दादी माँ मशोरी ही है अपनी, पर सच तो यह है कि शरा - सी कठिनाइर् पड़तेऋ बीसों गरमी, बरसात और वसंत देखने के बाद भी, मेरा मन सदा नहीं तो प्रायः अनमना - सा हो जाता है। मेरे शुभ¯चतक मित्रा मँुह पर मुझे प्रसन्न करने के लिए आनेवाली छु‘ियों की सूचना देते हैं और पीठ पीछे मुझे कमशोर और शरा - सी प्रतिवूफलता से घबरानेवाला कहकर मेरा मशाक उड़ाते हैं। मैं सोचता हूँ, ‘अच्छा, अब कभी उन बातों को न सोचूँगा। ठीक है, जाने दो, सोचने से होता ही क्या है’। पर, बरबस मेरी आँखों के सामने शरद की शीत किरणों के समान स्वच्छ, शीतल किसी की धुँधली छाया नाच उठती है। मुझे लगता है जैसे क्वार के दिन आ गए हैं। मेरे गाँव के चारों ओर पानी ही के बीज, सूरज की गरमी में खौलते हुए पानी में सड़कर एक विचित्रा गंध छोड़ रहे हैं। रास्तों में कीचड़ सूख गया है और गाँव के लड़के किनारों पर झागभरे जलाशयों में धमाके से वूफद रहे हैं। अपने - अपने मौसम की अपनी - अपनी बातें होती हैं। आषाढ़ में आम और जामुन न मिलें, ¯चता नहीं, अगहन में चिउड़ा और गुड़ न मिले, दुख नहीं, चैत के दिनों में लाइर् के साथ गुड़ की प‘ी न मिले, अप़्ाफसोस नहीं, पर क्वार के दिनों में इस गंधपूणर् झागभरे जल में वूफदना न हो तो बड़ा बुरा मालूम होता है। मैं भीतर हुड़क रहा था। दो - एक दिन ही तो वूफद सका था, नहा - धोकर बीमार हो गया। हलकी बीमारी न जाने क्यों मुझे अच्छी लगती है। थोड़ा - थोड़ा ज्वर हो, सर में साधारण ददर् और खाने के लिए दिनभर नींबू और साबू। लेकिन इस बार ऐसी चीश नहीं थी। ज्वर जो चढ़ा तो चढ़ता ही गया। रशाइर् पर रशाइर्μऔर उतरा रात बारह बजे के बाद। दिन में मैं चादर लपेटे सोया था। दादी माँ आईं, शायद नहाकर आइर् थीं, उसी झागवाले जल में। पतले - दुबले स्नेह - सने शरीर पर सप़्ोफद किनारीहीन धोती, सन - से सप़्ोफद बालों के सिरों पर सद्यः टपके हुए जल की शीतलता। आते ही उन्होंने सर, पेट छुए। आँचल की गाँठ खोल किसी अदृश्य शक्ितधारी के चबूतरे की मि‘ी मुँह में डाली, माथे पर लगाइर्। दिन - रात चारपाइर् के पास बैठी रहतीं, कभी पंखा झलतीं, कभी जलते हुए हाथ - पैर कपड़े से सहलातीं, सर पर दालचीनी का लेप करतीं और बीसों बार छू - छूकर ज्वर का अनुमान करतीं। हाँडी में पानी आया कि नहीं? उसे पीपल की छाल से छौंका कि नहीं? ख्िाचड़ी में मंँूग की दाल एकदम मिल तो गइर् है? कोइर् बीमार के घर में सीधे बाहर से आकर तो नहीं चला गया, आदि लाखों प्रश्न पूछ - पूछकर घरवालों को परेशान कर देतीं। दादी माँ को गँवइर् - गाँव की पचासों किस्म की दवाओं के नाम याद थे। गाँव में कोइर् बीमार होता, उसके पास पहुँचतीं और वहाँ भी वही काम। हाथ छूना, माथा छूना, पेट छूना। पिफर भूत से लेकर मलेरिया, सरसाम, निमोनिया तक का अनुमान विश्वास के साथ सुनातीं। महामारी और विशूचिका के दिनों मंे रोश सवेरे उठकर स्नान के बाद लवंग और गुड़ - मिश्रित जलधार, गुग्गल और धूप। सप़्ाफाइर् कोइर् उनसे