5अभ्यासऔरतों ने बदली दुनिया पिछले अध्याय में हमने देखा कि किस तरह महिलाओं द्वारा किया जाने वाला घर का काम, काम ही नहीं माना जाता है। हमने यह भी पढ़ा कि घरेलू काम और परिवार के सदस्यों की देखभाल करना पूरे समय का काम है और इस कायर् को प्रारंभ और समाप्त करने का कोइर् निश्िचत समय भी नहीं है। इस अध्याय में हम घर के बाहर के कामों को देखेंगे और समझेंगे कि वैफसे वुफछ व्यवसाय महिलाओं की अपेक्षा पुरफषों के लिए अध्िक उपयुक्त समझे जाते हैं। हम यह भी ज्ञात करंेगे कि समानता प्राप्त करने के लिए स्ित्रायों ने वैफसे संघषर् किए। पहले भी और आज भी श्िाक्षा प्राप्त करना एक ऐसा तरीका है, जिससे महिलाओं के लिए नए अवसर निमिर्त किए जा सकते हैं। साथ ही इस अध्याय में हम हाल के वषोर् में महिला आंदोलनों द्वारा भेदभाव को चुनौती देने के लिए किए जाने वाले विभ्िान्न प्रकार के प्रयत्नों के बारे में भी संक्षेप में जानेंगे। कौन क्या काम करता है? निम्नलिख्िात लोगों के चित्रा बनाइए μ एक किसान एक मिल मशदूर एक नसर् एक वैज्ञानिक एक पायलट एक श्िाक्षक चलिए, अब आपकी कक्षा द्वारा बनाए गए चित्रों को देखने के लिए नीचे दी गइर् तालिका को भरिए। अब हर व्यवसाय के लिए पुरफषों और महिलाओं के चित्रों को अलग - अलग जोडि़ए। वगर् पुरफष चित्रा महिला चित्रा श्िाक्षक किसान मिल मशदूर नसर् वैज्ञानिक पायलट क्या महिलाओं की अपेक्षा पुरफषों के चित्रा अध्िक हैं? किस प्रकार के व्यवसायों में स्ित्रायों की अपेक्षा पुरफषों के चित्रा अध्िक हैं? क्या सबने नसर् के लिए महिला का ही चित्रा बनाया है? क्यों? क्या महिला किसानों के चित्रा तुलनात्मक रूप से कम हैं? यदि हैं, तो क्यों? भारत में 83.6 प्रतिशत महिलाएँ खेतों में काम करती रोशी मैडम की कक्षा में तीस बच्चे हैं। उन्होंने अपनी कक्षा मेंहैं। उनके काम में पौध्े रोपना, खरपतवार निकालना, यही अभ्यास कराया। परिणाम इस प्रकार रहे μपफसल काटना और वुफटाइर् करना शामिल हैं। पिफर भी ़जब हम किसान के बारे में सोचते हैं, तो हम एक पुरफष के बारे में ही सोचते हैं। ;स्रोत μ 61वाँ नेशनल सैंपल सवेर्, 2004 - 05द्ध अपनी कक्षा में किए गए अभ्यास की तुलना रोशी मैडम की कक्षा के अभ्यास से करिए। वगर् पुरफष चित्रा महिला चित्रा श्िाक्षक 05 25 किसान 30 0 मिल मशदूर 25 05 नसर् 0 30 वैज्ञानिक 25 05 पायलट 27 03 कम अवसर और कठोर अपेक्षाएँ रोशी मैडम की कक्षा के अध्िकांश बच्चों ने नसर् के लिए महिलाओं के और पायलट के रूप में पुरफषों के चित्रा बनाए। ऐसा उन्होंने इस कारण किया कि उन्हें लगता है कि घर के बाहर भी महिलाएँ वुफछ खास तरह के काम ही अच्छी तरह कर सकती हैं। उदाहरण के लिए बहुत - से लोग मानते हैं कि महिलाएँ अच्छी नसे± हो सकती हैं, 56 सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन क्योंकि वे अध्िक सहनशील और विनम्र होती हैं। इसे परिवार में स्ित्रायों की भूमिका के साथ मिला कर देखा जाता है। इसी प्रकार से माना जाता है कि विज्ञान के लिए तकनीकी दिमाग की शरूरत होती है और लड़कियाँ और महिलाएँ तकनीकी कायर् करने में सक्षम नहीं