कानूनों की समझ आप कुछ कानूनों से परिचित होंगे। शायद आपको शादी की उम्र सीमा या मताधिकार की उम्र सीमा का पता होगा। संभव है आप संपत्ति को खरीदने-बेचने के कानूनों को भी जानते हों। अभी तक आप यह जान चुके हैं कि कानून बनाने का जिम्मा संसद का होता है। क्या ये कानून सभी पर लागू होते हैं? नए कानून किस तरह अस्तित्व में आते हैं? क्या कोई कानून अलोकप्रिय या विवादास्पद भी होता है? नागरिक के नाते हमें ऐसी परिस्थितियों में क्या करना चाहिए? सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 क्या कानून सब पर लागू होते हैं? इस स्थिति को पढ़े और उसके नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दें- एक सरकारी अधिकारी के बेटे को जिला अदालत ने 10 साल की सजा सुनाई है। इस वजह से वह सरकारी अधिकारी अपने बेटे को भाग निकलने में मदद करता है। क्या आपको लगता है कि उस सरकारी अधिकारी ने सही काम किया? क्या उसके बेटे को केवल इसलिए कानून से माफ़ी मिल जानी चाहिए । कि उसका बाप आर्थिक और राजनीतिक रूप से बहुत ताकतवर है? यह सीधे-सीधे कानून के उल्लंघन का मामला है। जैसा कि आप इकाई एक में पढ़ चुके हैं, राष्ट्रवादियों के बीच इस बात पर पूरी सहमति थी कि स्वतंत्र भारत में सत्ता के मनमाने इस्तेमाल की कोई गुंजाइश नहीं। होनी चाहिए। इसीलिए उन्होंने संविधान में कई ऐसे प्रावधान जोड़े जो कानून पर आधारित शासन की स्थापना के लिए जरूरी थे। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण प्रावधान यह था कि स्वतंत्र भारत में सभी लोग कानून की नज़र में बराबर होंगे। हमारा कानून धर्म, जाति और लिंग के आधार पर लोगों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता। कानून के शासन का मतलब है कि सभी कानून देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं। कानून से ऊपर कोई व्यक्ति नहीं है। चाहे वह सरकारी अधिकारी हो या धन्नासेठ हो और यहाँ तक कि राष्ट्रपति ही क्यों न हो। किसी भी अपराध या कानून के उल्लंघन की एक निश्चित सज़ा होती है। सज़ा तक पहुँचने की भी एक तय प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति का अपराध साबित किया जाता है। लेकिन क्या हमेशा से ऐसा ही था? प्राचीन भारत में असंख्य स्थानीय कानून थे। अकसर एक जैसे मामले में कई तरह के स्थानीय कानून लागू होते थे। विभिन्न समुदाय इन अध्याय 4: कानूनों की समझ 2015-16 कानूनों को अपने अधिकार क्षेत्र में अपने हिसाब से लागू करने के लिए रॉलट एक्ट अंग्रेजों के मनमानेपन का एक और उदाहरण था। इस कानून के ज़रिए ब्रिटिश आज़ाद थे। कुछ मामलों में जाति के आधार पर एक ही अपराध के सरकार बिना मुकदमा चलाए लोगों को लिए अलग-अलग व्यक्ति को अलग-अलग सज़ा दी जाती थी। जैसे, कारावास में डाल सकती थी। महात्मा गाँधी निचली मानी जाने वाली जाति के अपराधी को ज्यादा सज़ा दी जाती सहित सभी भारतीय राष्ट्रवादी नेता रॉलट एक्ट के सख्त खिलाफ़ थे। भारतीय विरोध के । थी। औपनिवेशिक शासन के दौरान कानून पर आधारित व्यवस्था