हिमालय की बेटियाँ भी तक मैंने उन्हें दूर से देखा था। बड़ी गंभीर, शांत, अपने आप में खोइर् हुइर् लगती थीं। संभ्रांत महिला की भाँति वे प्रतीत होती थीं। उनके प्रति मेरे दिल में आदर और श्र(ा के भाव थे। माँ और दादी, मौसी और मामी की गोद की तरह उनकी धारा में डुबकियाँ लगाया करता। परंतु इस बार जब मैं हिमालय के वंफधे पर चढ़ा तो वे वुफछ और रूप में सामने थीं। मैं हैरान था कि यही दुबली - पतली गंगा, यही यमुना, यही सतलुज समतल मैदानों में उतरकर विशाल वैफसे हो जाती हैं! इनका उछलना और वूफदना, हिमालय की बेटियाँ ख्िालख्िालाकर लगातार हँसते जाना, इनकी यह भाव - भंगी, इनका यह उल्लास कहाँ गायब हो जाता है मैदान में जाकर? किसी लड़की को जब मैं देखता हूँ, किसी कली पर जब मेरा ध्यान अटक जाता है, तब भी इतना कौतूहल और विस्मय नहीं होता, जितना कि इन बेटियों की बाललीला देखकर! कहाँ ये भागी जा रही हैं? वह कौन लक्ष्य है जिसने इन्हें बेचैन कर रखा है? अपने महान पिता का विराट प्रेम पाकर भी अगर इनका हृदय अतृप्त ही है तो वह कौन होगा जो इनकी प्यास मिटा सकेगा! बरपफ जली नंगी पहाडि़याँ,़छोटे - छोटे पौधों से भरी घाटियाँ, बंधुर अिात्यकाएँ, सरसब्श उपत्यकाएँμऐसा है इनका लीला निकेतन! खेलते - खेलते जब ये शरा दूर निकल जाती हैं तो देवदार, चीड़, सरो, चिनार, सप़्ोफदा, वैफल के जंगलों में पहुँचकर शायद इन्हें बीती बातें याद करने का मौका मिल जाता होगा। कौन जाने, बुइा हिमालय अपनी इन नटखट बेटियों के लिए कितना सिर धुनता होगा! बड़ी - बड़ी चोटियोंसे जाकर पूछिए तो उत्तर में विराट मौन के सिवाय उनके पास और रखा ही क्या है? ¯सधु और ब्रह्मपुत्राμये दो ऐसे नाम हैं जिनके सुनते ही रावी, सतलुज, व्यास, चनाब, झेलम, काबुल ;वुफभाद्ध, कपिशा, गंगा, यमुना, सरयू, गंडक, कोसी आदि हिमालय की छोटी - बड़ी सभी बेटियाँ आँखों के सामने नाचने लगती हैं। वास्तव में ¯सधु और ब्रह्मपुत्रा स्वयं वुफछ नहीं हैं। दयालु हिमालय के पिघले हुए दिल की एक - एक बूँद न जाने कब से इकऋा हो - होकर इन दो महानदों के रूप में समुद्र की ओर प्रवाहित होती रही है। कितना सौभाग्यशाली है वह समुद्र जिसे पवर्तराज हिमालय की इन दो बेटियों का हाथ पकड़ने का श्रेय मिला! जिन्हांेंने मैदानों में ही इन नदियों को देखा होगा, उनके खयाल में शायद ही यह बात आ सके कि बूढ़े हिमालय की गोद में बच्िचयाँ बनकर ये वैफसे खेला करती हैं। माँ - बाप की गोद में नंग - धड़ंग होकर खेलनेवाली इन बालिकाओं का रूप पहाड़ी आदमियों के लिए आकषर्क भले न हो, लेकिन मुझे तो ऐसा लुभावना प्रतीत हुआ वह रूप कि हिमालय को ससुर और समुद्र को उसका दामाद कहने में वुफछ भी झिझक नहीं होती है। 