अध्याय7विज्ञापनों को समझना आज हम चारों ओर से विज्ञापनों से घ्िारे हुए हैं। हम इन्हें टेलीविजन पर देखते हैं, रेडियो पर सुनते हैं, सड़कों पर देखते हैं और समाचारपत्रा और पत्रिाकाओं मंे पढ़ते हैं। यहाँतक कि टैक्िसयों और रिक्}ाों पर भी विज्ञापन दिखाइर् पड़तेहैं। जब हम सिनेमा देखने जाते हैं, प्िाफल्म }ाुरू होने के पूवर् विज्ञापन देखते हैं और जब हम इंटरनेट पर विभ्िान्न वेबसाइटें देख रहे होते हैं, ये बीच - बीच में आते रहते हैं। आख्िार विज्ञापन करते क्या हैं? वे हमारे ध्यान को वैफसे आकष्िार्त करते हैं? अिाक जानने के लिए आगे पढ़ें ..विज्ञापन हमारा ध्यान विभ्िान्न प्रकार के उत्पादों की ओर आकष्िार्त करते हैं और उनका सकारात्मक वणर्न करते हैं, जिससे हम उन्हें खरीदने में रफचि लेने लगते हैं। इस अध्याय में हम उफपर दिए गए दो विज्ञापनों पर ध्यान वेंफित कर समझेंगे कि विज्ञापन से क्या होता है और यह वैफसे काम करता है? टाॅप टेस्ट दाल केयर साबुन विज्ञापन में क्या बेचा जा रहा है? वे उत्पाद का वणर्न वैफसे कर रहे हैं? वणर्न में क्या बताने की कोिा}ा है? अतिथ्िायों को यह परोसा जाना चाहिए। चित्रा क्या संप्रेष्िात कर रहे हैं? माँ का प्यार विज्ञापन देखने के बाद क्या आप यह उत्पाद खरीदना चाहेंगे? ब्रांड के नाम और ब्रांड के मूल्यों का निमार्ण क्या आपने कभी ब्रांड }ाब्द सुना है? विज्ञापन ब्रांड निमिर्त करने के बारे में ही है। बिल्वुफल प्रारंभ्िाक स्तर पर ‘बां¯डग’ का अथर् है - किसी उत्पाद पर किसी वि}ोष नाम या चिह्न की मुहर लगाना। एक उत्पाद को बाशार में प्रचलित, अन्य उत्पादों से भ्िान्न दिखाने के लिए ऐसा किया जाता है। आइए, अब इन विज्ञापनों को पिफर से देखें। आपके विचार से दालऔर साबुन के निमार्ताओं ने अपने उत्पादों को वििाष्ट नाम क्यों दिए? केयर साबुन के विज्ञापन में यह प्रतीत होता है कि बच्चे की देखभाल केवल माँ ही करती है। क्या इस छवि में आपको कोइर् समस्या नशर आती है? ‘ब्रां¯डग’ या ‘दागना’ दरअसल पशुपालन की शरूरत से उभरा हुआ शब्द है। अलग - अलग मालिकों के पशु, चरागाहों में एक साथ चरा करते थे और उन्हें पहचानने की समस्या पैदा हो जाती थी। मालिकों ने इस दिक्कत का हल निकाला। वे गमर् लोहे की मदद से अपने पशुओं पर अपना खास चिह्न दागने लगे। इसे ‘ब्रांडिंग’ कहा गया। दालें और दलहन प्रायः बाशार में खुले रूप में बिकते हैं। हम दालों को उनके विभ्िान्न प्रकारों के नामों से जानते हैं, जैसे - मसूर की दाल, उड़द की दाल, आदि। ये नाम ब्रांड के नाम नहीं हैं। जब कोइर् कंपनी मसूर की दाल लेकर एक पैकेट में बंद करती है, तो उसी दाल कोएक वििाष्ट नाम देने की शरूरत पड़ती है। ऐसा करने की आव}यकताइसीलिए है, जिससे कि हम वििाष्ट पैकेट वाली दाल और बाशार में बिकने वाली खुली दाल के बीच भ्रमित न हो जाएँ। इसीलिए वंफपनीवाले एक नाम नििचत