बावजूद 10 मार्च 1919 से रॉलट एक्ट को लागू जैसे-जैसे परिपक्व होती गई, जाति के आधार पर सजा देने में भेदभाव कर दिया गया। पंजाब में इस कानून का भारी पैमाने पर विरोध होता रहा। इसी क्रम में 10 ।। का यह चलन खत्म होने लगा। अप्रैल को डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन । बहुत सारे लोग मानते हैं कि हमारे देश में कानून के शासन की शुरुआत किचलू को गिरफ़्तार कर लिया गया। इन नेताओं की गिरफ्तारियों के विरोध में 13 अप्रैल को अंग्रेजों ने की थी। इतिहासकारों में इस बात पर काफ़ी विवाद रहा है। अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक सभा का इसके कई कारण हैं। एक कारण तो यह है कि औपनिवेशिक कानून आयोजन किया गया। जिस समय यह सभा चल मनमानेपन पर आधारित था। दूसरी वज़ह यह बताई जाती है कि ब्रिटिश रही थी उसी समय जनरल डायर ब्रिटिश फ़ौजी टुकड़ियों के साथ बाग में दाखिल हुआ। उसने । । भारत में कानूनी मामलों के विकास में भारतीय राष्ट्रवादियों ने एक बाहर निकलने का रास्ता बंद करके बिना । अहम भूमिका निभाई थी। 1870 का राजद्रोह एक्ट अंग्रेजी शासन के चेतावनी दिए लोगों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवा मनमानेपन की मिसाल था। इस कानून में राजद्रोह की परिभाषा बहुत दीं। इस हत्याकांड में कई सौ लोग मारे गए। और असंख्य जख्मी हुए। मरने और घायल होने । व्यापक थी। इसके मुताबिक अगर कोई भी व्यक्ति ब्रिटिश सरकार का वालों में बहुत सारी औरतें और बच्चे भी थे। इस विरोध या आलोचना करता था तो उसे मुकदमा चलाए बिना ही पेंटिंग में जलियाँवाला बाग जनसंहार के समय । गिरफ्तार किया जा सकता था। हुई गोलीबारी का दृश्य दिखाया गया है। भारतीय राष्ट्रवादी अंग्रेजों द्वारा सत्ता के इस मनमाने इस्तेमाल का विरोध और उसकी आलोचना करते थे। अपनी बातों को मनवाने के लिए सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 उन्होंने संघर्ष शुरू कर दिया। यह समानता का संघर्ष था। उनके लिए इस किताब में मनमाना शब्द का इस्तेमाल कानून का मतलब ऐसे नियम नहीं थे जिनका पालन करना उनकी पीछे भी आ चुका है। अध्याय 1 के शब्द संकलन में आप इसका मतलब पढ़ चुके मजबूरी हो। वे कानून को उससे अलग ऐसी व्यवस्था के रूप में देखना हैं। अब एक कारण बताइए कि आप । चाहते थे जो न्याय के विचार पर आधारित हों। उन्नीसवीं सदी के आखिर 1870 के राजद्रोह कानून को मनमाना तक भारत में कानूनी पेशा भी उभरने लगा था। कानूनी पेशे में लगे क्यों मानते हैं। 1870 का राजद्रोह कानून भारतीयों ने माँग की कि औपनिवेशिक अदालतों में उन्हें सम्मान की नज़र । किस प्रकार कानून के शासन का उल्लंघन करता है? से देखा जाए। ऐसे भारतीय कानून विशेषज्ञ अपने देश के लोगों के अधिकारों की हिफाजत के लिए कानून का इस्तेमाल करने लगे। भारतीय न्यायाधीश भी फैसले लेने में पहले से ज्यादा भूमिका निभाने लगे थे। इस प्रकार औपनिवेशिक शासन के दौरान कानून के शासन के विकासक्रम में यहाँ के लोग भी कई तरह से अपना योगदान दे रहे