चिडि़या की बच्ची धवदास ने अपनी संगमरमर की नयी कोठी बनवाइर् है। उसके सामने बहुत सुहावना बगीचा भी लगवाया है। उनको कला से बहुत प्रेम है। धन की कमी नहीं है और कोइर् व्यसन छू नहीं गया है। सुंदर अभ्िारुचि के आदमी हैं। पूफल - पौधे, रकाबियों से हौशों में लगे पफव्वारों में उछलता हुआ पानी उन्हें बहुत अच्छा लगता है। समय भी उनके पास कापफी है।़शाम को जब दिन की गरमी ढल जाती है और आसमान कइर् रंग का हो जाता है तब कोठी के बाहर चबूतरे पर तख्त डलवाकर मसनद के सहारे वह गलीचेपर बैठते हैं और प्रकृति की छटा निहारते हैं। इनमें मानो उनके मन को तृप्ित मिलती है। मित्रा हुए तो उनसे विनोद - चचार् करते हैं, नहीं तो पास रखे हुए पफशीर् हुक्के की सटक को मुँह में दिए खयाल ही खयाल में संध्या को स्वप्न की भाँति गुशार देते हैं। आज वुफछ - वुफछ बादल थे। घटा गहरी नहीं थी। धूप का प्रकाश उनमें से छन - छनकर आ रहा था। माधवदास मसनद के सहारे बैठे थे। उन्हें ¯शदगी में क्या स्वाद नहीं मिला है? पर जी भरकर भी वुफछ खाली सा रहता है। वसंत भाग - 2 उस दिन संध्या समय उनके देखते - देखते सामने की गुलाब की डाली पर एक चिडि़या आन बैठी। चिडि़या बहुत संुदर थी। उसकी गरदन लाल थी और गुलाबीहोते - होते किनारों पर शरा - शरा नीली पड़ गइर् थी। पंख ऊपर से चमकदार स्याह थे। उसका नन्हा सा सिर तो बहुत प्यारा लगता था और शरीर पर चित्रा - विचित्राचित्राकारी थी। चिडि़या को मानो माधवदास की सत्ता का वुफछ पता नहीं था और मानो तनिक देर का आराम भी उसे नहीं चाहिए था। कभी पर हिलाती थी, कभी पुफदकती थी। वह खूब खुश मालूम होती थी। अपनी नन्ही सी चोंच से प्यारी - प्यारी आवाश निकाल रही थी। माधवदास को वह चिडि़या बड़ी मनमानी लगी। उसकी स्वच्छंदता बड़ी प्यारी जान पड़ती थी। वुफछ देर तक वह उस चिडि़या का इस डाल से उस डाल थ्िारकना देखते रहे। इस समय वह अपना बहुत - वुफछ भूल गए। उन्होंने उस चिडि़या से कहा, फ्आओ, तुम बड़ी अच्छी आईं। यह बगीचा तुम लोगों के बिना सूना लगता है। सुनो चिडि़या तुम खुशी से यह समझो कि यह बगीचा मैंने तुम्हारे लिए ही बनवाया है। तुम बेखटके यहाँ आया करो।य् चिडि़या पहले तो असावधान रही। पिफर जानकर कि बात उससे की जा रही है, वह एकाएक तो घबराइर्। पिफर संकोच को जीतकर बोली, फ्मुझे मालूम नहीं था कि यह बगीचा आपका है। मैं अभी चली जाती हूँ। पलभर साँस लेने मैं यहाँ टिक गइर् थी।य् माधवदास ने कहा, फ्हाँ, बगीचा तो मेरा है। यह संगमरमर की कोठी भी मेरी है। लेकिन, इस सबको तुम अपना भी समझ सकती हो। सब वुफछ तुम्हारा है। तुम वैफसी भोली हो, वैफसी प्यारी हो। जाओ नहीं, बैठो। मेरा मन तुमसे बहुत खुश होता है।य् चिडि़या बहुत - वुफछ सवुफचा गइर्। उसे बोध हुआ कि यह उससे गलती तो नहीं हुइर् कि वह यहाँ बैठ गइर् है। उसका थ्िारकना रुक गया। भयभीत - सी वह बोली, फ्मैं थककर यहाँ बैठ गइर् थी। मैं अभी चली जाउँफगी। बगीचा आपका है। मुझे68 ़मापफ करें!य् चिडि़या की बच्ची माधवदास ने कहा, फ्मेरी भोली चिडि़या, तुम्हें देखकर मेरा चित्त प्रपुफल्िलत हुआ है। मेरा महल भी सूना है। वहाँ कोइर् भी चहचहाता नहीं है। तुम्हें देखकर मेरी रागनियों का जी बहलेगा। तुम वैफसी प्यारी हो, यहाँ ही तुम क्यों न रहो?