कर लेते हैं, जैसे - टाॅप टेस्ट दाल। इस तरह उत्पादों को नाम देना ही ‘ब्रांडिंग’ कहलाता है। ऐसी ही कहानी साबुन की भी है। आज बाशार में बहुत - से़साबुन बिकते हैं। बड़े कस्बों व }ाहरों में अब हम सिपर्फ साबुन नहीं कहते वरन् उनको बनाने वाली विभ्िान्न कंपनियांे का नाम लेते हैं। बाशार में अनेक प्रकार के साबुन उपलब्ध होने के कारण कंपनी कोअपने साबुन को एक अलग और वििाष्ट नाम देना होगा। ऐसा करके वे एक और ब्रांड का साबुन उपलब्ध करा देते हैं। केवल उत्पाद का नाम हमें उसे खरीदने के लिए प्रेरित नहीं करसकता है। साबुन और दाल के निमार्ताओं को हमें आ}वस्त करना होगा कि उनका साबुन और दाल बाशार में उपलब्ध अन्य साबुनों और दालों से बेहतर है। यहीं पर विज्ञापन की भूमिका आती है। हमेंविज्ञापित उत्पाद के प्रति आ}वस्त करने में और उसे खरीदने के लिए प्रेरित करने में विज्ञापन की भूमिका निणार्यक होती है। किसी ब्रांड को विकसित करने का काम उत्पाद को नाम देने पर ही समाप्त नहीं हो जाता है। उदाहरण के लिए - जैसे ही ‘टाॅप टेस्ट दाल’ बिकना शुरू हुईं, एक अन्य कंपनी बाशार में पैकेट बंद दालों को ‘बेस्ट टेस्ट दाल’ के नाम से बेचने का निणर्य ले लेती है। इस प्रकार से अब बाशार में दो प्रकार के ब्रांड की दालें हो गईं। दोनों कंपनियों की शबरदस्त इच्छा होती है कि आप उनकी ही दाल खरीदें। ऐसे में उपभोक्ता भ्रमित हो जाते हैं, क्योंकि वे ‘टाॅप टेस्ट दाल’ और ‘बेस्ट टेस्ट दाल’ का अंतर नहीं जानते। निमार्ता द्वारा ग्राहक को विश्िाष्ट ब्रांड की दाल खरीदने के लिए प्रेरित करने के लिए कारण बताना होता है। केवल दाल को नाम दे देना बिक्री में सहायक नहीं होता। इसीलिए विज्ञापनदाता अपने ब्रांड की वस्तुओं की विशेषताओं का दावा करते हैं। इस तरह से वे अपने उत्पादों को दूसरे उत्पादों से भ्िान्न बताने की चेष्टा करते हैं। निम्नलिख्िात अंश में देख्िाए कि यह दो दालों में किस प्रकार होता है। उपरोक्त विज्ञापनों में आप देख सकते हैं कि दोनों दाल वाले अलग - अलग प्रकार की बातें कर रहे हैं। ‘टाॅप टेस्ट दाल’ अतिथ्िा सत्कार की हमारी सामाजिक परंपरा का सहारा ले रही हंै, तो ‘बेस्ट टेस्ट दाल’ बच्चों के स्वास्थ्य का ख्याल रखने और उन्हें अच्छी चीशें ख्िालाने की हमारी ¯चता को उभार रही हंै। अतिथ्िायों का सत्कार करना और बच्चों को पोषणयुक्त आहार देना जैसे मूल्यों का उपयोग ब्रांड का मूल्य बढ़ाने के लिए किया गया है। ब्रांड मूल्य को हम तक पहुँचाने के लिए दृश्यों और शब्दों के द्वारा हमारे मन को अच्छी लगने वाली छवियाँ निमिर्त की जाती हंै। ब्रांड के मूल्य और सामाजिक मूल्य आज विज्ञापन हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के मुख्य भाग बन गए हैं। हम विज्ञापन देखते हैं, उनके बारे में चचार् करते हैं और प्रायः लोगों का आकलन उनके द्वारा प्रयोग में लाए