कानून और सामाजिक न्याय क्या आपको कक्षा 7 का ‘बाशार में एक कमीश’ अध्याय याद है? वहाँ हमने देखा था कि बाशारों की शृंखला किस तरह कपास उत्पादकों को सुपर बाशार में कमीश खरीदने वाले ग्राहक से जोड़ देती है। इस शृंखला में हर मोड़ पर क्रय - विक्रय चल रहा था। कपास पैदा करने वाला छोटा किसान, इर्रोड के बुनकर या कपड़ा नियार्त कारखाने के मशदूर कमीश के उत्पादन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल बहुत सारे लोग बाशार में शोषण का श्िाकार होते हैं। उनके साथ उचित बतार्व नहीं होता। बाशार में हर जगह लोगों के शोषण की संभावना बनी रहती है, चाहे वे मशदूर हों, उपभोक्ता हों या उत्पादक हों। लोगों को इस तरह के शोषण से बचाने के लिए सरकार वुफछ कानून बनाती है। इन कानूनों के शरिए इस बात की कोश्िाश की जाती है कि बाजार में अनुचित तौर - तरीकों पर अंवुफश लगाया जाए। आइए बाशार की एक आम स्िथति को देखें जिसमें कानून बहुत मायने रखता है। मसला मशदूरों के मेहनताना का है। निजी वंफपनियाँ, ठेकेदार, कारोबारी लोग आमतौर पर श्यादा से श्यादा मुनाप़्ाफा कमाने की कोश्िाश करते हैं। मुनाप़्ोफ की चाह में कइर् बार वे मशदूरों को उनका हक नहीं देते और कइर् बार तो उनका मेहनताना तक नहीं देते। मशदूरों को उनवफा मेहनताना न देना कानून की नशर में गैर - कानूनी या गलत है। मशदूरों को मेहनताना कम न मिले या उनको वाजिब मेहनताना मिले, इस बात को सुनिश्िचत करने के लिए न्यूनतम वेतन का भी एक कानून बनाया गया है। इस कानून के तहत किसी भी मशदूर को न्यूनतम वेतन से कम मशदूरी नहीं दी सकती। न्यूनतम वेतन में हर वुफछ साल में बढ़ोतरी कर दी जाती है। जिस तरह मशदूरों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए न्यूनतम वेतन का कानून बनाया गया है उसी तरह बाशार में उत्पादकों और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए भी कानून बनाए गए हैं। इन कानूनों के शरिए मशदूर, उपभोक्ता और उत्पादक तीनों के संबंधों को इस तरह संचालित किया जाता है कि उनमें से किसी का शोषण न हो। न्यूनतम वेतन के लिए कानून की शरूरत क्यों पड़ती है? पता लगाएँ - ;कद्धआपके राज्य में निमार्ण मशदूरों के लिए तय न्यूनतम वेतन क्या है? ;खद्ध क्या आपको निमार्ण मशदूरों के लिए तय न्यूनतम वेतन सही, कम या श्यादा लगता है? ;गद्धन्यूनतम वेतन कौन तय करता है? अहमदाबाद के एक कपड़ा मिल में काम करते मशदूर। बिजली से चलने वाले करघों के साथ बढ़ती प्रतिस्पधार् के कारण 1980 और 1990 के दशकों में श्यादातर कपड़ा मिल बंद हो गए थे। पावरलूम बिजली से चलने वाले करघों को कहते हैं। यह 4 - 6 करघों की छोटी इकाइर् है। इन करघों के मालिक खुद उन पर काम करते हैं और परिवार के लोगों के साथ बाहर के श्रमिकों को भी काम में लगाते हैं। यह जानी हुइर् बात है कि बिजली से चलने वाले करघों में कायर्स्िथतियाँ बहुत खराब होती हैं। तालिका संख्या 1 में विभ्िान्न पक्षों की सुरक्षा से संबंिात वुफछ महत्त्वपूणर् कानून दिए गए हैं। उसमें में दिए गए काॅलम ;2द्ध और ;3द्ध में बताया गया है कि ये कानून क्यों और किसके लिए शरूरी हैं। कक्षा में चचार् के आधार पर इस तालिका के खाली खानों को भरें। तालिका 1 कानून इसकी शरूरत क्यों है? यह कानून किसके हित में है? न्यूनतम मेहनताना कानून। बहुत सारे मशदूरों को उनके मालिक यह कानून सारे मशदूरों, खासतौर से खेत इसमें यह निश्िचत किया सही मेहनताना नहीं देते। चूँकि मशदूरों, निमार्ण मशदूरों, पैफक्ट्री मशदूरों, गया है कि किसी का भी मशदूरों को काम की शरूरत होती घरेलू नौकरों आदि के हितों की रक्षा के मेहनताना एक निधर्रित है, इसलिए वे सौदेबाजी भी नहीं कर लिए बनाया गया है। न्यूनतम राश्िा से कम नहीं पाते और बहुत कम मशदूरी पर ही होना चाहिए। काम करने को तैयार हो जाते हैं। कायर्स्थल पर पयार्प्त सुरक्षा व्यवस्था का इंतशाम करने वाले कानून। उदाहरण के लिए, चेतावनी अलामर्, आपातकालीन द्वार आदि सही ढंग से काम कर रहे हों। चीशों की गुणवत्ता निधर्रित विद्युत