मानचित्रा 1 तेरहवीं - चैदहवीं सदी में दिल्ली सल्तनत के वुफछ चुने हुए शहर। हमने अध्याय 2 में देखा कि कावेरी डेल्टा जैसे क्षेत्रा बड़े राज्यों के वेंफद्र बन गये थे। क्या आपने गौर किया कि अध्याय 2 में ऐसे किसी राज्य का िाक्र नहीं है जिसकी राजधानी दिल्ली रही हो? इसकी वजह यह है कि दिल्लीमहत्त्वपूणर् शहर बारहवीं शताब्दी में ही बना। तालिका 1 पर नशर डालिए। पहले पहल तोमर राजपूतों के काल में दिल्ली किस साम्राज्य की राजधानी बनी। बारहवीं सदी के मध्य में तोमरों को अजमेर के चैहानों ;जिन्हें चाहमान नाम से भी जाना जाता हैद्ध ने परास्त किया। तोमरोंऔर चैहानों के राज्यकाल में ही दिल्ली वाण्िाज्य का एक महत्त्वपूणर् वेंफद्र बन गया। इस शहर में बहुत सारे समृिशाली जैन व्यापारी रहते थे जिन्होंने अनेक मंदिरों का निमार्ण करवाया। यहाँ देहलीवाल कहे जाने वाले सिक्के भी ढाले जाते थे जो का.पफी प्रचलन में थे। तेरहवीं सदी के आरंभ में दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुइर् और इसके साथ दिल्ली एक ऐसी राजधनी में बदल गइर् जिसका नियंत्राण इस उपमहाद्वीप के बहुत बड़े क्षेत्रा पर पैफला था। तालिका 1 पर पिफर से नशर डालिए और उन पाँच वंशों की पहचान कीजिए जिनसे मिलकर दिल्ली की सल्तनत बनी। जिस इलाके को हम आज दिल्ली के नाम से जानते हैं, वहाँ इन सुलतानों ने अनेक नगर बसाए। मानचित्रा 1 को देखकर देहली - ए वुफह्ना, सीरी और जहाँपनाह को पहचानिए। दिल्ली के सुलतानों के बारे में जानकारी μ वैफसे? हालाँकि अभ्िालेख, सिक्कों और स्थापत्य ;भवन निमार्ण कलाद्ध के माध्यमसे कापफी सूचना मिलती है, मगर और भी महत्त्वपूणर् वे ‘इतिहास’, तारीख़;एकवचनद्ध / तवारीख ;बहुवचनद्ध हैं जो सुलतानों के शासनकाल में, प्रशासनकी भाषा पफारसी में लिखे गए थे।़12 चित्रा 1 पांडुलिपि को तैयार करने के चार चरणः 1.कागश तैयार करना 2.लेखन - कायर्3.महत्त्वपूणर् शब्दों और अनुच्छेदांे की ओर ध्यान आकष्िार्त करने के लिए सोने को पिघला कर उसका प्रयोग 4.जिल्द तैयार करना क्या आपको लगता है कि न्याय - चक्र राजा और प्रजा के बीच के संबंध् को समझाने के लिए उपयुक्त शब्द है? तवारीख के लेखक सचिव, प्रशासक, कवि और दरबारियों जैसे सुश्िाक्ष्िात व्यक्ित होते थे जो घटनाओं का वणर्न भी करते थे और शासकों को प्रशासनसंबंध्ी सलाह भी देते थे। वे न्यायसंगत शासन के महत्त्व पर बल देते थे। ये वुफछ और बातें ध्यान में रखें: ;1द्ध तवारीख के लेखक नगरों में ;विशेषकर दिल्ली मेंद्ध रहते थे, गाँव में शायद ही कभी रहते हों। ;2द्ध वे अकसर अपने इतिहास सुलतानों के लिए, उनसे ढेर सारे इनाम - इकराम पाने की आशा में लिखा करते थे। ;3द्ध ये लेखक अकसर शासकों को जन्मसि( अिाकार और लिंगभेद पर आधरित ‘आदशर्’ समाज व्यवस्था बनाए रखने की सलाह देते थे। उनके विचारों से सारे लोग सहमत नहीं होते थे। सन् 1236 में