थे। संविधान को स्वीकृति मिलने के बाद यह दस्तावेज़ एक ऐसी आधारशिला बन गया जिसके आधार पर हमारे प्रतिनिधि देश के लिए कानून बनाने लगे। हर साल हमारे प्रतिनिधि कई नए कानून बनाते हैं और कई पुराने कानूनों में संशोधन करते हैं। कक्षा 6 की पुस्तक में आपने 2005 के हिंदू उत्तराधिकार संशोधन कानून के बारे में पढ़ा होगा। इस नए कानून के मुताबिक बेटे, बेटियाँ और उनकी माँ, तीनों को परिवार की संपत्ति में बराबर हिस्सा मिल सकता है। इसी प्रकार प्रदूषण को नियंत्रित करने और रोज़गार मुहैया कराने के लिए भी नए कानून बनाए गए हैं। लोग इस निर्णय पर कैसे पहुँचते हैं कि एक नया कानून जरूरी है? वे कानून का प्रस्ताव किस तरह पेश करते हैं? इनके बारे में आप अगले हिस्से में पढ़ेंगे। नए कानून किस तरह बनते हैं? कानून बनाने में संसद की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यह प्रक्रिया कई तरह से आगे बढ़ती है। आमतौर पर सबसे पहले समाज के विभिन्न समूह ही किसी खास कानून के लिए आवाज़ उठाते हैं। यह संसद की ज़िम्मेदारी है कि वह लोगों के सामने आ रही समस्याओं के प्रति संवेदनशील हो। आइए देखें कि घरेलू हिंसा का सवाल किस तरह संसद के सामने आया और घरेलू हिंसा की रोकथाम पर कानून बनने की प्रक्रिया क्या थी। जब परिवार का कोई पुरुष सदस्य (आमतौर पर पति) घर की किसी औरत (आमतौर पर पत्नी) के साथ मारपीट करता है, उसे चोट पहुँचाता है, या मारपीट अथवा चोट की धमकी देता है तो इसे घरेलू हिंसा कहा जाता है। औरत को यह नुकसान शारीरिक मारपीट या भावनात्मक शोषण के कारण पहुँच सकता है। यह शोषण मौखिक, यौन या फिर आर्थिक शोषण भी हो सकता है। घरेलू हिंसा कानून, 2005 में महिलाओं की सुरक्षा की परिभाषा ने ‘घरेलू' शब्द की समझ को और अधिक व्यापक बना दिया है। अब ऐसी महिलाएँ भी घरेलू दायरे का हिस्सा मानी जाएँगी जो हिंसा करने वाले पुरुष के साथ एक ही मकान में रहती हैं' या 'रह चुकी हैं। अध्याय 4: कानूनों की समझ 2015-16 अक्तूबर 2006 अरे शाज़िया, आज का अखबार । पढा तुमने? ये महिलाओं के लिए कितनी बड़ी बात है ना? । महिलाओं के लिए ही क्यों...! हिंसा-मुक्त परिवार तो सबके लिए ही अच्छे हैं। देखो न कुसुम इस कानून को बनने में कितना वक्त । लग गया। बल्कि पहले तो हमें नए कानून । की जरूरत ही साबित करनी पड़ी। कुसुम और शाज़िया एक महिला संगठन की सदस्य हैं। उन्हें इस सफर की एक-एक कड़ी याद है। अपैल 1991: दफ़्तर का एक आम दिन... मुझे सलाह चाहिए। मेरा आदमी मुझे पीटता है। मैंने अभी तक किसी से यह बात नहीं बताई मुझे बड़ी शर्म आती है। पर अब बर्दाश्त नहीं होता। लेकिन मेरे पास कोई चारा भी नहीं है। मैं कहाँ जाऊँ? मैं पुलिस के पास नहीं जाना । चाहती। मैं तो बस यह चाहती हूँ कि मारपीट बंद हो जाए। मैं बस यह चाहती हूँ। कि मुझे मेरे घर से न निकाला जाए। बदकिस्मती से मौजूदा कानून । फ़ौजदारी कानून है। उसमें ये दोनों रास्ते मुमकिन नहीं हैं। मेरा बेटा और बहू मुझसे बहुत बुरा बर्ताव करते हैं। बहुत । भला-बुरा कहते हैं। मुझे। मैं अपने बैंक खातों का भी इस्तेमाल नहीं कर सकती। वे चाहें तो मुझे घर से भी । निकाल सकते हैं। 