अध्याय 2, 3 और 4 में आपने देखा कि किस प्रकार राज्यों का उत्थान और पतन हुआ। इस उठापटक के बीच ही कलाओं, दस्तकारियों और उत्पादक गतिवििायों की नयी व्िाफस्में शहरों और गाँवों में पफल - पफूल रही थीं। एक लंबेचित्रा 1अंतराल में कइर् महत्त्वपूणर् राजनैतिक, सामाजिक और आथ्िार्क परिवतर्न हुए। जनजातीय नृत्य: लेकिन सामाजिक परिवतर्न हर जगह एक समान नहीं थे, संताल चित्रा खरार् क्योंकि अलग - अलग व्िाफस्म के समाज अलग - अलग तरीकों से विकसित हुए। ऐसा वैफसे और क्यों हुआ, यह समझनामहत्त्वपूणर् है। इस उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से में समाज, वणर् के नियमानुसार पहले से ही विभाजित था। ब्राह्मणों द्वारा सुझाए गए ये नियम, बडे़ - बडे़ राज्यों के राजाओं द्वारा स्वीकार किए गए थे। इससे उँफच और नीच तथा अमीर और गरीब के बीच का प़्ाफासला बढ़ा। दिल्ली के सुलतानों और मुग़्ालों के काल में श्रेणीब( समाज श्यादा जटिल हो गया। बड़े शहरों से परे μ जनजातीय समाज अलबत्ता, दूसरे तरह के समाज भी उस समय मौशूद थे। उपमहाद्वीप के कइर् समाज ब्राह्मणों द्वारा सुझाए गए सामाजिक नियमों और कमर्कांडों को नहीं मानते थे और न ही वे कइर् असमान वगो± में विभाजित थे। अकसर ऐसे समाजों को जनजातियाँ कहा जाता रहा है। प्रत्येक जनजाति के सदस्य नातेदारी के बंधन से जुड़े होते थे। कइर् जनजातियाँ खेती से अपना जीविकोपाजर्न करती थीं। वुफछ दूसरी जनजातियों के लोग श्िाकारी, संग्राहक या उपमहाद्वीप का एक भौतिक मानचित्रा लेकर वे इलाके बताइए जहाँ जनजातीय लोग रहते रहे होंगे। पशुपालक थे। प्रायः वे अपने निवासस्थान के प्राकृतिक संसाधनों का पूरा - पूरा इस्तेमाल करने के लिए इन गतिवििायों का मिला - जुला रूप अपनाते थे। वुफछ जनजातियाँ खानाबदोश थीं और वे एक जगह से दूसरी जगह घूमती रहती थीं। जनजातीय समूह, संयुक्त रूप से भूमि और चरागाहों पर नियंत्राण रखते थे और अपने खुद के बनाए नियमों के आधार पर परिवारों के बीच इनका बँटवारा करते थे। इस उपमहाद्वीप के विभ्िान्न हिस्सों में कइर् बड़ी जनजातियाँ पफली - पूफलीं। सामान्यतः ये जंगलों, पहाड़ों, रेगिस्तानों और दूसरी दुगर्म जगहों पर निवास करती थीं। कभी - कभी जाति विभाजन पर आधारित अिाक शक्ितशाली समाजों के साथ उनका टकराव होता था। कइर् मायनों में इन जनजातियों नेअपनी आशादी को बरकरार रखा और अपनी अलहदा संस्कृति को बचाया। लेकिन जाति - आधारित और जनजातीय समाज दोनों अपनी विविध किस्म की शरूरतों के लिए एक - दूसरे पर निभर्र भी रहे। टकराव और निभर्रता के इस संबंध ने दोनों तरह के समाजों को धीरे - धीरे बदलने का काम भी किया। जनजातीय लोग कौन थे? समकालीन इतिहासकारों और मुसाप्िाफरों ने जनजातियों के बारे में बहुत कम ़जानकारी दी है। वुफछ अपवादों को छोड़ दें, तो जनजातीय लोग भी लिख्िात दस्तावेश नहीं रखते थे। लेकिन समृ( रीति - रिवाजों और वाचिक/मौख्िाक परंपराओं का वे संरक्षण करते थे। ये परंपराएँ हर नयी पीढ़ी को विरासत में मिलती थीं। आज के इतिहासकार जनजातियों का इतिहास लिखने के लिए इन वाचिक परंपराओं को इस्तेमाल करने लगे हैं। जनजातीय लोग भारत के लगभग हर क्षेत्रा में पाए जाते