13 वसंत भाग - 2 कालिदास के विरही यक्ष ने अपने मेघदूत से कहा थाμवेत्रावती ;बेतवाद्ध नदी को प्रेम का प्रतिदान देते जाना, तुम्हारी वह प्रेयसी तुम्हें पाकर अवश्य ही प्रसन्न होगी। यह बात इन चंचल नदियों को देखकर मुझे अचानक याद आ गइर् और सोचा कि शायद उस महाकवि को भी नदियों का सचेतन रूपक पसंद था। दरअसल जो भी कोइर् नदियों को पहाड़ी घाटियों और समतल आँगनों के मैदानों में जुदा - जुदा शक्लों में देखेगा, वह इसी नतीजे पर पहुँचेगा। काका कालेलकर ने नदियों को लोकमाता कहा है। ¯वफतु माता बनने से पहले यदि हम इन्हें बेटियों के रूप में देख लें तो क्या हजर् है? और थोड़ा आगे चलिए...इन्हीं में अगर हम प्रेयसी की भावना करें तो वैफसे रहेगा? ममता का एक और भी धागा है, जिसे हम इनके साथ जोड़ सकते हैं। बहन का स्थान कितने कवियोंने इन नदियों को दिया है। एक दिन मेरी भी ऐसी भावना हुइर् थी। थो - लिघ् ;तिब्बतद्ध की बात है। मन उचट गया था, तबीयत ढीली थी। सतलज के किनारे जाकर बैठ गया। दोपहर का समय था। पैर लटका दिए पानी में। थोड़ी ही देर में उस प्रगतिशील जल ने असर डाला। तन और मन ताशा हो गया तो लगा मैं गुनगुनानेμ जय हो सतलज बहन तुम्हारी लीला अचरज बहन तुम्हारी हुआ मुदित मन हटा खुमारी जाउँफ मैं तुम पर बलिहारी तुम बेटी यह बाप हिमालय ¯चतित पर, चुपचाप हिमालयप्रकृति नटी के चित्रिात पट पर अनुपम अद्भुत छाप हिमालय जय हो सतलज बहन तुम्हारी! ऽ 14 लेख से 1.नदियों को माँ मानने की परंपरा हमारे यहाँ कापफी पुरानी है। लेकिन लेखक़नागाजर्ुन उन्हें और किन रूपों में देखते हैं? 2.¯सधु और ब्रह्मपुत्रा की क्या विशेषताएँ बताइर् गइर् हैं? 3.काका कालेलकर ने नदियों को लोकमाता क्यों कहा है? 4.हिमालय की यात्रा में लेखक ने किन - किन की प्रशंसा की है? लेख से आगे 1.नदियों और हिमालय पर अनेक कवियों ने कविताएँ लिखी हैं। उन कविताओं का चयन कर उनकी तुलना पाठ में निहित नदियों के वणर्न से कीजिए। 2.गोपाल¯सह नेपाली की कविता ‘हिमालय और हम’ अनुमान और कल्पना भाषा की बात 15 वसंत भाग - 2 ;कद्ध संभ्रांत महिला की भाँति वे प्रतीत होती थीं। ;खद्ध माँ और दादी, मौसी और मामी की गोद की तरह उनकी धरा में डुबकियाँ लगाया करता। ऽ अन्य पाठों से ऐसे पाँच तुलनात्मक प्रयोग निकालकर कक्षा में सुनाइए और उन सुंदर प्रयोगों को काॅपी में भी लिख्िाए। 