य् चिडि़या बोली, फ्मैं माँ के पास जा रही हूँ, सूरज की धूप खाने और हवा से खेलने और पूफलों से बात करने मैं शरा घर से उड़ आइर् थी, अब साँझ हो गइर् है और माँ के पास जा रही हूँ। अभी - अभी मैं चली जा रही हूँ। आप सोच न करें।य् माधवदास ने कहा, फ्प्यारी चिडि़या, पगली मत बनो। देखो, तुम्हारे चारों तरपफ़वैफसी बहार है। देखो, वह पानी खेल रहा है, उधर गुलाब हँस रहा है। भीतर महल में चलो, जाने क्या - क्या न पाओगी! मेरा दिल वीरान है। वहाँ कब हँसी सुनने को मिलती है? मेरे पास बहुत सा सोना - मोती है। सोने का एक बहुत संुदर घर मैं तुम्हें बना दूँगा, मोतियों की झालर उसमें लटकेगी। तुम मुझे खुश रखना। और तुम्हें क्या चाहिए! माँ के पास बताओ क्या है? तुम यहाँ ही सुख से रहो, मेरी भोली गुडि़या।य् चिडि़या इन बातों से बहुत डर गइर्। वह बोली, फ्मैं भटककर तनिक आराम के लिए इस डाली पर रुक गइर् थी। अब भूलकर भी ऐसी गलती नहीं होगी। मैं अभी यहाँ से उड़ी जा रही हूँ। तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आती हैं। मेरी माँ के घोंसले के बाहर बहुतेरी सुनहरी धूप बिखरी रहती है। मुझे और क्या करना है? दो दाने माँ ला देती है और जब मैं पर खोलने बाहर जाती हूँ तो माँ मेरी बाट देखती रहती है। मुझे तुम और वुफछ मत समझो, मैं अपनी माँ की हूँ।य् 69 वसंत भाग - 2 माधवदास ने कहा, फ्भोली चिडि़या, तुम कहाँ रहती हो? तुम मुझे नहीं जानती हो?य् चिडि़या, फ्मैं माँ को जानती हूँ, भाइर् को जानती हूँ, सूरज को और उसकी धूप को जानती हूँ। घास, पानी और पूफलों को जानती हूँ। महामान्य, तुम कौन हो? मैं तुम्हें नहीं जानती।य् माधवदास, फ्तुम भोली हो चिडि़या! तुमने मुझे नहीं जाना, तब तुमने वुफछ नहीं जाना। मैं ही तो हूँ सेठ माधवदास। मेरे पास क्या नहीं है! जो माँगो, मैं वही दे सकता हूँ।य् चिडि़या, फ्पर मेरी तो छोटी सी जात है। आपके पास सब वुफछ है। तब मुझे जाने दीजिए।य् माधवदास, फ्चिडि़या, तू निरी अनजान है। मुझे खुश करेगी तो तुझे मालामाल कर सकता हूँ।य् चिडि़या, फ्तुम सेठ हो। मैं नहीं जानती, सेठ क्या होता है। पर सेठ कोइर् बड़ी बात होती होगी। मैं अनसमझ ठहरी। माँ मुझे बहुत प्यार करती है। वह मेरी राह देखती होगी। मैं मालामाल होकर क्या होउँफगी, मैं नहीं जानती। मालामाल किसे कहते हैं? क्या मुझे वह तुम्हारा मालामाल होना चाहिए?य् सेठ, फ्अरी चिडि़या तुझे बुि नहीं है। तू सोना नहीं जानती, सोना? उसी की जगत को तृष्णा है। वह सोना मेरे पास ढेर का ढेर है। तेरा घर समूचा सोने का होगा। ऐसा ¯पजरा बनवाउँफगा कि कहीं दुनिया में न होगा, ऐसा कि तू देखती रह जाए। तू उसके भीतर थ्िारक - पुफदककर मुझे खुश करियो। तेरा भाग्य खुल जाएगा। तेरे पानी पीने की कटोरी भी सोने की होगी।य् चिडि़या, फ्वह सोना क्या चीश होती है?य् सेठ, फ्तू क्या जानेगी, तू चिडि़या जो है। सोने का मूल्य सीखने के लिए तुझे बहुत सीखना है। बस, यह जान ले कि सेठ माधवदास तुझसे बात कर रहा है। जिससे मैं बात तक कर लेता हूँ उसकी किस्मत खुल जाती है। तू अभी जग का हाल नहीं जानती। मेरी कोठियों पर कोठियाँ हैं, बगीचों पर बगीचे हैं।