होती। अनेक लोग इस प्रकार की रूढि़वादी धरणाओं में विश्वास करते हैं। इसलिए बहुत - सी लड़कियों को डाॅक्टर व इंजीनियर बनने के लिए अध्ययन करने और प्रश्िाक्षण लेने के लिए वह सहयोग नहीं मिल पाता है, जो लड़कों को मिलता है। अध्िकांश परिवारों में स्वूफली श्िाक्षा पूरी हो जाने के बाद लड़कियों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाता है कि वे शादी को अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य मान लें। यह समझना आवश्यक है कि हम ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहाँ सभी बच्चों को अपने चारों ओर की दुनिया के दबावों का सामना करना पड़ता है। कभी यह दबाव बड़ों की अपेक्षाओं के रूप में होता है, तो कभी यह हमारे अपने ही मित्रों के गलत तरीके से चिढ़ाने के कारण पैदा हो जाता है। लड़कों पर ऐसी रूढि़यों को तोड़ा है रेल का इंजन आदमी चलाते हैं। पर झारखंड के एक गरीब आदिवासी परिवार की 27 वषीर्य महिला लक्ष्मी लाकरा ने इस धरा का रफख बदलदिया है। उत्तरी रेलवे की वह पहली महिला इंजन चालक है। लक्ष्मी के माता - पिता पढ़े - लिखे नहीं हैं, पर उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बहुत संघषर् किया। लक्ष्मी की श्िाक्षा एक सरकारी स्वूफल में हुइर्। स्वूफल में पढ़ने के साथ - साथ लक्ष्मी घर के कामों व अन्य िाम्मेदारियों में हाथ भी बँटाती रही। उसने मन लगाकर और मेहनत से पढ़ाइर् की और स्वूफल पूरा करके इलेक्ट्रॅानिक्स में डिप्लोमा अजिर्त किया। पिफर वह रेलवे बोडर् की परीक्षा में बैठी और पहली हीकोश्िाश में उत्तीणर् हो गइर्। लक्ष्मी कहती है, फ्मुझे चुनौतियों से खेलना पसंद है और जैसे ही कोइर् यह कहता है कि पफलाँ काम लड़कियों के लिए नहीं है, मैं उसे करके रहती हूँ।य् लक्ष्मी के जीवन में ऐसा करने के अनेक अवसर आए। जब वह इलेक्ट्राॅनिक्स करना चाहती थी, जब उसने पाॅलीटेक्नीक में मोटर साइकिल चलाइर् और जब उसने तय किया कि वह इंजन ड्राइवर बनेगी। उसका दृष्िटकोण सीध - सादा हैμजब तक मुझे मशा आ रहा है और मैं किसी को नुकसान नहीं पहँुचा रही और मैं अच्छे से रह पा रही हूँ और अपने माता - पिता की मदद कर पा रही हूँ तो मैं अपने तरीके से क्यों न जीउँफ?य् ;ड्राइविंग हर ट्रेन, नीता लाल, वीमेन्स पफीचर सविर्स़से रूपांतरितद्ध नीचे दी गइर् कहानी को पढि़ए औरउसके बाद दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए μ यदि आप शेवियर होते, तो कौन - से विषय चुनते? अपने अनुभव के आधर पर बताइए कि लड़कों को ऐसे किन - किन दबावों का सामना करना पड़ता है? नौकरी प्राप्त करने के लिए दबाव होता है, जिसमें उन्हें अध्िक वेतन मिले। यदि वे दूसरे लड़कों की तरह व्यवहार नहीं करते हैं, तो उन्हें चिढ़ाया जाता है और धैंस दी जाती है। आपको याद होगा कि कक्षा 6 की पुस्तक में आपने पढ़ा था कि लड़कों को बचपन से ही दूसरों के सामने रोने पर चिढ़ाया जाता है। परिवतर्न के लिए सीखना स्वूफल जाना आपके जीवन का बहुत महत्त्वपूणर् हिस्सा है। जैसे - जैसे स्वूफलों में हर साल अध्िकाध्िक संख्या में बच्चे प्रवेश ले रहे हैं, हम शेवियर अपना दसवीं बोडर् का परीक्षापफल देख कर खुश था। यद्यपि विज्ञान और गण्िात में उसे बहुत अध्िक अंक नहीं मिले थे, लेकिन अपने पसंदीदा विषय इतिहास और भाषाओं में उसने अच्छा किया था। जब उसके माता - पिता ने परिणाम देखे, तो वे खुश नहीं हुए..