आपने लोगों को पूजा - पाठ करते अथवा भजन, कीतर्न या कव्वाली गाते या चुपचाप इर्श्वर के नाम का जाप करते हुए देखा होगा। आपने यह भी गौर किया होगा कि उनमें से वुफछ तो इतने भाव - विभोर हो जाते हैं कि उनकी आँखों में आँसू भर आते हैं। इर्श्वर के प्रति ऐसा प्रेम - भाव या गहरी भक्ित उन विभ्िान्न प्रकार के भक्ित तथा सूप़्ाफी आंदोलनों की देन है, जिनका आठवीं शताब्दी से उद्भव होने लगा। परमेश्वर का विचार बड़े - बड़े राज्यों के उदय होने से पहले, भ्िान्न - भ्िान्न समूहों के लोग अपने - अपने देवी - देवताओं की पूजा किया करते थे। जब लोग, नगरों के विकास और व्यापार तथा साम्राज्यों के माध्यम से एक साथ आते गए, तब नए - नए विचार विकसित होने लगे। यह बात व्यापक रूप से स्वीकार की जाने लगी कि सभी जीवधरी अच्छे तथा बुरे कमर् करते हुए जीवन - मरण और पुनजीर्वन के अनंत चक्रों से गुशरते हैं। इसी प्रकार यह विचार भी गहरे बैठ गया था कि सभी व्यक्ित जन्म के समय भी एक बराबर नहीं होते हैं। यह मान्यता कि सामाजिक विशेषाध्िकार किसी उच्च परिवार अथवा उँफची जाति में पैदा होने के कारण मिलते हैं, कइर् पांडित्यपूणर् ग्रंथों का विषय था। अनेक लोग ऐसे विचारों के कारण बेचैन थे। इसलिए वे बु( तथा जैनों के उपदेशों की ओर उन्मुख हुए, जिनके अनुसार व्यक्ितगत प्रयासों से सामाजिक अंतरों को दूर किया जा सकता है और पुनजर्न्म के चक्र से छुटकारा पाया जा सकता है। वुफछ अन्य लोग परमेश्वर संबंध्ी इस विचार से आकष्िार्त हुए कि यदि मनुष्य भक्ितभाव से परमेश्वर की शरण में जाए, तो परमेश्वर, व्यक्ित को इस बंध्न से मुक्त कर सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता में व्यक्त यह विचार, सामान्य सन् ;इर्सवी सन्द्ध की प्रारंभ्िाक शताब्िदयों में लोकपि्रय हो गया था। विशद् धमिर्क अनुष्ठानों के माध्यम से श्िाव, विष्णु तथा दुगार् को परम देवी - देवताओं के रूप में पूजा जाने लगा। साथ - साथ, भ्िान्न - भ्िान्न क्षेत्रों में पूजे जाने वाले देवों एवं देवियों को श्िाव, विष्णु या दुगार् का रूप माना जाने लगा। इसी प्रिया में स्थानीय मिथक तथा किस्से - कहानियाँ पौराण्िाक कथाओं के अंग बन गए। पुराणों में पूजा की जिन प(तियों की अनुशंसा की गइर् थी, उन्हें स्थानीय पंथों में भी अपनाया जाने लगा। आगे चलकर पुराणों में भी इस बात का उल्लेख किया गया है कि भक्त भले हीकिसी भी जाति - पाँति का हो, वह सच्ची भक्ित से इर्श्वर की कृपा प्राप्त कर सकता है। भक्ित की विचारधरा इतनी अध्िक लोकपि्रय हो गइर् कि बौ(ों और जैन मतावलंबियों ने भी इन विश्वासों को अपना लिया। दक्ष्िाण भारत में भक्ित का एक नया प्रकार μ नयनार और अलवार सातवीं से नौवीं शताब्िदयों के बीच वुफछ नए धमिर्क आंदोलनों का प्रादुभार्व हुआ। इन आंदोलनों का नेतृत्व नयनारों ;शैव संतोंद्ध और अलवारों ;वैष्णव संतोंद्ध ने किया। ये संत सभी जातियों वेफ थे, जिनमें पुलैया और पनार जैसी ‘अस्पृश्य’ समझी जाने वाली जातियों के लोग भी शामिल थे। वे बौ(ों और जैनों के कटु आलोचक थे और श्िाव तथा विष्णु के प्रति सच्चे प्रेम को मुक्ित का मागर् बताते थे। उन्होंने संगम साहित्य ;तमिल साहित्य का प्राचीनतम उदाहरण और सामान्य सन् यानी इर्सवी सन् की प्रारंभ्िाक शताब्िदयों में रचितद्ध में समाहित प्यार और शूरवीरता के आदशो± को अपना कर भक्ित के मूल्यों में उनका समावेश किया था। नयनार और अलवार घुमक्कड़ साध्ु - संत थे। वे जिस किसी स्थान या गाँव में जाते थे, वहाँ के स्थानीय देवी - देवताओं की प्रशंसा में सुंदर कविताएँ रचकर उन्हें संगीतब( कर दिया करते थे। 