जा रहे ब्रांड उत्पादों के आधाार पर करते हैं। यह जानने के बाद कि विज्ञापन हमारे जीवन को प्रभावित करने के महत्त्वपूणर् साधन हैं, यह आवश्यक है कि हम समझें कि ये किस तरह काम करते हैं। उत्पादों के निमार्ता यह सुनिश्िचत करने के लिए करोड़ों रफपए खचर् करते हैं कि हम जहाँ भी जाएँ वहाँ उनके विज्ञापन देखते रहें। यह विज्ञापन हमें इस ब्रंाड का सामान इस्तेमाल पर क्या अनुभव कराना चाहता है? यह विज्ञापन किन लोगों से बात कर रहा है और किन लोगों पर ध्यान नहीं दे रहा? यदि आपके पास इन उत्पादों को खरीदने के लिए पैसा हो, तो आपको इन्हें देख कर वैफसा महसूस होगा? यदि आपके पास पैसा न हो, तब वैफसा अनुभव होगा? आइए, पिफर से ध्यानपूवर्क उन दो विज्ञापनों को देखें, जिनसे पाठ शुरू हुआ था। यदि हम यहाँ दिए गए प्रश्नों को करेंगे, तो समझ जाएँगे कि दोनों विज्ञापन किस प्रकार कायर् करते हैं। ब्रांड वाली दालों की कीमत उन दालों से कहीं अिाक होती है, जो खुली मिलती हैं, क्योंकि ब्रांड वाली दालांेमंे पैकिंग और विज्ञापन का मूल्य भी शामिल होता है। इसीलिए बहुत - से लोग उन्हें ही नहीं खरीद पाते है। जो लोग ‘टाॅप टेस्ट दाल’ नहीं खरीद पाते हैं, विज्ञापन की वशह से यह सोचना शुरू कर सकते हैं कि शायद वे अपने अतिथ्िायों का सत्कार बहुत अच्छी तरह नहीं कर रहे हैं। धीरे - धीरे लोग यह विश्वास करने लगेंगे कि ब्रांड वाली दालें ही अच्छी होती हैं और खुली बिकने वाली दाल की अपेक्षा वह दाल खरीदना पसंद करेंगे, जो बंद पैकेट में आती है। वास्तव में दोनों दालों में, जो खुली मिलती हैं और जो पैकेट में मिलती हैं, बहुत कम अंतर हैं। विज्ञापन के कारण हम अंतर की कल्पना करने लगते हैं। केयर सोप के विज्ञापन में पुनः व्यक्ितगत भावनाओं का इस्तेमाल किया गया है। एक माँ के रूप में यदि आप दिखाना चाहती हंै कि आप अपने बच्चे की अच्छी देखभाल करती हैं, तो आपको यह महँगा साबुन खरीदना पड़ेगा। विज्ञापन ने बच्चे के प्रति माँ की चिंता को इस्तेमाल किया है। वह माँ को बताता है कि इस खास ब्रांड के साबुन का इस्तेमाल करके उसका प्रेम और उसकी चिंता सबसे अच्छी तरह प्रदश्िार्त होती है। इस कारण माताएँ यह महसूस करने लगती हैं कि इस साबुन का प्रयोग करना एक संकेत है कि वे अपने बच्चों से कितना अिाक प्यार करती हैं। इस प्रकार से विज्ञापन अपने महँगे साबुन को बेचने के लिए माँ के अपने बच्चे के प्रति प्रेम का इस्तेमाल करता है। जो माताएँ इस साबुन को नहीं खरीद पातीं है, शायद यह महसूस करने लगती हैं कि वे अपने बच्चों की बहुत अच्छी देखभाल नहीं कर रही हैं। जैसाकि आप उपयुर्क्त विज्ञापनों में देख सकते हैं कि वे अध्िकतर हमारी व्यक्ितगत भावनाओं को वेंफद्र बनाने की कोश्िाश करते हैं। हमारी व्यक्ितगत भावनाओं को उत्पादों के साथ जोड़ कर वे इस बात को भी प्रभावित करने की कोश्िाश करते हैं कि