2.निजीर्व वस्तुओं को मानव - संबंध्ी नाम देने से निजीर्व वस्तुएँ भी मानो जीवित हो उठती हैं। लेखक ने इस पाठ में कइर् स्थानों पर ऐसे प्रयोग किए हैं, जैसेμ ;कद्ध परंतु इस बार जब मैं हिमालय के वंफध्े पर चढ़ा तो वे वुफछ और रूप में सामने थीं। ;खद्ध काका कालेलकर ने नदियों को लोकमाता कहा है। ऽ पाठ से इसी तरह के और उदाहरण ढूँढि़ए। 3.पिछली कक्षा में आप विशेषण और उसके भेदों से परिचय प्राप्त कर चुके हैं। नीचे दिए गए विशेषण और विशेष्य ;स्ंाज्ञाद्ध का मिलान कीजिएμ विशेषण विशेष्य संभ्रांत वषार् चंचल जंगल समतल महिला घना नदियाँ मूसलधार आँगन 4.द्वंद्व समास के दोनों पद प्रधान होते हैं। इस समास में ‘और’ शब्द का लोप हो जाता है, जैसेμराजा - रानी द्वंद्व समास है जिसका अथर् है राजा और रानी। पाठ में कइर् स्थानों पर द्वंद्व समासों का प्रयोग किया गया है। इन्हें खोजकर वणर्माला क्रम ;शब्दकोश - शैलीद्ध में लिख्िाए। 5.नदी को उलटा लिखने से दीन होता है जिसका अथर् होता है गरीब। आप भी पाँच ऐसे शब्द लिख्िाए जिसे उलटा लिखने पर साथर्क शब्द बन जाए। प्रत्येक शब्द के आगे संज्ञा का नाम भी लिख्िाए, जैसेμनदी - दीन ;भाववाचक संज्ञाद्ध।16 हिमालय की बेटियाँ 6.समय के साथ भाषा बदलती है, शब्द बदलते हैं और उनके रूप बदलते हैं, जैसेμबेतवा नदी के नाम का दूसरा रूप ‘वेत्रावती’ है। नीचे दिए गए शब्दों में से ढूँढ़कर इन नामों के अन्य रूप लिख्िाएμ सतलुज रोपड़ विपाशा वितस्ता झेलम चिनाब रूपपुर शतद्रुमअजयमेरु वाराणसीअजमेर बनारस 7.‘उनके खयाल में शायद ही यह बात आ सके कि बूढ़े हिमालय की गोद में बच्िचयाँ बनकर ये वैफसे खेला करती हैं।’ ऽ उपयुर्क्त पंक्ित में ‘ही’ के प्रयोग की ओर ध्यान दीजिए। ‘ही’ वाला वाक्य नकारात्मक अथर् दे रहा है। इसीलिए ‘ही’ वाले वाक्य में कही गइर् बात को हम ऐसे भी कह सकते हैंμउनके खयाल में शायद यह बात न आ सके। ऽ इसी प्रकार नकारात्मक प्रश्नवाचक वाक्य कइर् बार ‘नहीं’ के अथर् में इस्तेमाल नहीं होते हैं, जैसेμमहात्मा गांधी को कौन नहीं जानता? दोनों प्रकार के वाक्यों के समान तीन - तीन उदाहरण सोचिए और इस दृष्िट से उनका विश्लेषण कीजिए। 17 पूफले कदंब पूफले कदंब टहनी - टहनी में वंफदुक सम झूले कदंब पूफले कदंब। सावन बीता बादल का कोप नहीं रीता जाने कब से तू बरस रहा ललचाइर् आँखों से नाहक जाने कब से तू तरस रहा मन कहता है, छू ले कदंब पूफले कदंब पूफले कदंब। ऽ नागाजुर्न