1990 के दशक में विभिन्न मंचों से एक नए कानून की माँग उठती रही। 1999 में वकीलों, कानून के विद्यार्थियों और समाज वैज्ञानिकों के संगठन 'लॉयर्स कलेक्टिव' ने राष्ट्रव्यापी चर्चा के बाद घरेलू हिंसा (रोकथाम एवं सुरक्षा) विधेयक का मसौदा तैयार किया। इस विधेयक को बहुत सारे लोगों को पढ़ाया गया। हमने कई महिलाओं की आपबीती सुनी है। हमने देखा है। कि महिलाएँ मारपीट से बचाव चाहती हैं, वे अपने । मकान में रहना चाहती हैं। कई बार उन्हें सिर्फ थोड़ी-सी राहत की दरकार होती है। इस मुद्दे से निपटने के लिए एक नया नागरिक कानून होना चाहिए। घरेलू हिंसा की परिभाषा में शारीरिक, आर्थिक, यौन और मौखिक व भावनात्मक। दुर्व्यवहार को भी शामिल किया जाना चाहिए। साझा घरेलू दायरे में रहने वाली किसी भी महिला को इस कानून के तहत रखा जाना चाहिए। उन्हें साझा मकान से बेदखली से बचाया जाना चाहिए। और आर्थिक मदद के बारे में क्या खयाल है? जन सुनवाई सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 विचार-विमर्श के लिए अलग-अलग संस्थानों के साथ बैठकें की गईं। आखिरकार 2002 में यह विधेयक संसद में पेश कर दिया गया। लेकिन... महिला आंदोलन घरेलू हिंसा पर एक नया कानून चाहता है। सरकार को यह प्रस्ताव जल्दी से जल्दी संसद में पेश करना चाहिए। हमें विधेयक के इस रूप का विरोध करना। चाहिए। . . चलो संवाददाता सम्मेलन बुलाते हैं... साथ ही कंप्यूटर पर एक ऑनलाइन याचिका भी शुरू करनी चाहिए ताकि इंटरनेट पर लोग तुरंत अपनी राय दे सकें। इस विधेयक में । कोई भी वो बात नहीं है जो हमने सुझाई थी। कई महिला संगठनों और राष्ट्रीय महिला आयोग ने संसदीय स्थायी समिति को अपने सुझाव सौंप दिए। संसदीय स्थायी समिति के माननीय सदस्यगण... वर्तमान विधेयक को बदलना ज़रूरी है। हम घरेलू हिंसा की प्रस्तावित परिभाषा से सहमत नहीं हैं। इस कानून में बच्चों की अस्थायी कस्टडी का भी इंतज़ाम होना चाहिए। दिसंबर 2002 में स्थायी समिति ने अपनी सिफ़ारिशें राज्यसभा को सौंप दीं। इन सिफ़ारिशों को लोकसभा में भी पेश किया गया। कमिटी की रिपोर्ट में महिला संगठनों की ज्यादातर माँगों को स्वीकार कर लिया गया था। 2005 में संसद के सामने एक नया विधेयक पेश किया गया। दोनों सदनों से मंजूरी मिल जाने के बाद उसे राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेज दिया गया। 2006 से घरेलू हिंसा महिला सुरक्षा कानून लागू हुआ। अक्तूबर 2006 में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान... यह पहला कानून है जिसमें महिलाओं के हिंसा-मुक्त परिवार के अधिकार को मान्यता दी गई है और घरेलू हिंसा की एक व्यापक परिभाषा पेश की गई है। यह एक दीवानी कानून है जो करोडों महिलाओं को राहत प्रदान । करेगा। बहुत सारी पत्नियों, माँओं, बेटियों और बहनों को अपने घरों में हिंसा से निजात मिलेगी। यह नया कानून क्या है? संवाददाता सम्मेलन के दौरान... अध्याय 