मध्यकाल में किसी भी शासक के लिए भारतीय उपमहाद्वीप जैसे बड़े क्षेत्रा पर, जहाँ लोगों एवं संस्वृफतियों में इतनी अध्िक विविध्ताएँ हो, शासन कर पाना अत्यंत ही कठिन कायर् था। अपने पूवर्वतिर्यों के विपरीत मुग़्ालों ने एक साम्राज्य की स्थापना की और वह कायर् पूरा किया, जो अब तक केवलछोटी अवध्ियों के लिए ही संभव जान पड़ता था। सोलहवीं सदी के उत्तराधर् से, इन्होंने दिल्ली और आगरा से अपने राज्य का विस्तार शुरू किया और सत्राहवीं शताब्दी में लगभग संपूणर् महाद्वीप पर अध्िकार प्राप्त कर लिया। उन्होंने प्रशासन के ढाँचे तथा शासन संबंध्ी जो विचार लागू किए, वे उनके राज्य के पतन के बाद भी टिके रहे। यह एक ऐसी राजनैतिक धरोहर थी, जिसके प्रभाव से उपमहाद्वीप में उनके पश्चात् आने वाले शासक अपने को अछूता न रख सवेंफ। आज भारत के प्रधानमंत्राी, स्वतंत्राता दिवस पर मुग़्ाल शासकों के निवासस्थान, दिल्ली के लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोिात करते हैं। चित्रा 1 लालकिला क्या यह चित्रा दिखाता हैकि मुगल राजत्व का दावा़जन्मसि( अध्िकार केरूप में करते थे? मुगल कौन थे?़मुग़्ाल दो महान शासक वंशों के वंशज थे। माता की ओर से वे चीन और मध्य एश्िाया के मंगोल शासक चंगेश ख़ान ;जिसकी मृत्यु 1227 में हुइर्द्ध वेफ़उत्तराध्िकारी थे। पिता की ओर से वे इर्रान, इराक एवं वतर्मान तुकीर् के शासक तैमूर ;जिसकी मृत्यु 1404 में हुइर्द्ध के वंशज थे। परंतु मुग़्ाल अपने को मुग़्ाल या मंगोल कहलवाना पसंद नहीं करते थे। ऐसा इसलिए था, क्योंकि चंगेश ख़ान से जुड़ी स्मृतियाँ संैकड़ों व्यक्ितयों के नरसंहार से संबंध्ित थीं।़यही स्मृतियाँ मुगलों के प्रतियोगियों उशबेगों से भी संबंध्ित थीं। दूसरी तरप़्ाफ,़मुग़्ाल, तैमूर के वंशज होने पर गवर् का अनुभव करते थे, श्यादा इसलिए क्योंकि उनके इस महान पूवर्ज ने 1398 में दिल्ली पर कब्शा कर लिया था। चित्रा 2तैमूर, उसके उत्तराध्िकारी और मुग़ल सम्राटों का एक लघुचित्रा ;1702 - 12द्ध। मध्य में तैमूर है और उसकी दाहिने ओर उसका पुत्रा मीरन शाह ;जो प्रथम मुगल सम्राट़बाबर का लकड़दादा थाद्ध और उसके बाद अबु सेद ;बाबर के दादाद्ध, तैमूर की बायींओर सुलतान मोहम्मद मिशार् ;बाबर के परदादाद्ध और उमर शेख ;बाबर के पिताद्ध हैं। तैमूर की दाहिनी ओर तीसरे, चैथे और पाँचवे व्यक्ित मुग़्ाल सम्राट बाबर, अकबर औरशाहजहाँ हैं और उसकी दायीं ओर उसी व्रफम से हुमायूँ, जहाँगीर और औरंगशेब हैं। उन्होंने अपनी वंशावली का प्रदशर्न चित्रा बनवाकर किया। प्रत्येक मुग़्ाल शासक ने तैमूर के साथ अपना चित्रा बनवाया। चित्रा 1 को देख्िाए, जो तैमूर और मुगलों की समूह में तसवीर प्रस्तुत करता है।