चित्रा 1 व़ुफत्बमीनार पाँच मंिाली इमारत है। अभ्िालेखों की पिðयाँ इसके पहले छज्जे के नीचे हैं। इस इमारत की पहली मंिाल का निमार्ण व़ुफत्बउद्दीन ऐबक तथा शेष मंिालों का निमार्ण 1229 के आस - पास इल्तुतमिश द्वारा करवाया गया। कइर् वषो± में यह इमारत आँध्ी - तूपफाऩतथा भूवंफप की वशह से क्षतिग्रस्त हो गइर् थी। अलाउद्दीन ख़लजी, मुहम्मद तुग़़़्ालवफ, प्िाफरोश शाह तुगलव़़फ तथा इब्राहिम लोदी ने इसकी मरम्मत करवाइर्। चित्रा 1 व़ुफत्बमीनार के पहले छज्जे को प्रदश्िार्त करता है। व़ुफत्बउद्दीन ऐबक ने लगभग 1199 में इसका निमार्ण करवाया था। छज्जे के नीचे छोटे मेहराब तथा ज्यामितीय रूपरेखाओं द्वारा निमिर्त नमूने को देखें। क्या आपको छज्जे के नीचे अभ्िालेखों की दो प‘ियाँ दिखाइर् दे रही हैं? ये अभ्िालेख अरबी में हैं। गौर करें कि मीनार का बाहरी हिस्सा घुमावदार तथा कोणीय है। ऐसी सतह पर अभ्िालेख लिखने के लिए काप़्ाफी परिशु(ता की आवश्यकता होती थी। सवार्ध्िक योग्य कारीगर ही इस कायर् को संपन्न कर सकते थे। याद रखें कि आठ सौ वषर् पूवर् केवल वुफछ ही इमारतें पत्थर या ईंटों की बनी होती थीं। तेरहवीं शताब्दी में व़ुफत्बमीनार जैसी इमारत का देखने वालों पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? आठवीं और अठारहवीं शताब्िदयों के बीच राजाओं तथा उनके अिाकारियों ने दो तरह की इमारतों का निमार्ण किया। पहली तरह की इमारतों मेंμसुरक्ष्िात, संरक्ष्िात तथा इस दुनिया और दूसरी दुनिया में आराम - विराम की भव्य जगहेंμव्िाफले, महल तथा मवफबरे थे। दूसरी श्रेणी में मंदिर, मसजिद, हौश, वुफएँ, सराय तथा बाशार जैसी जनता के उपयोग की इमारतें थीं। राजाओं से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे अपनी प्रजा की देख - भाल करेंगे तथा प्रजा के उपयोग और आराम के लिए इमारतों का निमार्ण करवाकर राजा उनकी प्रशंसा पाने की आशा करते थे। इस तरह के निमार्ण कायर्, व्यापारियों सहित अन्य व्यक्ितयों के द्वारा भी किए जाते थे। वे मंदिरों, मसजिदों और वुँफओं का निमार्ण करवाते थे। परंतु घरेलू स्थापत्यμव्यापारियों की विशाल हवेलियों के अवशेष अठारहवीं शताब्दी से ही मिलने शुरू होते हैं। अभ्िायांत्रिाकी कौशल तथा निमार्ण कायर् स्मारकों से हमें उनके निमार्ण में प्रयुक्त श्िाल्प विज्ञान का भी पता चलता है। छत का ही उदाहरण ले लीजिए। हम चार दीवारों के आर - पार लकड़ी की शहतीरों अथवा एक पत्थर की पटिया रखकर छत बना सकते हैं। लेकिन यह कायर् उस समय बहुत कठिन हो जाता है जब हम एक विस्तृत अध्िरचनावाले विशाल कक्ष का निमार्ण करना चाहते हैं। इसके लिए अध्िक परिष्कृत कौशल की शरूरत होती है। सातवीं और दसवीं शताब्दी के मध्य वास्तुकार भवनों में और अध्िक कमरे, दरवाशे और ख्िाड़कियाँ बनाने लगे। छत, दरवाशे और ख्िाड़कियाँ अभीभी दो ऊध्वार्ध्र खंभों के आर - पार एक अनुप्रस्थ शहतीर रखकर बनाए जाते थे। वास्तुकला की यह शैली ‘अनुप्रस्थ टोडा निमार्ण’ कहलाइर् जाती है। आठवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच मंदिरों, मसजिदों, मकबरों तथा सीढ़ीदार वँुफओं ;बावलीद्ध से जुड़े भवनों के निमार्ण में इस शैली का प्रयोग हुआ। चित्रा 2 ख बारहवीं शताब्दी में दो प्रौद्योगिकीय एवं शैली संबंध्ी परिवतर्न दिखाइर् पड़ने लगते हैं - ;1द्ध दरवाशों औरख्िाड़कियों के ऊपर की अध्िरचना का भार कभी - कभी मेहराबों पर डाल दिया जाता था। वास्तुकला का यह ‘चापाकार’ रूप था। मेहराब का ‘विशुद्व’ रूप मेहराब के मध्य में ‘डाट’ अध्िरचना केचित्रा 2 क व 2 ख की तुलनाभार को मेहराब की आधरश्िाला पर डालचित्रा 5 क और 5 ख से करें। देती है। ;2द्ध निमार्ण कायर् में चूना - पत्थर,सीमेंट का प्रयोग बढ़ गया। यहउच्च श्रेणी की सीमेंट होती थी,जिसमें पत्थर के टुकड़ों केमिलाने से वंफकरीट बनती थी।इसकी वशह से विशाल ढाँचों कानिमार्ण सरलता और तेशी से होनेलगा। चित्रा 6 में निमार्ण स्थल परएक नशर डालें। मंदिरों, मसजिदों और हौशों का निमार्ण मंदिरों और मसजिदों का निमार्ण बहुत सुंदर तरीके से किया जाता था क्योंकि वे उपासना के स्थल थे। वे अपने संरक्षक की शक्ित, धन - वैभव तथा भक्ित भाव का भी प्रदशर्न करते थे। उदाहरण के लिए, राजराजेश्वर मंदिर को लिया जा सकता है। एक अभ्िालेख से इस बात का संकेत मिलता है कि इस मंदिर का निमार्ण राजा राजदेव ने 63 चित्रा 5 ख मेहराब का विशु( रूप अलाइर् दरवाशे का मेहराब ;प्रारंभ्िाक चैदहवीं सदीद्ध, व़ुफव्वत अल - इस्लाम मसजिद, दिल्ली चित्रा 6 आगरा किले में जल - द्वार निमार्ण को दिखाती एक चित्राकारी। इसे अकबरनामा से लिया गया है। अपने देवता राजराजेश्वरम की उपासना हेतु किया था। ध्यान दें कि राजा और उसके देवता के नाम कापफी मिलते - जुलते हैं। राजा ने इस तरह का नाम़इसलिए रखा, क्योंकि यह नाम मंगलकारी था और राजा स्वयं को इर्श्वर के रूप में दिखाना चाहता था। धमिर्क अनुष्ठान के शरिए मंदिर में एक देवता ;राजा राजदेवद्ध, दूसरे देवता ;राजराजेश्वरमद्ध का सम्मान करता था। सभी विशालतम मंदिरों का निमार्ण राजाओं ने करवाया था। मंदिर के अन्य लघु देवता शासक के सहयोगियों तथा अध्ीनस्थों के देवी - देवता थे। यह मंदिर शासक और उसके सहयोगियों द्वारा शासित विश्व का एक लघु रूप ही था। जिस तरह से वे राजकीय मंदिरों में इकऋे होकर अपने देवताओं की उपासना करते थे, ऐसा प्रतीत होता था मानो उन्होंने देवताओं के न्यायपि्रय शासन को पृथ्वी पर ला दिया हो। मुसलमान सुलतान तथा बादशाह स्वयं को भगवान के अवतार होने का दावा तो नहीं करते थे विंफतु पफारसी दरबारी इतिहासों में सुलतान का ़वणर्न ‘अल्लाह की परछाइर्’ के रूप में हुआ है। दिल्ली की एक मसजिद के अभ्िालेख से पता चलता है कि अल्लाह ने अलाउद्दीन को