2015-16 शिक्षकों के लिए समानता एक मूल्य भी है और अधिकार भी। इसे हमने सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन किताब की श्रृंखला में समझने का प्रयास किया है। इन सालों के दौरान हमने समानता की अवधारणात्मक समझदारी को और पुख्ता बनाया है। हमने औपचारिक समानता और वस्तुगत समानता के बीच फ़र्क स्पष्ट करते हुए वस्तुगत समानता की दिशा में बढ़ने की ज़रूरत को समझा है। कक्षा 7 की पुस्तक में दी गई कांता की कहानी इस बात का उदाहरण है। हमने इस बात को भी रेखांकित किया कि समानता को समझने के लिए असमानता के अनुभव और उसकी अभिव्यक्ति पर ध्यान देना भी जरूरी होता है। इस प्रकार हमने डॉ. अम्बेडकर और ओमप्रकाश वाल्मिकी के बचपन के अनुभवों के माध्यम से भेदभाव और असमानता के आपसी संबंधों की पड़ताल की है। संसाधनों तक पहुँच असमानता के कारण किस तरह प्रभावित होती है, इस बात को हमने शिक्षा तक महिलाओं की पहुँच के उदाहरण से समझने का प्रयास किया है। रससुंदरी देवी और रुकैया बेगम के लेखन से हमें अंदाजा मिलता है कि इस अवरोध को दूर करने के लिए औरतें किस तरह संघर्ष करती हैं। हमने संविधान में दिए गए मूल अधिकारों का बार-बार जिक्र किया है। इनके माध्यम से हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि समानता तथा प्रतिष्ठा का विचार भारत में लोकतंत्र के संचालन के लिए महत्त्वपूर्ण है। | इस इकाई में हाशियाकरण या मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ जाने की अवधारणा के ज़रिए इस बात पर और बारीकी से ध्यान दिया गया है कि असमानता से विभिन्न समूहों और समुदायों पर किस तरह के असर पड़ते हैं। इस इकाई में आदिवासी, मुसलमान और दलित, इन तीन समूहों पर खास ध्यान दिया गया है। इन तीन समूहों को इसलिए चुना गया इन तीनों समूहों के हाशियाकरण के कारण अलग-अलग हैं और कई बार उन्हें यह हाशियाकरण अलग-अलग रूपों में अनुभव होता है। इस इकाई को पढ़ाते हुए यह चेष्टा होनी चाहिए कि विद्यार्थियों को उन कारकों को पहचानने में मदद मिले जो हाशियाकरण को बढ़ाने में योगदान देते हैं। साथ ही विद्यार्थियों को हाशिये पर डाल दिए गए तबकों को पहचानने और उनके दर्द को समझने के भी योग्य बनाया जाना चाहिए। आपको चाहिए कि आप बच्चों को अपने इलाके में इन हाशियाई समुदायों को पहचानने में मदद दें। अध्याय 7 में हम आदिवासी और मुसलिम समुदायों के अनुभवों पर ध्यान देंगे। अध्याय 8 में इस बात पर चर्चा की गई है कि सरकार और स्वयं इन समुदायों ने विभिन्न संघर्षों के जरिए अपने हाशियाकरण को दूर करने के लिए किस तरह कोशिशें की हैं। सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए कानून बनाती है और इन समुदायों को लाभ पहुँचाने के लिए कई नीतियाँ और योजनाएँ लागू करती है। | इस इकाई में हमने आँकड़ों, कविताओं, चित्रकथा-पट्ट, केस स्टडी इत्यादि कई तरह के शैक्षणिक साधनों का इस्तेमाल किया है। आदिवासी अपने जीवन में हाशियाकरण की प्रक्रियाओं को किस तरह महसूस करते हैं, इस पर चर्चा करने के लिए चित्रकथा-पट्ट का इस्तेमाल करें। दलितों से संबंधित केस स्टडी के सहारे आप इस कानून की अहमियत पर चर्चा कर सकते हैं और यह देख सकते हैं कि इस कानून से मौलिक अधिकारों के प्रति संविधान की प्रतिबद्धता किस तरह प्रतिबिंबित होती है। मुसलिम समुदाय की स्थिति को समझने के लिए हमने आँकड़ों, एक चिट्ठी और एक केस स्टडी का इस्तेमाल किया है जिनका कक्षा में विश्लेषण किया जा सकता है। इस इकाई में समाजविज्ञान और भाषा की पाठ्यपुस्तकों के बीच खिंची विभाजन रेखाओं को तोड़ने के लिए गीतों और कविताओं का इस्तेमाल किया गया है। इस बहाने हम यह भी कहना चाहते हैं कि विभिन्न समुदायों की रोजाना की जिंदगी में इस तरह का फ़र्क नहीं होता। वैसे भी न्याय के संघर्षों ने ऐसे अनेक अविस्मरणीय गीतों और कविताओं को जन्म दिया है जिन्हें पाठ्यपुस्तकों में प्रायः जगह नहीं मिल पाती। | इस अध्याय में कई ऐसे मुद्दे हैं जो कक्षा के भीतर तीखी बहस खड़ी कर सकते हैं। बच्चे इन मुद्दों से अवगत भी हैं। लिहाजा हमें इन बातों पर चर्चा करने के परिपक्व और संतुलित रास्ते ढूंढने होंगे। आपको यह सुनिश्चित करने के लिए इन चर्चाओं में अहम भूमिका निभानी है कि कोई भी बच्चा या बच्चों का समूह भेदभाव का शिकार महसूस न करे, किसी को मजाक का पात्र बनने या चर्चाओं में अप्रासंगिक हो जाने का बोध न हो। 