70 चिडि़या की बच्ची दास - दासियों की संख्या नहीं है। पर तुझसे मेरा चित्त प्रसन्न हुआ है। ऐसा वरदान कब किसी को मिलता है? री चिडि़या! तू इस बात को समझती क्यों नहीं?य् चिडि़या, फ्सेठ, मैं नादान हूँ। मैं वुफछ समझती नहीं। पर, मुझे देर हो रही है। माँ मेरी बाट देखती होगी।य् सेठ, फ्ठहर - ठहर, इस अपने पास के पूफल को तूने देखा? यह एक है। ऐसे अनगिनती पूफल हैं। ऐसे अनगिनती पूफल मेरे बगीचों में हैं। वे भाँति - भाँति के रंगके हैं। तरह - तरह की उनकी खुशबू हैं। चिडि़या, तैंने मेरा चित्त प्रसन्न किया है और वे सब पूफल तेरे लिए ख्िाला करेंगे। वहाँ घोंसले में तेरी माँ है, पर माँ क्या है? इस बहार के सामने तेरी माँ क्या है? वहाँ तेरे घोंसले में वुफछ भी तो नहीं है। तू अपने को नहीं देखती? वैफसी संुदर तेरी गरदन। वैफसी रंगीन देह! तू अपने मूल्य को क्यों नहीं देखती? मैं तुझे सोने से मढ़कर तेरे मूल्य को चमका दूँगा। तैंने मेरेचित्त को प्रसन्न किया है। तू मत जा, यहीं रह।य् चिडि़या, फ्सेठ, मैं अपने को नहीं जानती। इतना जानती हूँ कि माँ मेरी माँ है और मुझे यहाँ देर हो रही है। सेठ, मुझे रात मत करो, रात में अँधेरा बहुत हो जाता है और मैं राह भूल जाउँफगी।य् सेठ ने कहा, फ्अच्छा, चिडि़या जाती हो तो जाओ। पर, इस बगीचे को अपना ही समझो। तुम बड़ी संुदर हो।य् यह कहने के साथ ही सेठ ने एक बटन दबा दिया। उसके दबने से दूर कोठी के अंदर आवाश हुइर् जिसे सुनकर एक दास झटपट भागकर बाहर आया। यह सब छनभर में हो गया और चिडि़या वुफछ भी नहीं समझी। सेठ कहते रहे, फ्तुम अभी माँ के पास जाओ। माँ बाट देखती होगी। पर, कल आओगी न? कल आना, परसों आना, रोश आना।य् यह कहते - कहते दास को सेठ ने इशारा कर दिया और वह चिडि़या को पकड़ने के जतन में चला। सेठ कहते रहे, फ्सच तुम बड़ी संुदर लगती हो! तुम्हारे भाइर् - बहिन हैं? कितने भाइर् - बहिन हैं?य् 71 चिडि़या, फ्दो बहिन, एक भाइर्। पर मुझे देर हो रही है।य् फ्हाँ हाँ जाना। अभी तो उजेला है। दो बहन, एक भाइर् है? बड़ी अच्छी बात है।य् पर चिडि़या के मन के भीतर जाने क्यों चैन नहीं था। वह चैकन्नी हो - हो चारों ओर देखती थी। उसने कहा, फ्सेठ मुझे देर हो रही है।य् सेठ ने कहा, फ्देर अभी कहाँ? अभी उजेला है, मेरी प्यारी चिडि़या! तुम अपने घर का इतने और हाल सुनाओ। भय मत करो।य् चिडि़या ने कहा, फ्सेठ मुझे डर लगता है। माँ मेरी दूर है। रात हो जाएगी तो राह नहीं सूझेगी।य् इतने में चिडि़या को बोध हुआ कि जैसे एक कठोर स्पशर् उसके देह को छू गया। वह चीख देकर चिचियाइर् और एकदम उड़ी। नौकर के पैफले हुए पंजे में वह आकर भी नहीं आ सकी। तब वह उड़ती हुइर् एक साँस में माँ के पास गइर् और माँ की गोद में गिरकर सुबकने लगी, फ्ओ माँ, ओ माँ!य्72 माँ ने बच्ची को छाती से चिपटाकर पूछा, फ्क्या है मेरी बच्ची, क्या है?य् पर, बच्ची काँप - काँपकर माँ की छाती से और चिपक गइर्, बोली वुफछ नहीं, बस सुबकती रही, फ्ओ माँ, ओ माँ!य् बड़ी देर में उसे ढाढ़स बँधा और तब वह पलक मींच उस छाती में ही चिपककर सोइर्। जैसे अब पलक न खोलेगी। ऽजैनेंद्र वुफमार कहानी से 1.