उपकरणों, भोजन, दवाइर् आदि मानकों के अनुरूप होनी की खराब गुणवत्ता के कारण चाहिए यह बताने वाले उपभोक्ताओं का जीवन खतरे में पड़ कानून। उदाहरण के लिए, सकता है। विद्युत उपकरण सुरक्षा मानकों के अनुरूप होने चाहिए। शरूरी चीशों जैसे चीनी, ऐसे गरीबों के हितों की रक्षा के लिए मिट्टी का तेल, अनाज आदि जो कि इन चीशों की भारी कीमत वहन की कीमतों को नियंत्राण में नहीं कर सकते। रखने वाले कानून। ऐसे कानून जो पैफक्िट्रयों को हवा या पानी में प्रदूषण पैफलाने से रोकते हैं। कायर्स्थल पर बाल मशदूरी को रोकने वाले कानून। मशदूर यूनियन/संगठन बनाने यूनियनों में संगठित होकर मशदूर से संबंिात कानून अपनी संयुक्त ताकत के सहारे सही वेतन और बेहतर कायर्स्िथतियों के लिए आवाज उठा सकते हैं। कानून बना देना ही कापफी नहीं होता। सरकार को यह भी सुनिश्िचत करना होता है कि कानूनों को लागू किया जाए। इसका मतलब यह है कि कानून को लागू किया जाना बहुत शरूरी होता है। जब कोइर् कानून ताकतवर लोगों से कमशोर लोगों की रक्षा के लिए बनाया जाता है तो उसको लागू करना और भी महत्त्वपूणर् बन जाता है। उदाहरण के लिए, प्रत्येक मशदूर को सही वेतन मिले, यह सुनिश्िचत करने के लिए सरकार को कायर्स्थलों का नियमित रूप से निरीक्षण करना चाहिए और अगर कोइर् कानून का उल्लंघन करता है तो उसको सशा देनी चाहिए। अगर मशदूर गरीब या शक्ितहीन है तो आमदनी गवाने या बदले की कारर्वाइर् के डर से वह कम वेतन पर भी काम करने को तैयार हो जाता है। मालिक भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं। वे अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हैं ताकि मशदूरों से कम पैसे में काम कराया जा सके। ऐसी सूरत में यह बहुत शरूरी होता है कि संबंिात कानूनों को अच्छी तरह लागू किया जाए। इन कानूनों को बनाने, लागू करने और कायम रखने के लिए सरकार व्यक्ितयों या निजी वंफपनियों की गतिवििायों को नियंत्रिात कर सकती है ताकि सामाजिक न्याय सुनिश्िचत किया जा सके। इनमें से बहुत सारे कानूनों का जन्म भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अिाकारों से हुआ है। उदाहरण के लिए, शोषण से मुक्ित के अिाकार का अथर् है कि किसी को भी कम मेहनताना पर काम करने या बंधुआ मशदूर के तौर पर काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। संविधान में यह भी कहा गया है कि 14 साल से कम उम्र के किसी भी बच्चे को किसी कारखाने या खदान या किसी अन्य खतरनाक व्यवसाय में काम पर नहीं रखा जाएगा। व्यवहार में ये कानून किस तरह सामने आते हैं? ये कानून सामाजिक न्याय की चिंताओं को किस हद तक संबोिात करते हैं? इस अध्याय में हम ऐसे ही वुफछ सवालों की पड़ताल करेंगे। सन् 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में 5 से 14 साल की उम्र के 1.2 करोड़ बच्चे विभ्िान्न व्यवसायों में नौकरी करते हैं। इनमें से बहुत सारे बच्चे खतरनाक व्यवसायों में हैं। 2006 के अक्टूबर महीने में सरकार ने 14 साल से कम उम्र के बच्चों को घर, ढाबों या रेस्तरां में या चाय की दुकानों आदि में नौकरी पर रखने की प्रथा पर पाबंदी लगा दी थी। बाल मशदूरी रोकथाम अिानियम में संशोधन करके अब यह प्रावधान किया गया है कि इतने छोटे बच्चों को नौकरी पर रखना एक गंभीर अपराध है। अगर कोइर् व्यक्ित इस कानून का उल्लंघन करता है तो उसे 3 माह से 2 साल तक जेल की सशा और/या 10,000 से 20,000 रुपए तक का जुमार्ना हो सकता है। वेंफद्र सरकार ने राज्य सरकारों को निदेर्श दिया है कि वे घरेलू नौकर के तौर पर काम करने वाले बच्चों को मुक्त कराने और उनके पुनवार्स के लिए योजना बनाएँ। अभी तक महाराष्ट्र, कनार्टक और तमिलनाडु, केवल इन्हीं तीन सरकारों ने ऐसी योजनाएँ प्रकाश्िात की हैं। इस कानून के पारित होने के एक साल से भी श्यादा समय बाद आज 74 प्रतिशत घरेलू बाल मशदूर 16 साल से कम उम्र के हैं। ँतीन दिन के भीतर 8,000 से श्यादा लोग मौत के मुँह में चले गए। लाखों लोग गँभीर रूप से प्रभावित हुए। शहरीली गैस के संपवर्फ में आने वाले श्यादातर लोग गरीब कामकाजी परिवारों के लोग थे। उनमें से लगभग 50,000 लोग आज भी इतने बीमार हैं कि वुफछ काम नहीं कर सकते। जो लोग इस गैस के असर में आने के बावजूद जिंदा रह गए उनमें से बहुत सारे लोग गंभीर श्वास विकारों, आँख की बीमारियों और अन्य समस्याओं से पीडि़त हैं। बच्चों में अजीबो - गरीब विवृफतियाँ पैदा हो रही हैं। इस चित्रा में दिखाइर् दे रही लड़की इस बात का उदाहरण है। यह तबाही कोइर् दुघर्टना नहीं थी। यूनियन काबार्इड ने पैसा बचाने के लिए सुरक्षा उपायों को जानबूझकर नशरअंदाश किया था। 