शासक इसलिए चुना था, क्योंकि उसमें अतीत के महान विध्िकत्तार्ओंमूसा और सुलेमान की विश्िाष्टताएँ मौशूद थीं। सबसे महान विध्िकत्तार् और वास्तुकार अल्लाह स्वयं था। उसने अव्यवस्था को दूर करवेफ विश्व का सृजन किया तथा एक व्यवस्था और संतुलन कायम किया। सत्ता में आने पर प्रत्येक राजवंश के राजा ने शासक होने के अपने नैतिक अध्िकार पर और शोर डाला। उपासना के स्थानों के निमार्ण ने शासकों को, इर्श्वर के साथ अपने घनिष्ठ संबंध् की उद्घोषणा करने का मौका दिया। ऐसीउद्घोषणाएँ तेशी से बदलती राजनीति के संदभर् में महत्त्व ग्रहण कर लेती थीं। शासकों ने विद्वान तथा ध्मर्निष्ठ व्यक्ितयों को भी आश्रय प्रदान किया औरअपनी राजधनियों तथा नगरों को महत्त्वपूणर् संास्कृतिक वेंफद्रों के रूप में परिवतिर्त करने का प्रयास किया। इन सबसे उनके शासन तथा राज्य को ख्याति मिली। व्यापक समझ यह थी कि न्यायपि्रय राजा का राज ऐसा होगा, जहाँ खुशहाली होगी और जहाँ पयार्प्त वषार् होगी। इसी तरह हौशांे और जलाशयों के निमार्ण द्वारा बहुमूल्य पानी उपलब्ध् कराने के कायर् की बहुत प्रशंसा की जाती थी। सुलतान इल्तुतमिश ने देहली - ए - वुफह्ना के एकदम निकट एक विशाल तालाब का निमार्ण करके व्यापक सम्मान प्राप्त किया। इस विशाल जलाशय को हौश - ए - सुल्तानी अथवा ‘राजा का तालाब’ कहा जाता था। क्या आप इसे अध्याय 3 के मानचित्रा 1 में ढूँढ सकते हैं? शासक प्रायः सामान्य लोगों के लिए बड़े और छोटे हौशों और तालाबों का निमार्ण करवाते थे। कभी - कभी वे किसी मंदिर, मसजिद ;चित्रा 7 में जामी मसजिद के छोटे हौश पर ध्यान देंद्ध अथवा गुरुद्वारे ;सिक्खों के एकत्रिात होने और उपासना का स्थान, चित्रा 8द्ध का हिस्सा होते थे। मंदिरों को क्यों नष्ट किया गया? राजा, मंदिरों का निमार्ण अपनी शक्ित, ध्न - संपदा और इर्श्वर के प्रति निष्ठाके प्रदशर्न हेतु करते थे। ऐसे में यह बात आश्चयर्जनक नहीं लगती है कि जब उन्होंने एक दूसरे के राज्यों पर आक्रमण किया, तो उन्होंने प्रायः ऐसी चित्रा 9 मुग़्ाल चारबाग ;कद्ध हुमायूँ के मवफबरे का चारबाग, दिल्ली, 1562 - 71 ;खद्ध कश्मीर में शालीमार बाग का सीढ़ीदार चारबाग, 1620 और 1634 ;गद्ध लालमहल बारी मेंचारबाग को तटीय बाग केरूप में अपनाया गया,हमारे अतीत इमारतों पर निशाना साध। नवीं शताब्दी के आरंभ में जब पांड्यन राजा श्रीमर श्रीवल्लभ ने श्रीलंका पर आक्रमण कर राजा सेन प्रथम ;831 - 851द्ध कोपराजित किया था, उसके विषय में बौ( भ्िाक्षु व इतिहासकार ध्म्मकििा ने लिखा है कि, फ्सारी बहुमूल्य चीशें वह ले गया... रत्न महल में रखी स्वणर् कीबनी बु( की मूतिर्... और विभ्िान्न मठों में रखी सोने की प्रतिमाओं - इन सभी को उसने शब्त कर लिया।