सीख ले। दवा में देर होती, मिश्री या शहद खत्म हो जाता, चादर या गिलाप़्ाफ नहीं बदले जाते, तो वे जैसे पागल हो जातीं। बुखार तो मुझे अब भी आता है। नौकर पानी दे जाता है, मेस - महाराज अपने मन से पकाकर ख्िाचड़ी या साबू। डाॅक्टर साहब आकर नाड़ी देख जाते हैं और वुफनैन मिक्सचर की शीशी की तिताइर् के डर से बुखार भाग भी जाता है, पर न जाने क्यों ऐसे बुखार को बुलाने का जी नहीं होता! कहना! दिनभर गायब रहतीं। सारा घर जैसे उन्होंने सर पर उठा लिया हो। पड़ोसिनें आतीं। बहुत बुलाने पर दादी माँ आतीं, फ्बहिन बुरा न मानना। कार - परोजन का घर ठहरा। एक काम अपनेे हाथ से न करूँ , तो होनेवाला नहीं।य् जानने को यों सभी जानते थे कि दादी माँ वुफछ करतीं नहीं। पर किसी काम में उनकी अनुपस्िथति वस्तुतः विलंब का कारण बन जाती। उन्हीं दिनों की बात है। एक दिन दोपहर को मैं घर लौटा। बाहरी निकसार में दादी माँ किसी पर बिगड़ रही थीं। देखा, पास के कोने में दुबकी रामी की चाची खड़ी है। फ्सो न होगा, धन्नो! रुपये मय सूद के आज दे दे। तेरी आँख में तो शरम है नहीं। माँगने के समय वैफसी आइर् थी! पैरों पर नाक रगड़ती पिफरी, किसी ने एक पाइर् भी न दी। अब लगी है आजकल करनेμपफसल में दूँगी, पफसल में दूँगी...अब क्या तेरी खातिर दूसरी पफसल कटेगी?य् फ्दँूगी, मालकिन!य् रामी की चाची रोती हुइर्, दोनों हाथोें से आँचल पकड़े दादी माँ के पैरों की ओर झुकी, फ्बिटिया की शादी है। आप न दया करेंगी तो उस बेचारी का निस्तार वैफसे होगा!य् फ्हट, हट! अभी नहाके आ रही हँू!य् दादी माँ पीछे हट गईं। फ्जाने दो दादी,य् मैंने इस अपि्रय प्रसंग को हटाने की गरज से कहा, फ्बेचारी गरीब है, दे देगी कभी।य् फ्चल, चल! चला है समझाने...य् मैं चुपके से आँगन की ओर चला गया। कइर् दिन बीत गए, मैं इस प्रसंग को एकदम भूल - सा गया। एक दिन रास्ते में रामी की चाची मिली। वह दादी को ‘पूतों पफलो दूधों नहाओ’ का आशीवार्द दे रही थी! मैंने पूछा, फ्क्या बात है, धन्नो चाचीय्, तो उसने विह्नल होकर कहा, फ्उरिन हो गइर् बेटा, भगवान भला करे हमारी मालकिन का। कल ही आइर् थीं। पीछे का सभी रुपया छोड़ दिया, उफपर से दस रुपये का नोट देकर बोलीं, ‘देखना धन्नो, जैसी तेरी बेटी वैसी मेरी, दस - पाँच के लिए हँसाइर् न हो।’ देवता है बेटा, देवता।य् फ्उस रोश तो बहुत डाँट रही थीं?य् मैंने पूछा। फ्वह तो बड़े लोगों का काम है बाबू, रुपया देकर डाँटें भी न तो लाभ क्या!य् मैं मन - ही - मन इस तवर्फ पर हँसता हुआ आगे बढ़ गया। किशन के विवाह के दिनों की बात है। विवाह के चार - पाँच रोश पहले से ही औरतें रात - रातभर गीत गाती हैं। विवाह की रात को अभ्िानय भी होता है। यहप्रायः एक ही कथा का हुआ करता है, उसमें विवाह से लेकर पुत्रोत्पिा तक के सभी दृश्य दिखाए जाते हैंμसभी पाटर् औरतें ही करती हैं। मैं बीमार होने के कारण बारात में न जा सका। मेरा ममेरा भाइर् राघव दालान में सो रहा था ;वह भी बारातजाने के बाद पहुँचा थाद्ध। औरतों ने उस पर आपिा की। दादी माँ बिगड़ीं, फ्लड़के से क्या परदा? लड़के और बरह्मा का मन एक - सा होता है।