हम अपना मूल्य वैफसे आँकते हैं। प्रायः हमारे िय िकेट ख्िालाड़ी और लोकिय अभ्िानेता भी विज्ञापन द्वारा उत्पादों को बेचने का प्रयत्न करते हैं। हम इन चीशों को खरीदने के लिए उत्सुक हो जाते हैं, क्योंकि वे लोग जिन्हें हम अपना नायक समझते हैं, बताते हैं कि वे उत्पाद खरीदने योग्य हैं। साथ ही विज्ञापन हमें अिाकांशतः धनाढ्य लोगों की जीवन शैली के चित्रा दिखाते हैं। इनमें उन लोगों के जीवन की वास्तविकता तो बहुत कम दिखाइर् जाती है, जिन्हें हम अपने चारों ओर देखते हैं। विज्ञापन हमारे जीवन में महत्त्वपूणर् भूमिका अदा करते हैं। हम इन विज्ञापनों के आधार पर न केवल उत्पाद खरीदते हैं, वरन् ब्रांड उत्पादों का उपयोग करने से हम अपने और अपने मित्रों तथा परिवार के बारे में एक अलग तरह से सोचने भी लगते हैं। इसीलिए विज्ञापनों द्वारा बेचे जाने वाले उत्पादों को खरीदने से पहले यह जानना औरसमझना महत्त्वपूणर् है कि विज्ञापन किस प्रकार कायर् करते हैं। यह आवश्यक है कि हम एक ताव्िार्फक ढंग से समझें कि विज्ञापन वुफछ विशेष छवियाँ ही क्यों दिखाते हैं। वे किन व्यक्ितगत भावनाओं को उभारते हैं और इसका हम पर तब क्या प्रभाव पड़ता है, जब हम उन उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं या पिफर इस्तेमाल न कर पाने की दशा में अपने बारे में हमारे क्या विचार बनते हैं। स्वूफल के बच्चों द्वारा बनाया गया यह ‘कोलाश’ मशहूर लोगों को विभ्िान्न उत्पादों का प्रचार करते दिखा रहा है। हाल ही में मीडिया में एक रिपोटर् थी कि एक शीषर्स्थ िकेट ख्िालाड़ी ने 180 करोड़ रफपये में तीन वषर् के लिए कइर् विज्ञापन करने का अनुबंध किया है। एक लोकिय माॅडल एक विज्ञापन के लिए पाँच लाख रफपये या उससे अिाक ले सकती है। आज एक प्रमुख टी.वी. चैनल पर प्राइम टाइम में 30 सेवेंफड का विज्ञापन दिखाने का शुल्क 1 लाख 65 हशार रफपये है। एक प्रमुख अखबार में चैथाइर् पेश के आकार के रंगीन विज्ञापन की कीमत 8.36 लाख रफपए है। विज्ञापन वैफसे बनाया जाता है? लोगों को किसी विशेष ब्रांड की चीशे खरीदवाने में विज्ञापन कामहत्त्वपूणर् हाथ है। यह आसान नहीं होता है और इस पर सैकड़ों किताबें लिखी जा चुकी हैं। विज्ञापन का उद्देश्य होता है - लोगों से एक विशेष ब्रांड की चीशें खरीदवाना। इसका स्पष्ट अथर् है कि विज्ञापन देखने के बाद हमें उस ब्रांड की वस्तु खरीदने की चाहत हो। आओ, देखें विज्ञापन बनाने वाले वैफसे निणर्य लेते हैं कि उत्पाद को बेचने के लिए किन चित्रों, विवरणों और व्यक्ितगत भावनाओं का इस्तेमाल किया जाए। प्यार भरा साबुन एक प्रमुख विज्ञापन कंपनी के कायार्लय में..