महाभारत कथा महाभारत की कथा महष्िार् पराशर के कीतिर्मान पुत्रा वेद व्यास की देन है। व्यास जी ने महाभारत की यह कथा सबसे पहले अपने पुत्रा शुकदेव को वंफठस्थ कराइर् थी और बाद में अपने दूसरे श्िाष्यों को। मानव - जाति में महाभारत की कथा का प्रसार मह£ष वैशंपायन के द्वारा हुआ। वैशंपायन व्यास जी के प्रमुख श्िाष्य थे। ऐसा माना जाता है कि महाराजा परीक्ष्िात के पुत्रा जनमेजय ने एक बड़ा यज्ञ किया। इस महायज्ञ में सुप्रसि( पौराण्िाक सूत जी भी मौजूद थे। सूत जी ने समस्त ट्टष्िायों की एक सभा बुलाइर्। मह£ष शौनक इस सभा के अध्यक्ष हुए। सूत जी ने ट्टष्िायों की सभा में महाभारत की कथा प्रारंभ की कि महाराजा शांतनु के बाद उनके पुत्रा चित्रांगद हस्ितनापुर की गद्दी पर बैठे। उनकी अकाल मृत्यु हो जाने पर उनके भाइर् विचित्रावीयर् राजा हुए। उनके दो पुत्रा हुएμधृतराष्ट्र और पांडु। बड़े बेटे धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे थे, इसलिए उस समय की नीति के अनुसार पांडु को गद्दी पर बैठाया गया। पांडु ने कइर् वषो± तक राज्य किया। उनवफी दो रानियाँ थींμवुंफती और माद्री। वुफछ समय राज्य करने के बाद पांडु अपने किसी अपराध के प्रायश्िचत के लिए तपस्या करने जंगल में गए। उनकी दोनों रानियाँ भी उनके साथ ही गईं। वनवास के समय वुुंफती और माद्री ने पाँच पांडवों को जन्म दिया। वुफछ समय बाद पांडु की मृत्यु हो गइर्। पाँचों अनाथ बच्चों का वन के ट्टष्िा - मुनियों ने पालन - पोषण किया और पढ़ाया - लिखाया। जब युिाष्िठर सोलह वषर् के हुए, तो ट्टष्िायों ने पाँचों वुफमारों को हस्ितनापुर ले जाकर पितामह भीष्म को सौंप दिया। पाँचों पांडव बुि से तेश और शरीर से बली थे। उनकी प्रखर बुि और मधुर स्वभाव ने सबको मोह लिया था। यह देखकर धृतराष्ट्र के पुत्रा कौरव उनसे जलने लगे और उन्होंने पांडवों को तरह - तरह से कष्ट पहुँचाना शुरू किया। दिन - पर - दिन कौरवों और पांडवों के बीच वैरभाव बढ़ता गया। अंत में पितामह भीष्म ने दोनों को किसी तरह समझाया और उनके बीच संिा कराइर्। भीष्म के आदेशानुसार वुफरु - राज्य के दो हिस्से किए गए। कौरव हस्ितनापुर में ही राज करते रहे और पांडवों को एक अलग राज्य दे दिया गया, जो आगे चलकर इंद्रप्रस्थ के नाम से मशहूर हुआ। इस प्रकार वुफछ दिन शांति रही। उन दिनांे राजा लोगों में चैसर खेलने का आम रिवाज था। राज्य तक की बािायाँ लगा दी जाती थीं। इस रिवाज के मुताबिक एक बार पांडवों और कौरवों ने चैपड़ खेला। कौरवों की तरपफ से वुफटिल शवुफनि खेला। उसने युिाष्िठऱको हरा दिया। इसके पफलस्वरूप पांडवों का राज्य छिन गया और उनको तेरह वषर् का वनवास भोगना पड़ा। उसमें एक शतर् यह भी थी कि बारह वषर् के वनवास के बाद एक वषर् अज्ञातवास करना होगा। उसके बाद उनका राज्य उन्हें लौटा दिया जाएगा। द्रौपदी के साथ पाँचों पांडव बारह वषर् वनवास और एक वषर् अज्ञातवास में बिताकर वापस लौटे, पर लालची दुयोर्धन ने लिया हुआ राज्य वापस करने से इंकार कर दिया। अतः पांडवों को अपने राज्य के लिए लड़ना पड़ा। यु( में सारे कौरव मारे गए, तब पांडव उस विशाल साम्राज्य के स्वामी हुए। इसके बाद छत्तीस वषर् तक पांडवों ने राज्य किया और पिफर अपने पोते परीक्ष्िात को राज्य देकर द्रौपदी के साथ तपस्या करने हिमालय चले गए। संक्षेप में यही महाभारत की कथा है। बाल महाभारत कथा ध् 3 देवव्रत गंगा एक सुंदर युवती का रूप धारण किए नदी के तट पर खड़ी थी, उनके सौंदयर् और नवयौवन ने राजा शांतनु को मोह लिया था। गंगा बोली, फ्राजन्! आपकी पत्नी होना मुझे स्वीकार है, पर इससे पहले आपको मेरी शते± माननी होंगी। क्या आप मानेंगे?य् राजा ने कहाμफ्अवश्य!य् राजा शांतनु ने गंगा की सारी शते± मान लीं और वचन दिया कि वह उनका पूणर् रूप से पालन करेंगे।समय पाकर गंगा से शांतनु के कइर् तेजस्वी पुत्रा हुए, परंतु गंगा ने उनको जीने नहीं दिया। बच्चे के पैदा होते ही वह उसे नदी की बहती हुइर् धारा में पेंफक देती थी और पिफर हँसती - मुसवफराती राजा शांतनु के महल में आ जाती थी। अज्ञात सुंदरी के इस व्यवहार से राजा शंातनु चकित रह जाते। उनके आश्चयर् और क्षोभ का पारावार न रहता। शांतनु वचन दे चुके थे, इस कारण मन मसोसकर रह जाते थे। सात बच्चों को गंगा ने इसी भाँति नदी की धारा में बहा दिया। आठवाँ बच्चा पैदा हुआ। गंगा उसे भी लेकर नदी की तरप़्ाफ जाने लगी, तो शांतनु से न रहा गया। बोलेμफ्माँ होकर अपने नादान बच्चों को अकारण ही क्यों मार दिया करती हो? यह घृण्िात व्यवहार तुम्हें शोभा नहीं देता है।य् राजा की बात सुनकर गंगा मन - ही - मन मुसवफराइर्, परंतु व्रफोध का अभ्िानय करती हुइर् बोलीμफ्राजन्! क्या आप अपना वचन भूल गए हैं? मालूम होता है कि आपको पुत्रा से ही मतलब है, मुझसे नहीं। आपको मेरी क्या परवाह है! ठीक है, पर शतर् के अनुसार मैं अब नहीं ठहर सकती। हाँ, आपके इस पुत्रा को मैं नदी में नहीं पेंफवूँफगी। इस अंतिम बालक को मैं वुफछ दिन पालूँगी और पिफर पुरस्कार के रूप में आपको सौंप दूँगी।य् यह कहकर गंगा बच्चे को साथ लेकर चली गइर्। यही बच्चा आगे चलकर भीष्म पितामह के नाम से विख्यात हुआ। गंगा के चले जाने से राजा शांतनु का मन विरक्त हो गया। उन्होंने भोग - विलास से जी हटा लिया और राज - काज में मन लगाने लगे। एक दिन राजा श्िाकार खेलते - खेलते गंगा के तट पर चले गए, तो देखा किनारे पर खड़ा एक सुंदर और गठीला युवक गंगा की बहती हुइर् धारा पर बाण चला रहा था। बाणों की बौछार से गंगा की प्रचंड धारा एकदम रुकी हुइर् थी। यह दृश्य देखकर शांतनु दंग रह गए। इतने में ही राजा के सामने स्वयं गंगा आकर उपस्िथत हो गइर्। गंगा ने युवक को अपने पास बुलाया और राजा से बोलीμफ्राजन्, पहचाना मुझे और इस युवक को? यही आपका और मेरा आठवाँ पुत्रा देवव्रत है। मह£ष वसिष्ठ ने इसे श्िाक्षा दी है। शास्त्रा - ज्ञान में शुव्रफाचायर् और रण - कौशल में परशुराम ही इसका मुकाबला कर सकते हैं। यह जितना वुफशल यो(ा है, उतना ही चतुर राजनीतिज्ञ भी है। आपका पुत्रा, मैं आपको सौंप रही हूँ। अब ले जाइए इसे अपने साथ।य् गंगा ने देवव्रत का माथा चूमा और आशीवार्द देकर राजा के साथ उसे विदा कर दिया। बाल महाभारत कथा ध् 5 भीष्म - प्रतिज्ञा तेजस्वी पुत्रा को पाकर राजा प्रपुफल्िलत मन से नगर को लौटे और देवव्रत राजवुफमार के पद को सुशोभ्िात करने लगे। चार वषर् और बीत गए। एक दिन राजा शांतनु यमुना - तट की ओर घूमने गए, तो वहाँ अप्सरा - सी सुंदर एक तरुणी खड़ी दिखाइर् दी। तरुणी का नाम सत्यवती था। गंगा के वियोग के कारण राजा के मन में जो विराग छाया हुआ था, वह इस तरुणी को देखते ही विलीन हो गया। उस सुंदरी को अपनी पत्नी बनाने की इच्छा उनके मन में बलवती हो उठी और उन्होंने सत्यवती से प्रेम - याचना की। सत्यवती बोलीμफ्मेरे पिता मल्लाहों के सरदार हैं। पहले उनकी अनुमति ले लीजिए। पिफर मैं आपकी पत्नी बनने को तैयार हूँ।य् राजा शांतनु ने जब अपनी इच्छा उन पर प्रकट की, तो केवटराज ने कहाμफ्आपको मुझे एक वचन देना पड़ेगा।य् राजा ने कहाμफ्जो माँगोगे दँूगा, यदि वह मेरे लिए अनुचित न हो।य् केवटराज बोलेμफ्आपके बाद हस्ितनापुर के राज - ¯सहासन पर मेरी लड़की का पुत्रा बैठेगा, इस बात का आप मुझे वचन दे सकते हैं?य् केवटराज की शतर् राजा शंातनु को नागवार लगी। गंगा - सुत को छोड़कर अन्य किसी को राजगद्दी पर बैठाने की कल्पना तक उनसे न हो सकी। निराश और उद्विग्न मन से वह नगर की ओर लौट आए। किसी से वुफछ कह भी न सके। पर ¯चता उनके मन को कीड़े की तरह वुफतर - वुफतरकर खाने लगी। देवव्रत ने देखा कि उसके पिता के मन में वफोइर् - न - कोइर् व्यथा समाइर् हुइर् है। एक दिन उसने शांतनु से पूछाμफ्पिता जी, संसार का कोइर् भी सुख ऐसा नहीं है, जो आपको प्राप्त न हो, पिफर भी इधर वुफछ दिनों से आप दुखी दिखाइर् दे रहे हैं। आपको किस बात की ¯चता है?य् यद्यपि शांतनु ने गोलमोल बातें बताईं, पिफर भी वुफशाग्र - बुि देवव्रत को बात समझते देर न लगी। उन्होंने राजा के सारथी से पूछताछ करके, उस दिन केवटराज से यमुना नदी के किनारे जो वुफछ बातें हुइर् थीं, उनका पता लगा लिया। पिता जी के मन की व्यथा जानकर देवव्रत सीधे केवटराज के पास गए और उनसे कहा कि वह अपनी पुत्राी सत्यवती का विवाह महाराज शांतनु से कर दें। केवटराज ने वही शतर् दोहराइर्, जो उन्होेेंने शांतनु के सामने रखी थी।देवव्रत ने कहाμफ्यदि तुम्हारी आपिा का कारण यही है, तो मैं वचन देता हूँ कि मैं राज्य का लोभ नहीं करूँगा। सत्यवती का पुत्रा ही मेरे पिता के बाद राजा बनेगा।य् केवटराज इससे संतुष्ट न हुए। उन्होंने और दूर की सोची। बोलेμफ्आयर्पुत्रा, इस बात का मुझे पूरा भरोसा है कि आप अपने वचन पर अटल रहेंगे, ¯कतु आपकी संतान से मैं वैसी आशा वैफसे रख सकता हूँ? आप जैसे वीर का पुत्रा भी तो वीर ही होगा। बहुत संभव है कि वह मेरे नाती से राज्य छीनने का प्रयत्न करे। इसकेलिए आपके पास क्या उत्तर है?य् केवटराज का प्रश्न अप्रत्याश्िात था। उसे संतुष्ट करने का यही अथर् हो सकता था कि देवव्रत अपने भविष्य का भी बलिदान कर दें, ¯कतु पितृभक्त देवव्रत इससे शरा भी विचलित नहीं हुए। गंभीर स्वर में उन्होंने यह कहाμफ्मैं जीवनभर विवाह सत्यवती से शांतनु के दो पुत्रा हुएμचित्रांगद और विचित्रावीयर्। शांतनु के देहावसान पर चित्रांगद हस्ितनापुर के ¯सहासन पर बैठे और उनके यु( में मारे जाने पर विचित्रावीयर्। विचित्रावीयर् की दो रानियाँ थींμअंबिका और अंबालिका। ँनहीं करूगा! आजन्म ब्रह्मचारी रहूँगा! मेरे संतान ही अंबिका के पुत्रा थे धृतराष्ट्र और अंबालिका के न होगी! अब तो तुम संतुष्ट हो?य् किसी को आशा न थी कि तरुण वुफमार ऐसी कठोर प्रतिज्ञा करेंगे। देवव्रत ने भयंकर प्रतिज्ञा की थी, इसलिए उस दिन से उनका नाम ही भीष्म पड़ गया। केवटराज ने सानंद अपनी पुत्राी को देवव्रत के साथ विदा किया। पांडु। धृतराष्ट्र के पुत्रा कौरव कहलाए और पांडु के पांडव। महात्मा भीष्म, शांतनु के बाद से वुफरुक्षेत्रा - यु( का अंत होने तक उस विशाल राजवंश के सामान्य वुफलनायक और पूज्य बने रहे। शांतनु के बाद वुफरुवंश का व्रफम यह रहाμ शांतनु ;दो रानियाँद्ध ;गंगा सेद्ध ;सत्यवती सेद्ध देवव्रत चित्रांगद विचित्रावीयर् ;दो रानियाँद्ध ;अंबिका सेद्ध धृतराष्ट्र ;अंबालिका सेद्ध पांडु कौरव पांडव बाल महाभारत कथा ध् 7 अंबा और भीष्म सत्यवती के पुत्रा चित्रांगद बड़े ही वीर, परंतु स्वेच्छाचारी थे। एक बार किसी गंधवर् के साथ यु( हुआ, उसमें वह मारे गए। उनके कोइर् पुत्रा न था, इसलिए उनके छोटे भाइर् विचित्रावीयर् हस्ितनापुर की राजगद्दी पर बैठे। विचित्रावीयर् की आयु उस समय बहुत छोटी थी, इस कारण उनके बालिग होने तक राज - काज भीष्म को ही सँभालना पड़ा। जब विचित्रावीयर् विवाह के योग्य हुए, तो भीष्म को उनके विवाह की ¯चता हुइर्। उन्हें खबर लगी कि काश्िाराज की कन्याओं का स्वयंवर होनेवाला है। यह जानकर भीष्म बड़े खुश हुए और स्वयंवर में सम्िमलित होने के लिए काशी रवाना हो गए। देश - विदेश के अनेक राजवुफमार उस स्वयंवर में भाग लेने के लिए आए थे। राजपुत्रिायों को पाने के लिए आपस में बड़ी स्पधार् थी। क्षत्रिायों में भीष्म की प्रतिज्ञा की प्रतिष्ठा अद्वितीय थी। उनके महान त्याग और भीषण प्रतिज्ञा का हाल सब जानते थे। इसलिए जब वह स्वयंवर - मंडप में प्रविष्ट हुए, तो राजवुफमारों ने सोचा कि वह सि.पर्फ स्वयंवर देखने के लिए आए होंगे। परंतु जब स्वयंवर में सम्िमलित होनेवालों में भीष्म ने भी अपना नाम दिया, तो अन्य वुफमारों को निराश होना पड़ा। उनको क्या पता था कि दृढ़व्रती भीष्म अपने लिए नहीं, वरन् अपने भाइर् के लिए स्वयंवर में सम्िमलित हुए हैं। सभा में खलबली मच गइर्। चारों ओर से भीष्म पर पफब्ितयाँ कसी जाने लगींμफ्माना कि भरतवंशी भीष्म बड़े बुिमान और विद्वान हैं, स्वयंवर से इन्हें क्या मतलब? इनके प्रण का क्या हुआ? जीवनभर ब्रह्मचारी रहने की इन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, क्या वह झूठी थी?य् इस भाँति सब राजवुफमारों ने भीष्म की हँसी उड़ाइर्, यहाँ तक कि काश्िाराज की कन्याओं ने भी भीष्म की तरपफ से दृष्िट पेफर ली और उनकी़अवहेलना - सी करके आगे की ओर चल दीं। भीष्म इस अवहेलना को सह न सके। उन्होंने सभी राजवुफमारों को हराकर तीनों राजकन्याओं को बलपूवर्क रथ पर बैठा लिया और हस्ितनापुर को चल दिए। सौभदेश का राजा शाल्व बड़ा वीर था। काश्िाराज की सबसे बड़ी कन्या अंबा उस पर अनुरुक्त थी और उसको मन - ही - मन अपना पति मान चुकी थी। शाल्व ने भीष्म के रथ का पीछा किया और उसको रोकने का प्रयत्न किया। इस पर भीष्म और शाल्व के बीच घोर यु( छिड़ गया। भीष्म ने उसे हरा दिया, ¯कतु काश्िाराज की कन्याओं की प्राथर्ना पर उसे जीवित ही छोड़ दिया। भीष्म काश्िाराज की कन्याओं को लेकर हस्ितनापुर पहुँचे। विचित्रावीयर् के विवाह की सारी तैयारी हो जाने के बाद जब कन्याओं को विवाह - मंडप में ले जाने का समय आया, तो काश्िाराज की बड़ी बेटी अंबा एकांत में भीष्म से बोलीμफ्गांगेय, मैंने अपने मन में सौभदेश के राजा शाल्व को अपना पति मान लिया था। इसी बीच आप मुझे बलपूवर्क यहाँ ले आए। मेरे मन की बात जानने के बाद आप मेरे बारे में अब जो उचित समझें, करें।य् भीष्म को अंबा की बात जँची। उन्होंने अंबा को उसकी इच्छानुसार उचित प्रबंध के साथ शाल्व के पास भेज दिया और अंबा की दोनों बहनोंμअंबिका और अंबालिकाμका विचित्रावीयर् के साथ विवाह करा दिया। अंबा अपने मनोनीत वर सौभराज शाल्व केपास गइर् और सारा वृत्तांत कह सुनाया। उसने कहाμफ्राजन्! मैं आपको ही अपना पति मान चुकी हूँ। मेरे अनुरोध से भीष्म ने मुझे आपके पास भेजा है। आप मुझे अपनी पत्नी स्वीकार कर लें।य् पर शाल्व न माना। उसने अंबा से कहाμफ्सारे राजवुफमारों के सामने भीष्म ने मुझे यु( में पराजित किया और तुम्हें बलपूवर्क हरण करके ले गए। इतने बड़े अपमान के बाद मैं तुम्हें वैफसे स्वीकार कर सकता हूँ। तुम्हारे लिए अब उचित यही है कि तुम भीष्म के पास जाओ और उनकी सलाह के मुताबिक ही काम करो।य् बेचारी अंबा हस्ितनापुर लौट आइर् और भीष्म को सारा हाल कह सुनाया। उन्होेंने विचित्रावीयर् से कहाμफ्वत्स, राजा शाल्व अंबा को स्वीकार नहीं करता। इससे विदित होता है कि उसकी इच्छा अंबा को पत्नी बनाने की नहीं थी। अब उसकेसाथ तुम्हारा ब्याह करने में कोइर् आपिा नहीं रही है।य् पर विचित्रावीयर् अंबा के साथ ब्याह करने को राजी न हुए। बेचारी अंबा न इधर की रही, न उधर की। कोइर् और रास्ता न देख वह भीष्म से बोलीμ फ्गांगेय, मैं तो दोनों ओर से ही गइर्। मेरा कोइर् भी सहारा न रहा। आप ही मुझे हर लाए थे, अतः अब आपका यह कतर्व्य है कि आप मेरे साथ ब्याह कर लें।य् भीष्म ने उसकी बात ध्यान से सुनी और अपनी प्रतिज्ञा की याद दिलाकर बोलेμफ्अपनी प्रतिज्ञा तो मैं नहीं तोड़ सकता।य् उन्होंने अंबा की परिस्िथति समझकर विचित्रावीयर् से दोबारा आग्रह किया, पर वह न माना। भीष्म ने अंबा को पिफर समझाया और कहा कि सौभराज शाल्व के ही पास जाओ और एक बार पिफर प्राथर्ना करो। लाचार अंबा पिफर शाल्व के पास गइर् और उसकी बहुत मिन्नतें कीं, लेकिन दूसरे की जीती हुइर् कन्या को स्वीकार करने से सौभराज ने सापफ़इंकार कर दिया। अंबा इस प्रकार छह साल तक हस्ितनापुर और सौभदेश के बीच ठोकरें खाती पिफरी। उसने अपने इस सारे दुख का कारण भीष्म को ही समझा। उन पर उसे बहुत व्रफोध आया और प्रति¯हसा की आग उसके मन में जलने लगी। भीष्म से बदला लेने की इच्छा से वह कइर् राजाओं के पास गइर् और उनको अपना दुखड़ा सुनाया। भीष्म से यु( करके उनका वध करने की उसने राजाओं से प्राथर्ना की, पर राजा लोग तो भीष्म के नाम से ही डरते थे। किसी में इतना साहस न था कि भीष्म से यु( करे। क्षत्रिायों से एकदम निराश होकर अंबा ने तपस्वी ब्राह्मणों की शरण ली। तपस्िवयों ने कहाμफ्बेटी, तुम परशुराम के पास जाओ। वे तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरीकरेंगे।य् तब ट्टष्िायों की सलाह पर अंबा परशुराम के पास गइर्। अंबा की करफण कहानी सुनकर परशुराम का हृदय पिघल गया। उन्होंने दयाद्रर् स्वर में कहाμ फ्काश्िाराज - कन्ये, तुम मुझसे क्या चाहती हो?य् अंबा ने कहाμफ्ब्राह्मण - वीर, मेरी प्राथर्ना केवल यही है कि आप भीष्म से यु( करें। मैं आपसे भीष्म के वध की भीख माँगती हूँ।य् परशुराम को अंबा की प्राथर्ना पसंद आइर्। बड़े उत्साह के साथ वह भीष्म के पास गए और उन्हें यु( के लिए ललकारा। दोनों वुफशल यो(ा थे और धनुष - विद्या के जानकार भी। दोनों ही जितेंदि्रय और ब्रह्मचारी थे। समान यो(ाओं की टक्कर थी। कइर् दिनों तक यु( होता रहा, पिफर भी हार - जीत का निश्चय न हो सका। अंत में परशुराम ने हार मान ली और उन्होंने अंबा से कहाμफ्जो वुफछ मेरे वश में था, कर चुका। अब तुम्हारे लिए यही उचित है कि तुम भीष्म ही की शरण लो।य् पर अंबा ऐसी बातों से कब विचलित होनेवाली थी? उसने वन में जाकर पिफर तपस्या शुरू की विदुर विचित्रावीयर् की रानी अंबालिका की दासी की कोख से धमर्देव का जन्म हुआ था। वह ही आगे चलकर विदुर के नाम से प्रख्यात हुए। धमर्शास्त्रा तथा राजनीति में उनका ज्ञान अथाह था। वह बड़े निःस्पृह थे। व्रफोध उन्हें छू तक नहीं गया था। युवावस्था में ही पितामह भीष्म ने उनके विवेक तथा ज्ञान से प्रभावित होकर उन्हें राजा धृतराष्ट्र का प्रधानमंत्राी नियुक्त कर दिया था। जिस समय धृतराष्ट्र ने दुयोर्धन को जुआ खेलने की अनुमति दी, विदुर ने धृतराष्ट्र से बहुत आग्रहपूवर्क निवेदन कियाμफ्राजन्, मुझे आपका यह काम ठीक नहीं जँचता। इस खेल के कारण आपके बेटों में आपस में वैरभाव बढ़ेगा। इसको रोक दीजिए।य् बाल महाभारत कथा ध् 9 और तपोबल से स्त्राी - रूप छोड़कर पुरुष बन गइर् और उसने अपना नाम श्िाखंडी रख लिया। जब कौरवों और पांडवों के बीच वुफरुक्षेत्रा के मैदान में यु( हुआ, तो भीष्म के विरु( लड़ते समय श्िाखंडी रथ के आगे बैठा था और अजर्ुन ठीक उसके पीछे। ज्ञानी भीष्म को यह बात मालूम थी कि अंबा ही श्िाखंडी का रूप धारण किए हुए है। इसलिए उन्होंने उस पर बाण चलाना अपनी वीरोचित प्रतिष्ठा के विरु( समझा। श्िाखंडी को आगे करके अजुर्न ने भीष्म पितामह पर हमला किया और अंत में उन पर विजय प्राप्त की। जब भीष्म आहत होकर पृथ्वी पर गिरे, तब जाकर अंबा का व्रफोध शांत हुआ। धृतराष्ट्र विदुर की बात से प्रभावित हुए और अपने बेटे दुयोर्धन को अकेले में बुलाकर उसे इस वुफचाल से रोकने का प्रयत्न किया। बड़े प्रेम के साथ वह बोलेμफ्गांधारी के लाल! विदुर बड़ा बुिमान है और हमेशा हमारा भला चाहता आया है। उसका कहा मानने में ही हमारी भलाइर् है। वत्स! जुआ खेलने का विचार छोड़ दो। विदुर कहता है कि उससे विरोध बहुत बढ़ेगा और वह राज्य के नाश का कारण हो जाएगा। छोड़ दो इस विचार को।य् धृतराष्ट्र ने अपने बेटे को सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न किया, ¯कतु दुयोर्धन न माना। वृ( धृतराष्ट्र अपने बेटे से बहुत स्नेह करते थे। अपनी इस कमशोरी के कारण उसका अनुरोध वह टाल न सके और युिाष्िठर को जुआ खेलने का न्यौता भेजना ही पड़ा। धृतराष्ट्र पर बस न चला, तो विदुर युिाष्िठर के पास गए। उनको जुआ खेलने को जाने से रोकने का प्रयत्न किया। युिाष्िठर ने विदुर की सब बातें ध्यानपूवर्क सुनीं और बड़े आदर के कंुती 5 यदुवंश के प्रसि( राजा शूरसेन श्रीवृफष्ण के पितामह थे। इनके पृथा नाम की कन्या थी। उसके रूप और गुणों की की£त दूर - दूर तक पैफली हुइर् थी। शूरसेन के पुफपेफरे भाइर् वुंफतिभोज के कोइर् संतान न थी। शूरसेन ने वुंफतिभोज को वचन दिया था कि उनवफी जो पहली संतान होगी, उसे वुंफतिभोज को गोद दे देंगे। उसी के अनुसार शूरसेन ने वुंफतिभोज को पृथा गोद दे दी। वुंफतिभोज के यहाँ आने पर पृथा का नाम वुंफती पड़ गया। वुंफती के बचपन में )ष्िा दुवार्सा एक बार वुंफतिभोज के यहाँ पधारे। वुंफती ने एक वषर् तक बड़ी सावधानी व सहनशीलता के साथ उनकी सेवा - सुश्रूषा की। उसकी सेवा - टहल से दुवार्सा )ष्िा प्रसन्न हुए और उसे उपदेश दिया और बोलेμफ्वुंफतिभोज - कन्ये, तुम किसी भी देवता का ध्यान करोगी, तो वह अपने ही समान एक तेजस्वी पुत्रा तुम्हें प्रदान करेगा।य् इस प्रकार सूयर् के संयोग से वुफमारी वुंफती ने सूयर् के समान तेजस्वी एवं सुंदर बालक को जन्म दिया। जन्मजात कवच और वुंफडलों से साथ बोलेμफ्चाचा जी! मैं यह सब मानता हूँ, पर जब काका धृतराष्ट्र बुलाएँ, तो मैं वैफसे इंकार करूँ? यु( या खेल के लिए बुलाए जाने पर न जाना क्षत्रिाय का धमर् तो नहीं है।य् यह कहकर युिाष्िठर क्षत्रिाय - वुफल की मयार्दा रखने के लिए जुआ खेलने गए। शोभ्िात वही बालक आगे चलकर शस्त्राधारियों में श्रेष्ठ कणर् के नाम से विख्यात हुआ। लेकिन अब वुंफती को लोक - ¯नदा का डर हुआ। उसने बच्चे को छोड़ देना ही उचित समझा। इसलिए बच्चे को एक पेटी में बड़ी सावधानी के साथ बंद करके उसे गंगा की धारा में बहा दिया। बहुत आगे जाकर अिारथ नाम के एक सारथी की नशर उस पर पड़ी। उसने पेटी निकाली और खोलकर देखा, तो उसमें एक सुंदर बच्चा सोता हुआ मिला। अिारथ निःसंतान था। बालक को पाकर वह बड़ा प्रसन्न हुआ। सूयर् - पुत्रा कणर् इस तरह एक सारथी के घर पलने लगा। इधर वुंफती विवाह के योग्य हुइर्। राजा वुंफतिभोज ने उसका स्वयंवर रचा। उससे विवाह करने की इच्छा से देश - विदेश के अनेक राजवुफमार स्वयंवर में आए। हस्ितनापुर के राजा पांडु भी स्वयंवर में शरीक हुए थे। वुंफती ने उन्हीं के गले में वरमाला डाल दी। महाराज पांडु का वुंफती से ब्याह हो गया और वह वुंफती सहित हस्ितनापुर लौट आए। उन दिनों राजवंशों में एक से अिाक ब्याह करने की प्रथा प्रचलित थी। इसी रिवाज के अनुसार पितामह भीष्म की सलाह से महाराज पांडु ने मद्रराज की कन्या माद्री से भी ब्याह कर लिया। एक दिन महाराजा पांडु वन में श्िाकार खेलने गए। वहीं जंगल में हिरण के रूप में एक )ष्िा - दम्पति भी विहार कर रहे थे। पांडु ने अपने तीर से हिरण को मार गिराया। उनको यह पता नहीं था कि ये )ष्िा - दम्पति हैं। )ष्िा ने मरते - मरते पांडु को शाप दिया। )ष्िा के शाप से पांडु को बड़ा दुख हुआ, साथ ही वह अपनी भूल से ख्िान्न होकर नगर को लौटे और पितामह भीष्म तथा विदुर को राज्य का भार सौंपकर अपनी पत्िनयों के साथ वन में चले गए और वहाँ पर ब्रह्मचारी जैसा जीवन व्यतीत करने लगे। वुंफती ने देखा कि महाराज को संतान - लालसा तो है, लेकिन )ष्िाके शापवश वह संतानोत्पिा नहीं कर सकते। अतः उसने विवाह से पूवर् दुवार्सा )ष्िा से पाए वरदानों का पांडु से िाव्रफ किया। उनके अनुरोध से वुंफती और माद्री ने देवताओं के अनुग्रह से पाँच पांडवों को जन्म दिया। वन में ही पाँचों का जन्म हुआ और वहीं तपस्िवयों के संग वे पलने लगे। अपनी दोनों स्ित्रायों तथा बेटों के साथ महाराज पांडु कइर् बरस वन में रहे। भीम बाल महाभारत कथा ध् 11 वसंत )तु थी। सारा वन आनंद में डूबा हुआ - सा प्रतीत हो रहा था। महाराज पांडु माद्री के साथ प्रवृफति की इस उद्गारमय सुषमा को निहार रहे थे। )ष्िा के शाप का असर हो गया। तत्काल उनकी मृत्यु हो गइर्। माद्री के दुख का पार न रहा। पति की मृत्यु का वह कारण बनी, यह सोचकर पांडु के साथ ही वह भी मर गइर्। इस दुघर्टना से वुंफती और पाँचों पांडवों के शोक की सीमा न रही। पर वन के )ष्िा - मुनियों ने बहुत समझा - बुझाकर उनको शांत किया और उन्हें हस्ितनापुर ले जाकर पितामह भीष्म के सुपुदर् किया। युिाष्िठर की उम्र उस समय सोलह वषर् की थी। हस्ितनापुर के लोगों ने जब )ष्िायों से सुना कि वन में पांडु की मृत्यु हो गइर् है, तो उनके शोक की सीमा न रही। पोते की मृत्यु पर शोक करती हुइर् सत्यवती अपनी दोनों विधवा पुत्रावधुआंेेμ अंबिका और अंबालिका को साथ लेकर वन में चली गइर्। तीनों वृ(ाएँ वुफछ दिन तपस्या करती रहीं और बाद में स्वगर् सिधार गईं। अपने वुफल में जो छल - प्रपंच तथा अन्याय होने वाले थे, उन्हें न देखना ही संभवतः उन्होंने उचित समझा। पाँचों पांडव तथा धृतराष्ट्र के सौ पुत्रा, जो कौरव बढ़कर था। खेलों में वह दुयोर्धन और उसके कहलाते थे, हस्ितनापुर में साथ - साथ रहने लगे। भाइयों को खूब तंग किया करता। यद्यपि भीम खेलवूफद, हँसी - मशाक सब में वे साथ ही रहते मन में किसी से वैर नहीं रखता था और बचपन थे। शरीर - बल में पांडु का पुत्रा भीम सबसे के जोश के कारण ही ऐसा करता था, पिफर भी दुयोर्धन तथा उसके भाइयों के मन में भीम के प्रति द्वेषभाव बढ़ने लगा। इधर सभी बालक उचित समय आने पर वृफपाचायर् से अस्त्रा - विद्या के साथ - साथ अन्य विद्याएँ भी सीखने लगे। विद्या सीखने में भी पांडव कौरवों से आगे ही रहते थे। इससे कौरव और खीझने लगे। दुयोर्धन पांडवों को हर प्रकार से नीचा दिखाने का प्रयत्न करता रहता था। भीम से तो उसकी शरा भी नहीं पटती थी। एक बार सब कौरवों ने आपस में सलाह करके यह निश्चय किया कि भीम को गंगा में डुबोकर मार डाला जाए और उसके मरने पर युिाष्िठर - अजुर्न आदि को वैफद करके बंदी बना लिया जाए। दुयोर्धन ने सोचा कि ऐसा करने से सारे राज्य पर उनका अिाकार हो जाएगा। एक दिन दुयोर्धन ने धूमधाम से जल - व्रफीड़ा का प्रबंध किया और पाँचों पांडवों को उसके लिए न्यौता दिया। बड़ी देर तक खेलने और तैरने के बाद सबने भोजन किया और अपने - अपने डेरों में जाकर सो गए। दुयोर्धन ने छल से भीम के भोजन में विष मिला दिया था। सब लोग खूब खेले - तैरे थे, सो थक - थकाकर सो गए। भीम को विष के कारण गहरा नशा हो गया। वह डेरे पर भी न पहुँच पाया और नशे में चूर होकर गंगा - किनारे रेत में ही गिर गया। उसी हालत में दुयोर्धन ने लताओं से उसके हाथ - पैर बाँधकर उसे गंगा में बहा दिया। लताओं से जकड़ा हुआ भीम का शरीर गंगा की धारा में बहता हुआ दूर निकल गया। इधर दुयोर्धन मन - ही - मन यह सोचकर खुश हो रहा था कि भीम का तो काम ही तमाम हो गया होगा। जब युिाष्िठर आदि जागे और भीम को न पाया, तो चारों भाइयों ने मिलकर सारा जंगल तथा गंगा वफा वह किनारा, जहाँ जल - व्रफीड़ा की थी, छान डाला। पर भीम का कहीं पता न चला। अंत में निराश होेकर दुखी हृदय से वे अपने महल को लौट आए। इतने में ही क्या देखते हैं कि भीम झूमता - झामता चला आ रहा है। पांडवों और वुंफती के आनंद का ठिकाना न रहा! युिाष्िठर, वुंफती आदि ने भीम को गले से लगा लिया। पर यह सब हाल देखकर वुंफती को बड़ी ¯चता हुइर्। उसने विदुर को बुला भेजा और अकेले में उनसे बोलीμफ्दुष्ट दुयोर्धन शरूर कणर् पांडवों ने पहले वृफपाचायर् से और बाद में द्रोणाचायर् से अस्त्रा - शस्त्रा की श्िाक्षा पाइर्। उनको जब विद्या में कापफी निपुणता प्राप्त हो गइर्, तो एक भारी़समारोह किया गया, जिसमें सबने अपने कौशल का प्रदशर्न किया। सारे नगरवासी इस समारोह को देखने आए थे। तरह - तरह के खेल हुए और हरेक राजवुफमार यही चाहता था कि वही सबसे बढ़कर निकले। आपस में प्रतिस्पधार् बड़े शोर की थी, परंतु तीर चलाने में पांडु - पुत्रा अजुर्न का कोइर् सानी न था। अजुर्न ने धनुष - विद्या में बाल महाभारत कथा ध् 13 कोइर् - न - कोइर् चाल चल रहा है। राज्य के लोभ में वह भीम को मार डालना चाहता है। मुझे इसकी ¯चता हो रही है।य् राजनीति - वुफशल विदुर वुंफती को समझाते हुए बोलेμफ्तुम्हारा कहना सही है, परंतु वुफशल इसी में है कि इस बात को अपने तक ही रखो। प्रकट रूप से दुयोर्धन की ¯नदा कदापि न करना, नहीं तो इससे उसका द्वेष और बढ़ेगा।य्इस घटना से भीम बहुत उत्तेजित हो गया था। उसे समझाते हुए युिाष्िठर ने कहाμफ्भाइर् भीम, अभी समय नहीं आया है। तुम्हें अपने आपको सँभालना होगा। इस समय तो हम पाँचों भाइयों को यही करना है कि किसी प्रकार एक - दूसरे की रक्षा करते हुए बचे रहेें।य् भीम के वापस आ जाने पर दुयोर्धन को बड़ा आश्चयर् हुआ। उसका हृदय और जलने लगा। कमाल का खेल दिखाया। उसकी अद्भुत चतुरता को देखकर सभी दशर्क और राजवंश के सभी उपस्िथत लोग दंग रह गए। यह देखकर दुयोर्धन का मन इर्ष्यार् से जलने लगा। अभी खेल हो ही रहा था कि इतने में रंगभूमि के द्वार पर खम ठोंकते हुए एक रोबीला और तेजस्वी युवक मस्तानी चाल से आकर अजुर्न के सामने खड़ा हो गया। यह युवक और कोइर् नहीं, अिारथ द्वारा पोष्िात वुंफती - पुत्रा कणर् ही था, लेकिन उसके वुंफती - पुत्रा होने की बात किसी को मालूम न थी। रंगभूमि में आते ही उसने अजुर्न को ललकाराμ फ्अजुर्न! जो भी करतब तुमने यहाँ दिखाए हैं, उनसे बढ़कर कौशल मैं दिखा सकता हूँ। क्या तुम इसके लिए तैयार हो?य् इस चुनौती को सुनकर दशर्क - मंडली में बड़ी खलबली मच गइर्, पर इर्ष्यार् की आग से जलनेवाले दुयोर्धन को बड़ी राहत मिली। वह बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने तपाक से कणर् का स्वागत किया और उसे छाती से लगाकर बोलाμफ्कहो कणर्, वैफसे आए? बताओ, हम तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं?य् कणर् बोलाμफ्राजन्! मैं अजुर्न से द्वंद्व यु( और आपसे मित्राता करना चाहता हूँ।य् कणर् की चुनौती को सुनकर अजुर्न को बड़ा तैश आया। वह बोलाμफ्कणर्! सभा में जो बिना बुलाए आते हैं और जो बिना किसी के पूछे बोलने लगते हैं, वे ¯नदा के योग्य होते हैं।य् यह सुनकर कणर् ने कहाμफ्अजुर्न, यह उत्सव केवल तुम्हारे लिए ही नहीं मनाया जा रहा है। सभी प्रजाजन इसमें भाग लेने का अिाकार रखते हैं। व्यथर् डींगें मारने से पफायदा क्या? चलो,़तीरों से बात कर लें!य् जब कणर् ने अजुर्न को यों चुनौती दी, तो दशर्कांे ने तालियाँ बजाईं। उनके दो दल बन गए। एक दल अजर्ुन को बढ़ावा देने लगा और दूसरा कणर् को। इसी प्रकार वहाँ इकऋी स्ित्रायों के भी दो दल बन गए। वुंफती ने कणर् वफो देखते ही पहचान लिया और भय तथा लज्जा के मारे मूच्िर्छत - सी हो गइर्। उसकी यह हालत देखकर विदुर ने दासियों को बुलाकर उसे चेत करवाया। इसी बीच वृफपाचायर् ने उठकर कणर् से कहाμफ्अज्ञात वीर! महाराज पांडु का पुत्रा और वुफरुवंश का वीर अजुर्न तुम्हारे साथ द्वंद्व यु( करने के लिए तैयार है, ¯कतु तुम पहले अपना परिचय तो दो! तुम कौन हो, किसके पुत्रा हो, किस राजवुफल को तुम विभूष्िात करते हो? द्वंद्व यु( बराबर वालों में ही होता है। वुफल का परिचय पाए बगैर राजवुफमार कभी द्वंद्व करने को तैयार नहीं होते।य् वृफपाचायर् की यह बात सुनकर कणर् का सिर झुक गया। कणर् को इस तरह देखकर दुयोेर्धन उठ खड़ा हुआ और बोलाμफ्अगर बराबरी की बात है, तो मैं आज ही कणर् को अंगदेश का राजा बनाता हूँ!