मानचित्रा 1 और 2 पर नशर डालिए। मानचित्रा 1 अरब भूगोलवेत्ता अल - इद्रीसी ने 1154 में बनाया था। यहाँ जो नक्शा दिया गया है वह उसके द्वारा बनाए गए दुनिया के बड़े मानचित्रा का एक हिस्सा है और भारतीय उपमहाद्वीप को दशार्ता है। मानचित्रा 2 एक प्रफांसीसी मानचित्राकार ने 1720 में बनाया था। दोनों नक्शे एक ही इलाके के हैं मगर उनमें काप़्ाफी अंतर हैं।अल - इद्रीसी के नक्शे में दक्ष्िाण भारत उस जगह है जहाँ हम आज उत्तरभारत ढूँढेंगे और श्रीलंका का द्वीप ऊपर की तरपफ है। जगहों के नाम अरबी़मानचित्रा 1 बारहवीं सदी केभूगोलवेत्ता अल - इद्रीसी का बनाया हुआ दुनिया के नक्शे का एक हिस्सा जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप दिखाया गया है। मानचित्राकारजो व्यक्ित मानचित्रा/नक्शेबनाता है। मानचित्रा 2 अठारहवीं सदी के आंरभ में ग्िवलाॅम द लिस्ले के एटलस नूवो के अनुसार यह उपमहाद्वीप में दिए गए हैं और उनमें वुफछ जाने - पहचाने नाम भी हैं, जैसे कि उत्तर प्रदेश का कन्नौज। मानचित्रा 2 पहले मानचित्रा के बनने के लगभग 600 वषर् बाद बनाया गया। इस कालावध्ि में उपमहाद्वीप के बारे में सूचनाएँ काप़्ाफी बदल गईं थीं। यह नक्शा हमें श्यादा परिचित लगेगा। उसमें विशेषकर तटीय इलाकों के बारीक ब्यौरे देखकर आश्चयर् होता है। यूरोप के नाविक तथा व्यापारी अपनी समुद्र यात्रा के लिए इस नक्शे का इस्तेमाल किया करते थे ;देखंे अध्याय 6द्ध। लेकिन अब भीतरी इलाकों पर नशर डालें। क्या इनमें भी उतने ही ब्यौरे हैं जितने समुद्र तट वाले हिस्से में? गंगा के मागर् को देखंे। इसे किस तरह से दशार्या गया है? इस मानचित्रा में तटीय और भीतरी इलावफों के बीच ब्यौरों और बारीकी का जो अंतर है, आपके ख्याल में उसका कारण क्या है? हमारे अतीत 2 इतनी ही महत्त्वपूणर् एक और बात यह है कि दूसरे युग तक मानचित्रा - अंकन का विज्ञान भी बहुत बदल गया था। इतिहासकार जब बीते युगों के दस्तावेशों, नक्शों और लेखों का अध्ययन करते हैं तो उनके लिए उन सूचनाओं के संदभो± का, उनकी भ्िान्न - भ्िान्न ऐतिहासिक पृष्ठभूमियों का ध्यान रखना शरूरी होता है। नइर् और पुरानी शब्दावली अगर समय के साथ - साथ सूचनाओं के संदभर् बदलते हैं, तो भाषा और अथो± के साथ क्या होता है? ऐतिहासिक अभ्िालेख कइर् तरह की भाषाओं में मिलते हैं और ये भाषाएँ भी समय के साथ - साथ बहुत बदली हैं। उदाहरण के लिए मध्ययुग की प़फारसी, आध्ुनिक पफारसी ़भाषा से भ्िान्न है। यह भ्िान्नता सिप़्र्ाफ व्याकरण और शब्द भंडार में ही नहीं आइर् है, समय के साथ शब्दों के अथर् भी बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए ‘हिंदुस्तान’ शब्द ही लीजिए। आज हम इसे आधुनिक राष्ट्र राज्य ‘भारत’ के अथर् में लेते हैं। तेरहवीं सदी में जब पफारसी के ़इतिहासकार मिन्हाज - ए - सिराज ने हिंदुस्तान शब्द का प्रयोग किया था तो उसका आशय पंजाब, हरियाणा और गंगा - यमुना के बीच में स्िथत इलाकों से था। उसने इस शब्द का राजनीतिक अथर् में उन इलाकों के लिए इस्तेमाल किया जो दिल्ली के सुलतान के अध्िकार क्षेत्रा में आते थे। सल्तनत