किन बातों से ज्ञात होता है कि माधवदास का जीवन संपन्नता से भरा था और किन बातों से ज्ञात होता है कि वह सुखी नहीं था? 2.माधवदास क्यों बार - बार चिडि़या से कहता है कि यह बगीचा तुम्हारा ही है? क्या माधवदास निःस्वाथर् मन से ऐसा कह रहा था? स्पष्ट कीजिए। 3.माधवदास के बार - बार समझाने पर भी चिडि़या सोने के ¯पजरे और सुख - सुविधाओंको कोइर् महत्त्व नहीं दे रही थी। दूसरी तरप़्ाफ माधवदास की नशर में चिडि़या की िाद का कोइर् तुक न था। माधवदास और चिडि़या के मनोभावों के अंतर क्या - क्या थे? अपने शब्दों में लिख्िाए। 4.कहानी के अंत में नन्ही चिडि़या का सेठ के नौकर के पंजे से भाग निकलने की बात पढ़कर तुम्हें वैफसा लगा? चालीस - पचास या इससे वुफछ अिाक शब्दों में अपनी प्रतििया लिख्िाए। 5.‘माँ मेरी बाट देखती होगी’μनन्ही चिडि़या बार - बार इसी बात को कहती है। आपअपने अनुभव के आधार पर बताइए कि हमारी ¯शदगी में माँ का क्या महत्त्व है? 6.इस कहानी का कोइर् और शीषर्क देना हो तो आप क्या देना चाहेंगे और क्यों? कहानी से आगे 1.इस कहानी में आपने देखा कि वह चिडि़या अपने घर से दूर आकर भी पिफर अपने घोंसले तक वापस पहुँच जाती है। मधुमक्िखयों, चींटियों, ग्रह - नक्षत्रों तथा 73 वसंत भाग - 2 प्रकृति की अन्य विभ्िान्न चीशों में हमें एक अनुशासनब(ता देखने को मिलती है। इस तरह के स्वाभाविक अनुशासन का रूप आपको कहाँ - कहाँ देखने को मिलता है? उदाहरण देकर बताइए। 2.सोचकर लिख्िाए कि यदि सारी सुविधाएँ देकर एक कमरे में आपको सारे दिन बंद रहने को कहा जाए तो क्या आप स्वीकार करेंगे? आपको अिाक पि्रय क्या होगाμ‘स्वाधीनता’ या ‘प्रलोभनोंवाली पराधीनता’? ऐसा क्यों कहा जाता है कि पराधीन व्यक्ित को सपने में भी सुख नहीं मिल पाता। नीचे दिए गए कारणों को पढ़ें और विचार करेंμ ;कद्धक्योंकि किसी को पराधीन बनाने की इच्छा रखनेवाला व्यक्ित स्वयं दुखी होता है, वह किसी को सुखी नहीं कर सकता। ;खद्ध क्योंकि पराधीन व्यक्ित सुख के सपने देखना ही नहीं चाहता। ;गद्ध क्योंकि पराधीन व्यक्ित को सुख के सपने देखने का भी अवसर नहीं मिलता। अनुमान और कल्पना ऽ आपने गौर किया होगा कि मनुष्य, पशु, पक्षीμइन तीनों में ही माँएँ अपने बच्चोंका पूरा - पूरा ध्यान रखती हैं। प्रकृति की इस अद्भुत देन का अवलोकन कर अपने शब्दों में लिख्िाए। भाषा की बात 1.पाठ में पर शब्द के तीन प्रकार के प्रयोग हुए हैंμ ;कद्ध गुलाब की डाली पर एक चिडि़या आन बैठी। ;खद्ध कभी पर हिलाती थी। ;गद्ध पर बच्ची काँप - काँपकर माँ की छाती से और चिपक गइर्। ऽ तीनों ‘पर’ के प्रयोग तीन उद्देश्यों से हुए हैं। इन वाक्यों का आधार लेकर आप भी ‘पर’ का प्रयोग कर ऐसे तीन वाक्य बनाइए जिनमें अलग - अलग उद्देश्यों के लिए ‘पर’ के प्रयोग हुए हों। 2.पाठ में तंैने, छनभर, खुश करियोμतीन वाक्यांश ऐसे हैं जो खड़ीबोली ¯हदी के वतर्मान रूप में तूने, क्षणभर, खुश करना लिखे - बोले जाते हैं लेकिन ¯हदी के निकट की बोलियों में कहीं - कहीं इनके प्रयोग होते74 हैं। इस तरह के वुफछ अन्य शब्दों की खोज कीजिए।