2 दिसंबर की त्रासदी से बहुत पहले भी कारखाने में गैस का रिसाव हो चुका था। इन घटनाओं में एक मशदूर की मौत हुइर् थी जबकि बहुत सारे घायल हुए थे। सबूतों से पूरी तरह सापफ था कि इस महाविनाश के लिए यूनियन काबार्इड ही दोषी है, लेकिन वंफपनी ने अपनी गलती मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद शुरू हुइर् कानूनी लड़ाइर् में पीडि़तों की ओर से सरकार ने यूनियन काबार्इड के ख्िालापफ दीवानी मुकदमा दायर कर दिया। 1985 में सरकार ने 3 अरब डाॅलर का मुआवजा माँगा था, लेकिन 1989 में केवल 47 करोड़ डाॅलर के मुआवजे पर अपनी सहमति दे दी। इस त्रासदी से जीवित बच निकलने वाले लोगों ने इस पैफसले के ख्िालापफ सवोर्च्च न्यायालय में अपील की, मगर सवोर्च्च न्यायालय ने भी इस पैफसले में कोइर् बदलाव नहीं किया। एक मशदूर की कीमत क्या होती है? अगर आप भोपाल के महाविनाश की वजहों को समझना चाहते हैं तो सबसे पहले यह जानना पड़ेगा कि यूनियन काबार्इड ने भारत में ही अपना कारखाना क्यों खोला। विदेशी वंफपनियों के भारत आने का एक कारण यहाँ का सस्ता श्रम है। अगर ये वंफपनियाँ अमेरिका या किसी और विकसित देश में काम करें तो उन्हें भारत जैसे गरीब देशों के मशदूरों के मुकाबले वहाँ के मशदूरों को श्यादा वेतन देना पड़ेगा। भारत में न केवल वे कम कीमत पर काम करवा सकती हैं, बल्िक यहाँ के मशदूर श्यादा घंटों तक भी काम कर सकते हैं। यहाँ मशदूरों के लिए आवास जैसी दूसरी चीशों पर भी खचेर् की श्यादा शरूरत नहीं होती। इस तरह ये वंफपनियाँ यहाँ कम लागत पर श्यादा मुनाप़्ाफा कमा सकती हैं। लागत में कटौती के तरीके इससे खतरनाक भी हो सकते हैं। लागत में कमी लाने के लिए सुरक्षा उपायों की अकसर अनदेखी की जाती है। यूनियन काबार्इड के कारखाने में एक भी सुरक्षा उपकरण या तो सही ढंग से काम नहीं कर रहा था या उनकी संख्या कम थी। 1980 से 1984 के बीच मिक संयंत्रा के कामगारों के दल की संख्या 12 से घटाकर 6 की जा चुकी थी। मशदूरों के लिए सुरक्षा प्रश्िाक्षण की अविा तो 6 महीने से घटा कर केवल 15 दिन कर दी गइर् थी! मिक कारखाने के लिए रात की पाली के मशदूर का पद ही खत्म कर दिया गया था। यूनियन काबार्इड के भोपाल और अमेरिकी संयंत्रों में सुरक्षा व्यवस्था में पफवर्फ जानने के लिए नीचे पढ़ें - ़फ्पश्िचम वजीर्निया ;अमेरिकाद्ध में वंफप्यूटरीवृफत चेतावनी और निगरानी व्यवस्था मौजूद थी। भोपाल के यूनियन काबार्इड कारखाने में गैस के रिसाव के लिए केवल मशदूरों के अंदाशे के सहारे काम चलाया जाता था। पश्िचम वजीर्निया में खतरा पैदा होने पर लोगों को सुरक्ष्िात स्थानों पर ले जाने की व्यवस्था मौजूद थी, जबकि भोपाल में ऐसा वुफछ नहीं था।य् अलग - अलग देशों के बीच सुरक्षा मानकों में इतने भारी प़्ाफवर्फ क्यों हैं? और दुघर्टना हो जाने के बाद पीडि़तों को इतना मामूली मुआवशा क्यों दिया जा रहा है? इस बात का जवाब यह है कि भारतीय मशदूर का मोल अभी भी श्यादा नहीं माना जाता। एक मशदूर जाता है तो पफौरन उसकी जगह़दूसरा मिल सकता है। हमारे यहाँ बेरोशगारी इतनी श्यादा है कि थोड़ी सी तनख्वाह के बदले न जाने कितने लोग असुरक्ष्िात स्िथतियों में भी काम करने को तैयार हो जाते हैं। मशदूरों की इस कमशोरी का पफायदा उठाकर मालिक कायर्स्थल पर सुरक्षा की िाम्मेदारी से बच जाते हैं। इस तरह भोपाल गैस त्रासदी के इतने सालों बाद भी मालिकों के बबर्र रवैये के कारण निमार्ण स्थलों, खदानों या कारखानों में दुघर्टना की खबरें हर रोश