सुलतान इल्तुतमिश की बेटी रिाया सिंहासन पर बैठी। उस युग के इतिहासकार मिन्हाज - ए - सिराज ने स्वीकार किया है कि वह अपने सभी भाइयों से अध्िक योग्य और सक्षम थी, लेकिन पिफर भी वह एक रानी को शासक के रूप में मान्यता नहीं दे पा रहा था। दरबारी जन भी उसके स्वतंत्रा रूप से शासन करने की कोश्िाशों से प्रसन्न नहीं थे। सन् 1240 में उसे सिंहासन से हटा दिया गया। जन्मसि( अध्िकारजन्म के आधर परविशेषाध्िकार का दावा।उदाहरण के लिए, लोगमानते थे कि वुफलीनव्यक्ितयों को, वुफछ खासपरिवारों में जन्म लेने केकारण शासन करने काअध्िकार विरासत मेंमिलता है। लिंगभेदस्ित्रायों तथा पुरुषों केबीच सामाजिक तथाशरीर - रचना संबंध्ी अंतर।आमतौर पर यह तवर्फदिया जाता है कि ऐसेअंतर के कारण पुरुषस्ित्रायों की तुलना में श्रेष्ठहोते हैं। दिल्ली सल्तनत का विस्तार μ गैरिसन शहर से साम्राज्य तक मानचित्रा 2 शमसुद्दीन इल्तुतमिश द्वारा जीते गए प्रमुख शहर भीतरी प्रदेश किसी शहर या बंदरगाह के आस - पास के इलाके जो उस शहर के लिए वस्तुओं और सेवाओं की पूतिर् करें। गैरिसन शहर विफलेबंद बसाव जहाँ सैनिक रहते हैं। हमारे अतीत तेरहवीं शताब्दी के आरंभ्िाक वषो± में दिल्ली के सुलतानों का शासन गैरिसनों ;रक्षक सैनिकों की टुकडि़योंद्ध के निवास के लिए बने मशबूत किलेबंद शहरों से परे शायद ही कभी पैफला हो। शहरों से संब(, लेकिन उनसे दूर भीतरी प्रदेशों पर उनका नियंत्राण न के बराबर था और इसलिए उन्हें आवश्यक सामग्री, रसद आदि के लिए व्यापार, कर या लूटमार पर ही निभर्र रहना पड़ता था। दिल्ली से सुदूर बंगाल और सिंध् के गैरिसन शहरों का नियंत्राण बहुत ही कठिन था। बगावत, यु(, यहाँ तक कि खराब मौसम से भी उनसे संपवर्फ के नाशुक सूत्रा छिन्न - भ्िान्न हो जाते थे। शासन को अपफगानिस्तान से़आनेवाले हमलावरों और उन सूबेदारों से बराबर चुनौती मिलती रहती थी, जो शरा - सी कमशोरी का आभास मिलते ही विद्रोह का झंडा खड़ा कर देते थे। इन चुनौतियों के चलते सल्तनत बड़ी मुश्िकल से किसी तरह अपने आपको बचाए हुए थी। इसका विस्तार हुआ गयासुद्दीन बलबन, अलाउद्दीन ख़लजी़और मुहम्मद तुगलव़्ाफ़ के राज्यकाल में। सल्तनत की ‘भीतरी सीमाओं’ में जो अभ्िायान चले उनका लक्ष्य था गैरिसन शहरों की पृष्ठभूमि में स्िथत भीतरी क्षेत्रों की स्िथति को मशबूत करना। इन अभ्िायानों के दौरान गंगा - यमुना के दोआब से जंगलों को सापफ़कर दिया गया और श्िाकारी - संग्राहकों तथा चरवाहों को उनके पयार्वास से 34 खदेड़ दिया गया। वह शमीन किसानों को दे दी गइर् और कृष्िा - कायर् को प्रोत्साहन दिया गया। व्यापार - मागो± की सुरक्षा और क्षेत्राीय व्यापार की उन्नति की खातिर नए किले और शहर बनाए - बसाए गए। दूसरा विस्तार सल्तनत की बाहरी सीमा पर हुआ। अलाउद्दीन ख़लजी के शासनकाल में दक्ष्िाण भारत को लक्ष्य करके सैनिक अभ्िायान शुरू हुए ;देखें, मानचित्रा 