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VasantBhag2-009

चिड़िया की बच्ची 9

माधवदास ने अपनी संगमरमर की नयी कोठी बनवाई है। उसके सामने बहुत सुहावना बगीचा भी लगवाया है। उनको कला से बहुत प्रेम है। धन की कमी नहीं है और कोई व्यसन छू नहीं गया है। सुंदर अभिरुचि के आदमी हैं। फूल-पौधे, रकाबियों से हौज़ों में लगे फव्वारों में उछलता हुआ पानी उन्हें बहुत अच्छा लगता है। समय भी उनके पास काफ़ी है। शाम को जब दिन की गरमी ढल जाती है और आसमान कई रंग का हो जाता है तब कोठी के बाहर चबूतरे पर तख्त डलवाकर मसनद के सहारे वह गलीचे पर बैठते हैं और प्रकृति की छटा निहारते हैं। इनमें मानो उनके मन को तृप्ति मिलती है। मित्र हुए तो उनसे विनोद-चर्चा करते हैं, नहीं तो पास रखे हुए फर्शी हुक्के की सटक को मुँह में दिए खयाल ही खयाल में संध्या को स्वप्न की भाँति गुज़ार देते हैं।

आज कुछ-कुछ बादल थे। घटा गहरी नहीं थी। धूप का प्रकाश उनमें से छन-छनकर आ रहा था। माधवदास मसनद के सहारे बैठे थे। उन्हें ज़िंदगी में क्या स्वाद नहीं मिला है? पर जी भरकर भी कुछ खाली सा रहता है।

उस दिन संध्या समय उनके देखते-देखते सामने की गुलाब की डाली पर एक चिड़िया आन बैठी। चिड़िया बहुत सुंदर थी। उसकी गरदन लाल थी और गुलाबी होते-होते किनारों पर ज़रा-ज़रा नीली पड़ गई थी। पंख ऊपर से चमकदार स्याह थे। उसका नन्हा सा सिर तो बहुत प्यारा लगता था और शरीर पर चित्र-विचित्र चित्रकारी थी। चिड़िया को मानो माधवदास की सत्ता का कुछ पता नहीं था और मानो तनिक देर का आराम भी उसे नहीं चाहिए था। कभी पर हिलाती थी, कभी फुदकती थी। वह खूब खुश मालूम होती थी। अपनी नन्ही सी चोंच से प्यारी-प्यारी आवाज़ निकाल रही थी।

माधवदास को वह चिड़िया बड़ी मनमानी लगी। उसकी स्वच्छंदता बड़ी प्यारी जान पड़ती थी। कुछ देर तक वह उस चिड़िया का इस डाल से उस डाल थिरकना देखते रहे। इस समय वह अपना बहुत-कुछ भूल गए। उन्होंने उस चिड़िया से कहा, "आओ, तुम बड़ी अच्छी आईं। यह बगीचा तुम लोगों के बिना सूना लगता है। सुनो चिड़िया तुम खुशी से यह समझो कि यह बगीचा मैंने तुम्हारे लिए ही बनवाया है। तुम बेखटके यहाँ आया करो।"

चिड़िया पहले तो असावधान रही। फिर जानकर कि बात उससे की जा रही है, वह एकाएक तो घबराई। फिर संकोच को जीतकर बोली, "मुझे मालूम नहीं था कि यह बगीचा आपका है। मैं अभी चली जाती हूँ। पलभर साँस लेने मैं यहाँ टिक गई थी।"

माधवदास ने कहा, "हाँ, बगीचा तो मेरा है। यह संगमरमर की कोठी भी मेरी है। लेकिन, इस सबको तुम अपना भी समझ सकती हो। सब कुछ तुम्हारा है। तुम कैसी भोली हो, कैसी प्यारी हो। जाओ नहीं, बैठो। मेरा मन तुमसे बहुत खुश होता है।"

चिड़िया बहुत-कुछ सकुचा गई। उसे बोध हुआ कि यह उससे गलती तो नहीं हुई कि वह यहाँ बैठ गई है। उसका थिरकना रुक गया। भयभीत-सी वह बोली, "मैं थककर यहाँ बैठ गई थी। मैं अभी चली जाऊँगी। बगीचा आपका है। मुझे माफ़ करें!"