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हिमालय की बेटियाँ 3

अभी तक मैंने उन्हें दूर से देखा था। बड़ी गंभीर, शांत, अपने आप में खोई हुई लगती थीं। संभ्रांत महिला की भाँति वे प्रतीत होती थीं। उनके प्रति मेरे दिल में आदर और श्रद्धा के भाव थे। माँ और दादी, मौसी और मामी की गोद की तरह उनकी धारा में डुबकियाँ लगाया करता।

परंतु इस बार जब मैं हिमालय के कंधे पर चढ़ा तो वे कुछ और रूप में सामने थीं। मैं हैरान था कि यही दुबली-पतली गंगा, यही यमुना, यही सतलुज समतल मैदानों में उतरकर विशाल कैसे हो जाती हैं! इनका उछलना और कूदना, खिलखिलाकर लगातार हँसते जाना, इनकी यह भाव-भंगी, इनका यह उल्लास कहाँ गायब हो जाता है मैदान में जाकर? किसी लड़की को जब मैं देखता हूँ, किसी कली पर जब मेरा ध्यान अटक जाता है, तब भी इतना कौतूहल और विस्मय नहीं होता, जितना कि इन बेटियों की बाललीला देखकर!


कहाँ ये भागी जा रही हैं? वह कौन लक्ष्य है जिसने इन्हें बेचैन कर रखा है? अपने महान पिता का विराट प्रेम पाकर भी अगर इनका हृदय अतृप्त ही  है तो वह कौन होगा जो इनकी प्यास मिटा सकेगा! बरफ़ जली नंगी पहाड़ियाँ, छोटे-छोटे पौधों से भरी घाटियाँ, बंधुर अधित्यकाएँ, सरसब्ज़ उपत्यकाएँ–ऐसा  है इनका लीला निकेतन! खेलते-खेलते जब ये ज़रा दूर निकल जाती हैं तो देवदार, चीड़, सरो, चिनार, सफ़ेदा, कैल के जंगलों में पहुँचकर शायद इन्हें  बीती बातें याद करने का मौका मिल जाता होगा। कौन जाने, बुड्ढा हिमालय अपनी इन नटखट बेटियों के लिए कितना सिर धुनता होगा! बड़ी-बड़ी चोटियों से जाकर पूछिए तो उत्तर में विराट मौन के सिवाय उनके पास और रखा ही क्या है?

सिंधु और ब्रह्मपुत्र-ये दो ऐसे नाम हैं जिनके सुनते ही रावी, सतलुज, व्यास, चनाब, झेलम, काबुल (कुभा), कपिशा, गंगा, यमुना, सरयू, गंडक, कोसी आदि हिमालय की छोटी-बड़ी सभी बेटियाँ आँखों के सामने नाचने लगती हैं। वास्तव में सिंधु और ब्रह्मपुत्र स्वयं कुछ नहीं हैं। दयालु हिमालय के पिघले हुए दिल की एक-एक बूँद न जाने कब से इकट्ठा हो-होकर इन दो महानदों के रूप में समुद्र की ओर प्रवाहित होती रही है। कितना सौभाग्यशाली है वह समुद्र जिसे पर्वतराज हिमालय की इन दो बेटियों का हाथ पकड़ने का श्रेय मिला!

जिन्हाेंंने मैदानों में ही इन नदियों को देखा होगा, उनके खयाल में शायद ही यह बात आ सके कि बूढ़े हिमालय की गोद में बच्चियाँ बनकर ये कैसे खेला करती हैं। माँ-बाप की गोद में नंग-धड़ंग होकर खेलनेवाली इन बालिकाओं का रूप पहाड़ी आदमियों के लिए आकर्षक भले न हो, लेकिन मुझे तो ऐसा लुभावना प्रतीत हुआ वह रूप कि हिमालय को ससुर और समुद्र को उसका दामाद कहने में कुछ भी झिझक नहीं होती है।

कालिदास के विरही यक्ष ने अपने मेघदूत से कहा था-वेत्रवती (बेतवा) नदी को प्रेम का प्रतिदान देते जाना, तुम्हारी वह प्रेयसी तुम्हें पाकर अवश्य ही प्रसन्न होगी। यह बात इन चंचल नदियों को देखकर मुझे अचानक याद आ गई और सोचा कि शायद उस महाकवि को भी नदियों का सचेतन रूपक पसंद था। दरअसल जो भी कोई नदियों को पहाड़ी घाटियों और समतल आँगनों के मैदानों में जुदा-जुदा शक्लों में देखेगा, वह इसी नतीजे पर पहुँचेगा।