थे। किसी भी एक जनजाति का इलावफा और प्रभाव समय के साथ - साथ बदलता रहता था। वुफछ शक्ितशाली जनजातियों का बड़े इलावफों पर नियंत्राण था। पंजाब में खोखर जनजाति तेरहवीं और चैदहवीं सदी के दौरान बहुत प्रभावशालीथी। यहाँ बाद में गक्खर लोग श्यादा महत्त्वपूणर् हो गए। उनके मुख्िाया, कमाल खान गक्खर को बादशाह अकबर ने मनसबदार बनाया था। मुल्तान और सिंध में मुग़्ालों द्वारा अधीन कर लिए जाने से पहले लंगाह और अरघुन मानचित्रा 1 प्रमुख भारतीय जनजातियों के क्षेत्रा लोगों का प्रभुत्व अत्यंत विस्तृत क्षेत्रा पर था। उत्तर - पश्िचम में एक और विशाल एवं शक्ितशाली जनजाति थीμबलोच। ये लोग अलग - अलग मुख्िायों वाले कइर् छोटे - छोटे वुफलों में बँटे हुए थे। पश्िचमी हिमालय में गडड्ी गड़रियों की जनजाति रहती थी। उपमहाद्वीप के सुदूर उत्तर - पूवीर् भाग पर भी नागा, अहोम और कइर् दूसरी जनजातियों का पूरी तरह प्रभुत्व था। मौशूदा बिहार और झारखंड के कइर् इलावफों में बारहवीं सदी तक चेर सरदारशाहियों का उदय हो चुका था। बादशाह अकबर के प्रसि( सेनापति राजा मान सिंह ने 1591 में चेर लोगों पर हमला किया और उन्हें परास्त किया। उन्हें लूट कर अच्छा - खासा माल इकऋा किया गया, लेकिन वे पूरी तरह अधीन नहीं बनाए गए। औरंगशेब के समय में मुगल सेनाओं ने चेर ़वुफल परिवारों या घरों के एक ऐसे समूह को वुफल कहते हैं जो एक ही पूवर्ज की संतान होने का दावा करते हैं। जनजातीय संगठन प्रायः नातेदारी या वुफल संबंधी निष्ठा पर आधारित होते हैं। लोगों के कइर् व्िाफलों पर वफब्शा किया और इस जनजाति को अपना अधीनस्थ बना लिया। इसक्षेत्रा में रहने वाली महत्त्वपूणर् जनजातियों में मुंडा और संताल थे, यद्यपि ये उड़ीसा और बंगाल में भी रहते थे। कनार्टक और महाराष्ट्र की पहाडि़याँμकोली, बेराद तथा कइर् दूसरी जनजातियों के निवासस्थान थे। कोली लोग गुजरात के कइर् इलावफों में भी रहते थे। वुफछ और दक्ष्िाण में कोरागा, वेतर, मारवार और दूसरी जनजातियों की विशाल आबादी थी। भीलों की बड़ी जनजाति पश्िचमी और मध्य भारत में पैफली हुइर् थी। सोलहवीं सदी का अंत आते - आते उनमें से कइर् एक जगह बसे हुए खेतिहर और यहाँ तक कि शमींदार बन चुके थे। तब भी भीलांे के कइर् वुफल श्िाकारी - संग्राहक बनेरहे। मौजूदा छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में गोंड लोग बड़ी तादाद में पैफले हुए थे। खानाबदोश और घुमंतू लोग कैसे रहते थे खानाबदोश चरवाहे अपने जानवरों के साथ दूर - दूर तक घूमते थे। उनका जीवन दूध और अन्य पशुचारी उत्पादों पर निभर्र था। वे खेतिहर गृहस्थों से अनाज, कपड़े, बतर्न और ऐसी ही चित्रा 3 घुमंतू व्यापारियों की शृंखलाएँभारत को बाहरी दुनिया से जोड़ती थीं। यहाँ मेवा इकऋा करके उसे ऊँटों पर लादा जा रहा है। मध्य एश्िाया के व्यापारी ऐसी वस्तुएँ भारत लाते थे और बंजारे एवं अन्य व्यापारी उन्हें स्थानीय बाशारों तक पहुँचाते थे। चीशों के लिए ऊन, घी इत्यादि का विनिमय भी करते थे। वुफछ खानाबदोश अपने जानवरों पर सामानों की ढुलाइर् का काम भी करते थे। एक जगह से दूसरी जगह आते - जाते वे सामानों की खरीद - प़्करते थे। बंजारा लोग सबसे महत्त्वपूणर् व्यापारी - खानाबदोश थे। उनका कारवाँ ‘टांडा’ कहलाता था। सुलतान अलाउद्दीन ख़लजी ;अध्याय 3द्ध बंजारों का ही इस्तेमाल नगर के बाशारों तक अनाज की ढुलाइर् के लिए करते थे। बादशाह जहाँगीर ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि बंजारे विभ्िान्न इलाकों से अपने बैलों पर अनाज ले जाकर शहरों में बेचते थे। सैन्य अभ्िायानों के दौरान वे मुगल सेना के लिए खाद्यान्नों की ढुलाइर् का काम करते थे। किसी भी़विशाल सेना के लिए 1,00,000 बैल अनाज ढोते होंगे। कइर् पशुचारी जनजातियाँ मवेशी और घोड़ों, जैसे जानवरों को पालने - पोसने और संपन्न लोगों के हाथ उन्हें बेचने का काम करती थीं। छोटे - माटेे पेफरीवालों की विभ्िान्न जातियाँ भी एक गाँव से दूसरे गाँव भ्रमण करती थीं। ये लोग रस्सी, सरवंफडे की चीशें, पूफस की चटाइर् और मोटे बोरे जैसे माल बनाते और बेचते थे। कभी - कभी भ्िाक्षुक लोग भी घूमंतू सौदागरों का काम करते थे। नतर्कों, गायकों और अन्य तमाशबीनों की भी जातियाँ थीं जो विभ्िान्न नगरों और गाँवों में कमाइर् के लिए अपनी कला का प्रदशर्न करती थीं। बदलता समाज μ नयी जातियाँ और श्रेण्िायाँ जैसे - जैसे अथर्व्यवस्था और समाज की शरूरतें बढ़ती गईं, नए हुनर वाले लोगों की आवश्यकता पड़ी। वणो± के भीतर छोटी - छोटी जातियाँ उभरने लगीं। उदाहरण के लिए, ब्राह्मणों के बीच नयी जातियाँ सामने आईं। दूसरी ओर, कइर् जनजातियों और सामाजिक समूहों को जाति - विभाजित समाज में शामिल कर लिया गया और उन्हें जातियों का दजार् दे दिया गया। विशेषज्ञता प्राप्त श्िाल्िपयोंμसुनार, लोहार, बढ़इर् और राजमिस्त्राीμको भी ब्राह्मणों द्वारा जातियों के रूप में मान्यता दे दी गइर्। वणर् की बजाय जाति, समाज के संगठन का आधार बनी। वतर्मान तमिलनाडु के तिरूचिरापल्ली ताल्लुक में स्िथत उइर्याकोंडन उदेयार के बारहवीं शताब्दी के अभ्िालेख में ब्राह्मणों की एक सभा ;अध्याय 2द्ध के विचार - विमशर् का वणर्न मिलता है। वे रथकारों ;शाब्िदक अथर्, रथ बनाने वाले लोगद्ध की सामाजिक स्िथति पर विचार - विमशर् कर रहे थे। उन्होंने इस जाति के कामकाज तय किए जिनमें वास्तुकला, रथों और गााडि़यों का निमार्ण, मंदिर द्वार बनाना, मूतिर्याँ स्थापित करना, बलि के लिए लकडि़यों से बने साज - सामान तैयार करना, मंडप बनाना और राजा के लिए शेवर बनाना शामिल थे। ग्यारहवीं और बारहवीं सदी तक आते - आते क्षत्रिायों के बीच नए राजपूत गोत्रों की तावफत में कापफी इजाप़्ाफा हुआ। वे हूण, चंदेल, चालुक्य और वुफछ़दूसरी वंश - परंपराओं से आते थे। इनमें से वुफछ पहले जनजातियों में आते थे और बाद में कइर् वुफल राजपूत मान लिए गए। धीरे - धीरे उन्होंने पुराने शासकोंकी जगह ले ली विशेषतः कृष्िा वाले क्षेत्रों में। यहाँ कइर् तरह के परिवतर्न हो रहे थे और शासकों ने शक्ितशाली राज्यों के निमार्ण में अपनी संपदा का इस्तेमाल किया। शासकों के रूप में राजपूत गोत्रों के उदय के उदाहरण का जनजातीय लोगों ने अनुसरण किया। धीरे - धीरे ब्राह्मणों के समथर्न से कइर् जनजातियाँ, जाति व्यवस्था का हिस्सा बन गईं। लेकिन केवल प्रमुख जनजातीय परिवार ही शासक वगर् में शामिल हो पाए। उनकी बहुसंख्यक