आती रहती हैं। सुरक्षा कानूनों का वि्रफयान्वयन कानून बनाने और लागू करने वाली संस्था के नाते यह सुनिश्िचत करना सरकार की िाम्मेदारी है कि सुरक्षा कानूनों को सही ढंग से लागू किया जाए। सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि अनुच्छेद 21 में दिए गए जीवन के अिाकार का उल्लंघन न हो। जब यूनियन काबार्इड संयंत्रा में सुरक्षा मानकों की इस तरह खुले आम अवहेलना हो रही थी तो सरकार क्या कर रही थी? पहली बात, भारत में सुरक्षा कानून ढीले थे। दूसरा, उन कमशोर सुरक्षा कानूनों को भी ठीक से लागू नहीं किया जा रहा था। सरकारी अप़्ाफसर इस कारखाने को खतरनाक कारखानों की श्रेणी में रखने को भी तैयार नहीं थे। इस कारखाने को घनी आबादी वाले इलाके में खोलने पर उन्हेंने कोइर् ऐतराज नहीं किया। जब भोपाल के वुफछ नगर निगम अिाकारियों ने इस बात पर उँगली उठाइर् कि 1978 में मिक उत्पादन कारखाने की स्थापना सुरक्षा मानकों के ख्िालाप़्ाफ थी तो सरकार का कहना था कि प्रदेश को भोपाल के संयंत्रा में लगातार निवेश चाहिए ताकि रोशगार मिलते रहें। सरकार की राय में यूनियन काबार्इड से इस बात की माँग करना असंभव था कि वह सापफ - सुथरी तकनीक़या श्यादा सुरक्ष्िात प्रवि्रफयाओं को अपनाए। सरकारी निरीक्षक कारखाने में अपनाइर् जा रही दोषपूणर् प्रवि्रफयाओं को बार - बार मंशूरी देते रहे। जब कारखाने में बार - बार गैस का रिसाव होने लगा और सबको यह बात समझ में आ चुकी थी कि कहीं वुफछ भारी गड़बड़ी चल रही है, तब भी निरीक्षकों के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। कानून बनाने और उनको लागू करने वाली संस्था के लिए यह रवैया सही नहीं है। लोगों के हितों की रक्षा करने की बजाय सरकार और निजी वंफपनी, दोनों ही उनकी सुरक्षा को नशरअंदाश करती जा रही थीं। यह हरगिश अच्छी स्िथति नहीं है। जब भारत में स्थानीय और विदेशी व्यवसायी नए - नए कारखाने खोलते जा रहे हैं तो मशदूरों के अिाकारों की रक्षा करने वाले सख्त कानूनों और उनके श्यादा बेहतर वि्रफयान्वयन की शरूरत और बढ़ गइर् है। आपको ऐसा क्यों लगता है कि किसी पैफक्ट्री में सुरक्षा कानूनों को लागू करना बहुत महत्त्वपूणर् होता है? क्या आप वुफछ दूसरी ऐसी स्िथतियों का उल्लेख कर सकते हैं जहाँ कानून या नियम तो मौजूद हैं, परंतु उनके वि्रफयान्वयन में ढिलाइर् के कारण लोग उनका पालन नहीं करते? ;उदाहरण के लिए मोटर गाडि़यों की तेश रफ्ऱतारद्ध। कानूनों को लागू करने में क्या समस्याएँ आती हैं? क्या आप वि्रफयान्वयन में सुधार के लिए वुफछ सुझाव दे सकते हैं? हाल ही में एक ट्रेवल एजेंसी को आदेश दिया गया कि वह अपने वुफछ ग्राहकों को 8 लाख रुपए का मुआवशा दे। इन सैलानियों को मुआवशा इसलिए दिया जा रहा था क्योंकि वंफपनी की लापरवाही के कारण वे डिज्नीलैंड देखने और पेरिस में खरीदारी करने से वंचित रह गए थे। तो पिफर भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों को ¯शदगी भर की पीड़ा और नुकसान के बदले इतना कम मुआवशा क्यों मिला? ‘स्वच्छ वातावरण एक जनसुविधा है’, क्या आप इस बयान की व्याख्या कर सकते हैं? हमें नए कानूनों की शरूरत क्यों है? वंफपनियाँ और ठेकेदार पयार्वरण कानूनों का उल्लंघन वैफसे कर पाते हैं? पयार्वरण की रक्षा के लिए नए कानून 1984 में हमारे पास पयार्वरण की रक्षा के लिए बहुत कम कानून थे। इन कानूनों को लागू करने की व्यवस्था तो और भी कमशोर थी। पयार्वरण को एक ‘मुफ्ऱत’ चीश माना जाता था। किसी भी उद्योग को हवा - पानी में प्रदूषण छोड़ने की खुली छूट मिली हुइर् थी। चाहे नदियाँ हों, हवा हो या भूमिगत पानी हो - पयार्वरण दूष्िात हो रहा था और लोगों की सेहत के साथ ख्िालवाड़ किया जा रहा था। ढीले सुरक्षा मानकों से न केवल यूनियन काबार्इड को पफायदा मिला,़बल्िक उसे प्रदूषण से निपटने के लिए पैसा भी खचर् नहीं करना पड़ा। अमेरिका में यही वंफपनी इस िाम्मेदारी से नहीं बच सकती थी। भोपाल त्रासदी ने पयार्वरण के मुद्दों को अगली कतार में ला दिया। कइर् लाख ऐसे लोग कारखाने से निकली जहरीली