अलग काल खंडों में बाँटने की कोश्िाश क्यों करते हैं? इसकी भी एक वजह है। हम एक दौर की ख़ासियतों, उसके वेंफद्रीय तत्वों को पकड़ने की कोश्िाश करते हैं। इसीलिए ऐसे शब्द महत्वपूणर् हो जाते हैं जिनके सहारे हम समय को बाँटते हैं। ये शब्द अतीत के बारे में हमारे विचारों को दशार्ते हैं। वे हमें बताते हैं कि एक अविा से दूसरी अविा के बीच आए बदलावों का क्या महत्व होता है। मिल को लगता था कि सारे एश्िायाइर् समाज सभ्यता के मामले में यूरोप से पीछे हैं। इतिहास की उनकी समझदारी ये थी कि भारत में अंग्रेशों के आने से पहले यहाँ हिंदू और मुसलमान तानाशाहों का ही राज चलता था। यहाँ चारों ओर केवल धामिर्क बैर, जातिगत बंधनों और अंधविश्वासों का ही बोलबाला था। मिल की राय में बि्रटिश शासन भारत को सभ्यता की राह पर ले जा सकता था। इस काम के लिए शरूरी था कि भारत में यूरोपीय श्िाष्टाचार, कला, संस्थानों और वफानूनों को लागू किया जाए। मिल ने तो यहाँ तक सुझाव दिया था कि अंग्रेशों को भारत के सारे भूभाग पर कब्शा कर लेना चाहिए ताकि भारतीय जनता को ज्ञान और सुखी जीवन प्रदान किया जा सके। उनका मानना था कि अंग्रेशों की मदद के बिना हिंदुस्तान प्रगति नहीं कर सकता। इतिहास की इस धारणा में अंग्रेशी शासन प्रगति और सभ्यता का प्रतीक था। अंग्रेशी शासन से पहले सारा अंधकार का दौर था। क्या इस तरह की धारणा को स्वीकार किया जा सकता है? क्या इतिहास के किसी दौर को फ्हिंदूय् या फ्मुसलमानय् दौर कहा जा सकता है? क्या इन सारे दौरों में कइर् तरह के धमर् एक साथ नहीं चलते थे? किसी युग को केवल उस समय के शासकों के धमर् के हिसाब से तय करने की शरूरत क्या है? अगर हम ऐसा करते हैं तो इसका मतलब यह कहना चाहते हैं कि औरों के जीवन और तौर - तरीकों का कोइर् महत्व नहीं होता। हमें याद रखना चाहिए कि प्राचीन भारत में सारे शासकों का भी एक धमर् नहीं होता था। अंग्रेशों द्वारा सुझाए गए वगीर्करण से अलग हटकर इतिहासकार भारतीय इतिहास को आमतौर पर ‘प्राचीन’, ‘मध्यकालीन’, तथा ‘आधुनिक’ काल में बाँटकर देखते हैं। इस विभाजन की भी अपनी समस्याएँ हैं। इतिहास को इन खंडों में बाँटने की यह समझ भी पश्िचम से आइर् है। पश्िचम में आधुनिक काल को विज्ञान, तवर्फ, लोकतंत्रा, मुक्ित और समानता जैसी आधुनिकता की ताकतों के विकास का युग माना जाता है। उनके लिए मध्यकालीन समाज वे समाज थे जहाँ आधुनिक समाज की ये विशेषताएँ नहीं थीं। क्या हम अपने अध्ययन के लिए आधुनिक काल की इस अवधारणा को बिना सोचे - विचारे ऐसे ही अपना सकते हैं? जैसा कि आप इस किताब में देखेंगे, अंग्रेशों के शासन में लोगों के पास समानता, स्वतंत्राता या मुक्ित नहीं थी। न ही यह आथ्िार्क विकास और प्रगति का दौर था। बहुत सारे इतिहासकार इस युग को ‘औपनिवेश्िाक’ युग कहते हैं। औपनिवेश्िाक क्या होता है? इस किताब में आप पढ़ेंगे कि किस तरह अंग्रेशों ने हमारे देश को जीता और स्थानीय नवाबों और राजाओं को दबाकर अपना शासन स्थापित किया। आप देखेंगे कि किस तरह उन्होंने अथर्व्यवस्था व समाज पर नियंत्राण स्थापित किया, अपने सारे खचो± को निपटाने के लिए राजस्व वसूल किया, अपनी शरूरत की चीशों को सस्ती कीमत