य् यह कहकर दुयोर्धन ने तुरंत पितामह भीष्म एवं पिता धृतराष्ट्र से अनुमति लेकर वहीं रंगभूमि में ही राज्याभ्िाषेक की सामग्री मँगवाइर् और कणर् का राज्याभ्िाषेक करके उसे अंगदेश का राजा घोष्िात कर दिया। इतने में बूढ़ा सारथी अिारथ, जिसने कणर् को पाला था, लाठी टेकता हुआ और भय के मारे काँपता हुआ सभा में प्रविष्ट हुआ। कणर्, जो अभी - अभी अंगदेश का नरेश बना दिया गया था, उसको देखते ही धनुष नीचे रखकर उठ खड़ा हुआ और पिता मानकर बड़े आदर के साथ उसके आगे सिर नवाया। बूढ़े ने भी ‘बेटा’ कहकर उसे गले लगा लिया। यह देखकर भीम खूब कहकहा मारकर हँस पड़ा और बोलाμफ्सारथी के बेटे, धनुष छोड़कर हाथ में चाबुक लो, चाबुक! वही तुम्हें शोभा देगा। तुम भला कब से अजुर्न के साथ द्वंद्व यु( करने के योग्य हो गए?य् यह सब देखकर सभा में खलबली मच गइर्। इस समय सूरज भी डूब रहा था। इस कारण सभा विस£जत हो गइर्। मशालों और दीपकों की रोशनी में दशर्क - वृंद अपनी - अपनी पसंद के अनुसार अजुर्न, कणर् और दुयोर्धन की जय बोलते जाते थे। इस घटना के बहुत समय बाद एक बार इंद्र बूढ़े ब्राह्मण के वेश में अंग - नरेश कणर् के पास आए और उसके जन्मजात कवच और वुंफडलों की भ्िाक्षा माँगी। इंद्र को डर था कि भावी यु( मेंकणर् की शक्ित से अजुर्न पर विपिा आ सकती है। इस कारण कणर् की ताकत कम करने की इच्छा से ही उन्होंने उससे यह भ्िाक्षा माँगी थी। कणर् को सूयर्देव ने पहले ही सचेत कर दिया था कि उसे धोखा देने के लिए इंद्र ऐसी चाल चलनेवाले हैं, परंतु कणर् इतना दानी था कि किसी के वुफछ माँगने पर वह मना कर ही नहीं सकता था। इस कारण यह जानते हुए भी कि भ्िाखारी के वेश में इंद्र धोखा कर रहे हैं, कणर् ने अपने जन्मजात कवच और वुंफडल निकालकर भ्िाक्षा में दे दिए। इस अद्भुत दानवीरता को देखकर इंद्र चकित रह गए। कणर् की प्रशंसा करते हुए बोलेμफ्कणर्, तुुमसे मैं बहुत प्रसन्न हँू। तुम जो भी वरदान चाहो, माँगो।य् कणर् ने देवराज से कहाμफ्आप प्रसन्न हैं, तो शत्राुओं का संहार करनेवाला अपना ‘शक्ित’ नामक शस्त्रा मुझे प्रदान करें!य् बड़ी प्रसन्नता के साथ अपना वह शस्त्रा कणर् को देते हुए देवराज ने कहाμफ्यु( में तुम जिस किसी को लक्ष्य करके इसका प्रयोग करोेगे, वह अवश्य मारा जाएगा, परंतु एक ही बार तुम इसका प्रयोग कर सकोगे। तुम्हारे शत्राु को मारने के बाद यह मेरे पास वापस आ जाएगा।य् इतना कहकर इंद्र चले गए। बाल महाभारत कथा ध् 15 एक बार कणर् को परशुराम जी से ब्रह्मास्त्रा सीखने की इच्छा हुइर्। इसलिए वह ब्राह्मण के वेश में परशुराम जी के पास गया और प्राथर्ना की कि उसे श्िाष्य स्वीकार करने की वृफपा करें। परशुराम जी ने उसे ब्राह्मण समझकर श्िाष्य बना लिया। इस प्रकार छल से कणर् ने ब्रह्मास्त्रा चलाना सीख लिया। एक दिन परशुराम कणर् की जाँघ पर सिर रखकर सो रहे थे। इतने में एक काला भौंरा कणर् की जाँघ के नीचे घुस गया और काटने लगा। कीड़े के काटने से कणर् को बहुत पीड़ा हुइर् और जाँघ से लहू की धारा बहने लगी, पर कणर् ने इस भय से कि कहीं गुरुदेव की नींद न खुल जाए, जाँघ को शरा भी हिलाया - डुलाया नहीं। जब खून से परशुराम की देह भीगने लगी, तो उनकी नींद खुली। उन्होंने देखा कि कणर् की जाँघ से खून बह रहा है। यह देखकर परशुराम बोलेμफ्बेटा, सच बताओ, तुम कौन हो?य् तब कणर् असली बात न छिपा सका। उसने स्वीकार कर लिया कि वह ब्राह्मण नहीं, बल्िक सूत - पुत्रा है। यह जानकर परशुराम को बड़ा व्रफोध आया। अतः उन्होंने उसी घड़ी कणर् को शाप देते हुए कहाμफ्चूँकि तुमने अपने गुरु को ही धोखा दिया है, इसलिए जो विद्या तुमने मुझसे सीखी है, वह अंत समय में तुम्हारे किसी काम न आएगी। ऐन वक्त पर तुम उसे भूल जाओगे और रणक्षेत्रा में तुम्हारे रथ का पहिया पृथ्वी में धँस जाएगा।य् परशुराम जी का यह शाप झूठा न हुआ। जीवनभर कणर् को उनकी सिखाइर् हुइर् ब्रह्मास्त्रा - विद्या याद रही, पर वुफरुक्षेत्रा के मैदान में अजर्ुन से यु( करते समय कणर् को वह याद न रही। दुयोर्धन के घनिष्ठ मित्रा कणर् ने अंत समय तक कौरवों का साथ न छोड़ा। वुफरुक्षेत्रा के यु( में भीष्म तथा आचायर् द्रोण के आहत हो जाने के बाद दुयोर्धन ने कणर् को ही कौरव - सेना का सेनापति बनाया था। कणर् ने दो दिन तक अद्भुत वुफशलता के साथ यु( का संचालन किया। आख्िार दोणाचायर््र8 आचायर् द्रोण मह£ष भरद्वाज के पुत्रा थे। पांचाल - नरेश का पुत्रा द्रुपद भी द्रोण के साथ ही भरद्वाज - आश्रम में श्िाक्षा पा रहा था। दोनों में गहरी मित्राता थी। कभी - कभी राजवुफमार द्रुपद उत्साह में आकर द्रोण से यहाँ तक कह देता था कि पांचाल देश का राजा बन जाने पर मैं आधा राज्य तुम्हें दे दूँगा। श्िाक्षा समाप्त होने पर द्रोणाचायर् ने वृफपाचायर् की बहन से ब्याह कर लिया। उससे उनके एक पुत्रा हुआ, जिसका नाम उन्होंने अश्वत्थामा रखा। द्रोण अपनी पत्नी और पुत्रा को बड़ा प्रेम करते थे। द्रोण बड़े गरीब थे। वह चाहते थे कि धन प्राप्त किया जाए और अपनी पत्नी व पुत्रा के साथ सुख से रहा जाए। उन्हें खबर लगी कि परशुरामअपनी सारी संपिा गरीब ब्राह्मणों को बाँट रहे हैं, तो भागे - भागे उनके पास गए, लेकिन उनकेपहुँचने तक परशुराम अपनी सारी संपिा वितरित कर चुके थे और वन - गमन की तैयारी कर रहे थे। द्रोण को देखकर वह बोलेμफ्ब्राह्मण - श्रेष्ठ! आपका स्वागत है। पर मेरे पास जो वुफछ था, वह मैं बाँट चुका हूँ। अब यह मेरा शरीर और धनु£वद्या ही है। बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ?य् जब शापवश उसके रथ का पहिया शमीन में धँस गया और वह धनुष - बाण रखकर शमीन में धँसा हुआ पहिया निकालने का प्रयत्न करने लगा, तभी अजुर्न ने उस महारथी पर प्रहार किया। माता वुंफती ने जब यह सुना, तो उसके दुख का पार न रहा। तब द्रोण ने उनसे सारे अस्त्रों के प्रयोग तथा रहस्य सिखाने की प्राथर्ना की। परशुराम ने यह प्राथर्ना स्वीकार कर ली और द्रोण को धनु£वद्या की पूरी श्िाक्षा दे दी। वुफछ समय बाद राजवुफमार द्रुपद के पिता का देहावसान हो गया और द्रुपद राजगद्दी पर बैठा। द्रोणाचायर् को जब दु्रपद के पांचाल देश की राजगद्दी पर बैठने की खबर लगी, तो यह सुनकर वह बड़े प्रसन्न हुए और राजा द्रुपद से मिलने पांचाल देश को चल पड़े। उन्हें गुरु के आश्रम में द्रुपद की लड़कपन में की गइर् बातचीत याद थी। सोचा, यदि आधा राज्य न भी देगा तो कम - से - कम वुफछ धन तो शरूर ही देगा। यह आशा लेकर द्रोणाचायर् राजा द्रुपद के पास पहुँचे और बोलेμफ्मित्रा द्रुपद, मुझे पहचानते हो न? मैं तुम्हारा बालपन का मित्रा द्रोण हूँ।य्ऐश्वयर् के मद में मत्त हुए राजा द्रुपद को द्रोणाचायर् का आना बुरा लगा और द्रोण का अपने साथ मित्रा का - सा व्यवहार करना तो और भी अखरा। वह द्रोण पर गुस्सा हो गया और बोलाμफ्ब्राह्मण, तुम्हारा यह व्यवहार सज्जनोचित नहीं है। मुझे मित्रा कहकर पुकारने का तुम्हें साहस वैफसे हुआ? ¯सहासन पर बैठे हुए एक राजा के साथ एक दरिद्र प्रजाजन की मित्राता कभी हुइर् है? तुम्हारी बुि कितनी कच्ची है! लड़कपन में लाचारी के कारण हम दोनों को जो साथ रहना पड़ा, उसके आधार पर तुम द्रुपद से मित्राता का दावा करने लगे! दरिद्र की धनी के साथ, मूखर् की विद्वान के साथ और कायर की वीर के साथ मित्राता कहीं हो सकती है? मित्राता बराबरी की हैसियतवालों में ही होती है। जो किसी राज्य का स्वामी न हो, वह राजा का मित्रा कभी नहीं हो सकता।य् द्रुपद की इन कठोर गवोर्क्ितयों को सुनकर द्रोणाचायर् बड़े लज्िजत हुए और उन्हें व्रफोध भी बहुत आया। उन्होंने निश्चय किया कि मैं इस अभ्िामानी राजा को सबक सिखाउँफगा और बचपन में जो मित्राता की बात हुइर् थी, उसे पूरा करके चैन लूँगा। वह हस्ितनापुर पहुँचे और वहाँ अपनी पत्नी के भाइर् वृफपाचायर् के यहाँ गुप्त रूप से रहने लगे। एक रोश हस्ितनापुर के राजवुफमार नगर से बाहर कहीं गेंद खेल रहे थे कि इतने में उनकी गेंद एक वुफएँ में जा गिरी। युिाष्िठर उसको निकालने का प्रयत्न करने लगे, तो उनकी अँगूठी भी वुफएँ में गिर पड़ी। सभी राजवुफमार वुफएँ के चारों ओर झाँक - झाँककर देखने लगे, पर उसे निकालने का उपाय उनको नहीं सूझता था। एक वृफष्ण वणर् का ब्राह्मण मुसवफराता हुआ यह सब चुपचाप देख रहा था। राजवुफमारों को उसका पता नहीं था। राजवुफमारो को अचरज में डालता हुआ वह बोलाμफ्राजवुफमारो! बोलो, मैं गेंद निकाल दूँ, तो तुम मुझे क्या दोगे?य् फ्ब्राह्मणश्रेष्ठ! आप गेंद निकाल देंगे, तो वृफपाचायर् के घर आपकी बढि़या दावत करेंगे।य् बाल महाभारत कथा ध् 17 युिाष्िठर ने हँसते हुए कहा। तब द्रोणाचायर् ने पास में पड़ी हुइर् सींक उठा ली और उसे पानी में पेंफका। सींक गेंद को ऐसे जाकर लगी, जैसे तीर और पिफर इस तरह लगातार कइर् सींवंेफ वे वुफएँ में डालते गए। सींवेंफ एक - दूसरे के सिरे से चिपकती गईं। जब आख्िारी सींक का सिरा वुफएँ के बाहर तक पहुँच गया, तो द्रोणाचायर् ने उसे पकड़कर खींच लिया और गेंद निकल आइर्। सब राजवुफमार आश्चयर् से यह करतब देख रहे थे। उन्होंने ब्राह्मण से विनती की कि युिाष्िठर की अँगूठी भी निकाल दीजिए। द्रोण ने तुरंत धनुष चढ़ाया और वुफएँ में तीर मारा। पलभर में बाण अँगूठी को अपनी नोंक में लिए हुए उफपर आ गया। द्रोणाचायर् ने अँगूठी युिाष्िठर को दे दी। यह चमत्कार देखकर राजवुफमारों को और भी श्यादा अचरज हुआ। उन्होंने द्रोण के आगे आदरपूवर्क सिर नवाया और हाथ जोड़कर पूछाμफ्महाराज! हमारा प्रणाम स्वीकार कीजिए और हमें अपना परिचय दीजिए कि आप कौन हैं? हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं? हमें आज्ञा दीजिए।य् द्रोण ने कहाμफ्राजवुफमारो! यह सारी घटना सुनाकर पितामह भीष्म से ही मेरा परिचय प्राप्त कर लेना।य् राजवुफमारों ने जाकर पितामह भीष्म को सारी बात सुनाइर्, तो भीष्म ताड़ गए कि हो - न - हो वे सुप्रसि( आचायर् द्रोण ही होंगे। यह सोचकर उन्होंने निश्चय कर लिया कि अब से राजवुफमारों की अस्त्रा - श्िाक्षा द्रोणाचायर् के ही हाथों पूरी कराइर् जाए। बड़े सम्मान से उन्होंने द्रोण का स्वागत किया और राजवुफमारों को आदेश दिया कि वे गुरु द्रोण से ही धनु£वद्या सीखा करें। वुफछ समय बाद जब राजवुफमारों की श्िाक्षा पूरी हो गइर्, तो द्रोणाचायर् ने उनसे गुरु - दक्ष्िाणा के रूप में पांचालराज द्रुपद को वैफद कर लाने के लिए कहा। उनकी आज्ञानुसार पहले दुयोर्धन और कणर् ने द्रुपद के राज्य पर धावा बोल दिया, पर पराव्रफमी द्रुपद के आगे वे न ठहर सके। हारकर वापस आ गए। तब द्रोण ने अजुर्न को भेजा। अजर्ुन ने पांचालराज की सेना को तहस - नहस कर दिया और राजा द्रुपद को उनके मंत्राी सहित वैफद करके आचायर् के सामने ला खड़ा किया। द्रोणाचायर् ने मुसवफराते हुए द्रुपद से कहाμफ्हेवीर! डरो नहीं। किसी प्रकार की विपिा की आशंका न करो। लड़कपन में तुम्हारी - हमारी मित्राता थी। साथ - साथ खेले - वूफदे, उठे - बैठे। बाद में जब तुम राजा बन गए, तो ऐश्वयर् के मद में आकर तुम मुझे भूल गए और मेरा अपमान किया। तुमने कहा था कि राजा ही राजा के साथ मित्राता कर सकता है। इसी कारण मुझे यु( करके तुम्हारा राज्य छीनना पड़ा। परंतु मैं तो तुम्हारे साथ मित्राता ही करना चाहता हूँ। इसलिए आधा राज्य तुम्हें वापस लौटा देता हूँ, क्योंकि मेरा मित्रा बनने के लिए भी तो तुम्हें राज्य चाहिए न! मित्राता तो बराबरी की हैसियतवालों में ही हो सकती है।य् द्रोणाचायर् ने इसे अपने अपमान का कापफी़बदला समझा और उन्होंने द्रुपद को बड़े सम्मान के साथ विदा किया। इस प्रकार राजा द्रुपद का गवर् चूर हो गया, लेकिन बदले से घृणा दूर नहीं होती। किसी के अभ्िामान को ठेस लगने पर जो पीड़ा होती है, उसे सहन करना बड़ा कठिन होता है। द्रोण से बदला लेने की भावना द्रुपद के जीवन का लक्ष्य बन गइर्। उसने कइर् कठोर व्रत और तप इस कामना से किए कि उसे एक ऐसा पुत्रा हो, जो द्रोण को मार सके। साथ ही एक ऐसी कन्या हो, जो अजुर्न को लाख का घर भीमसेन का शरीर - बल और अजुर्न की यु( - वुफशलता देखकर दुयोर्धन की जलन दिन - पर - दिन बढ़ती ही गइर्। वह ऐसे उपाय सोचने लगा कि जिससे पांडवों का नाश हो सके। इस वुफमंत्राणा में उसका मामा शवुफनि और कणर् सलाहकार बने हुए थे। बूढ़े धृतराष्ट्र बुिमान थे। अपने भतीजों से उनको स्नेह भी कापफी था, परंतु अपने पुत्रों से उनका मोह भी़अिाक था। दृढ़ निश्चय की उनमें कमी थी, पर वह किसी बात पर वह स्िथर नहीं रह सकते थे। अपने बेटे पर अंवुफश रखने की शक्ित उनमें नहीं थी। इस कारण यह जानते हुए भी कि दुयोर्धन वुफराह पर चल रहा है, उन्होंने उसका ही साथ दिया। इधर पांडवों की लोकपि्रयता दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी। चैराहों और सभा - समाजों में लोग कहते कि राजगद्दी पर बैठने के योग्य तो युिाष्िठर ही हैं। वे कहते थेμफ्धृतराष्ट्र तो जन्म से अंधे थे, इस कारण उनके छोटे भाइर् पांडु ही ¯सहासन पर बैठे थे। उनकी अकाल मृत्यु हो जाने और पांडवों के बालक होने के कारण वुफछ समय के लिए धृतराष्ट्र ने राज - काज सँभाला था। अब युिाष्िठर बड़े हो गए हैं, तो पिफर आगे धृतराष्ट्र को राज्य अपने ही अधीन रखने का क्या अिाकार बाल महाभारत कथा ध् 19 ब्याही जा सके। आख्िार उसकी कामना पूरी हुइर्। उसके धृष्टद्युम्न नामक एक पुत्रा हुआ और द्रौपदी नाम की एक कन्या। आगे चलकर वुफरुक्षेत्रा की रणभूमि में अजेय द्रोणाचायर् इसी धृष्टद्युम्न के हाथों मारे गए थे। है? पितामह भीष्म का तो कतर्व्य है कि वह धृतराष्ट्र से राज्य का भार युिाष्िठर को दिला दें। युिाष्िठर ही सारी प्रजा के साथ न्यायपूवर्क व्यवहार कर सवेंफगे।य् ज्यों - ज्यों पांडवों की यह लोकपि्रयता दिखाइर् देती थी, इर्ष्यार् से वह और भी अिाक वुफढ़ने लगता था। एक दिन धृतराष्ट्र को अकेले में पाकर दुयोर्धन बोलाμफ्पिता जी, पुरवासी तरह - तरह की बातें करते हैं। जन्म से दिखाइर् न देने के कारण आप बड़े होते हुए भी राज्य से वंचित हीरह गए। राज - सत्ता आपके छोटे भाइर् के हाथ में चली गइर्। अब यदि युिाष्िठर को राजा बना दिया गया, तो पिफर पीढि़यों तक हम राज्य की आशा नहीं कर सवेंफगे। पिता जी, हमसे तो यह अपमान न सहा जाएगा।य् यह सुनकर राजा धृतराष्ट्र सोच में पड़ गए। बोलेμफ्बेटा, तुम्हारा कहना ठीक है। लेकिन युिाष्िठर के विरु( वुफछ करना भी तो कठिन है। युिाष्िठर धमार्नुसार चलता है, सबसे समान स्नेह करता है, अपने पिता के समान ही गुणवान है। इस कारण प्रजाजन भी उसे बहुत चाहते हैं।य् यह सुनकर दुयोर्धन बोलाμफ्पिता जी, आपको और वुफछ नहीं करना है, सिप़्र्ाफ पांडवों को किसी - न - किसी बहाने वारणावत के मेले में भेज दीजिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ इतनी सी बात से हमारा वुफछ भी बिगाड़ नहीं होगा।य् इस बीच अपने पिता पर और अिाक दबाव डालने के इरादे से दुयोर्धन ने वुफछ वूफटनीतिज्ञों को अपने पक्ष में मिला लिया। वे बारी - बारी से धृतराष्ट्र के पास जाकर पांडवों के विरु( उन्हें उकसाने लगे। इनमें कण्िर्ाक नाम का ब्राह्मण मुख्य था, जो शवुफनि का मंत्राी था। उसने धृतराष्ट्र को राजनीतिक चालों का भेद बताते हुए अनेक उदाहरणांे एवं प्रमाणों से अपनी दलीलों की पुष्िट की। अंत में बोलाμफ्राजन्! जो ऐश्वयर्वान है, वही संसार में श्रेष्ठ माना जाता है। यह बात ठीक है कि पांडव आपके भतीजे हैं, परंतु वे बड़े शक्ित - संपन्न भी हैं। इस कारण अभी से चैकन्ने हो जाइए। आप पांडु - पुत्रों से अपनी रक्षा कर लीजिए, वरना पीछे पछताइएगा।य् कण्िर्ाक की बातों पर धृतराष्ट्र विचार कर रहे थे कि दुयोर्धन ने आकर कहाμफ्पिता जी, आप अगर किसी तरह पांडवों को समझाकर वारणावत भेज दें, तो नगर और राज्य पर हमारा शासन पक्का हो जाएगा। पिफर पांडव बड़ी खुशी से लौट सकते हैं और हमंे उनसे कोइर् खतरा नहीं रहेगा।य् दुयोर्धन और उसके साथी धृतराष्ट्र को रात - दिन इसी तरह पांडवों के विरु( वुफछ - न - वुफछ कहते - सुनाते रहते और उन पर अपना दबाव डालते रहते थे। आख्िार धृतराष्ट्र कमशोर पड़ गए और उनको लाचार होकर अपने बेटे की सलाह माननी पड़ी। दुयोर्धन के पृष्ठ - पोषकों ने वारणावत की सुंदरता और खूबियों के बारे में पांडवों को बहुत ललचाया। कहा कि वारणावत में एक भारी मेला होनेवाला है, जिसकी शोभा देखते ही बनेगी। उनकी बातें सुन - सुनकर खुद पांडवों को भी वारणावत जाने की उत्सुकता हुइर्, यहाँ तक कि उन्होंने स्वयं आकर धृतराष्ट्र से वहाँ जाने की अनुमति माँगी। धृतराष्ट्र की अनुमति पाकर पांडव बड़े खुश हुए और भीष्म आदि से विदा लेकर माता वंुफती के साथ वारणावत के लिए रवाना हो गए। पांडवों के चले जाने की खबर पाकर दुयोर्धन की खुशी की तो सीमा न रही। वह अपने दोनों साथ्िायोंμकणर् एवं शवुफनि के साथ बैठकर पांडवों तथा वंुफती का काम तमाम करने का उपाय सोचने लगा। उसने अपने मंत्राी पुरोचन को बुलाकर गुप्त रूप से सलाह दी और एक योजना बनाइर्। पुरोचन ने यह सारा काम पूणर् सपफलता के साथ पूरा करने का वचन दिया और तुरंत वारणावत के लिए रवाना हो गया। एक शीघ्रगामी रथ पर बैठकर पुरोचन पांडवों से बहुत पहले वारणावत जा पहुँचा। वहाँ जाकर उसने पांडवों के ठहरने के लिए सन, घी, मोम, तेल, लाख, चरबी आदि जल्दी आग पकड़नेवाली चीशों को मि‘ी में मिलाकर एक सुंदर भवन बनवाया। इस बीच अगर पांडव वहाँ जल्दी पहुँच गए, तो वुफछ समय उनके ठहरने के लिए एक और जगह का प्रबंध पुरोचन ने कर रखा था। दुयोर्धन की योजना यह थी कि वुफछ दिनों तक पांडवों को लाख के भवन में आराम से रहने दिया जाए और जब वे पूणर् रूप से निःशंक हो जाएँ, तब रात में भवन में आग लगा दी जाए, जिससे पांडव तो जलकर भस्म हो जाएँ और कौरवों पर भी कोइर् दोष न लगा सके। बाल महाभारत कथा ध् 21 पांडवों की रक्षा10 पाँचों पांडव माता वंुफती के साथ वारणावत के लिए चल पड़े। उनके हस्ितनापुर छोड़कर वारणावत जाने की खबर पाकर नगर के लोग उनके साथ हो लिए। बहुत दूर जाने के बाद युिाष्िठर का कहा मानकर नगरवासियों को लौट जाना पड़ा। दुयोर्धन के षड्यंत्रा और उससे बचने का उपाय विदुर ने युिाष्िठर को इस तरह गूढ़ भाषा में सिखा दिया था कि जिससे दूसरे लोग समझ न सवेंफ। वारणावत के लोग पांडवों के आगमन की खबर पाकर बड़े खुश हुए और उनके वहाँ पहुँचने पर उन्होंने बड़े ठाठ से उनका स्वागत किया। जब तक लाख का भवन बनकर तैयार हुआ, पांडव दूसरे घरों में रहते रहे, जहाँ पुरोचन ने पहले से ही उनके ठहरने का प्रबंध कर रखा था। लाख का भवन बनकर तैयार हो गया, तो पुरोचन उन्हें उसमें ले गया। भवन में प्रवेश करते ही युिाष्िठर ने उसे खूब ध्यान से देखा। विदुर की बातें उन्हें याद थीं। ध्यान से देखने पर युिाष्िठर को पता चल गया कि यह घर जल्दी आग लगनेवाली चीशों से बना हुआ है। युिाष्िठर ने भीम को भी यह भेद बता दियाऋ पर साथ ही उसे सावधान करते हुए कहाμफ्यद्यपि यह सापफ मालूम हो गया है़कि यह स्थान खतरनाक है, पिफर भी हमें विचलित नहीं होना चाहिए। पुरोचन को इस बात का शरा भी पता न लगे कि उसके षड्यंत्रा का भेद हम पर खुल गया है। मौका पाकर हमें यहाँ से निकल भागना होगा। पर अभी हमें जल्दी से ऐसा कोइर् काम नहीं करना चाहिए, जिससे शत्राु के मन में शरा भी संदेह पैदा होने की संभावना हो।य् युिाष्िठर की इस सलाह को भीमसेन सहित सब भाइयों तथा वंुफती ने मान लिया। वे उसी लाख के भवन में रहने लगे। इतने में विदुर का भेजा हुआ एक संुरग बनानेवाला कारीगर वारणावत नगर में आ पहुँचा। उसने एक दिन पांडवों को अकेले में पाकर उन्हें अपना परिचय देते हुए कहाμफ्आप लोगों की भलाइर् के लिए हस्ितनापुर से रवाना होते समय विदुर ने युिाष्िठर से सांकेतिक भाषा में जो वुफछ कहा था, वह बात मैं जानता हूँ। यही मेरे सच्चे मित्रा होने का सबूत है। आप मुझ पर भरोसा रखें। मैं आप लोगों की रक्षा का प्रबंध करने के लिए आया हूँ।य् इसके बाद वह कारीगर महल में पहुँच गया और गुप्त रूप से वुफछ दिनों में ही उसमें एक सुरंग बना दी। इस रास्ते से पांडव महल के अंदर से नीचे - ही - नीचे चहारदीवारी और गहरी खाइर् को लाँघकर सुरक्ष्िात बेखटके बाहर निकल सवफते थे। यह काम इतने गुप्त रूप से और इस खूबी से हुआ कि पुरोचन को अंत तक इस बात की खबर न होने पाइर्। पुरोचन ने लाख के भवन के द्वार पर ही अपने रहने के लिए स्थान बनवा लिया था। इस कारण पांडवों को भी सारी रात हथ्िायार लेकर चैकन्ने रहना पड़ता था। एक दिन पुरोचन ने सोचा कि अब पांडवों का काम तमाम करने का समय आ गया है। समझदार युिाष्िठर उसके रंग - ढंग से ताड़ गए कि वह क्या सोच रहा है। युिाष्िठर की सलाह से माता वंुफती ने उसी रात को एक बड़े भोज का प्रबंध किया। नगर के सभी लोगों को भोजन कराया गया। बड़ी धूमधाम रही, मानो कोइर् बड़ा उत्सव हो। खूब खा - पीकर भवन के सब कमर्चारी गहरी नींद में सो गए। पुरोचन भी सो गया। आधी रात के समय भीमसेन ने भवन मंे कइर् जगह आग लगा दी और पिफर पाँचों भाइर् माता वंुफती के साथ सुरंग के रास्ते अँधेरे में रास्ता टटोलते - टटोलते बाहर निकल गए। भवन से बाहर वे निकले ही थे कि आग ने सारे भवन को अपनी लपटों में ले लिया। पुरोचन के रहने के मकान में भी आग लग गइर्। सारे नगर के लोग इकऋे हो गए और पांडवों के भवन को भयंकर आग की भेंट होते देखकर हाहाकार मचाने लगे। कौरवों के अत्याचार से जनता क्षुब्ध हो उठी और तरह - तरह से कौरवों की ¯नदा करने लगी। लोग व्रफोध में अनाप - शनाप बकने लगे, हाय - तौबा मचाने लगे और उनके देखते - देखते सारा भवन जलकर राख हो गया। पुरोचन का मकान और स्वयं पुरोचन भी आग की भेंट हो गया। वारणावत के लोगों ने तुरंत ही हस्ितनापुर में खबर पहुँचा दी कि पांडव जिस भवन में ठहराए गए थे, वह जलकर राख हो गया है और भवन में कोइर् भी जीता नहीं बचा। धृतराष्ट्र और उनके बेटों ने पांडवों की मृत्यु पर बड़ा शोक मनाया। वे गंगा - किनारे गए और पांडवों तथा वंुफती को बाल महाभारत कथा ध् 23 जलांजलि दी। पिफर सब मिलकर बड़े शोर - शोर से रोते और विलाप करते हुए घर लौटे। परंतु दाशर्निक विदुर ने शोक को मन ही मेेें दबा लिया। अिाक शोक - प्रदशर्न न किया। इसके अलावा विदुर को यह भी पक्का विश्वास था कि पांडव लाख के भवन से बचकर निकल गए होंगे। पितामह भीष्म तो मानो शोक के सागर ही में थे, पर उनको विदुर ने धीरज बँधाया और पांडवों के बचाव के लिए किए गए अपने सारे प्रबंध का हाल बताकर उन्हें ¯चतामुक्त कर दिया। लाख के घर को जलता हुआ छोड़कर पाँचों भाइर् माता वंुफती के साथ बच निकले और जंगल में पहुँच गए। जंगल में पहुँचने पर भीमसेन ने देखा कि रातभर जगे होने तथा ¯चता और भय से पीडि़त होने के कारण चारों भाइर् बहुत थके हुए हैं। माता वंुफती की दशा तो बड़ी ही दयनीय थी। बेचारी थककर चूर हो गइर् थी। सो महाबली भीम ने माता को उठाकर अपने वंफधे पर बैठा लिया और नवुफल एवं सहदेव को कमर पर ले लिया। युिाष्िठर और अजुर्न को दोनों हाथों से पकड़ लिया और वह उस जंगली रास्ते में उन्मत्त हाथी के समान झाड़ - झंखाड़ और पेड़ - पौधों को इधर - उधर हटाता व रौंदता हुआ तेशी से चलने लगा। जब वे सब गंगा के किनारे पहुँचे, तो वहाँ विदुर की भेजी हुइर् एक नाव मिली। युिाष्िठर ने मल्लाह से सांकेतिक प्रश्न करके जाँच लिया कि वह मित्रा है। वे लोग अगले दिन शाम होने तक चलते ही रहे, ताकि किसी सुरक्ष्िात स्थान पर पहुँच जाएँ। सूरज डूब गया और रात हो चली थी। चारों तरपफ अंँधेरा छा गया। वंुफती और पांडव एक तो़थकावट के मारे चूर हो रहे थे, उफपर से प्यास और नींद भी उन्हें सताने लगी। चक्कर - सा आने लगा। एक पग भी आगे बढ़ना असंभव हो गया। भीम के सिवाए और सब भाइर् वहीं शमीन पर बैठ गए। वंुफती से तो बैठा भी नहीं गया। वह दीनभाव से बोलीμफ्मैं तो प्यास से मरी जा रही हूँ। अब मुझसे बिलवुफल चला नहीं जाता। धृतराष्ट्र के बेटे चाहें तो भले ही मुझे यहाँ से उठा ले जाएँ, मैं तो यहीं पड़ी रहूँगी।य् यह कहकर वंुफती वहीं शमीन पर गिरकर बेहोश हो गइर्। माता और भाइयों का यह हाल देखकर क्षोभ के मारे भीमसेन का हृदय दग्ध हो उठा। वह उस भयानक जंगल में बेधड़क घुस गया और इधर - उधर घूम - घामकर उसने एक जलाशय का पता लगा ही लिया। उसने पानी लाकर माता व भाइयों की प्यास बुझाइर्। पानी पीकर चारों भाइर् और माता वंुफती ऐसे सोए कि उन्हें अपनी सुध - बुध तक न रही। अकेला भीमसेन मन - ही - मन वुफछ सोचता हुआ ¯चतित भाव से बैठा रहा। पाँचों भाइर् माता वंुफती को लिए अनेक विघ्न - बाधाओं का सामना करते और बड़ी मुसीबतें झेलते हुए उस जंगली रास्ते में आगे बढ़ते ही चले गए। वे कभी माता को उठाकर तेश चलते, कभी थके - माँदे बैठ जाते। कभी एक - दूसरे से होड़ लगाकर रास्ता पार करते। वे ब्राह्मण ब्रह्मचारियों का वेश धरकर एकचव्रफा नगरी में जाकर एक ब्राह्मण के घर में रहने लगे। माता वंुफती के साथ पाँचों पांडव एकचव्रफा नगरी में भ्िाक्षा माँगकर अपनी गुशर करके दिन बिताने लगे। भ्िाक्षा के लिए जब पाँचों भाइर् निकल जाते, तो वंुफती का जी बड़ा बेचैन हो उठता था। वह बड़ी ¯चता से उनकी बाट जोहती रहती। उनके लौटने में शरा भी देर हो जाती तो वंुफती के मन में तरह - तरह की आशंकाएँ उठने लगती थीं। पाँचों भाइर् भ्िाक्षा में जितना भोजन लाते, वंुफती उसके दो हिस्से कर देती। एक हिस्सा भीमसेन को दे देती और बाकी आधे में से पाँच हिस्से करके चारों बेटे और खुद खा लेती थी। तिसपर भी भीमसेन की भूख नहीं मिटती थी। हमेशा ही भूखा रहने के कारण वह दिन - पर - दिन दुबला होने लगा। भीमसेन का यह हाल देखकर वंुफती और युिाष्िठर बड़े ¯चतित रहने लगे। थोड़े से भोजन से पेट न भरता था, सो भीमसेन ने एक वुफम्हार से दोस्ती कर ली। उसने मि‘ी आदि खोदने में मदद करके उसको खुश कर दिया। वुफम्हार भीम से बड़ा खुश हुआ और एक बड़ी भारी हाँडी बनाकर उसको दी। भीम उसी हाँडी को लेकर भ्िाक्षा के लिए निकलने लगा। उसका विशाल शरीर और उसकी वह विलक्षण हाँडी देखकर बच्चे तो हँसते - हँसते लोटपोट हो जाते। एक दिन चारों भाइर् भ्िाक्षा के लिए गए। अकेला भीमसेन ही माता वुंफती के साथ घर पर रहा। इतने में ब्राह्मण के घर के भीतर से बिलख - बिलखकर रोने की आवाश आइर्। अंदर जाकर देखा कि ब्राह्मण और उसकी पत्नी आँखों में आँसू भरे सिसकियाँ लेते हुए एक - दूसरे से बातें कर रहे हैं। ब्राह्मण बड़े दुखी हृदय से अपनी पत्नी से कह रहा थाμफ्कितनी ही बार मैंने तुम्हंे समझाया कि इस अंधेर नगरी को छोड़कर कहीं और चले जाएँ, पर तुम नहीं मानीं। यही हठ करती रहीं कि यह मेरे बाप - दादा का गाँव है, यहीं रहँूगी। बोलो, अब क्या कहती हो? अपनी बेटी की भी बलि वैफसे चढ़ा दूँ और पुत्रा को वैफसे काल कवलित होने दूँ? यदि मैं शरीर त्यागता हूँ, तो पिफर इन अनाथ बच्चों का भरण - पोषण कौन करेगा? हाय! मैं अब क्या करूँ? और वुफछ करने से तो अच्छा उपाय यह है कि सभी एक साथ मौत को गले लगा लें। यही अच्छा होगा।य् कहते - कहते ब्राह्मण सिसक - सिसककर रो पड़ा। ब्राह्मण की पत्नी रोती - रोती बोलीμफ्प्राणनाथ! मुझे मरने का कोइर् दुख नहीं है। मेरी मृत्यु के बाद आप चाहें, तो दूसरी पत्नी ला सकते हैं। अब मुझे प्रसन्नतापूवर्क आज्ञा दें, ताकि मैं राक्षस का भोजन बनूँ।य् पत्नी की ये व्यथाभरी बातें सुनकर ब्राह्मण से न रहा गया। वह बोलाμफ्पि्रये! मुझसे बड़ा दुरात्मा और पापी कौन होगा, जो तुम्हें राक्षस की बलि चढ़ा दे और खुद जीवित रहे?य् माता - पिता को इस तरह बातें करते देख ब्राह्मण की बेटी से न रहा गया। उसने करुण स्वर में कहाμफ्पिताजी, अच्छा तो यह है कि राक्षस के पास आप मुझे भेज दें।य् सबको इस तरह रोते देखकर ब्राह्मण का नन्हा सा बालक पास में पड़ी हुइर् सूखी लकड़ी हाथ में लेकर घुमाता हुआ बोलाμफ्उस राक्षस को तो मैं ही इस लकड़ी से इस तरह शोर से मार डालँूगा।य् बाल महाभारत कथा ध् 25 वुंफती खड़ी - खड़ी यह सब देख रही थी। अपनी बात कहने का उसने ठीक मौका देखा। वह बोलीμफ्हे ब्राह्मण, क्या आप कृपा करके मुझे बता सकते हैं कि आप लोगों के इस असमय दुख का कारण क्या है?य् ब्राह्मण ने कहाμफ्देवी! सुनिए, इस नगरी के समीप एक गुप़्ाफा है, जिसमें बक नामक एक बड़ा अत्याचारी राक्षस रहता है। पिछले तेरह वषो± से इस नगरी के लोगों पर वह बड़े शुल्म ढा रहा है। इस देश का राजा, जो वेत्राकीय नाम के महल में रहता है, इतना निकम्मा है कि प्रजा को राक्षस के अत्याचार से बचा नहीं रहा है। इससे घबराकर नगर के लोगों ने मिलकर उससे बड़ी अनुनय - विनय की कि कोइर् - न - कोइर् नियम बना ले। बकासुर ने लोगों की यह बात मान ली और तब से इस समझौते के अनुसार यह नियम बना हुआ है कि लोग बारी - बारी से एक - एक आदमी और खाने की चीशें हर सप्ताह उसे पहुँचा दिया करते हैं। इस सप्ताह में उस राक्षस के खाने के लिए आदमी और भोजन भेजने की हमारी बारी है। अब तो मैंने यही सोचा है कि सबको साथ लेकर ही राक्षस के पास चला जाऊँगा। आपने पूछा सो आपको बता दिया। इस कष्ट को दूर करना तो आपके बस में भी नहीं है।य् ब्राह्मण की बात का कोइर् उत्तर देने से पहले वंुफती ने भीमसेन से सलाह की। उसने लौटकर कहाμफ्विप्रवर, आप इस बात की ¯चता छोड़ दें। मेरे पाँच बेटे हैं, उनमें से एक आज राक्षस के पास भोजन लेकर चला जाएगा।य् सुनकर ब्राह्मण चैंक पड़ा और बोलाμफ्आप भी वैफसी बात कहती हैं! आप हमारी अतिथ्िा हैं। हमारे घर में आश्रय लिए हुए हैं। आपके बेटे को मौत के मुँह में मैं भेजूँ, यह कहाँ का न्याय है? मुझसे यह नहीं हो सकता।य् वुंफती को डर था कि यदि यह बात पैफल गइर्, तो दुयोर्धन और उनके साथ्िायों को पता लग जाएगा कि पांडव एकचक्रा नगरी में छिपे हुए हैं। इसीलिए उसने ब्राह्मण से इस बात को गुप्त रखने का आग्रह किया था। वुंफती ने जब भीमसेन को बताया कि उसे बकासुर के पास भोजन - सामग्री लेकर जाना होगा, तो युिाष्िठर खीझ उठे और बोलेμफ्यह तुम वैफसा दुस्साहस करने चली हो, माँ!य्युिाष्िठर की इन कड़ी बातों का उत्तर देते हुए वंुफती बोलीμफ्बेटा युिाष्िठर! इस ब्राह्मण के घर में हमने कइर् दिन आराम से बिताए हैं। जब इन पर विपदा पड़ी है, तो मनुष्य होने के नाते हमें उसका बदला चुकाना ही चाहिए। मैं बेटा भीम की शक्ित और बल से अच्छी तरह परिचित हूँ। तुम इस बात की ¯चता मत करो। जो हमें वारणावत से यहाँ तक उठा लाया, जिसने हि¯डब का वध किया, उस भीम के बारे में मुझे न तो कोइर् डर है, न ¯चता। भीम को बकासुर के पास भेजना हमारा कतर्व्य है।य् इसके बाद नियम के अनुसार नगर के लोग खाने - पीने की चीशंे गाड़ी में रखकर ले आए। भीमसेन उछलकर गाड़ी में बैठ गया। शहर के लोग भी बाजे बजाते हुए वुफछ दूर तक उसके पीछे - पीछे चले। एक निश्िचत स्थान पर लोग रुक गए और अकेला भीम गाड़ी दौड़ाता हुआ आगे गया। उधर राक्षस मारे भूख के तड़प रहा था। जब बहुत देर हो गइर्, तो बड़े क्रोध के साथ वह गुपफा के बाहर आया। देखता क्या है कि एक़मोटा सा मनुष्य बड़े आराम से बैठा हुआ भोजन कर रहा है। यह देखकर बकासुर की आँखें क्रोध से एकदम लाल हो उठीं। इतने में भीमसेन की भी निगाह उस पर पड़ी। उसने हँसते हुए उसका नाम लेकर पुकारा। भीमसेन की यह ढिठाइर् देखकर राक्षस गुस्से में भर गया और तेशी से भीमसेन पर झपटा। भीमसेन ने बकासुर को अपनी ओर आते देखा, तो उसने उसकी तरप्.