गैस का श्िाकार बन गए थे जो इस कारखाने से किसी भी तरह जुड़े नहीं थे। इससे लोगों को यह अहसास हुआ कि मौशूदा कानून चाहे कितने भी कमशोर हों, वे केवल मशदूरों से ही संबंिात हैं। उनमें उन आम लोगों के अिाकारों पर ध्यान नहीं दिया गया है जो औद्योगिक दुघर्टनाओं के कारण घायल होते हैं। पयार्वरणवादी कायर्कतार्ओं तथा अन्य लोगों के इस दवाब से निपटने के लिए भोपाल गैस त्रासदी के बाद भारत सरकार ने पयार्वरण के बारे में नए कानून बनाए। पयार्वरण को नुकसान पहुँचाने के लिए प्रदूषण पैफलाने वालों को ही िाम्मेदार माना जाने लगा। इसके पीछे समझ यह थी कि हमारे पयार्वरण पर अगली पीढि़यों का भी हक बनता है और उसे केवल औद्योगिक विकास के लिए नष्ट नहीं किया जा सकता। अदालतों ने स्वस्थ पयार्वरण के अिाकार को जीवन के मौलिक अिाकार का हिस्सा बताते हुए कइर् महत्त्वपूणर् पैफसले दिए। सुभाष वुफमार बनाम बिहार राज्य ;1991द्ध के मुकदमे में सवोर्च्च न्यायालय ने कहा कि जीवन का अिाकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अिाकार है और इसमें प्रदूषण - मुक्त हवा और पानी का अिाकार भी शामिल है। यह सरकार की िाम्मेदारी है कि वह प्रदूषण पर अंवुफश लगाने, नदियों को साप़्ाफ रखने और जो दोषी हैं उन पर भारी जुमार्ना लगाने के लिए कानून और प्रियाएँ तय करे। जनसुविधा के रूप में पयार्वरण हाल के वषो± में न्यायालयों ने पयार्वरण से जुड़े मुद्दों पर कइर् कड़े आदेश दिए हैं। ऐसे कइर् आदेशों से लोगों की रोशी - रोटी पर भी बुरा असर पड़ा है। मिसाल के तौर पर, अदालत ने आदेश दिया कि दिल्ली के रिहायशी इलाकों में काम करने वाले उद्योगों को बंद कर दिया जाए या उन्हें शहर से बाहर दूसरे इलाकों में भेज दिया जाए। इनमें से कइर् कारखाने आसपास के वातावरण को प्रदूष्िात कर रहे थे। इन कारखानों की गंदगी से यमुना नदी भी प्रदूष्िात हो रही थी क्योंकि इन कारखानों को नियमों के हिसाब से नहीं चलाया जा रहा था। अदालत की कारर्वाइर् से एक समस्या तो हल हो गइर्, लेकिन एक नइर् समस्या पैदा भी हो गईं कारखानों के बंद हो जाने से बहुत सारे मशदूरों के रोशगार खत्म हो गए। बहुतों को दूर - दराज के इलाकों में जाना पड़ा जहाँ उन कारखानों को दोबारा चालू किया गया था। अब प्रदूषण की समस्या इन नए इलाकों में पैदा हो रही है ये इलाके प्रदूष्िात होने लगे हैं। मशदूरों की सुरक्षा संबंधी स्िथतियों का मुद्दा अभी भी वैसा का वैसा है। भारत में पयार्वरणीय मुद्दों पर हुए ताशा अनुसंधानों से यह बात सामने आइर् है कि मध्य वगर् के लोग पयार्वरण की चिंता तो करने लगे हैं, लेकिन वे अक्सर गरीबों की पीड़ा को ध्यान में नहीं रखते। इसलिए उनमें से बहुतों को यह तो समझ में आता है कि शहर को सुंदर बनाने के वास्ते बस्ितयों को हटाना चाहिए या प्रदूषण पैफलाने वाली पैफक्िट्रयों को शहर के बाहर ले जाना चाहिए, लेकिन यह समझ में नहीं आता कि इससे बहुत सारे लोगों की रोशी - रोटी भी खतरे में पड़ सकती है। जहाँ एक तरप़्ाफ स्वच्छ पयार्वरण के बारे में जागरूकता बढ़ रही है वहीं दूसरी तरपफ मशदूरों की ़सुरक्षा के बारे में लोग श्यादा चिंता नहीं जता रहे हैं। अब चुनौती ऐसे समाधान ढूँढ़ने की है जिनमें स्वच्छ वातावरण का लाभ सभी को मिल सके। इसका एक तरीका यह है कि हम कारखानों में श्यादा स्वच्छ तकनीकों और प्रवि्रफयाओं को अपनाने पर शोर दें। इसके लिए सरकार को भी चाहिए कि वह कारखानों को प्रोत्साहन और मदद दे। उसे प्रदूषण पैफलाने वालों पर जुमार्ना करना होगा। इस तरह मशदूरों के रोशगार भी बच जाएँगे और समुदायों व मशदूरों को सुरक्ष्िात पयार्वरण का अिाकार भी मिल जाएगा। क्या आपको लगता है कि उफपर उ(ृत मामले में सभी पक्षों को न्याय मिला है? गाडि़यों से उत्सजिर्त ध्ुआँ पयार्वरणीय प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत हैं। 1998 के बाद सवोर्च्च न्यायालय ने अपने कइर् प़्ौफसलों में यह आदेश दिया कि दिल्ली में डीजल से चलने वाले सभी सावर्जनिक वाहन कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस ;सी.