़मुगल सैन्य अभ्िायाऩप्रथम मुग़्ाल शासक बाबर ;1526 - 1530द्ध ने जब1494 में पफरघाना राज्य का उत्तराध्िकार प्राप्त किया, तो उसकी उम्र केवल बारह वषर् की थी। मंगोलों की दूसरी शाखा, उशबेगों के आक्रमण के कारण उसे अपनी पैतृक गद्दी छोड़नी पड़ी। अनेक वषो± तक भटकने के बाद उसने 1504 में काबुल पर कब्शा कर लिया। उसने 1526 में दिल्ली के सुलतान इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराया और दिल्ली और आगरा को अपने कब्शे में कर लिया। तालिका 1 में मुग़्ालों के प्रमुख सैन्य अभ्िायानों को दिखाया गया है। इसे ध्यान से पढि़ए। क्या आपइस लंबे घटनाक्रम में कोइर् पुनरावृिा ढूँढ सकते हैं? उदाहरण के लिए आप यह गौर करेंगे कि अ.पफगान, मुग़्ाल सत्ता के लिए तात्कालिक खतरा थे। मुग़्ालों और अहोम ;अध्याय 7द्ध, सिक्खों ;अध्याय 8 और 10द्ध एवं मेवाड़ और मारवाड़ ;अध्याय 9द्ध के संबंधों पर भी गौर करें। सपफाविद इर्रान से अकबऱऔर हुमायूँ के संबंधों में क्या अंतर था? क्या औरंगशेब के शासनकाल में गोलवुंफडा और बीजापुर के अिाग्रहण से दक्कन में यु( का अंत हो पाया? चित्रा 4 सोलहवीं शताब्दी के यु(ों में तोप और गोलाबारी का पहली बार इस्तेमाल हुआ। बाबर ने इनका पानीपत की पहली लड़ाइर् में प्रभावी ढंग से प्रयोग किया। चित्रा 3 मुगल प़्ाफौज अभ्िायान पऱतालिका 1 मुग़्ाल सम्राट प्रमुख अभ्िायान और घटनाएँ बाबर 1526 - 1530 ने 1526 में पानीपत के मैदान में इब्राहिम लोदी एवं उसके अ.पफगान समथर्कों को हराया। 1527 में खानुवा में राणा सांगा, राजपूत राजाओं और उनके समथर्कांे को हराया। 1528 में चंदेरी में राजपूतों को हराया। अपनी मृत्यु से पहले दिल्ली और आगरा में मुगल नियंत्राण स्थापित किया।़हुमायूँ 1530 - 1540 एवं 1555 - 1556 ;1द्धहुमायूँ ने अपने पिता की वसीयत के अनुसार जायदाद का बँटवारा किया। प्रत्येक भाइर् को एक एक प्रांत मिला। उसके भाइर् मिशार् कामरान की महत्त्वाकाँक्षाओं के कारण हुमायूँ अपने अ.पफग्.ाान प्रतिद्वंद्वियों के सामने पफीका पड़ गया। शेर खान ने हुमायूँ को दो बार हरायाμ1539 में चैसा में और 1540 में कन्नौज में। इन पराजयों ने उसे इर्रान की ओर भागने को बाध्य किया। ;2द्धइर्रान में हुमायूँ ने सप़्ाफाविद शाह की मदद ली। उसने 1555 में दिल्ली पर पुनः कब्शा कर लिया परंतु उससे अगले वषर् इस इमारत में एक दुघर्टना में उसकी मृत्यु हो गयी। अकबर 1556 - 1605 13 वषर् की अल्पायु में अकबर सम्राट बना।उसके शासनकाल को तीन अवध्ियों में विभाजित किया जा सकता है।;1द्ध1556 और 1570 के मध्य अकबर अपने संरक्षक बैरम ख़ान और अपने घरेलूकमर्चारियों से स्वतंत्रा हो गया। उसने सूरी और अन्य अ.पफगानों, निकटवतीर् राज्योंमालवा और गोंडवाना तथा अपने सौतेले भाइर् मिशार् हा.