ाफ पीठ पेफर ली और वुफछ भी परवाह न करके खाने में ही लगा रहा। खाली हाथों काम न बनते देखकर राक्षस ने एक बड़ा सा पेड़ जड़ से उखाड़ लिया और उसे भीमसेन पर दे मारा, परंतु भीमसेन ने बाएँ हाथ पर उसे रोक लिया। दोनों में भयानक मुठभेड़ हो गइर्। भीमसेन ने बाल महाभारत कथा ध् 27 थोड़ी देर सुस्ताकर भीम ने पिफर कहाμ फ्अच्छा! अब उठो!य् बकासुर उठकर भीम के साथ लड़ने लगा। भीमसेन ने उसको ठोकरें लगाकर पिफर गिरा दिया। इस तरह बार - बार पछाड़ खाने पर भी राक्षस उठकर भ्िाड़ जाता था। आख्िार भीम ने उसे मुँह के बल गिरा दिया और उसकी पीठ पर घुटनों की मार देकर उसकी रीढ़ तोड़ डाली। राक्षस पीड़ा के मारे चीख उठा और उसके प्राण - पखेरू उड़ गए। भीमसेन उसकी लाश को घसीट लाया और उसे नगर के पफाटक पर जाकर पटक दिया। पिफर उसने घर आकर माँ को सारा हाल बताया। द्रौपदी - स्वयंवर जिस समय पांडव एकचव्रफा नगरी में ब्राह्मणों के वेष में जीवन बिता रहे थे, उन्हीं दिनों पांचाल - नरेश की कन्या द्रौपदी के स्वयंवर की तैयारियाँ होने लगीं। एकचव्रफा नगरी के ब्राह्मणों के झुंड पांचाल देश के लिए रवाना हुए। पांडव भी उनके साथ ही हो लिए। पाँचों भाइर् माता वंुफती के साथ किसी वुफम्हार की झोंपड़ी मंे आ टिके। पांचाल देश में भी पांडव ब्राह्मण - वेश ही धारण किए रहे। इस कारण कोइर् उनको पहचान न सका। स्वयंवर - मंडप में एक वृहदाकार धनुष रखा हुआ था, जिसकी डोरी तारों की बनी हुइर् थी। उफपर कापफी उँफचाइर् पर एक सोने की मछली टँगी हुइर् ़थी। उसके नीचे एक चमकदार यंत्रा बड़े वेग से घूम रहा था। राजा द्रुपद ने घोषणा की थी कि जो राजवुफमार पानी मे पति¯बब देखकर उस भारी ं्रधनुष से तीर चलाकर उफपर टँगे हुए निशाने ;मछलीद्ध को गिरा देगा, उसी को द्रौपदी वरमाला पहनाएगी। इस स्वयंवर के लिए दूर - दूर से अनेक वीर आए हुए थे। मंडप में सैकड़ों राजा इकऋे हुए थे जिनमें धृतराष्ट्र के सौ बेटे, अंग - नरेश कणर्, श्रीवृफष्ण, श्िाशुपाल, जरासंध आदि भी शामिल हुए थे। दशर्कों की भी भारी भीड़ थी। राजवुफमार धृष्टद्युम्न घोड़े पर सवार होकर आगे आया। उसके पीछे हाथी पर सवार द्रौपदी आइर्। हाथ में पूफलों का हार लिए हुए राजकन्या हाथी से उतरी और सभा में पदापर्ण किया। राजवुफमार धृष्टद्युम्न अपनी बहन का हाथ पकड़कर उसे मंडप के बीच में ले गया। इसके बाद एक - एक करके राजवुफमार उठते और धनुष पर डोरी चढ़ाते, हारते और अपमानित होकर लौट जाते। कितने ही सुप्रसि( वीरों को इस तरह मुँह की खानी पड़ी। श्िाशुपाल, जरासंध, शल्य व दुयोर्धन जैसे पराव्रफमी राजवुफमार तक असपफल हो गए। जब कणर् की बारी आइर्, तो सभा में एक लहर - सी दौड़ गइर्। सबने सोचा, अंग - नरेश शरूर सपफल हो जाएँगे। कणर् ने धनुष उठाकर खड़ा कर दिया और तानकर प्रत्यंचा भी चढ़ानी शुरू कर दी। डोरी के चढ़ाने में अभी बालभर की ही कसर रह गइर् थी कि इतने में धनुष का डंडा उसके हाथ से छूट गया तथा उछलकर उसके मुँह पर लगा। अपनी चोट सहलाता हुआ कणर् अपनी जगह पर जा बैठा। इतने में उपस्िथत ब्राह्मणों के बीच से एक तरुण उठ खड़ा हुआ। ब्राह्मणों की मंडली में ब्राह्मण वेषधारी अजुर्न को यों खड़ा होते देखकर सभा में बड़ी हलचल मच गइर्। लोगों में तरह - तरह की चचार् होने लगी। तब अजुर्न ने धनुष हाथ में लिया और उस पर डोरी चढ़ा दी। उसने धनुष पर तीर चढ़ाया और आश्चयर्चकित लोगों को मुसवफराते हुए देखा। लोग उसे देख रहे थे। उसने और देरी न करके तुरंत एक के बाद एक पाँच बाण उस घूमते हुए चव्रफ में मारे और हशारों लोगों के देखते - देखते निशाना टूटकर नीचे गिर पड़ा। सभा में कोलाहल मच गया। बाजे बज उठे। उस समय राजवुफमारी द्रौपदी की शोभा वुफछ अनूठी हो गइर्। वह आगे बढ़ी और सवुफचाते हुए लेकिन प्रसन्नतापूवर्क ब्राह्मण - वेष में खड़े अजुर्न को वरमाला पहना दी। माता को यह समाचार सुनाने के लिए युिाष्िठर, नवुफल और सहदेव तीनों भाइर् मंडप से उठकर चले गए। परंतु भीम नहीं गया। उसे भय था कि निराश राजवुफमार कहीं अजुर्न को वुफछ कर न बैठें। भीमसेन का अनुमान ठीक ही निकला। राजवुफमारों में बड़ी हलचल मच गइर्। उन्होंने शोर मचाया। राजवुफमारों बाल महाभारत कथा ध् 29 का जोश बढ़ता गया। ऐसा प्रतीत हुआ कि भारी विप्लव मच जाएगा। यह हाल देखकर श्रीवृफष्ण, बलराम और वुफछ राजा विप्लव मचानेवाले राजवुफमारों को समझाने लगे। वे समझाते रहे और इस बीच भीम और अजुर्न द्रौपदी को साथ लेकर वुफम्हार की वुफटिया की ओर चल दिए। जब भीम और अजुर्न द्रौपदी को साथ लेकर सभा से जाने लगे, तो द्रुपद का पुत्रा धृष्टद्युम्न चुपके से उनके पीछे हो लिया। वुफम्हार की वुफटिया में उसने जो देखा, उससे उसके आश्चयर् की सीमा न रही। वह तुरंत लौट आया और अपने पिता से बोलाμफ्पिता जी, मुझे तो ऐसा लगता है कि ये लोग कहीं पांडव न हों! बहन द्रौपदी उस युवक की मृगछाला पकड़े जब जाने लगी, तो मैं भी उनके पीछे हो लिया। वे एक वुफम्हार की झोंपड़ी में जा पहुँचे। वहाँ अग्िन - श्िाखा की भाँति एक तेजस्वी देवी बैठी हुईं थीं। वहाँ जो बातें हुईं, उनसे मुझे विश्वास हो गया कि वह वंुफती देवी ही होनी चाहिए।य् इंद्रप्रस्थ 12 द्रौपदी के स्वयंवर में जो वुफछ हुआ था, उसकी खबर जब हस्ितनापुर पहुँची, तो विदुर बड़े खुश हुए। धृतराष्ट्र के पास दौड़े गए और बोलेμ फ्पांडव अभी जीवित हैं। राजा द्रुपद की कन्या को स्वयंवर में अजुर्न ने प्राप्त किया है। पाँचों भाइयों ने वििापूवर्क द्रौपदी के साथ ब्याह कर लिया है और वंुफती के साथ वे सब द्रुपद के यहाँ वुफशल से हैं।य् यह सुनकर धृतराष्ट्र हषर् प्रकट करते हुए बोलेμफ्भाइर् विदुर! तुम्हारी बातों से मुझे असीम आनंद हो रहा है। राजा द्रुपद की बेटी हमारी बहू बन गइर् है, यह बड़ा ही अच्छा हुआ।य् उधर दुयोर्धन को जब मालूम हुआ कि पांडवों ने लाख के घर की भीषण आग से किसी तरह बचकर और एक बरस तक कहीं छिपे रहने के बाद अब पराव्रफमी पांचालराज की तब राजा द्रुपद के बुलावा भेजने पर पाँचों भाइर्, माता वंुफती और द्रौपदी को साथ लेकर राजभवन पहुँचे। युिाष्िठर ने राजा को अपना सही परिचय दे दिया। यह जानकर कि ये पांडव हैं, राजा द्रुपद पूफले न समाए। उनकी इच्छा पूरी हुइर्। महाबली अजुर्न मेरी बेटी के पति हो गए हैं, तो पिफर द्रोणाचायर् की शत्राुता की मुझे ¯चता नहीं रही! यह विचारकर उन्होेेंने संतोष की साँस ली। माँ की आज्ञा और सबकी सम्मति से द्रौपदी के साथ पाँचों पांडवों का विवाह हो गया। कन्या से ब्याह कर लिया है और अब वे पहले से भी अिाक शक्ितशाली बन गए हैं, तो उनके प्रति उसके मन में इर्ष्यार् की आग और अिाक प्रबल हो उठी। दबा हुआ वैर पिफर से जाग उठा। दुयोर्धन और दुःशासन ने शवुफनि को अपना दुखड़ा सुनायाμफ्मामा, अब क्या करें? अब तो द्रुपदवुफमार धृष्टद्युम्न और श्िाखंडी भी उनके साथी बन गए हैं।य् उसके बाद कणर् और दुयोर्धन धृतराष्ट्र के पास गए और एवफांत में उनसे दुयोर्धन ने कहाμफ्पिता जी, जल्दी ही हम ऐसा कोइर् उपाय करें, जिससे हम सदा के लिए नि¯श्चत हो सवेंफ।य् धृतराष्ट्र ने कहा, फ्बेटा, तुम बिलवुफल ठीक कहते हो। तुम्हीं बताओ, अब क्या करना चाहिए?य् दुयोर्धन ने कहा, फ्तो पिफर हमें कोइर् ऐसा उपाय करना चाहिए, जिससे पांडव यहाँ आएँ ही नहीं, क्योंकि यदि वे इधर आए, तो शरूर राज्य पर भी अपना अिाकार जमाना चाहेंगे।य् इस पर कणर् को हँसी आ गइर्। उसने कहाμफ्दुयोर्धन! अब एक साल बाहर रहने और दुनिया देख लेने से उन्हें कापफी अनुभव प्राप्त हो़चुका है। एक शक्ित संपन्न राजा के यहाँ उन्होंने शरण ली है। तिस पर उनके प्रति तुम्हारा वैरभाव उनसे छिपा नहीं है। इसलिए छल - प्रपंच से अब काम नहीं बनेगा। आपस में पूफट डालकर भी उनको हराना संभव नहीं। राजा द्रुपद धन के प्रलोभन में पड़नेवाले व्यक्ित भी नहीं हैं। लालच देकर उनको अपने पक्ष में करने का विचार बेकार है। पांडवों का साथ वे कभी नहीं छोड़ेंगे। द्रौपदी के मन में पांडवों के प्रति घृणा पैदा हो ही नहीं सकती। ऐसे विचार की ओर ध्यान देना भी ठीक नहीं है। हमारे पास केवल एक ही उपाय रह गया है और वह यह है कि पांडवों की ताकत बढ़ने से पहले उन पर हमला कर दिया जाए।य् कणर् तथा अपने बेटों की परस्पर विरोधी बातें सुनकर धृतराष्ट्र इस बारे में कोइर् निणर्य नहीं ले सके। वे पितामह भीष्म तथा आचायर् द्रोण को बुलाकर उनसे सलाह - मशविरा करने लगे। पांडु - पुत्रांे के जीवित रहने की खबर पाकर पितामह भीष्म के मन मेें भी आनंद की लहरें उठ रही थीं। भीष्म ने कहाμफ्बेटा! वीर पांडवों के साथ संिा करके आधा राज्य उन्हें दे देना ही उचित है।य् आचायर् द्रोण ने भी यही सलाह दी। अंग - नरेश कणर् भी इस अवसर पर धृतराष्ट्र के दरबार में उपस्िथत था। पांडवों को आधा राज्य देने की सलाह उसे बिलवुफल अच्छी न लगी। दुयोर्धन के प्रति कणर् के हृदय में अपार स्नेह था। इस बाल महाभारत कथा ध् 31 कारण द्रोणाचायर् की सलाह सुनकर उसके व्रफोध की सीमा न रही। वह धृतराष्ट्र से बोलाμफ्राजन्! मुझे यह देखकर बड़ा आश्चयर् हो रहा है कि आचायर् द्रोण भी आपको ऐसी वुफमंत्राणा देते हैं! राजन्! शासकों का कतर्व्य है कि मंत्राणा देनेवालों की नीयत को पहले परख लें, पिफर उनकी मंत्राणा पर ध्यान दें।य् कणर् की इन बातों से द्रोणाचायर् व्रफोिात हो गरजकर बोलेμफ्दुष्ट कणर्! तुम राजा को गलत रास्ता बता रहे हो। यह निश्िचत है कि यदि राजा धृतराष्ट्र ने मेरी तथा पितामह भीष्म की सलाह न मानी और तुम जैसों की सलाह पर चले, तो पिफर कौरवों का नाश होनेवाला है।य् इसके बाद धृतराष्ट्र ने धमार्त्मा विदुर से सलाह ली। विदुर ने कहाμफ्हमारे वुफल के नायक भीष्म तथा आचायर् द्रोण ने जो बताया है, वही श्रेयस्कर है। कणर् की सलाह किसी काम की नहीं है।य् अंत में सब सोच - विचारकर धृतराष्ट्र ने पांडु के पुत्रों को आधा राज्य देकर संिा कर लेने का निश्चय किया और पांडवों को द्रौपदी तथा वंुफती सहित सादर लिवा लाने के लिए विदुर को पांचाल देश भेजा। विदुर पांचाल देश को रवाना हो गए। पांचाल देश में पहुँचकर विदुर ने राजा द्रुपद को अमूल्य उपहार भेंट करके उनका सम्मान किया और राजा धृतराष्ट्र की तरप़्ाफ से अनुरोध किया कि पांडवों को द्रौपदी सहित हस्ितनापुर जाने की अनुमति दें। विदुर का अनुरोध सुनकर राजा द्रुपद के मन में शंका हुइर्। उनको धृतराष्ट्र पर विश्वास न हुआ। सिपर्फ इतना कह़दिया कि पांडवों की जैसी इच्छा हो, वही करना ठीक होगा। तब विदुर ने माता वुंफती के पास जाकर अपने आने का कारण उन्हें बताया। वुंफती के मन में भी शंका हुइर् कि कहीं पुत्रांे पर पिफर कोइर् आपफत न आ जाए।़विदुर ने उन्हंे समझाया और धीरज देते हुए कहाμफ्देवी, आप नि¯श्चत रहें। आपके बेटों का कोइर् वुफछ नहीं बिगाड़ सकेगा। वे संसार में खूब यश कमाएँगे और विशाल राज्य के स्वामी बनेंगे। आप सब बेखटके हस्ितनापुर चलिए।य् आख्िार द्रुपद राजा ने भी अनुमति दे दी और विदुर के साथ वुंफती और द्रौपदी समेत पांडव हस्ितनापुर को रवाना हो गए। उधर हस्ितनापुर में पांडवों के स्वागत की बड़ी धूमधाम से तैयारियाँ होने लगीं। जैसाकि पहले ही निश्चय हो चुका था, युिाष्िठर का यथावििा राज्याभ्िाषेक हुआ और आधा राज्य पांडवों के अधीन किया गया। राज्याभ्िाषेक के उपरांत युिाष्िठर को आशीवार्द देते हुए धृतराष्ट्र ने कहाμफ्बेेटा युिाष्िठर! मेरे अपने बेटे बड़े दुरात्मा हैं। एक साथ रहने से संभव है कि तुम जरासंध13 इंद्रप्रस्थ में प्रतापी पांडव न्यायपूवर्क प्रजा - पालन कर रहे थे। युिाष्िठर के भाइयों तथा साथ्िायों की इच्छा हुइर् कि अब राजसूय यज्ञ करके सम्राट - पद प्राप्त किया जाए। इस बारे में सलाह करने के लिए युिाष्िठर ने श्रीवृफष्ण को संदेश भेजा। जब श्रीवृफष्ण को मालूम हुआ कि युिाष्िठर उनसे मिलना चाहते हैं, तो तत्काल ही वह द्वारका से चल पड़े और इंद्रप्रस्थ पहुँचे। लोगों के बीच वैर बढ़े। इस कारण मेरी सलाह है कि तुम खांडवप्रस्थ को अपनी राजधानी बना लेना और वहीं से राज करना। खांडवप्रस्थ वह नगरी है, जो पुरु, नहुष एवं ययाति जैसे हमारे प्रतापी पूवर्जों की राजधानी रही है। हमारे वंश की पुरानी राजधानी खांडवप्रस्थ को पिफर से बसाने का यश और श्रेय तुम्हीं को प्राप्त हो।य् धृतराष्ट्र के मीठे वचन मानकर पांडवों ने खांडवप्रस्थ के भग्नावशेषांे पर, जोकि उस समय तक निजर्न वन बन चुका था, निपुण श्िाल्पकारों से एक नए नगर का निमार्ण कराया। सुंदर भवनों, अभेद्य दुगो± आदि से सुशोभ्िात उस नगर का नाम इंद्रप्रस्थ रखा गया। इंद्रप्रस्थ की शान एवं सुंदरता ऐसी हो गइर् कि सारा संसार उसकी प्रशंसा करते न थकता था। अपनी राजधानी में द्रौपदी और माता वुंफती के साथ पाँचों पांडव तेइर्स बरस तक सुखपूवर्क जीवन बिताते हुए न्यायपूवर्क राज्य करते रहे। युिाष्िठर ने श्रीवृफष्ण से कहाμफ्मित्रों का कहना है कि मैं राजसूय यज्ञ करके सम्राट - पद प्राप्त करूँ । परंतु राजसूय यज्ञ तो वही कर सकता है, जो सारे संसार के नरेशों का पूज्य हो और उनके द्वारा सम्मानित हो। आप ही इस विषय में मुझे सही सलाह दे सकते हैं।य् युिाष्िठर की बात शांति के साथ सुनकर श्रीवृफष्ण बोलेμफ्मगधदेश के राजा जरासंध ने सब राजाओं को जीतकर उन्हें अपने अधीन कर रखा है। सभी उसका लोहा मान चुके हैं और उसके नाम से डरते हैं, यहाँ तक कि श्िाशुपाल जैसे शक्ित - संपन्न राजा भी उसकी अधीनता स्वीकार कर चुके हैं और उसकी छत्राछाया में रहना पसंद करते हैं। अतः जरासंध के रहते हुए और कौन सम्राट - पद प्राप्त कर सकता है? जब महाराज उग्रसेन का नासमझ बेटा वंफस जरासंध की बेटी से ब्याह करके उसका साथी बन गया था, तब मैंने और मेरे बंधुओं ने जरासंध के विरफ( यु( किया था। तीन बरस तक हम उसकी सेनाओं के साथ लड़ते रहे, पर आख्िार हार गए। हमें मथुरा छोड़कर दूर पश्िचम द्वारका में जाकर नगर और दुगर् बनाकर रहना पड़ा। आपके साम्राज्याधीश होने में दुयोर्धन और कणर्को आपिा न भी हो, पिफर भी जरासंध से इसकी आशा रखना बेकार है। बगैर यु( के जरासंध इस बात को नहीं मान सकता है। जरासंध ने आज तक पराजय का नाम तक नहीं जाना है। ऐसे अजेय पराक्रमी राजा जरासंध के जीते जी आप राजसूय यज्ञ नहीं कर सवेंफगे। उसने जो राजे - महाराजे बंदीगृह में डाल रखे हैं, किसी - न - किसी उपाय से पहले उन्हें छुड़ाना होगा। जब ये हो जाएगा, तभी राजसूय करना आपके लिए साध्य होगा।य् श्रीवृफष्ण की ये बातें सुनकर शांति - पि्रय राजा युिाष्िठर बोलेμफ्आपका कहना बिलवुफल सही है। इस विशाल संसार में कितने ही राजाओं के लिए जगह है। कितने ही नरेश अपने - अपने राज्य का शासन करते हुए इसमें संतुष्ट रह सकते हैं। आकांक्षा वह आग है, जो कभी बुझती नहीं है। इसलिए मेरी भलाइर् इसी में दिखती है कि साम्राज्याधीश बनने का विचार छोड़ दूँ और जो है उसी को लेकर संतुष्ट रहँूं।य् बाल महाभारत कथा ध् 33 युिाष्िठर की यह विनयशीलता भीमसेन को अच्छी न लगी। उसने कहाμफ्श्रीवृफष्ण की नीति - वुफशलता, मेरा शारीरिक बल और अजुर्न का शौयर् एक साथ मिल जाने पर कौन सा ऐसा काम है, जो हम नहीं कर सकते? यदि हम तीनों एक साथ चल पड़ें, तो जरासंध की शक्ित को चूर करके ही लौटेंगे। आप इस बात की शंका न करें।य् यह सुनकर श्रीवृफष्ण ने कहाμफ्यदि भीम और अजुर्न सहमत हों, तो हम तीनों एक साथ जाकर उस अन्यायी की जेल में पड़े हुए निदोर्ष राजाओं को छुड़ा सवेंफगे।य् परंतु युिाष्िठर को यह बात न जँची। उन्होंने कहाμफ्मैं तो कहूँगा कि जिस कायर् में प्राणों पर बन आने की संभावना हो, उसके विचार तक को छोड़ देना ही अच्छा होगा।य् यह सुनकर वीर अजुर्न बोल उठाμफ्यदि हम यशस्वी भरतवंश की संतान होकर भी कोइर् साहस का काम न करें, तो िाक्कार है हमें और हमारे जीवन को! जिस काम को करने की हममें सामथ्यर् है, भाइर् युिाष्िठर क्यों समझते हैं कि उसे हम न कर सवेंफगे?य् श्रीवृफष्ण अजुर्न की इन बातों से मुग्ध हो गए। बोलेμफ्धन्य हो अजुर्न! वुंफती के लाल अजुर्न से मुझे यही आशा थी।य् जब जरासंध के साथ यु( करने का निश्चय हो गया, तो श्रीवृफष्ण और पांडवों ने अपनी योजना बनाइर्। श्रीवृफष्ण, भीमसेन और अजुर्न ने वल्कल पहन लिए, हाथ में वुफशा ले ली और व्रती लोगों का - सा वेष धारण करके मगध देश के लिए रवाना हो गए। राह में सुंदर नगरों तथा गाँवों को पार करते हुए वे तीनों जरासंध की राजधानी में पहुँचे। जरासंध ने वुफलीन अतिथ्िा समझकर उनका बड़े आदर के साथ स्वागत किया। जरासंध के स्वागत का भीम और अजुर्न ने कोइर् जवाब नहीं दिया। वे दोनों मौन रहे। इस पर श्रीवृफष्ण बोलेμफ्मेरे दोनों साथ्िायों ने मौन व्रत लिया हुआ है, इस कारण अभी नहीं बोलेंगे। आधी रात के बाद व्रत खुलने पर बातचीत करेंगे।य् जरासंध ने इस बात पर विश्वास कर लिया और तीनों मेहमानों को यज्ञशाला में ठहराकर महल में चला गया। कोइर् भी ब्राह्मण अतिथ्िा जरासंध के यहाँ आता, तो उनकी इच्छा तथा सुविधा के अनुसार बातें करना व उनका सत्कार करना जरासंध का नियम था। इसके अनुसार आधी रात के बाद जरासंध अतिथ्िायों से मिलने गया, लेकिन अतिथ्िायों के रंग - ढंग देखकर मगध - नरेश के मन में वुफछ शंका हुइर्। राजा जरासंध ने कड़ककर पूछाμफ्सच - सच बताओ, तुम लोग कौन हो? ब्राह्मण तो नहीं दिखाइर् देते।य् इस पर तीनों ने सही हाल बता दिया और कहाμफ्हम तुम्हारे शत्राु हैं। तुमसे अभी द्वंद्व यु( करना चाहते हैं। हम तीनों में से किसी एक से, जिससे तुम्हारी इच्छा हो, लड़ सकते हो। हम सभी इसके लिए तैयार हैं।य् तभी भीमसेन और जरासंध में वुफश्ती शुरू हो गइर्। दोनों वीर एक - दूसरे को पकड़ते, मारते और उठाते हुए लड़ने लगे। इस प्रकार पलभर भी विश्राम किए बगैर वे तेरह दिन और तेरह रात लगातार लड़ते रहे। चैदहवें दिन जरासंध थककर शरा देर को रफक गया। पर ठीक मौका देखकर श्रीवृफष्ण ने भीम को इशारे से समझाया और भीमसेन ने प़्ाफौरन जरासंध को उठाकर चारों ओर घुमाया और उसे शमीन पर शोर से पटक दिया। इस प्रकार अजेय जरासंध का अंत हो गया। श्रीवृफष्ण और दोनों पांडवों ने उन सब राजाओं को छुड़ा लिया, जिनको जरासंध ने बंदीगृह में डाल रखा था और जरासंध के पुत्रा सहदेव को मगध की राजगद्दी पर बैठाकर इंद्रप्रस्थ लौट आए। इसके बाद पांडवों ने विजय - यात्रा की और सारे देश को महाराज युिाष्िठर की अधीनता में ले आए। जरासंध के वध के बाद पांडवों ने राजसूय यज्ञ किया। इसमें समस्त भारत के राजा आए हुए थे। जब अभ्यागत नरेशों का आदर - सत्कार करने की बारी आइर्, तो प्रश्न उठा कि अग्र - पूजा किसकी हो? सम्राट युिाष्िठर ने इस बारे में पितामह भीष्म से सलाह ली। वृ( भीष्म ने कहा कि द्वारकाधीश श्रीवृफष्ण की पूजा पहले की जाए। युिाष्िठर को भी यह बात पसंद आइर्। उन्होंने सहदेव को आज्ञा दी कि वह श्रीवृफष्ण का पूजन करे। सहदेव ने वििावत् श्रीवृफष्ण की पूजा की। वासुदेव का इस प्रकार गौरवान्िवत होना चेदि - नरेश श्िाशुपाल को अच्छा नहीं लगा। वह एकाएक उठ खड़ा हुआ और ठहाका मारकर हँस पड़ा। सारी सभा की दृष्िट जब श्िाशुपाल की ओर गइर्, तो वह उँफचे स्वर में व्यंग्य से बोलने लगाμफ्यह अन्याय की बात है कि एक मामूली से व्यक्ित को इस प्रकार गौरवान्िवत किया जाता है।य् युिाष्िठर को यों आड़े हाथों लेने के बाद श्िाशुपाल सभा में उपस्िथत राजाओं की ओर देखकर बोलाμफ्उपस्िथत राजागण! जिस दुरात्मा ने वुफचव्रफ रचकर वीर जरासंध को मरवा डाला, उसी की युिाष्िठर ने अग्र - पूजा की। इसके बाद उसे हम धमार्त्मा वैफसे कह सकते हैं? उनमें हमारा विश्वास नहीं रहा है।य् इस तरह शब्द - बाणों की बौछार कर चुकने के बाद श्िाशुपाल दूसरे वुफछ राजाओं को साथ लेकर सभा से निकल गया। राजािाराज युिाष्िठर नाराश हुए राजाओं के पीछे दौड़े गए और अनुनय - विनय करके उन्हें समझाने लगे। युिाष्िठर के बहुत समझाने पर भी श्िाशुपाल नहीं माना। उसका हठ और बाल महाभारत कथा ध् 35 घमंड बढ़ता गया। अंत में श्िाशुपाल और श्रीवृफष्ण में यु( छिड़ गया, जिसमें श्िाशुपाल मारा गया। राजसूय यज्ञ संपूणर् हुआ और राजा युिाष्िठर को राजािाराज की पदवी प्राप्त हो गइर्। शकु नि का प्रवेश 14 एक दिन युिाष्िठर ने अपने भाइयों से कहाμ फ्भाइयो! यु( की संभावना ही मिटा देने के उद्देश्य से मैं यह शपथ लेता हूँ कि आज से तेरह बरस तक मैं अपने भाइयों या किसी और बंधु को बुरा - भला नहीं कहूँगा। सदा अपने भाइर् - बंधुओं की इच्छा पर ही चलूँगा। मैं ऐसा वुफछ नहीं करूँ गा, जिससे आपस में मनमुटाव होने का डर हो, क्योंकि मनमुटाव के कारण ही झगड़े होते हैं। इसलिए मन से क्रोध को एकबारगी निकाल दूँगा। दुयोर्धन और दूसरे कौरवों की बात कभी न टालूँगा। हमेशा उनकी इच्छानुसार काम करूँगा।य् युिाष्िठर की बातें उनके भाइयों को भी ठीक लगीं। वे भी इसी निश्चय पर पहुँचे कि झगड़े - पफसाद का हमें कारण नहीं बनना चाहिए। उधर युिाष्िठर ¯चतित हो रहे थे कि कहीं कोइर् लड़ाइर् - झगड़ा न हो जाए और इधर राजसूय यज्ञ का ठाट - बाट तथा पांडवों की यश - समृि का स्मरण ही दुयोर्धन के मन को खाए जा रहा था। वह इर्ष्यार् की जलन से बेचैन हो रहा था। दुयोर्धन ने यह भी देखा कि कितने ही देशों के राजा पांडवों के परम मित्रा बने हैं। इस सबके स्मरण मात्रा से उसका दुख और भी असह्य हो उठा। पांडवों के सौभाग्य की याद करके उसकी जलन बढ़ने लगती थी। अपने महल के कोने में इसी भाँति ¯चतित और उदास भाव से वह एक रोश खड़ा हुआ था कि उसे यह भी पता न लगा कि उसकी बगल में उसका मामा शवुफनि आ खड़ा हुआ है। फ्बेटा! यों ¯चतित और उदास क्यों खड़े हो? कौन सा दुख तुमको सता रहा है?य् शवुफनि ने पूछा। दुयोर्धन लंबी साँस लेते हुए बोलाμफ्मामा, चारों भाइयों समेत युिाष्िठर ठाट - बाट से राज कर रहा है। यह सब इन आँखों से देखने पर भी मैं वैफसे शोक न करूँ? मेरा तो अब जीना ही व्यथर् मालूम होता है!य् शवुफनि दुयोर्धन को सांत्वना देता हुआ बोलाμफ्बेटा दुयोर्धन! इस तरह मन छोटा क्यों करते हो? आख्िार पांडव तुम्हारे भाइर् ही तो हैं। उनके सौभाग्य पर तुम्हें जलन नहीं होनी चाहिए। न्यायपूवर्क जो राज्य उनको प्राप्त हुआ है, उसी का तो उपभोग वे कर रहे हैं। पांडवों ने किसी का वुफछ बिगाड़ा नहीं है। जिस पर उनका अिाकार था, वही उन्हें मिला है। अपनी शक्ित से प्रयत्न करके यदि उन्होंने अपना राज्य तथासत्ता बढ़ा ली है, तो तुम जी छोटा क्यों करते हो? और पिफर पांडवों की शक्ित और सौभाग्य से तुम्हारा बिगड़ता क्या है? तुम्हें कमी किस बात की है? द्रोणाचायर्, अश्वत्थामा तथा कणर् जैसे महावीर तुम्हारे पक्ष में हंै। यही नहीं, बल्िकमैं, भीष्म, वृफपाचायर्, जयद्रथ, सोमदत्त सब तुम्हारे साथ हैं। इन साथ्िायों की सहायता से तुम सारे संसार पर विजय पा सकते हो। पिफर दुख क्यों करते हो?य् यह सुनकर दुयोर्धन बोलाμफ्जब ऐसी बात है, तो मामा जी, हम इंद्रप्रस्थ पर चढ़ाइर् ही क्यों न कर दें?य् शवुफनि ने कहाμफ्यु( की तो बात ही न करो। वह खतरनाक काम है। तुम पांडवों पर विजय पाना चाहते हो, तो यु( के बजाए चतुराइर् से काम लो। मैं तुमको ऐसा उपाय बता सकता हूँ, जिससे बगैर लड़ाइर् के ही युिाष्िठर पर सहज में विजय पाइर् जा सके।य् दुयोर्धन की आँखें आशा से चमक उठीं। बड़ी उत्सुकता के साथ पूछा, फ्मामा जी! आप ऐसा उपाय जानते हैं?य् शवुफनि ने कहाμफ्दुयोर्धन, युिाष्िठर को चैसर के खेल का बड़ा शौक है। पर उसे खेलना नहीं आता है। हम उसे खेलने के लिए न्यौता दें, तो युिाष्िठर अवश्य मान जाएगा। तुम तो जानते ही तो आपका बेटा दुयोर्धन शोक और ¯चता के कारण पीला - सा पड़ गया है।य् अंधे और बूढ़े धृतराष्ट्र को अपने बेटे पर अपार स्नेह था। शवुफनि की बातों से वह सचमुच बड़े चि¯तत हो गए। अपने बेटे को उन्होंने छाती से लगा लिया और बोलेμफ्बेटा! मुझे तो वुफछ समझ में ही नहीं आता कि तुम्हें किस बात का दुख हो सकता है। तुम्हारे पास ऐश्वयर् की कमी नहीं है। सारा संसार तुम्हारी आज्ञा पर चल रहा है। पिफर तुम्हें ¯चता काहे की?य् लेकिन शवुफनि ने धृतराष्ट्र को सलाह दी कि चैसर के खेल के लिए पांडवों को बुलाया जाए। दोनों के इस प्रकार आग्रह करने पर भी धृतराष्ट्र ने तुरंत हाँ नहीं की। वह बोलेμफ्मुझे यह उपाय ठीक नहीं जँच रहा है। मैं विदुर से भी तो सलाह कर लूँ। वह बड़ा समझदार है। मैं हमेशा से उसका कहा मानता आया हूँ। उससे सलाह कर लेने के बाद ही वुफछ तय करना ठीक होगा।य् पर दुयोर्धन को विदुर से सलाह करने की बात पसंद नहीं आइर्। धृतराष्ट्र बोलेμफ्जुए का खेल वैर - विरोध की जड़ होता है। इसलिए बेटा, मेरी तो यह राय है कि तुम्हारा यह विचार ठीक नहीं है। इसे छोड़ दो।य् दुयोर्धन अपने हठ पर दृढ़ रहता हुआ बोलाμफ्चैसर का खेल कोइर् हमने तो इर्जाद किया नहीं है। यह तो हमारे पूवर्जों का ही ँहो कि मैं ममैं खेलूँगा और युिाष्िठर को हराकर उसका सारा राज्य और ऐश्वयर्, बिना यु( के आसानी से छीनकर तुम्हारे हवाले कर दूँगा।य् इसके बाद दुयोर्धन और शवुफनि धृतराष्ट्र के पास गए। शवुफनि ने बात छेड़ीμफ्राजन्! देख्िाए जा हुआ ख्िालाड़ी हूँ। तुम्हारी ओर से चलाया हुआ है।य् दुयोर्धन के इस तरह आग्रह करने पर आख्िार धृतराष्ट्र ने घुटने टेक दिए। बेटे का आग्रह मानकर धृतराष्ट्र ने चैसर खेलने के लिए अनुमति दे दी और सभा - मंडप बनाने की भी आज्ञा दे दी, परंतु विदुर से भी उन्होंने इस बारे में गुपचुप सलाह की। विदुर बोलेμफ्राजन्, सारे वंश का इससे नाश हो जाएगा। इसके कारण हमारे वुफल के लोगों में आपसी मनमुटाव और झगड़े - पफसाद होंगे। इसकी भारी विपदा हम पर आएगी।य् धृतराष्ट्र ने कहाμफ्भाइर् विदुर! मुझे खेल का भय नहीं है। लेकिन हम क्या कर सकते चैसर का खेल व द्रौपदी की व्यथा धृतराष्ट्र की बात मानकर विदुर पांडवों के पास आए। उनको देखकर महाराज युिाष्िठर उठे और उनका यथोचित स्वागत - सत्कार किया। विदुर आसन पर बैठते हुए शांति से बोलेμफ्हस्ितनापुर में खेल के लिए एक सभा - मंडप बनाया गया है, जो तुम्हारे मंडप के समान ही सुंदर है। राजा धृतराष्ट्र की ओर से उसे देखने चलने के लिए मैं तुम लोगों को न्यौता देने आया हूँ। राजा धृतराष्ट्र की इच्छा है कि तुम सब भाइयों सहित वहाँ आओ, उस मंडप को देखो और दो हाथ चैसर भी खेल जाओ।य् युिाष्िठर ने कहाμफ्चाचा जी! चैसर का खेल अच्छा नहीं है। उससे आपस में झगड़े पैदा होते हैं। समझदार लोग उसे पसंद नहीं करते हैं। लेकिन इस मामले में हम तो आप ही के आदेशानुसार चलनेवाले हैं। आपकी सलाह क्या है?य् विदुर बोलेμफ्यह तो किसी से छिपा नहीं है कि चैसर का खेल सारे अनथर् की जड़ होता है। मैंने तो भरसक कोश्िाश की थी कि इसे न होने बाल महाभारत कथा ध् 37 हैं? सो तुम ही युिाष्िठर के पास जाओ और उसे मेरी तरप़्ाफ से खेल के लिए न्यौता देकर बुला लाओ।य् अपने बेटे पर उनका असीम स्नेह उनकी कमशोरी थी और यही कारण था कि उन्होंने बेटे की बात मान ली। दूँ, ¯कतु राजा ने आज्ञा दी है कि तुम्हें खेल के लिए न्यौता दे ही आउँफ। इसलिए आना पड़ा। अब तुम्हारी जो इच्छा हो करो।य् राजवंशों की रीति के अनुसार किसी को भी खेल के लिए बुलावा मिल जाने पर उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता था। इसके अलावा युिाष्िठर को डर था कि कहीं खेल में न जाने को ही धृतराष्ट्र अपना अपमान न समझ लें और यही बात कहीं लड़ाइर् का कारण न बन जाए। इन्हीं सब विचारों से पे्ररित होकर समझदार युिाष्िठर ने न्यौता स्वीकार कर लिया, यद्यपि विदुर ने उन्हें चेता दिया था। युिाष्िठर अपने परिवार के साथ हस्ितनापुर पहुँच गए। नगर के पास ही उनके लिए एक सुंदर विश्राम - गृह बना था। वहाँ ठहरकर उन्होंने आराम किया। अगले दिन सुबह नहा - धोकर सभा - मंडप में जा पहुँचे। वुफशल समाचार पूछने के बाद शवुफनि ने कहाμफ्युिाष्िठर, खेल के लिए चैपड़ बिछा हुआ है। चलिए, दो हाथ खेल लें।य् युिाष्िठर बोलेμफ्राजन्, यह खेल ठीक नहीं है! बाशी जीत लेना साहस का काम नहीं है। जुआ खेलना धोखा देने के समान है। आप तो यह सब बातें जानते ही हैं।य् वह बोलाμफ्आप भी क्या कहते हैं, महाराज! यह भी कोइर् धोखे की बात है! हाँ, यह कहिए कि आपको हार जाने का डर लग रहा है।य् युिाष्िठर वुफछ गरम होकर बोलेμफ्राजन्! ऐसी बात नहीं है। अगर मुझे खेलने को कहा गया, तो मैं ना नहीं करूँ गा। आप कहते हैं, तो मैं तैयार हूँ। मेरे साथ खेलेगा कौन?य् दुयोर्धन तुरंत बोल उठाμफ्मेरी जगह खेलेंगे तो मामा शवुफनि ¯कतु दाँव लगाने के लिए जो धन - रत्नादि चाहिए, वह मैं दूँगा।य् युिाष्िठर बोलेμफ्मेरी राय यह है कि किसी एक की जगह दूसरे को नहीं खेलना चाहिए। यह खेल के साधारण नियमों के विरफ( है।य् फ्अच्छा तो अब दूसरा बहाना बना लिया।य् शवुफनि ने हँसते हुए कहा। युिाष्िठर ने कहाμफ्ठीक है। कोइर् बात नहीं, मैं खेलूँगा।य् और खेल शुरू हुआ। सारा मंडप दशर्कों से खचाखच भरा हुआ था। द्रोण, भीष्म, वृफप, विदुर, धृतराष्ट्र जैसे वयोवृ( भी उपस्िथत थे। वे उसे रोक नहीं सके थे। उनके चेहरों पर उदासी छाइर् हुइर् थी। अन्य कौरव राजवुफमार बड़े चाव से खेल को देख रहे थे। पहले रत्नों की बाशी लगी, पिफर सोने - चाँदी के खशानों की। उसके बाद रथों और घोड़ों की। तीनों दाँव युिाष्िठर हार गए। शवुफनि का पासा मानो उसके इशारों पर चलता था। खेल में युिाष्िठर बारी - बारी से अपनी गाएँ, भेड़, बकरियाँ, दास - दासी, रथ, घोड़े, सेना, देश, देश की प्रजा सब खो बैठे। भाइयों के शरीरों पर जो आभूषण और वस्त्रा थे, उनको भी बाशी पर लगा दिया और हार गए। फ्और वुफछ बाकी है?य् शवुफनि ने पूछा। फ्यह साँवले रंग का सुंदर युवक, मेरा भाइर् नवुफल खड़ा है। वह भी मेरा ही धन है। इसकी बाशी लगाता हूँ। चलो!य् युिाष्िठर ने जोश के साथ कहा। शवुफनि ने कहाμफ्अच्छा तो यह बात है! तो यह लीजिए। आपका प्यारा राजवुफमार अब हमारा हो गया!य् कहते - कहते शवुफनि ने पासा पेंफका और बाशी मार ली। युिाष्िठर ने कहाμफ्यह मेरा भाइर् सहदेव, जिसने सारी विद्याओं का पार पा लिया है। इसकी बाशी लगाना उचित तो नहीं है, पिफर भी लगाता हूँ। चलो, देखा जाएगा।य् फ्यह चला और वह जीता,य् कहते हुए शवुफनि ने पासा पेंफका। सहदेव को भी युिाष्िठर गँवा बैठे। अब दुरात्मा शवुफनि को आशंका हुइर् कि कहीं युिाष्िठर खेल बंद न कर दें। बोलाμ फ्युिाष्िठर, शायद आपकी निगाह में भीमसेन और अजुर्न माद्री के बेटों से श्यादा मूल्यवान हैं। सो उनको बाशी पर आप लगाएँगे नहीं।