3द्ध और ये अभ्िायान मुहम्मद तुग़्ालक के समय में अपनी चरम सीमा पर पहुँचे। इन अभ्िायानों में सल्तनत की सेनाओं ने हाथी, घोड़े, गुलाम और मूल्यवान धतुएँ अपने कब्शे में ले लीं। दिल्ली सल्तनत की सेनाओं की शुरुआत अपेक्षाकृत कमशोर थी, मगर डेढ़ सौ वषर् बाद, मुहम्मद तुग़़्ालवफ के राज्यकाल के अंत तक इस उपमहाद्वीप का एक विशाल क्षेत्रा इसके यु( - अभ्िायान के अंतगर्त आ चुका था। इसने शत्राुओं की सेनाओं को परास्त किया और शहरों पर कब्शा किया। इसके सूबेदार और प्रशासक मुवफदमों में प़्ौफसले सुनाते थे और साथ ही किसानों से कर वसूल करते थे। लेकिन इतने विशाल क्षेत्रा पर इनका नियंत्राण किस सीमा तक और कितना प्रभावी था? मानचित्रा 3 अलाउद्दीन ख़लजी का दक्ष्िाण भारत अभ्िायान चित्रा 2बारहवीं सदी के आख्िारीदशक में बनी व़ुफव्वतअल - इस्लाम मसजिद तथा उसकी मीनारें। यह जामा मसजिद दिल्ली के सुलतानोंद्वारा बनाए गए सबसे पहलेशहर में स्िथत है। इतिहास में इस शहर को देहली - एवुफह्ना ;पुराना शहरद्ध कहागया है। इस मसजिद का इल्तुतमिश और अलाउद्दीनख़लजी ने और विस्तारकिया। मीनार तीन सुलतानों - व़ुफत्बउद्दीन ऐबक,इल्तुतमिश और प्ि़ाफरोश शाह तुगलव़़फ द्वारा बनवाइर्गइर् थी। चित्रा 3बेगमपुरी मसजिद। यह मुहम्मद तुगलव़्ाफ वेफ़राज्यकाल में, दिल्ली में उसकी नयी राजधानीमसजिद यह अरबी का शब्द है, जिसका शाब्िदक अथर् हैμऐसा स्थान जहाँ मुसलमान अल्लाह की आराध्ना में सशदा ;घुटने और माथा टेककरद्ध करते हैं। जामा मसजिद ;या मसजिद - ए - जामीद्ध वह मसजिद होती है, जहाँ अनेक मुसलमान एकत्रा होकर साथ - साथ नमाश पढ़ते हैं। नमाश की रस्म के लिए सारे नमािायों में से सबसे अध्िक सम्माननीय और विद्वान पुरुष को इमाम ;नेताद्ध के रूप में चुना जाता है। इमाम शुक्रवार की नमाश के दौरान ध्मोर्पदेश ;खुतबाद्ध भी देता है। नमाश के दौरान मुसलमान मक्का की तरपफ मुँह करके खड़े होते हैं। भारत़में मक्का पश्िचम की ओर पड़ता है। मक्का की ओर की दिशा को ‘किबला’ कहा जाता है। दिल्ली के सुलतानों ने सारे उपमहाद्वीप के अनेक शहरों में मसजिदें बनवाईं। इससे उनके मुसलमान और इस्लाम के रक्षक चित्रा 4होने के दावे को बल मिलता था। मोठ की मसजिद,समान आचार संहिता और आस्था सिवंफदर लोदी केका पालन करने वाले श्र(ालुओं के शासनकाल में यह उसकेपरस्पर एक समुदाय से जुड़े होने मंत्राी द्वारा बनवाइर् गइर्। का बोध् उत्पन्न करने में भी मसजिदें सहायक थीं। एक समुदाय का अंग होने के बोध् को प्रबल करना शरूरी था क्योंकि मुसलमान अनेक भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार की चित्रा 5पृष्ठभूमियों से आते थे। जमाली कमाली कीमसजिद, 1520 के दशकके आख्िारी दिनों मेंनिमिर्त। चित्रा 2, 3, 4 एवं 5 की तुलना कीजिए। इन मसजिदों की समानताएँ और असमानताएँ ढूँढनिकालने की कोश्िाश कीजिए। चित्रा 3, 4, 5 में