माधवदास ने कहा, "मेरी भोली चिड़िया, तुम्हें देखकर मेरा चित्त प्रफुल्लित हुआ है। मेरा महल भी सूना है। वहाँ कोई भी चहचहाता नहीं है। तुम्हें देखकर मेरी रागनियों का जी बहलेगा। तुम कैसी प्यारी हो, यहाँ ही तुम क्यों न रहो?"

चिड़िया बोली, "मैं माँ के पास जा रही हूँ, सूरज की धूप खाने और हवा से खेलने और फूलों से बात करने मैं ज़रा घर से उड़ आई थी, अब साँझ हो गई है और माँ के पास जा रही हूँ। अभी-अभी मैं चली जा रही हूँ। आप सोच न करें।"

माधवदास ने कहा, "प्यारी चिड़िया, पगली मत बनो। देखो, तुम्हारे चारों तरफ़ कैसी बहार है। देखो, वह पानी खेल रहा है, उधर गुलाब हँस रहा है। भीतर महल में चलो, जाने क्या-क्या न पाओगी! मेरा दिल वीरान है। वहाँ कब हँसी सुनने को मिलती है? मेरे पास बहुत सा सोना-मोती है। सोने का एक बहुत सुंदर घर मैं तुम्हें बना दूँगा, मोतियों की झालर उसमें लटकेगी। तुम मुझे खुश रखना। आैर तुम्हें क्या चाहिए! माँ के पास बताओ क्या है? तुम यहाँ ही सुख से रहो, मेरी भोली गुड़िया।"

चिड़िया इन बातों से बहुत डर गई। वह बोली, "मैं भटककर तनिक आराम के लिए इस डाली पर रुक गई थी। अब भूलकर भी ऐसी गलती नहीं होगी। मैं अभी यहाँ से उड़ी जा रही हूँ। तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आती हैं। मेरी माँ के घोंसले के बाहर बहुतेरी सुनहरी धूप बिखरी रहती है। मुझे और क्या करना है? दो दाने माँ ला देती है और जब मैं पर खोलने बाहर जाती हूँ तो माँ मेरी बाट देखती रहती है। मुझे तुम और कुछ मत समझो, मैं अपनी माँ की हूँ।"


माधवदास ने कहा, "भोली चिड़िया, तुम कहाँ रहती हो? तुम मुझे नहीं जानती हो?"

चिड़िया, "मैं माँ को जानती हूँ, भाई को जानती हूँ, सूरज को और उसकी धूप को जानती हूँ। घास, पानी और फूलों को जानती हूँ। महामान्य, तुम कौन हो? मैं तुम्हें नहीं जानती।"

माधवदास, "तुम भोली हो चिड़िया! तुमने मुझे नहीं जाना, तब तुमने कुछ नहीं जाना। मैं ही तो हूँ सेठ माधवदास। मेरे पास क्या नहीं है! जो माँगो, मैं वही दे सकता हूँ।"

चिड़िया, "पर मेरी तो छोटी सी जात है। आपके पास सब कुछ है। तब मुझे जाने दीजिए।"

माधवदास, "चिड़िया, तू निरी अनजान है। मुझे खुश करेगी तो तुझे मालामाल कर सकता हूँ।"


चिड़िया, "तुम सेठ हो। मैं नहीं जानती, सेठ क्या होता है। पर सेठ कोई बड़ी बात होती होगी। मैं अनसमझ ठहरी। माँ मुझे बहुत प्यार करती है। वह मेरी राह देखती होगी। मैं मालामाल होकर क्या होऊँगी, मैं नहीं जानती। मालामाल किसे कहते हैं? क्या मुझे वह तुम्हारा मालामाल होना चाहिए?"

सेठ, "अरी चिड़िया तुझे बुद्धि नहीं है। तू सोना नहीं जानती, सोना? उसी की जगत को तृष्णा है। वह सोना मेरे पास ढेर का ढेर है। तेरा घर समूचा सोने का होगा। ऐसा पिजरा बनवाऊँगा कि कहीं दुनिया में न होगा, ऐसा कि तू देखती रह जाए। तू उसके भीतर थिरक-फुदककर मुझे खुश करियो। तेरा भाग्य खुल जाएगा। तेरे पानी पीने की कटोरी भी सोने की होगी।"

चिड़िया, "वह सोना क्या चीज़ होती है?"