के प्रसार के साथ - साथ इस शब्द के अंतगर्त आने वाले क्षेत्रा भी बढ़ते गए, लेकिन हिंदुस्तान शब्द में दक्ष्िाण भारत का समावेश कभी नहीं हुआ। इसके विपरीत, सोलहवीं सदी के आंरभ में बाबर ने हिंदुस्तान शब्द का प्रयोग इस उपमहाद्वीप के भूगोल, पशु - पक्ष्िायों और यहाँ के निवासियों की संस्वृफति का वणर्न करने के लिए किया। यह प्रयोग चैदहवीं सदी के कवि अमीर ख़ुसरो द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘हिंद’ के ही वुफछ - वुफछ समान था। मगर जहाँ ‘भारत’ को एक भौगोलिक औरसंास्वृफतिक सत्त्व के रूप में पहचाना जा रहा था वहाँ हिंदुस्तान शब्द से वे राजनीतिक और राष्ट्रीय अथर् नहीं जुड़े थे जो हम आज जोड़ते हैं। किसी भी शब्द का प्रयोग करने में इतिहासकारों को बहुत सावधान रहना चाहिए क्योंकि अतीत में उन शब्दों के वुफछ अलग ही अथर् थे। उदाहरण के लिए ‘विदेशी’ जैसा सीध - सादा शब्द ही ले लीजिए। हमारे लिए आज इसका अथर् होता है, ऐसा व्यक्ित जो भारतीय न हो। मध्ययुग क्या आपको ऐसे वुफछऔर शब्दों का ध्यानआता है जिनके अथर्भ्िान्न - भ्िान्न संदभो± में बदल जाते हैं? में, मानो किसी गाँव में आने वाला कोइर् भी अनजाना व्यक्ित, जो उस समाज या संस्वृफति का अंग न हो, ‘विदेशी’ कहलाता था। ;ऐसे व्यक्ित को हिंदी में परदेसी और .पफारसी में अजनबी कहा जा सकता है।द्ध इसलिए किसी नगरवासी के लिए वनवासी ‘विदेशी’ होता था विंफतु एक ही गाँव में रहने वाले दो किसान अलग - अलग धमिर्क या जाति पंरपराओं से जुडे़ होने पर भी एक - दूसरे के लिए विदेशी नहीं होते थे। इतिहासकार और उनके ड्डोत इतिहासकार किस युग का अध्ययन करते हैं और उनकी खोज की प्रकृति क्याहै, इसे देखते हुए वे अलग - अलग तरह के ड्डोतों का सहारा लेते हैं। उदाहरण के लिए पिछले साल आपने गुप्तवंश के शासकों और हषर्वधर्न के बारे में पढ़ा। इस पुस्तक में हम मोटे तौर पर 700 से 1750 इर्सवी तक लगभग हशार वषो± के बारे में पढ़ेंगे। इस काल के अध्ययन के लिए इतिहासकार जिन ड्डोतों का प्रयोग करते हैं, उनमें आपको बहुत - सी बातें ऐसी मिलेंगी जो पिछले युग से वैसी ही चली आ रही हैं। इतिहासकार इस काल के बारे में सूचना इकऋी करने के लिए अभी भी सिक्कों, श्िालालेखों, स्थापत्य ;भवन निमार्ण कलाद्ध तथा लिख्िात सामग्री पर निभर्र करते हैं। पर वुफछ बातें पहले से काप़्ाफी भ्िान्न भी हैं। इस युग में प्रामाण्िाक लिख्िात सामग्री की संख्या और विविध्ता आश्चयर्जनक रूप से बढ़ गइर्। इसकेआगे इतिहासकार सूचनाओं के दूसरे प्रकार के ड्डोतों का इस्तेमाल ध्ीरे - ध्ीरे कम हमारे अतीत 4 करने लगे। इस समय के दौरान कागश व्रफमशः सस्ता होता गया और बड़े पैमानेपर उपलब्ध् भी होने लगा। लोग ध्मर्ग्रंथ, शासकों के वृत्तंात, संतों के लेखन तथा उपदेश, अिार्याँ, अदालतों के दस्तावेश, हिसाब तथा करों के खाते आदि लिखने में इसका उपयोग करने लगे। ध्नी व्यक्ित, शासक जन, मठ तथा मंदिर, पांडुलिपियाँ एकत्रिात किया करते थे। इन पांडुलिपियों को पुस्तकालयों तथा अभ्िालेखागारों में रखा जाता है। इन पांडुलिपियों तथा दस्तावेशों से इतिहासकारों