हे भगवान शेवियर, गण्िात में तुम सिपर्फ़65ः लाए हो। भौतिकशास्त्रा में भी तुम्हारे अंक बहुत कम हैं..मुझे पता है माँ, पर कोइर् बात नहीं, क्योंकि मैं गण्िात और विज्ञान पढ़ना भी नहीं चाहता हूँ। मैं इतिहास पढ़ना चाहता हूँ। तुम इतिहास क्यों पढ़ना चाहते हो? अपने भविष्य के बारे में सोचो। तुम्हें एक अच्छी नौकरी प्राप्त करनी है। इतिहास से क्या मदद मिलेगी? इसमें कोइर् भविष्य नहीं है। पर मुझे गण्िात और विज्ञान अच्छा नहीं लगता। समझदारी से काम लो, बेटे! गण्िात ले लो औरसाथ - साथ वंफप्यूटर भी सीख लेना। वंफप्यूटर सीखने सेनौकरी आसानी से मिल जाती है। 58 सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन सोचने लगे हैं कि सब बच्चों के लिए स्वूफल जाना एक साधरण बात है। आज हमारे लिए यह कल्पना करना भी कठिन है कि वुफछ बच्चों के लिए स्वूफल जाना और पढ़ना ‘पहुच के बाहर’ की बात या ‘अनुचित’ बात भी मानी जा सकती है। परंतु अतीत में लिखना और पढ़ना वुफछ लोग ही जानते थे। अध्िकांश बच्चे वही काम सीखते थे, जो उनके परिवार में होता था या उनके बुशुगर् करते थे। लड़कियों की स्िथति और भी खराब थी। उन समाजों में जहाँ लड़कों को पढ़ना - लिखना सिखाया जाता था, लड़कियों को अक्षर तक सीखने की अनुमति नहीं थी। यहाँ तक कि उन परिवारों में भी जहाँ वुफम्हारी, बुनकरी ;वस्त्रा बुननाद्ध और हस्तकला सिखाइर् जाती थी, यह धरणा थी कि लड़कियों और औरतों का काम केवल सहायता करने तक ही सीमित है। उदाहरण के लिए - वुफम्हार के व्यवसाय में स्ित्रायाँ मिट्टी एकत्रा करती थीं और बतर्न बनाने के लिए उसे तैयार करती थीं। चूँकि वे चाक नहीं चलाती थीं, इसलिए उन्हें वुफम्हार नहीं माना जाता था। 19वीं शताब्दी में ;लगभग 200 वषर् पूवर्द्ध श्िाक्षा के बारे में कइर् नए विचारों ने जन्म लिया। विद्यालय अध्िक प्रचलन में आ गए और वे समाज, जिन्होंने स्वयं कभी पढ़ना - लिखना नहीं सीखा था, अपने बच्चों को स्वूफल भेजने लगे। तब भी लड़कियों की श्िाक्षा को लेकर बहुत विरोध् हुआ। इसके बावशूद, बहुत - सी स्ित्रायों और पुरफषों ने बालिकाओं के लिए स्वूफल खोलने के प्रयत्न किए। स्ित्रायों ने पढ़ना - लिखना सीखने के लिए संघषर् किया। आइए, हम राससुंदरी देवी ;1800 - 1890द्ध का अनुभव पढ़ें, जो दो सौ वषर् पूवर् पश्िचमी बंगाल में रहती थीं। साठ वषर् की अवस्था में उन्होंने बांग्ला भाषा में अपनी आत्मकथा लिखी। उनकी पुस्तक ँरमाबाइर् ;1858 - 1922द्धअपनी बेटी के साथ। महिला - श्िाक्षा की ये यो(ा स्वयं कभी स्वूफल नहीं गईं, पर अपने माता - पिता से उन्होंने पढ़ना - लिखना सीख लिया। उन्हें पंडिता कीउपाध्ि दी गइर्, क्योंकि वे संस्कृत पढ़ना - लिखना जानती थींऋ जो उस समय की औरतों के लिए बहुत बड़ी उपलब्िध् थी। औरतों को तब यह ज्ञान अजिर्त करने की अनुमति नहीं थी। उन्होंने 