य् युिाष्िठर ने कहाμफ्मूखर् शवुफनि! तुम्हारी चाल यह मालूम होती है कि हम भाइयों में आपस में पूफट पड़ जाए! सो तुम क्या जानो कि हम पाँचों भाइयों के संबंध क्या हैं? पराक्रम में जिसका कोइर् सानी नहीं है, उस अपने भाइर् अजुर्न को मैं दाँव पर लगाता हूँ। चलो।य् शवुफनि यही तो चाहता था। फ्तो यह चलाय्, कहते हुए पासा पेंफका और अजुर्न भी हाथ से बाल महाभारत कथा ध् 39 निकल गया। असीम दुदैर्व मानो युिाष्िठर को बेबस कर रहा था और उन्हें पतन की ओर बलपूवर्क लिए जा रहा था। वह बोलेμफ्राजन्! शारीरिक बल में संसारभर में जिसका कोइर् जोड़ीदार नहीं है, अपने उस भाइर् को मैं दाँव पर लगाता हूँ।य् यह कहते - कहते युिाष्िठर भीमसेन से भी हाथ धो बैठे। दुष्टात्मा शवुफनि ने तब भी नहीं छोड़ा। पूछाμफ्और वुफछ?य् युिाष्िठर ने कहाμफ्हाँ! यदि इस बार तुम जीत गए, तो मैं खुद तुुम्हारे अधीन हो जाउँफगा।य् फ्लो, यह जीता!य् कहते हुए शवुफनि ने पासा पेंफका और यह बाशी भी ले गया। इस पर शवुफनि सभा के बीच उठ खड़ा हुआ और पाँचों पांडवों को एक - एक करके पुकारा और घोषणा की कि वे अब उसके गुलाम हो चुके हैं। शवुफनि को दाद देनेवालों के हषर्नाद से और पांडवों की इस दुदर्शा पर तरस खानेवालों के हाहाकार से सारा सभा - मंडप गूँज उठा। सभा में इस तरह खलबली मचने के बाद शवुफनि ने युिाष्िठर से कहाμफ्एक और चीश है, जो तुमने अभी हारी नहीं है। उसकी बाशी लगाओ, तो तुम अपने - आपको भी छुड़ा सकते हो। अपनी पत्नी द्रौपदी को तुम दाँव पर क्यों नहीं लगाते?य् और जुए के नशे में चूर युिाष्िठर के मुँह से निकल पड़ाμफ्चलो अपनी पत्नी द्रौपदी की भी मैंने बाशी लगाइर्!य् उनके मुँह से यह निकल तो गया, पर उसके परिणाम को सोचकर वह विकल हो उठे कि ‘हाय यह मैंने क्या कर डाला!’ युिाष्िठर की इस बात पर सारी सभा में एकदम हाहाकार मच गया। जहाँ वृ( लोग बैठे थे, उधर से िाक्कार की आवाशें आने लगीं। लोग बोलेμफ्छिः - छिः, वैफसा घोर पाप है!य् वुफछ ने आँसू बहाए और वुफछ लोग परेशानी के मारे पसीने से तर - ब - तर हो गए। दुयोर्धन और उसके भाइयों ने बड़ा शोर मचाया। पर युयुत्सु नाम का धृतराष्ट्र का एक बेटा शोक संतप्त हो उठा और ठंडी आह भरकर उसने सिर झुका लिया। शवुफनि ने पासा पेंफककर कहाμफ्यह लो, यह बाशी भी मेरी ही रही।य् बस, पिफर क्या था? दुयोर्धन ने विदुर को आदेश देते हुए कहाμफ्आप अभी रनवास में जाएँ और द्रौपदी को यहाँ ले आएँ। उससे कहें कि जल्दी आए।य् विदुर बोलेμफ्मूखर्! नाहक क्यों मृत्यु को न्यौता देने चला है। अपनी विषम परिस्िथति का तुम्हें ज्ञान नहीं है।य् दुयोर्धन को यों पफटकारने के बाद विदुर ने सभासदों की ओर देखकर कहाμफ्अपने को हार चुकने के बाद युिाष्िठर को कोइर् अिाकार नहीं था कि वह पांचालराज की बेटी को दाँव पर लगाए।य् विदुर की बातों से दुयोर्धन बौखला उठा। अपने सारथी प्रातिकामी को बुलाकर कहाμफ्विदुर तो हमसे जलते हैं और पांडवों से डरते हैं। रनवास में जाओ और द्रौपदी को बुला लाओ।य् आज्ञा पाकर प्रातिकामी रनवास में गया और द्रौपदी से बोलाμफ्दु्रपदराज की पुत्राी! चैसर के खेल में युिाष्िठर आपको दाँव में हार बैठे हैं। आप अब राजा दुयोर्धन के अधीन हो गइर् हैं। राजा की आज्ञा है कि अब आपको धृतराष्ट्र के महल में दासी का काम करना है। मैं आपको ले जाने के लिए आया हूँ।य् सारथी ने जुए के खेल में जो वुफछ हुआ था, उसका सारा हाल कह सुनाया। वह प्रातिकामी से बोलीμफ्रथवान! जाकर उन हारनेवाले जुए के ख्िालाड़ी से पूछो कि पहले वह अपने को हारे थे या मुझे? सारी सभा में यहप्रश्न उनसे करना और जो उत्तर मिले, वह मुझे आकर बताओ। उसके बाद मुझे ले जाना।य् प्रातिकामी ने जाकर भरी सभा के सामने युिाष्िठर से वही प्रश्न किया, जो द्रौपदी ने उसे बताया था। इस पर दुयोर्धन ने प्रातिकामी से कहाμफ्द्रौपदी से जाकर कह दो कि वह स्वयं ही आकर अपने पति से यह प्रश्न कर ले।य् प्रातिकामी दोबारा रनवास में गया और द्रौपदी के आगे झुककर बड़ी नम्रता से बोलाμफ्देवि! दुयोर्धन की आज्ञा है कि आप सभा में आकर स्वयं ही युिाष्िठर से प्रश्न कर लें।य् द्रौपदी ने कहाμफ्नहीं, मैं वहाँ नहीं जाउँफगी। अगर युिाष्िठर जवाब नहीं देते, तो सभा में जो सज्जन विद्यमान हैं, उन सबको तुम मेरा प्रश्नजाकर सुनाओ और उसका उत्तर आकर मुझे बताओ।य् प्रातिकामी लौटकर पिफर सभा में गया और सभासदों को द्रौपदी का प्रश्न सुनाया। यह सुनकर दुयोर्धन झल्ला उठा। अपने भाइर् दुःशासन से बोलाμफ्दुःशासन, यह सारथी भीमसेन से डरता मालूम होता है। तुम्हीं जाकर उस घमंडी औरत को ले आओ।य् दुरात्मा दुःशासन के लिए इससे अच्छी बात और क्या हो सकती थी। उसने द्रौपदी के गुँथे हुए बाल बिखेर डाले, गहने तोड़ - पफोड़ दिए और उसके बाल पकड़कर बलपूवर्क घसीटता हुआ सभा की ओर ले जाने लगा। द्रौपदी विकल हो उठी। द्रौपदी की ऐसी दीन अवस्था देखकर धृतराष्ट्र के एक बेटे विकणर् को बड़ा दुख हुआ। उससे नहीं रहा गया। वह बोलाμफ्उपस्िथत वीरो! सुनिए, चैसर के खेल के लिए युिाष्िठर को धोखे से बुलावा दिया गया था। वह धोखा खाकर इस जाल में पँफस गए और अपनी स्त्राी तक की बाशी लगा दी। यह सारा कायर् न्यायोचित नहीं है। दूसरी बात यह है कि द्रौपदी अकेले युिाष्िठर की ही पत्नी नहीं है, बल्िक पाँचों पांडवों की पत्नी है। इसलिए उसको दाँव पर लगाने का अकेले युिाष्िठर को कोइर् हक नहीं था। इसके अलावा खास बात यह है कि एक बार जब युिाष्िठर खुद को ही दाँव में हार गए थे, तो उनको द्रौपदी की बाशी लगाने का अिाकार हीक्या था? मेरी एक और आपिा यह है कि शवुफनि ने द्रौपदी का नाम लेकर युिाष्िठर को उसकी बाशी लगाने के लिए उकसाया था। लोगों ने चैसर के खेल के जो नियम बना रखें हैं, यह उनके बिलवुफल विरफ( है। इन सब बातों के आधार पर मैं इस सारे खेल को नियम - विरफ( ठहराता हूँ। मेरी राय में द्रौपदी नियमपूवर्क नहीं जीती गइर् है।य् युवक विकणर् के भाषण से वहाँ उपस्िथत लोगों के विवेक पर से भ्रम का परदा हट गया। सभा में बड़़ा कोलाहल मच गया। यह सब देखकर कणर् उठ खड़ा हुआ और वु्रफ( होकर बोलाμफ्विकणर्, अभी तुम बच्चे हो। सभा में इतने बड़े - बूढ़ों के होते हुए, तुम वैफसे बोल पड़े! तुम्हें यहाँ बोलने और तवर्फ - वितवर्फ करने का कोइर् अिाकार नहीं हैं।य् यह देखकर दुःशासन द्रौपदी के पास गया और उसका वस्त्रा पकड़कर खींचनंे लगा। ज्यों - ज्यों वह खींचता गया त्यों - त्यों वस्त्रा भी बढ़ता गया। अंत में खींचते - खींचते दुःशासन की दोनों भुजाएँ बाल महाभारत कथा ध् 41 थक गईं। हाँपफता हुआ वह थकान से चूर होकर बैठ गया। सभा के लोगों में वंफपवंफपी - सी पैफल गइर् और धीमे स्वर में बातें होने लगीं। इतने में भीमसेन उठा। उसके होंठ मारे व्रफोध के पफड़क रहे थे। उँफचे स्वर में उसने यह भयानक प्रतिज्ञा की, फ्उपस्िथत सज्जनो! मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि जब तक, भरत - वंश पर ब‘ा लगानेवाले इस दुरात्मा दुःशासन की छाती चीर न लूँगा, तब तक इस संसार को छोड़कर नहीं जाउँॅफगा।य् भीमसेन की इस प्रतिज्ञा को सुनकर उपस्िथत लोगों के हृदय भय के मारे थरार् उठे। इन सब लक्षणों से धृतराष्ट्र ने समझ लिया कि यह सब ठीक नहीं हुआ है। उन्होंने अनुभव किया कि जो वुफछ हो चुका है, उसका परिणाम शुभ नहीं होगा। यह उनके पुत्रों और वुफल के विनाश का कारण बन जाएगा। उन्होंने परिस्िथति को सँभालने के इरादे से द्रौपदी को बड़े प्रेम से अपने पास बुलाया और शांत किया तथा सांत्वना दी। उसके बाद वह युिाष्िठर की ओर मुड़कर बोलेμफ्युिाष्िठर तुम तो अजातशत्राु हो। उदार - हृदय के भी हो। दुयोर्धन की इस वुफचाल को क्षमा करो और इन बातों को मन से निकाल दो औरभूल जाओे। अपना राज्य तथा संपिा आदि सब ले जाओ और इंद्रप्रस्थ जाकर सुखपूवर्क रहो!य् धृतराष्ट्र की इन मीठी बातों को सुनकर पांडवों के दिल शांत हो गए और यथोचित अभ्िावादनादि के उपरांत द्रौपदी और वुंफती सहित सब पांडव इंद्रप्रस्थ के लिए विदा हो गए। पांडवों के विदा हो जाने के बाद कौरवों में बड़ी हलचल मच गइर्र्। पांडवों के इस प्रकार अपने पंजे से साप़्ाफ निकल जाने के कारण कौरव बड़ा व्रफोध - प्रदशर्न करने लगे और दुःशासन तथा शवुफनि के उकसाने पर दुयोर्धन पुनः अपने पिता धृतराष्ट्र के सिर पर सवार हो गया और पांडवों को खेल के लिए एक बार और बुलाने को उनको राशी कर लिया। युिाष्िठर को खेल के लिए बुलाने को पिफर दूत भेजा गया। पिछली घटना के कारण दुखी होते हुए भी युिाष्िठर को यह निमंत्राण स्वीकार करना पड़ा। युिाष्िठर हस्ितनापुर लौटे खेल में यह शतर् थी कि हारा हुआ दल अपने भाइयों के साथ बारह वषर् तक वनवास करेगा तथा उसके उपरांत एक वषर् अज्ञातवास में रहेगा। यदि इस एक वषर् में उनका पता चल जाएगा, तो उन सबको बारह वषर् का वनवास पिफर से भोगना होगा। इस बार भी युिाष्िठर हार गए और पांडव अपने किए वादे के अनुसार वन में चले गए। बाल महाभारत कथा ध् 43 धृतराष्ट्र की चितां16 जब द्रौपदी को साथ लेकर पांडव वन की ओर जाने लगे थे, तो धृतराष्ट्र ने विदुर को बुला भेजा और पूछाμफ्विदुर, पांडु के बेटे और द्रौपदी वैफसे जा रहे हैं? मैैं वुफछ देख नहीं सकता हूँ। तुम्हीं बताओ, वैफसे जा रहे हैं वे?य् विदुर ने कहाμफ्वुंफती - पुत्रा युिाष्िठर, कपड़े से चेहरा ढककर जा रहे हैं। भीमसेन अपनी दोनों भुजाओं को निहारता, अजुर्न हाथ में वुफछ बालू लिए उसे बिखेरता, नवुफल और सहदेव सारे शरीर पर धूल रमाए हुए, व्रफमशः युिाष्िठर के पीछे - पीछे जा रहे हैं। द्रौपदी ने बिखरे हुए केशों से सारा मुख ढक लिया है और आँसू बहाती हुइर्, युिाष्िठर का अनुसरण कर रही है।य् यह सुनकर धृतराष्ट्र की आशंका और ¯चता पहले से भी अिाक प्रबल हो उठी। विदुर बार - बार धृतराष्ट्र से आग्रह करते थे कि आप पांडवों के साथ संिा कर लें। विदुर अकसर इसी भाँति धृतराष्ट्र को उपदेश दिया करते थे। विदुर की बुिमता का धृतराष्ट्र पर भारी प्रभाव था। इसलिए शुरू - शुरू में वह विदुर की बातें सुन लिया करते थे। परंतु बार - बार विदुरकी ऐसी ही बातें सुनते - सुनते वह ऊब गए। एक दिन विदुर ने पिफर वही बात छेड़ी, तो धृतराष्ट्र झुँझलाकर बोलेμफ्विदुर! मुझे अब तुम्हारी सलाह की शरूरत नहीं है। अगर चाहो तो तुम भी पांडवों के पास चले जाओ।य् धृतराष्ट्र यह कहकर बड़े क्रोध के साथविदुर के उत्तर वफी प्रतीक्षा किए बिना अंतःपुर में चले गए। विदुर ने मन में कहा कि अब इस वंश का सवर्नाश निश्िचत है। उन्होंने तुरंत अपना रथ जुतवाया और उस पर चढ़कर जंगल में उस ओर तेशी से चल पड़े, जहाँ पांडव अपने वनवास का काल व्यतीत कर रहे थे। विदुर के चले जाने पर धृतराष्ट्र और भी ¯चतित हो गए। वह सोचने लगे कि मैंने यह क्या कर दिया। विदुर को भगाकर मैंने भारी भूल कर दी। यह सोचकर धृतराष्ट्र ने संजय को बुलाया और कहाμफ्संजय! मैंने अपने पि्रय विदुर को बहुत बुरा - भला कह दिया था, इससे गुस्सा होकर वह वन में चला गया है। तुम जाकर उसे किसी तरह समझा - बुझाकर मेरे पास वापस ले आओ।य् धृतराष्ट्र की बात मानकर संजय जंगल में पांडवों के आश्रम में जा पहुँचे। संजय ने विदुर से बड़ी नम्रता के साथ कहाμफ्धृतराष्ट्र अपनी भूल पर पछता रहे हैं। आप यदि वापस नहीं लौटेंगे, तो वह अपने प्राण छोड़ देंगेे। वृफपया अभी लौट चलिए।य् यह बात सुनकर विदुर युिाष्िठर आदि से विदा लेकर हस्ितनापुर के लिए चल पडे़। हस्ितनापुर पहुँचकर जब धृतराष्ट्र के सामने गए, तो धृतराष्ट्र ने उन्हें बड़े प्रेम से गले लगा लिया और गद्गद स्वर में बोलेμफ्निदोर्ष विदुर! मैं उतावली में जो बुरा - भला कह बैठा, उसका बुरा मत मानना और मुझे क्षमा कर देना।य् इसी तरह एक बार मह£ष मैत्रोय धृतराष्ट्र के दरबार में पधारे। राजा ने उनका समुचित आदर - सत्कार करके प्रसन्न किया। पिफर मह£ष से हाथ जोड़कर पूछाμफ्वुफरुजंागल के वन में आपने मेरे प्यारे पुत्रा वीर पांडवों को तो देखा होगा! वे वुफशल से तो हैं!य् मह£ष मैत्रोय ने कहाμफ्राजन्, काम्यक वन में संयोग से युिाष्िठर से मेरी भेंट हो गइर् थी। वन के दूसरे )ष्िा - मुनि भी उनसे मिलने उनके आश्रम में आए थे। हस्ितनापुर में जो वुफछ हुआ था, उसका सारा हाल उन्होंने मुझे बताया था। यही कारण हैं कि मैं आपके यहाँ आया हूँ। आपके और भीष्म के रहते ऐसा नहीं होना चाहिए था।य् इस अवसर पर दुयोर्धन भी सभा में मौजूद था। मुनि ने उसकी ओर देखकर कहाμफ्राजवुफमार, तुम्हारी भलाइर् के लिए कहता हूँ, सुनो! पांडवों को धोखा देने का विचार छोड़ दो। उनसे वैर मोल न लो। उनके साथ संिा कर लो। इसी में तुम्हारी भलाइर् है।य् )ष्िा ने यांे मीठी बातों से दुयोर्धन को समझाया, पर िाद्दी व नासमझ दुयोर्धन ने उसकी ओर देखा तक नहीं। वह वुफछ बोला भी नहीं, बल्िक अपनी जाँघ पर हाथ ठोकता और पैर के अँगूठे से शमीन वुफरेदता, मुसकराता हुआ खड़ा रहा। दुयोर्धन की इस ढिठाइर् को देखकर मह£ष बड़े क्रोिात हुए। उन्होंने कहाμफ्दुयोर्धन! याद रखो, अपने घमंड का पफल तुम अवश्य पाओगे।य् इसी बीच हस्ितनापुर में हुइर् घटनाओं की खबर श्रीवृफष्ण को लगी। उन्हें यह पता चला कि पाँचों पांडव द्रौपदी समेत वन में चले गए हैं। यह खबर पाते ही वह प़्ाफौरन उस वन को चल पड़े जहाँ पांडव ठहरे हुए थे। श्रीवृफष्ण जब पांडवों से भेंट करने के लिए जाने लगे, तो उनके साथ वैफकेय, भोज और वृष्िट जाति के नेता, चेदिराज धृष्टकेतु आदि भी गए। इन लोगों के साथ पांडवों का बड़ा स्नेह - संबंध था और वे उनको बड़ी श्र(ा से देखते थे। द्रौपदी श्रीवृफष्ण से मिली। श्रीवृफष्ण को देखते ही उसकी आँखों से अविरल अश्रुधर बह चली। बड़ी मुश्िकल से वह बोलीμफ्इस तरह अपमानित होने के बाद मेरा जीना ही बेकार है। मेरा कोइर् नहीं रहा और आप भी मेरे न रहे!य् यह कहते - कहते द्रौपदी की बड़ी - बड़ी आँखों से गरम - गरम आँसुओं की धारा बहने लगी। वह आगे न बोल सकी। करुण स्वर में विलाप करती हुइर् द्रौपदी को श्रीवृफष्ण ने बहुत समझाया और धीरज बँधाया। वह बोलेμफ्बहन द्रौपदी! जिन्होंने तुम्हारा अपमान किया है, उन सबकी लाशें यु( के मैदान में खून से लथपथ होकर पड़ेंगी। तुम शोक न करो। मैं वचन देता हूँ कि पांडवों की हर प्रकार से सहायता करूँ गा। यह भी निश्चय मानो कि तुम साम्राज्ञी के पद को पिफर सुशोभ्िात करोगी।य् धृष्टद्युम्न ने भी बहन को सांत्वना दी और समझाते हुए कहा कि श्रीवृफष्ण की प्रतिज्ञा अवश्य पूरी होगी। इसके बाद श्रीवृफष्ण पांडवों से विदा हुए। साथ में अजर्ुन की पत्नी सुभद्रा और उसके पुत्रा अभ्िामन्यु को भी वे द्वारकापुरी लेते गए। द्रौपदी के पुत्रों को लेकर धृष्टद्युम्न पांचाल देश चला गया। बाल महाभारत कथा ध् 45 भीम और हनुमान17 सुहावना मौसम था। द्रौपदी आश्रम के बाहर खड़ी थी। इतने में एक सुंदर पूफल हवा में उड़ता हुआ उसके पास आ गिरा। द्रौपदी ने उसे उठा लिया और भीमसेन के पास जाकर बोलीμफ्क्या तुम जाकर ऐसे ही वुफछ और पूफल ला सकोगे?य् यह कहती हुइर् द्रौपदी हाथ में पूफल लिए युिाष्िठर के पास दौड़ी गइर्। द्रौपदी की इच्छा पूरी करने के लिए भीमसेन उस पूफल की तलाश में निकल पड़ा। चलते - चलते वह पहाड़ की घाटी में जा पहुँचा, जहाँ केले के पेड़ों का एक विशाल बगीचा लगा हुआ था। बगीचे के बीच एक बड़ा भारी बंदर रास्ता रोके लेटा हुआ था। बंदर ने भीम की तरप़्ाफ देखकर कहाμफ्मैं वुफछ अस्वस्थ हूँ। इसलिए लेटा हुआ हूँ। शरा आँख लगी थी, तो तुमने आकर नींद खराब कर दी। मुझे क्यों जगाया तुमने?य् एक बंदर के इस प्रकार मनुष्य जैसा उपदेश देने पर भीमसेन को बड़ा व्रफोध आया और बोलाμफ्जानते हो, मैं कौन हूँ? मैं वुफरफवंश का वीर, वुंफती का बेटा हूँ। मुझे रोको मत! मेरे रास्ते से हट जाओ और मुझे आगे जाने दो।य् बंदर बोलाμफ्देखो भाइर्, मैं बूढ़ा हूँ। कठिनाइर् से उठ - बैठ सकता हूँ। ठीक है, यदि तुम्हें आगे बढ़ना ही है, तो मुझे लाँघकर चले जाओ।य् भीमसेन ने कहाμफ्किसी जानवर को लाँघना अनुचित कहा गया है। इसी से मैं रफक गया, नहीं तो मैं कभी का तुम्हें एक ही छलाँग में लाँघकर चला गया होता।य् बंदर ने कहाμफ्भाइर्, मुझे शरा बताना कि वह हनुमान कौन था, जो समुद्र को लाँघ गया था।य् भीमसेन शरा कड़ककर बोलाμफ्क्या कहा? तुम महावीर हनुमान को नहीं जानते? उठकर रास्ता दे दो, नाहक मृत्यु को न्यौता मत दो।य् बंदर बड़े करुण स्वर में बोलाμफ्हे वीर! शांत हो जाओ! इतना व्रफोध न करो। यदि मुझे लाँघना तुम्हें अनुचित लगता हो, तो मेरी इस पँूछ को हटाकर एक ओर कर दो और चले जाओ।य् भीमसेन ने बंदर की पूँछ एक हाथ से पकड़ ली, लेकिन आश्चयर्! भीम ने पूँछ पकड़ तो लीऋ पर वह उससे शरा भी नहीं हिलीμउठने की तो कौन कहे! उसे बड़ा ताज्जुब होने लगा कि यह बात क्या है? उसने दोनों हाथों से पूँछ पकड़कर खूब शोर लगाया। ¯कतु पूँछ वैसी - की - वैसी ही धरी रही। भीम बड़ा लज्िजत हुआ। उसका गवर् चूर हो गया। उसे बड़ा विस्मय होने लगा कि मुझसे अिाक ताकतवर यह कौन है! भीम के मन में बलिष्ठों के लिए बड़ी श्र(ा थी। वह नम्र हो गया। बोलाμफ्मुझे क्षमा करें। आप कौन हैं?य् हनुमान ने कहाμफ्हे पांडुवीर! हनुमान मैं ही हूँ।य् फ्वानर - श्रेष्ठ! मुझसे बढ़कर भाग्यवान और कौन होगा, जो मुझे आपके दशर्न प्राप्त हुए।य् कहकर भीमसेन ने हनुमान को दंडवत प्रणाम किया। मारुति ने आशीवार्द देते हुए कहाμफ्भीम! यु( के समय तुम्हारे भाइर् अजुर्न के रथ पर उड़नेवाली ध्वजा पर मैं विद्यमान रहूँगा। विजय तुम्हारी ही होगी।य् इसके बाद हनुमान ने भीमसेन को पास के झरने में ख्िाले हुए सुगंिात पूफल दिखाए। पूफलों को देखते ही भीमसेन को द्रौपदी का स्मरण हो आया। उसने जल्दी से पूफल तोड़े और वेेग से आश्रम की ओर लौट चला। द्वेष करनेवाले का जी नहीं भरता पांडवों के वनवास के दिनों में कइर् ब्राह्मण उनके आश्रम गए थे। वहाँ से लौटकर वे हस्ितनापुर पहुँचे और धृतराष्ट्र को पांडवों के हाल - चाल सुनाए। धृतराष्ट्र ने जब यह सुना कि पांडव वन में बड़ी तकलीपेंफ उठा रहे हैं, तो़उनके मन में ¯चता होने लगी। लेकिन दुयोर्धन और शवुफनि वुफछ और ही सोचते थे। कणर् और शवुफनि दुयोर्धन की चापलूसी किया करते थे, ¯कतु दुयोर्धन को भला इतने से संतोष कहाँ होता! वह कणर् से कहताμफ्कणर्, मैं तो चाहता हूँ कि पांडवों को मुसीबतों में पड़े हुए अपनी आँखों से देखूँ। इसलिए तुम और मामा शवुफनि वुफछ ऐसा उपाय करो कि वन में जाकर पांडवों को देखने की पिता जी से अनुमति मिल जाए।य् कणर् बोलाμफ्द्वैतवन में वुफछ बस्ितयाँ है,ंजो हमारे अधीन हैं। हर साल उन बस्ितयों में जाकर चैपायों की गणना करना राजवुफमारों का ही काम होता है। बहुत समय से यह प्रथा चली आ रही है। इसलिए उस बहाने हम पिता जी की अनुमति आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।य् कणर् अपनी बात पूरी तरह से कह भी न पाया था कि दुयोर्धन और शवुफनि मारे खुशी के उछल पड़े। राजवुफमारों ने भी धृतराष्ट्र से आग्रहपूवर्क प्राथर्ना की कि वह इसकी अनुमति दे दें। ¯कतु धृतराष्ट्र न माने। दुयोर्धन ने विश्वास दिलाया कि पांडव जहाँ होंगे, वहाँ वे सब नहीं जाएँगे और बड़ी सावधानी से काम लेंगे। विवश होकर धृतराष्ट्र ने अनुमति दे दी। एक बड़ी सेना को साथ लेकर कौरव द्वैतवन के लिए रवाना हुए। दुयोर्धन और कणर् पूफले नहीं समाते थे। उन्होंने पहुँचने पर अपने डेरे ऐसे स्थान पर लगाए, जहाँ से पांडवों का आश्रम चार कोस की दूरी पर ही था। गंधवर्राज चित्रासेन भी अपने परिवार के साथ उसी जलाशय के तट पर डेरा डाले हुए था। दुयोर्धन के अनुचर जलाशय के पास गए और किनारे पर तंबू गाड़ने लगे। इस पर गंधवर्राज के नौकर बहुत बिगड़े और दुयोर्धन के अनुचरों की उन्होंने खूब खबर ली। वे वुफछ न कर सके और अपने प्राण लेकर भाग खड़े हुए। दुयोर्धन को जब इस बात का पता चला, तो उसके व्रफोध की सीमा न रही। वह अपनी सेना लेकर तालाब की ओर बढ़ा। वहाँ पहुँचना था कि गंधवो± और कौरवों की सेनाएँ आपस में भ्िाड़ गईं। घोर संग्राम छिड़ गया। यहाँ तक कि कणर् जैसे महारथ्िायों के भी रथ और अस्त्रा चूर - चूर हो गए और वे उलटे पाँव भाग खड़े हुए। अकेला दुयोर्धन लड़ाइर् के मैदान में अंत तक डटा रहा। गंधवर्राज चित्रासेन ने उसे पकड़ लिया। पिफर रस्सी से बाँधकर उसको अपने रथ पर बैठा लिया और शंख बजाकर विजय - घोष किया। जब युध्िष्िठर ने सुना कि दुयोर्ध्न व उसके साथी अपमानित हुए हैं, तो उसने गंभीर स्वर में कहाμफ्भाइर् भीमसेन! ये हमारे ही वुफटंुबी हैं। तुम अभी जाओ और किसी तरह अपने बंधुओं को गंधवो± के बंधन से छुड़ा लाओ।य् युध्िष्िठर के आग्रह पर भीम और अजुर्न ने कौरवों की बिखरी हुइर् सेना को इकऋा किया और वे गंध्वो± पर टूट पड़े। अंततः गंध्वर्राज ने कौरवों को बंध्नमुक्त कर दिया। इस प्रकार अपमानित कौरव हस्ितनापुर लौट गए। पांडवों के वनवास के समय दुयोर्धन की तो इच्छा राजसूय यज्ञ करने की थी, ¯कतु पंडितों ने कहा कि धृतराष्ट्र और युिाष्िठर के रहते उसे राजसूय यज्ञ करने का अिाकार नहीं है। तब ब्राह्मणों की सलाह मानकर दुयोर्धन ने वैष्णव नामक यज्ञ करके ही संतोष कर लिया। इसी समय की बात है कि मह£ष दुवार्सा अपने दस हशार श्िाष्यों को साथ लेकर दुयोर्धन के राजभवन में पधारे। दुयोर्धन के सत्कार से )ष्िा बहुत प्रसन्न हुए और कहाμफ्वत्स, कोइर् वर चाहो, तो माँग लो।य् दुयोर्धन बोलाμफ्मुनिवर! प्राथर्ना यही है कि जैसे आपने श्िाष्यों - समेत अतिथ्िा बनकर मुझे अनुगृहीत किया है, वैसे ही वन में मेरे भाइर् पांडवों के यहाँ जाकर उनका भी सत्कार स्वीकार करें और पिफर एक छोटी सी बात मेरे लिए करने की वृफपा करें। वह यह कि आप अपने श्िाष्यों समेत ठीक ऐेसे समय युिाष्िठर के आश्रम में जाएँ, जब द्रौपदी पांडवों एवं उनके परिवार को भोजन करा चुकी हों और जब सभी लोग आराम से बैठे विश्राम कर रहे हों।य् उन्होंने दुयोर्धन की प्राथर्ना तुरंत मान ली। दुवार्सा )ष्िा अपने श्िाष्यों के साथ युिाष्िठर के आश्रम में जा पहुँचे। युिाष्िठर ने भाइयों समेत )ष्िा की बड़ी आवभगत की और उनका सत्कार किया। वुफछ देर बाद मुनि ने कहाμफ्अच्छा! हम सब अभी स्नान करके आते हैं। तब तक भोजन तैयार करके रखना।य् कहकर दुवार्सा श्िाष्यों समेत नदी पर स्नान करने चले गए। बाल महाभारत कथा ध् 47 वनवास के प्रारंभ में युिाष्िठर से प्रसन्न होकर सूयर् ने उन्हें एक अक्षयपात्रा प्रदान किया था और कहा था कि बारह बरस तक इसके द्वारा मैं तुम्हें भोजन दिया करूँ गा। इसकी विशेषता यह है कि द्रौपदी हर रोश चाहे जितने लोगों को इस पात्रा में से भोजन ख्िाला सकेगीऋ परंतु सबके भोजन कर लेने पर जब द्रौपदी स्वयं भी भोजन कर चुकेगी, तब इस बरतन की यह शक्ित अगले दिन तक के लिए लुप्त हो जाएगी। जिस समय दुवार्सा )ष्िा आए, उस समय सभी को ख्िाला - पिलाकर द्रौपदी भी भोजन कर चुकी थी। इसीलिए सूयर् का अक्षयपात्रा उस दिन के लिए खाली हो चुका था। द्रौपदी बड़ी ¯चतित हो उठी और कोइर् सहारा न पाकर उसने परमात्मा की शरण ली। इतने में श्रीवृफष्ण कहीं से आ गए और सीधे आश्रम के रसोइर्घर में जाकर द्रौपदी के सामने खडे़ हो गए। बोलेμफ्बहन वृफष्णा, बड़ी भूख लगी है। वुफछ खाने को दो।य् द्रौपदी और भी दुविधा में पड़ गइर्। वृफष्ण बोलेμफ्शरा लाओ तो अपना अक्षयपात्रा। देखें कि उसमें वुफछ है भी या नहीं।य् द्रौपदी हड़बड़ाकर बरतन ले आइर्। उसके एक छोर पर अन्न का एक कण और साग कीपत्ती लगी हुइर् थी। श्रीवृफष्ण ने उसे लेकर मुँह में डालते हुए मन में कहाμफ्यह भोजन हो, इससे उनकी भूख मिट जाए।य् द्रौपदी तो यह देखकर सोचने लगीμफ्वैफसी हूँ मैं कि मैंने ठीक से बरतन भी नहीं धोया! इसलिए उसमें लगा हुआ अन्न - कण और साग वासुदेव को खाना पड़ा। िाक्कार है मुझे!य् इस तरह द्रौपदी अपने - आपको ही िाक्कार रही थीकि इतने में श्रीकृष्ण ने बाहर जाकर भीमसेन को कहा - फ्भीम, जल्दी जाकर )ष्िा दुवार्सा को श्िाष्यों समेत भोजन के लिए बुला लाओ।य् भीमसेन उस स्थान पर गया, जहाँ दुवार्सा )ष्िा श्िाष्यों - समेत स्नान कर रहे थे। नशदीक जाकर भीमसेन देखता क्या है कि दुवार्सा )ष्िा का सारा श्िाष्य - समुदाय स्नान करके भोजन भी कर चुका है। श्िाष्य दुवार्सा से कह रहे थेμफ्गुरुदेव! युिाष्िठर से हम व्यथर् में कह आए कि भोजन तैयार करके रखें। हमारा तो पेट भरा हुआ है। हमसे उठा भी नहीं जाता। इस समय तो हमारी शरा भी खाने की इच्छा नहीं है।य् यह सुनकर दुवार्सा ने भीमसेन से कहाμफ्हम सब तो भोजन कर चुके हैं। युिाष्िठर से जाकर कहना कि असुविधा के लिए हमें क्षमा करें।य् यह कहकर )ष्िा अपने श्िाष्यों सहित वहाँ से रवाना हो गए। मायावी सरोवर19 पांडवों के वनवास की अविा पूरी होने को ही थी। बारह बरस समाप्त होने में वुफछ ही दिन रह गए थे। उन्हीं दिनों एक निध्र्न ब्राह्मण की सहायता करते हुए पाँचों भाइर् जंगल में काप़्ाफी दूर निकल आए। वे थके हुए थे, सो शरा सुस्ताने लगे। युिाष्िठर नवुफल से बोलेμफ्भैया! शरा उस पेड़ पर चढ़कर देखो तो सही कि कहीं कोइर् जलाशय या नदी दिखलाइर् दे रही है?य् नवुफल ने पेड़ पर चढ़कर देखा और उतरकर कहा कि वुफछ दूरी पर ऐसे पौधे दिखाइर् दे रहे हैं जो पानी के नशदीक ही उगते हैं। आसपास वुफछ बगुले भी बैठे हुए हैं। वहीं कहीं आसपास पानी अवश्य होना चाहिए। युिाष्िठर ने कहा कि जाकर देखो और पानी मिले, तो ले आओ। यह सुनकर नवुफल तुरंत पानी लाने चल पड़ा। वुफछ दूर चलने पर अनुमान के अनुसार नवुफल को एक जलाशय मिला। उसने सोचा कि पहले तो मैं अपनी प्यास बुझा लूँ और पिफर तरकश में पानी भरकर भाइयों के लिए ले जाउँफगा। यह सोचकर उसने दोनों हाथों की अंजुलि में पानी लिया और पीना ही चाहता था कि इतने में आवाश आइर्μफ्माद्री के पुत्रा! दुःसाहस न करो। यह जलाशय मेरे अधीन है। पहले मेरे प्रश्नों काउत्तर दो। पिफर पानी पियो।य् पर उसे प्यास इतनी तेश लगी थी कि उस वाणी की परवाह न करके उसने अंजुलि से पानी पी लिया। पानी पीकर किनारे पर चढ़ते ही उसे वुफछ चक्कर - सा आया और वह गिर पड़ा। बड़ी देर तक नवुफल के न लौटने पर युिाष्िठर ¯चतित हो गए और उन्होंने सहदेव को भेजा। सहदेव जलाशय के नशदीक पहुँचा तो नवुफल को शमीन पर पड़ा हुआ देखा। पर उसे भी प्यास इतनी तेश लगी थी कि वह वुफछ श्यादा सोच न सका। वह पानी पीने को ही था कि पहले जैसी वाणी उसे भी सुनाइर् दी। उसने वाणी की चेतावनी पर ध्यान न देते हुए पानी पी लिया और किनारे पर चढ़ते - चढ़ते वह अचेत होकर नवुफल के पास ही गिर पड़ा। जब सहदेव भी बहुत देर तक नहीं लौटा, तो युिाष्िठर घबराकर अजुर्न से बोलेμफ्जाकर देखो तो उनके साथ कोइर् दुघर्टना तो नहीं हो गइर्?य् अजुर्न बड़ी तेशी से चला। तालाब के किनारे पर दोनों भाइयों वफो उसने मृत पड़े हुए देखा, तो वह चैंक उठा। वह नहीं समझ पाया कि इनकी मृत्यु का क्या कारण है! यह सोचते हुए अजुर्न भी पानी पीने के लिए जलाशय में उतरा कि तभी उसे भी वही वाणी सुनाइर्दीμफ्अजुर्न! मेरे प्रश्नों का उत्तर देने के बाद ही प्यास बुझा सकते हो। यह तालाब मेरा है। मेरी बात नहीं मानोगे, तो तुम्हारी भी वही गति होगी, जो तुम्हारे दो भाइयों की हुइर् ह।य्ैअजुर्न यह सुनकर गुस्से से भर गया। उसने बाण छोड़ने शुरू कर दिए। जिधर से आवाश सुनाइर् दी थी, उसी ओर निशाना लगाकर वह तीर चलाता रहा, ¯कतु उन बाणों का कोइर् असर नहीं हुआ। अपने बाणों को बेकार होते देखकर अजुर्न के व्रफोध की सीमा न रही। उसने सोचा पहले अपनी प्यास तो बुझा ही लूँ। पिफर लड़ लिया जाएगा। यह सोचकर अजुर्न ने जलाशय में उतरकर यक्ष - प्रश्न बाल महाभारत कथा ध् 49 पानी पी लिया और किनारे आते - आते चारों खानेचित्त होकर गिर पड़ा। उधर बाट जोेहते - जोहते युिाष्िठर बड़े व्यावुफल हो उठे। भीमसेन से चि¯तत स्वर में बोलेμफ्भैया भीमसेन! देखो तो अजुर्न भी नहीं लौटा। शरा तुम्हीं जाकर तलाश करो कि तीनों भाइयों को क्या हो गया है।य् युिाष्िठर की आज्ञा मानकर भीमसेन तेशी से जलाशय की ओर बढ़ा। तालाब के किनारे पर देखा कि तीनों भाइर् मरे - से पड़े हुए हैं। सोचा, यह किसी यक्ष की करतूत मालूम होती है। शरा पानी पी लूँ पिफर देखता हूँ। यह सोचकर भीमसेन तालाब में उतरना ही चाहता था कि पिफर वही आवाश आइर्। फ्मुझे रोकनेवाला तू कौन है?य् कहता हुआ भीमसेन बेधड़क तालाब में उतर गया और पानी भी पी लिया। पानी पीते ही अपने भाइयों की तरह वह भी वहीं ढेर हो गया। उधर युिाष्िठर अकेले बैठे घबराने लगे और सोचने लगे कि बड़े आश्चयर् की बात है कि कोइर् भी अब तक नहीं लौटा! आख्िार भाइयों को हो क्या गया? क्या कारण है कि अभी तक वे लौटे नहीं? जल की खोज में वे जंगल में इधर - उधर भटक तो नहीं गए? मैं ही चलकर देखूँ कि क्या बात है! युिाष्िठर उसी विषैले तालाब के पास जा पहुँचे, वुफछ देर यों विलाप करने के बाद युिाष्िठर जिसका जल पीकर उनके चारों भाइर् मृत - से पड़े ने शरा ध्यान से भाइयों के शरीरों को देखा और हुए थे। यह देखकर युिाष्िठर चैंक पड़े। असह्य अपने आपसे कहने लगेμफ्यह तो कोइर् मायाजाल - सा शोक के कारण उनकी आँखों से आँसू बह चले। लगता है। आसपास शमीन पर किसी शत्राु के पाँव के निशान भी तो नशर नहीं आ रहे हैं। हो सकता है कि यह भी दुयोर्धन का ही कोइर् षड्यंत्रा हो। संभव है पानी में विष मिला हो।य् सोचते - सोचते युिाष्िठर भी प्यास से प्रेरित होकर तालाब में उतरने लगे। इतने में वही वाणी सुनाइर् दी। युिाष्िठर ने ताड़ लिया कि कोइर् यक्ष बोल रहा है। उन्होंने बात मान ली और बोलेμफ्आप प्रश्न कर सकते हैं।य्यक्ष ने कइर् प्रश्न किए, जिनके उत्तर युिाष्िठर ने दिएμ प्र.μमनुष्य का साथ कौन देता है? उ.μधैयर् ही मनुष्य का साथी होता है। प्र.μकौन सा शास्त्रा ;विद्याद्ध है, जिसका अध्ययन करके मनुष्य बुिमान बनता है? उ.μकोइर् भी शास्त्रा ऐसा नहीं है। महान लोगों की संगति से ही मनुष्य बुिमान बनता है। प्र.μभूमि से भारी चीश क्या है? उ.μसंतान को कोख में धारण करनेवाली माता भूमि से भी भारी होती है। प्र.μआकाश से भी उँफचा कौन है? उ.μपिता। प्र.μहवा से भी तेश चलनेवाला कौन है? उ.μमन। प्र.μघास से भी तुच्छ कौन सी चीश होती है? उ.μ¯चता। प्र.μविदेश जानेवाले का कौन साथी होता है? उ.μविद्या। प्र.μघर ही में रहनेवाले का कौन साथी होता है? उ.μपत्नी। प्र.μमरणासन्न वृ( का मित्रा कौन होता है? उ.μदान, क्योंकि वही मृत्यु के बाद अकेले चलनेवाले जीव के साथ - साथ चलता है। प्र.μबरतनों में सबसे बड़ा कौन सा है? उ.μभूमि ही सबसे बड़ा बरतन है, जिसमें सब वुफछ समा सकता है। प्र.μसुख क्या है? उ.μसुख वह चीश है, जो शील और सच्चरित्राता पर स्िथत है। प्र.μकिसके छूट जाने पर मनुष्य सवर्पि्रय बनता है? उ.μअहंभाव के छूट जाने पर। प्र.μकिस चीश के खो जाने से दुख नहीं होता है? उ.μव्रफोध के खो जाने से। बाल महाभारत कथा ध् 51 प्र.μकिस चीश को गँवाकर मनुष्य धनी बनता है? उ.μलालच को। प्र.