काका कालेलकर ने नदियों को लोकमाता कहा है। किंतु माता बनने से पहले यदि हम इन्हें बेटियों के रूप में देख लें तो क्या हर्ज है? और थोड़ा आगे चलिए...इन्हीं में अगर हम प्रेयसी की भावना करें तो कैसे रहेगा? ममता का एक और भी धागा है, जिसे हम इनके साथ जोड़ सकते हैं। बहन का स्थान कितने कवियों ने इन नदियों को दिया है। एक दिन मेरी भी ऐसी भावना हुई थी। थो-लिङ् (तिब्बत) की बात है। मन उचट गया था, तबीयत ढीली थी। सतलज के किनारे जाकर बैठ गया। दोपहर का समय था। पैर लटका दिए पानी में। थोड़ी ही देर में उस प्रगतिशील जल ने असर डाला। तन और मन ताज़ा हो गया तो लगा मैं गुनगुनाने-

जय हो सतलज बहन तुम्हारी

लीला अचरज बहन तुम्हारी

हुआ मुदित मन हटा खुमारी

जाऊँ मैं तुम पर बलिहारी

तुम बेटी यह बाप हिमालय

चितित पर, चुपचाप हिमालय

प्रकृति नटी के चित्रित पट पर

अनुपम अद्भुत छाप हिमालय

जय हो सतलज बहन तुम्हारी!

नागार्जुन

प्रश्न-अभ्यास

लेख से

  1. नदियों को माँ मानने की परंपरा हमारे यहाँ काफ़ी पुरानी है। लेकिन लेखक नागार्जुन उन्हें और किन रूपों में देखते हैं?
  2. सिंधु और ब्रह्मपुत्र की क्या विशेषताएँ बताई गई हैं?
  3. काका कालेलकर ने नदियों को लोकमाता क्यों कहा है?
  4. हिमालय की यात्रा में लेखक ने किन-किन की प्रशंसा की है?

    लेख से आगे

  1. नदियों और हिमालय पर अनेक कवियों ने कविताएँ लिखी हैं। उन कविताओं का चयन कर उनकी तुलना पाठ में निहित नदियों के वर्णन से कीजिए।
  2. गोपालसिह नेपाली की कविता ‘हिमालय और हम’, रामधारी सिह ‘दिनकर’ की कविता ‘हिमालय’ तथा जयशंकर प्रसाद की कविता ‘हिमालय के आँगन में’ पढ़िए और तुलना कीजिए।
  3. यह लेख 1947 में लिखा गया था। तब से हिमालय से निकलनेवाली नदियों में क्या-क्या बदलाव आए हैं?
  4. अपने संस्कृत शिक्षक से पूछिए कि कालिदास ने हिमालय को देवात्मा क्यों कहा है?

    अनुमान और कल्पना

  1. लेखक ने हिमालय से निकलनेवाली नदियों को ममता भरी आँखों से देखते हुए उन्हें हिमालय की बेटियाँ कहा है। आप उन्हें क्या कहना चाहेंगे? नदियों की सुरक्षा के लिए कौन-कौन से कार्य हो रहे हैं? जानकारी प्राप्त करें और अपना सुझाव दें।
  2. नदियों से होनेवाले लाभों के विषय में चर्चा कीजिए और इस विषय पर बीस पंक्तियों का एक निबंध लिखिए।

    भाषा की बात

  1. अपनी बात कहते हुए लेखक ने अनेक समानताएँ प्रस्तुत की हैं। ऐसी तुलना से अर्थ अधिक स्पष्ट एवं सुंदर बन जाता है। उदाहरण-

    (क) संभ्रांत महिला की भाँति वे प्रतीत होती थीं।

    (ख) माँ और दादी, मौसी और मामी की गोद की तरह उनकी धारा में डुबकियाँ लगाया करता।

    अन्य पाठों से ऐसे पाँच तुलनात्मक प्रयोग निकालकर कक्षा में सुनाइए और उन सुंदर प्रयोगों को कॉपी में भी लिखिए।