को बहुत सारी विस्तृत जानकारी मिलती है मगर साथ ही इनका उपयोग कठिन है। उन दिनों छापेखाने तो थे नहीं, इसलिए लिपिक या नवफलनवीस हाथ से ही पांडुलिपियों की प्रतिवृफति बनाते थे। अगर आपने कभी किसी मित्रा के गृहकायर् की नवफल उतारी है तो आप जानते होंगे कि यह काम आसान नहीं है। कभी - कभी आपको अपने मित्रा की लिखावट समझ में नहीं आती होगी और आपको मशबूर होकर अंदाश ही लगाना पड़ता होगा कि क्या लिखा गया है। पफलस्वरुप आपके लिखे में मित्रा के लिखे हुए से वुफछ छोटे - मोटे लेकिन 5 अभ्िालेखागारऐसा स्थान जहाँदस्तावेशों औरपांडुलिपियों को संग्रहितकिया जाता है। आजसभी राष्ट्रीय और राज्यसरकारों के अभ्िालेखागारहोते हैं जहाँ वे अपनेतमाम पुराने सरकारीअभ्िालेख और लेन - देनके ब्यौरों का रिकाॅडर्रखते हैं। चित्रा 1 यह एक लघुचित्रा की प्रतिवृफति है जिसमें एक लिपिक किसी पांडुलिपि की नकल कर रहा है। इस चित्रा का आकार सि.पर्फ 10.5 से.मी.7.1 से.मी. है। इस छोटे आकार के कारण इसे लघुचित्रा या मिनियेचर कहा जाता है। कभी - कभी इन लघुचित्रों का प्रयोग लेख में आयी पांडुलिपियों को स्पष्टता प्रदान करने के लिए किया जाता था। ये इतने संुदर होते थे कि आगे चलकर संग्रहकतार् अकसर इन चित्रों को पांडुलिपियों से अलग करके बेचने लगे थे। परिवतर्नों की पड़ताल..चित्रा 2 लिखावट की भ्िान्न प्रकार की शैलियों के कारण .पफारसी और अरबी पढ़ने में कठिनाइर् हो सकती है। नस्तलिवफ लिपि ;बायीं ओरद्ध में वणर् जोड़कर धाराप्रवाह रूप से लिखे जाते हैं। .पफारसी, अरबी के जानकारों के लिए इस लिपि को पढ़ना आसान होता है। श्िाक्स्त लिपि ;दायीं ओरद्ध अिाक सघन, संक्ष्िाप्त और कठिन है। महत्त्वपूणर् अंतर आ जाते होंगे। पांडुलिपि की प्रतिलिपि बनाने में भी वुफछ - वुफछ यही होता है। प्रतिलिपियाँ बनाते हुए लिपिक छोटे - मोटे प़्ोफर - बदल करते चलते थे, कहीं कोइर् शब्द, कहीं कोइर् वाक्य। सदी दर सदी प्रतिलिपियों की भी प्रतिलिपियाँ बनती रहीं और अंततः एक ही मूल ग्रंथ की भ्िान्न - भ्िान्न प्रतिलिपियाँ एक - दूसरे से बहुत ही अलग हो गइर्ं। इससे बड़ी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गइर् क्योंकि आज हमें लेखक की मूल पांडुलिपि शायद ही कहीं मिलती है। हमें बाद के लिपिकों द्वारा बनाइर् गइर् प्रतिलिपियों पर ही पूरी तरह निभर्र रहना पड़ता है। इसलिए इस बात का अंदाश लगाने के लिए कि मूलतः लेखक ने क्या लिखा था, इतिहासकारों को एक ही ग्रंथ की विभ्िान्न प्रतिलिपियों का अध्ययन करना पड़ता है। कइर् बार लेखक स्वयं भी समय - समय पर अपने मूल वृत्तंात में संशोध्न करते रहते थे। चैदहवीं शताब्दी के इतिहासकार िायाउद्दीन बरनी ने अपनावृत्तांत पहली बार 1356 में और दूसरी बार इसके दो वषर् बाद लिखा था। दोनोंमें अंतर है लेकिन 1971 तक इतिहासकारों को पहली बार वाले वृत्तांत की जानकारी ही नहीं थी। यह पुस्तकालयों के विशाल संग्रहों में कहीं दबा पड़ा था। हमारे अतीत 6 नए सामाजिक और राजनीतिक समूह सन् 700 और 1750 के बीच के हशार वषो± का अध्ययन इतिहासकारों के आगे भारी चुनौती रखता