िवफम और उशबेगों के विद्रोहोंको दबाने के लिए सैन्य अभ्िायान चलाए। 1568 में सिसौदियों की राजधनीचित्तौड़ और 1569 में रणथम्भौर पर कब्शा कर लिया गया।;2द्ध1570 और 1585 के मध्य गुजरात के विरु( सैनिक अभ्िायान हुए। इनअभ्िायानों के पश्चात् उसने पूवर् में बिहार, बंगाल और उड़ीसा में अभ्िायान चलाए,जिन्हें 1579 - 80 में मिशार् हाव्िाफम के पक्ष में हुए़ विद्रोह ने और जटिल कर दिया।;3द्ध1585 - 1605 के मध्य अकबर के साम्राज्य का विस्तार हुआ। उत्तर - पश्िचममें अभ्िायान चलाए गए। सपफाविदों को हराकर कांधर पर कब्शा किया गया औऱकश्मीर को भी जोड़ लिया गया। मिशार् हाव्िाफम की मृत्यु के पश्चात् काबुल कोभी उसने अपने राज्य मंे मिला लिया। दक्कन में अभ्िायानों की शुरुआत हुइर् औरबरार, खानदेश और अहमदनगर के वुफछ हिस्सों को भी उसने अपने राज्य में मिलालिया। अपने शासन के अंतिम वषो± में अकबर की सत्ता राजवुफमार सलीम केविद्रोहों के कारण लड़खड़ायी। यही सलीम आगे चलकर सम्राट जहाँगीर कहलाया। जहाँगीर 1605 - 1627 जहाँगीर ने अकबर के सैन्य अभ्िायानों को आगे बढ़ाया। मेवाड़ के सिसोदिया शासक अमर सिंह ने मुगलों की सेवा स्वीकार की। इसके बाद सिक्खों, अहोमों़और अहमदनगर के ख्िालापफ अभ्िायान चलाए गए, जो पूणर्तः सपफल नहीं हुए।़जहाँगीर के शासन के अंतिम वषो± में राजवुफमार खुरर्म, जो बाद में सम्राट शाहजहाँ कहलाया, ने विद्रोह किया। जहाँगीर की पत्नी नूरजहाँ ने शाहजहाँ को हाश्िाए पर धकेलने के प्रयास किए, जो असपफल रहे। शाहजहाँ 1627 - 1658 दक्कन में शाहजहाँ के अभ्िायान जारी रहे। अ.पफगान अभ्िाजात खान जहान लोदी ने विद्रोह किया और वह पराजित हुआ। अहमदनगर के विरु( अभ्िायान हुआजिसमें बंुदेलों की हार हुइर् और ओरछा पर कब्शा कर लिया गया। उत्तर - पश्िचम में बल्ख पर कब्शा करने के लिए उशबेगों के विरु( अभ्िायान हुआ जो असपफल रहा। परिणामस्वरूप कांधर सपफाविदों के हाथ में चला गया। 1632 में अंततः़अहमदनगर को मुग़्ालों के राज्य में मिला लिया गया और बीजापुर की सेनाओं ने सुलह के लिए निवेदन किया। 1657 - 58 में शाहजहाँ के पुत्रांे के बीचउत्तरािाकार को लेकर झगड़ा शुरू हो गया। इसमें औरंगशेब की विजय हुइर् और दारा श्िाकोह समेत उसके तीनों भाइयों को मौत के घाट उतार दिया गया। शाहजहाँ को उसकी शेष िांदगी के लिए आगरा में वैफद कर दिया गया। औरंगशेब 1658 - 1707;1द्ध 1663 में उत्तर - पूवर् में अहोमों की पराजय हुइर् परंतु उन्होंने 1680 में पुनः विद्रोह कर दिया। उत्तर - पश्िचम में यूसपफशइर् और सिक्खों के विरु( अभ्िायानों को अस्थायी सपफलता मिली। मारवाड़ के राठौड़ राजपूतों ने मुगलों के ख्िाला.