एन.जी.द्ध ईंधन का इस्तेमाल करें। इन प्रयासों से दिल्ली जैसे शहरों के वायु प्रदूषण में कापफी गिरावट आइर् है। ़लेकिन सेंटर प़्ाफाॅर साइंस ऐण्ड एनवायरनमेंट ;नयी दिल्लीद्ध की एक ताशा रिपोटर् में कहा गया है कि हवा में विषैले पदाथो± का स्तर ़कापफी उँफचा है। ये विषैले पदाथर् पेट्रोल की बजाय डीजल से चलने वाली बसों/कारों के कारण पैदा हो रहे हैं। बंद कारखानों के बाहर परेशान मशदूर रोशगार छिन जाने के बाद बहुत सारे मशदूर छोटा - मोटा व्यापार या दिहाड़ी मशदूरी करने लगते हैं। वुफछ मशदूरों को पहले से भी छोटे कारखानों में काम मिलता है जहाँ के हालात पहले से भी श्यादा शोषण भरे होते हैं और जहाँ कानूनों की स्िथति और भी श्यादा क्या आपको पयार्वरण की रक्षा के और तरीके दिखाइर् देते हैं? कक्षा में चचार् करें। कमशोर होती है। विकसित देश अपने विषैले और खतरनाक उद्योगों को विकासशील देशों में ले जा रहे हैं ताकि इन देशों के कमशोर कानूनों का पफायदा ़उठा सकें और अपने देशों को साप़्ाफ - सुथरा रख सकें। दक्ष्िाण एश्िायाइर् देश, खासतौर से भारत, बांगलादेश और पाकिस्तान μ कीटनाशक, ऐस्बेस्टाॅस बनाने वाले या जस्ते व सीसे को संसाध्ित करने वाले कारखानों को बड़े पैमाने पर अपने यहाँ बुला रहे हैं। निष्कषर् चाहे बाशार हो, दफ्ऱतर हो या कोइर् कारखाना हो बहुत सारी स्िथतियों में लोगों को गलत तौर - तरीकों से बचाने के लिए कानून शरूरी होते हैं। निजी वंफपनियाँ, ठेकेदार, व्यवसायी आदि श्यादा मुनाप़्ाफा कमाने के चक्कर में गलत हथवंफडे भी अपनाने लगते हैं। उदाहरण के तौर पर वे मशदूरों को कम मेहनताना देते हैं, बच्चों से काम करवाते हैं, काम की स्िथतियों पर ध्यान नहीं देते या पयार्वरण का खयाल नहीं रखते और इस तरह आस - पास के लोगों को भी नुकसान पहुँचाते हैं। ऐसे में सरकार की एक अहम िाम्मेदारी यह बनती है कि वह निजी वंफपनियों के गलत तौर - तरीकों को रोकने और सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए कानून बनाए, उनको लागू करे और उन पर निगरानी रखे। यानी न सरकार को केवल ‘सही कानून’ बनाने चाहिए, बल्िक उनको लागू भी करना चाहिए। अगर कानून कमशोर हों और उनको सही ढंग से लागू न किया जाए तो उनसे भारी नुकसान हो सकता है। भोपाल गैस त्रासदी इस बात का सबूत है। इस दिशा में सरकार की तो िाम्मेदारी बनती ही है, आम लोग भी दवाब डालकर निजी वंफपनियों और सरकार दोनों को समाज के हित में काम करने के लिए बाध्य कर सकते हैं। जैसा कि हमने पहले देखा, पयार्वरण एक ऐसा विषय है जहाँ लोगों ने जनहित के लिए दवाब डाला है और न्यायालयों ने भी स्वस्थ पयार्वरण के अिाकार को मौलिक अध्िकार के रूप में जीवन का अभ्िान्न अंग माना है। इस अध्याय में हमने इस बात पर शोर दिया है कि लोगों को इस बात के लिए आवाश उठानी चाहिए कि स्वस्थ्य वातावरण की सुविधा सबको मिले। इसी तरह मशदूर अिाकारों ;यानी काम का अिाकार, सही मेहनताना और मानवोचित कायर्स्िथतियांें का अिाकारद्ध के क्षेत्रा में भी अभी हालात कापफी खराब हैं। लोगों को इस बात के लिए आवाश उठानी चाहिए़कि कामगारों के अिाकारों की रक्षा के लिए सख्त कानून बनाए जाएँ ताकि सबको जीवन का अिाकार मिल सके। 1.दो मशदूरों से बात करके पता लगाएँ कि उन्हें कानून द्वारा तय किया गया न्यूनतम वेतन मिल रहा है या नहीं। इसके लिए आप निमार्ण मशदूरों, खेत मशदूरों, प़ैफक्ट्री मशदूरों या किसी दुकान पर काम करने वाले मशदूरांे से बात कर सकते हैं। 2.विदेशी वंफपनियों को भारत में अपने कारखाने खोलने से क्या प़्ाफायदा है? 3.क्या आपको लगता है कि भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों को सामाजिक न्याय मिला है? चचार् करें। 4.जब हम कानूनों को लागू करने की बात करते हैं तो इसका क्या मतलब होता है? कानूनों को लागू करने की िाम्मेदारी किसकी है? कानूनों को लागू करना इतना महत्त्वपूणर् क्यों है? 5.कानून के शरिए बाजारों को सही ढंग से काम करने के लिए किस तरह प्रेरित किया जा सकता है? अपने जवाब के साथ दो उदाहरण दें। 6.