य् वसंत भाग - 2 मुझे भी पास ही एक चारपाइर् पर चादर उढ़ाकर दादी माँ ने चुपके से सुला दिया था। बड़ी हँसी आ रही थी। सोचा, कहीं शोर से हँस दूँ, भेद खुल जाए तो निकाल बाहर किया जाउँफगा, पर भाभी की बात पर हँसी रुक न सकी और भंडापफोड़ हो गया। देबू की माँ ने चादर खींच ली, फ्कहो दादी, यह कौन बच्चा सोया है। बेचारा रोता है शायद, दूध तो पिला दूँ।य् हाथापाइर् शुरू हुइर्। दादी माँ बिगड़ीं, फ्लड़के से क्यों लगती है!य् सुबह रास्ते में देबू की माँ मिलीं, फ्कल वाला बच्चा, भाभी!य् मैं वहाँ से शोर से भागा और दादी माँ के पास जा खड़ा हुआ। वस्तुतः किसी प्रकार का अपराध हो जाने पर जब हम दादी माँ की छाया में खड़े हो जाते, अभयदान मिल जाता। स्नेह और ममता की मूतिर् दादी माँ की एक - एक बात आज वैफसी - वैफसीमालूम होती है। परिस्िथतियों का वात्याचव्रफ जीवन को सूखे पत्ते - सा वैफसा नचाता है, इसे दादी माँ खूब जानती थीं। दादा की मृत्यु के बाद से ही वे बहुत उदास रहतीं। संसार उन्हें धोखे की ट‘ी मालूम होता। दादा ने उन्हें स्वयं जो धोखा दिया। वे सदा उन्हें आगे भेजकर अपने पीछे जाने की झूठी बात कहा करते थे। दादा कीमृत्यु के बाद वुफवुफरमुत्ते की तरह बढ़नेवाले, मुँह में राम बगल में छुरीवाले दोस्तों की शुभ¯चता ने स्िथति और भी डाँवाडोल कर दी। दादा के श्रा( में दादी माँ केमना करने पर भी पिता जी ने जो अतुल संपिा व्यय की, वह घर की तो थी नहीं। दादी माँ अकसर उदास रहा करतीं। माघ के दिन थे। कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा था। पछुवा का सन्नाटा और पाले की शीत हंियों में घुसी पड़ती। शाम को मैंने देखा, दादी माँ गीली धोती पहने, कोनेवाले घर में एक संदूक पर दिया जलाए, हाथ जोड़कर बैठी हैं। उनकी स्नेह - कातर आँखों में मैंने आँसू कभी नहीं देखे थे। मैं बहुत देर तक मन मारे उनके पास बैठा रहा। उन्होंने आँखें खोलीं। फ्दादी माँ!य्, मैंने धीरे से कहा। फ्क्या है रे, तू यहाँ क्यों बैठा है?य् फ्दादी माँ, एक बात पूछूँ, बताओगी न?य् मैंने उनकी स्नेहपूणर् आँखों की ओर देखा। फ्क्या है, पूछ।य् फ्तुम रोती थीं?य् दादी माँ मुसकराईं, फ्पागल, तूने अभी खाना भी नहीं खाया न, चल - चल!य् फ्धोती तो बदल लो, दादी माँय्, मैंने कहा। फ्मुझे सरदी - गरमी नहीं लगती बेटा।य् वे मुझे खींचती रसोइर् में ले गईं। सुबह मैंने देखा, चारपाइर् पर बैठे पिता जी और किशन भैया मन मारे वुफछ सोच रहे हैं। फ्दूसरा चारा ही क्या है?य् बाबू बोले, फ्रुपया कोइर् देता नहीं। कितने के तो अभी पिछले भी बाकी हैं!य् वे रोने - रोने - से हो गए। फ्रोता क्यों है रे!य् दादी माँ ने उनका माथा सहलाते हुए कहा, फ्मैं तो अभी हूँ ही।य् उन्होंने संदूक खोलकर एक चमकती - सी चीश निकाली, फ्तेरे दादा ने यह वंफगन मुझे इसी दिन के लिए पहनाया था।