2015-16 हाशियाकरण की समझ सामाजिक रूप से हाशिये पर होने का क्या मतलब होता है? आप कॉपियों के जिन पन्नों पर लिखते हैं उनकी बाईं ओर खाली जगह होती है जहाँ आमतौर पर लिखा नहीं जाता है। उसे पन्ने का हाशिया कहा जाता है। कुछ ऐसा ही समाज में भी होता है। हाशियाई का मतलब होता है कि जिसे किनारे या हाशिये पर ढकेल दिया गया हो। ऐसे में वह व्यक्ति चीजों के केंद्र में नहीं रहता। यह एक ऐसी चीज़ है जिसको आपने अपनी कक्षा या खेल के मैदान में भी कभी न कभी महसूस किया होगा। अगर आप अपनी कक्षा के ज्यादातर बच्चों जैसे नहीं हैं यानी अगर संगीत या फ़िल्मों में आपकी रुचि अलग तरह की है, अगर आपका बोलने का ढंग औरों से अलग है, अगर आप औरों की तरह गपशप में ज्यादा मज़ा नहीं लेते, अगर आप वह खेल नहीं खेलते जो ज्यादातर बच्चे खेलना चाहते हैं, अगर आपका पहनावा अलग तरह का है तो इस बात की गुंजाइश बढ़ जाएगी कि आपके संगी-साथी आपको अपने बीच का/की' नहीं मानेंगे। इस तरह आप अकसर यह महसूस करते हैं कि आप औरों से अलग हैं, गोया आपकी कही बात, आपके अहसास, आपकी सोच और आपका व्यवहार सही नहीं है या औरों को पसंद नहीं है। कक्षा की तरह समाज में भी ऐसे समूह या समुदाय हो सकते हैं जिन्हें इस तरह की बेदखली का अहसास रहता है। उनके हाशियाकरण की वजह यह हो सकती है कि वे एक अलग भाषा बोलते हैं, अलग रीति-रिवाज अपनाते हैं या बहुसंख्यक समुदाय के मुकाबले किसी दूसरे धर्म के हैं। वे अपनी गरीबी के कारण, सामाजिक हैसियत में 'कमतर' माने जाने की वजह से और शेष लोगों के मुकाबले कमतर मनुष्य के रूप में देखे जाने की वजह से खुद को हाशिये पर महसूस करते हैं। कई बार हाशियाई समूहों को लोग दुश्मनी और डर के भाव से भी देखते हैं। फ़ासले और अलग-थलग किए जाने का यह अहसास समुदायों को संसाधनों और मौकों का फ़ायदा उठाने से रोक देता है। फलस्वरूप हाशियाई समुदाय अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने में चूक जाते हैं। उन्हें समाज के ऐसे ताकतवर और वर्चस्वशाली तबकों के मुकाबले शक्तिहीनता और पराजय का अहसास रहता है जिनके पास जमीन है, धन-दौलत है, जो ज्यादा पढ़े-लिखे और राजनीतिक रूप से ज्यादा ताकतवर हैं। इसका मतलब यह है कि हाशियाकरण किसी एक ही दायरे में महसूस नहीं होता। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सभी दायरे समाज के कुछ तबकों को हाशियाई महसूस करने के लिए विवश करते हैं। इस अध्याय में आप दो ऐसे समुदायों के बारे में पढ़ेंगे जिन्हें आज भारत में सामाजिक रूप से हाशिये पर माना जाता है। सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 आदिवासी और हाशियाकरण सही कहा तुमने, आदिवासियों की दुनिया बहुत समृद्ध है। ज्यादातर लोगों को इस बात का कुछ पता ही नहीं है। दिल्ली में एक आदिवासी परिवार सोमा और हेलेन दादाजी के साथ बैठकर टेलीविजन पर गणतंत्र दिवस की परेड देख रही हैं। = = * हाँ, क्या हमारे बारे में वे हाँ, क्या हमारे बारे में वे और कुछ भी नहीं जानते! hदेख्ओe!आस्विवियोंanाव! दादू, वे आदिवासियों को हमेशा नाचते-गाते ही क्यों दिखाते हैं? तभी अचानक हमें बताया गया कि ये जंगल हमारे नहीं हैं। वन विभाग के अफ़सरों और ठेकेदारों ने बहुत सारा जंगल साफ़ कर डाला। अगर हम जंगलों को बचाते तो वे हमारी पिटाई करते थे। हमें अदालत में घसीटा जाता था। वहाँ न तो हमें वकील मिलता था और न हम अपना मुकदमा खुद लड़ सकते थे। जब मैं तुम्हारी उम्र का था तो उड़ीसा में हमारा गाँव बहुत खूबसूरत हुआ करता था। हमें अपनी जरूरत की सारी चीजें अपनी जमीन और जंगलों से मिल जाती थीं। हम भी अपनी धरती, जंगलों और नदियों की बहुत कदर करते थे। तो फिर आपने अपनी जान कैसे बचाई? फिर अफसर आए। उन्होंने कहा कि हमारी जमीन के नीचे लोहे के भंडार हैं। वे उसे निकालना चाहते थे। उन्होंने बड़े-बड़े वादे किए। कहते थे कि अगर हम अपनी ज़मीन उन्हें बेच दें तो वे हमें नौकरी व पैसा देंगे। कुछ गाँव वाले बहुत खुश हुए। कुछ को लगता था कि इससे हमारी जिंदगी तबाह हो जाएगी। कुछ ने तो कागजों पर अँगूठे के निशान भी लगा दिए। उन्हें पता ही नहीं था कि अँगूठे का निशान लगाकर वे अपनी जमीन बेच रहे हैं। मुट्ठी भर लोगों को उन्होंने छोटी-मोटी नौकरी पर रख लिया। लेकिन ज्यादातर लोगों ने अपनी ज़मीनें नहीं बेचीं। फाइल आदिवासी भूमि अधिग्रहण हममें से बहुत सारे लोगों को अपने घर-बार छोड़ने पड़े। आस-पास के कस्बों में जो काम-धंधे समय-समय पर मिल जाते, हम उन्हें करने लगे। अध्याय 7: हाशियाकरण की समझ 2015-16 ओह दादू। और हमारी ज़मीन। उसका... तब उन्होंने हमारे साथ मार-पीट शुरू कर दी। वे हमें तरह-तरह से धमकाने लगे। आखिरकार उन्होंने सबको अपने पुरखों की जमीन बेचने और छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। हमारी पूरी जीवनशैली का रातोंरात नामोनिशान गायब हो गया। तीस एकड़ जमीन के बदले ठेकेदार से हमें बस थोड़ा-सा पैसा मिला। मैं अपने ज्यादातर दोस्तों से उसके बाद फिर कभी नहीं मिल पाया। शहर में वे पैसे