1898 में, पुणे के पास खेड़गाँव में एक मिशन स्थापित किया, जहाँ विध्वा स्ित्रायों और गरीब औरतों को पढ़नेे- लिखन तथा स्वतंत्रा होने की श्िाक्षा दी जाती थी। उन्हें लकड़ी से चीजें बनाने, छापाखाना चलाने जैसी वुफशलताएँ भी सिखाइर् जाती थीं जो वतर्मान में भी लड़कियों को कम ही सिखाइऱ्जाती हैं। ऊपर बाएँ हाथ की तरपफ छपी तसवीर में उनका छापाखाना दिख रहा है। रमाबाइर् का मिशन आज भी सिय है। श्िाक्षा प्राप्त करके वुफछ महिलाओं ने समाज में स्ित्रायों की स्िथति के बारे में प्रश्न उठाए। उन्होंने असमानता के अपने अनुभवों का वणर्न करते हुए कहानियाँ, पत्रा और आत्मकथाएँ लिखीं। अपने लेखों में उन्होंने स्त्राी और पुरफष दोनों के लिए सोचने और जीने के नए - नए तरीकों की कल्पना की। आमार जीबोन किसी भारतीय महिला द्वारा लिख्िात पहली आत्मकथा है। राससुंदरी देवी एक ध्नवान जमींदार परिवार की गृहिणी थीं। उस समय लोगों का विश्वास था कि यदि लड़की लिखती - पढ़ती है, तो वह पति के लिए दुभार्ग्य लाती है और विध्वा हो जाती है। इसके बावशूद उन्होंने अपनी शादी के बहुत समय बाद स्वयं ही छुप - छुपकर लिखना - पढ़ना सीखा। फ्मैं अत्यंत सबेरे ही काम करना शुरू कर देती थी और उध्र आध्ी रात हो जाने के बाद भी काम में लगी रहती थी। बीच में भी विश्राम नहीं होता था। उस समय मैं केवल चैदह वषर् की थी। मेरे मन में एक अभ्िालाषा पनपने लगी - मैं पढ़ना सीखूँगी और एक धमिर्क पांडुलिपि पढूँगी। मैं अभागी थी। उन दिनों स्ित्रायों को नहीं पढ़ाया जाता था। बाद में मैं स्वयं ही अपने विचारों का विरोध् करने लगी। मुझे क्या हो गया है? स्ित्रायाँ पढ़ती नहीं हैं, पिफर मैं वैफसे पढँ़गी? पिफर मुझे एक स्वप्न आया - मैं चैतन्य भागवत ;एक संतूरुवैफया सखावत हुसैन और लेडीलैंड का उनका सपना रुवैफया सखावत हुसैन एक ध्नी परिवार में पैदा हुइर् थीं, जिसके पास बहुत शमीन थी। यद्यपि उन्हें उदूर् पढ़ना और लिखना आता था, परंतु उन्हें बांग्ला और अंग्रेशी सीखने से रोका गया। उस समय अंग्रेशी को ऐसी भाषा के रूप में देखा जाता था, जो लड़कियों के सामने नए विचार रखती थी। जिन्हें लोग लड़कियों के लिए ठीक नहीं मानते थे। इसलिए अंग्रेशी अध्िकतर लड़कों को ही पढ़ाइर् जाती थी। रुवैफया ने अपने बड़े भाइर् और बहन के सहयोग से बांग्ला और अंग्रेशी पढ़ना और लिखना सीखा। आगे जाकर वे एक लेख्िाका बनीं। 1905 में जब वे केवल पच्चीस वषर् की थीं अंग्रेशी भाषा के कौशल का अभ्यास करने के लिए उन्होंने एक उल्लेखनीय कहानी लिखी, जिसका शीषर्क था सुल्ताना का स्वप्न । कहानी में सुल्ताना नामक एक स्त्राी की कल्पना की गइर् थी, जो लेडीलैंड नाम की एक जगह पहँुचती है। लेडीलैड ऐसा स्थान था, जहाँ पर स्ित्रायों को पढ़ने, काम करने और आविष्कार करने की स्वतंत्राता थी। इस कहानी में महिलाएँ बादलों से होने वाली वषार् को रोकने के उपाय खोजती हैं और हवाइर् कारें चलाती हैं। लेडीलैंड में पुरफषो की आक्रामक बंदूकें और यु( के अन्य अस्त्रा - शस्त्रा, स्ित्रायों की बौिक शक्ित से हरा दिए जाते हैं और पुरफष एक अलग - थलग स्थान में भेज दिए जाते