है, मुख्य रूप से इसलिए कि इस पूरे काल में बड़े पैमाने पर और अनेक तरह के परिवतर्न हुए। इस काल में अलग - अलग समय पर नइर् प्रौद्योगिकी के दशर्न होते हैं, जैसे, सिंचाइर् में रहट, कताइर् में चखेर् और यु( में आग्नेयास्त्रों ;बारूद वाले हथ्िायारद्ध का इस्तेमाल। इस उपमहाद्वीप में नइर् तरह का खान - पान भी आयाμआलू, मक्का, मिचर्, चाय और काॅप़्ाफी। ध्यान रहे कि ये तमाम परिवतर्नμनइर् प्रौद्योगिकियाँ और प़्ाफसलेंμउन लोगों के साथ आए जो नए विचार भी लेकर आए थे। परिणामस्वरूप यह काल आ£थक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्वृफतिक परिवतर्नों का भी काल रहा। अध्याय 5, 6 और 7 में आप इनमें से वुफछ के बारे में जानेंगे। इस युग में लोगों की गतिशीलताμएक स्थान से दूसरे स्थान पर आना - जाना भी बहुत बढ़ गया था। अवसर की तलाश में लोगों के झुंड के झंुड दूर - दूर चित्रा 3की यात्राएँ करने लगे थे। इस उपमहाद्वीप में अपार संपदा और अपना भाग्य रहटगढ़ने के लिए अपार संभावनाएँ मौजूद थीं। इस काल में जिन समुदायों का पयार्वास इसका तात्पयर् किसी भी क्षेत्रा के पयार्वरण औरवहाँ के रहने वालों कीसामाजिक और आ£थकजीवन शैली से है। इस अनुभाग में जो प्रौद्योगिकीय, आ£थक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवतर्न वण्िार्त हंै, उनमें से कौन - कौन से परिवतर्न आपकी समझ में आपके शहर या गाँव में सबसेमहत्त्वपूणर् रहे? हमारे अतीत महत्त्व बढ़ा उनमें से एक समुदाय था राजपूत, जिसका नाम ‘राजपुत्रा’ ;अथार्त् राजा का पुत्राद्ध से निकला है। आठवीं से चैदहवीं सदी के बीच यह नाम आमतौर पर यो(ाओं के उस समूह के लिए प्रयुक्त होता था जो क्षत्रिाय वणर् के होने का दावा करते थे। ‘राजपूत’ शब्द के अंतगर्त केवल राजा और सामंत वगर् ही नहीं, बल्िक वे सेनापति और सैनिक भी आते थे जो पूरे उपमहाद्वीप में अलग - अलग शासकों की सेनाओं में सेवारत थे। कवि और चारण राजपूतों की आचार संहिताμप्रबल पराक्रम और स्वामिभक्ितμका गुणगान करते थे।इस युग में राजनीतिक दृष्िट से महत्त्व हासिल करने के अवसरों का लाभ मराठा, सिक्ख, जाट, अहोम और कायस्थ ;मुख्यतः लिपिकों और मुंश्िायों का कायर् करने वाली जातिद्ध आदि समूहों ने भी उठाया। इस पूरे काल के दौरान क्रमशः जंगलों की कटाइर् हो रही थी और खेती का इलाका बढ़ता जा रहा था। वुफछ क्षेत्रों में यह परिवतर्न अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अध्िक तेजी से और पूरे तौर पर हुआ। पयार्वास में परिवतर्न के कारण कइर् वनवासियों को मशबूर होकर अपना स्थान छोड़ना पड़ा। वुफछ औरवनवासी शमीन की जुताइर् करने लगे और कृषक बन गए। कृषकों के ये नए समूह क्षेत्राीय बाशार, मुख्िायाओं, पुजारियों, मठों और मंदिरों से प्रभावित होने लगे। वे बड़े और जटिल समाजों के अंग बन गए। उन्हें कर चुकाने पड़ते थे और स्थानीय मालिक वगर् की बेगार करनी पड़ती थी। परिणामस्वरूप किसानों के बीच आ£थक और सामाजिक अंतर उभरने लगे। वुफछ के पासश्यादा उपजाऊ शमीन होती थी, वुफछ लोग मवेशी भी पालते थे और वुफछ लोग खेती से खाली समय में दस्तकारी