य् सिंहली शासक के आत्माभ्िामान को इससे जोआघात लगा था, उसका बदला लिया जाना स्वाभाविक था। अगले सिंहली शासक सेन द्वितीय ने अपने सेनापति को, पांड्यों की राजधनी मदुरइर् परआक्रमण करने का आदेश दिया। बौ( इतिहासकार ने लिखा है कि इसअभ्िायान में बु( की स्वणर् मूिार् को ढूँढ निकालने तथा वापस लाने हेतुमहत्त्वपूणर् प्रयास किए गए। इसी तरह ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में जब चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने अपनी राजधनी में श्िाव मंदिर का निमार्ण करवाया था तो उसने पराजितशासकों से शब्त की गइर् उत्कृष्ट प्रतिमाओं से इसे भर दिया। एक अध्ूरी सूचीमें निम्न चीशें सम्िमलित थींः चालुक्यों से प्राप्त एक सूयर् पीठिका, एक गणेशमूिार् तथा दुगार् की कइर् मूिायाँ, पूवीर् चालुक्यों से प्राप्त एक नंदी मूतिर्, उड़ीसाके कलिंगों से प्राप्त भैरव ;श्िाव का एक रूपद्ध तथा भैरवी की एक प्रतिमातथा बंगाल के पालों से प्राप्त काली की मूिार्। गशनी का सुलतान महमूद राजेंद्र प्रथम का समकालीन था। भारत में़अपने अभ्िायानों के दौरान उसने पराजित राजाओं के मंदिरों को अपवित्राकिया तथा उनके ध्न और मूिर्ायों को लूट लिया। उस समय सुलतान महमूदकोइर् बहुत महत्त्वपूणर् शासक नहीं था, लेकिन मंदिरों को नष्ट करकेμखासतौर से सोमनाथ का मंदिरμउसने एक महान इस्लामी यो(ा के रूप में श्रेय प्राप्त करने का प्रयास किया। मध्ययुगीन राजनीतिक संस्वृफति में श्यादातरशासक अपने राजनैतिक बल व सैनिक सपफलता का प्रदशर्न पराजित शासकों के उपासना स्थलों पर आव्रफमण करके और उन्हें लूट कर करते थे। राजेन्द्र प्रथम तथा महमूद ग़्ाशनवी की नीतियाँ किन रूपों में समकालीन समय की देन थीं और किन रूपों में ये एक - दूसरे से भ्िान्न थीं? बाग, मवफबरे तथा व्िाफले मुुग़्ालों के अध्ीन वास्तुकला और अध्िक जटिल हो गइर्। बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर और विशेष रूप से शाहजहाँ, साहित्य, कला और वास्तुकला 66 में व्यक्ितगत रुचि लेते थे। अपनी आत्मकथा में बाबर ने औपचारिक बागों की योजनाओं और उनके बनाने में अपनी रुचि का वणर्न किया है। अकसर ये बाग दीवार से घ्िारे होते थे तथा वृफत्रिाम नहरों द्वारा चार भागों में विभाजित आयताकार अहाते में स्िथत थे। औपचारिक बागों की योजनाओं और उनके बनाने तथा खावफा तैयार करने में बाबर ने अपनी रुचि का वणर्न किया है। चार समान हिस्सों में बँटे होने के कारण ये चारबाग कहलाते थे। चारबाग बनाने की परंपरा अकबर के समय से शुरू हुइर्। वुफछ सवार्ध्िक सुंदर चारबागों को कश्मीर, आगरा और दिल्ली ;चित्रा 9 देखेंद्ध में जहाँगीर और शाहजहाँ ने बनवाया था। अकबर के शासनकाल में कइर् तरह केमहत्त्वपूणर् वास्तुकलात्मक नवाचार हुए। इनकी प्रेरणा अकबर के वास्तुश्िाल्िपयों ने उसके मध्य एश्िायाइर् पूवर्ज तैमूर के म.कबरों से ली। हुमायँू के म.कबरे में सबसे पहली बार दिखने वालावेंफद्रीय गुंबद, ;जो बहुत ऊँचा थाद्ध और ऊँचा मेहराबदार प्रवेशद्वार ;पिश्तकद्ध मुुगल वास्तुकला के महत्त्वपूणर् रूप बन गए।