पफ विद्रोह किया। इसका कारण था उनकी आंतरिक राजनीति़और उत्तराध्िकार के मसलों में मुुग़्ालों वफा हस्तक्षेप। मराठा सरदार, श्िावाजी के विरु( मुगल अभ्िायान प्रारंभ में सपफल रहे। परंतु औरंगशेब ने श्िावाजी का अपमान किया़और श्िावाजी आगरा स्िथत मुुग़्ाल वैफदखाने से भाग निकले। उन्होंने अपने को स्वतंत्रा शासक घोष्िात करने के पश्चात् मुुगलों के विरु( पुनः अभ्िायान चलाए।़राजवुफमार अकबर ने औरंगशेब के विरु( विद्रोह किया, जिसमें उसे मराठों और दक्कन की सल्तनत का सहयोग मिला। अन्ततः वह सप़्ाफाविद इर्रान भाग गया। ;2द्ध अकबर के विद्रोह के पश्चात् औरंगशेब ने दक्कन के शासकों के विरु( सेनाएँ भेजी। 1685 में बीजापुर और 1687 में गोलवुंफडा को मुग़्ालों ने अपने राज्य में मिला लिया। 1698 में औरंगशेब ने दक्कन में मराठों, जो छापामार प(ति का उपयोगकर रहे थे, के विरु( अभ्िायान का प्रबंध् स्वयं किया। औरंगशेब को उत्तर भारत मेंसिक्खों, जाटों और सतनामियों, उत्तर - पूवर् में अहोमों और दक्कन में मराठों के विद्रोहों का सामना करना पड़ा। उसकी मृत्यु के पश्चात् उत्तराध्िकार के लिए यु( शुरू हो गया। ़उत्तराध्िकार की मुगल पंरपराएँ मुगल ज्येष्ठाध्िकार के नियम में विश्वास नहीं करते थे जिसमें ज्येष्ठ पुत्रा़अपने पिता के राज्य का उत्तराध्िकारी होता था। इसके विपरीत, उत्तरािाकार में वे सहदायाद की मुगल और तैमूर वंशों की प्रथा को अपनाते थे जिसमें़उत्तराध्िकार का विभाजन समस्त पुत्रों में कर दिया जाता था। तालिका 1 में दिए गए रंगीन उ(रणों को पढि़ए और मुग़्ाल राजवुफमारों के विद्रोहों से जुड़ेप्रमाणों पर गौर कीजिए। आपके अनुसार उत्तराध्िकार का कौन - सा तरीका सही थाμज्येष्ठाध्िकार या सहदायाद? ़मुगलों के अन्य शासकों के साथ संबंध् तालिका 1 को पिफर से देखें। आप पाएँगे कि मुगलों ने उन शासकों वेफ़विरु( लगातार अभ्िायान किए, जिन्होंने उनकी सत्ता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। जब मुगल शक्ितशाली हो गए तो अन्य कइर् शासकों ने़स्वेच्छा से उनकी सत्ता स्वीकार कर ली। राजपूत इसका एक अच्छा उदाहरण हैं। अनेकों ने मुग़्ाल घराने में अपनी पुत्रिायों के विवाह करके उच्च पद प्राप्त किए। परंतु कइयों ने विरोध् भी किया। सिसोदिया राजपूत लंबे समय तक मुग़्ालों की सत्ता को स्वीकार करने से इंकार करते रहे, परंतु जब वे हारे तो मुग़्ालों ने उनके साथ सम्माननीय व्यवहार किया और उन्हें उनकी जागीरें ;वतनद्ध, वतन जागीर के रूप में वापिस कर दीं। पराजित करने परंतु अपमानित न करने के बीच सावधनी से बनाए गए संतुलन की वजह से मुग़्ाल भारत के अनेक शासकों और सरदारों पर अपना प्रभाव बढ़ा पाए। परंतु इस संतुलन को हमेशा बरकरार रखना कठिन था। एक बार पिफर तालिका 1 देखें। गौर करें कि जब श्िावाजी मुगल सत्ता स्वीकार करने आए तो औरंगशेब ने उनका अपमान