नौवाँ पाठ विश्वेश्वरैया हरे - भरे धान के खेत लहलहा रहे थे। 52ध्दूवार् जहाँ विश्वेश्वरैया खड़ा था वहीं निकट की नाली का पानी उमड़ - घुमड़ रहा था। उसमें भँवर भी उठ रहे थे। उसने एक जलप्रपात का रूप धारण कर लिया था। वह एक बहुत ही बड़े पत्थर को अपने साथ बहा कर ले जा रहा था जिससे उसकी शक्ित का प्रदशर्न होता था। विश्वेश्वरैया ने हवा और सूयर् की शक्ित को भी देखा था। सामूहिक रूप से वे प्रवृफति की असीम शक्ित की ओर संकेत कर रहे थे। ‘प्रवृफति शक्ित है। मुझे प्रवृफति के बारे में सब वुफछ जानना चाहिए’ वह छोटा - सा लड़का बुदबुदाया। पिफर उसने थोड़ी दूरी पर, निभीर्कता से मूसलाधार वषार् में खड़ी एक आवृफति को ताड़पत्रा की छतरी हाथ में लिए देखा। वह उसे तुरंत पहचान गया। उसके कपड़े पफटे हुए थे। वह कमशोर और भूखी लग रही थी। वह एक झोंपड़ी में रहती थी। उसके बच्चे कभी स्वूफल नहीं जाते। वह गरीब थी। विश्वेश्वरैया ने सोचा ‘वह इतनी गरीब क्यों है?’ उन्होंने बड़ी गंभीरता से प्रवृफति और गरीबी के कारण के बारे में जानने का प्रयास किया। वह परिवार के बड़ों से इन बातों का उत्तर जानना चाहते थे। वह अपने अध्यापकों से भी िारह करते। वह उनसे प्रवृफति के बारे में पूछतेμ उफजार् के कौन से प्रचलित स्रोत हैं? वैफसे इस उफजार् को पकड़ कर इस्तेमाल में लाया जा सकता है? वह यह भी पूछते कि आख्िार इतने लोग गरीब क्यों हैं? नौकरानी पफटी साड़ी क्यों पहनती है? वह झोंपड़ी में क्यों रहती है? क्या उसे अपने बच्चों को स्वूफल नहीं भेजना चाहिए? धीरे - धीरे इस लड़के को प्रवृफति और जीवन के बारे में अंतदृर्ष्िट प्राप्त होने लगी। उन्हें महसूस हुआ कि ज्ञान असीमित है। उसे बिना रफके, सीखते रहना होगा। तभी उन्हें उन प्रश्नों केउत्तर मिल सकते हैं जो उन्होंने उठाए थे। उन्होंने निश्चय किया कि वह जीवनपय±त तक छात्रा बने रहेंगे क्योंकि बहुत वुफछ सीखना बाकी है। इसी संकल्प विश्वेश्वरैयाध्53 में उनकी महानता की वुफंजी थी। मोक्षगंुडम विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर ;जो अब कनार्टक में हैद्ध के मुद्देनाहल्ली नामक स्थान पर 15 सितंबर 1861 को हुआ था। उनके पिता वैद्य थे। वषो± पहले उनके पूवर्ज आंध्र प्रदेश के मोक्षगुंडम से यहाँ आए और मैसूर में बस गए थे। दो वषर् की आयु से ही उनका परिचय रामायण, महाभारत और पंचतंत्रा की कहानियों से हो गया था। ये कहानियाँ हर रात घर की वृ( महिलाएँ उन्हें सुनाती थीं। कहानियाँ श्िाक्षाप्रद व मनोरंजक थीं। इन कहानियों से विश्वेश्वरैया ने इर्मानदारी, दया और अनुशासन जैसे मूल मानवीय मूल्यों को आत्मसात किया। विश्वेश्वरैया चिक्बल्लापुर के मिडिल व हाइर्स्वूफल में पढ़े। जब उन्हें ‘गाड सेव द ¯कग’ ;इर्श्वर राजा को सुरक्ष्िात रखेद्ध वाला गीत गाने को कहा गया तो उन्हें पता चला कि भारत एक बि्रटिश उपनिवेश है, अपने मामलों में भी भारतीयों को वुफछ कहने का अिाकार न था। भारत की अिाकांशसंपिा विदेश्िायों ने हड़प ली थी। क्या उनके घर में काम करने वाली नौकरानी विदेशी शासन के कारण गरीब है? यह प्रश्न विश्वेश्वरैया के मस्ितष्क में उमड़ता - घुमड़ता रहा। राष्ट्रीयता की चिंगारी जल उठी थी और उनके जीवन में यह अंत समय तक जलती रही। विश्वेश्वरैया जब केवल चैदह वषर् के थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गइर्। क्या वह अपनी पढ़ाइर् जारी रखें? इस प्रश्न पर तब विचार - विमशर् हुआ जब उन्होंने अपनी माँ से कहा, फ्अम्मा, क्या मैं बंगलौर जा सकता हूँ? मैं वहाँ मामा रामैया के यहाँ रह सकता हूँ। वहाँ मैं काॅलेज में प्रवेश ले लूँगा।