आदि का वुफछ काम कर लेते थे। जैसे - जैसे समाज में अंतर बढ़ने लगे, लोग जातियों और उपजातियों में बाँटे जाने लगे और उनकी पृष्ठभूमि और व्यवसाय के आधर पर उन्हें समाज मेंऊँचा या नीचा दजार् दिया जाने लगा। ये दजेर् स्थायी नहीं थे। किसी जातिविशेष के सदस्यों के हाथों में कितनी सत्ता, प्रभाव और संसाध्नों का नियंत्राण है, इसके आधर पर उसके दजेर् बदलते रहते थे। एक ही जाति का किसी क्षेत्रा में कोइर् दजार् हो सकता था, और किसी अन्य क्षेत्रा में कोइर् और। अपने सदस्यों के व्यवहार का नियंत्राण करने के लिए जातियाँ स्वयं अपने - अपने नियम बनाती थीं। इन नियमों का पालन जाति के बड़े - बुशुगो± की एक सभा करवाती थी जिसे वुफछ इलाकों में ‘जाति पंचायत’ कहा जाता था। लेकिन जातियों को अपने निवास के गाँवों के रिवाजों का पालन भी करना पड़ता था। इसके अलावा कइर् गाँवों पर मुख्िायाओं का शासन होता था। मिल - मिलाकर वे किसी राज्य की एक छोटी इकाइर् भर होती थीं। 8 क्षेत्रा और साम्राज्य चोल ;अध्याय 2द्ध, तुगलव़्ाफ ;अध्याय 3द्ध या मुग़्ाल ;अध्याय 4द्ध जैसे़बड़े - बड़े राज्यों के अंतगर्त कइर् सारे क्षेत्रा आ जाते थे। दिल्ली के सुलतानग़्ायासुद्दीन बलबन ;1266 - 1287द्ध की प्रशंसा में एक संस्कृत प्रशस्ित ;प्रशस्ितके उदाहरण के लिए अध्याय 2 देख्िाएद्ध में उसे एक विशाल साम्राज्य काशासक बताया गया है जो पूवर् में बंगाल ;गौड़द्ध से लेकर पश्िचम में अपफगानिस्तान के ग़्ाशनी ;गज्जनद्ध तक पैफला हुआ था, और जिसमें संपूणऱ्दक्ष्िाण भारत ;द्रविड़द्ध भी आ जाता था। गौड़, आंध््र, केरल, कनार्टक,महाराष्ट्र और गुजरात आदि भ्िान्न - भ्िान्न क्षेत्रों के लोग उसकी सेना के आगे प् सिविस्तान टप्प् सरसुती ग्प्प्प् कड़ा ग्प्ग् गुजरात प्प् उच्छ टप्प्प् वुफहराम ग्प्ट अवध् ग्ग् देवगिरी प्प्प् मुल्तान प्ग् हाँसी ग्ट बिहार ग्ग्प् तेलंगाना प्ट कलानौर ग् दिल्ली ग्टप् लखनौती ग्ग्प्प् तैलंग ट लाहौर ग्प् बदायूँ ग्टप्प् जाजनगर ग्ग्प्प्प् द्वारसमुद्र टप् समाना ग्प्प् कन्नौज ग्टप्प्प् मालवा ग्ग्प्ट मालाबार मानचित्रा 3 मिस्र के श्िाहाबुद्दीन उमरी द्वारा रचित मसालिक अल - अबसर प्ि़ाफ ममालिक अल - अमसर के अनुसार मुहम्मद तुगलव़्ाफ वेफ़राज्यकाल में दिल्ली सल्तनत के अंतगर्त आने वाले प्रांत। पलायन कर जाते थे। इतिहासकार विजय अभ्िायान के इन दावों कोअतिशयोक्ितपूणर् मानते है। साथ ही वे यह समझने की कोश्िाश में भी लगेआप क्या समझते हैं,रहते हैं कि शासक लोग इस उपमहाद्वीप के भ्िान्न - भ्िान्न भागों पर अपनेशासक ऐसे दावे क्यों अध्िकार का उल्लेख क्यों करते रहते हैं।करते थे? हमारे अतीत सन् 700 तक कइर् क्षेत्रों के अपने - अपने भौगोलिक आयाम तय हो चुकेथे और उनकी अपनी भाषा तथा सांस्कृतिक विशेषताएँ स्पष्ट हो गइर् थीं। अध्याय 9 में आपको इनके बारे में और अध्िक जानकारी मिलेगी। ये क्षेत्रा, विशेष शासक राजवंशों से भी जुड़ गए थे। इन राज्यों के बीच का.