य् उनका गला भर आया, फ्मैंने इसे पहना नहीं, इसे सहेजकर रखती आइर् हूँ। यह उनके वंश की निशानी है।य् उन्होंने आँसू पोंछकर कहा, फ्पुराने लोग आगा - पीछा सब सोच लेते थे, बेटा।य् काली पाँखें पैफलाकर मेरी ख्िाड़की पर बैठ गया। हाथ में अब भी किशन भैया का पत्रा काँप रहा है। काली चींटियांे - सी कतारें धूमिल हो रही हैं। आँखों पर विश्वास नहीं होता। मन बार - बार अपने से ही पूछ बैठता हैμ‘क्या सचमुच दादी माँ नहीं रहीं?’ ऽ श्िावप्रसाद ¯सह कहानी से 1.लेखक को अपनी दादी माँ की याद के साथ - साथ बचपन की और किन - किन बातों की याद आ जाती है? 2.दादा की मृत्यु के बाद लेखक के घर की आ£थक स्िथति खराब क्यों हो गइर् थी? 3.दादी माँ के स्वभाव का कौन सा पक्ष आपको सबसे अच्छा लगता है और क्यों? कहानी से आगे 1. आपने इस कहानी में महीनों के नाम पढ़े, जैसेμक्वार, आषाढ़, माघ। इन महीनों में मौसम वैफसा रहता है, लिख्िाए।10 2. ‘अपने - अपने मौसम की अपनी - अपनी बातें होती हैं’μलेखक के इस कथन के अनुसार यह बताइए कि किस मौसम में कौन - कौन सी चीशें विशेष रूप से मिलती हैं? अनुमान और कल्पना 1.इस कहानी में कइर् बार )ण लेने की बात आपने पढ़ी। अनुमान लगाइए, किन - किन पारिवारिक परिस्िथतियों मंे गाँव के लोगों को )ण लेना पड़ता होगा और यह उन्हें कहाँ से मिलता होगा? बड़ों से बातचीत कर इस विषय में लिख्िाए। 2.घर पर होनेवाले उत्सवों / समारोहों में बच्चे क्या - क्या करते हैं? अपने और अपने मित्रों के अनुभवों के आधार पर लिख्िाए। भाषा की बात 1.नीचे दी गइर् पंक्ितयों पर ध्यान दीजिएμ शरा - सी कठिनाइर् पड़ते अनमना - सा हो जाता है सन - से सप़्ोफद ऽ समानता का बोध कराने के लिए सा, सी, से का प्रयोग किया जाता है। ऐसे पाँच और शब्द लिख्िाए और उनका वाक्य में प्रयोग कीजिए। 2.कहानी में ‘छू - छूकर ज्वर का अनुमान करतीं, पूछ - पूछकर घरवालों को परेशान कर देतीं’μजैसे वाक्य आए हैं। किसी िया को शोर देकर कहने के लिए एक से अिाक बार एक ही शब्द का प्रयोग होता है। जैसे वहाँ जा - जाकर थक गया, उन्हें ढूँढ़ - ढँूढ़कर देख लिया। इस प्रकार के पाँच वाक्य बनाइए। 3.बोलचाल में प्रयोग होनेवाले शब्द और वाक्यांश ‘दादी माँ’ कहानी में हैं। इन शब्दों और वाक्यांशों से पता चलता है कि यह कहानी किसी विशेष क्षेत्रा से संबंिात है। ऐसे शब्दों और वाक्यांशों में क्षेत्राीय बोलचाल की खूबियाँ होती हैं। उदाहरण के लिएμनिकसार, बरह्मा, उरिन, चिउड़ा, छौंका इत्यादि शब्दों को देखा जा सकता है। इन शब्दों का उच्चारण अन्य क्षेत्राीय बोलियों में अलग ढंग से होता है, जैसेμचिउड़ा को चिड़वा, चूडभी कहा जाता है। निकसार, उरिन और बरह्मा शब्द क्रमशः निकास, उ)ण और ब्रह्मा शब्द का क्षेत्राीय रूप हंै। इस प्रकार के दस शब्दों को बोलचाल में उपयोग होनेवाली भाषा / बोली से एकत्रा कीजिए और कक्षा में लिखकर दिखाइए। ़त्रा, पोहा और इसी तरह छौंका को छौंक, तड़का