सेठ, "तू क्या जानेगी, तू चिड़िया जो है। सोने का मूल्य सीखने के लिए तुझे बहुत सीखना है। बस, यह जान ले कि सेठ माधवदास तुझसे बात कर रहा है। जिससे मैं बात तक कर लेता हूँ उसकी किस्मत खुल जाती है। तू अभी जग का हाल नहीं जानती। मेरी कोठियों पर कोठियाँ हैं, बगीचों पर बगीचे हैं। दास-दासियों की संख्या नहीं है। पर तुझसे मेरा चित्त प्रसन्न हुआ है। ऐसा वरदान कब किसी को मिलता है? री चिड़िया! तू इस बात को समझती क्यों नहीं?"

चिड़िया, "सेठ, मैं नादान हूँ। मैं कुछ समझती नहीं। पर, मुझे देर हो रही है। माँ मेरी बाट देखती होगी।"

सेठ, "ठहर-ठहर, इस अपने पास के फूल को तूने देखा? यह एक है। ऐसे अनगिनत फूल हैं। ऐसे अनगिनत फूल मेरे बगीचों में हैं। वे भाँति-भाँति के रंग के हैं। तरह-तरह की उनकी खुशबू हैं। चिड़िया, तैंने मेरा चित्त प्रसन्न किया है और वे सब फूल तेरे लिए खिला करेंगे। वहाँ घोंसले में तेरी माँ है, पर माँ क्या है? इस बहार के सामने तेरी माँ क्या है? वहाँ तेरे घोंसले में कुछ भी तो नहीं है। तू अपने को नहीं देखती? कैसी सुंदर तेरी गरदन। कैसी रंगीन देह! तू अपने मूल्य को क्यों नहीं देखती? मैं तुझे सोने से मढ़कर तेरे मूल्य को चमका दूँगा। तैंने मेरे चित्त को प्रसन्न किया है। तू मत जा, यहीं रह।"

चिड़िया, "सेठ, मैं अपने को नहीं जानती। इतना जानती हूँ कि माँ मेरी माँ है और मुझे यहाँ देर हो रही है। सेठ, मुझे रात मत करो, रात में अँधेरा बहुत हो जाता है और मैं राह भूल जाऊँगी।"

सेठ ने कहा, "अच्छा, चिड़िया जाती हो तो जाओ। पर, इस बगीचे को अपना ही समझो। तुम बड़ी सुंदर हो।"

यह कहने के साथ ही सेठ ने एक बटन दबा दिया। उसके दबने से दूर कोठी के अंदर आवाज़ हुई जिसे सुनकर एक दास झटपट भागकर बाहर आया। यह सब छनभर में हो गया और चिड़िया कुछ भी नहीं समझी।

सेठ कहते रहे, "तुम अभी माँ के पास जाओ। माँ बाट देखती होगी। पर, कल आओगी न? कल आना, परसों आना, रोज़ आना।"

यह कहते-कहते दास को सेठ ने इशारा कर दिया और वह चिड़िया को पकड़ने के जतन में चला।

सेठ कहते रहे, "सच तुम बड़ी सुंदर लगती हो! तुम्हारे भाई-बहिन हैं? कितने भाई-बहिन हैं?"


चिड़िया, "दो बहिन, एक भाई। पर मुझे देर हो रही है।"

"हाँ हाँ जाना। अभी तो उजेला है। दो बहन, एक भाई है? बड़ी अच्छी बात है।"

पर चिड़िया के मन के भीतर जाने क्यों चैन नहीं था। वह चौकन्नी हो-हो चारों ओर देखती थी। उसने कहा, "सेठ मुझे देर हो रही है।"

सेठ ने कहा, "देर अभी कहाँ? अभी उजेला है, मेरी प्यारी चिड़िया! तुम अपने घर का इतने और हाल सुनाओ। भय मत करो।"

चिड़िया ने कहा, "सेठ मुझे डर लगता है। माँ मेरी दूर है। रात हो जाएगी तो राह नहीं सूझेगी।"

इतने में चिड़िया को बोध हुआ कि जैसे एक कठोर स्पर्श उसके देह को छू गया। वह चीख देकर चिचियाई और एकदम उड़ी। नौकर के फैले हुए पंजे में वह आकर भी नहीं आ सकी। तब वह उड़ती हुई एक साँस में माँ के पास गई और माँ की गोद में गिरकर सुबकने लगी, "ओ माँ, ओ माँ!"


माँ ने बच्ची को छाती से चिपटाकर पूछा, "क्या है मेरी बच्ची, क्या है?"

पर, बच्ची काँप-काँपकर माँ की छाती से और चिपक गई, बोली कुछ नहीं, बस सुबकती रही, "ओ माँ, ओ माँ!"