105 आज भी आप स्थानीय मिथक तथा किस्से - कहानियों की इस प्रिया को व्यापक स्वीवृफति पाते हुए देख सकते हैं। क्या आप अपने आस - पास वुफछ ऐसे उदाहरण ढूँढ सकते हैं? ध£मक जीवनी/संत जीवनी लेखन संतों की जीवनियाँ लिखना चित्रा 2 माण्िाक्कवसागार की एक काँस्य प्रतिमा वुफल मिलाकर 63 नयनार ऐसे थे, जो वुफम्हार, ‘अस्पृश्य’ कामगार, किसान, श्िाकारी, सैनिक, ब्राह्मण और मुख्िाया जैसी अनेवफ जातियों में पैदा हुए थे। उनमें सवार्ध्िक प्रसि( थेμअप्पार, संब्ंादर, संुदरार और माण्िाक्कवसागार। उनके गीतों के दो संकलन हैंμतेवरम् और तिरुवाचकम्। अलवार संत संख्या में 12 थे। वे भी भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार की पृष्ठभूमि से आए थे। उनमें से सवार्ध्िक प्रसि( थेμपेरियअलवार, उनकी पुत्राी अंडाल, तोंडरडिप्पोडी अलवार और नम्मालवार। उनके गीत दिव्य प्रबंधम् में संकलित हैं। दसवीं से बारहवीं सदियों के बीच, चोल और पांड्यन राजाओं ने उन अनेक धमिर्क स्थलों पर विशाल मंदिर बनवा दिए, जहाँ की संत - कवियों ने यात्रा की थी। इस प्रकार भक्ित परंपरा और मंदिर पूजा के बीच गहरे संब्ंाध् स्थापित हो गए। यही वह समय था, जब उनकी कविताओं का संकलन तैयार किया गया था। इसके अलावा अलवारों तथा नयनार संतों की धमिर्क जीवनियाँ भी रची गईं। आज हम भक्ित परंपरा के इतिहासलेखन में इन जीवनियों का ड्डोत के रूप में उपयोग करते हैं। दशर्न और भक्ित भारत के सवार्ध्िक प्रभावशाली दाशर्निकांे में से एक शंकर का जन्म आठवीं शताब्दी में केरल प्रदेश में हुआ था। वे अद्वैतवाद के समथर्क थे, जिसके अनुसार जीवात्मा और परमात्मा ;जो परम सत्य हैद्ध, दोनों एक ही हैं। उन्होंने यह श्िाक्षा दी कि ब्रह्मा, जो एकमात्रा या परम सत्य है, वह निगुर्ण और निराकार है। शंकर ने हमारे चारों ओर के संसार को मिथ्या या माया माना और संसार का परित्याग करने अथार्त् संन्यास लेने औरब्रह्मा की सही प्रकृति को समझने और मोक्ष प्राप्त करने के लिए ज्ञान के मागर् को अपनाने का उपदेश दिया। रामानुज ग्यारहवीं शताब्दी में तमिलनाडु में पैदा हुए थे। वे विष्णुभक्त अलवार संतों से बहुत प्रभावित थे। उनके अनुसार मोक्ष प्राप्त करने का उपाय विष्णु के प्रति अनन्य भक्ित भाव रखना है। भगवान विष्णु कीकृपा दृष्िट से भक्त उनके साथ एकाकार होने का परमानंद प्राप्त कर सकता है। रामानुज ने विश्िाष्टताद्वैत के सि(ांत को प्रतिपादित किया, जिसके अनुसार आत्मा, परमात्मा से जुड़ने के बाद भी अपनी अलगसत्ता बनाए रखती है। रामानुज के सि(ांत ने भक्ित की नयी धारा कोबहुत प्रेरित किया, जो परवतीर् काल में उत्तरी भारत में विकसित हुइ।