4; कानूनों की समझ 2015-16 यह कानून एक बहुत महत्त्वपूर्ण कदम है। यह कानून... एक साझे मकान में रहने के महिलाओं के अधिकार को मान्यता देता है... महिलाएँ किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ सुरक्षा का आदेश प्राप्त कर सकती हैं... महिलाएँ अपने इलाज और अन्य खर्यों के लिए आर्थिक सहायता प्राप्त कर सकती हैं। हाँ, हमें इस बात का खयाल रखना है कि इस कानून में जिन बातों का वादा किया गया है उन्हें सचमुच लागू किया जाए। हमें सब तरफ़ नज़र रखनी होगी। हमें महिलाओं, पुलिस, न्यायपालिका सभी को इस कानून के बारे में शिक्षित करना होगा...। अब एक और लंबा सफ़र शुरू होता है... यह कानून इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है? ‘घरेलू हिंसा से आप क्या समझते हैं? हिंसा की शिकार महिलाओं को नए कानून से कौन से दो मुख्य अधिकार प्राप्त हुए हैं? क्या आप एक ऐसी प्रक्रिया बता सकते हैं जिसका इस्तेमाल इस कानून की जरूरत के बारे में लोगों को अवगत कराने के लिए किया गया हो? उपरोक्त चित्रकथा-पट्ट को पढ़कर बताइए कि लोगों ने कौन से दो तरीकों से संसद पर दबाव बनाया? जिन औरतों के साथ हिंसा या दुराचार होता है उन्हें आमतौर पर पीड़ित माना जाता है। इन हालात से उबरने के लिए औरतें तरह-तरह से संघर्ष करती हैं। इसलिए उन्हें पीड़ित की बजाय 'सरवाइवर' कहना ज्यादा बेहतर है। इस अंग्रेज़ी शब्द का अर्थ है जो बचा रहे। बगल में दिए गए पोस्टर के बराबरी के रिश्ते हिंसा से मुक्त वाक्य खंड से आप क्या समझते हैं? सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 इस उदाहरण से साफ़ हो जाता है कि नागरिकों की भूमिका कानून बनाने में कितनी अहम है। वे जनता की चिंताओं को कानून के दायरे में लाने के लिए संसद की मदद कर सकते हैं। इस प्रक्रिया के हर चरण में नागरिकों की आवाज़ बहुत मायने रखती है। यह आवाज़ टेलीविजन रिपोर्टों, अखबारों के संपादकीयों, रेडियो प्रसारणों और आम सभाओं के ज़रिए सुनी और व्यक्त की जा सकती है। इन सारे संचार माध्यमों के ज़रिए संसद का काम ठोस और पारदर्शी तरीके से जनता के सामने आता है। अलोकप्रिय और विवादास्पद कानून आइए अब एक और स्थिति पर विचार करें। कई बार संसद एक ऐसा । कानून पारित कर देती है जो बेहद अलोकप्रिय साबित होता है। ऐसा । कानून संवैधानिक रूप से वैध होने के कारण कानूनन सही हो सकता है। फिर भी वह लोगों को रास नहीं आता क्योंकि उन्हें लगता है कि उसके पीछे नीयत सही नहीं थी। इसीलिए लोग उसकी आलोचना कर । सकते हैं, उसके खिलाफ़ जनसभाएँ कर सकते हैं, अखबारों में लिख सकते हैं, टीवी चैनलों में रिपोर्ट भेज सकते हैं। हमारे जैसे लोकतंत्र में आम नागरिक संसद द्वारा बनाए जाने वाले दमनकारी कानूनों के बारे में अपनी असहमति व्यक्त कर सकते हैं। जब बहुत सारे लोग यह मानने। लगते हैं कि गलत कानून पारित हो गया है तो संसद के ऊपर भी उस कानून पर दोबारा विचार करने का दबाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, नगरपालिका की सीमाओं