पफी टकराहटें चलती रहती थीं। कभी - कभी चोल, ख़लजी, तुगलव़्ाफ और मुग़्ाल जैसे़राजवंश अनेक क्षेत्रों में पैफला एक विशाल साम्राज्य भी खड़ा कर लेते थे। ये सभी साम्राज्य समान रूप से स्िथर या सपफल नहीं हो पाते थे। उदाहरण के लिए अध्याय 3 और अध्याय 4 की तालिका 1 की तुलना कीजिए। ख़लजी और मुगल वंश के शासन कितनी - कितनी अवध्ि तक चले?़10 अठारहवीं सदी में मुगल वंश पतन के ढलान पर था। पफलस्वरूप क्षेत्राीय़राज्य पिफर से उभरने लगे ;अध्याय 10द्ध। लेकिन वषो± से जो सवर्क्षेत्राीयसाम्राज्यों का शासन चल रहा था उससे क्षेत्रों की प्रकृति बदल गइर् थी। उन पर कइर् छोटे - बड़े राज्यों का शासन चलता रहा था और उन राज्यों की बहुत - सी बातें इस उपमहाद्वीप के अध्िकतर भाग पर पैफले इन क्षेत्रों को विरासत में मिली थीं। इस तथ्य का पता हमें उन कइर् परंपराओं से लगता है जो इन क्षेत्रों में उभरी थीं। इन परंपराओं में वुफछ एक - दूसरी से भ्िान्न और वुफछ एक समान हैं। ऐसी परंपराएँ हमें प्रशासन, अथर्व्यवस्था के प्रबंधन, उच्चसंस्कृति तथा भाषा के संदभर् में मिलती हैं। सन् 700 से लेकर 1750 के बीचके हशार वषो± में इन विभ्िान्न क्षेत्रों की प्रकृति एक - दूसरे से कटकर अलग - अलग नहीं पनपी थीं। हालाँकि उनके चरित्रा की अपनी विश्िाष्टताएँ बनी रही थीं, मगर समन्वय की सवर्क्षेत्राीय ताकतों का प्रभाव भी उन पर पड़ा था। पुराने और नए ध्मर् इतिहास के जिन हशार वषो± की पड़ताल हम कर रहे हैं, इनके दौरान धमिर्कपरंपराओं में कइर् बड़े परिवतर्न आए। दैविक तत्त्व में लोगों की आस्था पता लगाइए कि क्याआपका राज्य कभी इनसवर्क्षेत्राीय साम्राज्यों काहिस्सा रहा था? यदिरहा था, तो कितने समयतक? कभी - कभी बिल्वुफल ही वैयक्ितक स्तर पर होती थी मगर आम तौर पर इसआस्था का स्वरूप सामूहिक होता था। किसी दैविक तत्त्व में सामूहिक आस्था, यानि ध्मर्, प्रायः स्थानीय समुदायों के सामाजिक और आ£थक ज्ञान एवं ब्राह्मणों के बारे संगठन से संबंिात होती थी। जैसे - जैसे इन समुदायों का सामाजिक संसार में अमीर ख्टिप्पण्िायाँ याद हैं? ़ाुसरो की बदलता गया वैसे ही इनकी आस्थाओं में भी परिवतर्न आता गया। आज हम जिसे हिंदू ध्मर् कहते हैं, उसमें भी इसी युग में महत्त्वपूणर् बदलाव आए। इन परिवतर्नों में से वुफछ थेμनए देवी - देवताओं की पूजा, राजाओं द्वारा मंदिरों का निमार्ण और समाज में पुरोहितों के रूप में ब्राह्मणों कासंरक्षक कोइर् प्रभावशाली,बढ़ता महत्त्व तथा बढ़ती सत्ता आदि। ध्नी व्यक्ित जो किसीसंस्कृत ग्रंथों के ज्ञान के कारण समाज में ब्राह्मणों का बड़ा आदर होता कलाकार, श्िाल्पकार था। इनके संरक्षक थे, नए - नए शासक जो स्वयं प्रतिष्ठा की चाह में थे। इन विद्वान या अभ्िाजात जैसे संरक्षकों का समथर्न होने के कारण समाज में इनका दबदबा और भी बढ़ किसी अन्य व्यक्ित को गया था। मदद या सहारा दे। इस युग में एक महत्त्वपूणर् परिवतर्न भक्ित की अवधरणा के रूप में आया। इसमें इर्श्वर की कल्पना एक ऐसे प्रेमल इर्ष्ट देवी - देवता के रूप में की गइर् थी जिस तक पुजारियों के विशद कमर्कांड के बिना ही भक्त स्वयं पहुँच सवेंफ। इस विषय में, और साथ ही दूसरी परंपराओं के बारे में आपको अध्याय 8 में जानकारी मिलेगी। यही वह युग था जिसमें इस उपमहाद्वीप में नए - नए ध्मो± का भी आगमन ़हुआ। वुफरान शरीपफ का संदेश भारत में पहले - पहल सातवीं सदी में व्यापारियों और आप्रवासियों के शरिए पहुँचा। मुसलमान, वुफरान शरी.