मान लीजिए कि आप एक रासायनिक पैफक्ट्री में काम करने वाले मशदूर हैं। सरकार ने वंफपनी को आदेश दिया है कि वह वतर्मान जगह से 100 किलोमीटर दूर किसी दूसरे स्थान पर अपना कारखाना चलाए। इससे आपकी िंादगी पर क्या असर पड़ेगा? अपनी राय पूरी कक्षा के सामने पढ़कर सुनाएँ। 7.इस इकाइर् में आपने सरकार की विभ्िान्न भूमिकाओं के बारे में पढ़ा है। इनके बारे में एक अनुच्छेद लिखें। 8.आपके इलाके में पयार्वरण को दूष्िात करने वाले स्रोत कौन से हैं? ;कद्ध हवाऋ ;खद्ध पानी और ;गद्ध मिट्टी में प्रदूषण के संबंध में चचार् करें। प्रदूषण को रोकने के लिए किस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं? क्या आप कोइर् और उपाय सुझा सकते हैं? 9. पहले पयार्वरण को किस तरह देखा जाता था? क्या अब सोच में कोइर् बदलाव आया है? चचार् करें। 10.प्रसि( काटूर्निस्ट आर. के. लक्ष्मण इस काटूर्न के शरिए क्या कहना चाह रहे हैं? इसका 2006 में बनाए गए उस कानून से क्या संबंध है जिसको पृष्ठ 123 पर आपने पढ़ा था। 11.आपने भोपाल गैस त्रासदी और उसके बारे में चल रहे संघषर् के बारे में पढ़ा है। दुनिया भर के विद्याथीर् न्याय के इस संघषर् में अपना योगदान दे रहे हैं। वे जुलूस - प्रदशर्नों से लेकर जागरूकता अभ्िायान तक चला रहे हैं। उनकी गतिवििायों के बारे में आप ूूूण्ेजनकमदजेवितइीवचंसण्बवउ पर पढ़ सकते हैं। इस वेबसाइट पर बहुत सारे चित्रा, पोस्टर, वृतचित्रा और पीडि़तों के बयान आदि उपलब्ध हैं। इस वेबसाइट तथा अन्य संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए अपनी कक्षा में दिखाने के लिए भोपाल गैस त्रासदी पर एक दीवार पत्रिाका ;वाॅल - पेपरद्ध/प्रदशर्नी तैयार करें। पूरे स्वूफल को अपनी रचनाएँ देखने और उन पर चचार् करने के लिए आमंत्रिात करें। उपभोक्ताः जो व्यक्ित बाशार में बेचने के लिए नहीं बल्िक निजी इस्तेमाल के लिए कोइर् चीश खरीदता है उसे उपभोक्ता कहा जाता है। उत्पादकः ऐसा व्यक्ित या संस्थान जो बाशार में बेचने के लिए चीशें बनाता है। कइर् बार उत्पादक अपने उत्पादन का वुफछ हिस्सा निजी इस्तेमाल के लिए भी रख लेते हैं, उदाहरण के लिए, किसान। निवेशः भविष्य में उत्पादन बढ़ाने/सुधारने के लिए नइर् मशीनरी या इमारत या प्रश्िाक्षण पर खचर् होने वाला पैसा। मशदूरों की यूनियनः मशदूरों का संगठन। आमतौर पर मशदूर यूनियनें कारखानों और दफ्ऱतरों में दिखाइर् देती हैं लेकिन अन्य किस्म के मशदूरों की भी यूनियनें हो सकती हैं, जैसे घरेलू नौकरों की यूनियन। यूनियन के नेता अपने सदस्यों की ओर से मालिकों के साथ सौदेबाजी और बातचीत करते हैं। मशदूर यूनियनें वेतन, श्रम नियमावली, नियुक्ित, बखार्स्तगी और पदोन्नति से संबंिात नियमों, लाभों और कायर्स्थल सुरक्षा आदि मुद्दों पर काम करती हैं। एक जीवित आदशर् के रूप में संविधान जीवन का अिाकार एक मौलिक अिाकार है। संविधान के माध्यम से यह अिाकार देश के सभी नागरिकों को मिला हुआ है। जैसा कि आपने इस किताब में पढ़ा है, आम नागरिकों ने इस अिाकार, यानी संविधान के अनुच्छेद 21 का विभ्िान्न संदभो± में इस्तेमाल किया है। नागरिकों के इन प्रयासों से ही यह अिाकार और साथर्क व व्यापक हो गया है। उदाहरण के लिए, आपने पढ़ा कि किस तरह हाकिम शेख ने स्वास्थ्य के अिाकार को जीवन के अिाकार का अभ्िान्न अंग साबित कर दिया। इसी तरह मुंबइर् के झुग्गीवासियों की कोश्िाशों से रोशगार के अिाकार को जीवन के अिाकार का हिस्सा माना गया। इसी अध्याय में आपने यह भी पढ़ा कि किस तरह न्यायालय ने फ्प्रदूषण मुक्त पानी एवं हवाय् के अिाकार को जीवन के अिाकार का हिस्सा बताया था। इसके अलावा श्िाक्षा और आवास के अिाकार को भी अदालतों ने जीवन के अिाकार का हिस्सा बताया है। जीवन के अिाकार की यह विस्तृत व्याख्या आम नागरिकों के प्रयासों का नतीशा है। जब भी नागरिकों को ऐसा लगता है कि उनके मौलिक अिाकारों का उल्लंघन हो रहा है तो वे अदालत में जाकर न्याय माँगते हैं। जैसा कि आपने इस पुस्तक में कइर् जगह पढ़ा है, इन्हीं मौलिक अिाकारों ने नए कानून बनाने और खास