>vasant-2_Chp2>

दादी माँ 2

कमज़ोरी ही है अपनी, पर सच तो यह है कि ज़रा-सी कठिनाई पड़ते; बीसों गरमी, बरसात और वसंत देखने के बाद भी, मेरा मन सदा नहीं तो प्रायः अनमना-सा हो जाता है। मेरे शुभचितक मित्र मुँह पर मुझे प्रसन्न करने के लिए आनेवाली छुिट्टयों की सूचना देते हैं और पीठ पीछे मुझे कमज़ोर और ज़रा-सी प्रतिकूलता से घबरानेवाला कहकर मेरा मज़ाक उड़ाते हैं। मैं सोचता हूँ, ‘अच्छा, अब कभी उन बातों को न सोचूँगा। ठीक है, जाने दो, सोचने से होता ही क्या है’। पर, बरबस मेरी आँखों के सामने शरद की शीत किरणों के समान स्वच्छ, शीतल किसी की धुँधली छाया नाच उठती है।


मुझे लगता है जैसे क्वार के दिन आ गए हैं। मेरे गाँव के चारों ओर पानी ही पानी हिलोरें ले रहा है। दूर के सिवान से बहकर आए हुए मोथा और साईं की अधगली घासें, घेऊर और बनप्याज की जड़ें तथा नाना प्रकार की बरसाती घासों के बीज, सूरज की गरमी में खौलते हुए पानी में सड़कर एक विचित्र गंध छोड़ रहे हैं। रास्तों में कीचड़ सूख गया है और गाँव के लड़के किनारों पर झागभरे जलाशयों में धमाके से कूद रहे हैं। अपने-अपने मौसम की अपनी-अपनी बातें होती हैं। आषाढ़ में आम और जामुन न मिलें, चिंता नहीं, अगहन में चिउड़ा और गुड़ न मिले, दुख नहीं, चैत के दिनों में लाई के साथ गुड़ की पट्टी न मिले, अफ़सोस नहीं, पर क्वार के दिनों में इस गंधपूर्ण झागभरे जल में कूदना न हो तो बड़ा बुरा मालूम होता है। मैं भीतर हुड़क रहा था। दो-एक दिन ही तो कूद सका था, नहा-धोकर बीमार हो गया। हलकी बीमारी न जाने क्यों मुझे अच्छी लगती है। थोड़ा-थोड़ा ज्वर हो, सर में साधारण दर्द और खाने के लिए दिनभर नींबू और साबू। लेकिन इस बार ऐसी चीज़ नहीं थी। ज्वर जो चढ़ा तो चढ़ता ही गया। रज़ाई पर रज़ाई-और उतरा रात बारह बजे के बाद।

दिन में मैं चादर लपेटे सोया था। दादी माँ आईं, शायद नहाकर आई थीं, उसी झागवाले जल में। पतले-दुबले स्नेह-सने शरीर पर सफ़ेद किनारीहीन धोती, सन-से सफ़ेद बालों के सिरों पर सद्यः टपके हुए जल की शीतलता। आते ही उन्होंने सर, पेट छुए। आँचल की गाँठ खोल किसी अदृश्य शक्तिधारी के चबूतरे की मिट्टी मुँह में डाली, माथे पर लगाई। दिन-रात चारपाई के पास बैठी रहतीं, कभी पंखा झलतीं, कभी जलते हुए हाथ-पैर कपड़े से सहलातीं, सर पर दालचीनी का लेप करतीं और बीसों बार छू-छूकर ज्वर का अनुमान करतीं। हाँडी में पानी आया कि नहीं? उसे पीपल की छाल से छौंका कि नहीं? खिचड़ी में मूँग की दाल एकदम मिल तो गई है? कोई बीमार के घर में सीधे बाहर से आकर तो नहीं चला गया, आदि लाखों प्रश्न पूछ-पूछकर घरवालों को परेशान कर देतीं।

दादी माँ को गँवई-गाँव की पचासों किस्म की दवाओं के नाम याद थे। गाँव में कोई बीमार होता, उसके पास पहुँचतीं और वहाँ भी वही काम। हाथ छूना, माथा छूना, पेट छूना। फिर भूत से लेकर मलेरिया, सरसाम, निमोनिया तक का अनुमान विश्वास के साथ सुनातीं। महामारी और विशूचिका के दिनों में रोज़ सवेरे उठकर स्नान के बाद लवंग और गुड़-मिश्रित जलधार, गुग्गल और धूप। सफ़ाई कोई उनसे सीख ले। दवा में देर होती, मिश्री या शहद खत्म हो जाता, चादर या गिलाफ़ नहीं बदले जाते, तो वे जैसे पागल हो जातीं। बुखार तो मुझे अब भी आता है। नौकर पानी दे जाता है, मेस-महाराज अपने मन से पकाकर खिचड़ी या साबू। डॉक्टर साहब आकर नाड़ी देख जाते हैं और कुनैन मिक्सचर की शीशी की तिताई के डर से बुखार भाग भी जाता है, पर न जाने क्यों ऐसे बुखार को बुलाने का जी नहीं होता!