μसंसार में सबसे बड़े आश्चयर् की बात क्या है? उ.μहर रोश आँखों के सामने कितने ही प्राण्िायों को मृत्यु के मुँह में जाते देखकर भी बचे हुए प्राणी, जो यह चाहते हैं कि हम अमर रहें, यही महान आश्चयर् की बात है। इसी प्रकार यक्ष ने कइर् अन्य प्रश्न भी किएऔर युिाष्िठर ने उन सबके ठीक - ठीक उत्तर दिए। अंत में यक्ष बोलाμफ्राजन्! मैं तुम्हारे मृत भाइयों में से एक को जीवित कर सकता हूँ। तुम जिस किसी को भी चाहो, वह जीवित हो जाएगा।य् युिाष्िठर ने पलभर सोचा कि किसे जीवितकराऊँ ? थोड़ी देर रफककर, बोलेμफ्मेरा छोटा भाइर् नवुफल जी उठे।य् युिाष्िठर के इस प्रकार बोलते ही यक्ष ने सामने प्रकट होकर पूछाμफ्युिाष्िठर! दस हशार हाथ्िायों के बलवाले भीमसेन को छोड़कर तुमने नवुफल को जीवित करवाना क्यों ठीक समझा?य् युिाष्िठर ने कहाμफ्यक्षराज! मैंने जो नवुफल को जीवित करवाना चाहा, वह सिपर्फ इसी कारण़कि मेरे पिता की दो पत्िनयों में से माता वुंफती का बचा हुआ एक पुत्रा तो मैं हूँ, मैं चाहता हूँ कि माता माद्री का भी एक पुत्रा जीवित हो उठे, जिससे हिसाब बराबर हो जाए। अतः आप वृफपा करके नवुफल को जीवित कर दें।य् फ्पक्षपात से रहित मेरे प्यारे पुत्रा! तुम्हारे चारों ही भाइर् जी उठें,य् यक्ष ने वर दिया। उन्होंने युिाष्िठर के सद्गुणों से मुग्ध होकर उन्हें छाती से लगा लिया और आशीवार्द देते हुए कहाμफ्बारह बरस के वनवास की अविा पूरी होने में अब थोड़े ही दिन बाकी रह गए हैं। बारह मास तक जो तुम्हें अज्ञातवास करना है, वह भी सपफलता से पूरा हो जाएगा। तुम्हें और तुम्हारे भाइयों को कोइर् भी नहीं पहचान सकेगा। तुम अपनी प्रतिज्ञा सपफलता के साथ पूरी करोगे।य् इतना कहकर धमर्देव अंतधार्न हो गए। वनवास की कठिनाइयाँ पांडवों ने धीरज के साथ झेल लीं। अजुर्न इंद्रदेव से दिव्यास्त्रा प्राप्त करके वापस आ गया। भीमसेन ने भी सुगंिात पूफलों वाले सरोवर के पास हनुमान से भेंट कर ली थी और उनका आ¯लगन प्राप्त करके दस गुना अिाक शक्ितशाली हो गया था। मायावी सरोवर के पास युिाष्िठर ने स्वयं धमर्देव के दशर्न किए और उनसे गले मिलने का सौभाग्य प्राप्त कर लिया था। वनवास की अविा पूरी होने पर युिाष्िठर ने ब्राह्मणों की अनुमति लेकर उन्हें और अपने परिवार के अन्य लोगों से कहा कि वे नगर को लौट जाएँ। युिाष्िठर की बात मानकर सब लोग नगर लौट आए और यह खबर उड़ गइर् कि पांडव हम लोगों को आधी रात में सोया हुआ छोड़कर न जाने कहाँ चले गए। यह सुनकर लोगों को बड़ा दुख हुआ। इधर अज्ञातवास 21 पांडव वन में एक एकांत स्थान में बैठकर आगे के कायर्व्रफम पर सोच - विचार करने लगे। युिाष्िठर ने अजुर्न से पूछाμफ्अजुर्न! बताओ कि यह तेरहवाँ बरस किस देश में और किस तरह बिताया जाए?य् अजुर्न ने जवाब दियाμफ्महाराज! इसमें संदेह नहीं है कि हम बारह महीने बड़ी सुगमता के साथ इस प्रकार बिता सवेंफगे कि जिसमें किसी को भी हमारा असली परिचय प्राप्त न हो सके। अच्छा यही होगा कि हम सब एक साथ ही रहें। कौरवों के देश के आसपास पांचाल, मत्स्य, वैदेह, बाल्िहक दशाणर्, शूरसेन, मगध आदि कितने ही देश हैं। इसमें से आप जिसे पसंद करें, वहीं जाकर रह जाएँगे। यदि मुझसे पूछा जाए, तो मैं कहूँगा कि मत्स्य देश में जाकर रहना ठीक होगा। इस देश के अधीश राजा विराट हैं। विराट नगर बहुत ही सुंदर और समृ( है। मेरी तो ऐसी ही राय है। आगे आप जो उचित समझें।य् युिाष्िठर ने कहाμफ्मत्स्यािापति राजा विराट बड़े शक्ित संपन्न हैं। दुयोर्धन की बातों में भी वह आनेवाले नहीं हैं। अतः राजा विराट के यहाँ छिपकर रहा जाए।य् सब अपना - अपना भेष बदलकर राजा विराट ये तो राज करने योग्य प्रतीत होते हैं। मन में के यहाँ चाकरी करने गए, तो विराट ने उन्हें शंका तो हुइर्, पर पांडवों के बहुत आग्रह करने अपना नौकर बनाकर रखना उचित न समझा। और विश्वास दिलाने पर राजा ने उन्हें अपनी हर एक के बारे में उनका यहीे विचार था कि सेवा में ले लिया। पांडव अपनी - अपनी पसंद के कामों पर नियुक्त कर लिए गए। युिाष्िठर ‘वंफक’ के नाम से विराट के दरबारी बन गए और राजा के साथ चैपड़ खेलकर दिन बिताने लगे। भीमसेन ‘वल्लभ’ के नाम से रसोइयों का मुख्िाया बनकर रहने लगा। वह कभी - कभीमशहूर पहलवानों से वुफश्ती लड़कर या ¯हड्ड जंतुओं को वश में करके राजा का दिल बहलाया करता था। अजुर्न स्त्राी के वेश में ‘बृहन्नला’ के नाम से रनवास की स्ित्रायों, खासकर विराट कीकन्या उत्तरा और उसकी सहेलियों एवं दास - दासियों को नाच और गाना - बजाना सिखलाने लगा। नवुफल ‘ग्रंथ्िाक’ के नाम से घोड़ों को साधने, उनकी बीमारियों का इलाज करने और उनकी देखभाल करने में अपनी चतुरता का परिचय देते हुए राजा को खुश करता रहा। सहदेव ‘तंतिपाल’ के रूप में गाय - बैलों की देखभाल करता रहा। पांचाल - राजा की पुत्राी द्रौपदी, जिसकी सेवा - टहल के लिए कितनी ही दासियाँ रहती थीं, अब अपने पतियों की प्रतिज्ञा पूरी करने हेतु दूसरी रानी की आज्ञाकारिणी दासी बन गइर्। विराट की पत्नी सुदेष्णा की सेवा - सुश्रूषा करती हुइर् रनवास में ‘सैरंध्री’ के नाम से काम करने लगी। रानी सुदेष्णा का भाइर् कीचक बड़ा ही बलिष्ठ और प्रतापी वीर था। मत्स्य देश की सेना का वही नायक बना हुआ था और अपने वुफल के लोगों को साथ लेकर कीचक ने बूढ़े विराटराजकी शक्ित और सत्ता में खूब वृि कर दी थी। कीचक की धाक लोगों पर जमी हुइर् थी। लोग कहा करते थे कि मत्स्य देश का राजा तो कीचक है, विराट नहीं। यहाँ तक कि स्वयं विराट भी कीचक से डरा करते थे और उसका कहा मानते थे। जब से पांडवों के बारह बरस के बाल महाभारत कथा ध् 53 वनवास की अविा पूरी हुइर् थी, तभी से दुयोर्धन के गुप्तचरों ने पांडवों की खोज करनी शुरू कर दी थी। इन्हीं दिनों हस्ितनापुर में कीचक के मारे जाने की खबर पैफल गइर्। यह खबर पाते ही दुयोर्धन का माथा ठनका कि हो - न - हो कीचक का वध भीम ने ही किया होगा। यह दुयोर्धन का अनुमान था। उसने अपना यह विचार राजसभा में प्रकट करते हुए कहाμफ्मेरा खयाल है कि पांडव विराट के नगर में ही छिपे हुए हैं। मुझे तो यही ठीक लगता है कि मत्स्य देश पर हमला कर देना चाहिए। यदि पांडव वहाँ होंगे, तो निश्चय ही विराट की तरप़्ाफ से हमसे लड़ने आएँगे। यदि हम अज्ञातवास की अविा पूरी होने से पहले ही उनका पता लगा लेंगे, तो शतर् के अनुसार उन्हें बारह बरस के लिए पिफर से वनवास करना होगा। यदि पांडव विराट के यहाँ न भी हुए, तो भी हमारा वुफछ नहीं बिगडे़गा। हमारे तो दोनों हाथों में लं हैं।य्ूदुयोर्धन की यह बात सुनकर त्रिागतर् देश का राजा सुशमार् उठा और बोलाμफ्राजन्! मत्स्य देश के राजा विराट मेरे शत्राु हैं। कीचक ने भी मुझे बहुत तंग किया था। इस अवसर का लाभ उठाकर मैं उससे अपना पुराना बैर भी चुका लेना चाहता हूँ।य् कणर् ने सुशमार् की बात का अनुमोदन किया। पिफर सबकी राय से यह निश्चय किया गया कि विराट के राज्य पर राजा सुशमार् दक्ष्िाण की ओर से हमला करे और जब विराट अपनी सेना लेकर उसका मुकाबला करने जाए, तब ठीक इसीमौके पर उत्तर की ओर से दुयोर्धन अपनी सेना लेकर अचानक विराट नगर पर छापा मार दे। इस योजना के अनुसार राजा सुशमार् ने दक्ष्िाण की ओर से मत्स्य देश पर आव्र्रफमण कर दिया। मत्स्य देश के दक्ष्िाणी हिस्से पर त्रिागतर्राज की सेना छा गइर् और गायों के झुंड - के - झुंड सुशमार् की सेना के कब्शे में आ गए। वंफक ;युिाष्िठरद्ध ने विराट को सांत्वना देते हुए कहाμफ्राजन् ¯चता न करें। मंै भी अस्त्रा - विद्या सीखा हुआ हूँ। मंैने सोचा है कि आपके रसोइये वल्लभ, अश्वपाल ग्रंथ्िाक और तंतिपाल भी बड़े वुफशल यो(ा हैं। मैं कवच पहनकर रथारूढ़ होकर यु(क्षेत्रा में जाउँफगा। आप भी उनको आज्ञा दें कि रथारूढ़ होकर मेरे साथ चलें। सबके लिए रथ और शस्त्रास्त्रा की आज्ञा दीजिए।य् यह सुनकर विराट बड़े प्रसन्न हो गए। उनकी आज्ञानुसार चारों वीरों के लिए रथ तैयार होकर आ खड़े हुए। अजुर्न को छोड़कर बाकी चारों पांडव उन पर चढ़कर विराट और उनकी सेना समेत सुशमार् से लड़ने चले गए। राजा सुशमार् और विराट की सेनाओं में घोर यु( हुआ। जब राजा विराट बंदी बना लिए गए, तो उनकी सारी सेना तितर - बितर हो गइर्। सैनिक भागने लगे। यह हाल देखकर युिाष्िठर भीमसेन से बोलेμफ्भीम! विराट को अभी छुड़ाकर लाना होगा और सुशमार् का दपर् चूर करना होगा। यदि तुम सदा की भाँति ¯सह की - सी गजर्ना करने लग जाओगे, तो शत्राु तुम्हें तुरंत पहचान लेंगे। इसलिए सामान्य लोगों की भाँति रथ पर बैठकर और धनुष - बाण के सहारे लड़ना ठीक होगा।य् आज्ञा मानकर भीमसेन रथ पर से ही सुशमार् की सेना पर बाणों की बौछार करने लगा। थोड़ी ही देर की लड़ाइर् के बाद भीम ने विराट को छुड़ा लिया और सुशमार् को वैफद कर लिया। सुशमार् की पराजय की खबर जब विराट नगर पहुँची, तो नगरवालों ने नगर को खूब सजाकर आनंद मनाया और विजयी राजा विराट के स्वागत के लिए शहर के बाहर चल पड़े। इधर नगर के लोग विजय की खुश्िायाँ मना रहे थे और राजाकी बाट जोह रहे थे, तो उधर उत्तर की ओर से दुयोर्धन ने तबाही मचा दी।राजवुफमार उत्तर तो बिलवुफल डर गया था और काँप रहा था। उसने बृहन्नला से कहाμ फ्बृहन्नला, मुझे बचाओ इस संकट से! मैं तुम्हारा बड़ा उपकार मानूँगा।य्इस प्रकार राजवुफमार उत्तर को भयभीत और घबराया हुआ जानकर बृहन्नला ने उसे समझाते हुए और उसका हौसला बढ़ाते हुए कहाμ फ्राजवुफमार, घबराओ नहीं। तुम तो सिप़्ार्फ घोड़ों की रास सँभाल लो।य् इतना कहकर अजुर्न नेउत्तर को सारथी के स्थान पर बैठाकर रास उसके हाथ में पकड़ा दी। राजवुफमार ने रास पकड़ ली। आचायर् द्रोण यह सब दूर से देख रहे थे। उनको विश्वास हो रहा था कि यह अजुर्न ही है। उन्होंने यह बात इशारे से भीष्म को जता दी। यह चचार् सुनकर दुयोर्धन कणर् से बोलाμफ्हमें इस बात से क्या मतलब कि यह औरत के भेष में कौन है! मान लें कि यह अजुर्न ही है। पिफर भी हमारा तो उससे काम ही बनता है। शतर् के अनुसार उन्हें और बारह बरस का वनवास भुगतना पड़ेगा।य् अजुर्न ने कौरव - सेना के सामने रथ ला खड़ा किया। उसने गांडीव सँभाल लिया और उस पर डोरी चढ़ाकर तीन बार शोर से टंकार की। कौरव - सेना टंकार - ध्वनि से सचेत होने भी नहीं पाइर् थी कि अजुर्न ने खड़े होकर शंख की ध्वनि की, जिससे कौरव - सेना थरार् उठी। उसमें खलबली मच गइर् कि पांडव आ गए। बाल महाभारत कथा ध् 55 प्रतिज्ञा - पूतिर् 22 द्रोण ने कहाμफ्मालूम होता है, यह तो अजुर्न ही आया है।य् आचायर् की शंका और घबराहट दुयोर्धन को ठीक न लगी। तभी कणर् बोलाμफ्पांडव जुए के खेल में जब हार गए थे, तो शतर् के अनुसार उन्हें बारह बरस का वनवास और एक बरस अज्ञातवास में बिताना था। अभी तेरहवाँ बरस पूरा नहीं हुआ है और अजुर्न हमारे सामने प्रकट हो गया है, तो डर किस बात का है? शतर् के अनुसार पांडवों को पिफर से बारह बरस वनवास और एक बरस अज्ञातवास में बिताना होगा। अजीब बात है कि सेना के यो(ा भय के मारे काँप रहे हैं, जबकि उन्हें दिल खोलकर लड़ना चाहिए। आप लोग यही रट लगा रहे हैं कि सामने जो रथ आ रहा है, उस पर अजुर्न धनुष ताने हुए बैठा है। पर वहाँ अजुर्न वफी बजाए परशुराम हों, तो भी हम क्यों डरें? मैं तो अकेला ही जाकर उसका मुकाबला जब कणर् ने आचायर् की यों चुटकी ली, तोकृपाचायर् के भानजे अश्वत्थामा से न रहा गया। वह बोलाμफ्कणर्! किया तुमने वुफछ नहीं है और कोरी डींगें मारने में समय गँवा रहे हो।य् इस प्रकार कौरव - सेना के वीर आपस में ही वाद - विवाद तथा झगड़ा करने लगे। यह देखकर भीष्म बड़े ख्िान्न हुए। वह बोलेμफ्यह आपस में बैर - विरोध या झगड़े का समय नहीं है। अभी तो सबको एक साथ मिलकर शत्राु का मुकाबला करना है।य् पितामह के इस प्रकार समझाने पर कणर्,अश्वत्थामा आदि वीर जो उत्तेजित हो रहे थे, शांत हो गए। सबको शांत देखकर भीष्म दुयोर्धन से पिफर बोलेμफ्बेटा दुयोर्धन, अजुर्न प्रकट हो गया, वह ठीक है। पर प्रतिज्ञा का समय कल ही पूरा हो चुका है। चंद्र और सूयर् की गति, वषर्, महीने और पक्ष विभाग के पारस्परिक संबंध को अच्छी तरह जाननेवाले मेरे कथन की पुष्िटगा और मैंने दुयोर्धन को जो वचन दिया था,करूँउसे आज पूरा करके दिखाऊँकणर् को यों दम भरते हुए देखकर कृपाचायर् गा।य् करेंगे। प्रत्येक वषर् में एक जैसे महीने नहीं होते। झल्लाकर बोलेμफ्कणर्! मूखर्ता की बातें न करो। हम सबको एक साथ मिलकर अजुर्न का मुकाबला करना होगा।य् यह सुनकर कणर् को गुस्सा आ गया। वह बोला - फ्आचायर् तो अजुर्न की प्रशंसा करते कभी थकते ही नहीं हैं। अजुर्न की शक्ित को बढ़ा - चढ़ाकर बताने की इन्हें एक आदत - सी पड़ गइर् है। न मालूम यह भय के कारण है या अजुर्न को अिाक प्यार करते हैं, इस कारण है। जो भी हो, मैं अकेला ही डटा रहूँगा।य् मालूम होता है कि तुम लोगों की गणना में भूल हुइर् है। इसलिए तुम्हें भ्रम हुआ है। जैसे ही अजुर्न ने गांडीव धनुष की टंकार की थी, मैं समझ गया था कि प्रतिज्ञा की अविा पूरी हो गइर् है। दुयोर्धन! यु( शुरू करने से पहले इस बात का निश्चय कर लेना होगा कि पांडवों के साथ संिा कर लें या नहीं। यदि संिा करने की इच्छा है, तो उसके लिए अभी समय है।य् दुयोर्धन ने कहाμफ्पूज्य पितामह! मैं संिा नहीं चाहता हूँ। राज्य तो दूर रहा, मैं तो एक गाँव तक पांडवों को देने के लिए तैयार नहीं हूँ।य्यह सुनकर द्रोणाचायर् की आज्ञानुसार कौरववीरों ने व्यूह - रचना की। उधर उत्तर ने रथ उसी ओर हाँक दिया, जिधर दुयोर्धन था। अजुर्न ने गांडीव पर चढ़ाकर दो - दो बाण आचायर् द्रोण और पितामह भीष्म की ओर इस तरह से छोड़े जो उनके चरणों में जाकर गिरे। इस प्रकार अपने बड़ों की वंदना करके, अजुर्न ने दुयोर्धन का पीछा किया। अजुर्न को दुयोर्धन का पीछा करते देखकर भीष्म आदि सेना लेकर अजुर्न का पीछा करने लगे। अजुर्न ने उस समय अद्भुत रण - कौशल का परिचय दिया। पहले तो उसने कणर् पर हमला करके उसे बुरी तरह से घायल करके मैदान से भगा दिया। इसके बाद द्रोणाचायर् की बुरी गत होते देखकर अश्वत्थामा आगे बढ़ा और अजुर्न पर बाण बरसाने लगा। अजुर्न ने शरा सा हटकर द्रोणाचायर् को ख्िासक जाने का मौका दे दिया। मौका पाकर आचायर् जल्दी से ख्िासक गए। उनके चले जाने के बाद अजुर्न अब अश्वत्थामा पर टूट पड़ा। दोनों में भयानक यु( होता रहा। अंत में अश्वत्थामा को हार माननीपड़ी। उसके बाद कृपाचायर् की बारी आइर् और वह भी हार गए। पाँचों महारथी जब इस भाँति परास्त हो गए, तो पिफर सेना किसके बल पर टिकती! सारी कौरव - सेना को अजुर्न ने जल्दी ही तितर - बितर कर दिया। सैनिक अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। इस भाँति भीषण यु( करते हुए भी अजुर्न ने दुयोर्धन का पीछा करना न छोड़ा। पाँचों महारथ्िायों द्वारा अजुर्न को एक साथ रोकने का प्रयत्न करने पर भी उसे रोका न जा सका। अजुर्न आख्िार दुयोर्धन के निकट पहुँच ही गया। उसने दुयोर्धन पर भीषण हमला कर दिया। दुयोर्धन घायल हो गया और मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ। भीष्म ने उससे कहा कि अब वापस हस्ितनापुर लौट चलना चाहिए। भीष्म की सलाह मानकर सारी सेना हार मानकर हस्ितनापुर की ओर लौट चली। इधर यु( से लौटते हुए अजुर्न ने कहाμफ्उत्तर! अपना रथ नगर की ओर ले चलो। तुम्हारी गायें छुड़ा ली गइर् हैं। शत्राु भी भाग खड़े हुए हैं। इस विजय का यश तुम्हीं को मिलना चाहिए। इसलिए चंदन लगाकर और पूफलों का हार पहनकर नगर में प्रवेश करना।य् रास्ते मंे अजुर्न ने पिफर से बृहन्नला का वेशधारण कर लिया और राजवुफमार उत्तर को रथ पर बैठाकर सारथी के स्थान पर खुद बैठ गया। उन्होंने विराटनगर की ओर वुफछ दूतों को यह आज्ञा देकर भेज दिया कि जाकर घोषणा कर दोकि राजवुफमार उत्तर की विजय हुइर् है। विराट का भम्रत्रिागतर् - राजा सुशमार् पर विजय प्राप्त करके राजा राजवुफमार उत्तर को न पाकर राजा ने पूछताछ विराट नगर में वापस आए, तो पुरवासियों ने की तो स्ित्रायों ने बड़े उत्साह के साथ बताया कि उनका धूमधाम से स्वागत किया। अंतःपुर में वुफमार कौरवों से लड़ने गए हैं। राजा यह सुनकर एकदम चैंक उठे। उनके विशेष पूछने पर स्ित्रायों ने कौरवों के आक्रमण आदि का सारा हाल सुनाया। यह सब सुनकर राजा का मन ¯चतित हो उठा। राजा को इस प्रकार शोकातुर होते देखकर वंफक ने उन्हें दिलासा देते हुए कहाμफ्आप राजवुफमार की ¯चता न करें। बृहन्नला सारथी बनकर उनके साथ गइर् हुइर् है।य् वंफक इस प्रकार बातें कर ही रहे थे किइतने में उत्तर के भेजे हुए दूतों ने आकर कहाμ फ्राजन्! आपका कल्याण हो! राजवुफमार जीत गए। कौरव - सेना तितर - बितर कर दी गइर् है। गायें छुड़ा ली गइर् हैं।य् यह सुनकर विराट आँखें पफाड़कर देखते रह गए। उन्हें विश्वास ही न होता था कि अकेलाउत्तर कौरवों को जीत सकेगा! पुत्रा की विजय हुइर्, यह जानकर विराट, आनंद और अभ्िामान के मारे पूफले न समाए। उन्होंने दूतों को असंख्य रत्न एवं धन पुरस्कार के रूप में देकर खूब आनंद मनाया। इसके बाद राजा ने प्रसन्नता से अंतःपुर में जाकर कहाμफ्सैरंध्री चैपड़ की गोटें तो शरा ले आओ। चलो वंफक से दो - दो हाथ चैपड़ खेल लें। आज खुशी के मारे मैं पागल - सा हुआ जा रहा हूँ। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं अपना आनंद वैफसे व्यक्त करूँ!य् दोनों खेलने बैठे। खेलते समय भी बातें होने लगीं। फ्देखा राजवुफमार का शौयर्? विख्यात कौरव - वीरों को मेरे बेटे ने अकेले ही लड़कर जीत लिया!य् विराट ने कहा। फ्निःसंदेह आपके पुत्रा भाग्यवान हैं, नहीं तो बृहन्नला उनकी सारथी बनती ही वैफसे?य् कंक ने कहा। विराट झुँझलाकर बोलेμफ्आपने भी बाल महाभारत कथा ध् 57 क्या यह बृहन्नला - बृहन्नला की रट लगा रखी है? मैं अपने वुफमार की विजय की बात कर रहा हूँ और आप उसके सारथी की बड़ाइर् करने लगे।य् युध्िष्िठर ने अब बृहन्नला का नाम लेकर जैसे ही वुफछ कहना चाहा, राजा से न रहा गया। अपने हाथ का पासा युिाष्िठर ;वंफकद्ध के मँुह पर दे मारा। पासे की मार से युिाष्िठर के मुख पर चोट लग गइर् और खून बहने लगा। इतने में द्वारपाल ने आकर खबर दी किराजवुफमार उत्तर बृहन्नला के साथ द्वार पर खड़े हैं। राजा से भेंट करना चाहते हैं। सुनते ही विराट जल्दी से उठकर बोलेμफ्आने दो! आने दो!!य् वंफक ने इशारे से द्वारपाल को कहा कि सिप़्ार्फ राजवुफमार को लाओ, बृहन्नला को नहीं। युिाष्िठर को भय था कि कहीं राजा के हाथों उनको जो चोट लगी है, उसे देखकर अजुर्न गुस्से में कोइर् गड़बड़ी न कर दे। यही सोच उन्होंने द्वारपाल कोऐसा आदेश दिया। राजवुफमार उत्तर ने प्रवेश करके पहले अपने पिता को नमस्कार किया। पिफर वह वंफक को प्रणाम करना ही चाहता था कि उनके मुख से खून बहता देखकर चकित रह गया। उसे अजुर्न से मालूम हो चुका था कि वंफक तो असल में युिाष्िठर ही हैं। उसने पूछाμफ्पिता जी, इनको किसने यह पीड़ा पहुँचाइर् है?य् विराट ने कहाμफ्बेटा! क्रोध में मैंने चैपड़ के पासे पेंफक मारे। क्यों, तुम उदास क्यों हो गए?य् पिता की बात सुनकर उत्तर काँप गया। विराट वुफछ समझ ही न सके कि बात क्या है।उत्तर ने आग्रह किया, तो उन्होंने वंफक के पाँवपकड़कर क्षमा - याचना की। इसके बाद उत्तर को गले लगा लिया और बोलेμफ्बेटा, बड़े वीर हो तुम!य्उत्तर ने कहाμफ्पिता जी, मैंने कोइर् सेना नहीं हराइर्। मैं तो लड़ा भी नहीं।य् बड़ी उत्वंफठा के साथ राजा ने पूछाμफ्कौन था वह वीर? कहाँ है वह? बुला लाओ उसे।य् राजवुफमार ने कहाμफ्पिता जी, मेरा विश्वास है कि आज या कल वह अवश्य प्रकट होंगे।य् थोड़ी देर तक तो पांडवों ने सोचा कि अब श्यादा विवाद करना और अपने को छिपाए रखना ठीक नहीं है। यह सोचकर अजुर्न ने पहले राजा विराट को और बाद में सारी सभा को अपना असली परिचय दे दिया। लोगों के आश्चयर् और आनंद का ठिकाना न रहा। सभा में कोलाहलमच गया। राजा विराट का हृदय कृतज्ञता, आनंद और आश्चयर् से तरंगित हो उठा। विराट ने वुफछ सोचने के बाद अजुर्न से आग्रह किया कि आपराजकन्या उत्तरा से ब्याह कर लें। अजुर्न ने कहाμफ्राजन्! आपकी कन्या को मैं नाच और गाना सिखाता रहा हूँ। मेरे लिए वह बेटी के मंत्रणा 24 तेरहवाँ बरस पूरा होने पर पांडव विराट की राजधानी छोड़कर विराटराज के ही राज्य में स्िथत ‘उपप्लव्य’ नामक नगर में जाकर रहने लगे। अज्ञातवास की अविा पूरी हो चुकी थी। इसलिए पाँचों भाइर् प्रकट रूप में रहने लगे। आगे का कायर्व्रफम तय करने के लिए उन्होंने अपने भाइर् - बंधुओं एवं मित्रों को बुलाने के लिए दूत समान है। इस कारण यह उचित नहीं है कि मैं उसके साथ ब्याह करूँ । हाँ, यदि आपकी इच्छा हो, तो मेरे पुत्रा अभ्िामन्यु के साथ उसका ब्याह हो जाए।य् राजा विराट ने यह बात मान ली। इसके वुफछ समय बाद दुयोर्धन के दूतों ने आकर युिाष्िठर से कहाμफ्वुंफती - पुत्रा! महाराज दुयोर्धन ने हमें आपके पास भेजा है। उनका कहना है कि उतावली के कारण प्रतिज्ञा पूरी होने से पहले अजुर्न पहचाने गए हैं। इसलिए शतर् के अनुसार आपको बारह बरस के लिए और वनवास करना होगा।य् इस पर युिाष्िठर हंँस पड़े और बोलेμफ्दूतगण शीघ्र ही वापस जाकर दुयोर्धन को कहो कि वह पितामह भीष्म और जानकारों से पूछकर इस बात का निश्चय करे कि अजुर्न जब प्रकट हुआ था, तब प्रतिज्ञा की अविा पूरी हो चुकी थी या नहीं। मेरा यह दावा है कि तेरहवाँ बरस पूरा होने के बाद ही अजुर्न ने धनुष की टंकार की थी।य् भेजे। भाइर् बलराम, अजर्ुन की पत्नी सुभद्रा तथा पुत्रा अभ्िामन्यु और यदुवंश के कइर् वीरांे को लेकर श्रीवृफष्ण उपप्लव्य जा पहुँचे। इंद्रसेन आदि राजा अपने - अपने रथों पर चढ़कर उपप्लव्य आ पहुँचे। काश्िाराज और वीर शैव्य भी अपनी दो अक्षौहिणी सेना के साथ आकर युिाष्िठर के नगर में पहुँच गए। पांचालराज द्रुपद तीन अक्षौहिणी सेना लाए। उनके साथ श्िाखंडी, द्रौपदी का भाइर् धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के पुत्रा भी आ पहँुचे। और भी कितने ही राजा अपनी - अपनी सेनाओं को साथ लेकर पांडवों की सहायता के लिए आ गए।सबसे पहले अभ्िामन्यु के साथ उत्तरा का विवाह किया गया। इसके बाद विराटराज के सभा भवन में सभी आगंतुक राजा मंत्राणा के लिए इकऋे हुए। विराट के पास श्रीवृफष्ण और युिाष्िठर बैठे। द्रुपद के पास बलराम और सात्यकि। और भी कितने ही प्रतापी राजा सभा में विराजमान थे। सभा में सबके अपने - अपने आसन पर बैठ जाने पर श्रीवृफष्ण उठे और बोलेμफ्सम्माननीय बंधुओ और मित्रो! आज हम सब यहाँ इसलिए इकऋे हुए हैं कि वुफछ ऐसे उपाय सोचें, जो युिाष्िठर और राजा दुयोर्धन के लिए लाभप्रद हों, न्यायोचित हों और जिनसे पांडवों तथा कौरवों का सुयश बढ़े। जो राज्य युिाष्िठर से छीना गया है वह उनको वापस मिल जाए, तो पांडव शांत हो जाएँगे और दोनों में संिा हो सकती है। मेरी राय में इस बारे में दुयोर्धन के साथ उचित रीति से बातचीत करके उसे समझाने के लिए एक ऐसे व्यक्ित को दूत बनाकर भेजना होगा, जो सवर्था योग्य हो।य् तब बलराम उठे और बोलेμफ्वृफष्ण ने जो सलाह दी है, वह मुझे न्यायोचित लगती है। आप लोग जानते ही हैं कि वंुफती के पुत्रों को आधा राज्य मिला था। वे उसे जुए मेें हार गए। अब वे उसे पिफर से प्राप्त करना चाहते हैंं। यदि शांतिपूणर् ढंग से, बिना यु( किए ही वे अपना राज्य प्राप्त कर सवेंफ, तो उससे न केवल पांडवों बल्िक दुयोर्धन तथा सारी प्रजा की भलाइर् ही होगी।य् बलराम के कहने का सार यह था कि युिाष्िठर ने जान - बूझकर अपनी इच्छा से जुआ बाल महाभारत कथा ध् 59 खेलकर राज्य गँवाया था। उनकी इन बातों से यदुवुफल का वीर और पांडवों का हितैषी सात्यकि आगबबूला हो उठा। उससे न रहा गया। वह उठकर कहने लगाμफ्बलराम जी की बातें मुझे शरा भी न्यायोचित नहीं मालूम होतीं। युिाष्िठर को आग्रह करके जुआ खेलने पर विवश किया गया और खेल में कपट से हराया गया था। पिफर भी इनकी सज्जनता ही थी, जो प्रण निभाकर उन्होंने खेल की शते± पूरी कीं। दुयोर्धन और उनके साथी जो यह चिल्ल - पुकार मचा रहे हैं कि बारह महीने पूरे होने से पहले ही पांडवों को उन्होंने पहचान लिया है, सरासर झूठ है और बिलवुफल अन्याय है। मेरी राय में दुयोर्धन बगैर यु( के मानेगा ही नहीं। इसलिए विलंब करना हमारे लिए बिलवुफल नासमझी की बात होगी।य् सात्यकि की इन दृढ़तापूणर् और शोरदार बातों से राजा द्रुपद बड़े खुश हुए। वह उठे और बोलेμफ्सात्यकि ने जो कहा, वह बिलवुफल सही है। मैं उनका शोरों से समथर्न करता हूँ। शल्य, धृष्टकेतु, जयत्सेन, वैफकय आदि राजाओं के पास अभी से दूत भेज देने चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि सुलह का प्रयत्न ही न किया जाए, बल्िक मेरी राय में तो राजा धृतराष्ट्र के पास अभी से किसी सुयोग्य व्यक्ित को दूत बनाकर भेजना बहुत ही शरूरी है।य् राजा द्रुपद के कह चुकने के बाद श्रीवृफष्ण उठे और बोलेμफ्सज्जनो! पांचालराज ने जो सलाह दी है वह बिलवुफल ठीक है। भैया बलराम जी और मुझ पर कौरवों का जितना हक है, उतना ही पांडवों का भी है। हम यहाँ किसीका पक्षपात करने नहीं, बल्िक उत्तरा के विवाह में शामिल होने के लिए आए हैं। हम अब अपने स्थान पर वापस चले जाएँगे। ;द्रुपद की ओर देखकरद्ध द्रुपदराज! आप सभी राजाओं में श्रेष्ठ हैं, बुि एवं आयु में भी बड़े हैं। हमारे लिए तो आप आचायर् के समान हैं। धृतराष्ट्र भी आपकीबड़ी इश्शत करते हैं। द्रोण और कृपाचायर् तो आपके लड़कपन के साथी हैं। इसलिए उचित तो यही होगा कि जो वुफछ दूत को समझाना - बुझाना हो, वह आप ही समझा दें और उन्हें हस्ितनापुर भेज दें। यदि इसके बाद दुयोर्धन न्यायोचित रूप से संिा के लिए तैयार न हो, तो सब लोग सब तरह से तैयार हो जाएँ और हमें भी कहला भेजें।य् यह निश्चय हो जाने के बाद श्रीकृष्ण अपने साथ्िायों सहित द्वारका लौट गए। विराट, द्रुपद, युिाष्िठर आदि यु( की तैयारियाँ करने में लग गए। चारों ओर दूत भेजे गए। सब मित्रा - राजाओं को सेना इकऋी करने का संदेश भेज दिया गया। पांडवों के पक्ष में राजा लोग अपनी - अपनी सेना सज्िजत करने लगे। इधर ये तैयारियाँ होने लगीं, उधर दुयोर्धन आदि भी चुपचाप बैठे नहीं रहे। वे भी यु( की तैयारियों में जी - जान से लग गए। उन्होंने अपने मित्रों के यहाँ दूतों द्वारा संदेश भेजे, जिससे सेनाएँ इकऋी की जा सवेंफ। इस तरह सारा भारतवषर् आगामी यु( के कोलाहल से गूँजने लगा। शांति - चचार् के लिए हस्ितनापुर को दूत भेजने के बाद पांडव और उनके मित्रा राजागणशोरों से यु( की तैयारी में जुट गए। श्रीकृष्ण के पास अजुर्न स्वयं पहुँचा। इधर दुयोर्धन को भीइस बात की खबर मिल गइर् कि उत्तरा केविवाह से निवृत्त होकर श्रीकृष्ण द्वारका लौट गए हैं, सो वह भी द्वारका को रवाना हो गया। संयोग की बात है कि जिस दिन अजुर्न द्वारका पहुँचा,ठीक उसी दिन दुयोर्धन भी वहाँ पहुँचा। श्रीकृष्ण के भवन में भी दोनों एक साथ ही प्रविष्ट हुए।श्रीकृष्ण उस समय आराम कर रहे थे। अजुर्न और दुयोर्धन दोनों ही उनके निकट संबंधी थे। इसलिए दोनों ही बेखटके शयनागार में चले गए। दुयोर्धन आगे था, अजुर्न शरा पीछे। कमरे मेंप्रवेश करके दुयोर्धन श्रीकृष्ण के सिरहाने एकऊँचे आसन पर जा बैठा। अजुर्न श्रीकृष्ण केपैताने ही हाथ जोड़े खड़ा रहा। श्रीकृष्ण की नींद खुली, तो उन्होंने सामने अजुर्न को खड़े देखा। उन्होंने उठकर उसका स्वागत किया और वुफशल पूछी। बाद में घूमकर आसन पर बैठे दुयोर्धन को देखा, तो उसका भी स्वागत किया और वुफशल - समाचार पूछे। उसके बाद दोनों के आने का कारण पूछा।दुयोर्धन जल्दी से पहले बोलाμफ्श्रीकृष्ण, ऐसा मालूम होता है कि हमारे और पांडवों के बीच जल्दी ही यु( छिड़ेगा। यदि ऐसा हुआ, तो मैं आपसे प्राथर्ना करने आया हूँ कि आप मेरी सहायता करें। सामान्यतः यह नियम है कि जो पहले आए, उसका काम पहले हो। आप विद्वज्जनों में श्रेष्ठ हैं। आप सबके पथ - प्रदशर्क हैं। अतः बड़ों की चलाइर् हुइर् प्रथा पर चलें और पहले मेरी सहायता करें।य्यह सुनकर श्रीकृष्ण बोलेμफ्राजन्! आप पहले पहुँचे शरूर, लेकिन मैंने तो पहले अजुर्न को ही देखा था। मेरी निगाह में तो दोनों ही बराबर हैं। इसलिए कतर्व्यभाव से मैं दोनों की ही समान रूप से सहायता करूँगा। पूवर्जों की चलाइर् हुइर् प्रथा यह है कि जो आयु में छोटा हो, उसी को पहले पुरस्कार देना चाहिए। अजुर्न आपसे आयु में छोटा है। इसलिए मैं पहले उससे ही पूछता हूँ कि वह क्या चाहता है?य् अजुर्न की तरपफ मुड़कर श्रीकृष्ण बोलेμफ्पाथर्!़सुनो! मेरे वंश के लोग नारायण कहलाते हैं। वे बड़े साहसी और वीर भी हैं। उनकी एक भारी सेना इकऋी की जा सकती है। मेरी यह सेना एक तरपफ होगी। दूसरी तरप़्ाफ अकेला मैं रहूँगा। मेरी़प्रतिज्ञा यह भी है कि यु( में मैं न तो हथ्िायार उठाउँफगा और न ही लड़गा। तुम भली - भाँतिँूसोच लो, तब निणर्य करो। इन दो में से जो पसंद हो, वह ले लो।य् बिना किसी हिचकिचाहट के अजुर्न बोलाμ फ्आप शस्त्रा उठाएँ या न उठाएँ, आप चाहे लड़ें या न लड़ें, मैं तो आपको ही चाहता हूँ।य् दुयोर्धन के आनंद की सीमा न रही। वह सोचने लगा कि अजुर्न ने खूब धोखा खाया औरश्रीकृष्ण की वह लाखों वीरोंवाली भारी - भरकम सेना सहज में ही उसके हाथ आ गइर्। यह सोचता और हषर् से पूफला न समाता दुयोर्धन बलराम जीे के यहाँ पहुँचा और उनको सारा हाल कह सुनाया। बलराम जी ने दुयोर्धन की बातें ध्यान से सुनीं औरबोलेμफ्दुयोर्धन! मालूम होता है कि उत्तरा के विवाह के अवसर पर मैंने जो वुफछ कहा थाउसकी खबर तुम्हें मिल गइर् है। कृष्ण से भी मैंने कइर् बार तुम्हारी बात छेड़ी और उसको समझाता रहा कि कौरव और पांडव दोनों ही हमारे बराबरके संबंधी हैं। ¯कतु कृष्ण मेरी सुने तब न! मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं यु( में तटस्थ रहूँगा,क्योंकि जिधर कृष्ण न हो, उस तरपफ मेरा रहना़बाल महाभारत कथा ध् 61 हस्ितनापुर को लौटते हुए दुयोर्धन का दिल बल्िलयों उछल रहा था। वह सोच रहा था कि अजुर्न बड़ा बु(ू बना। द्वारका की इतनी बड़ी सेना अब मेरी हो गइर् है और बलराम जी कास्नेह तो मुझ पर है ही। श्रीकृष्ण भी निःशस्त्रा और सेनाविहीन हो गए। यही सोचते - विचारते दुयोर्धन खुशी - खुशी अपनी राजधानी में आ पहुँचा।कृष्ण ने पूछाμफ्सखा अजुर्न! एक बात बताओ। तुमने सेना - बल के बजाए मुझ निःशस्त्रा को क्यों पसंद किया?य् अजुर्न बोलाμफ्बात यह है कि आप में वह शक्ित है कि जिससे आप अकेले ही इन तमाम राजाओं से लड़कर इन्हें वुफचल सकते हैं।य्अजर्ुन की बात सुनकर कृष्ण मुसवफराए और बोलेμफ्अच्छा, यह बात है!