र्बसवन्ना का वीरशैववाद हमने पहले पढ़ा कि तमिल भक्ित आंदोलन और मंदिर पूजा के बीच क्या संबंध् थे। इसके परिणामस्वरूप जो प्रतििया हुइर्, वह बसवन्ना और अल्लमा प्रभु और अक्कमहादेवी जैसे उसके साथ्िायों द्वारा प्रारंभ किए गए वीरशैव आंदोलन में स्पष्टतः दिखलाइर् देती है। यह आंदोलन बारहवीं शताब्दी के मध्य में कनार्टक में प्रारंभ हुआ था। वीरशैवों ने सभी व्यक्ितयों की समानता के पक्ष में और जाति तथा नारी के प्रति व्यवहार के बारे में ब्राह्मणवादी विचारधारा के विरु( अपने प्रबल तवर्फ प्रस्तुत किए। इसके अलावा वे सभी प्रकार के कमर्कांडों और मूतिर्पूजा के विरोधी थे। शंकर या रामानुज के विचारों के बारे में वुफछ और पता लगाने का प्रयत्न करें। महाराष्ट्र के संत तेरहवीं से सत्राहवीं शताब्दी तक महाराष्ट्र में अनेकानेक संत कवि हुए, जिनके सरल मराठी भाषा में लिखे गए गीत आज भी जन - मन को प्रेरित करते हैं।उन संतों में सबसे महत्त्वपूणर् थेμज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम तथा सखूबाइर् जैसी स्ित्रायाँ तथा चोखामेळा का परिवार, जो ‘अस्पृश्य’ समझी जाने वाली महार जाति का था। भक्ित की यह क्षेत्राीय परंपरा पंढरपुर में विट्ठòल ;विष्णु का एक रूपद्ध पर और जन - मन के हृदय में विराजमान व्यक्ितगत देव ;इर्श्वरद्ध संबंध्ी विचारों पर वेंफित थी। इन संत - कवियों ने सभी प्रकार के कमर्कांडों, पवित्राता के ढोंगों और जन्म पर आधरित सामाजिक अंतरों का विरोध किया। यहाँ तक कि उन्होंने संन्यास के विचार को भी ठुकरा दिया और किसी भी अन्य व्यक्ित की तरह रोशी - रोटी कमाते हुए परिवार के साथ रहने और विनम्रतापूवर्क शरूरतमंद साथी व्यक्ितयों की सेवा करते हुए जीवन बिताने को अध्िक पसंद किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि असली भक्ित दूसरों के दुःखों को बाँट लेना है। इससे एक नए मानवतावादी विचार का उद्भव हुआ। जैसा कि सुप्रसि( गुजराती संत नरसी मेहता ने कहा थाμफ्वैष्णव जन तो तेने कहिए पीर पराइर् जाने रे।य् नाथपंथी, सि( और योगी चित्रा 3 आग के आस - पास तपस्िवयों का समूह इस काल में अनेक ऐसे धमिर्क समूह उभरे, जिन्होंने साधरण तवर्फ - वितवर्फ का सहारा लेकर रूढि़वादी धमर् के कमर्कांडों और अन्य बनावटी पहलुओं तथा समाज - व्यवस्था की आलोचना की। उनमें नाथपंथी, सि(ाचार और योगी जन उल्लेखनीय हैं। उन्होंने संसार का परित्याग करने का समथर्न किया। उनके विचार से निराकार परम सत्य का चिंतन - मनन और उसके साथ एक हो जाने की अनुभूति ही मोक्ष का मागर् है। इसके लिए उन्होंने योगासन, प्राणायाम और चिंतन - मनन जैसी ियाओं वेेफ माध्यम से मन एवं शरीर को कठोर प्रश्िाक्षण देने की आवश्यकता पर बल दिया। ये समूह खासतौर पर ‘नीची’ कही जाने वाली जातियों में बहुत लोकपि्रय हुए। उनके द्वारा की गइर् रूढि़वादी ध्मर् की आलोचना ने भक्ितमागीर्य ध्मर् के लिए आधर तैयार किया, जो आगे चलकरउत्तरी भारत में लोकपि्रय शक्ित बना। इस्लाम और सूप़फी मत संतों और सूप्िाफयों में बहुत अध्िक समानता थी, यहाँ तक कि यह भी माना़जाता है कि उन्होंने आपस में कइर् विचारों का आदान - प्रदान किया और उन्हें अपनाया। सूप़्ाफी मुसलमान रहस्यवादी थे। वे