हैं। सुल्ताना, लेडीलैंड में अपनी बहन साराह के साथ यात्रा पर जाती है, तभी उसकी आँख खुल जाती है और उसे पता चलता है कि वह तो केवल स्वप्न देख रही थी। जैसाकि आपने देखा रुवैफया सखावत हुसैन उस समय स्ित्रायों के हवाइर् जहाज और कारें चलाने का स्वप्न देख रहीं थीं, जब लड़कियों को स्वूफल तक जाने की अनुमति नहीं थी। इस तरह से श्िाक्षा ने रुवैफया का जीवन बदल दिया। रुवैफया केवल स्वयं श्िाक्ष्िात होकर संतुष्ट नहीं हुईं। उनकी श्िाक्षा ने उन्हें स्वप्न देखने और लिखने की ही शक्ित नहीं दी, वरन् उससे भी अध्िक करने की शक्ित दी। 1910 में उन्होंने कोलकाता में लड़कियों के लिए एक स्वूफल खोला, जो आज भी कायर् कर रहा है। का जीवनद्ध पढ़ रही थी। बाद में दिन के समय जब मैं रसोइर् में बैठी हुइर् भोजन बना रही थी, मैंने अपने पति को सबसे बड़े बेटे से कहते हुए सुना - फ्बिपिन! मैंने अपनी चैतन्य भागवत यहाँ छोड़ी है। जब मैं इसे मँगाउँफ, तुम इसे अंदर ले आना।य् वे पुस्तक वहीं छोड़कर चले गए। जब पुस्तक अंदर रख दी गइर्, मैंने चुपके से उसका एक पन्ना निकाल लिया और सावधनी से उसे छुपा दिया। उसे छुपाना भी एक बड़ा काम था, क्योंकि किसी को भी वह मेरे हाथ में नहीं दिखनाचाहिए था। मेरा सबसे बड़ा बेटा उस समय ताड़ के पत्तों पर लिखकर अक्षर बनाने का अभ्यास कर रहा था। उसमें से भी मैंने एक छिपा दिया। जब मौका मिलता, मैं जाती और उस पन्ने के अक्षरों का मिलान अपने याद किए गए अक्षरों से करती। मैंने उन शब्दों का भी मिलान करने की कोश्िाश की, जो मैं दिन - भर में सुनती रहती थी। अत्यध्िक जतन और कोश्िाशों से एक लंबे समय के बाद मैं पढ़ना सीख सकी।य् राससुंदरी देवी के अक्षर ज्ञान ने उन्हें चैतन्य भागवत पढ़ने का अवसर दिया। स्वयं अपने लेखन से उन्होंने संसार को उस समय की स्ित्रायों के जीवन के बारे में जानने का एक अवसर दिया। राससंुदरी देवी ने अपने दैनन्िदन जीवन के अनुभवों को विस्तार से लिखा है। ऐसे भी दिन होते थे, जब उन्हें दिनभर में क्षण - भर का भी विश्राम नहीं मिलता था इतना समय भी नहीं कि वे शरा बैठकर वुफछ खा ही लें। वतर्मान समय में श्िाक्षा और विद्यालय आज के युग में लड़के और लड़कियाँ विशाल संख्या में विद्यालय जा रहे हैं, लेकिन पिफर भी हम देखते हैं कि लड़वफों और लड़कियों की श्िाक्षा में अंतर है। भारत में हर दस वषर् में जनगणना होती है, जिसमें पूरे देश की जनसंख्या की गणना की जाती है। इसमें भारत में रहने वालों के जीवन के बारे में भी विस्तृत जानकारी एकत्रिात की जाती है, जैसे - उनकी आयु, पढ़ाइर्, उनके द्वारा किए जाने वाले काम, आदि। इस जानकारी का इस्तेमाल हम अनेक बातों के आकलन के लिए करते हैं, जैसे - श्िाक्ष्िात लोगों की संख्या तथा स्त्राी और पुरफषों का अनुपात। 