मुश्किल से थोड़े दिन चले। हमारे पास रोजी-रोटी का कोई साधन नहीं बचा था। हम सब किराये पर एक कमरे के मकान में रहने लगे। अपनी बेखौफ़ जिंदगी और उस खुले माहौल की हमें बहुत याद आती थी। कुछ साल बाद तुम्हारे पिताजी को दिल्ली में नौकरी मिल गई और हम यहाँ चले आए। वे बड़े कठिनाई भरे दिन थे...। इसीलिए तुम दोनों को भी हम कई साल तक स्कूल नहीं भेज पाए। मुझे स्कूल जाने से नफ़रत थी। हम पढ़ाई में इतने पीछे थे कि सारे बच्चे हमारा मज़ाक उड़ाते थे। हम घर में संथाली भाषा । बोलते थे इसलिए हिंदी में बात ही नहीं कर पाते थे। लेकिन अब हमारे कुछ दोस्त बन गए हैं। मैं थोड़ी-बहुत अंग्रेजी भी बोल लेती हूँ। काश, मैं अपने दोस्तों को अपना गाँव बरबाद होने । से पहले दिखा सकता। तुम लोग अभी भी उन्हें अपने गाँव | के बारे में बता सकती हो। इससे । वे काफी कुछ सीख सकते हैं.... एक दिन मैं अपनी यानी आदिवासियों की कहानी पर एक फ़िल्म बनाऊँगी। --- सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 अभी आपने पढ़ा कि किस तरह दादू को उड़ीसा का अपना गाँव छोड़ना पड़ा। दाद की कहानी हमारे देश के लाखों आदिवासियों की कहानी से मिलती-जुलती है। इस समुदाय के हाशियाकरण के बारे में आप इस अध्याय में और विस्तार से पढ़ेंगे। कम से कम तीन कारण बताइए कि विभिन्न समूह हाशिये पर क्यों चले जाते हैं। दादू को उड़ीसा का अपना गांव क्यों छोड़ना पड़ा? आदिवासियों को जनजाति भी कहा जाता है। शायद आपने अनुसूचित जनजाति शब्द सुना होगा। सरकारी दस्तावेज़ों में आदिवासियों के लिए इसी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। आदिवासी समुदायों की एक सरकारी सूची भी बनाई गई है। अनुसूचित जनजातियों को कई बार अनुसूचित जातियों के साथ मिलाकर भी देखा जाता है। मिलाकर भी देखा जाता है। आदिवासी कौन लोग हैं? आदिवासी शब्द का मतलब होता है ‘मूल निवासी'। ये ऐसे समुदाय हैं। जो जंगलों के साथ जीते आए हैं और आज भी उसी तरह जी रहे हैं। भारत की लगभग 8 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। देश के बहुत सारे महत्त्वपूर्ण खनन एवं औद्योगिक क्षेत्र आदिवासी इलाकों में हैं। जमशेदपुर, राउरकेला, बोकारो और भिलाई का नाम आपने सुना होगा। आदिवासियों की सारी आबादी एक जैसी नहीं है। भारत में 500 से ज्यादा तरह के आदिवासी समूह हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर-पूर्व के अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड एवं त्रिपुरा आदि राज्यों में आदिवासियों की संख्या काफ़ी ज्यादा है। अकेले उड़ीसा में ही 60 से ज्यादा अलग-अलग जनजातीय समूह रहते हैं। आदिवासी समाज औरों से बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं क्योंकि उनके भीतर ऊँच-नीच का फर्क बहुत कम होता है। इसी वजह से ये समुदाय जाति-वर्ण पर आधारित समुदायों या राजाओं के शासन में रहने वाले समुदायों से बिल्कुल अलग होते हैं। आदिवासियों के बहुत सारे जनजातीय धर्म होते हैं। उनके धर्म इस्लाम, हिंदु, ईसाई आदि धर्मों से बिल्कुल अलग हैं। वे अकसर अपने पुरखों । की, गाँव और प्रकृति की उपासना करते हैं। प्रकृति से जुड़ी आत्माओं में पर्वत, नदी, पशु आदि की आत्माएँ हैं। ये विभिन्न स्थानों से जुड़ी । होती हैं और इनका वहीं निवास माना जाता है। ग्राम आत्माओं की अकसर गाँव की सीमा के भीतर निर्धारित पवित्र लता-कुंजों में पूजा की जाती है जबकि पुरखों की उपासना घर में ही की जाती है। आदिवासी अपने आस-पास के बौद्ध और ईसाई आदि धर्मों व शाक्त, वैष्णव, भक्ति आदि पंथों से भी प्रभावित होते रहे हैं। लेकिन यह भी सच है। कि आदिवासियों के धर्मों का आस-पास के साम्राज्यों में प्रचलित प्रभुत्वशाली धर्मों पर भी असर पड़ता रहा है। उड़ीसा का जगन्नाथ पंथ आपके शहर या गाँव में कौन से समूह हाशिये पर हैं? चर्चा करें। क्या आप अपने राज्य के किसी जनजातीय समुदाय का नाम बता सकते हैं। वह समुदाय कौन सी भाषा बोलता है? क्या वे जंगलों के आसपास रहते हैं? क्या क्या वे जंगलों के आसपास रहते हैं? क्या वे काम की तलाश में दूसरे इलाकों में जाते हैं? अध्याय 7: हाशियाकरण की समझ 2015-16 और बंगाल व असम की शक्ति एवं तांत्रिक परंपराएँ इसी के उदाहरण हैं। उन्नीसवीं सदी में बहुत सारे आदिवासियों ने ईसाई धर्म अपनाया जो आधुनिक आदिवासी इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण धर्म बन गया है। आदिवासियों की अपनी भाषाएँ रही हैं (उनमें से ज्यादातर संस्कृत से बिल्कुल अलग और संभवतः उतनी ही पुरानी हैं)। इन भाषाओं ने बांग्ला जैसी मुख्यधारा' की भारतीय भाषाओं को गहरे तौर पर प्रभावित किया है। इनमें संथाली बोलने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है। उनकी