ध्मर् के बाहरी आडंबरों को अस्वीकार करते हुए इर्श्वर के प्रति प्रेम और भक्ित तथा सभी मनुष्यों के प्रति दयाभाव रखने पर बल देते थे। इस्लाम ने एकेश्वरवाद यानी एक अल्लाह के प्रति पूणर् समपर्ण का दृढ़ता से प्रचार किया। उसने मूतिर्पूजा को अस्वीकार कर दिया और उपासना प(तियों को सामूहिक प्राथर्ना - नमाश - का रूप देकर, उन्हें काप़्ाफी सरल बना दिया। साथ ही मुसलिम विद्वानों ;उलेमाद्ध ने ‘शरियत’ नाम से एक धामिर्क कानून बनाया। सूप़्ाफी लोगों ने मुसलिम धमिर्क विद्वानों द्वारा निधार्रित विशद् कमर्कांड और आचार - संहिता को बहुत वुफछ अस्वीकार कर दिया। वे इर्श्वर के साथ ठीक उसी प्रकार जुड़े रहना चाहते थे, जिस प्रकार एक प्रेमी, दुनिया की परवाह किए बिना अपनी पि्रयतमा के साथ जुड़े रहना चाहता है। संत - कवियों की तरह सूपफी लोग भी अपनी भावनाओं को़व्यक्त करने के लिए काव्य रचना किया करते थे। गद्य में एक विस्तृत साहित्य तथा कइर् किस्से - कहानियाँ इन सूपफी संतों के इदर् - गिदर् विकसित हुईं।़मध्य एश्िाया के महान सूपफी संतों में गश्शाली, रूमी और सादी के नाम़उल्लेखनीय हैं। नाथपंथ्िायों, सि(ों और योगियों की तरह, सूप़्ाफी भी यही मानते थे कि दुनिया के प्रति अलग नशरिया अपनाने के लिए दिल को सिखाया - पढ़ाया जा सकता है। उन्होंने किसी औलिया या पीर की देख - रेख में िाक्र ;नाम का जापद्ध, चिंतन, समा ;गानाद्ध, रक्स ;नृत्यद्ध, नीति - चचार्, साँस पर नियंत्राण आदि के शरिए प्रश्िाक्षण की विस्तृत रीतियांे का विकास किया। इस प्रकार सूपफी उस्तादों की पीढि़यों, सिलसिलाओं का प्रादुभार्व हुआ।़इनमें से हरेक सिलसिला निदेर्शों व धामिर्क ियाओं का थोड़ा - बहुत अलग तरीका अपनाती थी। चित्रा 5 वुफरान की पांडुलिपि से लिया गया एक पृष्ठ,दक्कन, परवत्तीर् पंद्रहवीं शताब्दी ख़ानव़्ाफाह सूपफी संस्था जहाँ सूप़्ाफी़संत अकसर रहते भी हैं। ग्यारहवीं शताब्दी से अनेक सूपफी जन ़मध्य एश्िाया से आकर हिंदुस्तान में बसने लगे थे। दिल्ली सल्तनत ;अध्याय 3द्ध की स्थापना के साथ यह प्रिया उस समय और भी मशबूत हो गइर्, जब उपमहाद्वीप में सवर्त्रा बड़े - बड़े अनेक सूपफी वेंफद्र विकसित हो गए। ़चिश्ती सिलसिला इन सभी सिलसिलों में सबसे अध्िक प्रभावशाली था। इसमें औलियाओं की एक लंबी परंपरा थी, जैसेμअजमेर के ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती, दिल्ली वे़फ वुफत्बउद्दीन बख्ितयार काकी, पंजाब के बाबा प़्ाफरीद, दिल्ली के ख़्वाजा निशामुद्दीन औलिया और गुलबगर् के बंदानवाश गिसुदराश।सूप़़्ाफी संत अपने ख़ानवफाहों में विशेष बैठकों का आयोजन करते थे जहाँ सभी प्रकार के भक्तगण, जिनमें शाही घरानों के लोग तथा अभ्िाजात और आम लोग भी शामिल होते थे। इन ख़ानव़्ाफाहों में आते थे। वे आध्यात्िमक विषयों पर चचार् करते थे। अपनी दुनियादारी की समस्याओं को सुलझाने के लिए संतों से आशीवार्द माँगते थे अथवा संगीत तथा नृत्य के जलसों में ही शामिल होकर चले जाते थे। अकसर लोग यह समझते थे कि सूूपफी़औलियाओं के पास चमत्कारिक शक्ितयाँ होती हैं, जिनसे आम लोगों को बीमारियों और तकलीपफों़से छुटकारा मिल सकता है। सूप़्ाफी