1961 की जनगणना के अनुसार सब लड़कों और पुरफषों ;7 वषर् एवं उससे अध्िक आयु केद्ध का 40 प्रतिशत श्िाक्ष्िात था ;अथार्त् वे कम - से - कम अपना नाम लिख सकते थेद्ध। इसकी राससुंदरी देवी और रुवैफया हुसैन जिन्हें पढ़ने - लिखने की अनुमति नहीं मिली थी, की स्िथति के विपरीत वतर्मान समय में भारत में बड़ी संख्या में लड़कियाँ स्वूफल जा रही हैं। इसके बावशूद भी बहुत - सी लड़कियाँ गरीबी, श्िाक्षण की सुविधओं के अभाव और भेदभाव के कारण स्वूफल जाना छोड़ देती हैं। सभी समाजों और वगो± की पृष्ठभूमि वाले बच्चों को श्िाक्षण की समान सुविधएँ प्रदान करना, विशेषकर लड़कियों को, आज भी भारत में एक चुनौती है। तुलना में लड़कियों तथा स्ित्रायों का केवल 15 प्रतिशत भाग श्िाक्ष्िात था। 2001 की जनगणना के अनुसार लड़कों व पुरफषों की यह संख्या बढ़कर 76 प्रतिशत हो गइर् है और श्िाक्ष्िात लड़कियों तथा स्ित्रायों की संख्या 54 प्रतिशत। इसका आशय यह हुआ कि पुरफषों और स्ित्रायों, दोनों के बीच ऐसे लोगों का अनुपात बढ़ गया है, जो पढ़ - लिख सकते हैं और जिन्हें वुफछ हद तक श्िाक्षा मिल चुकी है। लेकिन जैसाकि आप देख सकते हैं, अब भी स्ित्रायों की तुलना में पुरफषों का प्रतिशत अध्िक है। इनके बीच का अंतर अभी समाप्त नहीं हुआ है। नीचे दी गइर् तालिका में विभ्िान्न वगो± के उन लड़कों व लड़कियों का प्रतिशत दशार्या गया है, जो बीच में ही विद्यालय छोड़ देते हैं। शासकीय शब्दावली में दलितों के लिए अनुसूचित जाति और आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति शब्दावली का उपयोग किया जाता है। स्वूफल का स्तर सब लड़के अनु.जाके लड़के अनु.जन.जासब अनु.जा. की अनु.जन.जायोग के लड़के लड़कियाँ लड़कियाँ की लड़कियाँ प्राथमिक ;कक्षा 1 से 5द्ध 34 37 49 29 36 49 31 माध्यमिक ;कक्षा 6 से 8द्ध 52 57 69 53 62 71 52 उच्च माध्यमिक ;कक्षा 9 से 10द्ध 61 71 78 65 76 81 63 स्रोत μ सेलेक्ट एजुकेशन सवेर्, भारत सरकार 2003 - 04 माध्यमिक स्तर पर कितने बच्चे स्वूफल छोड़ देते हैं? श्िाक्षा के किस स्तर पर आपको सवार्ध्िक बच्चे स्वूफल छोड़ते हुए दिखाइर् देते हैं? आपके विचार में अन्य सभी वगो± की तुलना में, आदिवासी लड़के - लड़कियों की विद्यालय छोड़ने की दर अध्िक क्यों है? संभवतः आपने उफपर दी गइर् तालिका में इस बात पर ध्यान दिया होगा कि ‘सब लड़कियों’ की श्रेणी की तुलना में अनुसूचित जाति और जनजाति की लड़कियों की स्वूफल छोड़ने की दर अध्िक है। इसका अथर् यह हुआ कि दलित व आदिवासी पृष्ठभूमि की लड़कियों के स्वूफल में रहने की संभावना कम रहती है। वषर् 2001 की जनगणना से यह भी पता चलता है कि दलित और आदिवासी लड़कियों की अपेक्षा मुस्िलम लड़कियों की प्राथमिक श्िाक्षा पूरी करने की संभावना और भी कम रहती है। मुस्िलम लड़कियाँ स्वूफल में लगभग 3 वषर् रह पाती हैं, जबकि अन्य समुदायों की लड़कियाँ स्वूफल में 4 वषर् का समय बिता पा रही है। दलित, आदिवासी और मुस्िलम वगर् के बच्चों के स्वूफल छोड़ देने के अनेक कारण हैं। देश के अनेक भागों में विशेषकर ग्रामीण और गरीब क्षेत्रों में नियमित रूप से पढ़ाने के लिए न उचित स्वूफल हैं, न ही श्िाक्षक। यदि विद्यालय घर के पास न हो और लाने - ले जाने के 62 सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन लिए किसी साध्न जैसे बस या वैन आदि की व्यवस्था न हो तो अभ्िाभावक लड़कियों को स्वूफल नहीं भेजना चाहते। वुफछ परिवार अत्यंत निध्र्न होते हैं और अपने सब बच्चों को पढ़ाने का खचार् नहीं उठा पाते हैं। ऐसी स्िथति में लड़कों को प्राथमिकता मिल सकती है। बहुत - से बच्चे इसलिए भी स्वूफल छोड़ देते हैं, क्योंकि उनके साथ उनके श्िाक्षक और सहपाठी भेदभाव करते हैं, जैसा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि के साथ हुआ। 