जैसा कि आप जानते हैं, सभी महानगरों और बड़े शहरों में हमारी कंपनी की कापफी अच्छी पहचाऩहै। अब हम अपना नया ताशगी वाला साबुन हमें विज्ञापनों का एक ऐसा अभ्िायान चलाना है, जिससे ग्राहकों में एक नया चस्का पैदा हो! वे पहले से मौशूद इतने सारे ब्रांडों के तो आदी हो ही चुके हैं। एक विज्ञापन कंपनी के रूप में हमारा पहला काम यह पहचानना है कि आपका ग्राहक किस तरह का व्यक्ित है, यानी इतनी उफँची बाशार में लाना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि यह एक बहुत ही ख़ास साबुन के रूप में सामने आए और आने के छह महीने के अंदर क्वालिटी के साबुन को इस्तेमाल करने वाले वे ख्लोग कौन होंगे। इसे जानने के लिए हम बाशार का ़ाास एक सवेर् करेंगे। पिफर हम एक ऐसे विज्ञापन की अिाकांश ग्राहकों पर कब्शा कर ले। कल्पना करेंगेऋ जो हमारे निशाने पर सही बैठे तथा हमारे ्रेुेलक्ष्िात गाहक का लभा ल! बहुत बढि़या! कृपया बाशार का अध्ययन करने वाले सबसे योग्य विशेषज्ञों को इस काम पर लगाइए। दो सप्ताह के बाद...विज्ञापन कंपनी की रचानात्मक टीम विचार करने लगती है..बाशार के सवेर्क्षण से यह बात सामने आइर् है कि 21 से 40 वषर् के बीच की युवा माताएँ अपने बच्चों के लिए इस्तेमाल किए जा रहे साबुनों के बारे में कापफी प्िाफक्ऱ़करती हंै और वे एक बेहतर साबुन के लिए श्यादा कीमत चुकाने को तैयार हैं। हमें अपने साबुन की ऐसी ब्रांड पहचान बनानी चाहिए, जो उन्हें आकष्िार्त करें! हुँ... अच्छा विचार है! विज्ञापन कंपनी अपने काम को साबुन निमार्ता के समक्ष रखती है..हमारे अभ्िायान की अवधारणा यह होगी - ‘केयर साबुन अपना प्यार रोश तरोताशा करिए।’ हमारे ब्रांड की रणनीति को मशबूत करने के लिए हम चित्रों में भी माताओं और बच्चों को ही जगह देंगें। बाशार में जितने भी बच्चों केसाबुन हैं, वे ‘प्राकृतिक गुण’ जैसी बातों पर शोर देते हैं। हमें कोइर् नया पक्ष उभारना चाहिए! अगर हम अपने साबुन को माँ की ममत्व भरी देखभाल से जोड़ दें, तो वैफसा रहेगा? हमें यह संदेश देना चाहिए कि इस साबुन का इस्तेमाल किए बिना, आप अपने बच्चे के प्रति अपना प्यार पूरी तरह व्यक्त ही नहीं कर सकतीं हैं। इस संदेश के साथ अच्छा लगने वाला एक नया ब्रांड नाम भी हमें सोचना होगा केयर साबुन नाम शबरदस्त! यह वैफसा लगेगा? हुइर् न कोइर् बात! विज्ञापन और उसके चित्रों का परीक्षण ‘लक्ष्िात’ दशर्कों के बीच किया जाता है। हाँ, मुझे लगता है, इससे प्यार और दुलार को एक अलग तरह से शाहिर करने का मौका मिलता है। मैं इस ब्राँड को आजमा कर देखना चाहूँगी। शुिया मैडम! मुझे यह अवधारणापंसद आइर्! साबुन बेचने की रणनीति जब कारगर लगने लगती है, तो विज्ञापन अभ्िायान को अंतिम रूप दिया जाता है और बाशार में साबुन के आने के साथ - साथ उसके विज्ञापन विभ्िान्न संचार माध्यमों से जारी कर दिए जाते हैं। आपके विचार में नीचे दिए गए सामाजिक विज्ञापन में किस श्रोता को संबोिात या ‘लक्ष्िात’ किया गया है? इनमें से प्रत्येक सामाजिक विज्ञापन क्या संदेश पहुँचाना चाह रहा है? राज्य शासन के अध्याय में आपने हैशा की महामारी पफैलने