अपनी पत्र-पत्रिकाएँ निकलती हैं। इंटरनेट पर भी उनकी पत्रिकाएँ मौजूद हैं। ये परंपरागत पोशाकों में सजे-धजे जनजातीय समुदायों की तस्वीरें हैं। आमतौर पर आदिवासियों को इन्हीं रूपों में पेश किया। जाता है। इसके आधार पर हमें यह गलतफ़हमी हो जाती है कि आदिवासी ‘रंग-बिरंगे' और 'पिछड़े लोग होते हैं। आदिवासी और प्रचलित छवियाँ हमारे देश में आदिवासियों को एक खास तरह से पेश किया जाता रहा है। स्कूल के उत्सवों, सरकारी कार्यक्रमों या किताबों व फ़िल्मों में उन्हें सदा एक रूप में ही पेश किया जाता है। वे रंग-बिरंगे कपड़े पहने, सिर पर मुकुट लगाए और हमेशा नाचते-गाते दिखाई देते हैं। इसके अलावा हम उनकी जिंदगी की सच्चाइयों के बारे में बहुत कम जानते हैं। इसीलिए बहुत सारे लोग इस गलतफ़हमी का शिकार हो जाते हैं कि उनका जीवन बहुत आकर्षक, पुराने किस्म का और पिछड़ा हुआ है। आदिवासियों पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि वे आगे नहीं बढ़ना चाहते। बहुत सारे लोग पहले ही मान लेते हैं कि वे बदलाव या नए विचारों से दूर रहना चाहते हैं। कक्षा 6 की किताब में आपने पढ़ा था कि खास समुदायों को बनी-बनाई छवियों में देखते चले जाने की वजह से इस तरह के समुदायों के साथ अक्सर कितना भेदभाव होने लगता है। आदिवासी और विकास जैसा कि आपने इतिहास की अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ा है, भारत में तमाम साम्राज्यों और सभ्यताओं के विकास में जंगलों का बहुत गहरा महत्त्व रहा है। लोहे, ताँबे, सोने व चाँदी के अयस्क, कोयले और हीरे, कीमती इमारती लकड़ी, ज्यादातर जड़ी-बूटियाँ और पशु उत्पाद (मोम, लाख, शहद) और स्वयं जानवर (हाथी, जो कि शाही सेनाओं का मुख्य आधार रहा है), ये सभी जंगलों से ही मिलते हैं। इसके अलावा जीवन के आगे बढ़ते रहने में जंगल का बड़ा योगदान रहा है। इन्हीं जंगलों से बहुत सारी नदियों को लगातार पानी मिलता रहा है। अब समझ में आ रहा है कि ये जंगल हमारी हवा और पानी की उपलब्ध ता और गुणवत्ता को भी गहरे तौर पर प्रभावित करते हैं। उन्नीसवीं सदी सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 के आखिर तक हमारे देश का बड़ा हिस्सा जंगलों से ढका हुआ था। और कम से कम उन्नीसवीं सदी के मध्य तक तो इन विशाल भूखंडों । का आदिवासियों के पास जबरदस्त ज्ञान था। इन इलाकों में उनकी गहरी पैठ थी। उनका जंगलों पर पूरा नियंत्रण भी था। इसीलिए आदिवासी समुदाय बड़ी-बड़ी रियासतों और रजवाड़ों के अधीन नहीं । रहे। बल्कि बहुत सारे राज्य वन संसाधनों के लिए आदिवासियों पर निर्भर रहते थे। यह तस्वीर आदिवासियों की प्रचलित छवि से बिल्कुल अलग है। आज उन्हें हाशियाई और शक्तिहीन समुदाय के रूप में देखा जाता है। औपनिवेशिक शासन से पहले आदिवासी समुदाय शिकार और चीजें बीनकर आजीविका चलाते थे। वे एक जगह ठहर कर कम रहते थे। वे स्थानांतरित खेती के साथ-साथ लंबे समय तक एक स्थान पर भी । खेती करते थे। हालाँकि ये परंपराएँ अभी भी कायम हैं, लेकिन पिछले । 200 सालों में आए आर्थिक बदलावों, वन नीतियों और राज्य व निजी उद्योगों के राजनीतिक दवाब की वजह से इन लोगों को बागानों, निर्माण । स्थलों, उद्योगों और घरों में नौकरी करने के लिए ढकेला जा रहा है। इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि आज उनका वन क्षेत्रों पर कोई नियंत्रण नहीं है और न ही उन तक सीधी पहुँच है। आज के भारत में कौन सी धातुएँ। महत्त्वपूर्ण हैं? क्यों? वे धातुएँ कहाँ से हासिल होती हैं? क्या वहाँ आदिवासियों की आबादी है? ऐसे पाँच उत्पाद बताइए जो जंगल से मिलते हैं और जिनका आप घर में इस्तेमाल करते हैं। वन भूमि पर निम्नलिखित माँगें किन लोगों से की जा रही हैं? • मकानों और रेलवे के निर्माण के लिए इमारती लकड़ी • खनन के लिए वन भूमि • गैर-जनजातीय लोगों द्वारा कृषि के लिए वनभूमि का उपयोग । • वन्यजीव अभयारण्यों के रूप में सरकार द्वारा आरक्षित जमीन इन माँगों से जनजातीय समुदायों पर किस इन माँगों से जनजातीय समुदायों पर किस तरह असर पड़ता है? झारखंड और आसपास के इलाकों के आदिवासी 1830 के दशक से ही बहुत बड़ी संख्या में भारत और दुनिया के अन्य इलाकों - मॉरिशस, कैरीबियन और यहाँ तक कि ऑस्ट्रेलिया में जाते रहे हैं। भारत का चाय उद्योग असम में उनके श्रम के बूते ही अपने पैरों पर खड़ा हो पाया है। आज अकेले असम में 70 लाख आदिवासी हैं। इस विस्थापन की कहानी भीषण कठिनाइयों, यातना, विरह और मौत की कहानी रही है। उन्नीसवीं । सदी में ही इन पलायनों के कारण 5 लाख आदिवासी मौत के मुंह में जा चुके थे। नीचे दिया गया गीत आदिवासियों की आकांक्षाओं और असम में उनके वास्तविक हालात की बानगी पेश करता