य् और अजुर्नको बड़े प्रेम से विदा किया। इस प्रकार श्रीकृष्ण अजुर्न के सारथी बने और पाथर् - सारथी की पदवी प्राप्त की। मद्र देश के राजा शल्य, नवुफल - सहदेव की माँ माद्री के भाइर् थे। जब उन्हें यह खबर मिली कि पांडव उपप्लव्य के नगर में यु( की तैयारियाँ कर रहे हैं, तो उन्होंने एक भारी सेना इकऋी की और उसे लेकर पांडवों की सहायता के लिए उपप्लव्य की ओर रवाना हो गए। राजा शल्य की सेना बहुत बड़ी थी। उपप्लव्य की ओर जाते हुए रास्ते में जहाँ कहीं भी शल्य विश्राम करने के लिए डेरा डालते थे, तो उनकी सेना का पड़ाव कोइर् डेढ़ योजन तक लंबा पैफल जाता था। ठीक नहीं है। अजुर्न की सहायता मैं करूइस कारण मैं अब तुम्हारी भी सहायता करने योग्य सेना लेकर पांडवों की सहायता के लिए जा रहे नहीं रहा। मेरा तटस्थ रहना ही ठीक होगा।य् हैं, तो उसने किसी प्रकार इस सेना को अपनी ँगा नहीं, जब दुयोर्धन ने सुना कि राजा शल्य विशाल ओर कर लेने का निश्चय कर लिया। अपने वुफशल कमर्चारियों को उसने आज्ञा दी कि रास्ते में जहाँ कहीं भी राजा शल्य और उनकी सेना डेरा डाले, उसे हर तरह की सुविधा पहुँचाइर् जाए। शल्य पर दुयोर्धन के आदर - सत्कार का वुफछ ऐसा असर हुआ कि उन्होंने पुत्रों के समान प्यार करने योग्य भानजों ;पांडवोंद्ध को छोड़ दिया और दुयोर्धन के पक्ष में रहकर यु( करने का वचन दे दिया। उपप्लव्य में राजा शल्य का खूब स्वागत किया गया। मामा को आया देखकर नवुफल और सहदेव के आनंद की तो सीमा ही न रही। जब भावी यु( की चचार् छिड़ी, तो शल्य ने युिाष्िठर को बताया कि किस प्रकार दुयोर्धन ने धोखा देकर उनको अपने पक्ष में कर लिया है। युिाष्िठर बोलाμफ्मामा जी! मौका आने पर निश्चय ही महाबली कणर् आपको अपना सारथी राजदूत संजय25 उपप्लव्य नगर में रहते हुए पांडवों ने अपने मित्रा राजाओं को दूतों द्वारा संदेश भेजकर कोइर् सात अक्षौहिणी सेना एकत्रा की। उधर कौरवों ने भी अपने मित्रों द्वारा काप़्ाफी बड़ी सेना इकऋी कर ली, जो ग्यारह अक्षौहिणी तक हो गइर् थी। पांचाल नरेश के पुरोहित, जो युिाष्िठर की ओर से राजदूत बनकर हस्ितनापुर गए थे, नियत समय पर धृतराष्ट्र की राजसभा में पहुँचे। यथावििा वुफशल - समाचार पूछने के बाद पांडवों की ओर से संिा का प्रस्ताव करते हुए वह बनाकर अजुर्न का वध करने का प्रयत्न करेगा। मैं यह जानना चाहता हूँ कि उस समय आप अजुर्न की मृत्यु का कारण बनेंगे या अजुर्न की रक्षा का प्रयत्न करेंगे? मैं यह पूछकर आपको असमंजस में नहीं डालना चाहता था, पर पिफर भी पूछने का मन हो गया।य् मद्रराज ने कहाμफ्बेटा युिाष्िठर, मैं धोखे में आकर दुयोर्धन को वचन दे बैठा। इसलिए यु( तो मुझे उसकी ओर से ही करना होगा। पर एक बात बताए देता हूँ कि कणर् मुझे सारथी बनाएगा, तो अजुर्न के प्राणों की रक्षा ही होगी।य् उपप्लव्य में महाराज युिाष्िठर और द्रौपदी को मद्रराज शल्य ने दिलासा दिया और कहाμ फ्जीत उन्हीं की होती है, जो धीरज से काम लेते हैं। युिाष्िठर! कणर् और दुयोर्धन की बुि पिफर गइर् है। अपनी दुष्टता के पफलस्वरूप निश्चय ही उनका सवर्नाश होकर रहेगा।य् बोलेμफ्युिाष्िठर का विचार है कि यु( से संसार का नाश ही होगा और इसी कारण वे यु( से घृणा करते हैं। वे लड़ना नहीं चाहते। इसलिए न्याय तथा पहले के समझौते के अनुसार यह उचित होगा कि आप उनकाहिस्सा देने की कृपा करें। इसमें विलंब न कीजिए।य् यह सुनकर विवेकशील और महारथी भीष्म बोलेμफ्यही न्यायोचित है कि उन्हें उनका राज्य वापस दे दिया जाए।य् भीष्म की बात कणर् को अपि्रय लगी। वह बड़े क्रोध के साथ भीष्म की बात काटकर दूत की ओर देखता हुआ बोलाμफ्तेरहवाँ बरस पूरा होने से पहले ही उन्होंने प्रतिज्ञा भंग करके अपने आपको प्रकट कर दिया है। इसलिए शतर् के अनुसार उनको पिफर से बारह बरस के लिए वनवास भोगना पड़ेगा।य् कणर् के इस प्रकार बीच में उनकी बात काटकर बोलने से भीष्म को बड़ा क्रोध आया। वह बोलेμफ्राधा - पुत्रा! तुम बेकार की बातें कर रहे हो। यदि हम युिाष्िठर के दूत के कहे अनुसार संिा नहीं करेंगे, तो निश्चय ही यु( छिड़ जाएगा और उसमें दुयोर्धन आदि सबको पराजित होकर मृत्यु के मुँह में जाना पड़ेगा।य् भीष्म की बातों से सभा में खलबली मचते देखकर धृतराष्ट्र बोलेμफ्सारे संसार की भलाइर् को ध्यान में रखकर मैंने यह निश्चय किया है कि अपनी तरप़्ाफ से संजय को दूत बनाकर पांडवों के पास भेजा जाए।य् पिफर धृतराष्ट्र ने संजय को बुलाकर कहाμफ्संजय, तुम पांडु - पुत्रों के पास जाओ। वहाँ श्रीकृष्ण, सात्यकि, विराट आदि राजाओं से भी कहना कि मैंने सप्रेम उन सबकी वुफशल पूछी है। वहाँ जाकर मेरी ओर से यु( न होने की चेष्टा करो।य् संजय उपप्लव्य को रवाना हो गए। वहाँ पहुँचकर युिाष्िठर की सभा में सबको वििावत् प्रणाम करके बोलेμफ्धमर्राज! महाराज धृतराष्ट्र ने आपकी वुफशल पूछी है और कहा है कि वह यु( की बात नहीं करना चाहते। वह तो आपकी मित्राता चाहते हैं।य् संजय की ये बातें सुनकर राजा युिाष्िठर बड़े प्रसन्न हुए और बोलेμफ्मैं तो संिा ही बाल महाभारत कथा ध् 63 चाहता हूँ। यु( का विचार करते ही मेरा मन घृणा से भर जाता है। यदि हमें अपना राज्य वापस मिल जाए, तो हम अपने सारे कष्ट भूल जाएँगे।य् संजय ने कहाμफ्युिाष्िठर! धृतराष्ट्र के पुत्रा न तो अपने पिता की बात पर ध्यान देते हैं, न भीष्म की ही वुफछ सुनते हैं। आप सदा से ही न्याय पर स्िथर हैं। आप यु( की चाह न करें।य् संजय की ये बातें सुनकर युिाष्िठर बोलेμफ्संजय! श्रीकृष्ण दोनों पक्षों के लोगों के हित¯चतक हैं। वह जो सलाह देंगे, वैसा ही मैं करूँ गा।य् तभी श्रीकृष्ण बोलेμफ्मैं स्वयं हस्ितनापुर जाना उचित समझता हूँ। मेरी यही इच्छा है कि कौरवों से संिा की जा सकती हो, तो की जाए।य् श्रीकृष्ण के बाद युिाष्िठर पिफर बोलेμफ्संजय! कौरवों की राजसभा में जाकर महाराज धृतराष्ट्र को मेरी तरपफ से प्राथर्नापूवर्क संदेश सुनाना कि़कम - से - कम हमें पाँच गाँव ही दे दें। हम पाँचों भाइर् इसी से संतोष कर लेंगे और संिा करने को तैयार होंगे।य् युिाष्िठर का यह संदेश लेकर संजय पांडवोंतथा श्रीकृष्ण से विदा होकर हस्ितनापुर को रवाना हो गए। राजसभा में आकर उन्होंने युिाष्िठर की सभा में जो चचार् हुइर् थी, उसका सारा हाल कह सुनाया। संजय के इस प्रकार कहने पर भीष्म दुयोर्धन को दोबारा समझाने के बाद धृतराष्ट्र से बोलेμ फ्राजन्! कणर् बार - बार यही दम भर रहा है कि खत्म कर डालूँगा। ¯कतु मैं कहता हूँ कि पांडवों की शक्ित का सोलहवाँ हिस्सा भी उसमें नहीं है। तुम्हारा पुत्रा उसी के कहे में चलता है और अपने नाश का आप ही आयोजन कर रहा है। विराट नगर पर आक्रमण करते समय, जब अजुर्न ने हमारा दपर् चूर कर दिया था, तब कणर् वहीं तो था! गंधवर् जब दुयोर्धन को वैफद करके ले गए थे, तब यह डपोरशंख कणर् कहाँ छिप गया था? गंधवो± को अजुर्न ने ही तो भगाया था और दुयोर्धन को उनकी वैफद से मुक्त किया था।य् इसके बाद धृतराष्ट्र ने संतप्त होकर दुयोर्धन को समझायाμफ्बेटा, भीष्म पितामह जो कहते हैं, वही करने योग्य है। यु( न होने दो। संिा करना ही उचित है।य् दुयोर्धन, जो यह सब बातें सुन रहा था, उठा और अपने पिता को साहस बँधाता हुआ बोलाμफ्पिता जी, आप भी वैफसे भोले हैं, जो यह भी नहीं समझते हैं कि स्वयं युिाष्िठर हमारा सैन्य - बल देखकर घबरा उठे हैं और इसी कारण आधे राज्य की बात छोड़कर अब केवल पाँच गाँवों की याचना कर रहे हैं। क्या उनकी इस पाँच गाँववाली माँग से यह सि( नहीं होता है कि हमारी ग्यारह अक्षौहिणी सेना देखकर युिाष्िठर के मन में भय उत्पन्न हो गया है? इतने पर भी आपको हमारी विजय के बारे में संदेह हो रहा है। यह बड़े आश्चयर् की बात है!य् धृतराष्ट्र ने समझाते हुए कहाμफ्बेटा, जब पाँच गाँव देने से ही यु( टलता है, तो बाश आओ यु( से। तुम्हारे पास तो पिफर भी पूरा - का - पूरा राज्य रह जाता है। अब हठ न करो।य् लेकिन इस उपदेश से दुयोर्धन चिढ़ गया और बोलाμफ्मैं तो सुइर् की नांेक के बराबर भूमि भी बाल महाभारत कथा ध् 65 भी देने को तैयार नहीं होंगे। इस बारे में अब आप ही सलाह दे सकते हैं।य्युिाष्िठर की बातें सुनकर श्रीकृष्ण ने कहाμफ्युिाष्िठर! मैंने भी एक बार स्वयं हस्ितनापुर जाने का इरादा कर लिया है। तुम लोगों के स्वत्वों गा। यदि मैं सपफल ँपांडवों को नहीं देना चाहता हूँ। आपकी जो इच्छा हो, करें। अब इसका पैफसला यु(भूमि में ही होगा।य् यह कहता - कहता दुयोर्धन उठ खड़ा हुआ और बाहर चला आया। सभा में खलबली मच गइर् और इस गड़बड़ी में सभा भंग हो गइर्। इधर संजय के उपप्लव्य से रवाना हो जानेके बाद युिाष्िठर श्रीकृष्ण से बोलेμफ्वासुदेव! संजय तो महाराज धृतराष्ट्र के मानो दूसरे प्राण हैं। उनकी बातों से मुझे महाराज के मन की बात स्पष्ट रूप से मालूम हो गइर् है। मैंने तो कहला भेजा है कि मैं तो केवल पाँच गाँवों से ही संतोष कर लूँगा, ¯कतु ऐसा लगता है कि वे दुष्ट इतना को यु( से बचाने की चेष्टा करूहुआ, तो इससे सारे संसार का कल्याण होगा।य्युिाष्िठर ने कहाμफ्श्रीकृष्ण! मुझे लगता है कि आप वहाँ न जाएँ। दुयोर्धन का कोइर् ठिकाना नहीं है कि वह कब क्या कर बैैठे! मुझे भय है कि कहीं वह आप पर ही प्रहार न कर दे।य्श्रीकृष्ण बोलेμफ्धमर्पुत्रा! मैं दुयोर्धन से भली - भाँति परिचित हूँ। पिफर भी हमें प्रयत्न करना ही चाहिए। किसी के यह कहने की गुंजाइश ही मैं नहीं रखना चाहता कि मुझे शांति स्थापित करने का जो प्रयास करना चाहिए था, वह नहीं किया। इसलिए मेरा तो जाना ही ठीक होगा।य्इतना कहकर श्रीकृष्ण हस्ितनापुर के लिए विदा हुए। शातिदूत श्रीकृष्णं26 शांति की बातचीत करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण हस्ितनापुर गए। उनके साथ सात्यकि भी गए थे। रास्ते में वुफशस्थल नामक स्थान में वह एक रात विश्राम करने के लिए ठहरे। हस्ितनापुर में जबयह खबर पहुँची कि श्रीकृष्ण पांडवों की ओर से दूत बनकर संिा चचार् के लिए आ रहे हैं, तो धृतराष्ट्र ने आज्ञा दी कि नगर को खूब सजाया जाए। पुरवासियों ने द्वारिकाधीश के स्वागत की धूमधाम से तैयारियाँ कीं। दुःशासन का भवन दुयोर्धन के भवन से अिाक उँफचा और सुंदर था। इसलिए धृतराष्ट्र ने आज्ञा दी किउसी भवन में श्रीकृष्ण को ठहराने का प्रबंधकिया जाए। श्रीकृष्ण हस्ितनापुर पहुँच गए। पहलेश्रीकृष्ण धृतराष्ट्र के भवन में गए। पिफर धृतराष्ट्र से विदा लेकर वह विदुर के भवन में गए।वुंफती वहीं कृष्ण की प्रतीक्षा में बैठीं थीं। श्रीकृष्ण को देखते ही उन्हें अपने पुत्रों कास्मरण हो आया। श्रीकृष्ण ने उन्हें मीठे वचनों से सांत्वना दी और उनसे विदा लेकर दुयोर्धनके भवन में गए। दुयोर्धन ने श्रीकृष्ण का शानदार स्वागत किया और उचित आदर - सत्कारकरके भोजन का न्यौता दिया। श्रीकृष्ण ने कहाμफ्राजन्! जिस उद्देश्य को लेकर मैं यहाँ आया हूँ, वह पूरा हो जाए, तब मुझे भोजन का न्यौता देना उचित होगा।य् यह कहकर वे विदुर के यहाँ चले गए और वहाँ भोजन करके विश्राम किया। इसके बाद श्रीकृष्ण और विदुर में आगे के कायर्क्रम के बारे में सलाह हुइर्। विदुर ने कहाμफ्उनकी सभा में आपका जाना भी उचित नहीं है।य् दुयोर्धनादि के स्वभाव से जो भी परिचित थे, उनका भी यही कहना था कि वे लोग कोइर् - न - कोइर्वुफचक्र रचकर श्रीकृष्ण के प्राणों तक को हानि पहुँचाने की चेष्टा करेंगे। विदुर की बातें ध्यान सेसुनने के बाद श्रीकृष्ण बोलेμफ्मेरे प्राणों की ¯चता आप न करें।य् दूसरे दिन सवेरे दुयोर्धन और शवुफनि ने आकर श्रीवृफष्ण से कहाμफ्महाराज धृतराष्ट्र आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।य् इस पर विदुर को साथ लेकर श्रीवृफष्ण धृतराष्ट्र के भवन में गए। वासुदेव के सभा मंे प्रविष्ट होते ही सभी सभासद उठ खड़े हुए। श्रीवृफष्ण ने बड़ों को वििावत् नमस्कार किया और आसन पर बैठे। राजदूत एवं सम्भ्रांत अतिथ्िा - सा उनका सत्कार किया गया। इसके बाद श्रीवृफष्ण उठे और पांडवों की माँग सभा के सामने रखी। पिफर वह धृतराष्ट्र की ओर देखकर बोलेμफ्राजन्! पांडव शांतिपि्रय हैं, परंतु साथ ही यह भी समझ लीजिए कि वे यु( के लिए भी तैयार हैं। पांडव आपको पिता स्वरूप मानते हैं। ऐसा उपाय करें, जिससे आप भाग्यशाली बनें।य् यह सुनकर धृतराष्ट्र ने कहाμफ्सभासदो! मैं भी वही चाहता हूँ, जो श्रीवृफष्ण को पि्रय है।य् इस पर श्रीवृफष्ण दुयोर्धन से बोलेμफ्मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि पांडवों को आधा राज्य लौटा दो और उनके साथ संिा कर लो। यदियह बात स्वीकृत हो गइर्, तो स्वयं पांडव तुम्हें युवराज और धृतराष्ट्र को महाराज के रूप में सहषर् स्वीकार कर लेंगे।य् भीष्म और द्रोण ने भी दुयोर्धन को बहुत समझाया। पिफर भी दुयोर्धन ने अपना हठ नहीं छोड़ा। वह श्रीवृफष्ण का प्रस्ताव स्वीकार करने पर राशी न हुआ। धृतराष्ट्र ने दोबारा पुत्रा से आग्रह किया कि श्रीवृफष्ण का प्रस्ताव मान ले, नहीं तो वुफल का सवर्नाश हो जाएगा। दुयोर्धन ने अपने आपको निदोर्ष सि( करने की जो चेष्टा की थी, उससे श्रीवृफष्ण को हँसी आ गइर्। तभी श्रीवृफष्ण ने दुयोर्धन को उन सब अत्याचारों का विस्तार से स्मरण दिलाया, जो उसने पांडवों पर किए थे। भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख वृ(ों ने भी श्रीवृफष्ण के इस वक्तव्य का समथर्न किया। यह देखकर दुःशासन व्रुफ( हो उठा और दुयोर्धन से बोलाμफ्भाइर्, मालूम होता है, ये लोग आपको वैफद करके कहीं पांडवों के हवाले न कर दें। इसलिए चलिए, यहाँ से निकल चलें।य् इस पर दुयोर्धन उठा और अपने भाइयों के साथ सभा से बाहर चला गया। इसी बीच धृतराष्ट्र ने विदुर से कहाμफ्तुम शरा गांधारी को सभा में ले आओ। उसकी समझ बहुत स्पष्ट है और वह दूर की सोच सकती है। हो सकता है, उसकी बातें दुयोर्धन मान ले।य् यह सुनकर विदुर ने सेवकों को आज्ञा देकर गांधारी को बुला लाने को भेजा। गांधारी भी सभा में आइर् और धृतराष्ट्र ने दुयोर्धन को भी सभा में पिफर से बुलाया। दुयोर्धन सभा में लौट आया। व्रफोध के बाल महाभारत कथा ध् 67 हुआ, तो उसे यह जानकर असीम आश्चयर् हुआ कि महाराज पांडु की पत्नी और पांडवों की मातावुंफती ही उसका उत्तरीय सिर पर लिए खड़ी हैं। कणर् ने श्िाष्टतापूवर्क अभ्िावादन करके कहाμफ्आज्ञा दीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?य् कारण उसकी आँखें लाल हो रही थीं। गांधारी ने भी उसे कइर् तरह से समझाया, परंतु दुयोर्धन ये बातें माननेवाला कब था! अपनी माँ को भी उसने मना कर दिया और दोबारा सभा से निकलकर चला गया। बाहर जाकर दुयोर्धन ने अपने साथ्िायों के साथ मिलकर एक षड्यंत्रा रचा और राजदूत श्रीवृफष्ण को पकड़ने का प्रयत्न किया। श्रीवृफष्ण ने तो पहले ही से इन बातों की कल्पना कर ली थी। दुयोर्धन की यह चेष्टा देखकर वह हँस पड़े। श्रीवृफष्ण उठे। सात्यकि और विदुर उनके दोनों ओर हो गए। सब सभासदों से वििावत् आज्ञा ली। सभा से चलकर सीधे वंुफती के पास पहुुँचे और उनको सभा का सारा हाल कह सुनाया। वुंफती बोलीμफ्हे वृफष्ण! अब तुम्हीं मेरे पुत्रों के रक्षक हो।य् श्रीवृफष्ण रथ पर आरूढ़ होकर उपप्लव्य की ओर तेशी से रवाना हो गए। यु( अब अनिवायर् हो गया था। श्रीवृफष्ण के हस्ितनापुर से लौटते ही शंाति स्थापना की जो थोड़ी - बहुत आशा थी, वह भी लुप्त हो गइर्। वंुफती को जब पता चला कि वुफलनाशी यु( छिड़ेगा ही, तो वह बहुत व्यावुफल हो गईं। ¯चता के कारण आवुफल हो रही वुंफती अपने पुत्रों की सुरक्षा का विचार करती हुइर् गंगा के किनारे पहुँची, जहाँ कणर् रोश संध्या - वंदन कियाकरता था। मध्याÉ के बाद कणर् का जप पूरा वंुफती ने गद्गद स्वर में कहाμफ्कणर्! यह न समझो कि तुम केवल सूत - पुत्रा ही हो। न तो राधा तुम्हारी माँ है, न अिारथ तुम्हारे पिता। तुमको जानना चाहिए कि राजवुफमारी पृथा की कोख से तुम उत्पन्न हुए हो। तुम सूयर् के अंश हो।य् थोड़ा सुस्ताने के बाद वह पिफर बोलीμ फ्बेटा! दुयोर्धन के पक्ष में होकर तुम अपने भाइयों से ही शत्राुता कर रहे हो। धृतराष्ट्र के लड़कों के आश्रित रहना तुम्हारे लिए अपमान की बात है। तुम अजुर्न के साथ मिल जाओ, वीरता से लड़ो और राज्य प्राप्त करो। वे भी तुम्हारे अधीन रहेंगे और तुम उनसे घ्िारे हुए प्रकाशमान होओगे।य् कणर् माता वुंफती का यह अनुरोध सुनकर बोलाμफ्माँ! यदि इस समय मैं दुयोर्धन का साथ छोड़कर पांडवों की तरप़्ाफ चला गया, तो लोग मुझे ही कायर कहेंगे। अब, जब यु( होना निश्िचत हो गया है, तो मैं उनको मझधार में वैफसे छोड़ जाउँफ? यह तुम्हारी वैफसी सलाह है? आज मेरा कतर्व्य यही है कि मैं पांडवों के विरु( सारी शक्ित लगाकर लडूँ़। मैं तुमसे असत्य क्यों बोलूँ? मुझे क्षमा कर दो। लेकिन हाँ, तुम्हारी भी बात एकदम व्यथर् नहीं जाएगी। अब मैं यह करूँ गा कि अजुर्न को छोड़कर और किसी पांडव के प्राण नहीं लँूगा। या तो अजुर्न इस यु( में काम आएगा, या मैं। दोनों में से एक को तो मरना ही पड़ेगा। शेष चारों पांडव मुझे चाहे कितना भी तंग करें, मैं उनको नहीं मारूँगा। माँ, तुम्हारे तो पाँच पुत्रा हर हालत में रहेंगे, चाहे मैं मर जाउँफ, चाहे अजुर्न। हम दोनों में से एक बचेगा और बाकी चार तो रहेगें ही। तुम ¯चता न करो।य् अपने बड़े पुत्रा की ये सारी बातें सुनकर माता वंुफती का मन बहुत विचलित हुआ, परंतु उन्होंने उसे अपने गले से लगा लिया और बोलीμफ्तुम्हारा कल्याण हो।य् कणर् को इस प्रकार आशीवार्द देकर वंुफती अपने महल में चली आइर्र्। पाडवों और कौरवों के सेनापतिं26 श्रीवृफष्ण उपप्लव्य लौट आए और हस्ितनापुर की चचार् का हाल पांडवों को सुनाया। युिाष्िठर अपने भाइयों से बोलेμफ्भैया! अब सेना सुसज्िजत करो और व्यूह - रचना सुचारु रूप से कर लो।य् पांडवों की विशाल सेना को सात हिस्सों में बाँट दिया गया। द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न, श्िाखंडी, सात्यकि, चेकितान, भीमसेन आदि सात महारथी इन सात दलों के नायक बने। अब प्रश्न उठा कि सेनापति किसे बनाया जाए? सबकी राय ली गइर्। अंत में युिाष्िठर ने कहाμफ्सबने जिन - जिन वीरों के नाम लिए हैं, वे सभी सेनापति बनने के योग्य हैं। ¯कतु अजुर्न की राय मुझे हर दृष्िट से ठीक प्रतीत होती है। मैं उसी का समथर्न करता हूँ। धृष्टद्युम्न को ही सारी सेना का नायक बनाया जाए।य् वीर वुफमार धृष्टद्युम्न को पांडवों की सेना का नायक बनाया गया और उसका वििावत् अभ्िाषेक किया गया। अपने कोलाहल से दिशाओं को गुँजाती हुइर् पांडवों की सेना मैदान में आ पहुँची। उधर कौरवों की सेना के नायक थे भीष्म पितामह। भीष्म ने कहाμफ्यु( का संचालनकरके अपना ट्टण अवश्य चुका दूँगा। लड़ाइर् की घोषणा करते समय मेरी सम्मति किसी ने नहीं ली थी। इसी कारण मंैने निश्चय कर लिया था कि जान - बूझकर स्वयं आगे होकर पांडु - पुत्रों का वध मैं नहीं करूँगा। कणर्, तुम लोगों का बहुत ही प्यारा है। शुरू से ही वह मेरा तथा मेरी सम्मतियों का विरोध करता आया है। अतः अच्छा हो कि अगर वह सेनापति बन जाए।इसमें मुझे कोइर् आपिा नहीं होगी।य् कणर् का उद्दंड व्यवहार भीष्म को सदा से ही बहुत खटकता रहता था। कणर् ने भी हठ कर लिया था कि जब तक भीष्म जीवित रहेंगे, तब तक वह यु( - भूमि में प्रवेश नहीं करेगा। भीष्म के मारे जाने के बाद ही वह लड़ाइर् में भाग लेगा और केवल अजुर्न को ही मारेगा। दुयोर्धन ने सब सोच - समझकर पितामह भीष्म की शतर् मान ली और उन्हीं को सेनापति नियुक्त किया। पफलतः कणर् तब तक के लिए यु( से विरत रहा। पितामह के नायकत्व में कौरव - सेना समुद्र की भाँति लहरें मारती हुइर् वुफरुक्षेत्रा की ओर प्रवाहित हुइर्। इधर यु( की तैयारियाँ हो रही थीं और उधर एक रोश बलराम पांडवों की छावनी में एकाएक जा पहुँचे। बलराम जी ने अपने बड़े - बूढ़े विराटराज और द्रुपदराज को वििावत् प्रणाम किया और धमर्राज के पास बैठ गए। वह बोलेμफ्कितनी ही बार मैंने वृफष्ण को कहा था कि हमारे लिए तो पांडव और कौरव दोनों ही एक समान हैं। इसमें हमें बीच में पड़ने की आवश्यकता नहीं है, पर वृफष्ण ने मेरी बात नहीं मानी। अजुर्न के प्रति उसका इतना स्नेह है कि उसने तुम्हारे पक्ष में रहकर यु( करना भी स्वीकार कर लिया। जिस तरपफ वृफष्ण हो, उसके विपक्ष में मैं भला़वैफसे जाउँफ? भीम और दुयोर्धन दोनों ने ही मुझसे गदा - यु( सीखा है। दोनों ही मेरे श्िाष्य हैं। दोनों पर मेरा एक जैसा प्यार है। इन दोनों वुफरफवंश्िायों को यों आपस में लड़ते - मरते देखना मुझसे सहन नहीं होता है। लड़ो तुम लोग, परतंु यह सब देखने के लिए मैं यहाँ नहीं रह सकता ह। मुझेँूअब संसार से विराग हो गया है। अतः मैं जा रहा हूँ।य् यु( के समय सारे भारतवषर् में दो ही राजा यु( में सम्िमलित नहीं हुए और तटस्थ रहेμएक बलराम और दूसरे भोजकट के राजा रुक्मी। रुक्मी की छोटी बहन रुक्िमणी श्रीवृफष्ण की पत्नी थी। वुफरुक्षेत्रा में होनेवाले यु( के समाचार सुनकर रुक्मी एक अक्षौहिणी सेना लेकर यु( में सम्िमलित होने को गया। उसने सोचा कि यह अवसर वासुदेव की मित्राता प्राप्त कर लेने के लिए ठीक बाल महाभारत कथा ध् 69 होगा। इसलिए वह पांडवों के पास पहुँचा और अजर्ुन से बोलाμफ्पांडु - पुत्रा! आपकी सेना से शत्राु - सेना वुफछ अिाक मालूम होती है। इसी कारण मैं आपकी सहायता करने आया हूँ।य् यह सुनकर अजर्ुन हँसते हुए रुक्मी से बोलाμफ्राजन्! आप बिना शतर् के सहायता करना चाहते हैं, तो आपका स्वागत है। नहीं तो आपकी जैसी इच्छा।य् यह सुनकर रुक्मी बड़ा व्रुफ( हुआ और अपनी सेना लेकर दुयोर्धन के पास चला गया। रुक्मी ने दुयोर्धन से कहाμफ्पांडव मेरी मदद नहीं चाहते हैं। इस कारण मैं आपकी सहायता हेतु आया हूँ।य् पांडवों ने जिसकी सहायता स्वीकार नहीं की, हमें उसकी सहायता स्वीकार करने की शरूरत नहीं है।य् यह कहकर दुयोर्धन ने भी रुक्मी की सहायता ठुकरा दी। बेचारा रुक्मी दोनों तरपफ से अपमानित होकर भोजकट वापस लौट़गया। रुक्मी कतर्व्य से प्रेरित होकर नहीं, बल्िक अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के उद्देश्य से वुफरुक्षेत्रा गया और अपमानित हुआ। वुफरुक्षेत्रा के मैदान में दोनों तरपफ की सेनाएँ़लड़ने को तैयार खड़ी थीं। उन दिनों की रीति के अनुसार दोनों पक्ष के वीरों ने यु( - नीति पर चलने की प्रतिज्ञाएँ लीं। कौरवों की सेना की व्यूह - रचना देखकर युिाष्िठर ने अजुर्न को आज्ञा दीμफ्एक जगह सब वीरों को इकऋे रहकर लड़ना होगा। अतः सेना को सूची - मुख ;सूइर् की नोंक के समानद्ध व्यूह में सज्िजत करो।य् इस प्रकार दोनों पक्षों की सेनाओं की व्यूह - रचना हो गइर्। अजुर्न ने यु( के लिए तैयार हुए वीरों को देखा, तो उसके मन में शंका हुइर् कि हम यह क्या करने जा रहे हैं। उसने अपनी यह शंका श्रीवृफष्ण पर प्रकट की। तब अजुर्न के इस भ्रम को दूर करने के लिए श्रीवृफष्ण ने वुफरुक्षेत्रा में जिस कमर्योग का उपदेश दिया, वह तो विश्वविख्यात है। सब लोग इसी की राह देख रहे थे कि कब यु( शुरू हो, पर एकाएक पांडव - सेना के बीच में हलचल मच गइर्। देखते क्या हैं कि युिाष्िठर ने अचानक अपना कवच और धनुष - बाण उतारकर रथ पर रख दिया है और रथ से उतरकर हाथ जोड़े कौरव - सेना की हथ्िायारबंद पंक्ितयों को चीरते हुए भीष्म की ओर पैदल जा रहे हैं। बिना सूचना दिए उनको इस प्रकार जाते देखकर दोनों ही पक्षवाले अचंभे में पड़ गए। अजुर्न तुरंत रथ से वूफद पड़ा और युिाष्िठर के पीछे कौरव - सेना में घुस गया। दूसरे, पांडव और श्रीवृफष्ण भी उनके साथ ही हो लिए। इतने में श्रीवृफष्ण बोलेμफ्अजुर्न, मैं समझ गया हूँ कि महाराज युिाष्िठर की इच्छा क्या है। बिना बड़ों की आज्ञा लिए यु( करना अनुचित माना जाता है। धमर्राज का उद्देश्य अच्छा ही है।य् शत्राु - सेना के हथ्िायारबंद वीरों की कतार को चीरते हुए युिाष्िठर सीधे पितामह भीष्म के पास पहुँचे और झुककर उनके चरण छुए। पिफर बोलेμफ्पितामह! हमने आपके साथ लड़ने का दुःसाहस कर ही लिया। वृफपया हमंें यु( की अनुमति दीजिए और आशीवार्द भी कि हम यु( में विजय प्राप्त करें।य् भीष्म बोलेμफ्बेटा युिाष्िठर, मुझे तुमसे यही आशा थी। मैं स्वतंत्रा नहीं हूँ। विवश होकर मुझे तुम्हारे विपक्ष में रहना पड़ रहा है। पिफर भी मेरी यही कामना है कि रण में विजय तुम्हारी हो।य् भीष्म की आज्ञा और आशीवार्द प्राप्त कर लेने के बाद युिाष्िठर आचायर् द्रोण के पास गए और परिव्रफमा करके उनको दंडवत् किया। आचायर् ने आशीवार्द देते हुए कहाμफ्मैं भी कौरवों के अधीन हूँ। उनका साथ देने को विवश हूँ। पिफर भी मेरी यही कामना है कि जीत तुम्हारी ही हो।य् आचायर् द्रोण से आशीष लेकर धमर्राज ने आचायर् वृफप एवं मद्रराज शल्य के पास जाकर उनके भी आशीवार्द प्राप्त किए और सेना में लौट आए। पहला, दूसरा और तीसरा दिन कौरवों की सेना के अग्रभाग पर प्रायः दुःशासन ही रहा करता था और पांडवों की सेना के आगे भीमसेन। बाप ने बेटे को मारा। बेटे ने पिता के प्राण लिए। भानजे ने मामा का वध किया। मामा ने भानजे का काम तमाम किया। यु( का यह दृश्य था। पहले दिन की लड़ाइर् में भीष्म ने पांडवों पर ऐसा हमला किया कि पांडव - सेना थरार् उठी। युिाष्िठर के मन में भय छा गया। बाल महाभारत कथा ध् 71 यु( शुरू हुआ, तो पहले बड़े यो(ाओं में द्वंद्व होने लगा। बराबर की ताकतवाले एक ही जैसे हथ्िायार लेकर दो - दो की जोड़ी में लड़ने लगे। अजुर्न के साथ भीष्म, सात्यकि के साथ वृफतवमार् और अभ्िामन्यु बृहत्पाल के साथ भ्िाड़ गए। भीमसेन दुयोर्धन से जा भ्िाड़ा। युिाष्िठर शल्य के साथ लड़ने लगे। धृष्टद्युम्न ने आचायर् द्रोण पर सारी शक्ित लगाकर हमला बोल दिया और इसी प्रकार प्रत्येक वीर यु( - धमर् का पालन करता हुआ द्वंद्व करने लगा। भीष्म के नेतृत्व में कौरव - वीरों ने दस दिन तक यु( किया। दस दिन के बाद भीष्म आहत हुए और द्रोणाचायर् सेनापति नियुक्त किए गए। द्रोणाचायर् भी जब खेत रहे, तोे कणर् को सेनापतित्व ग्रहण करना पड़ा। सत्राहवें दिन की लड़ाइर् में कणर् का भी स्वगर्वास हो गया। इसके बाद शल्य ने कौरवों का सेनापति बनकर सेना का संचालन किया। इस प्रकार महाभारत का यु( वुफल अऋारह दिन चला। दुयोर्धन आनंद के कारण झूमता हुआ दिखाइर् दिया। पांडव घबराहट के मारे श्रीवृफष्ण के पास गए। श्रीवृफष्ण युिाष्िठर और पांडव - सेना का धीरज बँधाने लगे। पहले दिन की लड़ाइर् में पांडव - सेना की जो दुगर्ति हुइर् थी, उससे सबक लेकर पांडव - सेना के नायक धृष्टद्युम्न ने दूसरे दिन बड़ी सतवर्फता के साथ व्यूह - रचना की और सैनिकों का साहस बँधाया। सारी कौरव - सेना में तीन ही ऐसे वीर थे, जो अजुर्न का मुकाबला कर सकते थेμभीष्म, द्रोण और कणर्। सारे कौरव - वीरों को अपना प्रतिरोध करते हुए देखकर अजर्ुन ने अपना गांडीव हाथ में लेकर इस वुफशलता से यु( किया कि कौरव - सेना के सभी महारथी देखकर दंग रह गए। भीष्म ने अजर्ुन पर शोरों से हमला कर दिया। इस प्रकार अजर्ुन और भीष्म के बीच बड़ी देर तक यु( होता रहा। पिफर भी हार - जीत का वफोइर् निणर्य न हो सका। एक ओर यह अद्भुत यु( हो रहा था, तो दूसरी ओर दु्रपद का पुत्रा धृष्टद्युम्न, जो द्रोणाचायर् का जन्म से बैरी था, आचायर् के साथ यु(रत था। सात्यकि द्वारा छोड़े गए एक बाण ने भीष्म के सारथी को मार गिराया। सारथी के गिर जाने पर घोड़े हवा से बातें करते हुए अत्यंत वेग से भाग खड़े हुए। इससे कौरव - सेना में बड़ी तबाही मची। सब कौरव - वीर पश्िचम की ओर देख - देखकर यह मनाने लगे कि कब सूयार्स्त हो और यु( बंद हो, ताकि इस तबाही से मुक्ित मिले। सूयर् अस्त हुआ। संध्या हुइर् और यु( बंद हुआ। पहले दिन की लड़ाइर् के बाद पांडवों में जो आतंक छाया हुआ था, वह दूसरे दिन के यु( वफा अंत होने के बाद कौरवों के मन पर छा गया। तीसरे दिन दोनों सेनाओं की व्यूह - रचना हो जाने के बाद दोनों पक्ष पिफर से यु( में लग गए और एक - दूसरे पर हमला करने लगे। भीमसेन द्वारा चलाए एक बाण से दुयोर्धन शोर का धक्का खाकर बेहोश हो गया और रथ पर गिर पड़ा। यह देखकर उसके सारथी ने सोचा कि दुयोर्धन को लड़ाइर् के मैदान से हटा लिया जाए, जिससे कौरव - सेना को दुयोर्धन के मू£च्छत होने का पता न चले। इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर सारथी जल्दी से रथ को यु( - भूमि से हटाकर छावनी की ओर ले गया, ¯कतु उसने जो सोचा था, हुआ उससे उलटा ही। अनुशासन के टूटने और सेना में खलबली मच जाने का कारण वह स्वयं ही बन गया। सैनिकों में भगदड़ मच गइर्। इधर पांडवों की सेना में आनंद छाया हुआ था। दिन के पहले भाग में उन्होंने कौरव - सेना पर जिस प्रकार हमला करके उसे तितर - बितर कर दिया था, उन्हें इस बात की आशा न थी कि भीष्म इस बिखरी हुइर् सेना को पिफर से इकऋा करके उन पर टूट पड़ेंगे। भीष्म ने ऐसा भयानक हमला किया कि पांडव - सेना के पाँव उखड़ गए। श्रीवृफष्ण, अजुर्न और श्िाखंडी के प्रयत्नों के बावजूद सेना अनुशासन में न रह सकी। भीष्म के छोड़े गए कइर् बाण अजुर्न एवं श्रीवृफष्ण के शरीर पर लग ही गए। इस पर श्रीवृफष्ण को असीम व्रफोध आ गया। उनसे रहा न गया। उन्होंने खुद भीष्म को मारने की ठानी। अजुर्न यह देखकर सन्न रह गया। उसने सोचा कि यह तो बड़ा अनथर् हो जाएगा। वह रथ से उतरा और श्रीवृफष्ण के पीछे भागा। अजुर्न के आग्रह पर श्रीवृफष्ण वापस लौटकर पिफर से अजुर्न का रथ हाँकने लगे। श्रीवृफष्ण के इस कायर् से अजुर्न उत्तेजित हो उठा और कौरव - सेना पर वह वज्र के समान गिरा। शाम होते - होते कौरव - सेना बड़ी बुरी तरह से हार गइर्। थकी - हारी सेना मशालों की रोशनी में अपने श्िाविरों को लौट चली। बाल महाभारत कथा ध् 73 चैथा, पाँचवाँ और छठा दिन29 पौ पफटी। लड़ाइर् शुरू हो गइर्। शल्य का पुत्रा मारा गया। भीमसेन ने दुयोर्धन के आठ भाइर् मार डाले। दुयोर्धन ने भी निशाना साधकर भीमसेन की छाती पर एक भीषण अस्त्रा चलाया। चोट खाकर भीम मू£च्छत - सा होकर रथ पर बैठ गया। अपने पिता का यह हाल देखकर घटोत्कच के क्रोध का ठिकाना न रहा। वह आपे से बाहर हो गया और उसने भयानक यु( शुरू कर दिया। घटोत्कच के भीषण आक्रमण के आगे कौरव - सेना टिक न सकी। सेना को विह्नल होती देखकर भीष्म ने यु( बंद कर दिया और सेना लौटा दी। उस दिन की लड़ाइर् में दुयोर्धन के कितने ही भाइर् मारे गए। ¯चताग्रस्त दुयोर्धन अपने श्िाविर में जाकर व्यथ्िात हृदय से बैठ गया। उसकी आँखें भर आईं। संजय वुफरुक्षेत्रा के मैदान का आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुनाता जाता था। वहाँ का बयान सुनते - सुनते धृतराष्ट्र व्यथ्िात हो जाते थे। वह दुख उनकी सहनशक्ित से भारी हो जाता था, तो वह वुफछ कह - सुनकर अपना शोक - भार हलका कर लेते। दुयोर्धन बड़ी देर तक विचारों मंे डूबा रहा। इसी प्रकार सोचते - सोचते उसे नींद आ गइर्। सुबह होने पर दोनों सेनाएँ पिफर यु( के लिए सज्िजत हो गईं। लड़ाइर् शुरू हो गइर्। उस दिन संध्या होते - होते अजुर्न ने हशारों कौरव - सैनिकों का जीवन समाप्त कर दिया। यह देखकर पांडव - सेना के वीरों ने अजुर्न को चारों ओर से घेर लिया और शोर का जय - जयकार कर उठे। उधर सूरज डूबा और