50 40 30 प्रतिशत20 अनु सभी जाति लड़के के 10 34: लड़के 37: 0 लड़के और लड़कियाँ महिला आंदोलन अब महिलाओं और लड़कियों को पढ़ने का और स्वूफल जाने का अध्िकार है। अन्य क्षेत्रा भी हैं - जैसे कानूनी सुधर, हिंसा और स्वास्थ्य, जहाँ लड़कियों और महिलाओं की स्िथति बेहतर हुइर् है। ये परिवतर्न अपने - आप नहीं आए हैं। औरतों ने व्यक्ितगत स्तर पर और आपस में मिल कर इन परिवतर्नों के लिए संघषर् किए हैं। इन संघषो± को महिला आंदोलन कहा जाता है। देश के विभ्िान्न भागों से कइर् औरतें और कइर् महिला संगठन इस आंदोलन के हिस्से हैं। कइर् पुरफष भी महिला आंदोलन का समथर्न करते हैं। इस आंदोलन में जुटे लोगों की मेहनत, निष्ठा और उनकी विशेषताएँ इसे एक बहुत ही जीवंत आंदोलन बनाती हैं। इसमें चेतना जागृत करने, भेदभावों का मुकाबला करने और न्याय हासिल करने के लिए भ्िान्न - भ्िान्न रणनीतियों का उपयोग किया गया है। इनकी वुफछ झलकियाँ आप यहाँ देख सकते हैं। प्राथमिक कक्षाओं में स्वूफल छोड़ देने वाले बच्चों के आँकड़ों को उफपर दी गइर् तालिका में से लेकर दंडारेख के रूप में दशार्इए। पहले दो आँकड़े आपके लिए दंडारेख के रूप में दशार्ए गए हैं। अभ्िायान भेदभाव और हिंसा के विरोध् में अभ्िायान चलानामहिला आंदोलन का एक महत्त्वपूणर् हिस्सा है। अभ्िायानों के पफलस्वरूप नए कानून भी बने हैं। सन् 2006 में एक कानून बना है, जिससे घर के अंदर शारीरिक और मानसिक हिंसा को भोग रही औरतों को कानूनी सुरक्षा दी जा सके। इसी तरह महिला आंदोलन के अभ्िायानों के कारण 1997 में सवोर्च्च न्यायालय ने कायर् के स्थान पर और शैक्षण्िाक संस्थानों में महिलाओं के साथ होने वाली यौन प्रताड़ना से उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए दिशा निदेर्श जारी किए। एक और उदाहरण देखें, तो 1980 के दशक में देश भर के महिला संगठनों ने दहेज हत्याओं के ख्िालापफ आवाश उठाइर्। नवविवाहित युवतियों़को उनके पति और ससुराल के लोगों द्वारा दहेज के लालच में मौत के घाट उतार दिया जाता था। महिला संगठनों ने इस बात की कड़ी आलोचना करी कि कानून अपराध्ियों का वुफछ नहीं कर पा रहा है। इस मुद्दे पर महिलाएँ सड़कों पर निकल आइर्ं। उन्होंने आदलत के दरवाशे खटखटाए और आपस में अनुभव व जानकारियों का आदान - प्रदान किया। अंततः यह समाज का एक बड़ा सावर्जनिक मुद्दा बन गया और अखबारों में छाने लगा। दहेज से संबंध्ित कानून को बदला गया, ताकि दहेज माँगने वाले परिवारों को दंडित किया जा सके। सत्यारानी, महिला आंदोलनों की एक सिय सदस्या, दहेज के लिए मार दी गइर् अपनी बेटी के मामले में न्याय माँगने के लिए लड़े गए लंबे मुवफदमे की कानूनी पफाइलों से घ्िारी हुईं सवोर्च्च न्यायालय की सीढि़यों पर बैठी हैं।