है। आओ मिनी, असम चलें हमारे देश में तो बहुत कष्ट हैं। असम की धरती पर मिनी हरियाली से भरे चाय के बागान हैं... सरदार कहता है काम, काम । बाबू कहता है उन्हें पकड़ो और इधर लाओ साहब कहता है मैं तुम्हारी खाल उधेड़ दूंगा हे जादूराम, तुमने हमें असम भेजकर बड़ा छल किया है। स्रोत- बसु, एस. झारखंड मूवमेंट : ऐथनीसिटी कल्चर एंड साइलेंस इस कविता में क्या बताने का प्रयास किया जा रहा है? अध्याय 7: हाशियाकरण की समझ 2015-16 यह फ़ोटो उड़ीसा के कालाहाँडी जिले में स्थित न्यामगिरी पहाड़ी का है। यह डोंगरिया कोंड नामक आदिवासी समुदाय का इलाका है। न्यामगिरी इस समुदाय का पवित्र पर्वत है। एक बड़ी एल्यूमीनियम कंपनी यहाँ खान और शोधक संयंत्र (रिफ़ाइनरी) लगाना चाहती है। यह योजना इस आदिवासी समुदाय को विस्थापित कर देगी। इस समुदाय के लोगों ने इस प्रस्तावित योजना का जमकर विरोध किया है। पर्यावरणवादी भी उनका समर्थन कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में कंपनी के खिलाफ़ मुकदमा भी चल रहा है। इमारती लकड़ी और खेती व उद्योगों के लिए विशाल वनभूमियों को साफ़ किया जा चुका है। आदिवासियों के इलाकों में खनिज पदार्थों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की भी भरमार रही है। इसीलिए इन ज़मीनों को खनन और अन्य विशाल औद्योगिक परियोजनाओं के लिए बार-बार छीना गया है। जनजातीय भूमि पर कब्ज़ा करने के लिए ताकतवर गुटों ने हमेशा मिलकर काम किया है। काफ़ी बार उनकी जमीन जबरन छीनी गई है और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन बहुत कम किया गया है। सरकारी आँकड़ों से पता चलता है कि खनन और खनन परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वालों में 50 प्रतिशत से ज्यादा केवल आदिवासी रहे हैं। आदिवासियों के बीच काम करने वाले संगठनों की एक ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट से पता चलता है कि आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड में जो लोग विस्थापित हुए हैं उनमें से 79 प्रतिशत आदिवासी थे। उनकी बहुत सारी जमीन देश भर में बनाए गए सैकड़ों बाँधों के जलाशयों में डूब चुकी है। पूर्वोत्तर भारत में उनकी जमीन लंबे समय से सशस्त्र बलों और उनके बीच चलने वाले टकरावों से बिंधी है। इसके अलावा भारत में 54 राष्ट्रीय पार्क और 372 वन्य जीव अभयारण्य हैं। इनका कुल क्षेत्रफल 1,09,652 वर्ग किलोमीटर है। ये ऐसे इलाके हैं जहाँ मूल रूप से आदिवासी रहा करते थे। अब उन्हें वहाँ से उजाड़ दिया गया है। अगर वे इन जंगलों में रहने की कोशिश करते हैं तो उन्हें घुसपैठिया कहा जाता है। अपनी जमीन और जंगलों से बिछड़ने पर आदिवासी समुदाय आजीविका और भोजन के अपने मुख्य स्रोतों से वंचित हो जाते हैं। अपने परंपरागत | निवास स्थानों के छिनते जाने की वजह से बहुत सारे आदिवासी काम की तलाश में शहरों का रुख कर रहे हैं। वहाँ उन्हें छोटे-मोटे उद्योगों, इमारतों आदिवासी लगभग 10,000 तरह के पौधों का इस्तेमाल करते हैं। उनमें से लगभग 8,000 प्रजातियाँ दवाइयों के तौर पर; 325 प्रजातियाँ कीटनाशकों के तौर पर; 425 प्रजातियाँ गोंद, रेजिन और डाई के तौर पर और 550 प्रजातियाँ रेशों के लिए इस्तेमाल की जाती हैं। इनमें से 3500 प्रजातियाँ भोजन के रूप में इस्तेमाल होती हैं। जब आदिवासी समुदाय वन भूमि पर अपना अधिकार खो देते हैं तो यह सारी ज्ञान संपदा भी खत्म हो जाती है। सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 या निर्माण स्थलों पर बहुत मामूली वेतन वाली नौकरियाँ करनी पड़ती हैं। या निर्मा आपकी राय में यह बात महत्त्वपूर्ण क्यों आपकी राय में यह बात महत्त्वपूर्ण क्यों इस तरह वे गरीबी और लाचारी के जाल में फँसते चले जाते हैं। ग्रामीण। है कि आदिवासियों को भी उनके जंगलों और वनभूमि के इस्तेमाल से संबंधित इलाकों में 45 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 35 प्रतिशत आदिवासी समूह । फैसलों में अपनी बात कहने का मौका गरीबी की रेखा से नीचे गुजर बसर करते हैं। इसकी वजह से वे कई तरह मिलना चाहिए? के अभावों का शिकार हो जाते हैं। उनके बहुत सारे बच्चे कुपोषण के शिकार रहते हैं। आदिवासियों के बीच साक्षरता भी बहुत कम है। जब आदिवासियों को उनकी जमीन से हटाया जाता है तो उनकी आमदनी के स्रोत के अलावा और भी बहुत कुछ है जो हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है। वे अपनी परंपराएँ और रीति-रिवाज मँवा देते हैं जो कि उनके जीने और अस्तित्व का स्रोत हैं। उड़ीसा में एक रिफ़ाइनरी परियोजना के कारण विस्थापित हुए गोविंद मारन कहते हैं, उन्होंने हमारी खेती की ज़मीन छीन ली। बस थोड़े से मकान छोड़ दिए हैं। उन्होंने श्मशान