किशन भैया की शादी ठीक हुई, दादी माँ के उत्साह और आनंद का क्या कहना! दिनभर गायब रहतीं। सारा घर जैसे उन्होंने सर पर उठा लिया हो। पड़ोसिनें आतीं। बहुत बुलाने पर दादी माँ आतीं, "बहिन बुरा न मानना। कार-परोजन का घर ठहरा। एक काम अपनेे हाथ से न करूँ, तो होनेवाला नहीं।" जानने को यों सभी जानते थे कि दादी माँ कुछ करतीं नहीं। पर किसी काम में उनकी अनुपस्थिति वस्तुतः विलंब का कारण बन जाती। उन्हीं दिनों की बात है। एक दिन दोपहर को मैं घर लौटा। बाहरी निकसार में दादी माँ किसी पर बिगड़ रही थीं। देखा, पास के कोने में दुबकी रामी की चाची खड़ी है। "सो न होगा, धन्नो! रुपये मय सूद के आज दे दे। तेरी आँख में तो शरम है नहीं। माँगने के समय कैसी आई थी! पैरों पर नाक रगड़ती फिरी, किसी ने एक पाई भी न दी। अब लगी है आजकल करने-फसल में दूँगी, फसल में दूँगी...अब क्या तेरी खातिर दूसरी फसल कटेगी?"

"दूँगी, मालकिन!" रामी की चाची रोती हुई, दोनों हाथोें से आँचल पकड़े दादी माँ के पैरों की ओर झुकी, "बिटिया की शादी है। आप न दया करेंगी तो उस बेचारी का निस्तार कैसे होगा!"

"हट, हट! अभी नहाके आ रही हूँ!" दादी माँ पीछे हट गईं।

"जाने दो दादी," मैंने इस अप्रिय प्रसंग को हटाने की गरज से कहा, "बेचारी गरीब है, दे देगी कभी।"

"चल, चल! चला है समझाने..."

मैं चुपके से आँगन की ओर चला गया। कई दिन बीत गए, मैं इस प्रसंग को एकदम भूल-सा गया। एक दिन रास्ते में रामी की चाची मिली। वह दादी को ‘पूतों फलो दूधों नहाओ’ का आशीर्वाद दे रही थी! मैंने पूछा, "क्या बात है, धन्नो चाची", तो उसने विह्वल होकर कहा, "उरिन हो गई बेटा, भगवान भला करे हमारी मालकिन का। कल ही आई थीं। पीछे का सभी रुपया छोड़ दिया, ऊपर से दस रुपये का नोट देकर बोलीं, ‘देखना धन्नो, जैसी तेरी बेटी वैसी मेरी, दस-पाँच के लिए हँसाई न हो।’ देवता है बेटा, देवता।"

"उस रोज़ तो बहुत डाँट रही थीं?" मैंने पूछा।

"वह तो बड़े लोगों का काम है बाबू, रुपया देकर डाँटें भी न तो लाभ क्या!"

मैं मन-ही-मन इस तर्क पर हँसता हुआ आगे बढ़ गया।

किशन के विवाह के दिनों की बात है। विवाह के चार-पाँच रोज़ पहले से ही औरतें रात-रातभर गीत गाती हैं। विवाह की रात को अभिनय भी होता है। यह प्रायः एक ही कथा का हुआ करता है, उसमें विवाह से लेकर पुत्रोत्पत्ति तक के सभी दृश्य दिखाए जाते हैं–सभी पार्ट औरतें ही करती हैं। मैं बीमार होने के कारण बारात में न जा सका। मेरा ममेरा भाई राघव दालान में सो रहा था (वह भी बारात जाने के बाद पहुँचा था)। औरतों ने उस पर आपत्ति की।