स्थापत्य की उस परंपरा का विकास दिखाइर्देता है, जिसकी चरम सीमा हमें दिल्ली में शाहजहाँ की मसजिद में दिखाइर् देती है ;अध्याय 5में चित्रा 7 देखेंद्ध। ख़लजी और तुग़लव़फ वंश के अंतगर्त प्रशासन और समेकन μ नशदीक से एक नशर दिल्ली सल्तनत जैसे विशाल साम्राज्य के समेकन के लिए विश्वसनीय सूबेदारों तथा प्रशासकों की शरूरत थी। दिल्ली के आरंभ्िाक सुलतान, विशेषकर इल्तुतमिश, सामंतों और शमींदारों के स्थान पर अपने विशेष गुलामों को सूबेदार नियुक्त करना अिाक पसंद करते थे। इन गुलामों को प़्ाफारसी में बंदगाँ कहा जाता है तथा इन्हें सैनिक सेवा के लिए खरीदा जाताथा। उन्हें राज्य के वुफछ बहुत ही महत्त्वपूणर् राजनीतिक पदों पर काम करने के लिए बड़ी सावधनी से प्रश्िाक्ष्िात किया जाता था। वे चूँकि पूरी तरह अपने मालिक पर निभर्र होते थे, इसलिए सुलतान भी विश्वास करके उन पर निभर्र हो सकते थे। आश्रित जो किसी अन्य व्यक्ित के संरक्षण में रहता हो, उस पर निभर्र हो। ख़लजी तथा तुगलव़़फ शासक बंदगाँ का इस्तेमाल करते रहे और साथ ही अपने पर आश्रित निम्न वगर् के लोगों को भी ऊँचे राजनीतिक पदों पर बैठाते रहे। ऐसे लोगों को सेनापति और सूबेदार जैसे पद दिए जाते थे। लेकिन इससे राजनीतिक अस्िथरता भी पैदा होने लगी। गुलाम और आश्रित अपने मालिकों और संरक्षकों के प्रति तो वपफादाऱरहते थे मगर उनके उत्तराध्िकारियों के प्रति नहीं। नए सुलतानों के अपने नौकर होते थे। पफलस्वरूप किसी नए शासक के सिंहासन पर बैठते ही प्रायः नए और पुराने सरदारों के बीच टकराहट शुरू हो जाती थी। सुलतानों द्वारा निचले तबके के लोगों को संरक्षण दिए जाने के कारण उच्च वगर् के कइर् लोगों को गहरा ध्क्का भी लगता था और पफारसी तवारीख के लेखकों ने़‘निचले खानदान’ के लोगों को ऊँचे पदों पर बैठाने के लिए दिल्ली के सुलतानों की आलोचना भी की है। पहले वाले सुलतानों की ही तरह ख़लजी और तुगलव़़फ शासकों ने भी सेनानायकों को भ्िान्न - भ्िान्न आकार के इलाकों के सूबेदार के रूप में नियुक्त किया। ये इलाके इक़्ता कहलाते थे और इन्हें सँभालने वाले अिाकारी इक़्तदार या मुक़्ती कहे जाते थे। मुक़्ती का प़्ाफजर् था सैनिक अभ्िायानों का नेतृत्व करना और अपने इक़्तों में कानून और व्यवस्था बनाए रखना। अपनी सैनिक सेवाओं के बदले वेतन के रूप में मुक़्ती अपने इलावफों से राजस्व की वसूली किया करते थे। राजस्व के रूप में मिली रकम से ही वे अपने सैनिकों को भी तनख्वाह देते थे। मुक़्ती लोगों पर काबू रखने का सबसे प्रभावी तरीका यह था कि उनका पद वंश - परंपरा से न चले और उन्हंे कोइर् भी इक़्ता थोड़े - थोड़े समय के लिए ही मिले, जिसके बाद उनका स्थानांतरण कर दिया जाए। सुलतान अलाउद्दीन ख़लजी और मुहम्मद तुग़़्ालवफ के शासनकाल में नौकरी के इन कठोर नियमों का बड़ी सख्ती से पालन होता था। मुक़्ती लोगों द्वारा एकत्रिात किए गए राजस्व