आबादी, समाज की छोटी जातियों में ही जगह बना पाइर्। दूसरी तरपफ पंजाब, ¯सध औऱ़उत्तर - पश्िचमी सरहद की प्रभुत्वशाली जनजातियों ने कापफी पहले इस्लाम को अपना लिया था। वे जाति व्यवस्था को नकारते रहे। सनातनी हिंदू धमर् के द्वारा प्रस्तावित गैर - बराबरी वाली सामाजिक व्यवस्था इन इलावफों में बड़े पैमाने पर स्वीकार नहीं की गइर्। राज्यों की उत्पिा, जनजातीय लोगों के बीच हुए सामाजिक बदलाव सेगहराइर् से संबंिात है। हमारे इतिहास के इस महत्त्वपूणर् हिस्से के दो उदाहरण नीचे उल्िलख्िात हैं। नशदीक से एक नशर गोंड गोंड लोग, गोंडवाना नामक विशाल वनप्रदेश में रहते थे। वे स्थानांतरीयकृष्िा अथार्त् जगह बदल - बदल कर खेती करते थे। विशाल गोंड जनजाति कइर् छोटे - छोटे वुफलों में भी बँटी हुइर् थी। प्रत्येक वुफल का अपना राजा या राय होता था। जिस समय दिल्ली के सुलतानों की तावफत घट रही थी, उसी समय वुफछ बड़े गोंड राज्य छोटे गोंड सरदारों पर हावी होने लगे थे। अकबर के शासनकाल के एक इतिहास अकबरनामा में उल्िलख्िात है कि गढ़ कटंगा के गोंड राज्य में 70,000 गाँव थे। इन राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था वेंफद्रीकृत हो रही थी। राज्य, गढ़ों में विभाजित थे। हर गढ़ किसी खास गोंड वुफल के नियंत्राण में था। ये पुनः चित्रा 5 गोंड महिला स्थानांतरीय कृष्िा किसी वनप्रांत के पेड़ों और झाडि़यों को पहले काटा और जलाया जाता है। उसकी राख में ही पफसल बो दी जाती है।़जब यह शमीन अपनी उवर्रता खो देती है, तब शमीन का दूसरा टुकड़ा साप़्ाफ किया जाता है और इसी तरह से पफसल़उगाइर् जाती है। मानचित्रा 2 गोंडवाना चैरासी गाँवों की इकाइयों में विभाजित होते थे, जिन्हें चैरासी कहा जाता था। चैरासी का उप - विभाजन बरहोतों में होता था, जो बारह - बारह गाँवों को मिला कर बनते थे। बड़े राज्यों के उदय ने गोंड समाज के चरित्रा को बदल डाला। उनका मूलतः बराबरी वाला समाज धीरे - धीरे असमान सामाजिक वगो± में विभाजित हो गया। ब्राह्मण लोगों ने गोंड राजाओं से अनुदान में भूमि प्राप्त की और अिाक प्रभावशाली बन गए। गोंड सरदारों को अब राजपूतों के रूप में मान्यता प्राप्त करने की चाहत हुइर्। इसलिए गढ़ कटंगा के गोंड राजा अमन दास ने संग्राम शाह की उपािा धारण की। उसके पुत्रा दलपत ने महोबा के चंदेल राजपूत राजा सालबाहन की पुत्राी राजवुफमारी दुगार्वती से विवाह किया। दलपत की मृत्यु कम उम्र में ही हो गइर्। रानी दुगार्वती बहुत योग्य थी और उसने अपने पाँच साल के पुत्रा बीर नारायण के नाम पर शासन की कमान सँभाली। उसके समय में राज्य का और अिाक विस्तार हुआ। 1565 ़़में आसिपफ खान के नेतृत्व में मुगल सेनाओं ने गढ़ कटंगा पर हमला किया। रानी दुगार्वती ने इसका जम कर सामना किया। उसकी हार हुइर् और उसने समपर्ण करने की बजाय मर जाना बेहतर समझा। उसका पुत्रा भी तुरंत बाद लड़ता हुआ मारा गया। चित्रा 6 एक नक्काशीदार दरवाशा, गोंड जनजाति, बस्तर क्षेत्रा, मध्य प्रदेश 98गढ़ कटंगा एक समृ( राज्य था। इसने हाथ्िायों को पकड़ने और दूसरे राज्यों में उनका नियार्त करने के व्यापार में ख़ासा धन कमाया। जब मुग्गोंडों को हराया, तो उन्होंने लूट में बेशवफीमती सिक्के और हाथी बहुतायत में हथ्िाया लिए। उन्होंने राज्य का एक भाग अपने कब्शे में ले किया और शेष बीर नारायण के चाचा चंदर शाह को दे दिया। गढ़ कटंगा के पतन के बावशूद गोंड राज्य वुफछ समय तक चलता रहा। लेकिन वे का.