़यह मकबरा एक विशाल औपचारिक चारबाग के मध्य में स्िथत था। इसका निमार्ण ‘आठ स्वगो±’ अथवा हश्त बिहिश्त की परंपरा में हुआ था, जिसमें एक वेंफद्रीय कक्ष, आठ कमरों से घ्िारा होता था। इस इमारत का निमार्ण लाल चित्रा 10 काबुल में चारबाग का खाका बनाते बाबर की 1590 की एक चित्राकारी। ध्यान दें, वैफसे रास्ते पर एक दूसरे को काटती नहरें ,चारबाग योजना की विशेषता बनाती हैं। चित्रा 11 1562 व 1571 के बीच निमिर्त हुमायूँ का मकबरा। क्या आप नहरों को देख सकते हैं? शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान मुगल वास्तुकला के विभ्िान्न तत्त्व एक विशाल सद्भावपूणर् संश्लेषण में मिला दिए गए। शाहजहाँ के शासन में अनवरत निमार्ण कायर् चलते रहे, विशेष रूप से आगरा और दिल्ली में। सावर्जनिक और व्यक्ितगत सभा हेतु समारोह कक्षों ;दीवान - ए - खास और दीवान - ए - आमद्ध की योजना बहुत सावधानीपूवर्क बनाइर् जाती थी। एक विशाल आँगन में स्िथत ये दरबार चिहिल सुतुन अथवा चालीस खंभों के सभा भवन भी कहलाते थे। शाहजहाँ के सभा भवन विशेष रूप से मसजिद से मिलते - जुलते बनाए गए थे। उसका ¯सहासन जिस मंच पर रखा था उसे प्रायः व्िाफबला ;नमाश के दौरान मुसलमानों के सामने की दिशाद्ध कहा जाता था क्योंकि जिस समय दरबार चलता था, उस समय प्रत्येक व्यक्ित उस ओर ही मुँह करके बैठता था। इन वास्तुकलात्मक अभ्िालक्षणों का इस ओर इशारा था कि राजा पृथ्वी पर इर्श्वर का प्रतिनििा था। शाहजहाँ ने दिल्ली के लालकिले के अपने नवनिमिर्त दरबार में राजकीय न्याय और शाही दरबार के अंतःसंबंध् पर बहुत बल दिया। बादशाह के सिंहासन के पीछे पितरा - दूरा के जड़ाऊ काम की एक शंृखला बनाइर् गइर् थी, जिसमें पौराण्िाक यूनानी देवता आपिर्फयस को वीणा बजाते हुए चित्रिात किया गया था। ऐसा माना जाता था कि आपिर्फयस का संगीत आक्रामक जानवरों को भी शांत कर सकता है और वे शांतिपूवर्क एक - दूसरे के साथ रहने लगते हैं। शाहजहाँ के सावर्जनिक सभा भवन का निमार्ण यह सूचित करता था कि न्याय करते समय राजा उँफचे और निम्न सभी प्रकार के लोगों के साथ समान व्यवहार करेगा और सभी सद्भाव के साथ रह सकेंगे। शासन के आरंभ्िाक वषो± में शाहजहाँ की राजधानी आगरा थी। इस शहर में विश्िाष्ट वगो± ने अपने घरों का निमार्ण यमुना नदी के तटों पर करवाया था। इनका निमार्ण चारबाग की रचना के ही समान औपचारिक बागों के बीच में हुआ था। चारबाग वफी योजना के अंतगर्त ही अन्य तरह के बाग भी थे जिन्हें इतिहासकार ‘नदी - तट - बाग’ कहते हैं। इस तरह के बाग में निवासस्थान, चारबाग के बीच में स्िथत न होकर नदी तटों के पास बाग के बिल्वुफल किनारे पर होता था। शाहजहाँ ने अपने शासन की भव्यतम वास्तुकलात्मक उपलब्िध् ताजमहल के नक्शे में नदी - तट - बाग की योजना अपनाइर्। यहाँ स.