य् 54ध्दूवार् ‘पर बेटा... तुम्हारे मामा अमीर नहीं है। तुम उन पर बोझ क्यों बनना चाहते हो?’ उनकी माँ ने तवर्फ किया। फ्अम्मा... मैं अपनी शरूरतों के लिए स्वयं कमाउँफगा। मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दूँगा। अपनी प़्ाफीस देने और पुस्तवेंफ खरीदने के लिए मैं काप़्ाफी धन कमा लूँगा। मेरे ख्याल से मेरे पास वुफछ पैसे बच भी जाएँगे, जिन्हें मैं मामा को दे दूँगा,य् विश्वेश्वरैया ने समझाया। उनके पास हर प्रश्न का उत्तर थाμ समाधान ढूँढ़ने की क्षमता उनके पूरे जीवन में लगातार विकसित होती रही और इस कारण वह एक व्यावहारिक व्यक्ित बन गए। यह उनके जीवन का सार था और उनका संदेश था पहले जानो, पिफर करो। बड़े होकर यही विश्वेश्वरैया एक महान इंजीनियर बने। μ आर.के. मूतिर् ;अनुवाद - सुमन जैनद्ध विश्वेश्वरैयाध्55 मूसलाधार वषार् - तेश बारिश मस्ितष्क - दिमाग निहारना - देखना ऊजार् - शक्ित बुदबुदाना - धीरे - धीरे बोलना असीमित - जिसकी सीमा न हो उपनिवेश - वह देश जिस पर किसी अंतदृर्ष्िट - समझ अन्य देश का अिाकार हो आकृति - आकार 1. पाठ से क अपने घर के बरामदे में खड़े होकर छः वषीर्य विश्वेश्वरैया ने क्या देखा? ख तुम्हें विश्वेश्वरैया की कौन सी बात सबसे अच्छी लगी? क्यों? ग विश्वेश्वरैया के मन में कौन - कौन से सवाल उठते थे? 2. सवाल विश्वेश्वरैया अपने मन में उठे सवालों का जवाब अपने अध्यापकों और बड़ों से जानने की कोश्िाश करते थे। क्या तुम अध्यापकों से पाठ्य पुस्तकों के सवालों के अतिरिक्त भी वुफछ सवाल पूछते हो? वुफछ सवालों को लिखो जो तुमने अपने अध्यापकों से पूछे हों। 3. अनुभव और विचार क तुम्हें सदीर् - गरमी के मौसम में अपने घर के आसपास क्या - क्या दिखाइर् देता है? ख तुमने पाठ में पढ़ा कि एक बूढ़ी महिला ताड़पत्रा से बनी छतरी लिए खड़ी थी। पता करो कि ताड़पत्रा से और क्या - क्या बनाया जाता है? ग विश्वेश्वरैया ने बचपन में रामायण, महाभारत, पंचतंत्रा आदि की कहानियाँ सुनी थीं। तुमने पाठ्यपुस्तक के अलावा कौन - कौन सी कहानियाँ सुनी हैं? किसी कहानी के बारे में बताओ। 56ध्दूवार् घ तुम्हारे मन में भी अनेक सवाल उठे होंगे जिनके जवाब तुम्हें नहीं मिले। ऐसे ही वुफछ सवालों की सूची बनाओ।घ तुम्हारे विचार से गरीबी के क्या कारण हैं? 4. वाक्य बनाओ नीचे पाठ में से चुनकर वुफछ शब्द दिए गए हैं। तुम इनका प्रयोग अपने ढंग के वाक्य बनाने में करो। क हरे - भरे ख उमड़ - घुमड़ ग एक - दूसरे घ धीरे - धीरेघ टप - टप च पफटी - पुरानी 5. इन वाक्यों को पढ़ो और इन्हें प्रश्नवाचक वाक्यों में बदलो क ज्ञान असीमित है। ख आकाश में अँधेरा छाया हुआ था। ग गइे और नालियाँ पानी से भर गईं। घ उसने एक जल - प्रपात का रूप धारण कर लिया।घ राष्ट्रीयता की ¯चगारी जल उठी थी। च मैं कापफी धन कमा लूँगा।

RELOAD if chapter isn't visible.