भूमि, मंदिर, कुएँ, तालाब, सब कुछ अपने कब्जे में ले लिया है। अब हम कैसे जिएँगे?" जैसा कि आप पढ़ चुके हैं, आदिवासी जीवन के आर्थिक और सामाजिक आयाम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक दायरे में होने वाला विनाश दूसरे दायरे को भी प्रभावित करता है। उनके संसाधनों के लिए होने वाली छीनाझपटी और विस्थापन की यह प्रक्रिया अकसर दर्दनाक और हिंसक होती है। अल्पसंख्यक और हाशियाकरण इकाई 1 में आपने पढ़ा था कि मौलिक अधिकारों के ज़रिए हमारा संविधान धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करता है। आपकी राय में इन अल्पसंख्यक समुदायों को ये सुरक्षाएँ क्यों मुहैया कराई जा रही हैं? अल्पसंख्यक शब्द आमतौर पर ऐसे समुदायों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो संख्या की दृष्टि से बाकी आबादी के मुकाबले बहुत कम हैं। लेकिन यह अवधारणा केवल संख्या के सवाल तक ही सीमित नहीं है। इसमें न केवल सत्ता और संसाधनों तक पहुँच जैसे मुद्दे जुड़े हुए हैं, बल्कि इसके सामाजिक व सांस्कृतिक आयाम भी होते हैं। जैसा कि आपने इकाई 1 में पढ़ा था, भारतीय संविधान इस बात को मानता है कि बहुसंख्यक समुदाय की संस्कृति समाज और सरकार की अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकती है। ऐसी सूरत में छोटा आकार घाटे की बात साबित हो सकती है और संभव है कि छोटे समुदाय हाशिये पर खिसकते चले जाएँ। ऐसे में अल्पसंख्यक समुदायों को बहुसंख्यक समुदाय के सांस्कृतिक अध्याय 7: हाशियाकरण की समझ 2015-16 अल्पसंख्यकों के लिए हमें सुरक्षात्मक प्रावधानों की क्यों ज़रूरत है? वर्चस्व की आशंका से बचाने के लिए सुरक्षात्मक प्रावधानों की जरूरत पड़ती है। ये प्रावधान उन्हें भेदभाव और नुकसान की आशंका से भी बचाते हैं। कुछ खास परिस्थितियों में छोटे समुदाय अपने जीवन, संपत्ति और कुशलक्षेम के बारे में असुरक्षित भी महसूस कर सकते हैं। असुरक्षा की यह भावना तब और बढ़ सकती है जब अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदायों के संबंध तनावपूर्ण होते हैं। संविधान में इन सुरक्षाओं की व्यवस्था इसलिए की गई है कि हमारा संविधान भारत की सांस्कृतिक विविधता की सुरक्षा तथा समानता व न्याय की स्थापना के प्रति संकल्पबद्ध है। जैसा कि आप अध्याय 5 में पढ़ चुके हैं, कानून को कायम रखने और मौलिक अधिकारों को साकार करने में न्यायपालिका एक अहम भूमिका निभाती है। अगर किसी भी नागरिक को ऐसा लगता है कि उसके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है तो वह अदालत में जा सकता है। आइए अब इन प्रावधानों की रोशनी में मुसलमानों के संदर्भ में हाशियाकरण को समझें।। मुसलमान और हाशियाकरण 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की आबादी में मुसलमानों की संख्या 13.4 प्रतिशत है। उन्हें हाशियाई समुदाय माना जाता है क्योंकि दूसरे समुदायों के मुकाबले उन्हें सामाजिक-आर्थिक विकास के उतने लाभ नहीं मिले हैं। विभिन्न स्रोतों से ली गई निम्नलिखित तीनों सारणियों से पता चलता है कि मूलभूत सुविधाओं, साक्षरता और सरकारी नौकरियों के हिसाब से मुसलिम समुदाय की स्थिति कैसी है। नीचे दी गई तीनों सारणियों को पढ़ कर बताइए कि वे मुसलिम समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बारे में क्या बताती हैं? 1. मूलभूत सुविधाएँ, 1994 कच्चे घर 63.6% मुसलमान कच्चे घरों में रहते हैं। 55.2% हिंदू कच्चे घरों में रहते हैं। 30% मुसलमानों के घर में बिजली है। 7 में बिजली है। बिजली पाइप का पानी 19.4% मुसलमान पाइप के पानी का प्रयोग करते हैं। 25.3% हिंदू पाइप के पानी का प्रयोग करते हैं। स्रोत- अबुसालेह शरीफ (1999), इंडिया ह्यूमन डिवेलपमेंट रिपोर्ट : अ प्रोफाइल ऑफ इंडियन स्टेट्स इन दि 1990ज, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस फॉर नैशनल काउंसिल ऑफ़ एप्लाइड इकॉनॉमिक रिसर्च, नयी दिल्ली, पृ. 236, 238, 240. क्या मुसलमानों को मूलभूत सुविधाएँ समान रूप से उपलब्ध हैं? सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 2. विभिन्न धर्मों में साक्षरता दर, 2001 कुल हिंदू मुसलिम ईसाई जैन सिख 70% का बौद्ध 73% 65% 65% 59% के 80% 70% 73% 94% स्त्रोत: भारत की जनगणना, 2001 किस धार्मिक समुदाय की साक्षरता दर सबसे कम है? 3. सरकारी नौकरियों में मुसलमानों का प्रतिशत 2.2 आबादी भारतीय भारतीय भारतीय केंद्रीय सार्वजनिक राज्य बैंक एवं प्रशासनिक सेवा पुलिस सेवा विदेश सेवा क्षेत्रीय ईकाइयाँ स्तरीय रिजर्व | (आईएएस) (आईपीएस) (आईएफएस) (पीएसयू) (पीएसयू) बैंक 13. 