के भीतर जगह के । इस्तेमाल से संबंधित विभिन्न नगरपालिका कानूनों में पटरी पर दुकान लगाने और फेरी लगाने को गैरकानूनी घोषित किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सार्वजनिक स्थानों को साफ़-सुथरा और खुला रखने के लिए कुछ कानून जरूरी हैं। तभी लोग आसानी से फुटपाथों पर चल पाएँगे। लेकिन हम इस बात को भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि पटरी वाले एवं फेरी वाले किसी भी बड़े शहर में रहने वाले लाखों लोगों । को ज़रूरी चीजें और सेवाएँ बहुत सस्ती कीमत पर और कुशलतापूर्वक पहुँचाते हैं। इसी से उनकी रोज़ी-रोटी भी चलती है। लिहाजा अगर कानून किसी एक समूह की हिमायत करता है और दूसरे समूह की उपेक्षा करता है तो उस पर विवाद खड़ा होगा और टकराव की स्थिति । पैदा हो जाएगी। जो लोग सोचते हैं कि संबंधित कानून सही नहीं है, जैसा कि आपने कानून के शासन पर केंद्रित पिछले भाग में पढ़ा है, भारतीय राष्ट्रवादी खेमा अंग्रेजों द्वारा थोपे जा रहे मनमाने और दमनकारी कानूनों का विरोध व उनकी आलोचना करता था। इतिहास में हमें ऐसे । बहुत सारे लोग और समुदाय दिखाई देते हैं। जिन्होंने अन्यायपूर्ण कानूनों को खत्म करवाने के लिए संघर्ष किए हैं। कक्षा 7 की पुस्तक में आपने पढ़ा था कि रोजा पार्क्स नामक अफ्रीकी-अमेरिकी महिला ने 1 दिसंबर 1955 को एक श्वेत व्यक्ति के लिए बस में अपनी सीट छोड़ने से इनकार कर दिया था। रोजा पार्क्स उस कानून का विरोध कर रही थीं जो सभी सार्वजनिक स्थानों पर श्वेत नागरिकों और अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिकों के लिए अलग-अलग दायरे तय करता था। यहाँ तक कि सड़कों पर भी दोनों समुदायों की जगह अलग-अलग होती थी। रोजा पार्स का यह इनकार एक ऐतिहासिक घटना थी। इसी के बाद वहाँ नागरिक अधिकार आंदोलन शुरू हुआ जिसके फलस्वरूप 1964 में नागरिक अधिकार कानून पारित किया गया। इस कानून के ज़रिए संयुक्त राज्य अमेरिका में नस्ल, धर्म या राष्ट्रीयता के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। उपरोक्त चित्र में रोज़ा पार्क्स बस में यात्रा करती हुई दिखाई दे रही हैं। अध्याय 4; कानूनों की समझ 2015-16 एक सप्ताह तक अखबार पढ़े या टेलीविजन पर खबरें देखें और पता लगाएँ कि क्या कोई ऐसा अलोकप्रिय कानून है जिसका भारत या कहीं और के लोग विरोध कर रहे हैं। वे इस मुद्दे पर फ़ैसले के लिए अदालत की शरण में जा सकते हैं। यदि अदालत को ऐसा लगता है कि वह कानून संविधान के विरुद्ध है तो वह उसमें संशोधन कर सकती है या उसे रद्द कर सकती है। ऊपर दी गई तस्वीरों में अन्यायपूर्ण कानूनों के विरुद्ध के कुछ अन्य तरीके भी । दिखाए गए हैं। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि नागरिक के रूप में हमारी भूमिका प्रतिनिधियों के चुनाव के साथ खत्म नहीं होती। इसके बाद हम अखबारों और अन्य संचार माध्यमों के ज़रिए इस बात पर नज़र रखते हैं कि हमारे सांसद क्या कर रहे हैं। अगर हमें लगता है कि वे सही काम नहीं कर रहे हैं तो हम उनकी आलोचना करते हैं। इस प्रकार हमें इस बात को सदा ध्यान में रखना चाहिए कि लोगों की जितनी हिस्सेदारी होगी और जितने उत्साह से वे जुड़ेंगे, उतना ही संसद को अपना काम सही ढंग से करने में मदद मिलेगी। सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 2015-16 1. ‘कानून का शासन' पद से आप क्या समझते हैं? अपने शब्दों में लिखिए। अपना जवाब देते हुए कानून के उल्लंघन का कोई वास्तविक या काल्पनिक उदाहरण दीजिए। 2. इतिहासकार इस दावे को गलत ठहराते हैं कि भारत में कानून का शासन अंग्रेजों ने शुरू किया था। इसके कारणों में से दो कारण बताइए। 3. घरेलू हिंसा पर नया कानून किस तरह बना, महिला संगठनों ने इस प्रक्रिया में अलग-अलग तरीके से क्या भूमिका निभाई, उसे अपने शब्दों में लिखिए। 4. अपने शब्दों में लिखिए कि इस अध्याय में आए निम्नलिखित वाक्य (पृष्ठ 44-45) से आप क्या समझते हैं। अपनी । बातों को मनवाने के लिए उन्होंने संघर्ष शुरू कर दिया। यह समानता का संघर्ष था। उनके लिए कानून का मतलब ऐसे नियम नहीं थे जिनका पालन करना उनकी मजबूरी हो। वे कानून को उससे अलग ऐसी व्यवस्था के रूप में देखना चाहते थे जो न्याय के विचार पर आधारित हों। शब्द संकलन आलोचना- किसी व्यक्ति या चीज़ में कमियाँ निकालना या उसे अस्वीकार कर देना। इस अध्याय में आलोचना शब्द का इस्तेमाल सरकार के कामकाज पर नागरिकों की ओर से होने वाली आलोचना के लिए किया गया है। विकासक्रम-सरल से जटिल रूप तक विकास की प्रक्रिया को विकासक्रम कहा जाता है। आमतौर पर इस शब्द का इस्तेमाल पौधों या पशुओं की किसी प्रजाति के विकास का वर्णन करने के लिए किया जाता है। इस अध्याय में विकासक्रम का मतलब इस बात से है कि महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करने का विचार किस तरह एक अखिल भारतीय कानून के रूप में विकसित हुआ। राजद्रोह- जब सरकार को ऐसा लगता है कि उसके खिलाफ़ प्रतिरोध पैदा हो रहा है या विद्रोह किया जा रहा है तो उसे राजद्रोह कहा जाता है। ऐसी स्थिति में सरकार को किसी की गिरफ्तारी के लिए ठोस सुबूत की ज़रूरत नहीं होती। 1870 के राजद्रोह एक्ट के अंतर्गत अंग्रेज़ सरकार राजद्रोह की बहुत व्यापक परिभाषा का इस्तेमाल करती थी। लिहाजा वे इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को गिरफ़्तार करके जेल में डाल सकते थे। राष्ट्रवादी नेता इस कानून को मनमाना मानते थे क्योंकि बहुत सारे लोगों को गिरफ़्तारी से पहले वज़ह भी नहीं बताई जाती थी। उन्हें बिना मुकदमा चलाए ही जेल में डाल दिया जाता था। दमनकारी-स्वतंत्र और स्वाभाविक विकास या अभिव्यक्ति को रोकने के लिए सख्ती से नियंत्रण स्थापित करना। इस अध्याय में उन कानूनों को दमनकारी कहा गया है जो लोगों को बहुत निर्मम ढंग से नियंत्रित करते हैं और उन्हें सभा करने व अपनी बात कहने सहित मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल करने से भी रोक देते हैं। अध्याय 4: कानूनों की समझ 2015-16

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