के बारे में पढ़ा। इसे पढ़ने के बाद क्या आप एक सामाजिक विज्ञापन बना सकते हैं जिसमें हैशा की बीमारी से बचाव के उपायों के बारे में बताया गया हो। विज्ञापन और लोकतंत्रा एक लोकतंत्राीय समाज में विज्ञापन अनेक प्रकार से समानता संबंधी विषयों से जुड़ जाते हैं। किसी उत्पाद के विज्ञापन में बहुत पैसा लगता है। प्रायः एक ब्रांड के विज्ञापन में करोड़ों रफपए ख़चर् हो जाते हैं। विज्ञापन बनाना और उन्हें मीडिया में दिखाना बहुत महँगा है, क्योंकि आजकल बाशार में बहुत सारे विज्ञापन हैं। इसीलिए कंपनियों को अपने विज्ञापन बार - बार दिखाने पड़ते हैं, जिससे वे लोगों के दिमाग में बैठ जाएँ। इसका सामान्य अथर् यही है कि केवल बड़ी - बड़ी कंपनियाँ ही विज्ञापन दे सकती हैं। यदि आपका व्यापार छोटा है, तो आपके पास इतना पैसा ही नहीं होगा कि आप अपने उत्पाद का विज्ञापन टी.वी. या राष्ट्रीय स्तर के समाचारपत्रों और पत्रिाकाओं में दे सवेंफ। इसीलिए लोगों द्वारा घर पर बनाकर बेचे जाने वाले पापड़, अचार, मिठाइयाँ और जैम आदि वैसे प़ैफशनेबल नहीं समझे जाते हैं, जैसे ग्राहकों की सेवा में मुस्कान के साथ कि ब्रांडेड उत्पाद। उन्हें प्रायः अपनी चीशें साप्ताहिक बाशार या आस - पास की दुकानों को बेचनी पड़ती हैं, जिनके बारे में आप आगे की इकाइर् में पढ़ेंगें। विज्ञापन हमको यह भी विश्वास दिलाने लगता है कि पैकेट में बंद ब्रांड नामों वाली वस्तुएँ पैविंफग के बिना आने वाली वस्तुओं से बेहतरहैं। हम यह भूल जाते हैं कि उत्पाद की गुणवत्ता का उसकी पैविंफग से कोइर् खास संबंध नहीं है। लोगों के पै¯कग युक्त उत्पादों की ओर आकष्िार्त होने से बहुत से छोटे - छोटे व्यवसायी नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं और अपनी जीविका छोड़ने को विवश हो जाते हैं। लोकतंत्रा में जहाँ सब लोग समान हैं और जहाँ सभी को सम्माननीय जीवन जीने योग्य अवसर मिलने चाहिए, वहाँ विज्ञापन गरीबों के सम्मान में एक प्रकार की कमी शरूर करते हैं। उनके चेहरे विज्ञापनों में नहीं दिखाए जाते हैं और इसीलिए हम उनकेजीवन को कोइर् महत्त्व नहीं देते। विज्ञापन लोगों की निजी भावनाओं को पुकारता है। इसीलिए कइर् बार जब लोग वह विज्ञापित वस्तु नहीं खरीद पाते है, तब उन्हें बुरा लगता है। उन्हें महसूस होता है कि वे अपने िय लोगों का वैसा विज्ञापन हमें यह यकीन दिलाते हंै कि जो चीशें पैक होकर बिकती हैं, वे बिना पैक हुइर् चीशों से श्यादा अच्छी होती हैं। ऐसे रस निकालने वाले अपने ग्राहक गँवाने लगे हैं क्योंकि वे विज्ञापनों के प्रभाव में ब्रांडेड पेय पदाथर् ही खरीदना चाहते हैं। ख्याल रखने में असमथर् हैं, जैसा विज्ञापन में दिखाइर् पड़ रहा है। विज्ञापन धनी और प्रसि( लोगों पर हमारा ध्यान वेंफदि्रत करके हमें गरीबी, भेदभाव और आत्मसम्मान आदि बातों के बारे में सोचने से दूर कर देते हैं, जिनका