दादी माँ बिगड़ीं, "लड़के से क्या परदा? लड़के और बरह्मा का मन एक-सा होता है।"

मुझे भी पास ही एक चारपाई पर चादर उढ़ाकर दादी माँ ने चुपके से सुला दिया था। बड़ी हँसी आ रही थी। सोचा, कहीं ज़ोर से हँस दूँ, भेद खुल जाए तो निकाल बाहर किया जाऊँगा, पर भाभी की बात पर हँसी रुक न सकी और भंडाफोड़ हो गया।

देबू की माँ ने चादर खींच ली, "कहो दादी, यह कौन बच्चा सोया है। बेचारा रोता है शायद, दूध तो पिला दूँ।" हाथापाई शुरू हुई। दादी माँ बिगड़ीं, "लड़के से क्यों लगती है!"

सुबह रास्ते में देबू की माँ मिलीं, "कल वाला बच्चा, भाभी!" मैं वहाँ से ज़ोर से भागा और दादी माँ के पास जा खड़ा हुआ। वस्तुतः किसी प्रकार का अपराध हो जाने पर जब हम दादी माँ की छाया में खड़े हो जाते, अभयदान मिल जाता।

स्नेह और ममता की मूर्ति दादी माँ की एक-एक बात आज कैसी-कैसी मालूम होती है। परिस्थितियों का वात्याचक्र जीवन को सूखे पत्ते-सा कैसा नचाता है, इसे दादी माँ खूब जानती थीं। दादा की मृत्यु के बाद से ही वे बहुत उदास रहतीं। संसार उन्हें धोखे की टट्टी मालूम होता। दादा ने उन्हें स्वयं जो धोखा दिया। वे सदा उन्हें आगे भेजकर अपने पीछे जाने की झूठी बात कहा करते थे। दादा की मृत्यु के बाद कुकुरमुत्ते की तरह बढ़नेवाले, मुँह में राम बगल में छुरीवाले दोस्तों की शुभचिता ने स्थिति और भी डाँवाडोल कर दी। दादा के श्राद्ध में दादी माँ के मना करने पर भी पिता जी ने जो अतुल संपत्ति व्यय की, वह घर की तो थी नहीं।

दादी माँ अकसर उदास रहा करतीं। माघ के दिन थे। कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा था। पछुवा का सन्नाटा और पाले की शीत हड्डियों में घुसी पड़ती। शाम को मैंने देखा, दादी माँ गीली धोती पहने, कोनेवाले घर में एक संदूक पर दिया जलाए, हाथ जोड़कर बैठी हैं। उनकी स्नेह-कातर आँखों में मैंने आँसू कभी नहीं देखे थे। मैं बहुत देर तक मन मारे उनके पास बैठा रहा। उन्होंने आँखें खोलीं। "दादी माँ!", मैंने धीरे से कहा।

"क्या है रे, तू यहाँ क्यों बैठा है?"

"दादी माँ, एक बात पूछूँ, बताओगी न?" मैंने उनकी स्नेहपूर्ण आँखों की
ओर देखा।


"क्या है, पूछ।"

"तुम रोती थीं?"

दादी माँ मुसकराईं, "पागल, तूने अभी खाना भी नहीं खाया न, चल-चल!"

"धोती तो बदल लो, दादी माँ", मैंने कहा।

"मुझे सरदी-गरमी नहीं लगती बेटा।" वे मुझे खींचती रसोई में ले गईं।

सुबह मैंने देखा, चारपाई पर बैठे पिता जी और किशन भैया मन मारे कुछ सोच रहे हैं। "दूसरा चारा ही क्या है?" बाबू बोले, "रुपया कोई देता नहीं। कितने के तो अभी पिछले भी बाकी हैं!" वे रोने-रोने-से हो गए।

"रोता क्यों है रे!" दादी माँ ने उनका माथा सहलाते हुए कहा, "मैं तो अभी हूँ ही।" उन्होंने संदूक खोलकर एक चमकती-सी चीज़ निकाली, "तेरे दादा ने यह कंगन मुझे इसी दिन के लिए पहनाया था।" उनका गला भर आया, "मैंने इसे पहना नहीं, इसे सहेजकर रखती आई हूँ। यह उनके वंश की निशानी है।" उन्होंने आँसू पोंछकर कहा, "पुराने लोग आगा-पीछा सब सोच लेते थे, बेटा।"