की रकम का हिसाब लेने के लिए राज्य द्वारा लेखा अध्िकारी नियुक्त किए जाते थे। इस बात का ध्यान रखा जाता था कि मुक़्ती राज्य द्वारा निधर्रित कर ही वसूलें और तय संख्या के अनुसार सैनिक रखें। जब दिल्ली के सुलतान शहरों से दूर आंतरिक इलावफों को भी अपने अिाकार में ले आए तो उन्होंने भूमि के स्वामी सामंतों और अमीरशमींदारों को भी अपनी सत्ता के आगे झुकने को बाध्य कर दिया। अलाउद्दीन ख़लजी के शासनकाल में भू - राजस्व के निधर्रण और वसूली के कायर् को राज्य अपने नियंत्राण में ले आया। स्थानीय सामंतों से कर लगाने का अध्िकार छीन लिया गया, बल्िक स्वयं उन्हें भी कर चुकाने को बाध्य किया गया। सुलतान के प्रशासकों ने शमीन की पैमाइश की और इसका हिसाब बड़ी सावधनी से रखा। वुफछ पुराने सामंत और शमींदार राजस्व के निधर्रण और वसूली अध्िकारी के रूप में सल्तनत की नौकरीकरने लगे। उस समय तीन तरह के कर थे: ;1द्ध कृष्िा पर, जिसे खराज कहा जाता था और जो किसान की उपज का लगभग पचास प्रतिशत होता थाऋ ;2द्ध मवेश्िायों परऋ तथा ;3द्ध घरों पर। यह याद रखना शरूरी है कि इस उपमहाद्वीप का काप़्ाफी बड़ा हिस्सा दिल्ली के सुलतानों के अध्िकार से बाहर ही था। दिल्ली से बंगाल जैसे सुदूर प्रांतों का नियंत्राण कठिन था और दक्ष्िाण भारत की विजय के तुरंत बाद ही वह पूरा क्षेत्रा पिफर - से स्वतंत्रा हो गया था। यहाँ तक कि गंगा के मैदानी इलाके में भी घने जंगलों वाले ऐसे क्षेत्रा थे, जिनमें पैठने में सुलतान की सेनाएँ अक्षम थीं। स्थानीय सरदारों ने इन क्षेत्रों में अपना शासन जमा लिया। अलाउद्दीन ख़लजी और मुहम्मद तुग़्ालव़्ाफ इन इलावफों पर शोर - शबरदस्ती अपना अध्िकार जमा तो लेते थे, पर वह अध्िकार वुफछ ही समय तक रह पाता था। ़चंगेश ख़ान के नेतृत्व में मंगोलों ने 1219 में उत्तर - पूवीर् इर्रान में ट्रांसआॅक्ससियाना ;आध्ुनिक उशबेकिस्तानद्ध पर हमला किया और इसके शीघ्र बाद ही दिल्ली सल्तनत को उनका धवा झेलना पड़ा। अलाउद्दीन ख़लजी और मुहम्मद तुगलव़़फ के शासनकालों के आरंभ मंे दिल्ली पर मंगोलों के धवे बढ़ गए। इससे मशबूर होकर दोनों ही सुलतानों को एक विशाल स्थानीय सेना खड़ी करनी पड़ी। इतनी विशाल सेना को सँभालना प्रशासन के लिए भारी चुनौती थी। आइए, देखें कि दोनों सुलतानोें ने इस चुनौती का सामना वैफसे किया। इन तमाम असपफलताओं की गिनती करने में हम कभी - कभी भूल जाते हैं कि सल्तनत के इतिहास में पहली बार दिल्ली के किसी सुलतान ने मंगोल इलाके को प़्ाफतह करने के अभ्िायान की योजना बनाइर् थी। जहाँ अलाउद्दीन ख़लजी का बल प्रतिरक्षा पर था, वहाँ मुहम्मद तुगलव़़फ के द्वारा उठाए गए कदम मंगोलों के विरु( सैनिक आक्रमण की योजना का हिस्सा थे। पंद्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी में सल्तनत तालिका 1 को पिफर से देखें। आप पाएँगें कि तुगलव़़फ वंश के बाद 1526 तक