पेफद संगमरमर का मवफबरा नदी तट के एक चबूतरे पर तथा बाग इसके दक्ष्िाण में बनाया गया था। नदी पर सभी अभ्िाजातों की पहुँच पर नियंत्राण हेतु शाहजहाँ ने इस वास्तुकलात्मक रूप को विकसित किया। दिल्ली में शाहजहँानाबाद में उसने जो नया शहर निमिर्त करवाया उसमें शाही महल नदी पर स्िथत था। केवल विश्िाष्ट वृफपा प्राप्त अभ्िाजातों, जैसेμउसके बड़े बेटे दाराश्िाकोह को ही नदी चित्रा 13 आगरा का ताजमहल, जिसका निमार्ण 1643 में पूरा हुआ। ेफ दोनों तटों पर फ शाहजहाँनाबाद की योजना एक नक्शे से आगरा के नदी तट - बाग - शहर का पुनवर्फल्िपत दृश्य। ध्यान दें कि वैफसे यमुना वअभ्िाजातों के बाग - महल स्िथत हैं। ताजमहल बाईं ओर है। चित्रा 15 में दी गइर् दिल्ली वेकी तुलना आगरा की योजना से करें। चित्रा 15 1850 का शाहजहाँनाबाद का एक नक्शा। बादशाह का निवास कहाँ है? शहर का.पफी घना बसा हुआ लगता है, लेकिन क्या आपको यहाँ कइर् बड़े बाग भी दिखाइर् देते हैं? क्या आप मुख्य मागर् व जामी मसजिद ढूँढ सकते हैं? तक पहुँच मिली थी। अन्य सभी को अपने घरों का निमार्ण यमुना नदी से दूर, शहर में करवाना पड़ता था। क्षेत्रा व साम्राज्य आठवीं व अठारहवीं शताब्िदयों के बीच जब निमार्ण संबंध्ी गतिविध्ियों में बढ़ोतरी हुइर्, तो विभ्िान्न क्षेत्रों के बीच विचारों का भी पयार्प्त आदान - प्रदान हुआ। एक क्षेत्रा की परंपराएँ दूसरे क्षेत्रा द्वारा अपनाइर् गईं। उदाहरण के लिए, विजयनगर में राजाओं की गजशालाओं पर बीजापुर और गोलवुंफडा जैसी आस - पास की सल्तनतों की वास्तुकलात्मक शैली का बहुत प्रभाव पड़ा था ;अध्याय 6 देखेंद्ध। मथुरा के निकट स्िथत वृंदावन में बने मंदिरों की वास्तुकलात्मक शैली पफतेहपुर सीकरी के मुगल महलों से बहुत मिलती - जुलती थी।़विशाल साम्राज्यों के निमार्ण ने विभ्िान्न क्षेत्रों को उनके शासन के अधीन ला दिया। इससे कलात्मक रूपों व वास्तुकलात्मक शैलियों के परसंसेचन में मदद मिली। मुगल शासक अपने भवनों के निमार्ण में क्षेत्राीय वास्तुकलात्मक़शैली अपनाने में विशेष रूप से दक्ष थे। उदाहरण के लिए, बंगाल में स्थानीय शासकों ने छप्पर की झांेपड़ी के समान दिखने वाली छत का निमार्ण करवाया। मुगलों को यह ‘बंाग्ला गुंबद’ ;अध्याय 9 में चित्रा 11 और 12़देखेंद्ध इतना पसंद आया था कि उन्होंने अपनी वास्तुकला में इसका प्रयोग किया। अन्य क्षेत्रों का प्रभाव भी स्पष्ट था। अकबर की राजधनी पफतेहपुर सीकरी की कइर् इमारतों पर गुजरात व मालवा की वास्तुकलात्मक शैलियों का प्रभाव दिखता है। 