सचमुच मुझे दादी माँ शापभ्रष्ट देवी-सी लगीं।


धुँधली छाया विलीन हो गई। मैंने देखा, दिन काफ़ी चढ़ आया है। पास के लंबे खजूर के पेड़ से उड़कर एक कौआ अपनी घिनौनी काली पाँखें फैलाकर मेरी खिड़की पर बैठ गया। हाथ में अब भी किशन भैया का पत्र काँप रहा है। काली चींटियाें-सी कतारें धूमिल हो रही हैं। आँखों पर विश्वास नहीं होता। मन बार-बार अपने से ही पूछ बैठता है-‘क्या सचमुच दादी माँ नहीं रहीं?’

शिवप्रसाद सिंह 

प्रश्न-अभ्यास

कहानी से

  1. लेखक को अपनी दादी माँ की याद के साथ-साथ बचपन की और किन-किन बातों की याद आ जाती है?
  2. दादा की मृत्यु के बाद लेखक के घर की आर्थिक स्थिति खराब क्यों हो गई थी?
  3. दादी माँ के स्वभाव का कौन सा पक्ष आपको सबसे अच्छा लगता है और क्यों?

    कहानी से आगे

  1. आपने इस कहानी में महीनों के नाम पढ़े, जैसे-क्वार, आषाढ़, माघ। इन महीनों में मौसम कैसा रहता है, लिखिए।
  2. ‘अपने-अपने मौसम की अपनी-अपनी बातें होती हैं’-लेखक के इस कथन के अनुसार यह बताइए कि किस मौसम में कौन-कौन सी चीज़ें विशेष रूप से मिलती हैं?

    अनुमान और कल्पना

  1. इस कहानी में कई बार ऋण लेने की बात आपने पढ़ी। अनुमान लगाइए, किन-किन पारिवारिक परिस्थितियों में गाँव के लोगों को ऋण लेना पड़ता होगा और यह उन्हें कहाँ से मिलता होगा? बड़ों से बातचीत कर इस विषय में लिखिए।
  2. घर पर होनेवाले उत्सवों / समारोहों में बच्चे क्या-क्या करते हैं? अपने और अपने मित्रों के अनुभवों के आधार पर लिखिए।

    भाषा की बात

  1. नीचे दी गई पंक्तियों पर ध्यान दीजिए-

    ज़रा-सी कठिनाई पड़ते

    अनमना-सा हो जाता है

    सन-से सफ़ेद

    समानता का बोध कराने के लिए सा, सी, से का प्रयोग किया जाता है। ऐसे पाँच और शब्द लिखिए और उनका वाक्य में प्रयोग कीजिए।

  2. कहानी में ‘छू-छूकर ज्वर का अनुमान करतीं, पूछ-पूछकर घरवालों को परेशान कर देतीं’-जैसे वाक्य आए हैं। किसी क्रिया को ज़ोर देकर कहने के लिए एक से अधिक बार एक ही शब्द का प्रयोग होता है। जैसे वहाँ जा-जाकर थक गया, उन्हें ढूँढ़-ढँूढ़कर देख लिया। इस प्रकार के पाँच वाक्य बनाइए।
  3. बोलचाल में प्रयोग होनेवाले शब्द और वाक्यांश ‘दादी माँ’ कहानी में हैं। इन शब्दों और वाक्यांशों से पता चलता है कि यह कहानी किसी विशेष क्षेत्र से संबंधित है। ऐसे शब्दों और वाक्यांशों में क्षेत्रीय बोलचाल की खूबियाँ होती हैं। उदाहरण के लिए-निकसार, बरह्मा, उरिन, चिउड़ा, छौंका इत्यादि शब्दों को देखा जा सकता है। इन शब्दों का उच्चारण अन्य क्षेत्रीय बोलियों में अलग ढंग से होता है, जैसे-चिउड़ा को चिड़वा, चूड़त्र, पोहा और इसी तरह छौंका को छौंक, तड़का भी कहा जाता है। निकसार, उरिन और बरह्मा शब्द क्रमशः निकास, उऋण और ब्रह्मा शब्द का क्षेत्रीय रूप हैं। इस प्रकार के दस शब्दों को बोलचाल में उपयोग होनेवाली भाषा / बोली से एकत्र कीजिए और कक्षा में लिखकर दिखाइए।


RELOAD if chapter isn't visible.