संत की दरगाह एक तीथर्स्थल बन जाता था, जहाँ सभी इर्मान - ध्मर् के लोग हशारों की संख्या में इकऋे होते थे। चित्रा 6 सभी पृष्ठभूमियों के भक्त, सूप़्ाफी दरगाहों पर जाते हैं। उत्तर भारत में ध£मक बदलाव तेरहवीं सदी के बाद उत्तरी भारत में भक्ित आंदोलन की एक नयी लहर आइर्। यह एक ऐसा युग था, जब इस्लाम, ब्राह्ममणवादी हिंदू ध्मर्, सूप़्ाफीमत, भक्ित की विभ्िान्न धाराओं ने और नाथपंथ्िायों, सि(ों तथा योगियों ने परस्पर एक - दूसरे को प्रभावित किया। हमने देखा कि नए नगरों ;अध्याय 6द्ध और राज्यों ;अध्याय 2, 3 और 4द्ध का उद्भव हो रहा था और लोग अपने लिए नए - नए व्यवसाय और नयी - नयी भूमिकाएँ खोज रहे थे। ऐसे लोग विशेष रूप से श्िाल्पी, वृफषक, व्यापारी और मशदूर, इन नए संतों के विचारों को सुनने के लिए इकऋे हो जाते थे। पिफर वे उनका प्रचार करते थे। उनमें से कबीर और बाबा गुरु नानक जैसे वुफछ संतों ने सभी आडंबरपूणर् रूढि़वादी धमो± को अस्वीकार कर दिया। तुलसीदास और सूरदास जैसे वुफछ अन्य संतों ने उस समय विद्यमान विश्वासों तथा प(तियों को स्वीकार करते हुए उन्हें सब की पहुँच में लाने का प्रयत्न किया। तुलसीदास ने इर्श्वर को राम के रूप में धरणकिया। अवध्ी ;पूवीर् उत्तर प्रदेश की बोलीद्ध में लिखी गइर् तुलसीदास की रचना रामचरितमानस उनके भक्ित - भाव की अभ्िाव्यक्ित और साहित्ियकवृफति, दोनों ही दृष्िटयों से महत्त्वपूणर् है। सूरदास श्री वृफष्ण के अनन्य भक्त थे। उनकी रचनाएँ सूरसागर, चित्रा 7 चैतन्यदेव, सोलहवीं शताब्दी के बंगाल के एक भक्ित संत। इन्होंने वृफष्ण - राध के प्रति निष्काम भक्ित - भाव का उपदेश दिया। इस चित्रा में आप उनके अनुयायियों के एक समूह को आनंद में नाचते - गाते हुए देख सकते हैं। मानचित्रा 1 मुख्य भक्ित संत तथा उनसे जुडे़ क्षेत्रा सूरसारावली और साहित्य लहरी में संग्रहित हैं एवं उनके भक्ित भाव कोअभ्िाव्यक्त करती हैं। असम के शंकरदेव ;परवत्तीर् 15वीं शताब्दीद्ध जो इन्हीं के समकालीन थे, ने विष्णु की भक्ित पर बल दिया और असमिया भाषा में कविताएँ तथा नाटक लिखे। उन्होंने ही ‘नामघर’ ;कविता पाठ और प्राथर्ना गृहद्ध स्थापित करने की प(ति चलाइर्, जो आज तक चल रही है। इस पंरपरा में दादू दयाल, रविदास और मीराबाइर् जैसे संत भी शामिल थे। मीराबाइर् एक राजपूत राजवुफमारी थीं, जिनका विवाह सोलहवीं शताब्दी में मेवाड़ के एक राजसी घराने में हुआ था। मीराबाइर्, रविदास, जो ‘अस्पृश्य’ जाति के माने जाते थे, की अनुयायी बन गईं। वे वृफष्ण के प्रति सम£पत थीं और उन्होंने अपने गहरे भक्ित - भाव को कइर् भजनों में अभ्िाव्यक्त किया है। उनके गीतों ने ‘उच्च’ जातियों के रीतियों - नियमों को खुली चुनौती दी तथा ये गीत राजस्थान व गुजरात के जनसाधरण में बहुत लोकपि्रय हुए। इन संतों में से अध्िकाँश का विश्िाष्ट अभ्िालक्षण यह है कि इनकी वृफतियाँ क्षेत्राीय भाषाओं में रची गईं और इन्हें आसानी से गाया जा सकता था। इसीलिए ये बेहद लोकपि्रय हुईं और पीढ़ी - दर - पीढ़ी मौख्िाक रूप से चलती रहीं। प्रायः इन गीतों के प्रसारण में सवार्ध्िक निध्र्न, सवार्ध्िक वंचित समुदाय और महिलाओं की भूमिका रही