़जागरूकता बढ़ाना औरतों के अध्िकारों के संबंधें में समाज में जागरूकता बढ़ाना भी महिला आंदोलन का एक प्रमुख कायर् है। गीतों, नुक्कड़ - नाटकों व जनसभाओं के माध्यम से वह अपने संदेश लोगों के बीच पहुँचाता है। विरोध् करना जब महिलाओं के हितों का उल्लंघन होता है, जैसे किसी कानून अथवा नीति द्वारा, तो महिला आंदोलन ऐसे उल्लंघनों के ख्िालाप़्ाफ आवाश उठाता है। लोगों का ध्यान खींचने के लिए रैलियाँ, प्रदशर्न आदि बहुत असरकारक तरीके हैं। बन्ध्ुत्व व्यक्त करना न्याय के अन्य मुद्दों व औरतों के साथ बन्ध्ुत्व व्यक्त करना भी महिला आंदोलन का ही हिस्सा है। 8 माचर्, अंतरार्ष्ट्रीय महिला दिवस को दुनियाभर की औरतें अपने संघषो± को ताशा करने और जश्न मनाने के लिए इकट्ठी होती हैं। हर साल 14 अगस्त को वाघा में भारत - पाकिस्तान की सीमा पर हशारों लोगइकट्ठा होते हैं और एक सांस्कृतिककायर्क्रम आयोजित करते हैं। ऊपर की तसवीर में भारत और पाकिस्तान के लोगों के बीच बंध्ुत्व प्रदश्िार्त करते हुए औरतेेंजलती हुइर् मोमबिायाँ उठा रही हैं। 1 आपके विचार से महिलाओं के बारे में प्रचलित रूढि़वादी धरणा कि वे क्या कर सकती हैं और क्या नहीं, उनके समानता के अध्िकार को वैफसे अपने प्रभावित करती है? 2 कोइर् एक कारण बताइए, जिसकी वशह से राससुंदरी देवी, रमाबाइर् औररुवैफया हुसैन के लिए अक्षर ज्ञान इतना महत्त्वपूणर् था। 3 फ्निध्र्न बालिकाएँ पढ़ाइर् बीच में ही छोड़ देती हैं, क्योंकि श्िाक्षा में उनकी रफचि नहीं है।य् पृष्ठ 17 पर दिए गए अनुच्छेद को पढ़ कर स्पष्ट कीजिए कि यह कथन सही क्यों नहीं है? 4 क्या आप महिला आंदोलन द्वारा व्यवहार में लाए जाने वाले संघषर् के दो तरीकों के बारे में बता सकते हैं? महिलाएँ क्या कर सकती हैं और क्या नहीं, इस विषय पर आपको रूढि़यों के विरफ( संघषर् करना पड़े, तो आप पढ़े हुए तरीकों में से कौन - से तरीवफों का उपयोग करेंगे? आप इसी विशेष तरीके का उपयोग क्यों करेंगे? शब्द - संकलन रूढि़वादी धरणा μ जब हम विश्वास करने लगते हैं कि किसी विशेष धमिर्क, आथ्िार्क, क्षेत्राीय समूह के लोंगों की वुफछ निश्िचत विशेषताएँ होती ही हैं या वे केवल खास प्रकार का कायर् ही कर सकते हंै, तब रूढि़वादी धरणाओं का जन्म होता है। जैसे इस पाठ में हमने देखा कि लड़कों और लड़कियों को अलग - अलग विषय लेने के लिए कहा गया। कारण उनकी रुचि न होकर उनका लड़का - लड़की होना था। रूढि़वादी धरणाएँ हमें, लोगों को उनकी वैयक्ितक विश्िाष्टताओं के साथ देखने से रोकती हैं। भेदभाव μ भेदभाव तब होता है, जब हम लोगों के साथ समानता व आदर का व्यवहार नहीं करते हैं। यह तब होता है, जब व्यक्ित या संस्थाएँ पूवार्ग्रहों से ग्रसित होती हैं। भेदभाव तब होता है जब हम किसी के साथ अलग व्यवहार करते हैं या भेद करते हैं। उल्लंघन μ जब कोइर् शबरदस्ती कानून तोड़ता है या खुले रूप से किसी का अपमान करता है, तब हम कह सकते हैं कि उसने ‘उल्लंघन’ किया है। यौन प्रताड़ना μ इसका आशय औरत की इच्छा के विरफ( उसके साथ यौन से जुड़ी शारिरिक या मौख्िाक हरकतें करने से है।

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