भीष्म ने यु( बंद करने की आज्ञा दी। दोनों ओर के थके - थकाए सैनिक अपनी - अपनी छावनी की ओर चले गए। छठे दिन सवेरे यु( छिड़ते ही दोनों तरप़्ाफ की जन - हानि बड़ी तादाद में होने लगी। पर अंत में द्रोण ने वह तबाही मचाइर् कि पांडव - सेना के पाँव उखड़ गए। इसके बाद तो अंधाधुध यु( होने लगा। अंत में दुयोर्धन बुरी तरह घायल हुआ और बेहोश होकर रथ से गिर पड़ा। तब वृफपाचायर् ने बड़ी चतुराइर् से उसे रथ पर ले लिया, जिससे दुयोर्धन की जान बच गइर्। आकाश लाल हो चला। सूरज डूबना ही चाहता था। पिफर भी वुफछ मुहूतर् तक यु( जारी रहा। सूयार्स्त के बाद यु( समाप्त हुआ। आज का यु( इतना भयंकर था कि धृष्टद्युम्न और भीमसेन के सवुफशल श्िाविर में लौट आने पर युिाष्िठर ने बड़ा आनंद मनाया। उनकी खुशी की सीमा न थी। सातवाँ, आठवाँ और नवाँ दिन सातवें दिन का यु( वंेफदि्रत न था, बल्िक कइर् अजुर्न के विरफ( स्वयं भीष्म डटे हुए थे। एक मोचो± पर व्याप्त था। प्रत्येक मोचेर् पर विख्यात स्थान पर द्रोणाचायर् और विराटराज में भीषण वीरों में घमासान यु( होता रहा। एक मोचेर् पर यु( हो रहा था। एक अन्य मोचेर् पर श्िाखंडी घटोत्कच और भगदत्त में भयानक द्वंद्व छिड़ा दिन के यु( में तीसरे वुफमार शंख ने पिता के और अश्वत्थामा में लड़ाइर् हो रही थी। एक स्थान पर धृष्टद्युम्न और दुयोर्धन यु(रत थे। एक ओर नवुफल और सहदेव अपने मामा शल्य पर बाण बरसा रहे थे। दूसरी ओर अवंती के दोनों राजा युधामन्यु से लड़ते दिखाइर् दे रहे थे। एक मोचेर् पर दुयोर्धन के चार भाइयों की अकेला भीमसेन खबर ले रहा था, तो दूसरे मोचेर् परहुआ था। एक ओर मोचेर् पर अलंबुष और सात्यकि की टक्कर थी। युिाष्िठर का श्रुतायु के साथ द्वंद्व हो रहा था, जबकि वृफपाचायर् और चेकितान एक अन्य मोचेर् पर लड़ रहे थे। द्रोणाचायर् के साथ लड़ाइर् में विराट को हारखानी पड़ी। विराट वुफमार उत्तर एवं श्वेत पहले ही दिन की लड़ाइर् में काम आ चुके थे। सातवें देखते - देखते प्राण त्याग दिए, परंतु यह यु( अिाक देर नहीं चला। सूरज अस्त होने लगा और यु( बंद हुआ। आठवें दिन का यु( शुरू हुआ, तो पहले ही धावे में भीमसेन ने धृतराष्ट्र के आठ बेटों का वध कर दिया। एक ऐसी घटना हुइर् कि जिससे अजुर्न शोक - विह्नल हो उठा। उसका लाड़ला, साहसी और वीर बेटा इरावान, जो एक नागकन्या से पैदा हुआ था, उस दिन खेत रहा। इधर भीमसेन के पुत्रा घटोत्कच ने जब देखा कि इरावान मारा गया, तो उसने इतने शोर से गजर्ना की कि जिससे सारी सेना थरार् उठी। उसके बाद वह कौरव - सेना पर टूट पड़ा और घोर प्रलय मचाने लगा। युिाष्िठर को लगा कि घटोत्कच बाल महाभारत कथा ध् 75 पर कोइर् आप़्ाफत आइर् है। उन्होंने तत्काल भीमसेन को घटनास्थल पर भेज दिया। भीमसेन के आ जाने पर तो यु( की भयानकता और भी अिाक बढ़ गइर्, परंतु जल्दी ही सूयार्स्त हो गया और यु( बंद हुआ। नवें दिन के यु( में अभ्िामन्यु और अलंबुष में घोर संग्राम छिड़ गया। धनंजय के पुत्रा ने पिता की ही भाँति रण - कौशल का परिचय दिया। पांडवों की सेना की पितामह ने उस दिन बड़ी दुगर्त की। यहाँ तक कि अजुर्न और श्रीवृफष्ण दोनों को ही बड़ी पीड़ा हुइर्। सैनिक बहुत पीडि़त हो रहे थे। थोड़ी देर में सूयार्स्त हुआ और उस दिन यु( बंद कर दिया गया। भीष्म शर - शय्या पर31 दसवें दिन का यु( शुरू हुआ। आज पांडवों ने श्िाखंडी को आगे किया था। आगे - आगे श्िाखंडी और उसके पीछे अजुर्न। श्िाखंडी की आड़ से अजुर्न ने पितामह पर बाण बरसाए। श्िाखंडी के बाणों ने वृ( पितामह का वक्ष - स्थल बींध डाला। भीष्म ने अपने चेहरे पर शरा भी श्िाकन न आनेदी और श्िाखंडी के बाणों का प्रत्युत्तर नहीं दिया। अजुर्न ने जब यह देखा कि पितामह प्रतिरोध नहीं कर रहे हैं, तो शरा जी कड़ा करके उसने भीष्म के ममर् - स्थानों को लक्ष्य करके तीखे बाणों से बींधना शुरू कर दिया। भीष्म का सारा शरीर ¯बध गया, पर इतने पर भी उनका मुख मलिन न हुआ। भीष्म ने अजुर्न पर शक्ित - अस्त्रा चलाया। अजुर्न ने उसे तीन बाणों से काट गिराया। अब भीष्म को यह निश्चय हो गया था कि आज का यु( उनका आख्िारी यु( होगा। इस कारण वह हाथ में ढाल - तलवार लेकर रथ से उतरने लगे। अजर्ुन का बाण बरसाना जारी था। उसके बाणों ने पितामह के शरीर में उँगली रखने की भी जगह न छोड़ी थी। पितामह के सारे शरीर में बाण - ही - बाण घुस गए थे। ऐसी अवस्था में ही भीष्म रथ से सिर के बल शमीन पर गिर पड़े। भीष्म गिर तो गए, लेकिन उनका शरीर भूमि से नहीं लगा। सारे शरीर में जो बाण लगे हुए थे वे एक तरप़़्ाफ से घुसकर दूसरी तरपफ निकल आए थे। भीष्म का शरीर शमीन पर न गिरकर उन तीरों के सहारे ही उफपर उठा रहा। पितामह अजुर्न से बोलेμफ्बेटा अजुर्न, मेरे सिर के नीचे कोइर् सहारा नहीं है। वह लटक रहा है। कोइर् ठीक - सा सहारा तो लगा दो।य् भीष्म ने ये वचन उसी अजुर्न से कहे, जिसने अभी - अभी प्राणहारी बाणों से उनको बींध डाला था। भीष्म का आदेश सुनते ही अजुर्न ने अपने तरकस से तीन तेश बाण निकाले और पितामह का सिर उनकी नोंक पर रखकर उनके लिए उपयुक्त तकिया बना दिया। भीष्म बोलेμफ्हे राजागण! अजुर्न ने मेरे लिए जो सिरहाना बनाया है, उसी से मैं प्रसन्न हुआ हूँ। अभी मेरा शरीर - त्याग करने का उचितसमय नहीं हुआ है। अतः सूयर्नारायण के उत्तरायण होने तक मैं यहीं और ऐसा ही पड़ा रहूँगा। आप लोगों में से जो भी उस समय तक जीवित बचें, वे आकर मुझे देख जाएँ।य् इसके बाद पितामह ने अजुर्न से कहाμफ्बेटा! मेरा सारा शरीर जल रहा है और प्यास लग रही है। थोड़ा पानी तो पिलाओ।य् अजुर्न ने तुरंत धनुष तानकर भीष्म की दाहिनी बगल में पृथ्वी पर बड़े शोर से एक तीर दिखाइर् दी। यह देखकर भीष्म का दिल भर आया। शरीर पर लगे हुए बाणों से होनेवाले कष्ट को दबाकर बोलेμफ्बेटा, तुम राधा के पुत्रा नहीं, वंुफती के पुत्रा हो। सूयर्पुत्रा! मैंने तुमसे कभी द्वेष नहीं किया। अकारण ही तुमने पांडवों से वैर रखा। इसी कारण तुम्हारे प्रति मेरा मन मलिन हुआ। तुम्हारी दान - वीरता और शूरता से मैं भली - भाँति परिचित हूँ। इसमें कोइर् संदेह नहीं कि शूरता में तुम वृफष्ण और अजुर्न की बराबरी कर सकते हो। तुम पांडवों में ज्येष्ठ हो। इस कारण तुम्हारा कतर्व्य है कि तुम उनसे मित्राता कर लो। मेरी यही इच्छा है कि यु( में मेरे सेनापतित्व के साथ ही पांडवों के प्रति तुम्हारे वैरभाव का भी आज ही अंत हो जाए।य् यह सुनकर कणर् बड़ी नम्रता के साथ बोलाμफ्पितामह! मैं जानता हूँ कि मैं वंुफती का पुत्रा हूँ, लेकिन यह भी मुझे मालूम है कि मैं सूत - पुत्रा नहीं हूँ, लेकिन यह बात मुझसे नहीं हो सकती कि अब मैं दुयोर्धन का साथ छोड़ दूँ और उनके शत्राुओं से जा मिलूँ। मेरा कतर्व्य यही है कि मैं दुयोर्धन के ही पक्ष में रहकर यु( करूँ। आप वृफपया मुझे इस बात की अनुमति दें कि मैं मारा। बाण पृथ्वी में घुसकर सीधा पाताल में जा दुयोर्धन की तरप़्ँ़ाफ से लड। मैंने जो वुफछ किया याू लगा। उसी क्षण उस स्थल से जल का एक सोता पूफट निकला। और पितामह भीष्म ने अमृत के समान मधुर और शीतल जल पीकर अपनी प्यास बुझाइर्। वह बहुत ही खुश और प्रसन्न दिखाइर् दिए। जब कणर् को यह पता चला कि पितामह भीष्म घायल होकर रणक्षेत्रा में पड़े हैं, तो वह उनके पास गया। प्रणाम करके जब कणर् उठा, तो पितामह को उसके मुख पर भय की छाया - सी कहा है, उसमें जितने दोष हों, उसके लिए मुझे क्षमा कर दें।य् कणर् का कथन भीष्म बड़े ध्यान से सुनते रहे। उसके बाद बोलेμफ्जो तुम्हारी इच्छा हो, वही करो।य् भीष्म पितामह से आशीष पाकर कणर् बहुत प्रसन्न हुआ और रथ पर चढ़कर यु(क्षेत्रा में जा पहुँचा। कणर् को देखते ही दुयोर्धन आनंद के मारे पूफल उठा। भीष्म के बिछोह का जो दुख उसके लिए दुःसह - सा प्रतीत हो रहा था, अब कणर् के आ जाने पर किसी तरह उसे भूल जाना उसके लिए संभव मालूम होने लगा। दुयोर्धन और कणर् इस बारे में सोच - विचार करने लगे कि अब सेनापति किसे बनाया जाए। रीति से द्रोणाचायर् का सेनापति - पद पर अभ्िाषेक हुआ। द्रोणाचायर् ने पाँच दिन तक कौरवों की सेना का संचालन करते हुए घोर यु( किया। यद्यपि अवस्था में वह बूढ़े थे, पिफर भी सात्यकि, भीम, अजुर्न, धृष्टद्युम्न, अभ्िामन्यु, द्रुपद, काश्िाराज आदि सुविख्यात वीरों के विरफ( द्रोणाचायर् अकेले ही भ्िाड़ जाते थे और एक - एक को खदेड़ देते थे। पाँचों दिन तक उनके हाथों पांडवों की सेना बहुत ही सताइर् गइर्। आचायर् द्रोण ने पांडव - सेना की नाक में दम कर दिया। द्रोणाचायर् के सेनापतित्व ग्रहण करने के बाद दुयोर्धन, कणर् और दुःशासनμ तीनों ने आपस में सलाह करके एक योजना बनाइर्। उसके अनुसार दुयोर्धन आचायर् के पास जाकर बोला - फ्आचायर्! किसी भी उपाय से आप युिाष्िठर को जीवित ही पकड़ कर हमारे हवालेकर सवेंफ तो बड़ा ही उत्तम हो!य् दुयोर्धन का उद्देश्य तो वुफछ और ही था। दुयोर्धन को यह भी पता चल गया था कि युिाष्िठर का वध करने से कोइर् लाभ नहीं हो सकता। इसके विपरीत यदि युिाष्िठर को जीवित पकड़ लिया जाए, तो यु( भी शीघ्र ही बंद हो जाएगा और जीत भी कौरवों की होगी। थोड़ा राज्य युिाष्िठर को देने का बहाना करना होगा, सो वह कर देंगे और बाद में पिफर जुआ खेलकर सहज ही में उसे वापस छीन भी लेंगे। इन्हीं सब विचारों से प्रेरित होकर दुयोर्धन ने द्रोणाचायर् से युिाष्िठर को जीवित पकड़ लाने का अनुरोध बाल महाभारत कथा ध् 77 किया था। लेकिन द्रोण को जब दुयोर्धन के असली उद्देश्य का पता लगा, तो वह बहुत उदास हो गए। इससे उनके मन में दुयोर्धन के प्रति तीव्र घृणा उत्पन्न हो गइर्। मन - ही - मन यह सोचकर उन्होंने संतोष कर लिया कि युिाष्िठर के प्राण न लेने का कोइर् - न - कोइर् बहाना तो मिल ही गया। पांडव तो द्रोणाचायर् की अद्वितीय शूरता एवं शस्त्रा विद्या के अनुपम ज्ञान से भली - भाँति परिचित ही थे। अतः जब सुना कि द्रोणाचायर् ने युिाष्िठर को पकड़ने का निश्चय ही नहीं किया है, बल्िक प्रतिज्ञा भी की है, तो वे भी भयभीत हो गए। सबको यही ¯चता रहने लगी कि किसी भी तरह युिाष्िठर की रक्षा का पूरा - पूरा प्रबंध किया जाए। द्रोण ने अपने सारथी को आज्ञा दी कि रथ को उस ओर ले चलो, जिधर युिाष्िठर यु( कर रहे हों। युिाष्िठर सँभले, इससे पहले ही द्रोणाचायर् वेग से उनके निकट जा पहुँचे। धृष्टद्युम्न ने हशार चेष्टा की, परंतु वह द्रोण को नहीं रोक सका। ‘युिाष्िठर पकड़े गए!’ ‘युिाष्िठर पकड़े गए!’ की चिल्लाहट से सारा वुफरफक्षेत्रा गूँज उठा। इतने ही में एकाएक न जाने कहाँ से अजुर्न उधर आ पहँुचा और अजुर्न के गांडीव से बाणों की ऐसी अविरल बौछार छूट रही थी कि कोइर् देख ही नहीं पाता था कि कब बाण धनुष पर चढ़ते और कब छूटते थे। वुफरफक्षेत्रा का आकाश बाणों से भर गया। इस कारण सारे मैदान में अंधकार - सा छा गया। अजुर्न के हमले के कारण द्रोणाचायर् को पीछे हटना पड़ा। युिाष्िठर को जीवित पकड़ने का उनका प्रयत्न विपफल हो गया और संध्या होते - होते उस दिन का यु( भी बंद हो गया। कौरव - सेना में भय छा गया। पांडव - सेना के वीर शान से अपने - अपने श्िाविर को लौट चले। बारहवाँ दिन32 युिाष्िठर को जीवित पकड़ने की चेष्टा के विपफल हो जाने पर अंत में यही निश्चय किया गया कि अजुर्न को यु( के लिए ललकारा जाए और लड़ते - लड़ते उसे युिाष्िठर से दूर हटाकर ले जाया जाए। यु( का बारहवाँ दिन था। बहुत ही भयानक लड़ाइर् हो रही थी। आचायर् द्रोण ने युिाष्िठर को जीवित पकड़ने की कइर् बार चेष्टाकी पर असपफल रहे। ‘भगदत्त के हाथी ने भीमसेन को मार दिया!’ यह शोर सुनकर युिाष्िठर ने भी विश्वास कर लिया कि भीमसेन सचमुच ही मारा गया होगा। यह सोचकर उन्होंने अपनेवीरों को आज्ञा दी कि वे भगदत्त पर हमला करें। इधर युिाष्िठर द्वारा भेजी गइर् वुफमुक आ पहुँचीथी और वृ( भगदत्त को चारों तरप़्ाफ से पांडव - वीरों ने घेर लिया था। उधर दूर अजुर्न संशप्तकों से लड़ रहा था। अजुर्न के पहुँचते ही पांडवों की सेना मेंनया उत्साह आ गया। हाथी पर सवार भगदत्त ने अजुर्न और श्रीवृफष्ण दोनों पर ही बाणबरसाने शुरू किए। भगदत्त ने एक तोमर अजुर्न पर चलाया। तोमर अजुर्न के मुवुफट पर जा लगा। इससे अजुर्न को बड़ा क्रोध आया। उसने अपना मुवुफट सँभालकर रख लिया औरबोलाμफ्भगदत्त अब इस संसार को अंतिम बार सैन्य - समूह के पीछे - पीछे चलते हुए वृफष्ण और अजुर्न अपने श्िाविर में जा पहुँचे। इस प्रकार ग्यारहवें दिन का यु( समाप्त हुआ। अच्छी तरह से देख लो।य् यह कहते - कहते अजुर्न ने अपना गांडीव तान लिया। अजुर्न द्वाराछोड़े गए बाणों से भगदत्त का धनुष टूट गया। तरकश का भी यही हाल हुआ। अजुर्न नेभगदत्त के ममर् - स्थानों पर भी बाण चलाकर उन्हें छेद डाला। इसके बाद अजुर्न के तेशबाणों से भगदत्त की आँखों के उफपर बँधी हुइर् रेशम की प‘ी कट गइर्, जो उसकी आँखों के उफपर लटक आनेवाली चमड़ी को उफपर उठाएरखती थी। इससे भगदत्त की आँखें बंद हो गईं। उसे वुफछ भी सूझना बंद हो गया। वह अँधेरे में मानो विलीन - सा हो गया। थोड़ी ही देर बाद एक और पैने बाण ने उसकी छाती भेद डाली।भगदत्त को गिरते हुए देखकर कौरवों की सेना मारे भय के तितर - बितर होने लगी। ¯कतु शवुफनि के दो भाइर् वृषक और अचक तब भी विचलित न हुए और जमकर लड़ते रहे। उन दोनों वीरों ने अजुर्न पर आगे और पीछे से बाणों की वषार् करके खूब परेशान किया। अजुर्न ने थोड़ी देर बाद उन दोनों के रथों को तहस - नहस कर दिया और उनकी सेनाओं पर भी भयानक बाण - वषार् की। ¯सह - श्िाशुओं के समान वे दोनों भाइर् अजुर्न के बाणों से घायल होकर गिर पड़े और मृत्यु को प्राप्त हुए। अपने अनुपम वीर भाइयों के मारे जाने पर शवुफनि के क्रोध और क्षोभ की सीमा न रही। उसने यु( शुरू कर दिया और उन सब उपायों से काम लिया, जिनमें उसे वुफशलता प्राप्त थी। परंतु अजुर्न ने उसके एक - एक अस्त्रा को अपने जवाबी अस्त्रों से काट डाला। अंत में अजुर्न के बाणों से शवुफनि ऐसा आहत हुआ कि उसे यु( - क्षेत्रा से हट जाना पड़ा। अभ्िामन्यु तेरहवें दिन भी संशप्तकोें ;त्रिागतो±द्ध ने अजुर्न को यु( के लिए ललकारा। अजुर्न भी चुनौती स्वीकार करके उनके साथ लड़ता हुआ दक्ष्िाण दिशा की ओर चला। नियत स्थान पर पहुँचने पर अजुर्न और संशप्तकों के बीच घोर संग्राम छिड़ गया। अजुर्न के दक्ष्िाण की ओर चले जाने के बाद द्रोणाचायर् ने चव्रफव्यूह की रचना की और युिाष्िठर पर धावा बोल दिया। युिाष्िठर की ओर से भीम, सात्यकि,चेकितान, धृष्टद्युम्न, वुंफतिभोज, उत्तमौजा, विराटराज, वीर वैफकेय आदि कितने ही सुविख्यात महारथ्िायों ने द्रोणाचायर् के आक्रमण की बाढ़ को रोकने की जी - तोड़ कोश्िाश की। पिफर भी द्रोण का वेग उनके रोके नहीं रुका। यह देखकर सभी महारथी ¯चता में पड़ गए। सुभद्रा का पुत्रा अभ्िामन्यु अभी बालक ही था। पिफर भी अपनी रणवुफशलता और शूरता के लिए वह इतना अिाक प्रसि( हो चुका था कि लोग उसको वृफष्ण एवं अजुर्न की समता करनेवाला समझते थे। बाल महाभारत कथा ध् 79 इसके बाद तो पांडवों की सेना द्रोणाचायर् की सेना पर टूट पड़ी। असंख्य वीर खेत रहे। खून की नदियाँ - सी बहने लगीं। थोड़ी देर बाद सूयर् अस्त हुआ। अपनी सेना का यह हाल देखकर द्रोणाचायर् ने लड़ाइर् बंद कर दी। दोनों पक्षों की सेनाएँ अपने - अपने डेरों को चल दीं और इस प्रकार बारहवें दिन का यु( समाप्त हुआ। युिाष्िठर ने इस वीर बालक को बुलाकर कहाμफ्बेटा! द्रोण के रचे हुए चक्रव्यूह को तोड़ना हमारे और किसी वीर से हो नहीं सकता। अकेले तुम्हीं ऐसे हो, जिसके लिए द्रोण के बनाए इस व्यूह को तोड़ना संभव है। तुम द्रोण की सेना पर आक्रमण करने को तैयार हो?य् यह सुनकर अभ्िामन्यु बोलाμफ्महाराज, इस चक्रव्यूह में प्रवेश करना तो मुझे आता है, पर प्रवेश करने के बाद कहीं कोइर् संकट आ गया तो व्यूह से बाहर निकलना मुझे याद नहीं है।य् युिाष्िठर ने कहाμफ्बेटा! व्यूह को तोड़कर एक बार तुम भीतर प्रवेश कर लोऋ पिफर तो जिधर से तुम आगे बढ़ोगे, उधर से ही हम तुम्हारे पीछे - पीछे चले आएँगे और तुम्हारी मदद को तैयार रहेंगे।य् युिाष्िठर की बातों का समथर्न करते हुए भीमसेन ने कहाμफ्तुम्हारे ठीक पीछे - पीछे मैं चलूँगा। धृष्टद्युम्न, सात्यकि आदि वीर भी अपनी - अपनी सेनाओं के साथ तुम्हारा अनुकरण करेंगे। एक बार तुमने व्यूह को तोड़ दिया, तो पिफर यह निश्िचत समझना कि हम सब कौरव - सेना को तहस - नहस कर डालेंगे।य् यह सब सुनकर बालक अभ्िामन्यु को अपने मामा श्रीवृफष्ण और पिता अजुर्न की वीरता का स्मरण हो आया। बड़े उत्साह के साथ वह बोलाμफ्मैं अपनी वीरता और पराक्रम से मामा श्रीवृफष्ण और पिता जी को अवश्य प्रसन्न करूँगा।य् फ्सुमित्रा! वह देखो! द्रोणाचायर् के रथ की ध्वजा। उसी ओर रथ चलाओ, जल्दी करो।य् अपने सारथी को उत्साहित करते हुए अभ्िामन्यु ने कहा और सारथी ने भी उसी ओर रथ चलाया। अभ्िामन्यु की आज्ञा मानकर सारथी ने उधर रथ बढ़ा दिया। कौरव - सेना में हलचल मच गइर्μफ्अरे अभ्िामन्यु आया और उसके पीछे - पीछे पांडव वीर भी चले आ रहे हैं।य् द्रोणाचायर् के देखते - देखते उनका बनाया हुआ व्यूह टूट गया और अभ्िामन्यु व्यूह के अंदर दाख्िाल हो गया। कौरव - वीर एक - एक करके अभ्िामन्यु का सामना करने आते गए और इस प्रकार वूफच करते गए कि जैसे आग में पड़कर पतंगे भस्म हो जाते हैं। जो भी सामने आया, उस बालवीर के बाणों की मार से मारा गया। जैसा कि पहले तय हुआ था, पांडवों की सेना अभ्िामन्यु के पीछे - पीछे चली और जहाँ से व्यूह तोड़कर अभ्िामन्यु अंदर घुसा था, वहीं से व्यूह के अंदर प्रवेश करने लगी। यह देखकर ¯सधु देश का पराक्रमी राजा जयद्रथ, जो धृतराष्ट्र का दामाद था, अपनी सेना को लेकर पांडव - सेना पर टूट पड़ा। जयद्रथ ने ऐसी वुफशलता और बहादुरी से ठीक समय पर व्यूह की टूटी हुइर् बाल महाभारत कथा ध् 81 किलेबंदी को पिफर से पूरा करके मशबूत बना दिया कि जिससे पांडव बाहर ही रह गए। अभ्िामन्यु व्यूह के अंदर अकेला रह गया, परंतु अकेले अभ्िामन्यु ने व्यूह के अंदर ही कौरवों की उस विशाल सेना को तहस - नहस करना शुरू कर दिया। जो भी उसके सामने आता, खत्म हो जाता था। दुयोर्धन का पुत्रा लक्ष्मण अभी बालक था, परंतु उसमें वीरता की आभा पूफट रही थी। उसको भय छू तक नहीं गया था। अभ्िामन्यु की बाण - वषार् से व्यावुफल होकर जब सभी यो(ा पीछे हटने लगे, तो वीर लक्ष्मण अकेला जाकर अभ्िामन्यु से भ्िाड़ गया। वह वीर बालक भाले की चोट से तत्काल मृत होकर गिर पड़ा। यह देखकर कौरव - सेना आतर् स्वर में हाहाकार कर उठी। फ्अभ्िामन्यु का इसी क्षण वध करो।य् दुयोर्धन ने चिल्लाकर कहा और द्रोण, अश्वत्थामा, वृहदबल, वृफतवमार् आदि छह महारथ्िायों ने अभ्िामन्यु को चारों ओर से घेर लिया। द्रोण ने कणर् के पास आकर कहाμफ्इसका कवच भेदा नहीं जा सकता। ठीक से निशाना साधकर इसके रथ के घोड़ों की रास काट डालो और पीछे की ओर से इस पर अस्त्रा चलाओ।य् कणर् ने यही किया। पीछे की ओर से बाण चलाए गए। अभ्िामन्यु का धनुष कट गया। घोड़े और सारथी मारे गए। वह रथविहीन हो गया। तुरंत ही अभ्िामन्यु ने टूटे हुए रथ का पहिया हाथ में उठा लिया और उसे घुमाने लगा। इस समय अभ्िामन्यु भयानक यु( कर रहा था। यह देखकर सारी सेना एक साथ उस पर टूट पड़ी। उसके हाथ का पहिया चूर - चूर हो गया। इसी बीच दुःशासन का पुत्रा गदा लेकर अभ्िामन्यु पर झपटा। इस पर अभ्िामन्यु ने भी पहिया पेंफककर गदा उठा ली और दोनों आपस में भ्िाड़ गए। दोनों में घोर यु( छिड़ गया। एक - दूसरे पर गदा का भीषण वार करते हुए दोनों ही राजवुफमार आहत होकर गिर पड़े। दोनों ही हड़बड़ाकर उठने लगे। दुःशासन का पुत्रा शरा पहले उठ खड़ा हुआ। अभ्िामन्यु अभी उठ ही रहा था कि दुःशासन के पुत्रा ने उसके सिर पर शोर से गदा - प्रहार किया। यों भी अभ्िामन्यु अब कइयों से अकेला लड़ते हुए घायल हो चुका था और थककर चूर हो रहा था। गदा की मार पड़ते ही उसके प्राण - पखेरू उड़ गए। संशप्तकों ;त्रिागतो±द्ध का संहार करने के बाद यु( समाप्त करके अजर्ुन और श्री वृफष्ण अपने श्िाविर को लौट रहे थे। अजुर्न श्रीवृफष्ण से बोलाμफ्जनादर्न! मेरा मन घबराया हुआ है। मैं भ्रांत - सा हो रहा हूँ? सब भाइर् वुफशल से तो होंगे? आज अभ्िामन्यु अपने भाइयों के साथ हँसता हुआ मेरा स्वागत करने क्यों नहीं दौड़ा आ रहा है?य् ऐसी ही बातें करते हुए दोनों श्िाविर के अंदर पहुँचे। किसी के वुफछ न कहने पर भी अजुर्न ने परिस्िथति देखकर अपने आप ही सब बातें ताड़ लीं और तब उससे रहा नहीं गया। सब वुफछ जान जाने पर वह बुरी तरह से बिलखने लगा। श्रीवृफष्ण की बातें सुनकर अजुर्न वुफछ शांत हुआ। उसने अपने इस वीर पुत्रा की मृत्यु का सारा हाल जानना चाहा। उसके पूछने पर युिाष्िठर बोलेμफ्मैंने ही अभ्िामन्यु से कहा था कि चक्रव्यूह को तोड़कर भीतर प्रवेश करने का हमारे लिए रास्ता बना दो, तो हम सब तुम्हारा अनुकरण करते हुए व्यूह में प्रवेश कर लेंगे। मेरी बात मानकर वीर अभ्िामन्यु इस अभेद्य व्यूह को तोड़कर अंदर घुस गया। हम भी उसी के पीछे - पीछे चले। हम अंदर घुसने ही वाले थे कि पापी जयद्रथ ने हमें रोक लिया। उसने बड़ी चतुरता से टूटे हुए व्यूह को पिफर से ठीक कर दिया। हमारे लाख प्रयत्न करने पर भी जयद्रथ ने हमें प्रवेश करने नहीं दिया। इसके बाद हम तो बाहर रहे और अंदर कइर् महारथ्िायों ने एक साथ मिलकर उस अकेले बालक को घेर लिया और मार डाला।य् युिाष्िठर की बात पूरी भी न हो पाइर् थी कि अजुर्न आतर् स्वर में फ्हा बेटा!य् कहकर मू£च्छत होकर गिर पड़ा। चेत आने पर वह उठा और दृढ़तापूवर्क बोलाμफ्जिसके कारण मेरे पि्रय पुत्रा की मृत्यु हुइर् है, उस जयद्रथ का मैं कल सूयार्स्त होने से पहले वध करके रहूँगा। यह मेरी प्रतिज्ञा है।य् यह कहकर अजुर्न ने गांडीव पर शोर से टंकार की। ¯सधु देश के सुप्रसि( राजा वृ(क्षत्रा के पुत्रा जयद्रथ को जब अजुर्न की प्रतिज्ञा का हाल मालूम हुआ, तो वह दुयोर्धन के पास गया और बोलाμफ्मुझे यु( की चाह नहीं है। मैं अपने देश चला जाना चाहता हूँ।य् यह सुनकर दुयोर्धन ने उसको धीरज बँधाया और बोलाμफ्सैंधव! आप भय न करें। मेरी सारी सेना आपकी रक्षा करने के लिए नियुक्त की जाएगी, आप निःशंक रहें।य् दुयोर्धन के इस प्रकार आग्रह करने पर जयद्रथ ने उसकी बात मान ली। सवेरा हुआ। शस्त्राधारियों में श्रेष्ठ आचायर् द्रोण ने सेना की व्यवस्था करने में ध्यान दिया। यु( के मैदान से बारह मील की दूरी पर जयद्रथ को अपनी सेना एवं रक्षकों के साथ रखा गया। उसकी रक्षा के लिए भूरिश्रवा, कणर्, अश्वत्थामा, शल्य, वृषसेन आदि महारथी अपनी सेनाओं के साथ सुसज्िजत होकर तैयार खड़े थे। अजुर्न पहले भोजों की सेना पर टूट पड़ा। वृफतवमार् और सुदक्ष्िाण पर एक ही साथ हमला करके व उनको परास्त करके वह श्रुतायुध पर टूट पड़ा। शोरों की लड़ाइर् छिड़ गइर्। श्रुतायुध के घोड़े मारे गए। इस पर उसने गदा उठाकर श्रीवृफष्ण पर प्रहार किया। परंतु निःशस्त्रा और यु( में शरीक न होनेवाले श्रीवृफष्ण पर पेंफककर मारी गइर् गदा श्रुतायुध को ही जा लगी और श्रुतायुध मृत होकर गिर पड़ा। इस पर कांभोजराज सुदक्ष्िाण ने अजुर्न पर शोरों का हमला कर दिया। ¯कतु अजुर्न ने उस पर बाणों की ऐसी वषार् की कि उसका रथ चूर - चूर हो गया। उसके कवच युिाष्िठर की चिता और कामनांदुयोर्धन को अजुर्न का पीछा करते देखकर पांडव - सेना ने शत्राुओं पर और भी शोर का हमला कर दिया। धृष्टद्युम्न ने सोचा कि जयद्रथ की रक्षा करने हेतु यदि द्रोण भी चले गए, तो अनथर् हो जाएगा। इस कारण द्रोणाचायर् को रोके रखने के इरादे से उसने द्रोण पर लगातार आव्रफमण जारी रखा। धृष्टद्युम्न की इस चाल के कारण कौरव - सेना तीन हिस्सों में बँटकर कमशोर पड़ गइर्। इतने में धृष्टद्युम्न उछलकर द्रोणाचायर् के रथ पर जा चढ़ा और विक्ष्िाप्त - सा होकर द्रोण पर वार करने लगा। धुष्टद्युम्न का हमला जारी रहा। अंत में बाल महाभारत कथा ध् 83 के टुकडे - टुकड़े हो गए और छाती पर बाण लगने से कांभोजराज हाथ पैफलाता हुआ धड़ाम से गिर पड़ा। इस प्रकार अपना गांडीव हाथ में लिए हुए असंख्य वीरों का काम तमाम करता हुआ अजुर्न आगे बढ़ता गया और कौरव - सेना के समुद्र को चीरता हुआ अंत में उस जगह पर जा पहुँचा, जहाँ जयद्रथ अपनी सेना से घ्िारा हुआ खड़ा था। अजर्ुन का रथ जयद्रथ की ओर जाते हुए देखकर दुयोर्धन ¯चतित और दुखी हुआ। जयद्रथ की रक्षा के लिए नियुक्त वीरों ने जब यह सुना, तो उनके दिल एकबारगी दहल उठे और भूरिश्रवा, कणर्, वृषसेन, शल्य, अश्वत्थामा, जयद्रथ आदि आठों महारथी अजुर्न का मुकाबला करने को तत्पर हो उठे। द्रोण ने क्रोध में आकर एक अत्यध्िक पैना बाण चलाया। वह पांचालवुफमार के प्राण ही ले लेता, यदि सात्यकि का बाण उसे बीच में ही पुनः न काट देता। अचानक सात्यकि के बाण रोक लेने पर द्रोण का ध्यान उसकी ओर चला गया। इसी बीच पांचाल - सेना के रथसवार धृष्टद्युम्न को वहाँ से हटा ले गए। परंतु सात्यकि भी कोइर् मामूली वीर नहीं था। पांडव - सेना के सबसे चतुर यो(ाओं में उसका स्थान था। जब उसने द्रोणाचायर् को अपनी ओर झपटते देखा, तो वह खुद भी उनकी ओर झपटा। इस तरह बहुत देर तक दोनों वीर लड़ते रहे। इसी बीच युिाष्िठर को पता चला कि सात्यकि पर संकट आया हुआ है, तो वह अपने आसपासके वीरों से बोलेμफ्वुफशल यो(ा, नरोत्तम और सच्चे वीर सात्यकि आचायर् द्रोण के बाणों से बहुत ही पीडि़त हो रहे हैं। चलो, हम लोग उधर चलकर उस वीर महारथी की सहायता करें।य् उसके बाद वह धृष्टद्युम्न से बोलेμफ्द्रुपद - वुफमार! आपको अभी जाकर द्रोणाचायर् पर आव्रफमण करना चाहिए, नहीं तो डर है कि कहीं आचायर् के हाथों सात्यकि का वध न हो जाए। युिाष्िठर ने द्रोण पर हमला करने के लिए धृष्टद्युम्न के साथ एक बड़ी सेना भेज दी। समय पर वुफमुक के पहुँच जाने पर भी बड़े परिश्रम के बाद ही सात्यकि को द्रोण के पँफदे से छुड़ाया जा सका। इसी समय श्रीवृफष्ण के पांचजन्य की ध्वनि सुनाइर् दी। वह आवाश सुनकर युिाष्िठर ¯चतित हो गए। फ्इस घड़ी अजुर्न की सहायता को चले जाओय्, इतना कहते - कहते युिाष्िठर बहुत ही अधीर हो उठे। युिाष्िठर के इस प्रकार आग्रह करने पर सात्यकि ने बड़ी नम्रता से कहाμ फ्युिाष्िठर! द्रोण की प्रतिज्ञा तो आप जानते ही हैं। अतः आपकी रक्षा का भार हमारे उफपर है। महाराज, वासुदेव और अजुर्न मुझे यह आदेश दे गए हैं और मुझ पर भरोसा करके यह भारी िाम्मेदारी डाल गए हैं। मैं उनकी बात को वैफसे टालूँ? आप अजुर्न की शरा भी ¯चता न करें। अजुर्न को कोइर् नहीं जीत सकता।य् उधर जैसे ही सात्यकि युिाष्िठर को छोड़कर अजुर्न की ओर चला, वैसे ही द्रोणाचायर् ने पांडव - सेना पर हमले करने शुरू कर दिए। पांडव - सेना की पंक्ितयाँ कइर् जगह से टूट गईं और उन्हें पीछे हटना पड़ गया। यह देखकर युिाष्िठर बड़े ¯चतित हो उठे और बोलेμफ्भीम, मेरा कहा मानो तो तुम भी अजुर्न के पास चले जाओ और सात्यकि तथा अजुर्न का हालचाल मालूम करो। इसके लिए जो वुफछ करना शरूरी हो, वह करके वापस आकर मुझे सूचना दो। मेरा कहना मानकर ही सात्यकि अजुर्न की सहायता को कौरव - सेना से यु( करता हुआ गया है। यदि तुम उनको वुफशलपूवर्क पाओ तो ¯सहनाद करना। मैं समझ लूँगा कि सब वुफशल है।य् भीमसेन ने युिाष्िठर की बात का प्रतिवाद नहीं किया और वह धृष्टद्युम्न से बोलाμफ्आचायर् द्रोण के इरादे से तो आप परिचित हैं ही। किसी - न - किसी तरह भ्राता युिाष्िठर को जीवित पकड़ने का उनका प्रण है। राजा की रक्षा करना ही हमारा प्रथम कतर्व्य है। जब वह स्वयं मुझे जाने की आज्ञा दे रहे हैं, तो उसका भी पालन करना मेरा धमर् हो जाता है। इस कारण भ्राता युिाष्िठर को आपके ही भरोसे पर छोड़कर जा रहा हूँ। इनकी भली - भाँति रक्षा कीजिएगा।य् धृष्टद्युम्न ने कहाμफ्तुम किसी प्रकार की ¯चता न करो और नि¯श्चत होकर जाओ। विश्वास रखो कि द्रोण मेरा वध किए बिना युिाष्िठर को नहीं पकड़ सवेंफगे।य् आचायर् द्रोण के जन्म के बैरी धृष्टद्युम्न के इस प्रकार विश्वास दिलाने पर भीम निश्िंचत होकर तेशी से अजुर्न की तरप़्ाफ चल दिया। जितने भी सैन्यदल मुकाबला करने आए, उन्हें मारता - गिराता हुआ भीम अंत में उस स्थान पर पहुँच गया, जहाँ अजुर्न जयद्रथ की सेना से लड़ रहा था। अजुर्न को सुरक्ष्िात देखते ही भीमसेन ने ¯सहनाद किया। भीम का ¯सहनाद सुनकर श्रीवृफष्ण और अजुर्न आनंद के मारे उछल पड़े और उन्होंने भी शोरों से ¯सहनाद किया। इन ¯सहनादों को सुनकर युिाष्िठर बहुत ही प्रसन्न हुए। उनके मन से शोक के बादल हट गए। उन्होंने अजुर्न को मन - ही - मन आशीवार्द दिया। वह सोचने लगेμअभी सूरज डूबने से पहले अजुर्न अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लेगा और जयद्रथ का वध करके लौट आएगा। हो सकता है, जयद्रथ के वध के बाद दुयोर्धन शायद संिा कर ले। इधर युिाष्िठर मन - ही - मन शांति स्थापना की कामना कर रहे थे और उधर मोचेर् पर जहाँ भीम, सात्यकि और अजुर्न थे, वहाँ घोर संग्राम हो रहा था। थोड़े ही समय में जिस स्थान पर अजुर्न और जयद्रथ का यु( हो रहा था, दुयोर्धन भी वहाँ आ पहुँचा मगर थोड़ी ही देर में बुरी तरह हारकर मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ। इस भाँति उस रोश कइर् मोचो± पर शोरों से यु( हो रहा था। द्रोण ने कहाμफ्बेटा दुयोर्धन, तुम्हें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। तुम जयद्रथ की सहायता के लिए जाओ और वहाँ जो वुफछ करना आवश्यक हो, वह करो।य् आचायर् के कहने - सुनने पर दुयोर्धन वुफछ सेना लेकर पिफर से लड़ाइर् के उस मोचेर् पर चला गया, जहाँ अजुर्न और जयद्रथ में शोरों की लड़ाइर् हो रही थी। उस दिन भीम और कणर् में जो यु( हुआ, वह एक रोमांचकारीघटना के रूप में व£णत है। भीमसेन उत्तेजना और उग्रता की प्रतिमूतिर् - सा दिखाइर् दे रहा था। कणर् जो वुफछ करता, धीरज और व्यवस्था के बाल महाभारत कथा ध् 85 साथ शांतभाव से करता, ¯वफतु भीम को तो थोड़ा - सा भी अपमान असह्य हो जाता था। दोनों ही बड़े वीर थे। वे एक - दूसरे पर झपटकर आघात करने लगे। भीमसेन को उस समय पिछले घोर अपमानों, यातनाओं और मुसीबतों की याद हो आइर्, जो उसे, उसके भाइयों और द्रौपदी को पहुँचाइर् गइर् थीं। प्राणों का मोह छोड़कर वह लड़ने लगा। उस समय भीमसेन का घावों से भरा हुआ शरीर धधकती हुइर् आग - सा प्रतीत हो रहा था। कणर् और भीम के यु( में इस बार भीमसेन के रथ के घोड़े मारे गए। सारथी भी कटकर गिर पड़ा। रथ टूट - पूफट गया और धनुष भी कट गया। भीम ने ढाल - तलवार ले ली और जान झोंककर लड़ने लगा। पलक झपकते ही कणर् ने उसकी ढाल के भी टुकड़े - टुकड़े कर दिए। जब ढाल भी न रही तो कणर् ने भीम को खूब परेशान किया। इससे भीम बहुत ही पीडि़त हुआ। उसे असीम व्रफोध आया। वह उछलकर कणर् के रथ पर जा वूफदा। कणर् ने रथ के ध्वज - स्तंभ की आड़ लेकर भीमसेन की झपट से अपने को बचा लिया। भीम नीचे शमीन पर वूफद पड़ा और विलक्षण यु( करने लगा। मैदान में जो रथ के पहिए, घोड़े, हाथी आदि पड़े हुए थे, उन्हीं को उठा - उठाकर वह कणर् पर पेंफकता गया, जिससे उसे क्षणभर भी आराम न मिल पाया। उस समय कणर् चाहता, तो वह भीम को आसानी से मार सकता था, पर निहत्थे भीम को उसने मारना नहीं चाहा। माता वंुफती को दिया हुआ वचन भी उसे याद था कि वह अजुर्न के अतिरिक्त और किसी को यु( में न मारेगा। भूरिश्रवा, जयदथ और आचायर् दोण्र्रका अंत उधर अजुर्न ¯सधुराज जयद्रथ के साथ यु( कर रहा था और उसका वध करने के मौके की तलाश में था। इतने में भूरिश्रवा ने सात्यकि को उफपर उठाया और शमीन पर शोर से दे पटका। कौरव - सेना शोरों से कोलाहल कर उठीμफ्सात्यकि मारा गया।