है। प्रसारण की इस प्रिया में ये सभी लोग अकसर अपने अनुभव भी जोड़ देते थे। इस तरह आज मिलने वाले गीत, संतों की रचनाएँ तो हैं हीं, साथ - साथ उन पीढि़यों के लोगों की रचनाएँ मानी जा सकती हैं, जो उन्हें गाया करते थे। वे हमारी जीती - जागती जन संस्वृफति का अंग बन गइर् हैं। कबीर μ नशदीक से एक नशर कबीर संभवतः पंद्रहवीं - सोलहवीं सदी में हुए थे। वे एक अत्यध्िक प्रभावशाली संत थे। उनका पालन - पोषण बनारस में या उसके आस - पास के एक मुसलमान जुलाहा यानी बुनकर परिवार मंे हुआ था। उनके जीवन के बारे में हमारे पास बहुत कम विश्वसनीय जानकारी है। हमें उनके विचारों की जानकारी उनकी साख्िायों और पदों के विशाल संग्रह से मिलती है, जिनके बारे में यह कहा जाता है कि इनकी रचना तो कबीर ने की थी परंतु ये घुमंतू भजन - गायकों द्वारा गाए जाते थे। इनमें से वुफछ भजन गुरु ग्रंथ साहब, पंचवाणी और बीजक में संग्रहित एवं सुरक्ष्िात हैं। कबीर के उपदेश प्रमुख धमिर्क परंपराओं की पूणर् एवं प्रचंड अस्वीवृफति पर आधरित थे। उनके उपदेशों में ब्राह्ममणवादी हिंदू ध्मर् और इस्लाम दोनों की बाह्य आंडबरपूणर् पूजा के सभी रूपों का मशाक उड़ाया गया है। उनके काव्य की भाषा बोलचाल की हिंदी थी, जो आम आदमियों द्वारा आसानी से समझी जा सकती थी। उन्होंने कभी - कभी रहस्यमयी भाषा का भी प्रयोग किया, जिसे समझना कठिन होता है। कबीर, निराकार परमेश्वर में विश्वास रखते थे। उन्होेंने यह उपदेश दिया कि भक्ित के माध्यम से ही मोक्ष यानी मुक्ित प्राप्त हो सकती है। हिंदू तथा मुसलमान दोनों लोग उनके अनुयायी हो गए। बाबा गुरु नानक μ नशदीक से एक नशर कबीर की अपेक्षा बाबा गुरु नानक ;1469 - 1539द्ध के बारे में हम कहीं अिाक जानते हैं। तलवंडी ;पाकिस्तान में ननकाना साहबद्ध में जन्म लेने वाले बाबा गुरु नानक ने करतारपुर ;रावी नदी के तट पर डेरा बाबा नानकद्ध में एक वेंफद्र स्थापित करने से पहले कइर् यात्राएँ की। उन्हांेने अपने अनुयायियों के लिए करतारपुर में एक नियमित उपासना प(ति अपनाइर्, जिसके अंतगर्त उन्हीं के शबदों ;भजनोंद्ध को गाया जाता था। उनके अनुयायी अपने - अपने पहले ध्मर् या जाति अथवा ¯लग - भेद को नशरअंदाश करके एक सांझी रसोइर् में इकट्ठे खाते - पीते थे। इसे ‘लंगर’ कहा जाता था। बाबा गुरु नानक ने उपासना और ध£मक कायो± के लिए जो जगह नियुक्त की थी, उसे ‘धमर्साल’ कहा गया। आज इसे गुरुद्वारा कहते हैं। 1539 में अपनी मृत्यु के पूवर् बाबा गुरु नानक ने एक अनुयायी को अपनाउत्तरािाकारी चुना। इनका नाम लहणा था, लेकिन ये गुरु अंगद के नाम से जानेगए। ‘गुरु अंगद’ नाम का महत्त्व यह था कि गुरु अंगद, बाबा गुरु नानक के ही अंग माने गए। गुरु अंगद ने बाबा गुरु चित्रा 10 धमिर्क महानुभावों से चचार् करते बाबा गुरु नानक, जब वे युवक थे। चित्रा 11 गुरु ग्रंथ साहब की एक आरंभ्िाक पांडुलिपि नानक की रचनाओं का संग्रह किया और उस संग्रह में अपनी वृफतियाँ भी जोड़ दीं। संग्रह एक नइर् लिपि गुरमुखीमें लिखा गया था। गुरु अंगद के तीन उत्तरािाकारियों ने भी अपनी रचनाएँ ‘नानक’ के नाम से लिखीं। इन सभी का संग्रह गुरु अजर्न ने 1604 में किया। इस संग्रह में शेख पफरीद, संत कबीर, भगत नामदेव और गुरु तेग़्ाबहादुर जैसे सूप्िाफयों, संतों और गुरुओं की वाणी जोड़ी गइर्। 