5 13.5 3 3 4 1.8 3.3 10.8 स्रोत- भारत में मुसलिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक स्थिति, प्रधानमंत्री की उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट, 2006 ये आँकड़े क्या बताते हैं? इस बात को ध्यान में रखते हुए कि मुसलमान विकास के विभिन्न सच्चर समिति रिपोर्ट में दिए गए शिक्षा संबंधी आँकड़ों को पढ़िए- संकेतकों पर पिछड़े हुए हैं, सरकार ने 2005 में एक उच्च स्तरीय समिति । का गठन किया। न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर की अध्यक्षता में बनाई गई इस | 6-14 साल के उम्र के 25 प्रतिशत बच्चे या तो कभी स्कूल नहीं गए या समिति ने भारत में मुसलिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक । स्कूल छोड़ चुके हैं। किसी भी स्थिति का जायजा लिया। रिपोर्ट में इस समुदाय के हाशियाकरण का । | सामाजिक-धार्मिक समुदाय के मुकाबले विस्तार से अध्ययन किया गया है। समिति की रिपोर्ट से पता चलता है कि यह संख्या बहुत बड़ी है (पृष्ठ 58 )। विभिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक संकेतकों के हिसाब से मुसलमानों क्या आपको लगता है कि इस स्थिति से की स्थिति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे अन्य हाशियाई निपटने के लिए विशेष प्रावधान करना जरूरी है? समुदायों से मिलती-जुलती है। उदाहरण के लिए, 7-16 साल की उम्र के मुसलिम बच्चे अन्य सामाजिक-धार्मिक समुदायों के बच्चों के मुकाबले औसतन काफ़ी कम साल तक ही स्कूली शिक्षा ले पाते हैं (पृष्ठ 56)। मुसलमानों के आर्थिक व सामाजिक हाशियाकरण के कई पहलू हैं। दूसरे अल्पसंख्यकों की तरह मुसलमानों के भी कई रीति-रिवाज और व्यवहार मुख्यधारा के मुकाबले काफ़ी अलग हैं। सब नहीं, लेकिन कुछ मुसलमानों में बुक़, लंबी दाढ़ी और फ़ैज़ टोपी का चलन दिखाई अध्याय 7: हाशियाकरण की समझ 2015-16 देता है। बहुत सारे लोग सभी मुसलमानों को इन्हीं निशानियों से पहचानने की कोशिश करते हैं। इसी कारण अकसर उन्हें अलग नज़र से देखा जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि वे 'हम बाकी लोगों जैसे नहीं हैं। अकसर यही सोच उनके साथ गलत व्यवहार करने और भेदभाव का बहाना बन जाती है। कक्षा 7 में आपने पढ़ा था कि किस तरह अंसारी परिवार को किराये पर मकान ढूँढ़ने में मुश्किल आ रही थी। मुसलमानों के इसी सामाजिक हाशियाकरण के कारण कुछ स्थितियों में वे जिन इलाकों में पहले से रहते आए हैं, वहाँ से निकलने लगे हैं जिससे अकसर उनका ‘घेटोआइजेशन' (ghettoisation) होने लगता है। कभी-कभी यही पूर्वाग्रह घृणा और हिंसा को जन्म देता है। मुसलिम महिलाएँ भारत में महिला आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। मैं एक मुसलिम बहुल क्षेत्र में रहती हैं। कुछ दिन पहले रमज़ान के दौरान वहाँ कुछ गड़बड़ी हुई जिसने जल्दी ही सांप्रदायिक रूप ले लिया। मैं और मेरा भाई पड़ोस में ही इफ़्तार की एक दावत में गए थे। मैंने परंपरागत कपड़े यानी सलवार-कमीज़ पहनी थी। मेरा भाई शेरवानी पहने था। घर लौटने पर हमें कहा गया कि हम अपने कपड़े बदलकर जींस और टी-शर्ट पहन लें। अब जबकि सब कुछ ठीक है तो मुझे हैरत होती है कि हमें कपड़े बदलने के लिए क्यों कहा गया और मुझे यह बात अजीब क्यों नहीं लगी। क्या हमारे पहनावे से हमारी पहचान पता चल जाती है और क्या यही पहचान सारे खतरों और भेदभाव की जड़ है? ऐनी ए. फ़ारूक़ी उपरोक्त निबंध आपकी ही उम्र की एक बच्ची ने लिखा है। आपकी राय में वह क्या कहने का प्रयास कर रही है? इस अध्याय के उपरोक्त भाग में हमने देखा कि मुसलमानों के आर्थिक और सामाजिक हाशियाकरण के बीच गहरा संबंध है। इसी अध्याय में पीछे आपने आदिवासियों की स्थिति के बारे में भी पढ़ा। सातवीं कक्षा में आप भारत में औरतों की असमान स्थिति के बारे में पढ़ चुके हैं। इन सारे समूहों के अनुभवों से पता चलता है कि हाशियाकरण एक जटिल परिघटना है जिससे निपटने के लिए कई तरह की रणनीतियों, साधनों और सुरक्षाओं की जरूरत है। इसका मतलब है कि संविधान द्वारा परिभाषित अधिकारों और इन अधिकारों को साकार करने वाले कानूनों व नीतियों की रक्षा में हम सभी की बराबर जिम्मेदारी बनती है। इनके बिना न तो हम उस विविधता की रक्षा कर पाएँगे जो हमारे देश को एक अनूठी छटा देती है और न ही समानता के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को साकार कर पाएँगे। सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 निष्कर्ष इस अध्याय में हमने यह समझने का प्रयास किया है कि हाशियाई समुदाय होने का क्या मतलब होता है। हमने विभिन्न हाशियाई समुदायों के अनुभवों के ज़रिए इस बात को समझने का प्रयास किया है। इन समुदायों के हाशिये पर रह जाने के अलग-अलग कारण हैं। प्रत्येक समुदाय इसको अलग-अलग तरह से महसूस भी करता हैं। हमने