य् अजुर्न ने देखा कि मैदान में मृत - से पड़े सात्यकि को भूरिश्रवा घसीट रहा है। यह देखकर अजुर्न भारी असमंजस मंे पड़ गया। उसे वुफछ नहीं सूझा कि क्या किया जाए। वह श्रीवृफष्ण से बोलाμफ्वृफष्ण, भूरिश्रवा मुझसे लड़ नहीं रहा है। दूसरे के साथ लड़नेवाले पर वैफसे बाण चलाउँफ?य् अजुर्न इस प्रकार श्रीवृफष्ण से बातें कर ही रहा था कि इतने में जयद्रथ द्वारा छोड़े गए बाणों के समूह आकाश में छा गए। इस पर अजुर्न ने बातें करते - करते ही जयद्रथ पर बाणों की बौछार जारी रखी। ज्योंही अजुर्न ने सात्यकि की ओर मुड़कर देखा तो पाया कि सात्यकि शमीन पर पड़ा हुआ था और भूरिश्रवा उसके शरीर को एक पाँव से दबाकर और दाहिने हाथ में तलवार लेकर उस पर वार करने को उद्यत ही था। यह देखकर अजुर्न से रहा न गया। उसने उसी क्षण भूरिश्रवा पर तानकर बाण चलाया। बाण लगते ही भूरिश्रवा का दाहिना हाथ कटकर तलवार समेत दूर शमीन पर जा गिरा। अपना हाथ कट जाने पर जब भूरिश्रवा ने वृफष्ण की ¯नदा की, तो अजुर्न बोला - फ्वृ( भूरिश्रवा! तुमने मेरे पि्रय मित्रा सात्यकि का वध करने की कोश्िाश की है और वह भी उस समय जबकि वह घायल और अचेत - सा होकर शमीन पर निःशस्त्रा पड़ा हुआ था। उस अवस्था में तुमने उसे तलवार से मारना चाहा। जिसके हथ्िायार टूट चुके थे, कवच नष्ट हो चुका था और जो इतना थका हुआ था कि जिसके लिए खड़ा रहना भी दूभर था, ऐेसे मेरे कोमल बालक अभ्िामन्यु का वध होने पर तुम सभी लोगों ने विजयोत्सव मनाया था। तुम्हीं बताओ कि ऐसा करना किस धमर् के अनुसार उचित था?य् अजुर्न के इस प्रकार मुँहतोड़ जवाब देने पर भूरिश्रवा यु( के मैदान में शरों को पैफलाकर और आसन जमाकर बैठ गया। उसने वहीं आमरण अनशन शुरू कर दिया। यह सब देखकर अजुर्न बोलाμफ्वीरो! तुम सब मेरी प्रतिज्ञा जानते हो। मेरे बाणों की पहुँच तक अपने किसी भी मित्रा या साथी का शत्राु के हाथों वध न होने देने का प्रण मैंने कर रखा है। इसलिए सात्यकि की रक्षा करना मेरा धमर् था।य् अजुर्न की ये बातें सुनकर भूरिश्रवा ने भी शांति से सिर नवाया और शमीन पर टेक दिया। इन बातों में कोइर् दो घड़ी का समय बीत गया था। सब लोगों के मना करते हुए भी सात्यकि ने भूरिश्रवा का सिर धड़ से अलग कर दिया। सात्यकि के कायर् को सबने निवृफष्ट कहकर िाक्कारा। लड़ाइर् के मैदान में जिस ढंग से भूरिश्रवा का वध हुआ था, उसे किसी ने भी उचित नहीं माना। कौरव - सेना को तितर - बितर करता हुआ अजुर्न जयद्रथ के पास आख्िार पहुँच ही गया, परतंु जयद्रथ भी कोइर् साधारण वीर नहीं था। वह सुविख्यात यो(ा था। वह डटकर लड़ने लगा। उसे हराना अजुर्न के लिए भी सुगम न था। बड़ी देर तक यु( होता रहा। दोनों पक्षों के वीर सूयर् की ओर बार - बार देखने लगे। धीरे - धीरे पश्िचम में लालिमा छाने लगी और सूयार्स्त का समय भी नशदीक आने लगा, परंतु जयद्रथ और अजुर्न का यु( समाप्त होने के कोइर् लक्षण नशर नहीं आते थे। यह देखकर दुयोर्धन के मन में आनंद की लहर उठने लगी। उसने सोचा कि अब शरा सी देर और है। जयद्रथ तो बच ही गया और अजुर्न की प्रतिज्ञा विपफल हुइर् - सी है। जयद्रथ ने भी पश्िचम की ओर देखते हुए मन में कहाμफ्चलो, प्राण बचे!य् इसी बीच श्रीवृफष्ण ने अजुर्न से कहाμफ्अजुर्न! जयद्रथ सूयर् की तरप़्ाफ देखने में लगा है और मन में समझ रहा है कि सूयर् डूब गया। परंतु अभी तो सूयर् डूबा नहीं है। अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने का तुम्हारे लिए यही अवसर है।य् श्रीवृफष्ण के ये वचन अजुर्न के कान में पड़े ही थे कि अजुर्न के गांडीव से एक तेश बाण छूटा और जयद्रथ के सिर को उड़ा ले गया। श्रीवृफष्ण ने समय पर ही एक चेतावनी अजुर्न को दे दी थी कि जयद्रथ के सिर को शमीन पर नहीं गिरने देना है। अजर्ुन ने ऐसा ही किया। जयद्रथ के पिता राजा वृ(क्षत्रा अपने आश्रम में बैठे संध्या वंदना कर रहे थे कि इतने में जयद्रथ बाल महाभारत कथा ध् 87 का सिर ध्यानमग्न राजा की गोद में जा गिरा। ध्यान समाप्त होने पर जब वृ(क्षत्रा की आँखें खुलीं और वह उठे, तो जयद्रथ का सिर उनकी गोद से शमीन पर गिर पड़ा और उसी क्षण बूढ़े वृ(क्षत्रा के सिर के भी सौ टुकड़े हो गए। जब युिाष्िठर ने जान लिया कि अजुर्न के हाथों जयद्रथ का वध हो गया है, तो उन सबके आनंद की सीमा न रही। इसके बाद तो युिाष्िठर दूने उत्साह के साथ सारी पांडव - सेना को लेकर आचायर् द्रोण पर टूट पड़े। चैदहवें दिन का यु( केवल सूयार्स्त तक ही नहीं हुआ, बल्िक रात को भी होता रहा। घटोत्कच भीमसेन का हि¯डबा से उत्पन्न पुत्रा था। कणर् और घटोत्कच में उस रात बड़ा भयानक यु( हुआ। घटोत्कच ने कणर् को भी इतनी पीड़ा पहुँचाइर् थी कि वह आपे में न रहा और इंद्र की दी हुइर् शक्ित का, जिसे उसने अजुर्न का वध करने के उद्देश्य से यत्नपूवर्क सुरक्ष्िात रखा था, घटोत्कच पर प्रयोग कर दिया। इससे अजर्ुन का संकट तो टल गया, परंतु भीमसेन का पि्रय एवं वीर पुत्रा घटोत्कच मारा गया। पांडवों के दुख की सीमा न रही। इतने पर भी यु( बंद नहीं हुआ। द्रोणाचायर् के धनुष से बाणों की तीव्र बौछार से पांडव - सेना के असंख्य वीर कट - कटकर गिरते जाते थे। यह देखकर श्रीवृफष्ण अजुर्न से बोलेμफ्अजुर्न! वुफछ वुफचव्रफ रचकर ही इनको परास्त करना होगा। आज अगर परास्त न हुए तो ये हमारा सवर्नाश कर देंगे। इसलिए किसी को आचायर् के पास जाकर यह खबर पहुँचानी चाहिए कि अश्वत्थामा मारा गया।य् युिाष्िठर ने कापफी़सोच - विचार के बाद कहा कि यह पाप मैं अपने ही उफपर लेता हूँ। इस व्यवस्था के अनुसार भीम ने गदा - प्रहार से अश्वत्थामा नाम के एक भारी लड़ाके हाथी को मार डाला। पिफर द्रोण की सेना के पास जाकर शोर से चिल्लाने लगाμफ्मैंने अश्वत्थामा को मार डाला है।य् उधर यु( करते हुए द्रोणाचायर् ब्रह्मास्त्रा का प्रयोग करना ही चाहते थे कि उन्होंने सुना कि उनका पुत्रा अश्वत्थामा मारा गया। वह विचलित हो गए। साथ ही उन्हें इस बात की सच्चाइर् पर भी शक हुआ। उन्होंने युिाष्िठर से पूछा। आचायर् द्रोण को विश्वास था कि युिाष्िठर झूठ नहीं बोलेंगे। युिाष्िठर असत्य बोलते हुए डरे, पर विजय प्राप्त करने की लालसा में किसी तरह जी कड़ा करके शोर से बोलेμफ्हाँ, अश्वत्थामा मारा गया।य् परंतु यह कहते - कहते अंत में धीमे स्वर में यह भी कह दिया किμफ्मनुष्य नहीं, हाथी।य् इसके साथ ही भीम तथा अन्य पांडवों ने शोरों का शंखनाद और ¯सहनाद किया, जिससे युिाष्िठर के अंतिम वचन उस शोर में लुप्त हो गए। युिाष्िठर के मुँह से यह सुनते ही चारों ओर हाहाकार मच गया और इसी हाहाकार के बीच धृष्टद्युम्न ने ध्यानमग्न आचायर् की गरदन पर खड्ग से शोर का वार किया। आचायर् द्रोण का सिर तत्काल ही धड़ से अलग होकर गिर पड़ा। कणर् और दुयोर्धन भी मारे गए36 द्रोण के मारे जाने पर कौरव - पक्ष के राजाओं ने कणर् को सेनापति मनोनीत किया। मद्रराज शल्य कणर् के सारथी बने। दूसरे दिन कणर् के सेनापतित्व में पिफर से घमासान यु( जारी हो गया। अजुर्न की रक्षा करता हुआ भीम, अपने रथ पर उसके पीछे - पीछे चला और दोनों एक साथ कणर् पर टूट पड़े। जब दुःशासन ने यह देखा, तो उसने भीम पर बाणों की वषार् कर दी। उसको भीम ने एक ही धक्के में शमीन पर गिरा दिया और उसका एक - एक अंग तोड़ - मरोड़ डाला। भीम मैदान में नाचने - वूफदने लगा और चिल्लाने लगाμफ्मेरी एक प्रतिज्ञा पूरी हुइर्। अब दुयोर्धन की बारी है। उसका काम - तमाम करना बाकी है।य् भीमसेन का वह भयानक रूप देखकर कणर् का भी शरीर काँपने लगा। तभी अश्वत्थामा को दुयोर्धन ने पांडवांे पर हमला करने की आज्ञा दी। कणर् ने अजुर्न पर एक ऐसा बाण चलाया जो आग उगलता गया। अजुर्न की ओर उस भयानक तीर को आता हुआ देखकर वृफष्ण ने रथ को पाँव के अँगूठे से दबा दिया, जिससे रथ शमीन में पाँच अँगुल धँस गया। वृफष्ण की इस युक्ित से अजुर्न मरते - मरते बचा। कणर् का चलाया हुआ सपर्मुखास्त्रा पुँफपफकारता हुआ आया और अजुर्न का मुवुफट उड़ा ले गया। इस पर अजुर्न के व्रफोध का ठिकाना न रहा। उसने जोश के साथ कणर् पर बाण - वषार् कर दी। तभी अचानक कणर् के रथ का बाईं तरप़्ाफ का पहिया धरती में धँस गया। इससे कणर् घबरा गया और बोलाμफ्अजुर्न! शरा ठहरो। मेरे रथ का पहिया कीचड़ में पँफस गया है। पांडु - पुत्रा, तुम्हें धमर् - यु( करने का जो यश प्राप्त हुआ है, उसे व्यथर् ही न गँवाओ। मैं शमीन पर खड़ा रहूँ और तुम रथ पर बैठे - बैठे मुझ पर बाण चलाओ, यह ठीक नहीं होगा। शरा रफको।य् कणर् की ये बातें सुनकर श्रीवृफष्ण बोलेμफ्कणर्! जब दुःशासन, दुयोर्धन और तुम द्रौपदी को भरी सभा में घसीटकर लाए थे, उस वक्त तुम्हें धमर् की याद आइर् थी? जब दूधमुँहे बच्चे अभ्िामन्यु को तुम सात लोगों ने एक साथ घेरकर निलर्ज्जता के साथ मार डाला था, तब तुम्हारा धमर् कहाँ था? और आज जब मुसीबत सामने खड़ी दिखाइर् दे रही है, तो तुमको धमर् याद आ रहा है!य् श्रीवृफष्ण की इस झिड़की का कणर् से कोइर् उत्तर देते न बना। उसने सिर झुका लिया और अटके हुए रथ पर से ही यु( जारी रखा। इतने में कणर् का एक बाण अजुर्न को जा लगा, तो वह थोड़ी देर के लिए विचलित हो उठा। बस, यही शरा सा समय पाकर कणर् रथ से उतर पड़ा और रथ का पहिया उठाकर उसे समतल पर लाने की कोश्िाश करने लगा। कणर् के हशार प्रयत्न करने पर भी पहिया गइे से निकलता न था। यह स्िथति देख श्रीवृफष्ण ने अजुर्न से कहाμफ्अजुर्न, अब देरी न करो, हिचकिचाओ मत। इसी समय इसे खत्म कर दो।य् श्रीवृफष्ण की यह बात मानकर अजुर्न ने एक बाण तानकर ऐसा मारा कि कणर् का सिर कटकर शमीन पर गिर पड़ा। जब दुयोर्धन को इस बात की खबर मिली कि यु( में कणर् भी बाल महाभारत कथा ध् 89 मारा गया है, तो उसके शोक की सीमा न रही। दुयोर्धन की इस अवस्था पर वृफपाचायर् को बड़ा तरस आया। उन्होंने दुयोर्धन को सांत्वना देते हुए कहाμफ्राजन्! अब तुम्हारा कतर्व्य यही है कि पांडवों से किसी प्रकार संिा कर लो। अब यु( बंद करना ही श्रेयस्कर होगा।य् यद्यपि दुयोर्धन हताश हो चुका था, पिफर भी वृफपाचायर् की यह सलाह उसे बिलवुफल पसंद नहीं आइर्। वह उसे मानने के लिए तैयार न हुआ। सभी कौरव वीरों ने दुयोर्धन की बातों का समथर्न किया और कहा कि यु( जारी रखना ही ठीक होगा। इस पर सबकी सलाह से मद्रराज शल्य को सेनापति नियुक्त किया गया। इसलिए शल्य के सेनापतित्व में पिफर से यु( जारी हुआ। पांडवों की सेना के संचालन का पूरा दायित्व अब युिाष्िठर ने स्वयं अपने कंधों पर ले लिया। शल्य पर उन्होंने स्वयं आव्रफमण किया। युिाष्िठर ने शल्य पर शक्ित का प्रयोग किया और मद्रराज शल्य मृत होकर रथ पर से धड़ाम से गिर पड़े। जब शल्य भी मारा गया, तो कौरव - सेना निःसहाय - सी हो गइर्। पिफर भी, धृतराष्ट्र के रहे - सहे पुत्रों ने हिम्मत न हारी। दूसरी ओर शवुफनि और सहदेव का यु( हो रहा था। तलवार की पैनी धार के समान नोंकवाला एक बाण शवुफनि पर चलाते हुए सहदेव ने गरजकर कहाμफ्शवुफनि! अपने किए का पफल भुगत ही ले!य् और मानो उसकी बात सपफल हो गइर्। बाण धनुष से निकला नहीं कि शवुफनि का सिर कटकर गिरा पड़ा। इस प्रकार कौरव - सेना के सारे वीर वुफरफक्षेत्रा की भूमि पर सदा के लिए सो गए। अकेला दुयोर्धन जीवित बचा था, अब उसके पास न तो सेना थी, न रथ। उस वीर की स्िथति बड़ी दयनीय थी। ऐसी हालत में दुयोर्धन अकेला ही हाथ में गदा लिए हुए एक जलाशय की ओर चुपके से चल दिया। उधर दूसरे दिन युिाष्िठर और उनके भाइर् उसे खोजते हुए उसी जलाशय पर जा पहुँचे, जहाँ वह छिपा हुआ बैठा था। श्रीवृफष्ण भी उनके साथ थे। उन सबको यह पता चल गया था कि दुयोर्धन जलाशय में छिपा हुआ है। युिाष्िठर ने कहाμफ्दुयोर्धन! अपने वुफटंुब और वंश का नाश कराने के बाद अब पानी में छिपकर प्राण बचाना चाहते हो?य् हुआ और घायल हूँ। कवच भी मेरे पास नहीं है। इसलिए एक - एक करके निपट लो। चलो!य् यह सुनकर युिाष्िठर बोलेμफ्यदि अकेले पर कइयों का हमला करना धमर् नहीं, तो बालक अभ्िामन्यु वैफसे मारा गया था?य् यह सुनकर दुयोर्धन जलाशय से बाहर निकल आया और उसने भीम से गदा यु( करने की इच्छा प्रकट की। भीम भी राशी हो गया और दोनों में गदा यु( शुरू हो गया। इस तरह बड़ी देर तक यु( जारी रहा। श्रीवृफष्ण ने इशारों में ही अजुर्न को बताया कि भीम दुयोर्धन की जाँघ पर गदा मारेगा, तो जीत जाएगा। भीम ने श्रीवृफष्ण का यह इशारा तुरंत भाँप लिया और यह सुनकर दुयोर्धन ने व्यथ्िात होकर कहाμ फ्मैं न तो डरा हुआ ही हूँ और न मुझे प्राणों का ही मोह है। पिफर भी, सच पूछो तो यु( से मेरा जी हट गया है। मेरे सभी संगी - साथी और बंधु - बांधव मारे जा चुके हैं। अब मैं बिलवुफल अकेला हूँ। राज्य - सुख का मुझे लोभ नहीं रहा। यह सारा राज्य अब तुम्हारा ही है। निश्िंचत होकर तुम्हीं इसका उपभोग करो।य् युिाष्िठर ने गरजते हुए कहाμफ्दुयोर्धन! एक दिन वह था, जब तुम्हीं ने कहा था कि सूइर् की नोंक जितनी शमीन भी नहीं दूँगा।य् दुयोर्धन ने जब स्वयं युिाष्िठर के मुख से ये कठोर बातें सुनीं, तो उसने गदा उठा ली और जल में ही उठ खड़ा हुआ और बोलाμफ्अच्छा! यही सही! तुम एक - एक करके मुझसे भ्िाड़ लो! मैं अकेला हूँ और तुम पाँच हो। पाँचों का अकेले के साथ लड़ना न्यायोचित नहीं। मैं थका अचानक दुयोर्धन पर झपट पडशोर से गदा का प्रहार किया। जाँघ टूट जाने के कारण अधमरी अवस्था में पड़े हुए दुयोर्धन के दिल में पिफर से व्रफोध और द्वेष की आग - सी भड़क उठी। वह चिल्लाकर बोलाμफ्वृफष्ण! धमर् यु( करनेवाले हमारे पक्ष के सारे यशस्वी महारथ्िायों को तुमने ही वुफचव्रफ रचकर मरवा डाला है। यदि तुमने वुफचव्रफ न रचा होता, तो कणर्, भीष्म, द्रोण भला समर में परास्त होनेवाले थे?य् मरणासन्न अवस्था में दुयोर्धन को इस प्रकार विलाप करता देख श्रीवृफष्ण बोलेμफ्दुयोर्धन! तुम अपने ही किए हुए कमो± का पफल पा रहे हो। तुम यह क्यों नहीं समझते और उसका पश्चाताप करते? अपने अपराध के लिए दूसरों को दोष देना बेकार है। तुम्हारे नाश का कारण मैं नहीं हूँ। लालच में पड़कर तुमने जो महापाप किया था, उसी का यह पफल तुम्हें भुगतना पड़ रहा है।य् ा़। उसकी जाँघ पर बाल महाभारत कथा ध् 91 अश्वत्थामा 37 दुयोर्धन पर जो वुफछ बीती, उसका हाल सुनकर अश्वत्थामा बहुत क्षुब्ध हो उठा। उसके पिता द्रोणाचायर् को मारने के लिए जो वुफचव्रफ रचा गया था, वह उसे भूला नहीं था। वह उस स्थान पर जा पहँुचा, जहाँ दुयोर्धन मृत्यु की प्रतीक्षा करता हुआ पड़ा था। दुयोर्धन के सामने जाकर अश्वत्थामा ने दृढ़तापूवर्क प्रतिज्ञा की कि वह आज ही रात में पांडवों को नष्ट करके रहेगा। मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए दुयोर्धन ने जब यह सुना, तो उसका पुराना वैर पिफर से जाग्रत हो गया और उसे वुफछ प्रसन्नता हुइर्। उसने आसपास खडे़ हुए लोगों से कहकर अश्वत्थामा को कौरव - सेना का वििावत् सेनापति बनाया और बोलाμफ्आचायर् - पुत्रा! शायद मेरा यह अंतिम कायर् है। शायद आप ही मुझे शांति दिला सवेंफ। मैं बड़ी आशा से आपकी राह देखता रहूँगा।य् सूरज डूब चुका था, रात हो गइर् थी। एक बड़े बरगद के पेड़ के नीचे अश्वत्थामा, वृफपाचायर्, और वृफतवमार् रात बिताने की गरश से ठहरे। वृफप और वृफतवमार् बहुत थके हुए थे। इसलिए दोनों वहीं पड़े - पड़े सो गए। लेकिन अश्वत्थामा को नींद नहीं आइर्। अश्वत्थामा सोचने लगाμ‘मैं इन पांडवों और पिता जी की हत्या करनेवाले धृष्टद्युम्न को उनके संगी - साथ्िायों समेत एक साथ ही क्यों न मार डालूँ? अभी रात का समय है और वे सब अपने श्िाविरों में पड़े सो रहे होंगे। इस समय उन सबका वध कर डालना बहुत सुगम होगा।’ अश्वत्थामा ने वृफपाचायर् को जगाकर उनको अपना निश्चय सुनाया। अश्वत्थामा की ये बातें सुनकर वृफपाचायर् व्यथ्िात हो गए। वह बोलेμफ्अश्वत्थामा! सोते हुओं को मारना कभी भी धमर् नहीं हो सकता। तुम यह विचार छोड़ दो।य् यह सुनकर अश्वत्थामा झल्लाकर बोलाμफ्आपने भी क्या यह धमर् - धमर् की रट लगा रखी है?य् दृढ़तापूवर्क अपनी इच्छा जताकर अश्वत्थामा पांडवों के श्िाविर की ओर जाने को उठा। यह देखकर वृफपाचायर् और वृफतवमार् भी अश्वत्थामा के साथ हो लिए। आधी रात बीत चुकी थी। पांडवों के श्िाविर में भी सभी सैनिक मीठी नींद में सो रहे थे। अश्वत्थामा पहले धृष्टद्युम्न के श्िाविर में घुसा और उसने सोए हुए धृष्टद्युम्न को पैरों तले ऐसा वुफचला कि वह तत्काल ही मर गया। इसी प्रकार सभी पांचाल - वीरों को अश्वत्थामा ने वुफचलकर भयानक ढंग से मार डाला और द्रौपदी के पुत्रों की भी एक - एक करके हत्या कर दी। वृफपाचायर् और वृफतवमार् ने भी इस हत्याकांड में अश्वत्थामा का हाथ बँटाया। वहाँ तीनों ने ऐसे - ऐसे अत्याचार किए, जैसे कि अब तक किसी ने सुने भी न थे। उन्होंने वहाँ आग लगा दी। आग भड़क उठी और सारे श्िाविरों में पैफल गइर्। इससे सोए हुए सारे सैनिक जाग गए और भयभीत होकर इधर - उधर भागने लगे। उन सबको अश्वत्थामा ने बड़ी निदयर्ता से मार डाला। दुयोर्धन के पास पहुँचकर अश्वत्थामा ने कहाμफ्महाराज दुयोर्धन! आप अभी जीवित हैं क्या? देख्िाए, आपके लिए मैं ऐसा अच्छा समाचार लाया हूँ कि जिसे सुनकर आपका कलेजा शरूर ठंडा हो जाएगा। जो वुफछ हम लोगों ने किया है, उसे आप ध्यान से सुनें। सारे पांचाल खत्म कर दिए गए हैं। पांडवों के भी सारे पुत्रा मारे गए हैं। पांडवों की सारी सेना का हमने सोते में ही सवर्नाश कर दिया। पांडवों के पक्ष में अब केवल सात ही व्यक्ित जीवित बच गए हैं। हमारे पक्ष में वृफपाचायर्, वृफतवमार् और मैंμतीन ही रह गए हैं।य् यह सुनकर दुयोर्धन बहुत प्रसन्न हुआ और बोलाμफ्गुरफ भाइर् अश्वत्थामा, आपने मेरी खातिर वह काम किया है, जो न भीष्म पितामह से हुआ और न जिसे महावीर कणर् ही कर सके।य् इतना कहकर दुयोर्धन ने अपने प्राण त्याग दिए। द्रौपदी की दयनीय अवस्था की क्या कहें! युिाष्िठर के पास आकर वह कातर स्वर में पुकार उठीμफ्क्या इस पापी अश्वत्थामा से बदला लेनेवाला हमारे यहाँ कोइर् नहीं रहा है?य् शोक - विह्नल द्रौपदी की हालत देखकर पाँचों पांडव अश्वत्थामा की खोज में निकले। ढूँढ़ते - ढूँढ़ते आख्िार उन्होंने गंगा नदी के तट पर छिपे हुए अश्वत्थामा का पता लगा ही लिया। अश्वत्थामा और भीमसेन में यु( छिड़ गया लेकिन अंत में अश्वत्थामा हार गया। पांडव - वंश का नामोनिशान तक मिट गया होता, लेकिन उत्तरा के गभर् की रक्षा हो गइर्।समय पर उत्तरा ने परीक्ष्िात को जन्म दिया।यही परीक्ष्िात पांडवों के वंश का एकमात्रा चिÉ रह गया था। हस्ितनापुर का सारा नगर निःसहाय स्ित्रायों और अनाथ बच्चों के रोने - कलपने के हृदय - विदारक शब्दों से गूँज उठा। यु( समाप्त होने का समाचार पाकर हशारों निःसहाय स्ित्रायों को लेकर वृ( महाराज धृतराष्ट्र वुफरुक्षेत्रा की समर - भूमि में गए, जहाँ एक ही वंश के बंधु - बांध्वों ने एक - दूसरे से भयानक यु( करके अपने ही वुफल का सवर्नाश कर डाला था। धृतराष्ट्र ने बीती बातों का स्मरण करते हुए बहुत विलाप किया। युिाष्िठर की वेदना38 वुफछ देर बाद युिाष्िठर रोती - बिलखती हुइर् स्ित्रायों के समूह को पार करते हुए भाइयों व श्रीवृफष्ण सहित धृतराष्ट्र के पास आए व नम्रतापूवर्क हाथ जोड़े खड़े रहे। इसके बाद धृतराष्ट्र ने भीम को अपने पास बुलाया। धृतराष्ट्र के हाव - भाव से श्रीवृफष्ण ने अंदाशा लगाया कि इस समय धृतराष्ट्र पुत्रा - शोक के कारण व्रफोध में हैं। इससे भीम को उनके पास भेजना ठीक न होगा। अतः उन्होंने भीमसेन को तो एक तरप़्ाफ हटा लिया औैर उसके स्थान पर लोहे की एक प्रतिमा दृष्िटहीन राजा धृतराष्ट्र के आगे लाकर खड़ी कर दी। श्रीवृफष्ण का भय सही साबित हुआ। वृ( राजा ने प्रतिमा को भीम समझकर ज्योंही छाती से लगाया, त्योंही उन्हें याद हो आया कि मेरे कितने ही प्यारे बेटों को इस भीम ने मार डाला है। इस विचार के मन में आते ही धृतराष्ट्र क्षुब्ध हो उठे और उसे शोरों से छाती से लगाकर कस लिया। प्रतिमा चूर - चूर हो गइर्। पर प्रतिमा के चूर हो जाने के बाद धृतराष्ट्र को खयाल आया कि मैंने यह क्या कर डाला! वह दुखी हो गए और शोक विह्नल होकर बोलेμफ्हाय! व्रफोध में आकर मूखर्तावश मैंने यह क्या कर डाला! भीम की हत्या कर दी।य् यह कहकर वह बुरी तरह विलाप करने लगे। इस पर श्रीवृफष्ण ने धृतराष्ट्र से कहाμफ्राजन्, क्षमा करें। मुझे पहले ही से मालूम था कि व्रफोध में आकर आप ऐसा काम करेंगे। इसलिए उस अनथर् को टालने के लिए मैंने पहले से ही उचित प्रबंध कर रखा था। आपने जिसको नष्ट किया है, वह भीमसेन का शरीर नहीं, बल्िक लोहे की मूतिर् थी। आपके व्रफोध का ताप उस पर ही उतरकर शांत हो गया। भीमसेन अभी जीवित है।य् यह सुनकर धृतराष्ट्र के मन को धीरज बँधा और उन्होंने अपना व्रफोध शांत कर लिया। उन्होंने सभी पांडवों को आशीवार्द देकर विदा किया। धृतराष्ट्र से आज्ञा पाकर पाँचों भाइर् श्रीवृफष्ण के साथ गांधारी के पास गए। गांधारी का शोकोद्वेग देखकर अजुर्न भी डर गया और श्रीवृफष्ण के पीछे ही खड़ा रहा। वुफछ बोला नहीं। गांधारी ने अपने दग्ध - हृदय वफो धीरे - धीरे शांत कर लिया और पांडवोें को आशीवार्द देकर विदा किया। युिाष्िठर आदि सब वहाँ से चले गए, परंतु द्रौपदी वहीं गांधारी के पास ही रही। अपने पाँचों सुवुफमार बालकों के मारे जाने के कारण द्रौपदी शोकविह्नल होकर रो रही थी। उसकी अवस्था बाल महाभारत कथा ध् 93 पर गांधारी को बड़ी दया आइर्। वह बोलीμफ्बेटी, दुखी न होओ। मैं और तुम एक ही जैसी हैं। हमें सांत्वना देनेवाला कौन है? इस सबकी दोषी तो मैं ही हँू। मेरे ही दोष के कारण आज इस वुफल का सवर्नाश हुआ है। पर अब अपने को भी दोष देने से क्या लाभ?य् युिाष्िठर के मन में यह बात समा गइर् थी कि हमने अपने बंधु - बांधवों को मारकर राज्य पाया है, इससे उनको भारी व्यथा रहने लगी। अंत में उन्होंने वन में जाने का निश्चय किया, ताकि इस पाप का प्रायश्िचत हो सके। यह सुनकर सब भाइयों पर मानो वज्र गिर गया। वे बहुत ¯चतित हो उठे और बारी - बारी से सब युिाष्िठर को समझाने लगे। अजुर्न ने गृहस्थ धमर् की श्रेष्ठता पर प्रकाश डाला। भीमसेन ने कटु वचनों से काम लिया। नवुफल ने प्रमाणपूवर्क यह सि( करने का प्रयत्न किया कि कमर् - मागर् न केवल सुगम है, बल्िक उचित भी है, जबकि संन्यास - मागर् वँफटीला और दुष्कर है। इस तरह देर तक युिाष्िठर से वाद - विवाद होता रहा। सहदेव ने नवुफल के पक्ष का समथर्न किया और अंत में अनुरोध किया कि हमारे पिता, माता, आचायर्, बंधु सब वुफछ आप ही हैं। हमारी ढिठाइर् को क्षमा करें। द्रौपदी भी इस वाद - विवाद में पीछे न रही। वह बोलीμफ्अब तो आपका यही कतर्व्य है कि राजोचित धमर् का पालन करते हुए राज्य - शासन करें और ¯चता न करें।य् तब शासन - सूत्रा ग्रहण करने से पहले युिाष्िठरभीष्म के पास गए, जो वुफरुक्षेत्रा में शर - शÕया पर पड़े हुए मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। पितामह भीष्म ने युिाष्िठर को धमर् का ममर् समझाया और उपदेश भी दिया। धृतराष्ट्र भी युिाष्िठर के पास आकर सांत्वना देते हुए बोलेμफ्बेटा, तुम्हें इस तरह शोकविह्नल नहीं होना चाहिए। दुयोर्धन ने जो मूखर्ताएँ की थीं, उनको सही समझकर मैंने धोखा खाया। इस कारण मेरे सौ - के - सौ पुत्रा उसी भाँति काल - कवलित हो गए, जैसे सपने में मिला हुआ धन नींद खुलने पर लुप्त हो जाता है। अब तुम्हीं मेरे पुत्रा हो। इस कारण तुम्हें दुखी नहीं होना चाहिए।य् पाडवों का धृतराष्ट्र के प्रति व्यवहारं39 कौरवों पर विजय पा लेने के बाद सारे राज्य पर पांडवों का एकछत्रा अिाकार हो गया और उन्होंने कतर्व्य समझकर राज - काज सँभाल लिया। पिफर भी जिस संतोष और सुख की उन्हें आशा थी, वह प्राप्त नहीं हुआ। युिाष्िठर ने अपने भाइयों को आज्ञा दे रखी थी कि पुत्रों के बिछोह से दुखी राजा धृतराष्ट्र को किसी भी तरह की व्यथा न पहुँचने पाए। सिवाए भीमसेन के सब पांडव युिाष्िठर के ही आदेशानुसार व्यवहार करते थे। पांडव वृ( धृतराष्ट्र का खूब आदर करते हुए उन्हें हर प्रकार का सुख एवं सुविधा पहुँचाने के प्रयत्न में लगे रहते थे, जिससे धृतराष्ट्र को अपने पुत्रों का अभाव महसूस न हो। धृतराष्ट्र भी पांडवों से स्नेहपूणर् व्यवहार किया करते थे। न तो पांडव उन्हें अपि्रय समझते थे और न धृतराष्ट्र ही पांडवों को अपि्रय समझते थे। परंतु भीमसेन कभी - कभी ऐसी बातें कर दिया करता था, जिससे धृतराष्ट्र के दिल को चोट पहुँचती। युिाष्िठर के राजािाराज बनने के थोड़े ही दिन बाद भीमसेन धृतराष्ट्र की किसी आज्ञा को परिणत न होने देता था। कभी - कभी धृतराष्ट्र को सुनाते हुए वह कह भी देता था कि दुयोर्धन और उसके साथी अपनी नासमझी के कारण मारे गए हैं। बात यह थी कि दुयोर्धन, दुःशासन आदि द्वारा किए गए अत्याचारों और अपमानों का दुखद स्मरण भीमसेन के मन में अमिट रूप से अंकित हो चुका था। इस कारण न तो वह अपना पुराना वैर भूल पाता था और न व्रफोध को ही चबा पाता था। कभी - कभी वह गांधारी तक के आगे उलटी - सीधी बातें कर दिया करता था। भीमसेन की इन तीखी बातों से धृतराष्ट्र के हृदय को बहुत चोट पहुँचती थी। गांधारी को भी इस कारण बहुत दुख होता था। परंतु वह विवेकशीला थीं और धमर् का ममर् जानती थीं। इसलिए भीमसेन की बातें चुपचाप सह लिया करती थीं तथा वुंफती से स्पूफतिर् पाकर धीरज धर लिया करती थीं। यद्यपि महाराज युिाष्िठर ने धृतराष्ट्र को हर प्रकार से आराम पहुँचाने का उचित प्रबंध कर रखा था, पिफर भी धृतराष्ट्र का जी सुखभोग में नहीं लगता था। एक तो वह बहुत वृ( हो गए थे, पिफर भीमसेन की अपि्रय बातों से कभी - कभी उनका हृदय ख्िान्न हो जाता था। धीरे - धीरे उनके मन में विराग आ गया। इन बातों में गांधारी भी उनका अनुसरण किया करती थीं। एक दिन धृतराष्ट्र धमर्राज के भवन में गए और उनसे बोलेμफ्तुम तो शास्त्रों के ज्ञाता हो और यह भी जानते हो कि हमारे वंश की परंपरागत प्रथा के अनुसार हम वृ(ों को वल्कल धारण करके वन में जाना चाहिए। इसके अनुसार ही मैं अब तुम्हारी भलाइर् की कामना करता हुआ वन में जाकर रहना चाहता हूँ। तुम्हें इस बात की अनुमति मुझे देनी ही होगी।य् धृतराष्ट्र की ये बातें सुनकर युिाष्िठर बहुत ख्िान्न हुए और भरे हुए हृदय से बोलेμफ्अब मैंने तय किया है कि आज से आपका ही पुत्रा युयुत्सु राजगद्दी पर बैठे या जिसे आप चाहें राजा बना दें। अथवा शासन की बागडोर स्वयं अपने हाथों में ले लें और प्रजा का पालन करें। मैं वन में चला जाउँफगा। राजा मैं नहीं बल्िक आप ही हैं। मैं ऐसी हालत में आपको अनुमति वैफसे दे सकता हूँ?य् यह सुनकर धृतराष्ट्र बोलेμफ्वुंफती - पुत्रा! मेरे मन में वन में जाकर तपस्या करने की इच्छा बड़ी प्रबल हो रही है। तुम्हारे साथ मैं इतने बरसों तक सुखपूवर्क रहा और तुम और तुम्हारे भाइर् सभी मेरी सेवा - सुश्रूषा करते रहे। वन में जाने का मेरा ही समय है, तुम्हारा नहीं। इस कारण वन में जाने की अनुमति तुम्हें देने का सवाल ही नहीं उठता। यह अनुमति तो तुमको देनी ही होगी।य् बाल महाभारत कथा ध् 95 यह सुनकर युिाष्िठर अंजलिब( होकर काँपते हुए खड़े रहे। वह वुफछ बोल न सके। उनसे ये बातें कहने के बाद धृतराष्ट्र आचायर् वृफप एवं विदुर से बोलेμफ्भैया विदुर और आचायर्! आप लोेग महाराज युिाष्िठर को समझा - बुझाकर मुझे वन में जाने की अनुमति दिलाइए।य् और इस तरह से युिाष्िठर से वन में जाने की अनुमति पाकर वृ( राजा धृतराष्ट्र उठे और गांधारी के वंफधे पर हाथ रखकर लाठी टेकते हुए वन के लिए रवाना हुए। माता वुंफती भी उनके साथ रवाना हुईं। गांधारी ने अपनी आँखों पर प‘ी बाँधी हुइर् थी, इसीलिए वह वुंफती के कंधे पर हाथ रखकर रास्ता टटोलती हुइर् जाने लगीं और इस तरह तीनों वृ( राजवुफटुंबी राजधानी की सीमा पारकर वन की ओर चले। धमर्राज समझ रहे थे कि माता वुंफती गांधारी को थोड़ी दूर तक विदा करने के लिए साथ जा रही हैं। वह सँभलकर बोलेμफ्माँ, तुम वन में क्यों जा रही हो? तुम्हारा जाना तो ठीक नहीं है। तुम्हीं ने आशीवार्द देकर यु( के लिए भेजा था। अब तुम्हीं हमें छोड़कर वन को जाने लगीं। यह ठीक नहीं है।य् इतना कहते - कहते युिाष्िठर का गला भर आया। ¯कतु उनके आग्रह करने पर भी वंुफती अपने निश्चय पर अटल रहीं। युिाष्िठर अवाव्फ होकर खड़े हुए देखते रहे। धृतराष्ट्र, गांधारी और वुंफती ने तीन वषर् तक वन में तपस्िवयों का - सा जीवन व्यतीत किया। संजय भी उनके साथ था। श्रीकृष्ण और युिाष्िठर महाभारत के यु( की समाप्ित के बाद श्रीवृफष्णछत्तीस बरस तक द्वारका में राज्य करते रहे। उनके सुशासन में यदुवंश ने सुख - समृि को भोगा, परंतु आपसी पूफट के कारण अंततः यह विशाल यदुवंश समाप्त हो गया। यह वंश - नाश देखकर बलराम को असीम शोक हुआ और उन्होंने वहीं समािा में बैठकर शरीर त्याग दिया। सब बंधु - बांधवों का सवर्नाश हुआ देखकर श्रीवृफष्ण भी ध्यानमग्न हो गए और समुद्र के किनारे स्िथत वन में अकेले विचरण करते रहे। जो वुफछ हुआ था, उस पर विचार करके उन्होंने जान लिया कि संसार छोड़कर जाने का उनवफा भी समय आ गया है। यह सोचते - सोचते वह भी वहीं शमीन पर एक पेड़ के नीचे लेट गए। इतने में कोइर् श्िाकारी श्िाकार की तलाश में घूमता - पिफरता उधर से आ निकला। सोए हुए श्रीवृफष्ण को श्िाकारी ने दूर से हिरन समझा और धनुष तानकर एक तीर मारा। तीर श्रीवृफष्ण के तलुए को छेदता हुआ शरीर में घुस गया और उनके देहावसान का कारण बन गया। यह शोकजनक समाचार हस्ितनापुर पहुँचा और पांडवों के मन में सांसारिक जीवन के प्रति विराग छा गया। जीवित रहने की चाह अब उनमें न रही। अभ्िामन्यु के पुत्रा परीक्ष्िात को राजगद्दी पर बैठाकर पाँचों पांडवों ने द्रौपदी को साथ लेकर तीथर्यात्रा करने का निश्चय किया। वे हस्ितनापुर से रवाना होकर अनेक पवित्रा स्थानों के दशर्न करते हुए अंत में हिमालय की ओर चल दिए। इध्र परीक्ष्िात और उसके वंशजों ने न्यायोचित शासन की परंपरा का निवार्ह करते हुए दीघर् समय तक राज्य किया।ऽ

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