1706 में़इस वृहत् संग्रह को गुरु तेगबहादुर के पुत्रा व उत्तरािाकारी गुरु गो¯बद ¯सह ने प्रमाण्िात किया। आज इस संग्रह को सिक्खों के पवित्रा ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहब के रूप में जाना जाता है। सोलहवीं शताब्दी में बाबा गुरु नानक के उत्तरािाकारियों के नेतृत्व में उनके अनुयायियों की संख्या का विस्तार हुआ। ये अनुयायी कइर् जातियों के थे, परंतु इनमें व्यापारी, वृफषक और श्िाल्पकार श्यादा थे। इसकी वजह यह हो सकती है कि बाबा गुरु नानक इस बात पर बल दिया करते थे कि उनके अनुयायी गृहस्थ हों और उपयोगी व उत्पादक पेशों से जुड़े हों। अनुयायियों से यह आशा भी की जाती थी कि वे नए समुदाय के सामान्य कोष में योगदान देंगे। सत्राहवीं शताब्दी के प्रारंभ से वंेफद्रीय गुरुद्वारा हरमंदर साहब ;स्वणर् मंदिरद्ध के आस - पास रामदासपुर शहर ;अमृतसरद्ध विकसित होने लगा था। प्रशासनमें यह वस्तुतः स्वायत्त था। आध्ुनिक इतिहासकार इस युग के सिक्ख समुदाय को ‘राज्य के अंतगर्त राज्य’ मानते हैं। मुग़्ाल सम्राट जहाँगीर इस समुदाय को एक संभावित खतरा मानता था। उसने 1606 में गुरु अजर्न को मृत्युदण्ड देने का आदेश दिया। सत्राहवीं शताब्दी में सिक्ख आंदोलन का राजनीतिकरण शुरू हो गया, जिसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि 1699 में गुरु गो¯बद ¯सह ने खालसा की संस्था का निमार्ण किया। ‘खालसा पंथ’ के नाम से जाना जानेवाला सिक्ख समुदाय अब एक राजनैतिक सत्ता बन गया। सोलहवीं और सत्राहवीं शताब्िदयों की बदलती हुइर् ऐतिहासिक परिस्िथतियों ने सिक्ख आंदोलन के विकास को प्रभावित किया। शुरू से ही बाबा गुरु नानक के विचारों का सिक्ख आंदोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होनें एकइर्श्वर की उपासना के महत्त्व पर शोर दिया। उन्होंने आग्रह किया कि जाति, धमर् अथवा ¯लग - भेद, मुक्ित प्राप्ित के लिए कोइर् मायने नहीं रखते हंै। उनके लिए मुक्ित किसी निष्िव्रफय आनंद की स्िथति नहीं थी, बल्िक सवि्रफय जीवन व्यतीत करने के साथ - साथ सामाजिक प्रतिब(ता की निंरतर कोश्िाशों में ही निहित थी। अपने उपदेश के सार को व्यक्त करने के लिए उन्होंने तीन शब्दों का प्रयोग किया: नाम, दान और इस्नान ;स्नानद्ध। नाम से उनका तात्पयर्, सही उपासना से था। दान का तात्पयर् था, दूसरों का भला करना और इस्नान का तात्पयर् आचार - विचार की पवित्राता। आज उनके उपदेशों को नाम - जपना, कितर् - करना और वंड - छकना के रूप में याद किया जाता है। ये अवधरणाएँ भी उचित विश्वास और उपासना, इर्मानदारीपूणर् निवार्ह और संसाधनों को मिल - बाँटकर प्रयोग करना यानी किदूसरों की मदद के महत्त्व को रेखांकित करती हैं। इस तरह बाबा गुरु नानक के समानता के विचारों के सामाजिक - राजनीतिक मायने थे। शायद इसी बात से हमें बाबा गुरु नानक और उनके अनुयायियों के इतिहास और कबीर, रविदास एवं दादू जैसे संतों और उनके अनुयायियों ;जिनके विचार बाबा गुरु नानक के विचारों के काप़्ाफी करीब