पफी कमशोर हो गए और बाद में अिाक शक्ितशाली बुंदेलों और मराठों के ख्िालाप्असपफल रहे। अहोम अहोम लोग मौजूेदा म्यानमार सबसे। उन्होंने भुइयाँ ;भूस्वामीद्ध लोगों की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था का दमन करवेफ नए राज्य की स्थापना की। सोलहवीं सदी के दौरान उन्होंने चुटियों ;1523द्ध और कोच - हाजो ;1581द्ध वमिला लिया। उन्होंने कइर् अन्य जनजातियों को भी अधीन कर लिया। अहोमों ने एक बड़ा राज्य बनाया और इसके लिए 1530 के दशक में ही, इतने वषो± पहले, आग्नेय अस्त्रों का इस्तेमाल किया। 1660 तक आते - आते वे उच्चस्तरीय बारूद और तोपों का निमार्ण करने में सक्षम हो गए थे। लेकिन अहोम लोगों को दक्ष्िाण - पश्िचम से कइर् आक्रमणों का सामना करना पड़ा। 1662 में मीर जुमला के नेतृत्व में मग्ु़ालों ने अहोम राज्य पर हमला किया। बहादुरी से सामना करने के बावशूद अहोम लोगों की पराजय हुइर्। लेकिन उस क्षेत्रा पर मुगलों का प्रत्यक्ष नियंत्राण श्यादा समय ़तक बना नहीं रह सका। अहोम राज्य, बेगार पर निभर्र था। राज्य के लिए जिन लोगों से शबरन काम लिया जाता था, वे ‘पाइक’ कहलाते थे। अहोम राज्य में एक जनगणना की गइर् थी। प्रत्येक गाँव को अपनी बारी आने पर निश्िचत संख्या में पाइक भेजने होते थे। इसके लिए जनगणना के बाद सघन आबादी वाले इलावफों से कम आबादी वाले इलावफों में लोगों को स्थानांतरित किया गया था। इस प्रकार अहोम वुफल टूट गए। सत्राहवींशताब्दी का पूवार्(र् पूरा होते - होते प्रशासन खासा वेंफद्रीकृत हो चुका था। लगभग सभी वयस्क पुरुष यु( के दौरान सेना में अपनी सेवाएँ प्रदान करते थे। दूसरे समय में वे बाँध, ¯सचाइर् व्यवस्था इत्यादि के निमार्ण या अन्य सावर्जनिक काया±में जुटे रहते थे। अहोम लोग चावल की खेती केेनए तरीके भी अमल में लाए। अहोम समाज, वुफलों में विभाजित था, जिन्हें ‘खेल’ कहा जाता था। वहाँ दस्तकारों की बहुत कम जातियाँ थीं। इसलिए अहोम क्षेत्रा में दस्तकार निकटवतीर् क्षेत्रों से आए थे। एक खेल के नियंत्राण में प्रायः कइर् गाँव होते थे। किसान को अपने ग्राम समुदाय के द्वारा शमीन दी जाती थी। समुदाय की सहमति के बगैर राजा तक इसे वापस नहीं ले सकता था। शुरुआत में अहोम लोग, अपने जनजातीय देवताओं की उपासना करतेथे। लेकिन सत्राहवीं सदी के पूवार्(र् में ब्राह्मणों के प्रभाव में बढ़ोत्तरी हुइर्। मंदिरों और ब्राह्मणों को राजा के द्वारा भूमि अनुदान में दी गइर्। सिब सिंह ;1714 - 44द्ध के काल में ¯हदू धमर् वहाँ का प्रधान धमर् बन गया था। लेकिन अहोम राजाओं ने ¯हदू धमर् को अपनाने के बाद अपनी पारंपरिक आस्थाओं को पूरी तरह से नहीं छोड़ा था। अहोम समाज, एक अत्यंत परिष्कृत समाज था। कवियों और विद्वानों को अनुदान में शमीन दी जाती थी। नाट्य - कमर् को प्रोत्साहन दिया जाताथा। संस्कृत की महत्त्वपूणर् कृतियोें का स्थानीय भाषा में अनुवाद किया गया़ालों था। बुरंजी