तरह की नीतियों को लागू करने में भी मदद दी है। ये सब वुफछ इसीलिए संभव हुआ कि हमारे संविधान में वुफछ खास नियम हैं जो भारत के सभी नागरिकों की प्रतिष्ठा और स्वाभ्िामान की रक्षा करते हैं। मौलिक अिाकारों तथा कानून के शासन से संबंिात विभ्िान्न प्रावधानों में इस बात की व्याख्या की गइर् है। इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि हमारा संविधान कापफी लचीला भी है। इसी आधार पर संविधान ़द्वारा दिए गए प्रतिष्ठा और न्याय के विचार में नए सिरे से उभरकर आनेवाले मुद्दों की सूची का भी समावेश किया जाना चाहिए। इस लचीलेपन के कारण संविधान के प्रावधनों की नइर् व्याख्याएँ की जा सकती हैं। इस आधार पर संविधान को एक जीवन्त दस्तावेश माना जा सकता है। स्वास्थ्य का अिाकार या आवास का अिाकार आदि ऐसे मुद्दे हैं जो 1949 में संविधान सभा के सदस्यों द्वारा पेश किए गए संविधान में लिख्िात तौर पर मौजूद नहीं थे। लेकिन भावना के स्तर पर वे निश्िचत रूप से मौजूद थे। इसका मतलब यह है कि संविधान में ऐसे लोकतांत्रिाक आदशर् उस समय भी मौजूद थे जिनके शरिए लोग राजनीतिक प्रवि्रफया का इस्तेमाल करके यह सुनिश्िचत कर सकते थे कि आम नागरिकों की िंादगी में ये आदशर् हकीकत का रूप लें। जैसा कि इस पुस्तक के अध्यायों में चचार् की गइर् है, संवैधानिक आदशो± को यथाथर् रूप देने के लिए कापफी वुफछ किया जा चुका है। दूसरी ओर, इन्हीं अध्यायों में यह भी बताया गया है कि अभी बहुत ़वुफछ होना बाकी है। देश के विभ्िान्न भागों में जनता द्वारा किए जा रहे विभ्िान्न संघषर् बार - बार इस बात को याद दिलाते हैं कि समाज के श्यादातर लोगों की िंादगी में समानता, प्रतिष्ठा और स्वाभ्िामान जैसे सवाल अभी भी अधूरे हैं। जैसा कि कक्षा 7 की पुस्तक में आपने पढ़ा था, मीडिया भी इन संघषो± पर अकसर ध्यान नहीं देता। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इन आंदोलनों पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए। इस पुस्तक के विभ्िान्न अध्यायों में यह समझाने की चेष्टा की गइर् है कि संविधान में कौन से लोकतांत्रिाक आदशर् दिए गए हैं और उनसे लोगों के दैनिक जीवन पर किस तरह असर पड़ता है। इसके पीछे हमारा मकसद आपको ऐसे साधन मुहैया कराना है जिनके सहारे आप अपने आसपास की दुनिया को समझने - बूझने का प्रयास कर सवेंफ और संविधान द्वारा बताए गए रास्ते पर चलते हुए उसमें हिस्सा ले सवेंफ। संदभर् किताबें आॅस्िटन, ग्रेनविल. 1966, दि इंडियन काॅन्स्टीट्यूशन: काॅनर्रस्टोन आॅप़्ाफ ए नेशन, आॅक्सपफोडर्: क्लेरेंडन प्रेस।़आॅस्िटन, ग्रेनविल. 1999, ववि±फग ए डेमोव्रेफटिक काॅन्स्टीट्यूशन: दि इंडियन एक्सपीरियन्स, नयी दिल्ली: आॅक्सपफोड± लाॅयसर् क्लेक्िटव. 2007, स्टेयिंग अलाइव: पफस्टर् माॅनीटरिंग एंड इवैल्युएशन रिपोटर् 2007 आॅन द प्रोटेक्शन आॅप़्ाफ वूमैन प्रफाम डोमेस्िटक वाॅयलैंस एक्ट, 2005, नयी दिल्ली: लाॅयसर् क्लेक्िटव। रामास्वामी, गीता. 2005, इंडिया स्िटंविंफग: मैनुअल स्वैफवेंजसर् इन आंध््रा प्रदेश एंड देयर ववर्फ, नयी दिल्ली: नवनय पब्िलकेशन। अखबारों के लेख पी. साइर्नाथ, फ्हूज सैवि्रफपफाइस इज इट ऐनीवे?य् द हिन्दू, 6 सितंबर 1998। विध्िक प्रकरण ओल्गा टेलिस वसेर्स बाॅम्बे म्यूनिसिपल काॅपोर्रेशन ;1985द्ध3 एस सी सी 545। पश्िचम बंग खेत मशदूर समिति बनाम पश्िचम बंगाल राज्य ;1996द्ध स्टेट ;देहली ऐडमिनिस्ट्रेशनद्ध वसेर्स लक्समन वुफमार ;1985द्ध 4 एस सी सी 476। सुभाष वुफमार वसेर्स स्टेट आॅप़्ाफ बिहार ;1991द्ध 1 एस सी सी 598। वेबसाइट्स भोपाल गैस त्रासदी, ीजजचरूध्ध्ूूूण्ेजनकमदजेवितइीवचंसण्वतहध्ॅींजभ्ंचचमदमकण्ीजउण् ।बबमेेमक वद 12 जनवरी2008ण् सी. के. जानू, ूूूण्बवनदजमतबनततमदजेण्वतह ।बबमेेमक वद 12 नवंबर 2007ण् नेपाल में लोकतंत्राए ीजजचरूध्ध्ूूूण्ीपउंसउंहण्बवउ ।बबमेेमक वद 15 दिसंबर 2007ण् हाथ से मैला उठाना, ूूूण्ीतकबण्दमजध्ेंीतकबध्ीतमिंजनतमेध्भ्त्थ् 129ण्ीजउसण् ।बबमेेमक वद 2 जनवरी 2008ण्

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