दिल्ली तथा आगरा पर सैयद तथा लोदी वंशों का राज्य रहा। तब तक जौनपुर, बंगाल, मालवा, गुजरात, राजस्थान तथा पूरे दक्ष्िाण भारत में स्वतंत्रा शासक उठ खड़े हुए थे। उनकी राजधनियाँ समृ( थीं और राज्य पफल - पूफल रहे थे। इसी काल में अप़्ाफगान तथा राजपूतों जैसे नए शासक समूह भी उभरे। इस काल में स्थापित राज्यों में से वुफछ छोटे तो थे पर शक्ितशाली थे और उनका शासन बहुत ही वुफशल तथा सुव्यवस्िथत तरीके से चल रहा था। शेरशाह सूर ;1540 - 1545द्ध ने बिहार में अपने चाचा के एक छोटे - से इलाके के प्रबंध्क के रूप में काम शुरू किया था और आगे चलकर उसने इतनी उन्नति की कि मुग़्ाल सम्राट हुमायँू ;1530 - 1540, 1555 - 1556द्ध तक को चुनौती दी और परास्त किया। शेरशाह ने दिल्ली पर अध्िकार करके स्वयं अपना राजवंश स्थापित किया। हालाँकि सूरी वंश ने केवल पंद्रह वषर् ;1540 - 1555द्ध शासन किया, लेकिन इसके प्रशासन ने अलाउद्दीन ख़लजी वाले कइर् तरीकों को अपनाकर उन्हें और भी चुस्त बना दिया। महान सम्राट अकबर ;1556 - 1605द्ध ने जब मुग़्ाल साम्राज्य को समेकित किया, तो उसने अपने प्रतिमान के रूप में शेरशाह की प्रशासन व्यवस्था को ही अपनाया था। ़़ काल में एक किसान हैं और आप सुलतान द्वारा लगाया गया कर नहीं चुका सकते। आप क्या करेंगे? आप अलाउद्दीन ख़लजी या मुहम्मद तग्ुालवफ के शासन 1. दिल्ली में पहले - पहल किसने राजधनी स्थापित की? 2. दिल्ली के सुलतानों के शासनकाल में प्रशासन की भाषा क्या थी? 3. किसके शासन के दौरान सल्तनत का सबसे अध्िक विस्तार हुआ? 4. इब्न बतूता किस देश से भारत में आया था? आइए समझें 5.‘न्याय चक्र’ के अनुसार सेनापतियों के लिए किसानों के हितों का ध्यान रखना क्यों शरूरी था? 6.सल्तनत की ‘भीतरी’ और ‘बाहरी’ सीमा से आप क्या समझते हैं? 7.मुक़्ती अपने कत्तर्व्यों का पालन करें, यह सुनिश्िचत करने के लिए कौन - कौन से कदम उठाए गए थे? आपके विचार में सुलतान के आदेशों का उल्लंघन करना चाहने के पीछे उनके क्या कारण हो सकते थे? 8.दिल्ली सल्तनत पर मंगोल आक्रमणों का क्या प्रभाव पड़ा? 9.क्या आपकी समझ में तवारीख के लेखक, आम जनता के जीवन के बारे में कोइर् जानकारी देते हैं? 10.दिल्ली सल्तनत के इतिहास में रिाया सुलतान अपने ढंग की एक ही थीं। क्या आपको लगता है कि आज महिला नेताओं को श्यादा आसानी से स्वीकार किया जाता है? 11.दिल्ली के सुलतान जंगलों को क्यों कटवा देना चाहते थे? क्या आज भी जंगल उन्हीं कारणों से काटे जा रहे हैं? आइए करके देखें 12.पता लगाइए कि क्या आपके इलाके में दिल्ली के सुलतानों द्वारा बनवाइर् गइर् कोइर् इमारत है? क्या आपके इलाके में और भी कोइर् ऐसी इमारत है, जो बारहवीं से पंद्रहवीं सदी के बीच बनाइर् गइर् हो? इनमें से वुफछ इमारतों का वणर्न कीजिए और उनके रेखाचित्रा बनाइए।

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