किया। इस ़अपमान का क्या परिणाम हुआ? मनसबदार और जागीरदार जैसे - जैसे साम्राज्य में विभ्िान्न क्षेत्रा सम्िमलित होते गए, वैसे - वैसे मुग़्ालों ने तरह - तरह के सामाजिक समूहों के सदस्यों को प्रशासन में नियुक्त करना आरंभ किया। शुरू - शुरू में श्यादातर सरदार, तुवफीर् ;तूरानीद्ध थे, लेकिन अब इस छोटे समूह के साथ - साथ उन्होंने शासक वगर् में इर्रानियों, भारतीय ़मुसलमानों, अपफगानों, राजपूतों, मराठों और अन्य समूहों को सम्िमलित किया। मुगलों की सेवा में आने वाले नौकरशाह ‘मनसबदार’ कहलाए। ‘मनसबदार’ शब्द का प्रयोग ऐसे व्यक्ितयों के लिए होता था, जिन्हें कोइर् मनसब यानी कोइर् सरकारी हैसियत अथवा पद मिलता था। यह मुगलों द्वारा़चलाइर् गइर् श्रेणी व्यवस्था थी, जिसके शरिए ;1द्ध पदऋ ;2द्ध वेतनऋ एवं ;3द्धसैन्य उत्तरदायित्व, निधार्रित किए जाते थे। पद और वेतन का निधार्रण जात की संख्या पर निभर्र था। जात की संख्या जितनी अिाक होती थी, दरबार में अभ्िाजात की प्रतिष्ठा उतनी ही बढ़ जाती थी और उसका वेतन भी उतना ही अध्िक होता था। जो सैन्य उत्तरदायित्व मनसबदारों को सौंपे जाते थे उन्हीं के अनुसार उन्हें घुड़सवार रखने पड़ते थे। मनसबदार अपने सवारों को निरीक्षण के लिए लाते थे। वे अपने सैनिकों के घोड़ों को दगवाते थे एवं सैनिकांे का पंजीकरण करवाते थे। इन कायर्वाहियों के बाद ही उन्हें सैनिकों को वेतन देने के लिए धन मिलता था। मनसबदार अपना वेतन राजस्व एकत्रिात करने वाली भूमि के रूप में पाते थे, जिन्हें जागीर कहते थे और जो तकरीबन ‘इ ़क्ताओं’ के समान थीं। परंतु चित्रा 5 अपने सवारों के साथ एक मनसबदार अभ्िायान पर चित्रा 6 शाहजहाँ के राज - काल के एक लघु चित्रा के ब्यौरे। यहाँ जहाँगीर के समय के भ्रष्टाचार को दिखाया गया हैμ;1द्ध भ्रष्ट अ.पफसर रिश्वत लेते हुएऋ ;2द्ध एक कर अध्िकारी गरीब किसानों को सशा देते हुए। हमारे अतीत 52 ़जागीरों पर नहीं रहते थे और न ही उनपर प्रशासन करते थे। उनके पास अपनीजागीरों से केवल राजस्व एकत्रिात करनेका अिाकार था। यह राजस्व उनकेनौकर उनके लिए एकत्रिात करते थे,जबकि वे स्वयं देश के किसी अन्य भाग में सेवारत रहते थे। मनसबदार, मुक्ितयों से भ्िान्न, अपने अकबर के शासनकाल में इन जागीरोंका सावधानीपूवर्क आकलन किया जाताथा, ताकि इनका राजस्व मनसबदार के वेतन के तवफरीबन बराबर रहेे।