पर ख़रीदा, नियार्त के लिए महत्वपूणर् पफसलों की खेती करायी और इन सारी़कोश्िाशों के कारण क्या बदलाव आए। आप ये भी जानेंगे कि बि्रटिश शासन के कारण यहाँ की मूल्य - मान्यताओं और पसंद - नापसंद, रीति - रिवाज व तौर - तरीकों में क्या बदलाव आए। जब एक देश पर दूसरे देश के दबदबे से इस तरह के राजनीतिक, आथ्िार्क, सामाजिक और सांस्वृफतिक बदलाव आते हैं तो इस प्रवि्रफया को औपनिवेशीकरण कहा जाता है। लेकिन, जल्दी ही आप ये समझ जाएँगे कि सारे वगर् और समूह इन बदलावों को एक ही ढंग से अनुभव नहीं कर रहे थे। इसीलिए, इस किताब को हमारे अतीत ;यानी कइर् अतीतों पर केंदि्रतद्ध नाम दिया गया है। हम किस तरह जानते हैं? भारतीय इतिहास के पिछले 250 साल का इतिहास लिखने के लिए इतिहासकार कौन से ड्डोतों का इस्तेमाल करते हैं? प्रशासन अभ्िालेख तैयार करता है अंग्रेशी शासन द्वारा तैयार किए गए सरकारी रिकाॅडर् इतिहासकारों का एक महत्वपूणर् साधन होते हैं। अंग्रेशों की मान्यता थी कि चीशों को लिखना बहुत महत्वपूणर् होता है। उनके लिए हर निदेर्श, हर योजना, नीतिगत पैफसले, सहमति, जाँच को सापफ - साप़्ाफ लिखना शरूरी था। ऐसा करने के बाद चीशों़का अच्छी तरह अध्ययन किया जा सकता था और उन पर वाद - विवाद किया जा सकता है। इस समझदारी के चलते ज्ञापन, टिप्पणी और प्रतिवेदन पर आधारित शासन की संस्वृफति पैदा हुइर्। अंग्रेशों को यह भी लगता था कि तमाम अहम दस्तावेशों और पत्रों को सँभालकर रखना शरूरी है। लिहाशा, उन्होंने सभी शासकीय संस्थानों में अभ्िालेख कक्ष भी बनवा दिए। तहसील के दफ्ऱतर, कलेक्टरेट, कमिश्नर के दफ्ऱतर, प्रांतीय सचिवालय, कचहरी - सबके अपने रिकाॅडर् रूम होते थे। महत्वपूणर् दस्तावेशों को बचाकर रखने के लिए अभ्िालेखागार ;आकार्इवद्ध और संग्रहालय जैसे संस्थान भी बनाए गए। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में प्रशासन की एक शाखा से दूसरी शाखा के पास भेजे गए पत्रों और ज्ञापनों को आप आज भी अभ्िालेखागारों में देख सकते हैं। वहाँ आप िाला अिाकारियों द्वारा तैयार किए गए नोट्स और रिपोटर् पढ़ सकते हैं या उफपर बैठे अप़फसरों द्वारा प्रांतीय अिाकारियों को भेजे गए निदेर्श और सुझाव देख सकते हैं। उन्नीसवीं सदी के शुरुआती सालों में इन दस्तावेशों की सावधानीपूवर्क नव़्ाफलें बनाइर् जाती थीं। उन्हें खुशनवीसी के माहिर लिखते थे। खुशनवीसी या सुलेखनवीस ऐसे लोग होते हैं जो बहुत सुंदर ढंग से चीशें लिखते हैं। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक छपाइर् ड्डोत 1 गृह विभाग को भेजी गइर् रिपोटे± सन् 1946 में भारत की औपनिवेश्िाक सरकार शाही भारतीय नौसेना के जहाशों में सिपाहियों की बगावत को वुफचलने का प्रयास कर रही थी। उस समय विभ्िान्न बंदरगाहों से गृह विभाग को जो रिपोटे± मिल रही थीं उनके वुफछ नमूने इस प्रकार हैं: बम्बइर्: इस बात का इंतशाम कर लिया गया है कि सेना जहाशों और दफ्ऱतरों पर कब्शा कर ले। शाही नौसैनिक जहाश अभी भी बंदरगाह से बाहर ही हैं। कराची: 301 विद्रोहियों को गिरफ्ऱतार कर लिया गया है। वुफछ अन्य संदेहास्पद विद्रोही भी गिरफ्ऱतार किए गए हैं...