  2. निर्जीव वस्तुओं को मानव-संबंधी नाम देने से निर्जीव वस्तुएँ भी मानो जीवित हो उठती हैं। लेखक ने इस पाठ में कई स्थानों पर ऐसे प्रयोग किए हैं, जैसे-

    (क) परंतु इस बार जब मैं हिमालय के कंधे पर चढ़ा तो वे कुछ और रूप में सामने थीं।

    (ख) काका कालेलकर ने नदियों को लोकमाता कहा है।

    पाठ से इसी तरह के और उदाहरण ढूँढ़िए।

  3. पिछली कक्षा में आप विशेषण और उसके भेदों से परिचय प्राप्त कर चुके हैं। नीचे दिए गए विशेषण और विशेष्य (संज्ञा) का मिलान कीजिए-

    विशेषण

    विशेष्य

    संभ्रांत

    वर्षा

    चंचल

    जंगल

    समतल

    महिला

    घना

    नदियाँ

    मूसलधार

    आँगन

  4. द्वंद्व समास के दोनों पद प्रधान होते हैं। इस समास में ‘और’ शब्द का लोप हो जाता है, जैसे-राजा-रानी द्वंद्व समास है जिसका अर्थ है राजा और रानी। पाठ में कई स्थानों पर द्वंद्व समासों का प्रयोग किया गया है। इन्हें खोजकर वर्णमाला क्रम (शब्दकोश-शैली) में लिखिए।
  5. नदी को उलटा लिखने से दीन होता है जिसका अर्थ होता है गरीब। आप भी पाँच ऐसे शब्द लिखिए जिसे उलटा लिखने पर सार्थक शब्द बन जाए। प्रत्येक शब्द के आगे संज्ञा का नाम भी लिखिए, जैसे-नदी-दीन (भाववाचक संज्ञा)।
  6. समय के साथ भाषा बदलती है, शब्द बदलते हैं और उनके रूप बदलते हैं, जैसे-बेतवा नदी के नाम का दूसरा रूप ‘वेत्रवती’ है। नीचे दिए गए शब्दों में से ढूँढ़कर इन नामों के अन्य रूप लिखिए-

    सतलुज  रोपड़   विपाशा वितस्ता

    झेलम   चिनाब   रूपपुर  शतद्रुम

    अजमेर  बनारस  अजयमेरु  वाराणसी

  7. ‘उनके खयाल में शायद ही यह बात आ सके कि बूढ़े हिमालय की गोद में बच्चियाँ बनकर ये कैसे खेला करती हैं।’

    उपर्युक्त पंक्ति में ‘ही’ के प्रयोग की ओर ध्यान दीजिए। ‘ही’ वाला वाक्य नकारात्मक अर्थ दे रहा है। इसीलिए ‘ही’ वाले वाक्य में कही गई बात को हम ऐसे भी कह सकते हैं-उनके खयाल में शायद यह बात न आ सके।

    इसी प्रकार नकारात्मक प्रश्नवाचक वाक्य कई बार ‘नहीं’ के अर्थ में इस्तेमाल नहीं होते हैं, जैसे-महात्मा गांधी को कौन नहीं जानता? दोनों प्रकार के वाक्यों के समान तीन-तीन उदाहरण सोचिए और इस दृष्टि से उनका विश्लेषण कीजिए।


फूले कदंब

केवल पढ़ने के लिए

फूले कदंब

टहनी-टहनी में कंदुक सम झूले कदंब

फूले कदंब।

सावन बीता

बादल का कोप नहीं रीता

जाने कब से तू बरस रहा

ललचाई आँखों से नाहक

जाने कब से तू तरस रहा

मन कहता है, छू ले कदंब

फूले कदंब

फूले कदंब।

नागार्जुन


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