औरंगशेब के शासनकाल तक पहुँचते - पहँुचते स्िथति बदल गइर्। अब प्राप्तराजस्व, मनसबदार के वेतन से बहुत कम था। मनसबदारों की संख्या में भीअत्यिाक वृि हुइर्, जिसके कारण उन्हें जागीर मिलने से पहले एक लंबाइंतजार करना पड़ता था। इन सभी कारणों से जागीरों की संख्या में कमी होगइर्। पफलस्वरूप कइर् जागीरदार, जागीर रहने पर यह कोश्िाश करते थे कि वेजितना राजस्व वसूल कर सवेंफ, कर लें। अपने शासनकाल के अंतिम वषो± मंेऔरंगशेब इन परिवतर्नों पर नियंत्राण नहीं रख पाया। इस कारण किसानों कोअत्यध्िक मुसीबतों का सामना करना पड़ा। शब्त और शमीदार ालों की आमदनी का प्रमुख साधन किसानों की उपज से मिलने वाला राजस्व था। अिाकतर स्थानों पर किसान ग्रामीण वुफलीनों यानी कि मुख्िाया या स्थानीय सरदारों के माध्यम से राजस्व देते थे। समस्त मध्यस्थों के लिए, चाहे वे स्थानीय ग्राम के मुख्िाया हो या पिफर शक्ितशाली सरदार हों, मुगल एक ही शब्दμशमीदारμका प्रयोग़अकबर के राजस्वमंत्राी टोडरमल ने दस साल ;1570 - 1580द्धकी कालावध्ि के लिए कृष्िा की पैदावार, कीमतों और कृष्िाभूमि का सावधानीपूवर्क सवेर्क्षण किया। इन आँकड़ों केआधार पर, प्रत्येक पफसल पर नकद के रूप में कर ;राजस्वद्ध़निश्िचत कर दिया गया। प्रत्येक सूबे ;प्रांतद्ध को राजस्वमंडलों में बाँटा गया और प्रत्येक की हर प़्ाफसल के लिएराजस्व दर की अलग सूची बनायी गइर्। राजस्व प्राप्त करने की इस व्यवस्था को ‘शब्त’ कहा जाता था। यह व्यवस्था उन स्थानों पर प्रचलितथी जहाँ पर मुगल प्रशासनिक अिाकारी भूमि का निरीक्षण कर सकते थे़और सावधानीपूवर्क उनका हिसाब रख सकते थे। ऐसा निरीक्षण गुजरात औरबंगाल जैसे प्रांतों में संभव नहीं हो पाया। वुफछ क्षेत्रों में शमीदार इतने शक्ितशाली थे कि मुगल प्रशासकों द्वारा़शोषण किए जाने की स्िथति में वे विद्रोह कर सकते थे। कभी - कभी एक हीजाति के शमीदार और किसान मुगल सत्ता के ख्िाला.़पफ मिलकर विद्रोह करदेते थे। सत्राहवीं शताब्दी के आख्िार से ऐसे किसान विद्रोहों ने मुगल साम्राज्य़के स्थायित्व को चुनौती दी। अकबर की नीतियाँ μ नशदीक से एक नशर प्रशासन के मुख्य अभ्िालक्षण अकबर ने निधर्रित किए थे और इनका विस्तृतवणर्न अबुल .पफश्ल की अकबरनामा, विशेषकर आइने - अकबरी में मिलता है।अबुल .पफश्ल के अनुसार साम्राज्य कइर् प्रांतों में बँटा हुआ था, जिन्हें ‘सूबा’कहा जाता था। सूबों के प्रशासक ‘सूबेदार’ कहलाते थे, जो राजनैतिक तथासैनिक, दोनों प्रकार के कायो± का निवार्ह करते थे। प्रत्येक प्रांत में एक वित्तीय अिाकारी भी होता था जो ‘दीवान’ कहलाताथा। कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सूबेदार को अन्य अ.पफसरों का सहयोग प्राप्त था, जैसे कि बक्शी ;सैनिक वेतनािाकारीद्ध, सदर ;धामिर्कऔर धमार्थर् किए जाने वाले कायो± का मंत्राीद्ध, पफौजदार ;सेनानायकद्ध औऱकोतवाल ;नगर का पुलिस अिाकारीद्ध का। अकबर के अभ्िाजात, बड़ी सेनाओं का संचालन करते थे और बड़ी मात्रा में वे राजस्व खचर् कर सकते थे। जब तक वे वपफादार रहे, साम्राज्य का कायऱ्सपफलतापूवर्क चलता रहा परंतु सत्राहवीं सदी के अंत तक कइर् अभ्िाजातों ने अपने स्वतंत्रा ताने - बाने बुन लिए थे। साम्राज्य के प्रति उनकी वप़्ाफादारी उनके निजी हितों के कारण कमशोर पड़ गइर् थी। 