पफ को अपनाधमर्ग्रंथ मानते हैं, केवल एक इर्श्वरμअल्लाहμकी सत्ता को स्वीकार करते हैं जिसका प्रेम, करुणा और उदारता अपने में आस्था रखने वाले हर व्यक्ित को गले लगाता है चाहे उस व्यक्ित की सामाजिक पृष्ठभूमि वुफछ भी रही हो। कइर् शासक इस्लाम और इसके विद्वान ध्मर्शास्ित्रायों और न्याय - शास्ित्रायों अथार्त् उलेमा को संरक्षण देते थे। हिंदू ध्मर् की ही भाँति इस्लाम के अनुयायी भी अपने ध्मर् की अलग - अलग तरह से व्याख्या करते थे। मुसलमानों में वुफछ श्िाया थे जो पैगंबर साहब के दामाद अली को मुसलमानों का विध्िसम्मत नेता मानते थे, और वुफछ सुन्नी थे जो खलीपफाओं के प्रभुत्व को स्वीकाऱकरते थे। इस्लाम के आरंभ्िाक दौर में इस ध्मर् का नेतृत्व करने वाले खलीपफा़कहलाते थे और आगे भी इनकी परंपरा चलती रही। इस्लामी न्याय सि(ांत ;विशेषकर भारत में हनप़़्ाफी और शपफी ऐसे सि(ांत हैंद्ध की विभ्िान्न परंपराओंमें भी कइर् महत्त्वपूणर् अंतर रहे हैं। ऐसे ही ध्मर् - सि(ांतों तथा रहस्यवादी विचारों को लेकर विभ्िान्नताएँ देखने को मिलती हैं। समय और इतिहास के कालखंडों पर विचार इतिहासकार समय को केवल घड़ी या वैफलेंडर की तरह नहीं देखते यानी कि केवल घंटों, दिन या वषो± के बीतने के रूप में ही नहीं देखते हंै। उनका नशरिया यह है कि समय सामाजिक और आ£थक संगठन में आने वाले परिवतर्नों को झलकाता है, यह दिखलाता है कि विचारों और विश्वासों में कितना स्थायित्व रहा है और कितना परिवतर्न आया है। यदि अतीत को समान विशेषता रखनेवाले वुफछ बड़े - बड़े हिस्सोंμयुगों या कालोंμमें बाँट दिया जाए तो समय का अध्ययन वुफछ आसान हो जाता है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में अंग्रेश इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को तीन युगों में बाँटा थाः ‘हिंदू’, ‘मुसलिम’ और ‘बि्रटिश’। यह विभाजन इस हमारे अतीत 12 विचार पर आधरित था कि शासकों का ध्मर् ही एकमात्रा महत्त्वपूणर् ऐतिहासिकपरिवतर्न होता है और अथर्व्यवस्था, समाज और संस्कृति में और कोइर् भीमहत्त्वपूणर् बदलाव नहीं आता। इस दृष्िटकोण में इस उपमहाद्वीप की अपार विविध्ता की भी उपेक्षा हो जाती थी। इस काल विभाजन को आज बहुत कम इतिहासकार ही स्वीकार करते हैं। अध्िकतर इतिहासकार आ£थक तथा सामाजिक कारकों के आधर पर ही अतीत के विभ्िान्न कालखंडों की विशेषताएँ तय करते हैं। पिछले साल आपने जो इतिहास पढ़े थे उसमें प्राचीन समाजों के कइर् प्रकारों का समावेश था - जैसे श्िाकारी - संग्राहक, प्रारंभ्िाक दौर के कृष्िाकमीर्, शहरों और गाँवों के निवासी और प्रारंभ्िाक दौर के राज्य और साम्राज्य। इस साल आप जो इतिहासपढ़ेंगे उसे प्रायः मध्यकालीन इतिहास कहा जाता है। इसमें आपको कृषक समाजों के विस्तार, क्षेत्राीय और साम्राज्ियक राज्यों के उदय, कभी - कभी तो ग्रामवासियों और वनवासियों की कीमत पर, प्रधन ध्मो± के रूप