यह भी देखा है कि हाशियाकरण का संबंध अभाव, पूर्वाग्रह और शक्तिहीनता के अहसास से जुड़ा हुआ है। हमारे देश में कई और भी हाशियाई समुदाय हैं। दलित भी इसी तरह का एक समुदाय है। इस समुदाय के बारे में हम अगले अध्याय में विस्तार से पढ़ेंगे। हाशियाकरण से कमज़ोर सामाजिक हैसियत ही नहीं पैदा होती, बल्कि शिक्षा व अन्य संसाधनों तक पहुँच भी बराबर नहीं मिल पाती है। सच्चर समिति रिपोर्ट ने मुसलमानों के बारे में प्रचलित दूसरी गलतफ़हमियों को भी उजागर कर दिया है। आमतौर पर माना जाता है कि मुसलमान अपने बच्चों को सिर्फ मदरसों में भेजना चाहते हैं। आँकड़ों से पता चलता है कि केवल 4 प्रतिशत मुसलमान बच्चे मदरसों में जाते हैं। मुसलमानों के 66 प्रतिशत बच्चे। सरकारी और 30 प्रतिशत बच्चे निजी सरकारी और 30 प्रतिशत बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं (पृष्ठ 75)। स्कूलों में पढ़ रहे हैं (पृष्ठ 75)। और अगर इसके बावजूद हाशियाई समुदायों का जीवन भी बदला जा सकता है । और बदलता है। कोई भी हमेशा एक ही तरह से हाशिये पर नहीं रहता। अगर हम हाशियाकरण के इन उदाहरणों पर ध्यान दें तो पाएँगे कि इन दोनों समुदायों के पास भी संघर्ष और प्रतिरोध का एक लंबा इतिहास रहा है। हाशियाई समुदाय अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता बनाए रखना चाहते हैं और साथ ही अधिकारों, विकास और अन्य अवसरों में बराबर का हिस्सा चाहते हैं। अगले अध्याय में आप जानेंगे कि विभिन्न समूहों ने इस हाशियाकरण का सामना किस तरह किया है। अध्याय 7: हाशियाकरण की समझ 2015-16 1. ‘हाशियाकरण' शब्द से आप क्या समझते हैं? अपने शब्दों में दो-तीन वाक्य लिखिए। 2. आदिवासी लगातार हाशिये पर क्यों खिसकते जा रहे हैं? दो कारण बताइए। 3. आप अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षाओं को क्यों महत्त्वपूर्ण मानते हैं? इसका एक कारण बताइए। 4. अल्पसंख्यक और हाशियाकरण वाले हिस्से को दोबारा पढिए। अल्पसंख्यक शब्द से आप क्या समझते हैं? 5. आप एक बहस में हिस्सा ले रहे हैं जहाँ आपको इस बयान के समर्थन में तर्क देने हैं कि मुसलमान एक हाशियाई समुदाय है।' इस अध्याय में दी गई जानकारियों के आधार पर दो तर्क पेश कीजिए। 6. कल्पना कीजिए कि आप टेलीविजन पर 26 जनवरी की परेड देख रहे हैं। आपकी एक दोस्त आपके नजदीक बैठी है। वह अचानक कहती है, "इन आदिवासियों को तो देखो, कितने रंग-बिरंगे हैं। लगता है सदा नाचते ही रहते हैं।” उसकी बात सुन कर आप भारत में आदिवासियों के जीवन से संबंधित क्या बातें उसको बताएँगे? उनमें से तीन बातें लिखें। 7. चित्रकथा-पट्ट में आपने देखा कि हेलेन होप आदिवासियों की कहानी पर एक फिल्म बनाना चाहती है। क्या आप आदिवासियों के बारे में एक कहानी बना कर उसकी मदद कर सकते हैं? 8. क्या आप इस बात से सहमत हैं कि आर्थिक हाशियाकरण और सामाजिक हाशियाकरण आपस में जुड़े हुए हैं? क्यों? सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 शब्द संकलन ऊँच-नीच- व्यक्तियों या चीजों की एक क्रमिक व्यवस्था। आमतौर पर ऊँच-नीच की सीढी के सबसे निचले पायदान पर वे लोग होते हैं जिनके पास सबसे कम ताकत है। जाति व्यवस्था ऊँच-नीच की व्यवस्था है जिसमें दलितों को सबसे नीचे माना जाता है। घेटोआइजेशन- यह शब्द आमतौर पर ऐसे इलाके या बस्ती के लिए इस्तेमाल होता है जिसमें मुख्य रूप से एक ही समुदाय के लोग रहते हैं। घंटोआइजेशन इस स्थिति तक पहुँचने वाली प्रक्रिया को कहा जाता है। यह प्रक्रिया विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों पर आधारित हो सकती है। भय की भी किसी समदाय को एकजट होने के लिए मजबर कर सकती है क्योंकि अपने समदाय के लोगों के बीच रहने पर उन्हें ज्यादा राहत मिलती है। इस समुदाय के पास आमतौर पर वहाँ से । निकल पाने के ज्यादा विकल्प नहीं होते हैं जिसके कारण वह शेष समाज से कटता चला जाता है। मुख्यधारा- कायदे से किसी नदी या जलधारा के मुख्य बहाव को मुख्यधारा कहा जाता है। इस अध्याय में यह शब्द एक ऐसे सांस्कृतिक संदर्भ के लिए इस्तेमाल हुआ है जिसमें वर्चस्वशाली समुदाय के रीति-रिवाजों और प्रचलनों को ही सही माना जाता है। इसी क्रम में उन लोगों या समुदायों को भी मुख्यधारा कहा जाता है जिन्हें समाज का केंद्र माना जा रहा है, जैसे बहुधा शक्तिशाली या वर्चस्वशाली समूह। विस्थापित- ऐसे लोग जिन्हें बाँध, खनन आदि विशाल विकास परियोजनाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए जबरन उनके घर-बार से उजाड़ दिया जाता है। कुपोषित- ऐसा व्यक्ति जिसे पर्याप्त भोजन या पोषण नहीं मिलता। अध्याय 7: हाशियाकरण की समझ 2015-16

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