1570 में अकबर जब पफतेहपुर सीकरी में था, तो उसने उलेमा, ब्राह्मणों, जेसुइट पादरियों ;जो रोमन वैफथोलिक थेद्ध और शरदुश्त धमर् के अनुयायियों के साथ धमर् के मामलों पर चचार् शुरू की। ये चचार्एँ इबादतखाना में हुईं। अकबर की रुचि विभ्िान्न व्यक्ितयों के ध्मो± और रीति - रिवाशों में थी। इस विचार - विमशर् से अकबर की समझ बनी कि जो विद्वान धमिर्क रीति और मतांधता पर बल देते हंै, वे अकसर क‘र होते हैं। उनकी श्िाक्षाएँ प्रजा के बीच विभाजन और असामंजस्य पैदा करतीं हैं। ये अनुभव अकबर को सुलह - ए - वुफल या ‘सवर्त्रा शांति’ के विचार की ओर ले गए। सहिष्णुता की यह धारणा विभ्िान्न धमो± के अनुयायियों में अंतर नहीं करती थी अपितु 54 मतांध्ता ऐसी व्याख्या या कथन जिसे अध्िकारपूणर् कहकर यह आशा की जाए कि उस पर बिना कोइर् प्रश्न उठाए उसे स्वीकार कर लिया जाएगा। चित्रा 9 इबादतख़ाना में अकबर विभ्िान्न ध्मो± के विद्वानों के साथ चचार् करते हुए इस चित्रा में क्या आपजेसुइट पादरियों कोपहचान सकते हैं? सत्राहवीं शताब्दी में और उसके पश्चात् मुग़्ाल साम्राज्य मुग़्ाल साम्राज्य की प्रशासनिक और सैनिक वुफशलता के पफलस्वरूप आथ्िार्क और वाण्िाज्ियक समृि में वृि हुइर्। विदेशी यात्रिायों ने इसे वैसा ध्नी देश बताया, जैसा कि किस्से - कहानियों में वण्िार्त होता रहा है। परंतु यही यात्राी इसी प्रचुरता के साथ मिलने वाली दरिद्रता को देखकर विस्िमत रह गए। सामाजिक असमानताएँ सा.पफ दिखाइर् पड़ती थीं। शाहजहाँ के शासनकाल के बीसवें वषर् के दस्तावेशों से हमें पता चलता है कि ऐसे मनसबदार, जिनको उच्चतम पद प्राप्त था, वुफल 8000 में से 445 ही थे। वुफल मनसबदारों की एक छोटी संख्या 5.6 प्रतिशत को ही साम्राज्य के अनुमानित राजस्व का 61.5 प्रतिशत, स्वयं उनके व उनके सवारों के वेतन के रूप में दिया जाता था। मुगल सम्राट और उनके मनसबदार अपनी आय का बहुत बड़ा भाग वेतऩऔर वस्तुओं पर लगा देते थे। इस ख़चेर् से श्िाल्पकारों और किसानों को लाभ होता था, चूँकि वे वस्तुओं और .पफसल की पूतिर् करते थे। परंतु राजस्व का भार इतना था कि प्राथमिक उत्पादकोंμकिसान और श्िाल्पकारोंμके पास निवेश के लिए बहुत कम ध्न बचता था। इनमें से जो बहुत गरीब थे, मुश्िकल से ही पेट भर पाते थे। वे उत्पादन शक्ित बढ़ाने के लिए अतिरिक्त संसाधनों में - औशारों और अन्य वस्तुओं में - निवेश करने की बात सोच भी नहीं सकते थे। ऐसी अथर्व्यवस्था में श्यादा ध्नी किसान, श्िाल्पकारों के समूह, व्यापारी और महाजन श्यादा लाभ उठाते थे। मुगलों के वुफलीन वगर् के हाथों में बहुत ध्न और संसाधन