बड़ी देर में उसे ढाढ़स बँधा और तब वह पलक मींच उस छाती में ही चिपककर सोई। जैसे अब पलक न खोलेगी।

जैनेंद्र कुमार

प्रश्न-अभ्यास

कहानी से

  1. किन बातों से ज्ञात होता है कि माधवदास का जीवन संपन्नता से भरा था और किन बातों से ज्ञात होता है कि वह सुखी नहीं था?
  2. माधवदास क्यों बार-बार चिड़िया से कहता है कि यह बगीचा तुम्हारा ही है? क्या माधवदास निःस्वार्थ मन से ऐसा कह रहा था? स्पष्ट कीजिए।
  3. माधवदास के बार-बार समझाने पर भी चिड़िया सोने के पिंजरे और सुख-सुविधाओं को कोई महत्त्व नहीं दे रही थी। दूसरी तरफ़ माधवदास की नज़र में चिड़िया की जि़द का कोई तुक न था। माधवदास और चिड़िया के मनोभावों के अंतर क्या-क्या थे? अपने शब्दों में लिखिए।
  4. कहानी के अंत में नन्ही चिड़िया का सेठ के नौकर के पंजे से भाग निकलने की बात पढ़कर तुम्हें कैसा लगा? चालीस-पचास या इससे कुछ अधिक शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया लिखिए।
  5. ‘माँ मेरी बाट देखती होगी’–नन्ही चिड़िया बार-बार इसी बात को कहती है। आप अपने अनुभव के आधार पर बताइए कि हमारी ज़िंदगी में माँ का क्या महत्त्व है?
  6. इस कहानी का कोई और शीर्षक देना हो तो आप क्या देना चाहेंगे और क्यों?

    कहानी से आगे

  1. इस कहानी में आपने देखा कि वह चिड़िया अपने घर से दूर आकर भी फिर अपने घोंसले तक वापस पहुँच जाती है। मधुमक्खियों, चींटियों, ग्रह-नक्षत्रों तथा प्रकृति की अन्य विभिन्न चीज़ों में हमें एक अनुशासनबद्धता देखने को मिलती है। इस तरह के स्वाभाविक अनुशासन का रूप आपको कहाँ-कहाँ देखने को मिलता है? उदाहरण देकर बताइए।
  2. सोचकर लिखिए कि यदि सारी सुविधाएँ देकर एक कमरे में आपको सारे दिन बंद रहने को कहा जाए तो क्या आप स्वीकार करेंगे? आपको अधिक प्रिय क्या होगा-‘स्वाधीनता’ या ‘प्रलोभनोंवाली पराधीनता’? ऐसा क्यों कहा जाता है कि पराधीन व्यक्ति को सपने में भी सुख नहीं मिल पाता। नीचे दिए गए कारणों को पढ़ें और विचार करें-

    (क) क्योंकि किसी को पराधीन बनाने की इच्छा रखनेवाला व्यक्ति स्वयं दुखी
    होता है, वह किसी को सुखी नहीं कर सकता।

    (ख) क्योंकि पराधीन व्यक्ति सुख के सपने देखना ही नहीं चाहता।

    (ग) क्योंकि पराधीन व्यक्ति को सुख के सपने देखने का भी अवसर नहीं मिलता।

    अनुमान और कल्पना

    आपने गौर किया होगा कि मनुष्य, पशु, पक्षी–इन तीनों में ही माँएँ अपने बच्चों का पूरा-पूरा ध्यान रखती हैं। प्रकृति की इस अद्भुत देन का अवलोकन कर अपने शब्दों में लिखिए।

    भाषा की बात

  1. पाठ में पर शब्द के तीन प्रकार के प्रयोग हुए हैं-

    (क) गुलाब की डाली पर एक चिड़िया आन बैठी।

    (ख) कभी पर हिलाती थी।

    (ग) पर बच्ची काँप-काँपकर माँ की छाती से और चिपक गई।

    तीनों ‘पर’ के प्रयोग तीन उद्देश्यों से हुए हैं। इन वाक्यों का आधार लेकर
    आप भी ‘पर’ का प्रयोग कर ऐसे तीन वाक्य बनाइए जिनमें अलग-अलग
    उद्देश्यों के लिए ‘पर’ के प्रयोग हुए हों।

  2. पाठ में तैंने, छनभर, खुश करियो-तीन वाक्यांश ऐसे हैं जो खड़ीबोली हिंदी के वर्तमान रूप में तूने, क्षणभर, खुश करना लिखे-बोले जाते हैं लेकिन हिंदी के निकट की बोलियों में कहीं-कहीं इनके प्रयोग होते हैं। इस तरह के कुछ अन्य शब्दों की खोज कीजिए।



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