सामना किए बिना लोकतंत्रा में समानता स्थापित नहीं हो सकती है। उत्पादों को बेचने के अतिरिक्त विज्ञापन हमें यह भी बताते हैं कि हमें अपना जीवन वैफसे जीना चाहिए, हमारीमहत्त्वाकांक्षाएँ और स्वप्न वैफसे हों, हम अपने प्रेम की अभ्िाव्यक्ित वैफसे करें और चुस्त, सपफल और सुंदर होने का तात्पयर् क्या है। लोकतंत्राीय समाज का नागरिक होने के नाते हमें अपने जीवन पर विज्ञापनों से पड़ने वाले सशक्त प्रभाव के बारे में सजग रहना शरूरी है। विज्ञापन क्या करते हैं, इसके बारे में तको± के साथ सोचने के बाद हम बेहतर निणर्य ले सवेंफगे कि हमें अमुक वस्तु खरीदनी है या नहीं। 1 ‘ब्रांड’ शब्द से आप क्या समझते हैं? विज्ञापन के लिए ब्रांड निमिर्त करने के दो मुख्य कारण बताइए। 2 अपनी पसंद के दो छपे हुए विज्ञापन चुनिए। इन्हें देखकर निम्नलिख्िात प्रश्नोंके उत्तर दीजिए: - आपका ध्यान आकष्िार्त करने के लिए इन विज्ञापनों में वैफसी भाषा और चित्रों का उपयोग किया गया है? - इन विज्ञापनों से किन मूल्यों को बढ़ावा दिया जा रहा है? - यह विज्ञापन किन लोगों से संवाद कर रहा है और किन्हें छोड़ रहा है? - यदि आप विज्ञापित ब्रांड खरीदने में समथर् नहीं होंगे, तो आपको वैफसा लगेगा? 3 क्या आप ऐसे दो तरीके बता सकते हैं, जिनके द्वारा आप सोचते हैं कि विज्ञापन का प्रभाव लोकतंत्रा में समानता के मुद्दे पर पड़ता है? 4 विज्ञापन बनाने में रचनात्मकता की बहुत आवश्यकता होती है। आइए, हम एक ऐसी स्िथति की कल्पना करें, जहाँ एक निमार्त्राी ने एक नइर् घड़ी बनाइर् है। निमार्त्राी कहती है कि वह यह घड़ी स्वूफल के बच्चों को बेचना चाहती है। वह आपकी कक्षा में आकर आप सबसे घड़ी के लिए एक ब्रांड का नाम और विज्ञापन बनाने को कहती है। कक्षा को छोटे - छोटे समूहों में बाँट दीजिए। हर समूह इस घड़ी के लिए एक विज्ञापन तैयार करेगा। अब आपस में अपने बनाए कच्चे - पक्के विज्ञापनों और नाम को कक्षा के सामने रख्िाए। शब्द - संकलन उत्पादμइसका तात्पयर् किसी चीश या सेवा से है, जिसे बाशार में बेचने के लिए बनाया गया हो। उपभोक्ताμइससे अभ्िाप्राय ऐसे व्यक्ित से है, जिनके लिए उत्पाद बनाया गया है और जो उत्पाद को खरीदने और उनका उपयोग करने के लिए धन देता है। ब्रांडμइसका आशय उत्पाद के विशेष नाम या पहचान से हैै। इस पहचान का निमार्ण विज्ञापन प्रिया द्वारा होता है। प्रभावित करनाμइसका मतलब किसी के विश्वास या कायर् करने की प्रिया को बदलने की शक्ित से है। जीवन शैलीμइस अध्याय में इस शब्द का तात्पयर् लोगों के जीवन को उनके द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले उत्पादों से जोड़कर देखने से हैै। जैसे - उनके पास क्या - क्या उत्पाद हैं, उनके द्वारा पहने जाने वाले कपड़े, वे स्थान जहाँ वे भोजन करने जाते हैं आदि।

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