नामक ऐतिहासिक कृतियों काआपके विचार में मुग्े पहले अहोम भाषा में और पिफरने अहोम प्रदेश कोजीतने का प्रयास क्यों किया? असमिया में लिखा गया था। निष्कषर् जिस युग की हम चचार् करते आए हैं, उस युग के दौरान उपमहाद्वीप में कापफी सामाजिक परिवतर्न हुआ। वणर् आधारित समाज और जनजातीय लोग एक - दूसरे के साथ लगातार संपवर्फ में आते रहे। इस आदान - प्रदान ने दोनों तरह के समाजों में अनुवूफलन और बदलाव की प्रिया चलाइर्। बहुत - सी विभ्िान्न प्रकार की जनजातियाँ थीं और उन्होंने विभ्िान्न प्रकार की जीविकाएँ अपनाईं। कालांतर में उनमें से कइर् जाति आधारित समाज में शामिल हो गईं। लेकिन कइर्यों ने जाति व्यवस्था और सनातनी हिंदू धमर्, दोनों को ही नकार दिया। वुफछ जनजातियों ने सुसंगठित प्रशासनिक व्यवस्था वाले विस्तृत राज्यों की स्थापना की। इस तरह वे राजनीतिक रूप से तावफतवर हो गए। इसने उन्हें बृहत्तर और अिाक जटिल राज्यों और साम्राज्यों के साथ संघषर् की स्िथति में ला खड़ा किया। आप एक ऐसे खानाबदोश समुदाय के सदस्य हैं, जो हर तीन महीने बाद अपना निवासस्थान बदलता है। इसका आपके जीवन पर क्या प्रभाव पडे़गा? पिफर से याद करें 1.निम्नलिख्िात में मेल बैठाएँ: गढटांडा चैरासी श्रमिक कारवाँ वुफल गढ़ कटंगा सिब सिंह अहोम राज्य दुगार्वती पाइक़खेल 2. रिक्त स्थानों की पूिार् करें: ;कद्ध वणो± के भीतर पैदा होती नयी जातियाँ कहलाती थीं। ;खद्ध अहोम लोगों के द्वारा लिखी गइर् ऐतिहासिककृतियाँ थीं। ;गद्ध ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋने इस बात का उल्लेख किया है कि गढ़ कटंगा में 70,000 गाँव थे। ;घद्ध बड़े और तावफतवर होने पर जनजातीय राज्यों ने और को भूमि - अनुदान दिए। 3. सही या गलत बताइए: ;कद्धजनजातीय समाजों के पास समृ( वाचक परंपराएँ थीं। ;खद्ध उपमहाद्वीप के उत्तर - पश्िचमी भाग में कोइर् जनजातीय समुदाय नहीं था। ;गद्धगोंड राज्यों में अनेक नगरों को मिला कर चैरासी बनता था। ;घद्ध भील, उपमहाद्वीप के उत्तर - पूवीर् भाग में रहते थे। 4. खानाबदोश पशुचारकों और एक जगह बसे हुए खेतिहरों के बीच किस तरह का विनिमय होता था? आइए समझें 5.अहोम राज्य का प्रशासन कैसे संगठित था? 6.वणर् आधारित समाज में क्या परिवतर्न आए? 7.एक राज्य के रूप में संगठित हो जाने के बाद जनजातीय समाज वैफसे बदला? आइए विचार करें 8.क्या बंजारे लोग अथर्व्यवस्था के लिए महत्त्वपूणर् थे? 9.गोंड लोगों का इतिहास, अहोमों के इतिहास से किन मायनों में भ्िान्न था? क्या कोइर् समानता भी थी? आइए करके देखें 10.एक मानचित्रा पर इस अध्याय में उल्िलख्िात जनजातियों के इलावफों कोचिित करें। किन्हीं दो के संबंध में यह चचार् करें कि क्या उनके जीविकोपाजर्न का तरीका अपने - अपने इलावफों की भौगोलिक विशेषताओं और पयार्वरण के अनुरूप था? 11.जनजातीय समूहों के संबंध में मौशूदा सरकारी नीतियों का पता लगाएँ और उनके बारे में एक बहस का आयोजन करंे। 12.उपमहाद्वीप में वतर्मान खानाबदोश पशुचारी समूहों के बारे में और पता लगाएँ। वे कौन - से जानवर रखते हैं? वे प्रायः किन इलाकों में जाते रहते हैं?

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