71 चित्रा 16 वृंदावन में गोविंददेव के मंदिर का अंदरूनी भाग, 1590 इस मंदिर का निमार्ण लाल बलुआ पत्थर से हुआ था। दो ;चार में सेद्ध प्रतिच्छेदी मेहराबों पर ध्यान दें, जिनसे इसकीऊँची भीतरी छत का निमार्ण किया था। वास्तुकला की यह शैलीउत्तर - पूवीर् इर्रान ;खुरासानद्ध से आइर् और पफतेहपुर सीकरी में इसका प्रयोग किया गया था। अठारहवीं शताब्दी से मुग़्ाल शासकों की सत्ता के ध्ूमिल हो जाने के बाद भी उनके आश्रय में विकसित वास्तुकलात्मक शैली निरंतर प्रयोग में रही तथा अन्य शासकों ने, जब भी स्वयं के राज्य स्थापित करने के प्रयास किए, यह शैली अपनाइर्। चित्रा 17 पफतेहपुर सीकरी के जोधबाइर् महल में छत के विस्तार को संभालतेअलंकृत स्तंभ तथा टेक। ये गुजरात क्षेत्रा की वास्तुकलात्मक परंपराओं से प्रभावित हैं। आसमान छूते चचर् बारहवीं शताब्दी से प्रफांस में आरंभ्िाक भवनों की तुलना मेंअध्िक ऊँचे व हलके चचो± के निमार्ण के प्रयास शुरू हुए। वास्तुकला की यह शैली ‘गोथ्िाक’ नाम से जानी जाती है।इस शैली की विश्िाष्टताएँ हैंμनुकीले ऊँचे मेहराब, रंगीन काँच का प्रयोग, जिसमें प्रायः बाइबिल से लिए गए दृश्यों का चित्राण है तथा उड़ते हुए पुश्ते। दूर से ही दिखने वालीऊँची मीनारें और घंटी वाले बुशर् बाद में चचर् से जुडे़। इस वास्तुकलात्मक शैली के सवार्ेत्वृफष्ट ज्ञात उदाहरणों में से एक पेरिस का नाट्रेडम चचर् है। बारहवीं और तेरहवीं शताब्िदयों के कइर् दशकों में इसका निमार्ण हुआ। चित्रा पर एक नशर डालें और घंटी वाले बुजो± को पहचानने की कोश्िाश करें। अन्यत्रा आप एक श्िाल्पकार हैं और शमीन से पचास मीटर कीऊँचाइर् पर बाँस और रस्सी की सहायता से बनाए गए लकड़ी के एक छोटे से प्लेटपफाॅमर् पर खड़े हैं। आपको वुफत्बमीनार के पहले छज्जे के नीचे एक अभ्िालेख़लगाना है। आप यह कायर् वैफसे करेेंगे? 2. ‘श्िाखर’ से आपका क्या तात्पयर् है? 3. ‘पितरा - दूरा’ क्या है? 4.एक मुगल चारबाग की क्या खास विशेषताएँ हैं?़5. किसी मंदिर से एक राजा की महत्ता की सूचना वैफसे मिलती थी? 6.दिल्ली में शाहजहाँ के दीवान - ए - खास में एक अभ्िालेख में कहा गया हैμ ‘अगर पृथ्वी पर कहीं स्वगर् है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है?’ यह धरणा वैफसे बनी? 7.मुगल दरबार से इस बात का वैफसे संकेत मिलता था कि बादशाह से ध्नी,़निध्र्न, शक्ितशाली, कमशोर सभी को समान न्याय मिलेगा? 8.शाहजहाँनाबाद में नए मुगल शहर की योजना में यमुना नदी की क्या़भूमिका थी? आइए विचार करें 9.आज ध्नी और शक्ितशाली लोग विशाल घरों का निमार्ण करवाते हैं। अतीत में राजाओं तथा उनके दरबारियों के निमार्ण किन मायनों में इनसे भ्िान्न थे? 10.चित्रा 4 पर नशर डालें। यह इमारत आज वैफसे तेशी से बनवाइर् जा सकती है? आइए करके देखें 11.पता लगाएँ कि क्या आपके गाँव या कस्बे में किसी महान व्यक्ित की कोइर् प्रतिमा अथवा स्मारक है? इसे वहाँ क्यों स्थापित किया गया था? इसका प्रयोजन क्या है? 12.अपने आस - पास के किसी पावर्फ या बाग की सैर करके उसका वणर्न करें। किन मायनों में ये मुग़्ाल बागों के समान अथवा भ्िान्न हैं?

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