सारे दफ्ऱतर... सैनिक निगरानी में हैं। विशाखापट्नम: स्िथति पूरी तरह नियंत्राण में है और कहीं हिंसा नहीं हुइर् है। जहाशों और प्रतिष्ठानों पर सैनिक गाडर् तैनात कर दिए गए हैं। किसी परेशानी की उम्मीद नहीं है सिवाय इसके कि संभव है वुफछ सिपाही काम पर न आएँ। डायरेक्टर आॅप़फ इंटेलिजेंस, हेडक्वाटर्र, इंडिया कमान्ड, सिचुएशन रिपोटर् सं. 7, पफाइल सं. 5/21/46गृह ;राजनीतिकद्ध, भारत सरकार। वैफसे, कब और कहाँ तकनीक भी पैफलने लगी थी। इस तकनीक के सहारे अब प्रत्येक सरकारी विभाग की कारर्वाइयों के दस्तावेशों की कइर् - कइर् प्रतियाँ बनाइर् जाने लगीं। सवेर्क्षण का बढ़ता महत्व औपनिवेश्िाक शासन के दौरान सवेर्क्षण का चलन भी महत्वपूणर् होता गया। अंग्रेशों का विश्वास था कि किसी देश पर अच्छी तरह शासन चलाने के लिए उसको सही ढंग से जानना शरूरी होता है। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे देश का नक्शा तैयार करने के लिए बड़े - बड़े सवेर्क्षण किए जाने लगे। गांवों में राजस्व सवेर्क्षण किए गए। इन सवेर्क्षणों में धरती की सतह, मिट्टी की गुणवत्ता, वहाँ मिलने वाले पेड़ - पौधों और जीव - जंतुओं तथा स्थानीय इतिहासों व प्ाफसलों का पता लगाया जाता था। अंग्रेशों की राय में किसी इलाके का शासन चलाने के लिए इन सारी बातों ़चित्रा 5 - शरीप़्1770 का दशक। को जानना शरूरी था। उन्नीसवीं सदी के आख्िार से हर दस साल में चित्रा 6 - बंगाल में मानचित्राण और सवेर्क्षण कायर् चल रहा है। जेम्स पिं्रसेप द्वारा बनाइर् गइर् तसवीर, 1832ध्यान से देखें कि सवेर्क्षण में इस्तेमाल होने वाले सारे उपकरणों को चित्रा के अगले हिस्से में दिखाया गया है। चित्राकार इस परियोजना के वैज्ञानिक स्वरूप पर ख़ासतौर से शोर देना चाहता है। अंग्रेशांे द्वारा बनाए गए वानस्पतिक उद्यान और प्रावृफतिक इतिहास के संग्रहालयों में विभ्िान्न पौधों के नमूने और उनसे संबंिात जानकारियाँ इकट्ठा की जाती थीं। इन नमूनों के चित्रा स्थानीय कलाकारों से बनवाए जाते थे। अब इतिहासकार इस बात पर ध्यान दे रहे हैं कि इस तरह की जानकारी किस तरह इकट्ठा की जाती थी और इससे उपनिवेशवाद के बारे में क्या पता चलता है। जनगणना भी की जाने लगी। जनगणना के शरिए भारत के सभी प्रांतों में रहने वाले लोगों की संख्या, उनकी जाति, इलाके और व्यवसाय के बारे में जानकारियाँ इकट्ठा की जाती थीं। इसके अलावा वानस्पतिक सवेर्क्षण, प्राण्िा वैज्ञानिक सवेर्क्षण, पुरातात्वीय सवेर्क्षण, मानवशास्त्राीय सवेर्क्षण, वन सवेर्क्षण आदि कइर् दूसरे सवेर्क्षण भी किए जाते थे। अिावृफत रिकाॅड्सर् से क्या पता नहीं चलता रिकाॅड्सर् के इस विशाल भंडार से हम बहुत वुफछ पता लगा सकते हैं। पिफर भी, इस बात को नशरअंदाश नहीं किया जा सकता कि ये सारे सरकारी चित्रा 7 - 1857 के विद्रोही। तसवीरों को भी बहुत ध्यान से देखना चाहिए। उनसे हमें चित्राकार की सोच पता चलती है। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेशों द्वारा तैयार की गइर् सचित्रा पुस्तकों में यह तसवीर कइर् जगह दिखाइर् देती है। इस तसवीर के नीचे लिखा होता था: फ्बागी सिपाही लूट - खसोट में लगे हुए हैंय्। अंग्रेशों की नशर में विद्रोही जनता लालची, दुष्ट और बेरहम थी। इस विद्रोह के बारे में आप अध्याय 5 में पढ़ेंगे। रिकाॅडर् हैं। इनसे हमें यही पता चलता है कि सरकारी अप़फसर क्या सोचते थे, उनकी दिलचस्पी किन चीशों में थी और बाद के लिए वे किन चीशों को बचाए रखना चाहते थे। इन रिकाॅड्सर् से हमें ये समझने में हमेशा मदद नहीं मिलती कि देश के दूसरे लोग क्या महसूस करते थे और उनकी कारर्वाइयों की क्या वजह थी। इन बातों को जानने के लिए हमें कहीं और देखना होगा। जब हम ऐसे दूसरे ड्डोतों की तलाश में निकलते हैं तो उनकी भी कोइर् कमी नहीं रहती। लेकिन, सरकारी रिकाॅड्सर् के मुवफाबले उन्हें ढूँढ़ना शरा मुश्िकल साबित होता है। इस लिहाश से लोगों की डायरियाँ, तीथर् यात्राओं और यात्रिायों के संस्मरण, महत्वपूणर् लोगों की आत्मकथाएँ और स्थानीय बाशारों में बिकने वाली लोकपि्रय पुस्तक - पुस्ितकाएँ महत्वपूणर् हो जाती हैं। जैसे - जैसे छपाइर् की तकनीक पैफली, अख़बार छपने लगे और विभ्िान्न मुद्दों पर जनता में बहस भी होने लगी। नेताओं और सुधारकों ने अपने विचारों को पैफलाने के लिए लिखा, कवियों और उपन्यासकारों ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए लिखा। लेकिन ये सारे ड्डोत उन लोगों ने रचे हैं जो पढ़ना - लिखना जानते थे। इनसे हम यह पता नहीं लगा सकते कि आदिवासी और किसान, खदानों में काम करने वाले मशदूर या सड़कों पर िांदगी गुजारने वाले गरीब किस तरह के अनुभवों से गुजर रहे थे। अगर हम थोड़ी और कोश्िाश करें तो हम इस बारे में भी जान सकते हैं। जैसे - जैसे आप इस किताब में आगे बढ़ेंगे, आपको यह बात समझ में आने लगेगी। गतिवििा ड्डोत 1 और 2 को देखें। क्या आपको प्रतिवेदनों के स्वरूप में कोइर् प़्ाफवर्फ दिखाइर् देता है। बताएँ कि आपको क्या प़्ाफवर्फ लगता है। वैफसे, कब और कहाँ फिर से याद करेंआइए कल्पना करें 1.सही और गलत बताएँकल्पना कीजिए कि आप इतिहासकार हैं। आप यह ;कद्ध जेम्स मिल ने भारतीय इतिहास को हिंदू, मुसलिम, इर्साइर्, तीन काल पता लगाना चाहते हैं कि खंडों में बाँट दिया था। आशादी मिलने के बाद एक ;खद्ध सरकारी दस्तावेशों से हमें ये समझने में मदद मिलती है कि आम लोग दुगर्म आदिवासी इलाके की क्या सोचते हैं।खेती में क्या बदलाव आए हैं। इन जानकारियों को ढूँढ़ने ;गद्ध अंग्रेशों को लगता था कि सही तरह शासन चलाने के लिए सवेर्क्षण के विभ्िान्न तरीकों की सूची महत्वपूणर् होते हैं। बनाएँ। आइए विचार करें 2.जेम्स मिल ने भारतीय इतिहास को जिस तरह काल खंडों में बाँटा है, उसमें क्या समस्याएँ हैं? 3.अंग्रेशों ने सरकारी दस्तावेशों को किस तरह सुरक्ष्िात रखा? 4.इतिहासकार पुराने अख़बारों से जो जानकारी जुटाते हैं वह पुलिस की रिपोटो± में उपलब्ध जानकारी से किस तरह अलग होती है? 5.क्या आप आज की दुनिया के वुफछ सवेर्क्षणों का उदाहरण दे सकते हैं? सोचकर देख्िाए कि ख्िालौना बनाने वाली वंफपनियों को यह पता वैफसे चलता है कि बच्चे किन चीशों को श्यादा पसंद करते हैं। या, सरकार को यह वैफसे पता चलता है कि स्वूफलों में बच्चों की संख्या कितनी है? इतिहासकार ऐसे सवेर्क्षणों से क्या हासिल कर सकते हैं?

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