थे, जिनवेफ़कारण सत्राहवीं सदी के अंतिम वषो± में वे अत्यिाक शक्ितशाली हो गए। जैसे - जैसे मुग़्ाल सम्राट की सत्ता पतन की ओर बढ़ती गइर्, वैसे - वैसे विभ्िान्नक्षेत्रों में सम्राट के सेवक, स्वयं ही सत्ता के शक्ितशाली वेंफद्र बनने लगे। इनमें से वुफछ ने नए वंश स्थापित किए और हैदराबाद एवं अवध् जैसे प्रांतों में अपना नियंत्राण जमाया। यद्यपि वे दिल्ली के मुगल सम्राट को स्वामी के रूप़में मान्यता देते रहे, तथापि अठारहवीं शताब्दी तक साम्राज्य के कइर् प्रांत अपनी स्वतंत्रा राजनैतिक पहचान बना चुके थे। इनके बारे में हम दसवें अध्याय में विस्तार से चचार् करेंगे। बाबर और अकबर शासक बनने के समय आपकी ही उम्र केथे। कल्पना करंे कि आपको पैतृक संपिा के रूप में एक राज्य प्राप्त होता है। आप अपने राज्य को स्थायी और समृ( वैफसे बनाएँगें? 1.सही जोड़े बनाएँ: मनसब मारवाड़ मंगोल गवर्नर सिसौदिया राजपूत उशबेग राठौर राजपूत मेवाड़ नूरजहाँ पद सूबेदार जहाँगीर 2.रिक्त स्थान भरें: ;कद्ध अकबर के सौतेले भाइर्, मिशार् हाकिम के राज्य की राजधानी थी ;खद्ध दक्कन वफी पाँचों सल्तनत बरार, खानदेश, अहमद नगर, और थीं। ;गद्ध यदि जात एक मनसबदार के पद और वेतन का द्योतक था, तो सवार उसके को दिखाता था। ़;घद्ध अकबर के दोस्त और सलाहकार, अबुल पफश्ल ने उसकी के विचार को गढ़ने में मदद की जिसके द्वारा वह विभ्िान्न धमो±, संस्वृफतियों और जातियों से बने समाज पर राज्य कर सका। 3.मुगल राज्य के अधीन आने वाले वेंफद्रीय प्रांत कौन - से थे?़4.मनसबदार और जागीर में क्या संबंध था। आइए समझें 5.मुुग़्ाल प्रशासन में शमींदार की क्या भूमिका थी? 6.शासन - प्रशासन संबंध्ी अकबर के विचारों के निमार्ण में धमिर्क विद्वानों सेहोने वाली चचार्एँ कितनी महत्त्वपूणर् थीं? 7.मुुग़्ालों ने खुद को मंगोल की अपेक्षा तैमूर के वंशज होने पर क्यों बल दिया? तक शरूरी थी? 9.मुग़्ालों के लिए केवल तूरानी या इर्रानी ही नहीं, बल्िक विभ्िान्न पृष्ठभूमि केमनसबदारों की नियुक्ित क्यों महत्त्वपूणर् थी? 10.मुगल साम्राज्य के समाज की ही तरह वतर्मान भारत, आज भी अनेक़सामाजिक और संास्कृतिक इकाइयों से बना हुआ है? क्या यह राष्ट्रीय एकीकरण के लिए एक चुनौती है? 11.मुगल साम्राज्य की अथर्व्यवस्था के लिए कृषक अनिवायर् थे। क्या आप सोचते़हैं कि वे आज भी इतने ही महत्त्वपूणर् हैं? क्या आज भारत में अमीर और ़गरीब के बीच आय का पफासला मुगलों के काल की अपेक्षा कहीं अिाक बढ़ गया है? 12.मुगल साम्राज्य का उपमहाद्वीप के विभ्िान्न क्षेत्रों पर अनेक तरह से प्रभाव़पड़ा। पता लगाइए कि जिस नगर, गाँव अथवा क्षेत्रा में आप रहते हैं, उस पर इसका कोइर् प्रभाव पड़ा था?

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