में हिंदू धमर्, इस्लाम ध्मर् के विकास और यूरोप से व्यापारी वंफपनियों के आगमन के बारे में और विस्तार से जानकारी मिलेगी। भारत के इतिहास के ये हशार साल अनेक बदलावों के साक्षी रहे हैं। आख्िार, सोलहवीं और अठारहवीं शताब्िदयाँ आठवीं या ग्यारहवीं शताब्िदयों से कापफी भ्िान्न थीं। इसलिए इस सारे काल को एक ऐतिहासिक इकाइर् वेफ़रूप में देखना समस्याओं से खाली नहीं है। पिफर, ‘मध्यकाल’ की तुलना प्रायः ‘आध्ुनिक काल’ से की जाती है। आध्ुनिकता के साथ भौतिक उन्नति और बौिक प्रगति का भाव जुड़ा हुआ है। इससे आशय यह निकलता है कि मध्यकाल रूढि़वादी था और उस दौरान कोइर् परिवतर्न हुआ ही नहीं। लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा नहीं था। इन हशार वषो± के दौरान इस उपमहाद्वीप के समाजों में प्रायः परिवतर्न आते रहे और कइर् क्षेत्रों की अथर्व्यवस्था तो इतनी समृ( हो गइर् थी कि उसने यूरोप की व्यापारी वंफपनियों को भी आकष्िार्त करना आरंभ कर दिया। इसपुस्तक को पढ़ते समय आप परिवतर्न के चिÉों तथा यहाँ सिय ऐतिहासिक प्रियाओं पर ध्यान देते चलें। और, जब भी संभव हो, इस पुस्तक में आप जो पढ़ रहे हैं उसकी तुलना आप पिछले वषर् पढ़ी हुइर् बातों से करने की कोश्िाश करें। जहाँ भी संभव हो, यह देखें कि कहाँ बदलाव हुए हैं और कहाँ नहीं, और आज अपने आस - पास की दुनिया पर नशर डालकर भी यह देखें कि और भी क्या वुफछ बदला है या वैसा ही रहा है। 2. नीचे उल्िलख्िात बातें सही हैं या गलत: ;कद्ध सन् 700 के बाद के काल के संबंध् में अभ्िालेख नहीं मिलते हैं। ;खद्ध इस काल के दौरान मराठों ने अपने राजनीतिक महत्त्व की स्थापनाकी। ;गद्ध कृष्िा - वेंफित बस्ितयों के विस्तार के साथ कभी - कभी वनवासीअपनी शमीन से उखाड़ बाहर कर दिए जाते थे। ;घद्ध सुलतान गयासुद्दीन बलबन असम, मण्िापुर तथा कश्मीर का शासक़था। 3. रिक्त स्थानों को भरें: ;कद्ध अभ्िालेखागारों में रखे जाते हैं। ;खद्ध चैदहवीं सदी का एक इतिहासकार था। ;गद्ध ए ए ए और इस उपमहाद्वीप में इस काल के दौरान लाइर् गइर् वुफछ नइर् पफसलें हैं। 4. इस काल में हुए वुफछ प्रौद्योगिकीय परिवतर्नों की तालिका दें। हमारे अतीत14 5. इस काल के दौरान हुए वुफछ मुख्य धमिर्क परिवतर्नों की जानकारी दें। 6. पिछली कइर् शताब्िदयों में ‘हिंदुस्तान’ शब्द का अथर् वैफसे बदला है? 7. जातियों के मामले वैफसे नियंत्रिात किए जाते थे? 8. सवर्क्षेत्राीय साम्राज्य से आप क्या समझते हैं? आती हैं? 10.इतिहासकार अतीत को कालों या युगों में वैफसे विभाजित करते हैं? क्या इस कायर् में उनके सामने कोइर् कठिनाइर् आती है? आज के मानचित्रा से करें। तुलना करते हुए दोनों के बीच जितनी भी समानताएँ और असमानताएँ मिलती है, उनकी सूची बनाइए। 12.पता लगाइए कि आपके गाँव या शहर में अभ्िालेख ;रिकाॅडर्द्ध कहाँ रखे जाते हैं। इन अभ्िालेखों को कौन तैयार करता है? क्या आपके यहाँ कोइर् अभ्िालेखागार है? उसकी देखभाल कौन करता है? वहाँ किस तरह के दस्तावेश संग्रहित हैं? उनका उपयोग कौन लोग करते हैं?

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