थेद्ध के इतिहास में पफवर्फ को ़समझने में मदद मिलती है। माटिर्न लूथर और ध्मर्सुधर आंदोलन सोलहवीं सदी का समय यूरोप में भी एक धमिर्क अंतःक्षोभ यानी उथल - पुथल काकाल था, तब इर्साइर् ध्मर् में अनेक परिवतर्न हुए, जिन्हें लाने वाले महत्त्वपूणर् नेताओं में से एक थेμमाटिर्न लूथर ;1483 - 1546द्ध। लूथर ने यह महसूस किया कि रोमन वैफथोलिक चचर् के अनेक आचार - व्यवहार बाइबिल की श्िाक्षाओं के विरु( जाते हैं। लूथर ने लैटिन भाषा की बजाय आम लोगों की भाषा के प्रयोग को प्रोत्साहन दिया और बाइबिल का जमर्न भाषा में अनुवाद किया। वे दंडमोचन की उस प्रथा के घोर विरोध्ी थे, जिसके अंतगर्त पापकमो± को क्षमा कराने के लिए चचर् को दान दिया जाता था। छापेखाने के बढ़ते हुए प्रयोग से उनकी रचनाओं का व्यापक रूप से प्रचार - प्रसार हुआ। अनेक प्रोटेस्टैंट इर्साइर् संप्रदाय अपना उद्भव लूथर की श्िाक्षाओं में ही खोजते हैं। चित्रा 12 मा£टन लूथर द्वारा जमर्न भाषा में अनुवादित बाइबिल का शीषर्क पृष्ठ अन्यत्रा आप एक बैठक में भाग ले रहे हैं, जहाँ एक संतजाति - व्यवस्था पर चचार् कर रहे हैं। इस बातचीत कावणर्न करें। 1. निम्नलिख्िात में मेल बैठाएँ: बु( नामघर शंकरदेव विष्णु की पूजा निशामुद्दीन औलिया सामाजिक अंतरों पर सवाल उठाए नयनार सूपफी संत़अलवार श्िाव की पूजा 2. रिक्त स्थान की पूिार् करें: ;कद्ध शंकर के समथर्क थे। ;खद्ध रामानुज ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋके द्वारा प्रभावित हुए थे। ;गद्ध , और वीरशैव मत के समथर्क थे। ;घद्ध महाराष्ट्र में भक्ित परंपरा का एक महत्त्वपूणर् वेंफद्र था। 3.नाथपंथ्िायों, सि(ों और योगियों के विश्वासों और आचार - व्यवहारों का वणर्न करें। 4.कबीर द्वारा अभ्िाव्यक्त प्रमुख विचार क्या - क्या थे? उन्होंने इन विचारों को वैफसे अभ्िाव्यक्त किया? 5.सूप्िाफयों के प्रमुख आचार - व्यवहार क्या थे?़6.आपके विचार से बहुत - से गुरुओं ने उस समय प्रचलित धमिर्क विश्वासों तथा प्रथाओं को अस्वीकार क्यों किया? 7.बाबा गुरु नानक की प्रमुख श्िाक्षाएँ क्या थीं? 8.जाति के प्रति वीरशैवों अथवा महाराष्ट्र के संतों का दृष्िटकोण वैफसा था? चचार् करें। 9.आपके विचार से जनसाधरण ने मीरा की याद को क्यों सुरक्ष्िात रखा? कोइर् दरगाह, गुरुद्वारा या मंदिर है। इनमें से किसी एक को देखने जाइए और बताइए कि वहाँ आपने क्या देखा और सुना। 11.इस अध्याय में अनेक संत कवियों की रचनाओं के उ(रण दिए गए हैं।उनकी कृतियों के बारे में और अिाक जानकारी प्राप्त करें और उनकी उन कविताओं को नोट करें, जो यहाँ नहीं दी गइर् हैं। पता लगाएँ कि क्या ये गाइर् जाती हैं। यदि हाँ, तो वैफसे गाइर् जाती हैं और कवियों ने इनमें किन विषयों पर लिखा था। 12.इस अध्याय में अनेक संत - कवियों के नामों का उल्लेख किया गया है, परंतु वुफछ की रचनाओं को इस अध्याय में शामिल नहीं किया गया है। उस भाषा के बारे में वुफछ और जानकारी प्राप्त करें, जिसमें ऐसे कवियों ने अपनीकृतियों की रचना की। क्या उनकी रचनाएँ गाइर् जाती थीं? उनकी रचनाओं का विषय क्या था?

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